Saturday, December 20, 2014

पेशावर हत्याकांड – पाकिस्तान की आतंकी नीति की खुलती परतें

पाकिस्तानी तालिबान द्वारा पेशावर के फ़ौजी स्कूल में किए गए हत्याकांड का विश्लषण करने से पाकिस्तान की आतंकी नीति की परतें खुलती हैं, और हमें इस नीति को बेहतर रूप से समझने में मदद मिलती है।

तालिबान पाकिस्तानी फ़ौज और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई द्वारा बनाया गया संगठन है। उसे निर्मित करने का उद्देश्य उसकी मदद से अफ़गानिस्तान में पाक-समर्थक सरकार स्थापित करना है। पाकिस्तान अफ़गानिस्तान को अपना पिछवाड़ा मानता है जो भारत के साथ भविष्य में होनेवाले युद्धों के लिए भौगोलिक गहराई प्रदान करनेगा। वहाँ वह ऐसी किसी भी सरकार को पनपने नहीं देता है जो उसके हितों के विरुद्ध जाए। वर्तमान में अमरीका द्वारा अफ़गानिस्तान में स्थापित सरकार पाक-विरोधी सरकार है। अब चूँकि अमरीका अफ़गान युद्ध हारने के बाद अपनी सेना को अफ़गानिस्तान से खींच रहा है, पाकिस्तान को वहाँ एक बार फिर पाक-समर्थक तालिबान सरकार स्थापित करने के अवसर नज़र आ रहे हैं।

ओसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा द्वारा न्यू योर्क के ट्विन टावर को धराशायी करने के बाद अमरीका ने काबुल में तालिबानी सरकार को अपदस्थ करके वहाँ करज़ई की कठपुली सरकार स्थापित कर दी थी। अमरीकी सेना के हमलों से बचने के लिए तालिबानी लड़ाके अफ़गानिस्तान भर में और अफ़गानिस्तान से लगते पाकिस्तान के इलाक़ों में फैल गए और वहाँ से अपनी छापेमार लड़ाई चलाते रहे। यह लड़ाई अब सफलता की ओर बढ़ रही है और अमरीका अपनी सेना समेटकर वापस जा रहा है। पीछे रह गई अफ़गानी सेना अकुशल, अपेशवर, अप्रशिक्षत और अनुभवहीन है और वह तालिबान के मँजे हुए लड़ाकों का मुक़ाबला करने में असमर्थ हैं। इतना ही नहीं, तालिबानों को पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का परोक्ष समर्थन और मार्गदर्शन भी प्राप्त है। इससे उसे जल्द ही काबुल में एक बार फिर अपनी सत्ता क़ायम करने की उम्मीद है।

लेकिन, इस परिदृश्य को बिगाड़नेवाली कुछ बातें भी अफ़गान-पाकिस्तान में गतिशील हो रही हैं। इतने दिनों तक अमरीकी सेना से लड़ने और अंत में उसे हराने से तालिबान के हौसले बुलंद हैं और उसे पाकिस्तानी सेना द्वारा नचाया जाना बिलकुल रास नहीं आ रहा है। दूसरे, तालिबान अल-क़ायदा से जुड़े अन्य आतंकी संगठनों से भी जुड़ा हुआ है और उन सबमें लड़ाकों, पैसे और जंगी सामान का आदान-प्रदान होता है। इन सबका मुख्य शत्रु अमरीका ही है। अल-क़ायदा से जुड़ा एक प्रमुख संगठन आईसिस है जो ईराक में अमरीका द्वारा ईराक में स्थापित कठपुतली शिया सरकार से लड़ रहा है। उसे आश्चर्यजनक सफलता मिल रही है और उसने लगभग आधे ईराक पर कब्ज़ा करके वहाँ एक स्वतंत्र सुन्नी इस्लामी ख़िलाफ़त की घोषणा कर दी है। इसे साउदी अरब और अन्य सुन्नी-वहबी अरब देशों से प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिल रहा है। तालिबान को भी इन्हीं स्रोतों से समर्थन मिलता है। तालिबान से घनिष्ट रूप से जुड़ा ओसामा बिन लादेन साउदी राज-परिवार से जुड़ा एक व्यक्ति ही था। हालाँकि इराक में आईसिस को ज़बर्दस्त सफलताएँ मिल रही है, लेकिन उसके विरुद्ध पश्चिमी सरकारों का सैनिक गठबंधन भी बनता जा रहा है और बहुत जल्द उनके सम्मिलित सैन्य बल का मुक़ाबला करना आइसिस के लिए कठिन होता जाएगा। इसलिए वह भी अपने समर्थकों को इकट्ठा करने में जुट गया है। तालिबान और हक्कानी नेटवर्क और हाफ़िज़ साईद का लश्करे-तोईबा और जमात-उद-दवा जैसे आतंकी संगठनों ने पहले ही आइसिस को अपना समर्थन घोषित कर दिया है और वे उसे पैसे और लड़ाके भेजने लगे हैं।

पर तालिबान ही नहीं, आइसिस भी जानता है कि अमरीका और पश्चिमी देशों की मिली-जुली सैन्य बल को हराने का एक ही तरीका परमाणु हथियार प्राप्त करना है। अब पूरे इस्लामी विश्व में केवल पाकिस्तान के पास परमाणु अस्त्र हैं। इसलिए बहुत समय से तालिबान, और अब आईसिस, पाकिस्तान के परमाणु हथियार हथियाने की फ़िराक में है। पर ये हथियार पाकिस्तानी फ़ौज की सख्त पहरेदारी में रखे गए हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज को हराना आवश्यक है।

इस तरह एक ओर पाकिस्तान तालिबान को अफ़गानिस्तान में अपने मंसूबों को साकार करने के लिए उपयोग करना चाहता है, और दूसरी ओर तालिबान पाकिस्तान से परमाणु हथियार छीनने की ताक में है।

अब तक तो पाकिस्तानी फ़ौज तालिबान पर नकेल कसकर उसे अपने इशारों पर नचाने में सफल रहा है, पर अब लग रहा है कि तालिबान इतना शक्तिशाली हो चला है कि वह यह नकेल उतार फेंककर, पाकिस्तानी फ़ौज को ही अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। यह उनके लिए सामरिक महत्व भी रखता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, इससे तालिबान, और उनके ज़रिए ईराक के आइसिस को, परमाणु हथियार मिल जाएँगे, और दूसरे, अफ़गानिस्तान में सत्ता हथियाने के उनके मुहिम के लिए पाकिस्तान से रसद और पाकिस्तान के सरहदी इलाक़ों में सुरक्षित स्थान प्राप्त हो जाएँगे। या अन्य शब्दों में, तालिबान को काबुल की अपनी लड़ाई में पाकिस्तान भौगोलिक गहराई प्रदान कर सकेगा। कैसी विडंबना है यह! कहाँ पाकिस्तान ने अफ़गानिस्तान में भौगोलिक गहराई तलाशते हुए तालिबान की सृष्टि की थी, और यही तालिबान पाकिस्तान को ही अपने लिए भौगोलिक गहराई प्रदान करनेवाला इलाक़ा बनाना चाहता है, और जले पर नमक छिड़कने के लिए उससे उसके परमाणु खिलौने भी छीनना चाहता है।

इस लड़ाई में कौन विजयी होगा, यह समय ही बताएगा। पर अब तक जब तालिबान पाकिस्तान की फ़ौज के हुक्मों के विरुद्ध जाता है, तो पाकिस्तानी फ़ौजी उसे सख्ती से दंडित करती है। स्वात घाटी में यही हुआ था और अब वज़ीरिस्तान में यही चल रहा है। और जब भी पाकिस्तानी फ़ौज तालिबान पर सख्ती बरतती है, तो वह कोई न कोई आतंकी हमला करके इसका बदला लेता है। यह घात-प्रतिघात वर्षों से चला आ रहा है। हर बार पाकिस्तानी फ़ौज को पहले से अधिक सख्ती से काम लेना पड़ रहा है, और तालिबान का जवाबी हमला पहले से अधिक ख़ौफ़नाक होता जा रहा है। पेशावर में पाकिस्तानी फ़ौज के अफ़सरों और सिपाहियों के बच्चों का क़त्ल करके तालिबान ने यही दिखाया है कि वह ईंट का जवाब पत्थर से देने में समर्थ है।

अब सवाल यह है कि यह सब कहाँ जाकर थमेगा? इस दुष्चक्र का अंत निकट भविष्य में नहीं होनेवाला है। कारण स्पष्ट है। पाकिस्तान की अफ़गान नीति का लक्ष्य – अफ़गानिस्तान में अपने लिए अनुकूल सरकार क़ायम करना – उसकी पहुँच के दायरे में आ गया है। अमरीका अफ़गान युद्ध हारकर अपनी सेना वहाँ से हटा रहा है। अफ़गानिस्तान में रह गई अफ़गान सेना किसी भी तरह से तालिबान का मुक़ाबला करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए, तालिबान की जीत निश्चित लग रही है। इस जीत को कुछ और निश्चित बनाने के लिए पाकिस्तान वज़ीरिस्तान में बरसों से रह रहे तालिबान टोलियों को वापस अफ़गानिस्तान खदेड़ देना चाहता है, ताकि वे अफ़गान तालिबान के साथ मिलकर इन दोनों के ही नेता मुल्ला उमर, जो स्वयं पाकिस्तान में ही, शायद कराची में, छिपकर रह रहा है, के हाथ मजबूत कर सकें।

वज़ीरिस्तान में पाकिस्तनी सेना द्वारा पिछले कई महीनों से चलाए जा रहे अभियान का मुख्य लक्ष्य यही है। पर इतने दिनों से पाकिस्तान में रहने के बाद और वहाँ तेजी से फैल रहे इस्लामी कट्टरवाद को देखते हुए, पाकिस्तानी तालिबान ने ख़ून चख चुके शेर की तरह अपनी निगाहें पाकिस्तान पर गढ़ा ली हैं और वह वहाँ सत्ता-पलट करके पाकिस्तान और उसके परमाणु हथियारों को अपने कब्ज़े में लेने की सोचने लगा है।

पाकिस्तान की जनता इन दोनों शैतानी ताकतों के दंगल का मूक दर्शक बनी हुई है। दोनों ही ताकतें उसे अँधेरे में रखने की पूरी कोशिश कर रही हैं, पर पेशावर हत्याकांड जैसी घटनाएँ उसे पर्दे के पीछे की सचाई की अस्पष्ट-सी झलक ज़रूर दिखा देती हैं।

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पेशावर हत्याकांड का असली चेहरा

पेशावर हत्याकांड के बाद पाकिस्तान में इस हत्याकांड के असली कर्ता-धर्ताओं को छिपाने और पाकिस्तानी फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के साथ इन हत्यारों की साँठगाँठ पर पर्दा डालने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। इसमें सर्वोच्च स्तर के नेता, फ़ौजी अफ़सर, मीडिया के लोग और आतंकी सब शामिल हो गए हैं।

पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ और विपक्षी नेता इमरान ख़ान दोनों इस हत्याकांड की निंदा करते हुए बड़ी सफ़ाई से तालिबान का नाम लेने से कन्नी काट गए, हालाँकि तालिबान के प्रवक्ता ने हत्याकांड के तुरंत बाद इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी क़बूल करते हुए कह दिया था कि यह पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा उत्तरी वज़ीरिस्तान में सैकड़ों बच्चों सहित अनगिनत मासूम पख्तूनों की हत्या करने का बदलना लेने के लिए किया गया है।

पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में तालिबान ने नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान दोनों को ही अधिक सीटें जीतने में मदद की थी क्योंकि उन्होंने उनके विरोध में खड़े हुए बेनज़ीर भुट्टो और आसिफ़ ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्क पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान चुन-चुनकर मार डाला था। नतीज़ा यह हुआ कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी खुलकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाई और केवल सिंध तक सिमटकर रह गई जहाँ उसका अब भी थोड़ा-बहुत वर्चस्व है। इससे नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तानी संसद में अप्रत्याशित बहुमत मिल सकी और इमरान ख़ान भी खैबर-पख्तून ख्वाह प्रांत में बहुमत हासिल कर सके।

निश्चय ही इसके बदले इन दोनों ही पार्टियों ने तालिबान के साथ परोक्ष समझौता किया होगा। इमरान ख़ान तो पहले से ही तालिबान समर्थक रहे हैं और पाकिस्तान में शरीयत लागू करने की निरंतर वकालत करते हैं। इसलिए अब इनके लिए तालिबान की निंदा करना ज़रा कठिन है। यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान ने अपने वक्तव्यों में तालिबान पर सीधा आक्षेप नहीं किया।

यह भी ध्यान रहे कि नवाज़ शरीफ़ ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में तालिबान के विरुद्ध फ़ौजी कार्रवाई को टालने के लिए हर संभव प्रयास किया था और इसे तभी होने दिया जब इमरान ख़ान और कनाडाई मौलवी कादरी के मिले-जुले पैंतरे ने उसके हाथ कमज़ोर कर दिए और उसे अपनी गद्दी बचाने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के तहत वज़ीरिस्तान में फ़ौजी कार्रवाई के लिए हरी झंडी देना भी शामिल था। यह हरी झंडी मिलते ही पाकिस्तानी फ़ौज और अमरीका के ड्रोन विमान वज़ीरिस्तान पर टूट पड़े और हज़ारों लोगों को मार डाला। इनमें से मुट्ठी भर लोग ही वास्तव में तालिबान के लड़ाकू थे, बाकी सब मासूम लोग थे। इस सबका मीडिया में उतना खुलासा नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तानी फ़ौज ने मीडिया को वज़ीरिस्तान में घुसने ही नहीं दिया है। इसके विपरीत पेशावर हत्याकांड को पूरा मीडिया कवरेज प्राप्त हुआ जिससे ऐसी धारणा विश्व भर में फैल गई कि तालिबान वहशी हैं, पर यह पूरा सत्य नहीं है। दरअसल पाकिस्तानी फ़ौज ने भी वज़ीरिस्तान में इतना ही या इससे कहीं अधिक वहशीपन दिखाया है, और इसी का बदला तालिबान ने पेशावर में पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चों को मारकर लिया।

कहने का मतलब यह है कि पेशावर हत्याकांड की एक लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि है और उसे मात्र एक आतंकी हमला मानना ठीक नहीं होगा।

यह सब होते हुए भी, पेशावर हत्याकांड ने पाकिस्तानी जनता को झकझोर डाला है, और उनके मन में अनेक कठिन सवाल उठ रहे हैं, और तालिबान और पाकिस्तानी फ़ौज, आईएसआई, और पाकिस्तानी नेताओं के बीच जो साँठगाँठ है वह पाकिस्तानी जनता को समझ में आने लगा है। यदि जनता पूरी तरह इन संबंधों को समझ जाए, तो यह पाकिस्तान के लिए बड़ी समस्या बन सकती है क्योंकि पाकिस्तान का अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा। पाकिस्तान को इस्लामी मुल्क के रूप में अभिकल्पित किया गया है और उसका सीधा सरोकार वहाँ की जनता की खुशहाली या उनके दुखों-कष्टों को दूर करने से नहीं है। यही कारण है कि वहाँ देश की अधिकांश संपदा को फ़ौज को पुष्ट करने और अफ़गानिस्तान और भारत में अनावश्यक हस्तक्षेप करने में खर्च किया जाता है।

इसलिए यह ज़रूरी है कि जल्द ही पेशावर हत्याकांड के असली स्वरूप पर पर्दा डाला जाए। इसका आजमाया हुआ नुस्खा भारत या अमरीका को पाकिस्तान में हो रहे सभी नापाक कामों के लिए ज़िम्मेदार ठहराना है। और यही हथकंडा इस बार भी अपनाया गया है।

पेशावर हत्याकांड अभी चल ही रहा था कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और फ़ौजी तानाशाह मुशर्रफ़ ने एक टीवी चैनल को इंटर्वयू देते हुए कह दिया कि पेशावर हमले के पीछे भारत का हाथ है और पाकिस्तानी फ़ौज को भारत को मुँह तोड़ जवाब देना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान में जब भी कोई आतंकी घटना घटती है, तो इसकी ज़िम्मेदारी भारत के मत्थे मढ़ने के लिए वहाँ किसी भी प्रकार के प्रमाण या सबूत की आवश्यकता नहीं होती है। यह वहाँ की मीडिया, स्तंभ लेखक, अख़बार, नेता, आतंकी सब की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। ऐसा करके वहाँ की जनता में भारत के प्रति नफ़रत की भावना भड़काई जाती है, जिसके बिना पाकिस्तान के अलग अस्तित्व का कोई औचित्य ही नहीं बनता है।

