Thursday, June 04, 2009

ऐसे होंगे भविष्य के टूथ ब्रश

जब आजकल हर छोटी-बड़ी चीज तकनीकी विकास से प्रभावित हो रही है तो दैनंदिन के उपयोग में आनेवाला टूथब्रश ही क्यों इससे अछूता रहे। वैज्ञानिकों का कहना है भविष्य के टूथ ब्रश भी लेसर जैसे अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों से लैस होकर हमारे सामने प्रकट होंगे।

इन ब्रशों के रेशों में से लेसर की तेज रोशनी निकलेगी जो खास तौर से बने प्रकाश-संवेदनशील टूथ पेस्ट की सहायता से मुंह में बदबू लानेवाले और मसूड़ों की बीमारियां पैदा करनेवाले जीवाणुओं को नष्ट करेगी।

लेसर किरणें इन ब्रशों के हत्थों से निकलकर ब्रशों के रेशों के सिरे पर से मुंह के अंदर फैलेंगी। ये रेशे ओप्टिकल फाइबर के जैसे काम करेंगे। दांतों को मांजने की क्रिया के दौरान इस टूथ ब्रश के साथ उपयोग करने के लिए बनाया गया खास टूथ पेस्ट मुंह के जीवाणुओं के संपर्क में आएगा। इस टूथ पेस्ट में प्रकाश से सक्रिय होने वाले रसायन रहेंगे। टूथ ब्रश से निकली रोशनी इन रसायनों को सक्रिय बना देगी जो जीवाणुओं को नष्ट कर देंगे।

यह तरीका कैंसर के इलाज में उपयोग की जानेवाली फोटोडाइनेमिक थिरेपी का विकसित रूप है। इस चिकित्सा पद्धति में प्रकाश के उपयोग से कुछ प्रकार के रसायनों को सक्रिय बनाया जाता है।

लंदन के इंपीरियल कोलेज और ईस्टमैन डेंटल इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिक कैंसर में उपयोग होनेवाली इस तकनीक को मुंह के जीवाणुओं को मारने के लिए परिवर्तित कर रहे हैं। ईस्टमैन डेंटल इंस्टिट्यूट के माइकल विलसन का कहना है कि इस विधि से मुंह या मसूड़ों को नुक्सान नहीं होगा क्योंकि जीवाणु मुंह की कोशिकाओं की तुलना में कहीं अधिक नाजुक होते हैं और प्रकाश व उससे सक्रिय बनाए गए रसायनों से नष्ट हो जाते हैं। इंपीरियल कालेज के डेविड फिलिप के अनुसार इस विधि के घर-घर पहुंचने में केवल एक अड़चन है। अब तक जो प्रकाश-संवेदनशील जीवाणुनाशी ज्ञात हैं, उनके उपयोग से मुंह और दांतों में नीले दाग पड़ सकते हैं। इसलिए इस विधि को सफल बनाने के लिए कोई अन्य प्रकाश-संवेदनशील जीवाणुनाशी खोजना होगा। इसमें समय लगेगा।

डेविड फिलिप व माइकिल विलसन को विश्वास है कि रोशनी फेंकने वाला टूथ ब्रश एक ऐसी अजीबोगरीब खोज है कि लोग उसके साथ उपयोग किए जानेवाले टूथ पेस्ट के अभाव में भी उसे अपनाने के लिए तैयार होंगे, खासकरके बच्चे जिनमें नियमित रूप से दांत साफ करने की आदत डालने में यह नया टूथ ब्रश उपयोगी रहेगा।

4 Comments:

ghughutibasuti said...

:) हाहा,मुझे तो याहू चैट के हास्य के इमोटिकोम वाले नीले दाँत याद आ रहे हैं। नीले भी चलेंगे। रोचक जानकारी है।
घुघूती बासूती

श्यामल सुमन said...

जानकारी अच्छी दी है आपने। लेकिन सचमुच ऐसा कबतक हो पायगा?

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

गिरिजेश राव, Girijesh Rao said...

घूम फिर कर यह पता चलेगा कि नीम की दातुन सबसे अच्छी होती है लेकिन अफसोस तब तक वह इस धरा से लुप्त हो चुकेगी।

farhaan khan said...

about of islam

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