उधर हाफ़िज साईद, जिसने मुंबई में पेशावर के जैसा ही हत्याकांड आयोजित कराया था, और जिसके लिए उसे पाकिस्तान में हीरो की तरह पूजा जाता है, एक बड़ी प्रेस सम्मेलन बुलाकर वक्तव्य दे दिया कि पेशावर हमले के पीछे भारत का हाथ है और यह भारत की सोची-समझी साजिश है क्योंकि यह हमला ठीक उस दिन (दिसंबर 15) को किया गया है जिस दिन भारत ने 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके पूर्वी पाकिस्तान में बंग्लादेश का निर्माण करा दिया था। हाफ़िज़ ने यह भी कहा कि इसका बदला कश्मीर को भारत से छीनकर लिया जाएगा।

पाकिस्तान के अनेक पत्रकारों ने भी इस तरह की अफ़ावाएँ फैलाते हुए पेशावर हमले का ज़िम्मा भारत पर डालना शुरू कर दिया है। वे चाहते हैं कि पाकिस्तानी जनता का रोष तालिबान और उनके आका पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई और तालिबान के समर्थक नेताओं और राजनीतिक पार्टियों पर न उमड़े और उसे सुरक्षित मार्गों की ओर मोड़ दिया जाए, अर्थात भारत की ओर मोड़ दिया जाए।

पर इस बार उनका काम अधिक मुश्किल है, क्योंकि एक तो स्वयं तालिबान ने इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी क़बूल कर ली है और उसे वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा मारे गए सैकड़ों मासूम बच्चों और औरतों का बदला बताया है।

इसके अलावा अब इस हत्याकांड को अंजाम देनेवाले लड़ाकों द्वारा अफ़गानिस्तान में बैठे अपने आकाओं के साथ हुए वार्तालाप की रेकॉर्डिंग भी प्राप्त हो चुका है, जिसमें वे अपने आकाओं से पूछ रहे हैं कि हमने यहाँ सारे बच्चों को मार दिया है अब हमें क्या करना है। उधर से जवाब आता है कि अपने आपको बम से उड़ा लेने से पहले पाकिस्तानी फ़ौज को आने दो ताकि बम धमाके में पाकिस्तानी फ़ौज के सिपाही भी बड़ी संख्या में मरें।

इन सब तथ्यों को मद्दे नज़र रखते हुए ही अनेक भारतीय प्रेक्षकों का मानना है कि आंतिकियों का उपयोग अफ़गानिस्तान और भारत में राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करने की पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की नीति पेशावर हत्याकांड के बाद भी ज़रा भी नहीं बदलेगी।

पाकिस्तान अफ़गानी तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों का उपयोग अफ़गानिस्तान में तबाही मचाने और पाकिस्तानी तालिबान और हाफ़िज़ साईद के लश्कर-ए-तोइबा और जमात-उद-दवा का उपयोग कश्मीर और भारत में आतंक फैलाने के लिए करता है। इनके ज़रिए वह भारत के साथ सामरिक संतुलन स्थापित करने के सपने देखता है और अफ़गानिस्तान में अपने अनुकूल तालिबानी कठपुतली सरकार स्थापित करने के मंसूबे बाँधता है।

पर पेशावर हमले ने दिखा दिया है कि तालिबान कठपुतले कम और दुर्दांत और वहशी लड़ाकू हैं जो समस्त पाकिस्तान को ही लील जाने की क्षमता रखते हैं। अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान के संबंध में सही ही कहा है कि जो लोग अपने घर में इस इरादे से ज़हरीले साँप पालते हैं कि वे उनके पड़ोसियों को डसेंगे, देर-सबेर स्वयं ही इन विषधरों द्वारा डस लिए जाते हैं।

Thursday, December 18, 2014

पेशावर कत्लेआम से नहीं बदलेगी पाकिस्तान की आतंकी नीति

पेशावर स्कूल हमले के बाद भारत के अनेक लोगों ने यह आशा व्यक्त की है कि शायद इस हादसे के बाद पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आएगी और वह आतंकवाद को पालने-पोसने से बाज़ आएगा। लेकिन इसकी ज़रा भी संभावना नहीं है।

पेशावर के फ़ौजी स्कूल में बहे पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चों का ख़ून और उनकी माँओं के आँसू अभी सूखे भी न थे कि लाहौर की एक अदालत ने मुंबई हत्याकांड के प्रमुख संचालक और लश्कर-ए-तोइबा के कमांडर ज़ाकिर रहमान लख़वी की ज़मानत पर रिहाई मंजूर कर ली।

यह शायद हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा पाकिस्तान से मुंबई हत्याकांड के एक अन्य प्रमुख आरोपी हाफ़िज़ साईद को भारत के हवाले करने की माँग का परोक्ष उत्तर था। हाफ़िज़ पाकिस्तान में खुले आम घूम रहा है और अभी हाल में जब पाकिस्तानी फ़ौज कश्मीर में आतंकियों को घुसाने के लिए सरहद पर फ़ायरिंग कर रही थी, सरहद के पास भी इसे देखा गया था। इतना ही नहीं इसने कुछ ही दिन पहले लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान के मैदान में एक बड़ी रैली भी आयोजित की, जिसके लिए लोगों को लाहौर लाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने ख़ास रेलगाडियाँ चलाईं। इससे पता चलता है कि हाफ़िज़ एक तरह से पाकिस्तानी फ़ौज और वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का घर-जमाई है और पाकिस्तान का इन आतंकियों से नाता तोड़ने का कोई इरादा नहीं है।

पेशावर हमले की निंदा वहाँ के नेताओं और फ़ौज को मजबूरन करनी पड़ रही है, पर इससे पाकिस्तान की केंद्रीय नीति में कोई भी परिवर्तन आने के आसार नहीं है क्योंकि इसी नीति पर पाकिस्तानी मुल्क का वजूद टिका है। ध्यान रहे, पेशावर हमले की निंदा करते हुए तहरीख-ए-पाकिस्तान पार्टी के नेता इमरान खान पाकिस्तानी तालिबान का नाम लेने से साफ मुकर गए, हालाँकि इस हमले के लिए पाकिस्तानी तालिबान ने ज़िम्मेदारी क़बूल कर ली है और कहा है कि यह हमला वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा मासूम पख्तून निवासियों को मारने के बदले में किया गया है।

पाकिस्तान जानता है कि सैनिक होड़ में वह भारत का मुक़ाबला नहीं कर सकता है, भले ही उसके पास परमाणु बम क्यों न हो। इसलिए शुरू से ही वह ग़ैर-सैनिक ज़रियों से भारत को कमज़ोर करने की नीति पर चलता आ रहा है। इसे वह हज़ार घावों से ख़ून बहाकर भारत को घुटनों पर लाने की नीति कहता है। इसे अंजाम देने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज ने और खास तौर से उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने दाऊद इब्राहीम, हाफ़िज़ साईद, और तालिबान जैसे अनेक ग़ैर-सरकारी ताकतों को पालकर खड़ा किया है और इन्हें वह भारत में आतंक फैलाने के लिए समय-समय पर छोड़ता रहता है।

तालिबान को उसने अमरीका की सहायता से तब खड़ा किया था जब सोवियत संघ ने अफ़गानिस्तान पर कब्ज़ा करके वहाँ नजीबुल्ला की पाकिस्तान-विरोधी सरकार स्थापित की थी। अफ़गानिस्तान को पाकिस्तान अपने ही मुल्क का पिछवाड़ा मानता है और वहाँ ऐसी किसी भी सरकार को बर्दाश्त नहीं करता है जिसकी बागडोर पाकिस्तान के फ़ौजी जनरलों या आईएसआई के हाथों में न हो। इसलिए नजीबुल्ला सरकार को गिराने के लिए उसने तालिबान को पाला पोसा और इस तालिबान ने ओसामा बिन लादेन जैसे सौउदी धन्ना-सेठ और कट्टर सुन्नी और वहबी इस्लामी विचारधारा के पैरोकारों की मदद से सोवियत संघ को अफ़गानिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया और वहाँ तालिबान की सरकार कायम कर दी।

इसके बाद पाकिस्तान के दुर्भाग्य से ओसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा ने अमरीका में हवाई जहाजों को मिसाइलों के रूप में उपयोग करके न्यू योर्क में ट्विन-टावर को धराशायी कर दिया। इसमें 3,000 से अधिक अमरीकी नागरिक मरे। इससे भी बड़ी बात यह थी कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर समुद्री हमले के बाद यह पहली बार अमरीका की ज़मीन पर किसी ने हमला किया था। अब तक अमरीका यही समझ रहा था कि उसके देश पर कोई भी हमला नहीं कर सकता है। न्यू योर्क हमले ने अमरीकियों की इस ख़ुश-फ़हमी को सदा-सदा के लिए खत्म कर दिया।

इस हमले का बदला लेने के लिए अमरीकी सेना अफ़गानिस्तान में उतरी और उसने तालिबान को काबुल से खदेड़कर हमीद करज़ई को राष्ट्रपति बना दिया। इस लड़ाई में उसने पाकिस्तान को भी शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। अमरीका ने पाकिस्तान को अल्टिमैटम दे डाला कि लड़ाई में शामिल हो जाओ, वरना हम पाकिस्तान पर इतने बम बरसाएँगे कि वह पत्थर युग में पहुँच जाएगा।

पाकिस्तान को इस धमकी को गंभीरता से लेने में ही समझदारी लगी और वहाँ के तानाशाह राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ़ ने अमरीकियों का साथ देना क़बूल किया, पर आधे मन से ही। वह अमरीकियों के साथ लड़ता भी रहा और तालिबान को बचाने के लिए यथा-शक्ति छिपी कोशिश भी करता रहा। यही कारण है कि अमरीका अफ़गानिस्तान में तालिबान को सफ़ाई के साथ हरा नहीं सका न ही वह ओसामा बिन लादेन को ही पकड़ सका क्योंकि वह पाकिस्तानी फ़ौज की एक छावनी अबोट्टाबाद में सुरक्षित रूप से पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा छिपाया गया था जहाँ वह पाकिस्तानी फ़ौज के संरक्षण में अपनी बीवियों और बच्चों के साथ मज़े से रह रहा था। आखिर अमरीका को अपने सीलों को भेजकर रात के अँधेरे में इस तरह उसका वध करवाना पड़ा कि पाकिस्तानी फ़ौज को इसकी भनक तक न लग पाए।

जब तालिबान सरकार सत्ताच्युत हुई तो तालिबानी लड़ाकू पूरे अफ़गानिस्तान में और पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में भागकर फैल गए और वहाँ से वे अमरीका के विरुद्ध छापेमार युद्ध लड़ते रहे। पाकिस्तान में जो तालिबान फैल गए थे, वे ही पाकिस्तानी तालिबान के रूप में जाने जाते हैं और उनका अफ़ागानी तालिबान के साथ घनिष्ट संबंध है। दोनों का अंतिम ध्येय है अफ़गानिस्तान में अमरीका द्वारा स्थापित सरकार को अपदस्थ करके तालिबानी सरकार दुबारा क़ायम करना। यही ध्येय पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का भी है।

अमरीकी दबाव में आकर पाकिस्तानी फ़ौज को अफ़गानी तालिबान पर कुछ कार्रवाई करनी पड़ी है जिससे तालिबान उनसे काफ़ी रुष्ट हो गया है। इसी तरह तालिबान का पाकिस्तानी हिस्सा जब पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को पार करने लगा, तब भी पाकिस्तानी फ़ौज को पाकिस्तानी तालिबान के विरुद्ध कार्रवाई करनी पड़ी है। ऐसा एक बार तब हुआ जब पाकिस्तानी तालिबान ने स्वात घाटी में अपना वर्चस्व फैला लिया और वहाँ शरीयत लागू करके अपराधियों का सिर कलम करना, हाथ काटना, कोड़े लगाना, पत्थर फेंककर मरवाना आदि इस्लामी दंड लागू करने लगा था। इसी तालिबान ने वहाँ लड़कियों को स्कूल जाने से भी मना कर दिया था और इस निषेध का उल्लंघन करने के लिए ही मलाला यूसुफ़ज़ई नामक 15 साल की लड़की के सिर पर एक तालिबानी कमांडर ने गोली दाग दी थी। ईश्वर की कृपा से वह बच गई और उसे लंदन में शरण मिल गई। इसी लड़की को अभी हाल में भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ नोबल पुरस्कार मिला है।

जब यह स्पष्ट होने लगा कि अमरीका अफ़ागन युद्ध में कहीं आगे नहीं बढ़ रहा है और जल्द वहाँ से बोरियाँ-बिस्तर बाँधनेवाला है, तो तालिबान का भी हौसला बुलंद होने लगा। वह अपनी शक्ति बटोरने लगा ताकि अमरीकी सेना के निकलते ही वह अफ़गानिस्तान पर फिर से कब्ज़ा जमा सके। इस नए हौसले ने पाकिस्तानी तालिबान को भी मदहोश कर दिया है और वह पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई द्वारा उस पर कसा गया नकेल तोड़ने के लिए कसमसा रहा है। उसे यह उम्मीद भी बनती जा रही है कि उसके लिए अफ़गानिस्तान पर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान पर भी कब्ज़ा करना और इस तरह पाकिस्तानी फ़ौज के पास मौजूद परमाणु हथियार पर नियंत्रण पाना शायद मुमकिन है। परमाणु हथियार हाथ आते ही, उन्हें इराक में उनके बंधु-बांधव आईसिस के हवाले करके वहाँ से भी अमरीका को खदेड़ना संभव हो सकेगा। इस तरह आईसिस द्वारा घोषित ख़िलाफ़त की नींव और भी पक्की हो सकेगी। तालिबान ने पहले से ही आईसिस को अपना समर्थन घोषित कर दिया है।

इस विचार को अंजाम देने के लिए पाकिस्तानी तालिबान धीरे-धीरे कोशिश कर रहा है। अभी हाल में उसके एक कुमुक ने कराची हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लिया था, और एक अन्य दल ने पाकिस्तानी नौसेना के एक युद्ध-पोत पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी।

तालिबान ने समस्त पाकिस्तान में इस्लामी और सुन्नी वहबी विचारधारा को भी इतना फैला दिया है कि वहाँ उसके इमरान खान जैसे शक्तिशाली समर्थक हो गए हैं। इमरान खान की तहरीख-ए-पाकिस्तान पार्टी खैबर-पक्तून ख्वाह प्रांत में सरकार चला रही है, और अभी हाल में उसने कनाडावासी इस्लामी मौलवी ताहिर उल कादिर के साथ मिलकर इस्लामाबाद में ऐसी जबर्दस्त हड़ताल आयोजित की कि कई दिनों तक पाकिस्तानी सरकार ठप्प पड़ गई और पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन के राष्ट्रपति तक को अपनी पाकिस्तानी दौरा रद्द करना पड़ा। इमरान खान तालिबान और शरियत क़ानून का प्रबल समर्थक है और पाकिस्तानी युवाओं में उसकी काफी धाक है।

दूसरी ओर मुंबई हमले के कर्ता-धर्ता हाफ़िज़ साईड का संगठन लश्कर-ए-तोइबा का भी पाकिस्तान में काफी रुतबा है। यह संगठन पकिस्तान में हज़ारों मदरसे चलाता है जहाँ कट्टर वहबी इस्लामी विचारों का प्रचार होता है। यह संगठन बाढ़, भूकंप आदि विपदाओं में राहत कार्य चलाकर भी लोगों के दिलों में जगह बनाता है। उसे साउदी अरब से अकूत दौलत भी प्राप्त होती है। इतना ही नहीं, पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई भी उसे सभी सहूलियतें मुहैया कराती हैं। इसके बदले वह भारत के विरुद्ध आतंकी हमले आयोजित करता है और काश्मीर में अशांति फैलाकर पाकिस्तानी फ़ौज की मदद करता है।

इस तरह जिस पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर स्कूल में कत्ले-आम किया है, वह पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का ही बनाया हुआ है और उसे बनाने के पीछे पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई के खास मकसद हैं। ये हैं अफ़गानिस्तान में पाक-समर्थक सरकार खड़ा करना और भारत के विरुद्ध ग़ैर-सैनिक आतंकी कार्रवाई कराने में उसकी मदद करना।

पर पाकिस्तानी फौज़ की बनाई हुई चीज़ होने पर भी तालिबान कई बार किसी उद्दंड संतान की तरह अपने ही पिता के निर्देशों का उल्लंघन कर देता है, और तब पाकिस्तानी फ़ौज उसे दंडित करके सही रास्ते पर ले आती है। ऐसा कई बार हुआ है, जैसे स्वात घाटी में और अभी वज़ीरिस्तान में जर्द-ए-अज़्ब नामक सैनिक कार्रवाई में, जिसके तहत सैकड़ों तालिबानी लड़ाकों को और हज़ारों पख्तून निवासियों को पाकिस्तानी फ़ौज ने मार डाला है।

इसी का बदला लेने के लिए पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर स्कूल हमला कराया है। पाकिस्तानी तालिबान चाहती है कि पाकिस्तानी फ़ौज भी वही दर्द और पीड़ा महसूस करे जो अपनों के मारे जाने पर होता है और जिसे वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौजी कार्रवाई में मारे गए पख्तूनों के कारण तालिबान को महसूस हुआ था। इसीलिए पाकिस्तान ने पेशावर के सैनिक स्कूल को चुना था क्योंकि वहाँ पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चे पढ़ते हैं और इन बच्चों के मारे जाने पर पाकिस्तानी फ़ौज को वही दुख-दर्द महसूस होगा जो तालिबान को वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों अपनों के मारे जाने पर हुआ था।

इसलिए पेशावर हमले को आतंकी हमला मानना पूरी तरह से ठीक नहीं होगा। यह प्रतिशोध की कार्रवाई है, और दो ऐसे पक्षों के बीच की रस्सा-कशी है जो एक-दूसरे को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश में हैं। पाकिस्तानी फ़ौज चाहती है कि तालिबान वही करे जो उसका हुक्म हो, और तालिबान पाकिस्तान पर कब्ज़ा करके उसके परमाणु हथियारों और अन्य सैनिक साज-सामानों को हथियाना चाहती है ताकि उसकी मदद से उसके वैचारिक भाई आईसिस इराक में इस्लामी खिलाफ़त को सुदृढ़ बना सके।

युद्धरत पक्षों के बीच इस तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई अक्सर होती रहती है। जो महाभरत से वाकिफ़ हैं, वे जानते होंगे कि महाभारत युद्ध में भी ऐसी ही एक कार्रवाई को कौरवों ने अंजाम दिया था। युद्ध के अंतिम दिनों जब पांडवों ने एक अर्ध-सत्य का सहारा लेकर कौरवों की तरफ़ से लड़ रहे उनके गुरु और कौरव सेनापति द्रोणाचार्य की हत्या करा दी थी, तो द्रोणाचार्य के पुत्र और दुर्योधन के मित्र अश्वत्थामा ने कृतवर्मा और कृपाचार्य का साथ लेकर रात के अँधेरे में पांडवों के शिवर में घुसकर वहाँ सो रहे सभी को मारकर इसका बदला लिया था। मारे गए व्यक्तियों में द्रौपदी के पाँच बच्चे भी शामिल थे। पांडव इसलिए बच पाए क्योंकि वे उस समय वहाँ नहीं थे।

भारत के लिए यह सब अत्यंत चिंता का विषय है क्योंकि चाहे तालिबान जीते या पाकिस्तानी फ़ौज, दोनों स्थितियों में उसे नुकसान होनेवाला है। यदि तालिबान पाकिस्तान को हज़म कर जाए, तो परमाणु बम से लैंस एक ऐसी शत्रुतापूर्ण शक्ति भारत की सरहदों पर उभर आएगी, जो भारत के प्रति आज के पाकिस्तान से हज़ार गुना द्वेष रखती है। और यदि पाकिस्तानी फौज़ तालिबान को दंडित और अनुशासित करने में क़ामयाब होती है, तो आनेवाले दिनों में यह तालिबान और हाफ़िज़ साईद जैसे आतंकी पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई के इशारों पर भारत पर आजकल से कहीं अधिक विस्तार से हमले कराएँगे।

इसलिए पाकिस्तान के घटनाचक्र पर भारत को पैनी निगाह रखनी होगी और उसे हर स्थिति का मुक़ाबला करने के लिए मुस्तैद होना पड़ेगा।

Monday, March 25, 2013

टाइम्स ऑफ़ इंडिया का दकियानूसी उर्दू प्रेम

संजय दत्त को पाँच साल की जेल सज़ा होने की ख़बर आते ही अख़बारों में इसी की चर्चा छायी रही। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भी यही बात थी। उसमें छपी एक ख़बर ने विशेषरूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया और मैं सोचने के लिए मजबूर हुआ कि यह अख़बर इस तरह का घिनौना काम क्यों कर रहा है।

यह ख़बर थी, उर्दू अख़बारों में संजय दत्त के मामले में क्या कहा गया है इसकी समीक्षा। अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया आए दिन तो उर्दू अख़बारों में क्या छपा है इसकी समीक्षा प्रकाशित नहीं करता है न ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर उर्दू अख़बारों को याद करता है – उदाहरण के लिए लगभग इसी समय इतालवी कमांडो को इटली से वापस न भेजने का इटली की संसद का निर्णय भी एक मुख्य सुर्खी रही थी, पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मुद्दे पर उर्दू अख़बारों की राय की तलब नहीं की।

थोड़ा सोचने पर विदित होता है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया उर्दू अख़बारों का उन्हीं संदर्भों में उल्लेख करता है जिनका संबंध मुसलमानों से होता है। संजय दत्त मामले का संबंध मुंबई में आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट कराए जाने से है, और यह बम विस्फोट इससे पहले बाबरी मसजिद के ढहाए जाने के बाद हुए दंगों में सैकड़ों मुसलमानों को शिव सेना आदि हिंदुत्व पार्टियों द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने के बदले में कराए गए थे। इस तरह संजय दत्त मामले का सीधा संबंध मुसलमानों से है। इसीलिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस मामले के बारे में उर्दू अख़बारों के विचारों की समीक्षा करता है। इससे पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अफ़सल गुरु को फाँसी दिए जाने के बाद भी इस संबंध में उर्दू अख़बारों में छपे लेखों की समीक्षा छापी थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह करतूत कितनी राष्ट्रविरोधी और घातक है यह उन सभी को मालूम होगा जो यह जानते हैं कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा नहीं है बल्कि वह उत्तर और दक्षिण भारत (जहाँ उर्दू साहित्य का उद्भव और प्ररंभिक विकास हुआ था) के शिष्टजनों की भाषा है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, दलित आदि सभी शामिल हैं। उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति का अंग था, जो भयानक रूप से सफल हुआ और मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दे बैठा और देश को दो (और बाद में तीन) टुकड़ों में बाँट बैठा, और यह नरसंहार अब भी थमा नहीं है – पाकिस्तान में जो नरमेध मचा हुआ है वह इसका सबूत है।

तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा उर्दू अख़बारों की तलब केवल मुसलमानों से संबंधित विषयों में करना अंग्रेज़ों की इसी बाँटो और राज करो वाली घातक नीति को तूल देना है और उर्दू को मात्र मुसलमानों के साथ जोड़कर उसकी असमय मृत्यु के लिए रास्ता साफ करना है। आज यदि इस देश में उर्दू की हालत खस्ता है, तो इसका मुख्य कारण उसे मुसलमानों की भाषा समझना और देश-विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना है। जिस भाषा का संबंध देश विभाजन से हो और पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण देश से संबंधित हो, उसे देशवासियों के दिलों में कैस स्थान मिल सकता था। पर यह निष्कर्ष एक ग़लत प्रचार पर आधारित है। उर्दू न तो मात्र मुसलमानों की भाषा है न ही वह किसी ग़ैर-भारतीय उपज है। वह इस देश में पैदा हुई नवीनतम भाषा है जिसमें गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस देश की सबसे लोक-प्रिय और आम भाषा है, और यह हिंदी का ही एक परिष्कृत रूप है। जिस तरह हनुमान शाप-वश अपनी ही ताकत़ भूल गए थे, उसी तरह हिंदी भी अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति के शाप के प्रभाव से अपने ही परिष्कृत रूप उर्दू को भूल ही नहीं गई है बल्कि उसे अपना शत्रु मानने लगी है, यद्यपि कई जांबवानों ने हिंदी को अपने भूले-बिसरे रूप उर्दू की याद दिलाई है – डा. रामविलास शर्मा ने कई दशक पहले यह काम किया था, और अब न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू यह काम कर रहे हैं। आइए, इसे समझें कि हिंदी और ऊर्दू को, जो एक भाषा हैं, अलग क्यों और कैसे किया गया।

1857 के संग्राम में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़े थे और उनका लगभग इस देश से खात्मा कर दिया था। यदि पंजाब, नेपाल आदि कुछ रियासत अंग्रेजों की फ़ौजी मदद न करते और दक्षिण के रियासत इस संग्राम में शामिल हो गए होते तो अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर तभी बंध चुका होता और आज भारत का इतिहास, और विश्व का इतिहास भी, कुछ और ही हुआ होता। पर इस संग्राम को दबाने में अंग्रेज सफल हुए और वे समझ गए कि इस देश पर अपनी हुकूमत कायम रखनी हो, तो यहाँ के लोगों को विभिन्न परस्पर वैमनस्यपूर्ण गुटों में तोड़ना होगा। इनमें से प्रमुख गुट हिंदुओं और मुसलमानों के थे। इनमें दरार डालने की कूटनीति अंग्रेजों ने बड़े ही संगठित तरीके से शुरू कर दी। इस कूटनीति की आधारशिला भारतीय जनता की उस समय की साझी भाषा हिंदुस्तानी को दो अलग-अलग भाषाओं में विभाजित करना थी। अंग्रेज जानते थे कि कौमी एकता का एक प्रमुख खंभा भाषा होता है और भाषा को बाँटते ही कौम भी बँट जाता है।

इस नीति के तहत फोर्ट विलयम में स्थापित भाषा कोलेज में भाषाविद गिलक्राइस्ट के नेतृत्व में हिंदी और उर्दू को अलग करने की साजिश को अंजाम दिया गया। गिलक्राइस्ट ने पंडित सदासुखलाल जैसे लेखकों की मदद से संस्कृत बहुल भाषा में कुछ पुस्तकें प्रकाशित करवाईं, और इसी प्रकार उर्दू-फारसी बहुल भाषा में और फारसी लिपि में कुछ अन्य किताबें छपवाईं और यह घोषित कर दिया कि हिंदी हिदुओं की भाषा है और उर्दू केवल मुसलमानों की। इसके अलावा अंग्रेजों ने अनगिनत मौलवियों और पंडितों को भी इस घातक धारणा को प्रचारित करने के काम में लगा दिया। कुछ ही दशकों में उनका यह प्रचार रंग लाने लगा और लोग हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएँ समझने लगे। इतना ही नहीं हिंदी को मात्र हिंदुओं की और उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा मानने लगे। इसकी परिणति देश-विभाजन और देश के विभाजन से जुड़े भयानक नर-संहार में हुई।

हिंदी-उर्दू अलग-अलग भाषाएँ हैं, यह बात कितनी बेबुनियाद है यह इस पर विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे प्रेमचंद हिंदी और उर्दू दोनों में ही लिखते थे। इसके अलावा मंटो, फिराक, राजिंदर सिंह बेदी, आदि अनेक उर्दू के लेखक मुसलमान नहीं हैं। आज भी यदि आप उत्तर प्रदेश या बिहार के देहाती इलाकों में चले जाएँ और लोगों की बातें सुनें, तो आप कह नहीं पाएँगे कि वे हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू। उर्दू-हिंदी में केवल उच्च स्तरीय लेखन और लिपि में फ़र्क है, और इस फ़र्क को दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है। लिपि की समस्या कुछ हद तक आज कम होती जा रही है क्योंकि अब बहुत सी उर्दू रचनाएँ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रही हैं और खूब बिक रही हैं क्योंकि देवनागरी लिपि में आने से वे हिंदी भाषियों को भी सुलभ हो जाती हैं।

अब अंग्रेजों के यहाँ से गए साठ से अधिक वर्ष हो गए हैं और हममें से कई लोग इस बात को समझने लगे हैं कि अंग्रेजों ने हमें कैसे उल्लू बना दिया था। पर इन समझनेवाले लोगों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया शामिल नहीं है। वह अब भी यह राग अलाप रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और उर्दू अख़ाबार की राय उन्हीं विषयों में लेने की ज़रूरत है जिनका संबंध मुसलमानों से है। आश्चर्य की बात यह है कि यही अख़बार बड़े ज़ोर-शोर से अमन की आशा नाम का अभियान चला रहा है जिसका कथित उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बुद्धि जीवियों को निकट लाना है। पर इस अख़बार को यह मामूली बात भी अब तक समझ में नहीं आ सकी है कि भारत और पाकिस्तान को निकट लाने का सूत्र दोनों की भाषा में बनाई गई कृत्रिम दरारों को दूर करने में निहित है। भारत और पाकिस्तान को पास लाने का पहला सोपान हिंदी और उर्दू का एकीकरण है। और यह एकीकरण तब तक संभव नहीं है जब तक उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा समझा जाता जाएगा। उर्दू समस्त भारत की उपज है। वह हिंदुओं और मुसलमानों, सिक्खों और अन्य समुदायों की साझी विरासत है। उसमें भाषाई नज़ाकत चरम स्थिति तक पहुँचा दी गई है और इस भाषा में गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इस अभिव्यक्ति शक्ति से अपने आपको वंचित करने के कारण ही हिंदी वह भव्यता नहीं प्राप्त कर पाई है जो वह प्राप्त कर सकती थी। हिंदी में संस्कृत के शब्द भरने और उससे आम बोलचाल के शब्दों को उर्दू के शब्द मानकर निकालने की जो ग़लती की गई, उससे उसकी अभिव्यंजना शक्ति काफी हद तक कुंठित हुई। इतना ही नहीं, उसे फिर से परिमार्जीत करने में दशकों लग गए। अब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वह संपूर्ण रूप से परिमार्जित हो गई है। यह इस बात से स्पष्ट है कि हिंदी की कविताएँ - और भाषा अपने सबसे अधिक निखरे हुए रूप में कविताओं में ही दिखाई देती है - अब भी आम आदमी के लिए दुरूह हैं। क्या आप किसी आम आदमी को निराला, जय शंकर प्रसाद, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि की कविताओं का रसास्वादन करते हुए सोच सकते हैं? इनके लिए इन महान कवियों की कविताएँ दुरूह और कठिन ही बनी हुई हैं। इसकी तुलना में उर्दू की गज़लें, ग़ालिब की रचनाएँ और और अन्य उर्दू शायरों की कविताएँ, आम लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ चुकी हैं, उनके कई अंश मुहावरों का रूप ले चुके हैं। उर्दू के कहानी-किस्से भी लोगों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। समस्त हिंदी फिल्म और फिल्मी गानों की भाषा अधिकांश में उर्दू है और उनकी लोकप्रियता को लेकर कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।

यदि हिंदी और उर्दू में कृत्रिम दरारें नहीं डाली गई होतीं, तो इस मिली-जुली भाषा ने मुग़लों के अंतिम समय में जो आश्चर्यजनक कथन शैली विकसित कर ली थी, वह अनायास ही हिंदी को प्राप्त हो गई होती और उसे कई दशक बिताकर नए सिरे से अपनी अभिव्यंजना शक्ति विकसित नहीं करनी पड़ती और हिंदी आज जहाँ पहुँच सकी है, उससे कई दशक आगे की मंजिल प्राप्त कर गई होती।

यह बात बरसों पहले डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में कही थी, और एक अनोखे संयोग से आज लगभग उन्हीं की बातों को एक समकालीन विचारक दुहरा रहे हैं। ये हैं सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जो प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग सत्यम ब्रूयत में दो महत्वूपूर्ण लेख लिखे हैं जिनका विषय उर्दू और देश-विभाजन हैं। अपने उर्दू वाले लेख में उन्होंने लगभग वे बातें दुहराई हैं जो डा. शर्मा पहले कह चुके हैं, कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा कतई नहीं है बल्कि वह भारत में रहनेवाले लोगों की साझी विरासत है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिक्ख, दलित सभी शामिल हैं। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा इस साझी भाषा को तोड़ने की कूटनीति का भी विस्तार से वर्णन किया है। अपने दूसरे महत्वपूर्ण लेख में उन्होंने पाकिस्तान को एक कृत्रिम देश करार देते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को फिर से एक होने का आह्वान किया है। यह भी डा. शर्मा अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं।

इन देशों का फिर से एक होना आज एक असंभव सी बात लग सकता है, पर यही इन देशों का प्रारब्ध है जिसे उन्हें आनेवाले पचास-सौ सालों में साकार करना होगा। आज हर युवक और विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह इस सपने को सत्य में बदलने के लिए अपना योगदान करे। शुरुआत वह उर्दू सीखकर और उर्दू साहित्य से अपना परिचय बढ़ाकर कर सकता है। इससे उसे यह अच्छी तरह समझ में आ जाएगा कि ये दोनों भाषाएँ एक ही हैं और ये दोनों भाषाएँ बोलनेवाले लोग भी वास्तव में एक ही कौम के अंश हैं, भले ही वे अलग-अलग धर्मों में विश्वास करते हों। दो धर्म, दो देश वाली विचारधारा अंग्रेजों द्वारा इस देश को कमज़ोर करने और तोड़ने के लिए फैलाया गया विषवृक्ष है। यह पाकिस्तान के बनते ही उसके दो टुकड़ों में बटने से और पाकिस्तान के आज की हालात से बखूबी स्पष्ट है। आज पाकिस्तान नाम के लिए मुसलमानों का देश है पर वहाँ मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। सुन्नी शिया को मार रहे हैं, अफगान पाकिस्तानियों को मार रहे हैं और पाकिस्तानी अफगानों, अहमदियों, बोहरा मुस्लिमों और महिलाओं पर अत्याचार ढो रहे हैं।

हम सबको इस विष-वृक्ष की जड़ें काटकर इस देश को (जिसमें उसके दो भटके टुकड़े भी शामिल हैं) मजबूत करना होगा।

Saturday, April 04, 2009

तालिबानी इंसाफ

पाकिस्तान में उस सत्रह साल की किशोरी को अपने पड़ोसी के साथ बाहर निकलने के लिए जैसा इंसाफ मिला उस पर कोई टिप्पणी करना यहां मेरा इरादा नहीं है। इसकी खूब चर्चा टीवी चैनलों, अखबारों और ब्लोगों में हो चुकी है। उसमें कुछ भी नया जोड़ने को बाकी नहीं रह गया है।

यही दिमाग में आता है कि मध्य युग में चंगेज खान आदि जालिमों के जमाने में ऐसा ही सब हुआ होगा।

अफसोस होता है कि पाकिस्तान क्या-क्या सोचकर हमसे अलग हुआ था और आज क्या-क्या होकर रह गया है। पर पाकिस्तान की दुर्गति पर खुश होने का हमें कितना अधिकार है? यहीं मैंगलूर के पबों में लड़कियों के साथ जैसा सलूक किया गया क्या वह तालिबानी इंसाफ से जरा भी कम वहशियाना था?

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जिन्होंने अब तक टीवी या इंटरनेट में इस बर्बरता को नहीं देखा है, वे यूट्यूब के जरिए यहां उसे देख सकते हैं। हालांकि दृश्य काफी विचलित कर देने वाले हैं, पर, जैसा कि घुघूती बासूती ने उचित कहा है (टिप्पणी में देखें), हमें ऐसे कृत्यों के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनानी होगी, जिसके लिए यह आवश्यक है कि हम इस तरह की वीभत्सता को अपनी आंखों से देख लें।

Wednesday, March 18, 2009

अच्छा तालिबान, बुरा तालिबान

ओबामा सरकार अमरीका की अफगान नीति को नए सिरे से गढ़ रही है। जो छिटपुट खबरें आ रही हैं, उनसे ऐसा मालूम पड़ रहा है कि अमरीका अफगानिस्तान में लंबे युद्ध में फंसने से बचने के लिए तालिबान से समझौता करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

अमरीका के ट्विन टावर पर विमान-बम से हमला करके लगभग 5,000 अमरीकियों की जान लेने वाले अलकायदा का तालिबान के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। इस तालिबान से अमरीका भली-भांति परिचित है। अफगानिस्तान से सोवियतों को खदेड़ने के लिए अमरीका ने ही इसे हथियारों से लैस किया था।

तालिबान का दूसरा संरक्षक अमरीका का ही मित्र पाकिस्तान है। उसका खुफिया संगठन आईएसआई और स्वयं पाकिस्तानी सेना तालिबान को अपना धर्म-भाई मानते हैं। भारत के साथ युद्ध होने पर पाकिस्तान अफगानिस्तान को भौगोलिक गहराई प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहता है। इसलिए अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार स्थापित करना उसकी रणनीति का एक अंग है। दुर्भाग्य से नायन-लेवन के बाद उसे इस रणनीति को ताक पर रखकर अमरीकी दबाव में तालिबान पर ही बंदूक तानना पड़ा है। पर परोक्ष रूप से तालिबान को समर्थन देना पाकिस्तान ने कभी नहीं छोड़ा।

नायन-लेवन के बाद अमरीका ने अपने पुराने युद्ध साथी तालिबान पर हमला बोल दिया और उसे काबुल से खदेड़ दिया। संकट के इस पल में तालिबान के लिए यह स्वाभाविक था कि वह पाकिस्तान में शरण ले। पहले तालिबान अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सरहद की बीहड़ पहाड़ियों तक सीमित रहा, परंतु धीरे-धीरे वह पाकिस्तान भर में अपना प्रभाव बढ़ाता गया। नवीनतम खबर यह है कि पाकिस्तान की स्वात घाटी उसके कब्जे में आ गई है। अब लगभग आधे पाकिस्तान पर उसका कब्जा है, और ऐसा माना जा रहा है कि जल्द ही कराची, पेशावर, रावलपिंडी, इस्लामाबाद, और लाहौर, यानी लगभग संपूर्ण पाकिस्तान में उसकी तूती बोलेगी।

तालिबान के साथ लड़ाई में अमरीका ने एक गंभीर गलती की। नयन-लेवन के बाद उसने तालिबान को काबुल में गद्दी से उतार तो दिया, पर मसले का पूर्ण समाधान होने से पहले ही ईराक पर हमला करके अपने ऊपर दो-दो युद्धों का भार थोप लिया। यह दूसरा युद्ध खाड़ी के तेल संसाधनों पर अमरीकी प्रभाव बनाए रखने के लिए था। दो-दो युद्ध एक साथ लड़ने से अमरीका की शक्ति बंट गई। समस्त मुस्लिम जगत में अमरीका के प्रति घृणा की भावना तेज हो गई। इससे तालिबान को मुस्लिम देशों से आर्थिक और नैतिक समर्थन प्राप्त होने लगा।

चीन, जो बड़ी तेजी से महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, भली-भांति समझता है कि अमरीका द्वारा ईराक में युद्ध छेड़ने का उद्देश्य वहां के तेल संसाधनों को अमरीकी कब्जे में रखना है। यह चीन को मंजूर नहीं है क्योंकि वह स्वयं इस संसाधन को अपने प्रभाव में लाना चाहता है। पर चीन अमरीका से सीधा वैर मोल नहीं ले सकता था। इसलिए अमरीका को कमजोर करने के इरादे से उसने तालिबान को समर्थन बढ़ा दिया।

उधर नायन-लेवन के बाद पाकिस्तानी सेना को अमरीकी दबाव में आकर अपने धर्म-भाइयों पर ही सैनिक कार्रवाई करनी पड़ी। इससे पाकिस्तानी सेना की साख न केवल तालिबानों में गिरी, बल्कि पाकिस्तान की जनता भी अपनी सेना को विश्वासघाती के रूप में देखने लगी। वह सवाल करने लगी, पाकिस्तानी सेना अमरीका का युद्ध क्यों लड़े और तालिबान को क्यों मारे, जो आखिर मुसलमान ही तो हैं?

इस सवाल का सीधा सा जवाब यह है कि पाकिस्तानी सेना को इसके बदले अरबों डालर मिल रहे हैं, जिसके बिना पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था कब की लुढ़क चुकी होती। पर यह बेबाक उत्तर पाकिस्तानी जनता को कैसे दिया जा सकता था? अतः आईएसआई और पाकिस्तानी सेना एक दोगली नीती पर चलने लगी जिसे अंग्रेजी कहावत रनिंग विथ द हेर एंड हंटिंग विथ द डोग्स के रूप में अच्छी तरह व्यक्त किया जा सकता है। यह नीति कुछ यों थी -- पाकिस्तानी सेना अमरीका से तो कहती गई कि वह अफगान युद्ध में उसका साथी है, और अमरीका से अरबों डालर इसके एवज में ऐंठती रही, पर जब तालिबान से लड़ने की बारी आई तो वह खोमोश बैठी रही।

नतीजा यह हुआ कि तालिबान को पाकिस्तान में बेरोकटोक अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल गया। अब ऐसा लगता है कि उसकी शक्ति इतनी बढ़ चुकी है कि वह पाकिस्तानी सेना या आईएसआई के नियंत्रण के बाहर हो चुका है। इतना ही नहीं पाकिस्तानी सेना के निचले स्तर के जवान तालिबानी संस्कृति में इतने रंग गए हैं कि वे तालिबान पर कभी हथियार नहीं उठा सकते। वे एक तरह से तालिबान के ही सदस्य जैसे हो गए हैं। यदि पाकिस्तानी फौज के आला अफसर तालिबान के विरुद्ध कार्रवाई का हुक्म भी दें, तो निचले स्तर के पाकिस्तानी जवान इस हुक्म की तामील न करें।

इस तरह अमरीका की मूर्खता, चीन की कूटनीति और पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की मिली भगत से तालिबान इतना मजबूत हो गया है कि अब उसे अमरीका के लिए हरा पाना लगभग असंभव है।

अब भेद नीति ही बची रह गई है। नए अमरीकी राष्ट्रपति ने इसी का सहारा लेना तय किया है। अमरीका द्वारा अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान में अंतर करने के पीछे यही रहस्य है। जो तालिबान अमरीकी डालरों के लिए बिकने को तैयार हैं, वे अच्छे तालिबान, और जो लड़ने पर उतारू हैं, वे बुरे तालिबान। अमरीका तालिबान को भीतर से तोड़कर कमजोर करना चाहता है। तालिबान विभिन्न अफगान कबीलों से बना है, जिनमें आपसी फूट भी है। अमरीका इस फूट का लाभ उठाकर उनमें से कुछ कबीलों को अपने साथ मिलाना चाहता है।

शायद पाकिस्तान ने ही अमरीका को यह पाठ पढ़ाया है। जब जनरल कियानी हाल में वाशिंगटन गया था, उसने अमरीका को साफ-साफ बता दिया होगा कि उसकी सेना के लिए अब तालिबान को अंकुश में रखना संभव नहीं है। हो सकता है कि पाकिस्तान ने यह भी कहा हो कि स्वयं पाकिस्तानी राज्य को तालिबान से खतरा है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति जरदारी तो बारबार कह ही रहे हैं कि पाकिस्तान में तालिबान कभी भी सत्ता-पलट कर सकता है। पीकिस्तान में स्थिति के इस हद तक बिगड़ने से अमरीका घबरा उठा होगा क्योंकि यदि पाकिस्तन पर तालिबान का कब्जा हो जाए, उसके हाथों में पाकिस्तान का परमाणु बम भी आ जाएगा। परमाणु बम हाथ लगते ही तालिबान सचमुच अजेय हो जाएगा और अमरीका को अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा। यह सामरिक दृष्टि से अमरीका की करारी हार होती क्योंकि अफगानिस्तान से वह ईरान, चीन, रूस और भारत जैसे बड़े बड़े देशों को नियंत्रण में रखने की मंशा रखता है।

अफगानिस्तान से अमरीकी प्रभाव समाप्त होने के बाद ईरान और तालिबान के बीच मेल-जोल बढ़ सकता है। इससे खाड़ी क्षेत्र के अमरीका के अन्य मित्र देशों को भारी खतरा पैदा हो जाएगा। इनमें प्रमुख है इजराइल। दूसरी ओर अमरीका के इस क्षेत्र से पलायन करते ही ईरान और तालिबान को चीन अपनी छत्रछाया में ले लेगा, जिससे इस भूभाग के विशाल तेल संपत्ति पर उसका नियंत्रण हो जाएगा।

इस सब घटनाचक्र से भारत सब ओर से घाटे में रहेगा। पाकिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने पर कश्मीर के अलगाववादियों में नया जोश भर जाएगा। उधर पाकिस्तान से शरणार्थी भारी मात्रा में भारत में घुसने लगेंगे। तालिबान के हाथों परमाणु बम आने से काबुल में अमरीका-पोषित वर्तमान सरकार गिर जाएगी और तालिबान वहां सत्ता संभाल लेगा। इससे अफगानिस्तान से भारतीय प्रभाव एक बार फिर समाप्त हो जाएगा। भारत की पश्चिमी सरहद पर पाकिस्तान से भी ज्यादा भारत से शत्रुता रखनेवाला तालिबान नजर आने लगेगा जिसका भारत के एक अन्य शत्रु चीन के साथ बड़े ही मधुर संबंध होंगे। इस संबंध का प्रयोग करके चीन भारत पर दबाव डालने लगेगा। संभव है कि भारत को कमजोर स्थिति में पाकर वह अरुणाचल आदि के संबंध में प्रतिकूल संधियां भी करा ले। खाड़ी प्रदेश में चीन, ईरान और तालिबान का प्रभाव बढ़ने से भारत को वहां से तेल मिलने में कठिनाई का समाना करना पड़ सकता है।

पर बात यहां तक आकर नहीं रुकेगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर अपना राज्य स्थापित करके तालिबान शांत नहीं होगा, बल्कि विजय दर्प में भारत, अमरीका, इजराइल आदि पर हमले करने की भी कोशिश करेगा, क्योंकि उसे चीन और ईरान के समर्थन का भरोसा होगा। इससे तृतीय विश्व युद्ध की नौबत आ सकती है।

इसलिए तालिबान से खिलवाड़ करने से पहले अमरीका को दो बार सोच लेना चाहिए। यदि वह इतिहास से कुछ सीखना चाहे, तो द्वितीय विश्व युद्ध में भी ब्रिटन आदि पश्चिमी देशों ने नाजी जर्मनी के साथ ऐसे ही समझौते किए थे और हर समझौते से हिटलर और मजबूत हो उठा था। अंत में उसने सारे यूरोप में अपनी सेनाएं भेजकर भयंकर नरसंहार मचा दिया था।

अब लगता है कि अमरीका वही पुरानी गलती दुहरा रहा है। स्थिति वही है केवल खिलाड़ियों ने स्थान बदल लिए हैं। नाजी जर्मनी की जगह तालिबान है, नाजियों से समझौते करनेवाले ब्रिटेन की जगह अमरीका है, युद्ध के लगभग अंत तक तटस्थ रहते हुए अपनी शक्ति बरकरार रखनेवाले अमरीका की जगह चीन है। यदि युद्ध छिड़ जाए, तो जिस तरह जर्मनी और ब्रिटन दोनों ही तबाह हुए थे, वैसे ही तालिबान और अमरीका और उसके मित्र देश तबाह हो जाएंगे, और इस विध्वंस से चीन उसी तरह अधिक शक्तिशाली होकर उभरेगा जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका उभरा था।

इस तरह ऐसा लगता है कि आनेवाले वर्षों में भारी उथल-पुथल मचने वाला है जो दुनिया के नक्शे को ही और वर्तमान शक्ति-संतुलन को ही बदलकर रख देगा। द्वितीय विश्व युद्ध के विजेताओं ने अपने पक्ष में जो तंत्र रचा था, लगता है, उसका समय अब बीतने वाला है। उसकी जगह एक नया शक्ति संतुलन आ सकता है जिसमें चीन का स्थान सर्वोपरि होगा। (समाप्त)

Tuesday, March 10, 2009

पाकिस्तानी बम पर गढ़ी है तालिबानी नजर

तालिबान के कब्जे में पाकिस्तानी परमाणु अस्त्र का आना एक गंभीर और वास्तविक खतरा है, जिसके भारत के लिए और समस्त दुनिया के लिए दूरगामी परिणाम होंगे।

रणनीतिक दृष्टि से देखें, तो अमरीका से पिंड़ छुड़ाने के लिए तालिबान के पास पाकिस्तानी बम पर कब्जा करने के सिवा और कोई विकल्प रह भी नहीं गया है, क्योंकि वह अमरीका के साथ सीधी लड़ाई जीत नहीं सकता। इसलिए वह परमाणु बम प्राप्त करने की ओर पुर-जोर कोशिश करेगा।

पाकिस्तानी बम तालिबान के हाथ पड़ते ही अमरीका को अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा। अमरीका कभी भी परमाणु बम के खतरेवाले युद्ध में अपने सैनिकों को नहीं उतारेगा। वह युद्ध भूमि में अपने सैनिकों की इतनी मौतें कभी बर्दाश्त नहीं कर सकेगा।

पाकिस्तानी बम तालिबानों के हाथ लगते ही, पाकिस्तानी सेना में भी विभाजन हो सकता है। उसका एक भाग तालिबान को अजेय मानकर उसके साथ हो जाएगा। इस विभाजन से पाकिस्तानी सेना की लड़ने की क्षमता समाप्त हो जाएगी और तालिबान की उतनी ही मजबूत। तब उसे पाकिस्तान को हजम करने से कोई नहीं रोक सकेगा। यदि ऐसा हुआ तो एक बार फिर विभाजन के समय का और बंग्लादेश के बनने के समय का घटनाचक्र घूम उठेगा और लाखों पाकिस्तानी शरणार्थी तालिबान से भागते हुए गुजरात, राजस्थान, पंजाब आदि सरहदी क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे। इस तरह इतिहास एक पूरा चक्कर घूम जाएगा, धार्मिक कट्टरता के आधार पर बने पाकिस्तान के नागरिक धर्मनिरपेक्ष भारत की शरण में आने को मजबूर हो जाएंगे, और दो राष्ट्रों के अपने सिद्धांत को उन्हें थूक कर चाटना पड़ेगा।

तालिबान के हाथ बम आते ही, वह उसका प्रयोग दिल्ली, अमृतसर या अन्य किसी भारतीय शहर पर कर सकता है। वह इसलिए ऐसा करेगा, क्योंकि पाकिस्तान के पास अभी ऐसे प्रक्षेपास्त्र नहीं हैं, जो इन अस्त्रों को न्यूयोर्क, वाशिंगटन या लंदन तक ले जा सकें। इसलिए तालिबान अपने निकट के अमरीकी मित्रों की कनपटी पर परमाणु बम रखकर अमरीका पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। तालिबान के लिए सबसे नजदीक भारत ही है, जिसे वह अमरीका परस्त मानता है क्योंकि भारत अफगानिस्तान की वरतमान सरकार के साथ मिल-जुलकर काम कर रहा है। हां, इजराइल एक अन्य निशाना हो सकता है।
दिल्ली, इजराइल आदि पर एक आध बम गिराकर तालिबान अमरीका को अल्टीमैटम देगा कि अफगानिस्तान से तुरंत दफा हो जाओ वरना यही क्रम दुहराया जाएगा। जापान को हराने के लिए अमरीका ने भी यही रणनीति अपनाई थी। उसने हिरोशिमा, नागासाकी आदि पर परमाणु बम गिराए, और यह जाहिर कर दिया कि जब तक जापानी सेना हथियार न डाले, वह जापान के अन्य शहरों पर भी परमामु बम गिराता जाएगा और जापान को तबाह कर देगा। इस तरह दिल्ली के बाद चंडीगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद, अहमदाबाद आदि का नंबर आ सकता है।

यदि पाकिस्तान का वजूद नष्ट हो जाए, तो ये सब घटनाएं संभव हैं। पाकिस्तन के पश्चिमी सरहदों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबानी क्षेत्रों में एक नए कबीलाई राष्ट्र का उदय हो रहा है, लगभग उसी तरह जैसे मध्य युग में चंगेस खान मध्य एशिया में शक्तिशाली हुआ था। उसने तब स्पेन से लेकर चीन तक के विशाल भूभाग को हिलाकर रख दिया था।

तालिबान के कब्जे में पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र आने को रोकने के लिए यदि इजराइल अथवा अमरीका पाकिस्तान के परमाणु जखीरों पर एहतियाती हमले करें, तो इससे तीसरे विश्व युद्ध की नौबत आ सकती है, क्योंकि इसके प्रतिकार में चीन जरूर पाकिस्तान के पक्ष में युद्ध भूमि में उतर पड़ेगा। चीन चाहता है कि तालिबान उसके अंकुश के अधीन रहे, क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह अपने मुसलमान इलाकों में तालिबानी विचारधारा को फैलने से रोक नहीं पाएगा। यदि तालिबानी विचारधाराएं चीन के मुसलमानों में फैल जाए, तो चीन के ये इलाके अलग होकर तालिबान से मिल सकते हैं अथवा स्वतंत्र राज्य बन सकते हैं। चीन यह कभी नहीं चाहेगा। इसलिए चीन तालिबान को शह देता जाएगा और उसे अपने वर्चस्व में रखने की कोशिश करेगा। चीन तालिबान का उपयोग अमरीका को कमजोर करने के लिए भी करना चाहता है। चीन अमरीका को अपना दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्वी समझता है। जिस तरह रूस को कमजोर करने के लिए अमरीका ने तालिबान को मजबूत किया था, वैसे ही अब चीन अमरीका को कमजोर करने के लिए तालिबान का उपयोग कर रहा है। तालिबान को हथियार देकर वह अमरीका को अफगानिस्तान-पाकिस्तान में लंबे युद्ध में फंसाए रखने में सफल हो रहा है। यदि अमरीका को कुछ और सालों के लिए अफगानिस्तान-पाकिस्तान में फंसाकर रखा जा सके, तो वह आर्थिक रूप से तबाह हो जाए, और चीन को चुनौती देने की उसकी क्षमता कमजोर हो जाए।

ऐसे में अमरीकी अथवा इजराइली हमला होने पर यदि तालिबान चीन से मदद मांगे, तो चीन इनकार नहीं करेगा। चीन, तालिबान और पाकिस्तान के बीच के गठजोड़ के संकेत अभी से मिलने लगे हैं। चीन पाकिस्तानी सेना और तालिबान दोनों को ही हथियार बेचता है। चीन, पाकिस्तान और तालिबान का यह गठजोड़ द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी, इटली और जापान के गठजोड़ के समान होगा, और उसके सामने होगी अमरीका, ब्रिटन, इजराइल आदि पश्चिमी देशों की सेनाएं। इससे अमरीका और चीन में सीधा युद्ध छिड़ जाएगा, कुछ-कुछ वैसे ही जैसे द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटन और जर्मनी के बीच युद्ध हुआ था। यानी इक्कीसवीं सदी की दो महाशक्तियां आपस में टकराएंगी। भारत या तो अमरीका के पक्ष में युद्ध में कूद पड़ेगा, अथवा ईरान, रूस, इंडोनीशिया, मलेशिया आदि की तरह तटस्थ रहेगा। लेकिन यदि युद्ध विश्व स्तर का छिड़ जाए, तो भारत अधिक दिन तक तटस्थ रह भी नहीं पाएगा। यदि भारत युद्ध में खिंच जाए, तो उसके दशकों के आर्थिक-औद्योगिक विकास पर पानी फिर जाएगा। इसकी भी संभावना रहेगी कि भारतीय सेना को विश्व युद्ध में उलझा पाकर नक्सली और माओवादी ताकतें पूरे देश पर अथवा देश के अधिकांश हिस्सों पर साम्यवादी स्वतंत्र राज्य बना लें। ऐसे राज्य को सफल नेतृत्व देने के लिए भारत में अनुभवी साम्यवादी दल पहले से ही मौजूद है। रूस में भी साम्यवादी क्रांति द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में ही हुई थी। याद रखना चाहिए कि चंद्रगुप्त मौर्य ने ढाई हजार साल पहले लगभग ऐसी ही परिस्थितियों का लाभ उठाकर इन्हीं प्रदेशों में यानी आजकल के बिहार-मध्य प्रदेश वाले इलाके में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी जो समस्त उत्तर और मध्य भारत में लगभग ढाई सौ सालों तक राज्य करता रहा। उस समय सिकंदरी हमले से मगध के उत्तर-पश्चमी भागों में अराजकता फैली हुई थी, जैसे आज पाकिस्तान-अफगानिस्तान में फैली है।

इन सब गतिविधियों का भारत पर क्या असर पड़ सकता है, इसके बारे में सोचकर भी दिल कांप उठता है। तालिबानी हमले से बचने के लिए भारत को अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर नागपुर, पटना अथवा हैदराबाद ले जाना पड़े। यदि ऐसा हुआ, तो जैसे तुगलक के जमाने में हुआ था, दिल्ली एक बार फिर वीरान हो जाएगी।

हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए। भारत पर पश्चिमी सरहदों से ही हमले होते रहे हैं, और हमने कई बार अपनी आजादी इन हमलावरों के हाथों खोई है। ऐसा न हो कि इक्कीसवीं सदी में भारत को तालिबान के रूप में एक और गजनी, गौरी, बाबर, या तैमूर का सामना करना पड़े।

भारतीय राज्य इतना अमरीका परस्त हो गया है कि वह पाकिस्तान-अफगानिस्तान में हो रहे इन बुनियादी परिवर्तनों का बस मूक दर्शक बना हुआ है, हालांकि उसमें उसकी भी तबाही के बीज विद्यमान हैं। वह सोच रहा है कि अमरीका इस समस्या का समाधान कर लेगा। नए अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा पर उसकी आशाएं टिकी हुई हैं। ईराक से अमरीकी सेना वापस बुला लेने को लेकर भी भारत उत्साहित है। वह सोच रहा है कि अब अमरीका अपनी पूरी ताकत अफगानिस्तान-पाकिस्तान में लगाएगा।
पर ये भारतीय आशाएं मिट्टी में मिल सकती हैं, यदि अमरीका का वर्तमान आर्थिक संकट बना रहा अथवा और गहराता गया। ऐसी स्थिति में अमरीका में इतनी कुव्वत बची नहीं रहेगी कि वह अफगानिस्तान-पाकिस्तान में एक लंबा युद्ध छेड़ता जाए। ईराक-अफगानिस्तान में अब लगभग सात-आठ सालों से वह युद्ध में फंसा हुआ है, जो हर साल उसके लिए अरबों डालर का खर्च करा रहा है। क्या आर्थिक महासंकट से कंगाल हुआ अमरीका इस स्तर का खर्च अधिक समय जारी रख सकेगा?

यदि अर्थ-संकट गहराने से अमरीका मजबूर होकर अफगानिस्तान-पाकिस्तान से हाथ खींच ले, तो यह तालिबान और चीन की स्पष्ट विजय होगी। अमरीका के हटते ही, तालिबान पाकिस्तान-अफगानिस्तान पर अपना एकछत्र वर्चस्व स्थापित कर लेगा और पाकिस्तान को हजम कर लेने के बाद वह चीनी शहजोरी में अपनी विनाशकारी नजर भारत की ओर करेगा।

Tuesday, December 23, 2008

हर ओर से हारे हम आतंक के सामने

मुंबई नरसंहार के दौरान और उसके बाद भारत की प्रतिक्रिया बहुत ही असंतोषजनक रही है, सभी स्तरों पर। सरकार की नीति ढुलमुल और दिगभ्रमित सी रही है। पहले तो आतंकी हमले का सामना करते वक्त ही बहुत से घपले किए गए। बिना पर्याप्त सुरक्षा तैयारी के महाराष्ट्र के कुछ आला पुलिस अधिकारी हथियारों से लैस आतंकियों को रोकने चल पड़े और तुरंत शहीद हो गए। उनकी बहादुरी पर तो कोई सवाल नहीं उठा सकता, पर समझदारी पर जरूर अनेक सवाल उठते हैं। क्या उन्हें बिना पर्याप्त दल-बल के इस तरह खतरा मोल लेना चाहिए था? क्या उनकी आसान मौत यह संदेश नहीं देता कि भारत का सुरक्षा तंत्र अकुशल, अपेशेवरीय और मूर्ख है? यदि पुलिस प्रमुख स्वयं इतनी आसानी से मारा जा सकता है, तो आम जनता कितनी असुरक्षित होगी। इससे यही पता चलता है कि पुलिस को भनक तक नहीं थी कि आतंकी किस हद तक हथियारबंद थे, कितनी संख्या में थे और उनकी संहारक क्षमता कितनी थी। शायद सालसकर आदि यही समझ रहे थे कि ये मुंबई के अपराधी गैंगों के गुर्गे हैं। उन्हें इस गलतफहमी की भरपाई अपनी जान देकर करनी पड़ी। इससे यही पता चलता है कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिनके हाथों में हैं, वे वास्तविक परिस्थितियों से बिलकुल कटे हुए हैं और देश के सामने उपस्थित खतरों की उन्हें न के बराबर समझ है।

हां यह दलील दिया जा सकता है कि करकरे, सलासकर, आप्टे आदि की इसमें क्या दोष है, दशकों के राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और कुशासन ने पुलिस को पंगु बना दिया है, और वह एक संगठन के रूप में पहल करने की क्षमता खो चुकी है, और किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए उसके कुछ दिलेर अफसरों को स्वयं जान हथेली पर लेकर कार्रवाई करनी पड़ती है। यदि यही सच है तो हम मध्यकाल के उन राजपूत योद्धाओं की गलतियों से कुछ भी नहीं सीख पाए हैं, जो युद्ध भूमि में खूब व्यक्तिगत वीरता तो दिखाते थे, पर रण न जीत पाते थे, क्योंकि ये आपसी तालमेल से नहीं लड़ते थे। आधुनिक युग में पुलिस, फौज या अन्य सुरक्षा बलों में व्यक्तिगत वीरता का उतना महत्व नहीं रहता, जितना संगठित शक्ति के सूझबूझपूर्ण प्रयोग का। यहीं महाराष्ट्र पुलिस हार गई। सालेसकर जरूर वीर सिपाही थे, पर समझदार सिपाही भी थे? उनकी शहादत के सामने नतमस्तक होते हुए भी, हमें पुलिस सुधार को ध्यान में रखते हुए और अपने देश और समाज की भावी सुरक्षा के लिए उपर्युक्त सवाल उठाने ही होंगे।

अब आते हैं अन्य महकमों की कोताहियों पर। आतंकियों के ताज और ट्राइडेंट होटलों में घुस जाने के नौ घंटे तक राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के जांबाज वारदात-ए-मौके पर नहीं पहुंच पाए। पहले तो उन्हें दिल्ली से मुंबई लाने के लिए हवाई जहाज मिलने में देरी हुई। फिर मुंबई हवाई अड्डे पहुंचने पर उन्हें वहां से ताज तक लाने में दो घंटे की देरी हुई। आतंकियों ने अधिकांश बंधकों और होटल कर्मचारियों की कत्ल उनके होटल पहुंचने के कुछ ही घंटों में कर दी थी। यदि राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के जांबाज तुरंत मौके पर पहुंच गए होते, तो न जाने कितनों की जानें बच जातीं। पर न तो एनएसजी जांबाजों को तुरंत बुलाया गया और न ही बुलाए जाने पर वे तुरंत ही मौके पर पहुंच सके। इतने में कई लोगों की जानें चली गईं।

इस तरह की वारदातें होने पर निर्णय लेने और आदेश देने की जिम्मेदारी किसकी हो, यही स्पष्ट नहीं था। मुंबई को शासित करने की अंतिम जिम्मेदारी महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री के हाथों में है। एक तो मुख्य मंत्री और उसका गृह मंत्री निकम्मे निकले, दूसरे, इन पदाधिकारियों पर महाराष्ट्र जैसे विशाल राज्य के शासन की जिम्मेदारी होती है, इसलिए वे मुंबई की इस तात्कालिक जरूरत की ओर तुरंत ध्यान नहीं दे पाए। और इस बार तो मुख्य मंत्री मुंबई में था भी नहीं, दूर केरल के दौरे पर था। उस तक इस घटना की सूचना पहुंचाने में, स्थिति की गंभीरता का उसे बोध होने में, और उसके द्वारा सरकारी मशीनरी को सक्रिय कराने के आदेश देने में काफी वक्त लग गया।

सवाल यह है कि मुंबई जैसे बड़े-बड़े महानगरों का शासन मुख्य मंत्री के हाथों में क्यों रहे, क्या ये अपनी शासन-व्यवस्था स्वयं नहीं संभाल सकते? जरूर संभाल सकते हैं, लेकिन यहां राजनीतिज्ञों का स्वार्थ आड़े आता है। मुंबई महाराष्ट्र का सबसे समृद्ध शहर है। अधिकांश उद्योग-धंधे वहीं हैं। वहीं से महाराष्ट्र को अधिकांश राजस्व प्राप्त होता है। यदि मुंबई एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई हो जाए, तो महाराष्ट्र सरकार की आमदनी में भारी कमी आ जाए। और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मुंबई की आमदनी में हाथ डालकर ही महाराष्ट्र के नेता मालामाल होते हैं, तब फिर वे मुंबई को कैसे अलग प्रशासनिक इकाई बनने देते।

हमारी शासन व्यवस्था का सच यह है कि कोई भी स्वयं निर्णय लेने का जोखिम नहीं ले सकता। सब कुछ पार्टी के आला कमान पर छोड़ दिया जाता है। कहने को तो देश लोकतंत्र है, पर यहां हर पार्टी में परिवारवाद का बोलबाला है या पार्टियों के कुछ मुट्ठी भर व्यक्ति ही सत्ता की डोर संभाले हुए हैं। वे ही सभी निर्णय लेते हैं, दूसरों को न तो निर्णय लेने दिया जाता है, न ही वे स्वयं भी निर्णय लेना चाहते हैं। चाटुकारी और निकम्मेपन का साम्राज्य गरम है और कोई भी जिम्मेदारी की आफत अपने सिर नहीं मोल लेना चाहता है। ऐसे माहौल में सामान्य स्थितियों में तो देश की गाड़ी जैसे-तैसे अपने अंदरूनी वेग से चलती जाती है, पर जब कोई आपत स्थिति आती है और तुरंत निर्णय लेने होते हैं, पल-पल पैंतरे बदलने होते हैं, तो यह सब समय पर नहीं हो पाता। यही सब हुआ, और निर्णय मुंबई शासन के ही किसी अधिकारी द्वारा न लिए जाकर, दूर बैठे मुख्य मंत्री को लेने पड़े, जो स्वयं और भी दूर दिल्ली स्थित अपने आकाओं का मुहताज था।

दूसरे, इस तरह की घटनाओं में सरकार के अनेक महकमों का तालमेल आवश्यक होता है, पुलिस, अग्निशमन दल, सेना, इत्यादी। यहां भी भारी चूक हुई और सब अलग-अलग और बहुधा परस्पर-विरोधी तरीके से काम करते रहे।

मीडीया भी भारी घपले कर बैठा। एक ओर वह पुलिस और सैनिक कार्रवाई के महत्वपूर्ण सुराग आतंकियों तक पहुंचाने का माध्यम बना, और दूसरी ओर वह सारी घटना को बहुत ही पक्षपाती और संकीर्ण नजरिए से पेश करता रहा। आतंकियों ने मुख्य रूप से तीन जगहों को निशाना बनाया था, छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन, ताज और ट्राइडेंट होटल और नरीमन हाउस। सबसे पहला हमला छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पर हुआ था और सबसे ज्यादा लोग भी वहीं मरे थे, लेकिन मीडिया ने सारा ध्यान ताज और नरीमन हाउस पर ही केंद्रित रखा और इस तरह यह जाहिर कर दिया कि उसकी दृष्टि में गरीबों की मृत्यु और अमीर उद्योगपतियों और विदेशी नागरिकों की मृत्यु का वजन समान नहीं है।

मुंबई के अभिजात नागरिकों की प्रतिक्रिया भी बहुत प्रेरणादायक नहीं रही। एक तो, इस तरह के पहले के हमलों पर चुप्पी साधकर उन्होंने एक प्रकार से इस बार कुछ भी कहने का नैतिक अधिकार खो दिया था। इसलिए जब इस बार हमला स्वयं उनके वर्ग पर हुआ, तो उनका क्रोध और बौखलाहट साफ रूप से नपुंसक और अशोभाकारी लगा। जब बिहार में लाखों लोग बाढ़ से विस्थापित हो रहे थे, जब महाराष्ट्र में गरीब किसार हजारों की संख्या में गरीबी और मुफलीसी के कारण आत्महत्या कर रहे थे, या जब हिंदी भाषी छात्र-छात्राओं, गरीब खोमचेवालों और टैक्सी चालकों को मुंबई में राज ठाकरे के गुर्गे पीट रहे थे, या जब मुबई की ट्रेनों में बम विस्फोट कराए गए थे, इस अभिजात वर्ग ने कोई प्रतिक्रिया या हमदर्दी नहीं दिखाई। पर जब इस बार बंदूक उनके वर्ग के सीने पर दागी गई, तो वे अपने आलीशासन बंगलों और सुख-सुविधा संपन्न फ्लैटों से (जो अब असुरक्षित प्रतीत हो रहे थे) बाहर निकल आकर सारे देश के सामने मांगें करने लगे। अब उनको देश के समर्थन की जरूरत महसूस हो रही थी, पर अनेक अवसरों पर जब देश को उनके समर्थन की आवश्यकता थी, वे खामोश बैठे रहे थे। इस वर्ग के लोग इस देश से कितने कट से गए हैं और अमरीका आदि के साथ उनके तार किस हद तक मिलते हैं, इसके भी उन्होंने अनेक संकेत दिए। मुंबई नरसंहार को उन्होंने अमरीका के न्यूयोर्क शहर के ट्विन टावर पर ग्यारह सितंबर को हुए हमले की तर्ज पर भारत का नायन लेवन (अमरीका में दिनांक लिखते समय पहले महीना-सूचक संख्या लिखी जाती है, फिर दिन सूचक संख्या, इस तरह ग्यारह सितंबर को 9/11 के रूप में लिखा जाता है, और उसे नायन लेवन कहा जाता है) घोषित किया। ताज होटल को ग्राउंड जीरो बता दिया। अमरीकी रीति-रिवाज उन पर इतना हावी था कि वे यह भी नहीं सोच पाए नायन लेवन जैसी शब्दावली भारत के लिए बिलकुल ही अनर्गल है क्योंकि यहां तिथियां इस तरह लिखी ही नहीं जातीं। भारत के लिए तो नयन लेवन, लेवन नयन होता, क्योंकि यहां महीना-सूचक अंक दिन-सूचक अंक के बाद लिखा जाता है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि अमरीका से हटकर भी भारत का स्वतंत्र अस्तित्व है और भारत में हो रही हर घटना को अमरीका के साथ जोड़कर या अमरीका की शब्दावली में सोचने की जरूरत नहीं है, यह शब्दावली भारत के करोड़ों लोगों को न तो समझ में आती है न ही वह उनके लिए प्रासंगिक है।

उनकी दिमागी दीवालिएपन के और भी अनेक संकेत मिलने को बाकी थे। जब न्यूयोर्क में आतंकी हमले हुए थे, तो हमले की रात वहां के नागरिकों ने एक-दूसरे को ईमेल संदेश भेजकर उसी रात ट्विन टावर के मलबे के चारों ओर इस हमले में मरे लोगों की स्मृति में मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजली दी थी। यह उनकी संस्कृति के प्रतीकों और शोक जाहिर करने की परिपाटी को देखते हुए एक सुंदर और गौरवपूर्ण तरीका था।

लेकिन जब मुंबई के अभिजात वर्गों ने इसी तरीके से मुंबई में भी शोक-रस्म कराना चाहा तो वही सुंदर कल्पना भोंडेपन और अमरीका की मानसिक गुलामी का सूचक हो गई। इस समारोह के आयोजक फिल्मी सितारों और अन्य अभिजात वर्गों ने इतनी ही मौलिकता दिखाई कि ईमले की जगह एसएमस के जरिए लोगों को इकट्ठा किया। आखिर मुंबई में जो मोमबत्ती समारोह किया गया, वह कृत्रिम, भावना-शून्य और अशोभन ही ज्यादा रहा। सबको स्पष्ट था कि यह अमरीकियों ने नायन लेवन के बाद न्यूय योर्क में किए गए रस्म की नकल मात्र है। मोमबत्ती समारोह में ये लोग बहुत से इश्तहार लेकर आए, जो सब अंग्रेजी में थे और टीवी कैमरों के सामने इन्हें खूब हिलाया गया, ताकि अमरीका और ब्रिटेन के लोग देख सकें कि उनके नक्काल इस देश में कितने हैं। यदि उनका मोमबत्ती समारोह देशवासियों के लिए होता तो ये इश्तहार हिंदी में होते। स्पष्ट था कि यह समारोह देशवासियों के दुख में शरीक होने के लिए नहीं आयोजित किया गया था।

अब रहती है सुरक्षा महकमे की प्रतिक्रियाओं की बात। प्रधान मंत्री से लेकर सुरक्षा सलाहकरा, और विदेश मंत्री से लेकर गृह मंत्री तक सभी विफल रहे। उनकी प्रतिक्रिया बस यही रही कि अमरीका के सामने हाथ जोड़े दीन भाव से याचना की जाए कि, माई-बाप, हमारी रक्षा करो, पाकिस्तान से कहो कि वह हमें इस तरह न सताए। यह उपनिवेशकाल के गोखले आदि नेताओं की याद दिलाता है जो अंग्रेज वाइसरायों को दीन भाव से अर्जियां भेजने को ही देश को गुलामी से बाहर निकलाने का कारगर अस्त्र मानते थे।

इतना जरूर है कि प्रधान मंत्री आदि के अमरीका के सामने इस तरह श्वान-वृत्ति अपनाने से एक ध्रुव सत्य स्पष्ट हो गया। आज भारत न तो उभरता सुपरपवर है न ही कोई सच्चे अर्थ में स्वतंत्र देश ही। उसकी हैसियत आज भी वही है जो उपनिवेश काल में थी। फर्क इतना है कि हम पहले अंग्रेजों के गुलाम थे, अब अमरीका के हो गए हैं। अंग्रेज सेना लेकर यहां डंटे हुए थे, जबकि अमरीका दूर बैठे अपने डालर निवेशों के बलबूते यहां राज करता है। लेकिन हम आज भी अपने हितों से संबंधित निर्णय लेने के लिए उतने ही स्वतंत्र हैं जितने अंग्रेजों की गुलामी के दिनों स्वतंत्र थे, यानी बिलकुल नहीं।

ये नेता यह नहीं देख पा रहे हैं कि पाकिस्तान के संबंध में अमरीका के हित और हमारे हित में जमीन आसमान का फर्क है, और वे परस्पर विरोधी भी हैं। अफगानिस्तान और तालिबान से लड़ाई में अमरीका के लिए पाकिस्तानी सेना का सहयोग आवश्यक है। दूसरे, अमरीका पाकिस्तान को चीन को घेरे रखने के लिए भी उपयोग कर रहा है, हालांकि यहां चीन ने अपनी कूटनीति का प्रयोग करके पाकिस्तान को बहुत हद तक अपने पक्ष में फोड़ लिया है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका स्वयं भारत को एक भावी प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है और वह ऐसा कुछ नहीं करेगा जो भारत को इतना मजबूत कर दे कि वह अमरीका के लिए चुनौती बन जाए। भारत को कमजोर रखने के लिए पाकिस्तान को उभाड़ना उसकी रणनीति का एक अंग है। इसलिए यह सोचना कि अमरीका अपने हितों को नुकसान पहुंचाकर हमारी लड़ाई लड़ेगा, कोरी आत्म-प्रवंचना है।

मुंबई हमले का जवाब – क्या युद्ध एक विकल्प है? – 2

प्रत्यक्ष युद्ध एक विकल्प नहीं है। पर परोक्ष युद्ध एक विकल्प हो सकता है। इसके अनेक उद्देश्य होंगे –

- पाकिस्तान के भीतर घुसकर भारत के दुश्मनों का सफाया। यह नपे-तुले तरीके से करना चाहिए। केवल दुश्मन मरे, आम नागरिकों को हानि न पहुंचे। और सबसे महत्वपूर्ण भारत पर उंगली न उठे।

- जिन 20 अपराधियों की सूची भारत ने बनाई है, उन्हें गुप्त रूप से पकड़कर भारत लाने की कार्रवाई करनी चाहिए, जैसे अमरीका सद्दाम हुसैन को इराक से पकड़ लाई थी, या ओसामा को पकड़ने की कोशिश कर रही है। पाकिस्तान से उन्हें हमें दे देने की मांग करना राजनीतिक मासूमियत का परिचय देना है।

- अमरीका, ब्रिटन, चीन, साउदी अरब आदि पर गुप्त रूप से आतंकी हमले कराना चाहिए। इस तरह से कि शक की सुई पाकिस्तान की ओर घूमे। इससे वे पाकिस्तान को शह देने की अपनी नीति का खामियाजा स्वयं भरेंगे। अब तक भारत भरता आ रहा है।

- इससे वे पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देना बंद कर देंगे।

- भारत में ही अमरीका, ब्रिटन, चीन, साउदी अरब आदि नागरिकों और उनके आर्थिक हितों पर आतंकी हमले करवाना और जिम्मेदारी पाकिस्तान पर थोपना, इससे भी हमारा हित सध जाएगा। पर यह सब अत्यंत ही गुप्त रीति से करना चाहिए, वरना वार उल्टा भी पड़ सकता है, जैसे मालेगांव कांड में हुआ।

Monday, December 22, 2008

आतंक से कैसे निपटें

भारत का हित इसमें है कि पाकिस्तान में नासूर की तरह पनप रहा आतंक समाप्त हो, और वहां पाकिस्तानी फौज, तालिबान, मुल्ला-मौलवी और अन्य भारत-विरोधी तत्व निस्तेज हो जाएं, भारत पर हजार चोट करके उसे शिथिल करने की पाकिस्तानी नीति को निष्फल किया जाए। यह सब तभी संभव होगा जब पाकिस्तान को ऐसी स्थिति में लाया जाए कि वह भारत की बात माने। आज पाकिस्तान खुलेआम भारत को अंगूठा दिखा रहा है, इसलिए क्योंकि यह उसके लिए बिलकुल ही सस्ता अथवा मुफ्त का खेल है। यदि हम ऐसा कुछ कर सकें जिससे पाकिस्तान के लिए भारत के साथ अच्छे संबंध रखना लाजिमी और फायदेमंद हो, तभी वह इस विनाशी खेल से बाज आएगा।

हमें पाकिस्तान के ऐसे वर्गों के हाथ मजबूत करने होंगे जो भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं। इनमें वहां के व्यापारी वर्ग, आम जनता, कलाकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक आदि हैं। भारत को इनके साथ मेल-जोल बढ़ाना चाहिए और उन्हें धर्म-आधारित या सेना द्वारा संचालित समाज-व्यवस्था के बदले लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के फायदे समझाने चाहिए। भारत में विभिन्न कौमों और धर्मों के लोगों के हजारों वर्षों के सहअस्तित्व से एक सहिष्णु, मेल-मिलाप वाली संस्कृति पनपी है जो भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश की साझी संपत्ति है। इसकी रक्षा करना और इसका फायदा उठाना इन तीनों देशों की जनता की जिम्मेदारी है। यह संस्कृति भारत में तो बहुत-कुछ फल-फूल रही है, पर पाकिस्तान और बंग्लादेश में तेजी से लुप्त होती जा रही है, वहां तालिबानी वहशीपन का साया फैलता जा रहा है। वहां के नागरिकों को एहसास कराना चाहिए कि वे कितनी बड़ी निधि खोते जा रहे हैं और उसके बदले में कितना क्षुद्र कंकड़ पा रहे हैं।

यह सब अंग्रेजों की कूटनीति की सफलता है जब आजादी के वक्त उन्होंने भारत को कमजोर रखने के इरादे से उसका विरोधी गुटों में विभाजन कर डाला था। आज पाकिस्तान में जो हो रहा है और वहां जो तालिबान का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वह सब इसी कूटनीति का फल है। बंग्लादेश में भी यह जहर फैलता जा रहा है। सौभाग्य से भारत के मुसलमान बहुत कुछ इस जहरीले प्रभाव से बचे हुए हैं। अब सब आशाएं उन्हीं पर टिकी हैं। यह उन्हीं का ऐतिहासिक कार्यभार होगा कि वे भारत के अन्य कौमों की मदद से देश के इस विभाजन को निरस्त करके देश के तीन टुकड़ों को फिर से एक कर दें। यही आतंक का सही समाधान होगा।

अभी भारत का कोई वश पाकिस्तान पर नहीं चलता क्योंकि वह एक स्वतंत्र देश है, हालांकि हजारों सालों से सांस्कृतिक रूप से वह एक ही महान देश का अंग रहा है। ब्रिटिश कूटनीति के कारण वह हाल के कुछ दशकों से स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व में रह रहा है। पर पिछले साठ सालों के अनुभव से अब यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान के बनने से न भारत का भला हुआ है न स्वयं पाकिस्तान की जनता का। यदि फायदा हुआ है तो चंद फौजी जनरलों का और वहां के बड़े-बड़े जमींदारों और मुल्ला-मौलवियों का। वहां की जनता आज भी घोर गरीबी, अशिक्षा और बीमारी के तले पिस रही है। वहां की फौज, जमींदारों और धर्म के ठेकेदारों का गठजोड़ पाकिस्तानी जनता के इन कष्टों का निराकरण न करके उन्हें भारत के प्रति शत्रुता बरतने की घुट्टी पिलाता जा रहा है। हालांकि सचाई यह है कि यदि भारत-पाकिस्तान-बंग्लादेश एक हो जाएं, तो जनता के असली दुश्मन - गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी आदि पर अधिक संगठित और असरकारक रूप से धावा बोला जा सकता है।

आज इन तीनों देशों का एकीकरण एक असंभव सा कार्य लगता है, पर मुंबई नरसंहार जैसी घटनाएं हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि अब इससे बचा नहीं जा सकता। भारत पर हो रहे आतंकी हमले का सही उत्तर भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश को एक ही शासन के तले लाना होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की फौज इन देशों पर सैनिक विजय प्राप्त कर ले। यह यदि संभव भी हो, तो इससे काम नहीं बनेगा क्योंकि इससे पाकिस्तान और बंग्लादेश की जनता के मन में भारत के प्रति तीव्र घृणा और प्रतिशोध की भावना पनपेगी, जिसके रहते किसी भी प्रकार का सहयोग संभव न हो पाएगा।

हमें पाकिस्तान और बंग्लादेश को समझाना होगा कि यह उन्हीं के हित में है कि वे भारत में एक बार फिर विलीन हो जाएं। हमें जो नीति अपनानी होगी, वह उसी तरह की होनी चाहिए जिसके तहत यूरोप के सदियों से युद्धरत देश आज एक हो गए हैं। हम इस कार्य को चरणबद्ध रूप से पूरा कर सकते हैं। पहले तीनों देशों की संस्थाएं, जैसे स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल, आदि एक-दूसरे के लिए खुल जाएं। छात्रों, अध्यापकों, डाक्टरों, नर्सों आदि का आदान-प्रदान हो। फिर तीनों देशों की कोई सामान्य मुद्रा चलाई जा सकती है। पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। तीनों को समान नागरिकता के अधीन लाया जा सकता है, अर्थात बिना वीसा के इन तीनों देशों के लोग एक-दूसरे के क्षेत्र में आ-जा सकें। सैनिक तालमेल बढ़ाई जा सकती है, और अंततः एक सेना की ओर प्रयास करना चाहिए। अपराध, धर्मोन्माद आदि को नाथने के लिए तीनों को सम्मिलित प्रयास करना चाहिए। और जब सभी पक्षों को यकीन हो जाए कि इसमें किसी का नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही फायदा है, तब तीनों की सरहदें मिटाई जा सकती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में दस, बीस या सौ साल भी लग सकते हैं, पर हमें निरंतर इस ओर कदम बढ़ाते जाना चाहिए।

अखंड भारत के विचार का अब समय आ गया है। अखंड भारत के इतिहास में मुंबई नरसंहार एक ऐसा मील का पत्थर बने, जिसने तीनों देशों के नागरिकों में विभाजन के कलंक को मिटाने की आवश्यकता का बोध कराया। तीनों देशों के हर वर्ग के लोगों को सोचने लगना चाहिए कि किस तरह इस प्राचीन और महान देश के तीनों टुकड़ों को फिर से जोड़ा जाए। यदि करोड़ों लोग सक्रिय रूप से इस दिशा में सोचें, तो ये टुकड़ें अपने आप ही एक हो जाएंगे।

मुंबई नरसंहार को लेकर बहुत जबान चली है, बहुत से पन्ने रंगे गए हैं, पर इस नजरिए से किसी ने नहीं सोचा है, कि आतंक का अंत तभी होगा जब भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश राजनीतिक, सांस्कृतिक, सैनिक और भौगोलिक रूप से एक इकाई बनें। इससे पता चलता है कि काम कितना कठिन है। अभी तो लोग आतंक के मूल कारण को भी समझ नहीं सके हैं। मूल कारण भारत का विभाजन है। मूल कारण अंग्रेजों की कूटनीति है, यहां संप्रदायवाद भड़काने और धार्मिक उन्माद को हवा देने की उनकी नीति है। हम जिन्ना, नेहरू, पटेल आदि को कोसते हैं कि उनकी विफलता और परस्पर वैमनस्य के कारण देश बंटा। पर वे मात्र अंग्रेजों के हाथ के कठपुतले थे। असली कारण अंग्रजों की देश की जनता में दरार डालने की कुटिल नीति थी, ताकि देश सदा कमजोर रहे और उनके लिए चुनौती न बने। हर बार जब भारत पर आतंकी हमला होता है या पाकिस्तान में जुलफिकर भुट्टो, बेनजीर भुट्टो, जिया उल हक और अनेकानेक नेता मारे जाते हैं, तो यह कुटिल नीति का प्रभाव स्पष्ट होता है। इस कुटिल नीति को कमजोर करने और अंततः उसे पूर्णतः मिटाने का एक ही तरीका है कि तीनों देशों को फिर एक किया जाए।

यह कैसे किया जाए, यह सोचने की बात है। पर हमें याद रखना चाहिए कि इस दुनिया में कोई भी बात असंभव नहीं होती। राजनीति की परिभाषा ही यह है वह ऐसी कला है जो असंभव को संभव कर दिखाए। जब चंद्रगुत्प मौर्य ने सिकंदरी हमले के समय के छिन्न-भिन्न भारत को चाणक्य की मदद से समेटकर एक विशाल साम्राज्य गठित किया था तब उसने ऐसे ही असंभव को संभव सिद्ध किया था। यही कार्य बाबर और अकबर ने चौदहवीं सदी में किया था। 1857 में जब हिंदू और मुसलमान एक होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे, तो भी हमने यही गौरवशाली प्रयास किया था। गांधी आदि नेताओं के नेतृत्व में देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए हमने जो महान संग्राम छेड़ा, वह भी ऐसा ही एक प्रयास था। अब समय आ गया है कि हम एक बार फिर प्रयास करें एक महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, देश को एक करने के लिए।

यदि हम सब मान जाएं कि देश का विभाजन गलत था, देश की जनता के हित में नहीं था, और देश की जनता का असली हित देश के टुकड़ों को जोड़ने में है, तो हम कुछ ही दशकों में अखंड भारत के सपने को साकार कर लेंगे। तीनों देशों के लेखकों, कलाकारों, राजनेताओं, राजनीतिक दलों, कारोबारी लोगों, जन साधारण, सभी को गंभीरता से सोचना चाहिए कि अखंड भारत को कैसे साकार किया जाए। इस ओर छोटे-छोटे कदम अभी से उठाए जा सकते हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को सोचना चाहिए कि हम अखंड भारत को साकार करने के लिए क्या कर सकते हैं, और उसे तुरंत करने लग जाना चाहिए। अखंड भारत हममें से अधिकांश के जीवनकाल में संभव नहीं भी हो सकता है। पर हमें अपने बाल-बच्चों का खयाल करके इस ओर प्रयत्नशील रहना चाहिए। जब भरत-पाकिस्तान-बंग्लादेश फिर से एक हो जाएंगे, तो हम कितना महान देश बन जाएंगे इसकी कल्पना करके हमें अपने उत्साह को बुलंद रखना चाहिए।

Sunday, December 21, 2008

मुंबई हमले का जवाब - क्या युद्ध एक विकल्प है?

पाकिस्तान के साथ परंपरागत युद्ध शायद विकल्प नहीं है, पर परोक्ष युद्ध की नीति संभव है।

अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजकर तालिबानों के विरुद्ध मोर्चे को हम मजबूत कर सकते हैं। इससे अमरीका का पाकिस्तान पर निर्भरता कम होगी, उसी तादाद में अमरीका द्वारा पाकिस्तानी सेना को टिकाए रखने की इच्छा भी। इससे अंततः पाकिस्तानी सेना कमजोर होगी और पाकिस्तान का लोकतंत्र मजबूत होगा। तालिबान का सफाया भी संभव हो सकेगा।

Saturday, December 20, 2008

मुंबई हमले का जवाब – कूटनीतिक पहल

अब तक कूटनीति यही रही है हम अमरीका के सामने हाथ फैलाएं।

अन्य कूटनितिक पहल भी आवश्यक होंगे।

चीन पाकिस्तान को उभाड़नेवाला देश है। उसे रास्ते पर लाने के लिए भारत को ताइवान और तिब्बत की आजादी के आंदोलन को खुला समर्थन देना चाहिए। चीन के जिजियांग आदि प्रदेशों में घनी मुस्लिम आबादी है जो चीन से अलग होना चाहती है। इनमें तालिबान, अलकायदा आदि का प्रभाव बढ़ रहा है। यहां अलगाववाद फैलाने की ओर हमारी भेद नीति तेज करनी चाहिए। वहां आतंकी हमले कराने की कोशिश करनी चाहिए, पर इस तरह से कि यह लगे कि पाकिस्तान की ओर से हुआ है।

साथ ही पाकिस्तान के नागरिकों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए।

भारत के मुसलमानों को मुसलिम दुनिया में शीर्ष स्थान हथियाना चाहिए और साउदी अरब, ईरान, तालिबान आदि की कट्टरपंथी धारा को गैरइस्लामिक करार देना चाहिए। भारत के सहिष्णुतावादी सूफी धारा को असली इस्लाम के रूप में प्रचारित करना चाहिए। इसमें तुर्की, मलेशिया, इंदोनीशिया आदि नरम इस्लामी देशों का सहारा लेना चाहिए। इनके धर्म-गुरुओं का सम्मेलन भारत में बुलाना चाहिए। यह सरकार की ओर न करके, मुस्लिम समुदाय की ओर से होना चाहिए।

Friday, December 19, 2008

क्यों हुआ मुंबई

अब यह लगभग स्पष्ट हो चुका है कि मुंबई हमलों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। सवाल यह है कि यह हमला क्यों कराया गया और इसके जवाब में भारत क्या करे।

भारत ने पाकिस्तान से 20 आतंकियों को सौंपने की मांग की है, जिसे पाकिस्तान ने ठुकरा दिया है। पहले के अवसरों की तरह इस बार भी पाकिस्तान की दलीलें बहुत कुछ वे ही हैं - इस हमले का पाकिस्तान से कोई ताल्लुक नहीं है; ये आतंकवादी पाकिस्तानी नागरीक हैं ही नहीं, बल्कि ये मुंबई के ही निवासी हैं, क्योंकि इन्हें मुंबई की अच्छी जानकारी थी; और, यदि फिर भी भारत को यकीन न हो, तो वह अपने पास मौजूद सारे सबूत पाकिस्तान को दे दे, पाकिस्तान उनके आधार पर अपनी अदालतों में मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई करेगा। यह आखिरी दलील अमरीकी दबाव के फलस्वरूप किया गया है। अमरीका ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान आतंकियों पर कार्रवाई नहीं करेगा, तो अमरीका को यह कार्रवाई करनी पड़ेगी।

पाकिस्तान ने इस बार उपर्युक्त दलीलों के अलावा एक नई दलील भी पेश की है, जो काफी रोचक है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने कहा है कि मुंबई हमले अराज्यीय कर्ताओं (नोन-स्टेट एक्टरों) की करतूत है, और पाकिस्तानी सरकार का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। यदि इस दलील को माना भी जाए, तो यह बात निर्विवाद है कि इन अराज्यीय कर्ताओं को पाकिस्तान में खूब शह मिलता है, उन्हें वहां पाला-पोसा जाता है, हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, उनका मानसिक प्रक्षालन (ब्रेनवाश) करके उन्हें जेहादी बनाया जाता है, और पैसे और बमों से लैस करके भारत में उतारा जाता है। यह सब काम पाकिस्तान के अंदर से और पाकिस्तान की संस्थाओं द्वारा -- आईएसआई और पाकिस्तानी सेना द्वारा -- किया जाता है। भारत को पाकिस्तान में मौजूद ऐसे दर्जनों प्रशिक्षण शिविरों की जानकारी है। ऐसे में जरदारी का यह दलील कि पाकिस्तान का इस हमले से कोई लेना-देना नहीं है, खोखला है।

फिर भी जरदारी का वक्तव्य पाकिस्तान की असली स्थिति पर प्रकाश जरूर डालता है। आज के पाकिस्तान में पांच मुख्य शक्ति केंद्र हैं – जरदारी की सरकार, पाकिस्तानी सेना, आईएसआई, तालिबान का पाकिस्तानी रूप, और देश के पश्चिमी भागों के कबीलाई गुट, जो लगभग स्वतंत्र से हो गए हैं और जिन पर पाकिस्तानी सरकार या सेना का कोई नियंत्रण नहीं है। संभव है आनेवाले दिनों में यहां एक नए राष्ट्र बलूचिस्तान का जन्म हो जाए, या यह भी हो सकता है कि अफगानिस्तान से खदेड़ा गया तालिबान यहां अपने लिए नया राष्ट्र बना ले जिसमें अफगानिस्तान और पाकिस्तान के वे हिस्से शामिल होंगे जिन पर उसका नियंत्रण है। इस तरह दिक्षण और उत्तर कोरिया, दक्षिण और उत्तर वियतनाम आदि की तरह अफगानिस्तान के भी दो भाग हो जाएंगे, एक भाग दक्षिण कोरिया की तरह अमरीकी सैनिक शक्ति के कारण टिका रहेगा, और दूसरा भाग तालिबान और अलकायदा के नियंत्रण में रहेगा।

इन पांच शक्ति केंद्रों के अलावा पाकिस्तान में एक छठा शक्ति केंद्र अमरीकी सेना भी है जो पाकिस्तान में ओसामाबिन लादन को पकड़ने और अल कायदा को नेस्तनाबूद करने के लिए डटी हुई है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन छह शक्ति केंद्रों में से किसी की भी सत्ता पाकिस्तान भर में नहीं चलती है।

जब हम मुंबई हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप मांग करते हैं कि पाकिस्तान यह करे, वह करे, तो हमारे लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह मांग हम किससे कर रहे हैं? और हमें यह भी विचारना चाहिए कि जिससे हम यह मांग कर रहे हैं, क्या वह इस स्थिति में है भी कि वह उसे पूरा कर सके। स्पष्ट ही जब हमने पाकिस्तान से 20 आतंकवादियों को सौंपने को कहा, तब हमारे मन में यही विचार था कि यह काम पाकिस्तान की सरकार को करना है। पर असलियत यह है कि जरदारी की सरकार पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के हाथों की मात्र कठपुतली है। उसे वही करना होता है, जो उसके ये आका उससे करवाते हैं। इसके अनेक सबूत अब उपलब्ध हैं। जब मुंबई में हमला हुआ था, शुरू-शुरू में जरदारी का रवैया काफी सहानुभूतिपूर्ण रहा। जब भारत ने मांग की कि इस हमले की तहकीकात में सहयोग देने के लिए वे आईएसआई के सरगना को भारत भेजें, तो जरदारी तुरंत राजी हो गए। लेकिन दो दिन बाद ही वे मुकर गए क्योंकि उनके आका आईएसआई ने उन्हें इसके लिए फटकार बताई।

इससे पहले भी जरदारी अनेक ऐसे बयान दे चुके हैं जिनसे उन्हें कुछ ही पल बाद मुकर जाना पड़ा था क्योंकि पाकिस्तानी सेना या आईएसआई ने इन बयानों के लिए उन्हें आड़े हाथों लिया। इन बयानों में ये भी शामिल हैं -- कश्मीर के आतंकवादी फ्रीडम-फाइटर नहीं हैं; और, पाकिस्तान अपने परमाणु अस्त्रों का प्रथम प्रयोग नहीं करेगा। इससे जाहिर होता है कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई पर पाकिस्तानी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, बल्कि इसकी ही अधिक संभावना है कि पाकिस्तानी सरकार की लगाम पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के हाथों में है।

तो भारत के पास क्या विकल्प हैं? क्या वह होट-पर्स्यूट की नीति अपनाकर सीमा पार के आतंकी शिविरों पर फौजी हमले करे, या हवाई हमले करके इन्हें नष्ट करे? मुंबई नरसंहार के गुस्से में हमें यह एक वाजिब कार्रवाई प्रतीत हो सकती है, पर गहराई से सोचने पर यह देश के दुश्मनों के हाथों में खेल जाना होगा।

भारत के दुश्मनों ने मुंबई नरसंहार करवाया ही इसलिए था कि भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ जाए। अमरीका पाकिस्तान पर निरंतर जोर डाल रहा है कि वह तालिबानों और अल कायदा पर ईमानदारी से सैनिक कार्रवाई करे। यह तालिबान पाकिस्तानी सेना का ही मानस पुत्र है और इसलिए उस पर वार करना उसे अपने ही पुत्रों को मारने जैसा प्रतीत होता है। दूसरे तालिबानी मुसलमान हैं और दो-राष्ट्र की नीति पर गठित किए गए पाकिस्तान के लिए अपने ही धर्म भाइयों पर गोली चलाना एक घिनौना कार्य है। अब तक झूठ-फरेब का सहारा लेकर पाकिस्तानी सेना अमरीकी आंखों में धूल झोंकती रही है, पर अब अमरीका का भी मूड बदल रहा है। वहां नया राषट्रपति बराक ओबामा आ गया है जिसने पाकिस्तान पर कड़ा रुख अपनाने की बात कही है। दूसरी ओर अमरीका ईराक से हाथ खींचने का मन बना चुका है और अफगानिस्तान पर अपनी पूरी ताकत लगाने वाला है।

ऐसे में तालिबान और अल कायदा पर ठोस कार्रवाई न करने के लिए पाकिस्तानी सेना के पास अब कोई बहाना नहीं बचा है। इसी परिप्रेक्ष्य में उसने मुंबई पर हमला करवाया है। वह चाहता है कि इस हमले से भारत इतना तिलमिला उठे कि दोनों देशों में युद्ध की स्थिति बन जाए, जिसका बहाना बनाकर पाकिस्तानी सेना अपने फौजियों को पश्चिमी सरहदों से हटाकर पूर्वी सरहदों में ले आ सके, और इस तरह तालिबानों से भिड़ने से बच सके। पाकिस्तान को शायद विश्वास है कि उसके परमाणु अस्त्रों के कारण भारत के साथ कोई असली युद्ध नहीं होगा, या अमरीका आदि देश युद्ध होने नहीं देंगे।

पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने यह भी हिसाब लगाया होगा कि यदि पाकिस्तान की सरकार इस नीति का विरोध करे, तो उसे हटाकर दुबारा किसी जनरल को राष्ट्रपति बना दिया जा सकेगा। चूंकि पाकिस्तानी लोगों को बरसों से भारत-विरोधी प्रचार से बहकाया गया है, वे भी इस सरकार के टूटने का ज्यादा विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें समझाया जा सकेगा कि यह सरकार भारत के प्रति नरम रुख अपना रही है जो पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए घातक है और इसलिए उसे हटाना जरूरी है। लेकिन यहां पाकिस्तानी सेना का हिसाब गलत भी हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान की जनता बरसों की सैनिक तानाशाही से त्रस्त हो चुकी है और लोकतांत्रिक सरकार के फायदे समझने लगी है।

इन्हीं दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पाकिस्तानी सेना ने मुंबई नरसंहार रचाया। पर पाकिस्तानी सेना यहां बहुत ही खतरनाक और आत्मघाती खेल खेल रही है। वह तालिबान और अल कायदा की शक्ति को कम आंक रही है। यह सही है कि तालिबान उसका मानस-पुत्र है पर यह राक्षसी पुत्र अब बड़ा हो गया है और अपने पिता के नियंत्रण के बाहर हो चुका है। वह अपने ही पिता को मारकर अपने हितों की रक्षा करने से भी बाज नहीं आएगा। आज तालिबान पर अमरीकी दबाव दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। अमरीकी दबाव में आकर पाकिस्तानी सेना भी तालिबान पर कार्रवाई करने को मजबूर है। ऐसे में तालिबानों की शत्रुओं की सूची में पाकिस्तानी सेना भी आ गई है। यही वजह है कि अभी हाल के दिनों में पाकिस्तान में आतंकी हमलों की बाढ़ सी आ गई है।

अफगानिस्तान से खदेड़े जाने के बाद अब तालिबान के लिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि उसके पास कोई सुरक्षित जमीन हो जहां वह अपने आपको संगठित कर सके, और जिसे वह अमरीकी और पाकिस्तानी हमलों से सुरक्षित रख सके और जहां से वह अपने क्षेत्र का शासन कर सके, लोगों से कर वसूल सके, अफीम आदि की खेती करके नशीले द्रव्य बनाकर उनकी तस्करी कर सके, और इससे आनेवाले पैसे से हथियार खरीद सके, तथा अपने नेताओं को सुरक्षित रख सके।

इसलिए तालिबान धीरे-धीरे अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सरहदों के आसपास के इलाकों पर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है। अभी तालिबान और पाकिस्तानी सेना के पलड़े बराबर हैं, लेकिन यदि पाकिस्तानी सेना अपनी सैनिकों को हटाकर भारत की सरहद पर ले आए, तो तालिबान का पलड़ा भारी हो जाएगा और वह पूरे पाकिस्तान नहीं तो उसके उत्तर-पश्चिमी इलाकों में हावी हो जाएगा और ये इलाके पाकिस्तान के हाथ से सदा के लिए निकल जाएंगे। यानी पाकिस्तान का दूसरी बार बंटवारा हो जाएगा।

बात इतने तक भी सीमित नहीं रहेगी। तालिबान के लिए अमरीकी दबाव से मुक्ति पाने का एक ही मार्ग बचा है, वह है पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर कब्जा करना। जैसे ही पाकिस्तानी सेना मोर्चे से हट जाएगी, तालिबान आगे बढ़कर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर कब्जा कर लेगी। तब अमरीका को भी अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा।
एक बार परमाणु हथियार तालिबानों के हाथ आ जाए, तो यह समझा जा सकता है कि ये हथियार अल कायदा को मिल चुके हैं, क्योंकि दोनों में गहरी सांठ-गांठ है। तब फिर इस दुनिया का क्या होगा इसकी कल्पना करके भी दिल दहल उठता है, क्योंकि तब आतंकी आरडीएक्स के स्थान पर परमाणु हथियार इस्तेमाल करते हुए नजर आएंगे। यदि तालिबान या अलकायदा अमरीका, भारत, ब्रिटेन या इजराइल पर परमाणु अस्त्रों से हमला कर दे, अथवा ये ही देश तालिबान पर परमाणु अस्त्रों से एहतियाती हमला कर दे, तो दुनिया तीसरे महायुद्ध की कगार पर पहुंच जाएगी, और पाकिस्तान की जमीन पर यह युद्ध लड़ा जाएगा। कहना न होगा कि इस युद्ध में परमाणु हथियारों का खुलकर उपयोग होगा।

इसलिए पाकिस्तानी सेना को और वहां के लोगों को समझना चाहिए कि तालिबान, अल कायदा और आतंकवादियों पर विजय पाना उनके भी हित में है। पर पाकिस्तानी सेना कभी भी अपनी समझदारी के लिए नहीं जानी गई है। किसी ने सही ही कहा है कि यह एक ऐसी सेना है जिसने कोई भी युद्ध नहीं जीता है, हालांकि उस पर अरबों डालर हर साल खर्च किए जाते हैं।
ऐसे में भारत को अच्छी तरह समझना होगा कि उसके असली दुश्मन कौन हैं और उनसे कैसे निपटा जाए। गलत कदम से मामला नियंत्रण के बाहर हो जाएगा और भारत को भी लेने के देने पड़ जाएंगे।

Thursday, December 18, 2008

मुंबई हमला और मोमबत्ति मार्च का सच

मुंबई हमले के सूत्रधारों का खुलासा हो चुका है। हमलावर पाकिस्तान से आए, पाकिस्तान के तत्वों ने उन्हें पाकिस्तान में स्थित शिविरों में प्रशिक्षण दिया, और पाकिस्तान से ही उन्हें पैसे, हथियार, निर्देश और मार्गदर्शन मिले। स्वयं पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तौयबा और जमात-उद-दावा को प्रतिबंधित करके और उसके सरगना को नजरबंद करके यह कबूल कर लिया है कि इस हमले में पाकिस्तान का हाथ है।

ऐसे में भारत की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए? देश के नेताओं, अफसरों और मुंबई के कुछ नागरिकों के मन में गुस्सा है, अपमान है कि देश के बाहर का कोई आतंकी दल बेरोक देश के समृद्धतम शहर में घुस आया और नरसंहार कर गया। अभी कई वर्षों से भारत के कुछ वर्ग देश को एक उभरती विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, हलांकि यहां अब भी अपार गरीबी, भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और बीमारी का बोलबाला है। फिर भी भारत को चीन और अमरीका के समकक्ष रखना इस वर्ग की मंशा है। यह हमला इस वर्ग द्वारा कल्पित भारत की छवि पर घड़ों ठंडा पानी उंडेल गया है।

पर हमले के प्रति गुस्से को इस वर्ग ने जिस रीती से व्यक्त किया है, उस पर कुछ टिप्पणी करना जरूरी लगता है। टीवी चैनल इस वर्ग का मुख्य वक्ता है, उसका दूसरा वक्ता है, अंग्रेजी अखबार। टीवी चैनलों के प्रसारणों को देखकर तो ऐसा लगता था कि सारा देश आपे से बाहर हुआ जा रहा है और तुरंत ही सेना लेकर पाकिस्तान पर चढ़ बैठने वाला है। पर यह हमारा सौभाग्य है कि टीवी चैनल देश की रग पहचानने में इस बार भी असफल रहे। हमले के दो दिन बाद ही देश के तीन-चार बड़े-बड़े राज्यों में चुनाव हुए। टीवी चैनलों ने विश्वास के साथ कहा कि आतंक इन चुनावों के नतीजों को प्रभावित करके रहेगा, और भाजपा को, जिसने शुरू से ही आतंक को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया था, भारी लाभ पहुंचेगा। पर ऐसा नहीं हुआ, भारत की जनता ने मुंबई हमले की ओर कोई ध्यान नहीं दिया, और स्थानीय मुद्दों के आधार पर उम्मीदवारों को चुना।

क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि टीवी चैनल अपनी अलग ही दुनिया में रहते हैं, जिसका देश की जमीनी हालातों से कोई ताल्लुकात नहीं है। देश गरीबी, भूख, सूखा, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार, और न जाने किन-किन विपत्तियों से जूझ रहा है, पर टीवी चैनलों ने दूध पीते सांप, नरभक्षी तांत्रिक, भुतहा महल, समलैंगिकों का विवाह, किस फिल्मी सितारे ने किस हीरोइन को तलाक दिया, या किसे चूमा, घर की बहू-बेटियों को अध-नंगी हालत में नाचने के लिए प्रोत्साहित करने वाले रियालटी शो, या बिग बोस जैसे अनैतिक सीरियलों और कार्यक्रमों को ही प्राइम टाइम में दिखाने में देश का सर्वोच्च हित समझा। समाचार चैनलों में दो मिनट इस तरह के “समाचार” दिखाए जाते हैं और अगले पांच मिनट अंग प्रदर्शन और फूहड़ता से भरे विज्ञापन। शायद टीवी चैनलों और उनके मालिकों का (जो सब बड़े-बड़े उद्योगपति या विदेशी मीडिया मुगल हैं) उद्देश्य ही यह है कि इस तरह के बेतुके और खयाली कार्यक्रम दिखा-दिखाकर लोगों के मन को सुन्न कर दिया जाए और देश की असली समस्याओं से उन्हें दूर रखा जाए ताकि लोग एक प्रकार की झूठी खुश-फहमी में रहें और टेढ़े और कठिन सवाल न पूछने लगें, जैसे, आजादी के साठ सालों के बाद भी देश से गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी क्यों दूर नहीं हुई, और किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं?

अब तो इन टीवी चैनलों और उन्हें देखनेवालों की एक अजीब सा वर्ग ही बन गया है जो देश की वास्तविकताओं से बिलकुल कटा हुआ है। उनकी अवास्तविकता मुंबई हमले जैसी घटनाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं से भली-भांति जाहिर होती है।

मुंबई हमले के कुछ दिन बाद ही मुंबई के गेटवे ओफ इंडिया के सामने ये लोग मोमबत्तियां लेकर इकट्ठे हुए और तरह-तरह की बेतुकी मांगें टूटी-फूटी अंग्रेजी में करने लगे। लगभग 120 लाख आबादी वाले इस विशाल महानगरी में मुट्ठी भर लोग (किसी ने 20,000 बताया है, किसी ने 10,000) ही इस “प्रदर्शन” में शरीक हुए, जो स्पष्ट करता है कि देश में इस तरह के लोग हमारे सौभाग्य से अभी इने-गिने ही हैं। और इन दस-बीस हजार लोगों में से भी कितने प्रीती जिंता और अन्य फिल्मी हस्तियों को नजदीक से देखने के लालच में वहां आए थे, यह कहना मुश्किल है, पर काफी संख्या इस तरह के तमाशबीनों की भी रही ही होगी। इसी तरह के प्रदर्शन देश के कुछ अन्य बड़े अंग्रेजीदां नगरों में भी कराए गए, जैसे बंगलूरु में।

पर इन प्रदर्शनों में कई ऐसी बातें थीं, जो इनके खोखलेपन को उजागर करती हैं। कई लोग अपने हाथों में इश्तहार लिए हुए थे, पर इन इश्तहारों पर नजर डालते ही स्पष्ट हो जाता था कि उनका लक्ष्य-समूह कौन है। इश्तहार सब अंग्रेजी में थे, और अमरीका और ब्रिटन की नजरों के लिए थे। यदि भारतीयों के लिए होते, तो वे ऐसी भाषा में क्यों लिखे होते जिसे देशवासी नहीं समझते? इसकी भी संभावना है कि इश्तहार दिखाने वाले ये लोग कोई भी भारतीय भाषा ठीक तरह से न जानते हों, क्योंकि ये सब या तो विदेशों में पले-बढ़े हैं या अंग्रेजी-दां स्कूलों में, जिसकी वजह से देशी भाषाओं के ज्ञान से ये महरूम हो चुके हैं। यह बात उनके बोले गए बयानों से और भी अधिक स्पष्ट होता था, क्योंकि ये दो वाक्य भी बिना अंग्रेजी के शब्द बीच में लाए नहीं बोल पा रहे थे।

इन्हें देखकर यह लगता है कि मराठी के चैंपियन राज ठाकरे हिंदी भाषियों को मुंबई से खदेड़ने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करके अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। उन्हें इन अंग्रेजीदां लोगों को मुंबई से बाहर करने की ओर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इनके ही कारण मराठी ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं की बाढ़ मारी जा रही है। पर राज ठाकरे ऐसा क्यों करने लगे, स्वयं उनका बेटा स्कूल में मराठी न पढ़कर जर्मन पढ़ने में लगा हुआ है।

यह वर्ग इतना पश्चिमीकृत और अंग्रेजीदां हो चुका है कि इसे इसकी बड़ी चिंता लगी रहती है कि अमरीका आदि में लोग इनके बारे में क्या सोचते हैं। इनके अपने ही देश के
भाई-बहनों की तकलीफों और परेशानियों को लेकर इनकी रात की नींद कभी नहीं खराब होती। जब बिहार में लाखों लोग बाढ़ से तबाह हो रहे थे, या महाराष्ट्र में ही हजारों किसान गरीबी और मुफलीसी के कारण आत्महत्या कर रहे थे, या मुंबई में ही ट्रेनों पर आंतकी हमले हो रहे थे, तो इनमें से किसी ने भी गेटवे ओफ इंडिया में मोमबत्ती मार्च कराने की नहीं सोची। सवाल उठना स्वाभाविक है, कि अब क्यों?

उत्तर बिलकुल सीधा है। जब अमरीका के ट्विन टावर पर 11 सितंबर (नायन लेवन) को आतंकी हमले हुए थे, तो ऐसे मोमबत्ती मार्च अमरीका में कराए गए थे। मुंबई हमले को इस वर्ग ने भारत का नायन लेवन के रूप में महिमा-मंडित कर दिया था। इसलिए यह आवश्यक था कि भारत में भी इसी तरह के प्रदर्शन हों, ताकि दुनिया देख सके कि भारत भी अमरीका जितना ही आगे बढ़ा हुआ देश है, और वह भी अपना मातम मोमबत्ती जलाकर करता है। पर रोटी-कपड़ा-मकान की झंझटों से परेशान देश की आम जनता को न तो नायन लेवन से कोई लेना-देना था, न ही मुंबई हमले से। उन बेचरों की सारी ताकत तो इस समस्या का हल करने में ही खर्च हो जाती थी कि अगली जून की रोटी कहां से आएगी।

दूसरा कारण यह था कि इस बार हमला मुख्य रूप से गरीबों द्वारा इस्तेमाल करनेवाले ट्रेनों या बाजारों में न हुआ था, बल्कि फिल्मी सितारे, अरबपति कारोबारी, विदेशी सैलानी और आला अफसर जहां शाम को जाम पीने इकट्ठे होते थे, ऐसे सात सितारा होटलों में हुआ था, और हमले में इस तरह के लोग भारी संख्या में मारे भी गए थे। कहते हैं, जब अपने लोग मरते हैं तो दर्द ज्यादा महसूस होता है। इन लोगों की मानसिकता कितनी संकीर्ण हो चुकी है कि इनके लिए "अपने लोग" देश की तमाम जनता नहीं, बल्कि सात सितारा होटलों के चंद मेहमान हैं।

और नायन लेवन के बाद अमरीका ने तुरंत अफगानिस्तान पर युद्ध घोषित कर दिया था, इसलिए मोमबत्ती मार्चरों ने भी गुहार लगाई कि पाकिस्तान पर युद्ध घोषित कर दिया जाए। न तो मामले की पर्याप्त छानबीन को, न ही युद्ध जैसे गंभीर विकल्प के नफे-नुकसान का हिसाब लगाने को इन लोगों ने जरूरी समझा। बस लगे नारे लगाने, पाकिस्तान पर युद्ध कर दो। आखिर पाकिस्तान क्या हमारे लिए गैर है जो हम उस पर हमला करने लगें? अभी साठ साल पहले तक वह इसी देश का हिस्सा था। आज भी देनों देशों के लाखों नागरिकों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है। देश के प्रमुख धर्म के पवित्र ग्रंथ, वेद, वहीं रचे गए थे। क्या अमरीका और अफगानिस्तान के रिश्ते इस तरह के हैं? पर मोमबत्ति मार्चरों को इससे क्या लेना-देना है? वे तो अमरीका के इतिहास को स्वयं अपने देश के इतिहास से बेहतर जो समझते हैं।

उनकी एक अन्य "रणनीति" थी सारा ठीकरा राजनेताओं पर फोड़ना। लगे मांग करने कि गृह मंत्री हटे, महाराष्ट्र का मुख्यमंत्रि बदले, महाराष्ट्र का गृह मंत्रि इस्तीफा दे। वे आसान समाधान चाहते थे। राजनेताओं को बलि का बकरा बनाना आसान था, पर राजनेताओं को भ्रष्ट और निकम्मा बनाया किसने? आज देश की एक कटु सच्चाई यह है कि शासन पैसेवालों और उद्योगपतियों के हाथों का खिलौना है। इस वर्ग ने देश की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, भूख आदि से लड़ना अब देश की प्राथमिकता नहीं है। अमरीका के साथ परमाणु संधि करना, फालतू की प्रौद्योगिकियां देश में लाना जिनसे न तो लोगों को रोजगार मिलते हैं न ही उत्पादकता बढ़ती है, और विदेशी पूंजी को देश में खुला तांडव मचाने की छूट देना, ये सब देश की प्राथमिकताएं हो गई हैं।

आखिर इन मोमबत्ति मार्चरों से पूछना चाहिए कि आप नेताओं पर इतने लाल-पीले हो रहे हैं, लेकिन उन्हें चुनने के लिए आपमें से कितनों ने मतदान किया था? इससे इनकी असलियत खुल जाती। और इनके पीछे जो उद्योगपति हैं, उनसे पूछना चाहिए कि गलत नेताओं और पार्टियों को सत्ता में लाने के लिए उन्होंने कितने अरब रुपए पार्टी कोषों में दिए हैं? तो उनकी भी पोल खुल जाती।

गेटवे ओफ इंडिया में जमा 20,000 लोगों में से 19,000 लोगों ने कभी अपनी जिंदगी में मत दिया हो, तो यह आश्चर्य की बात होगी। क्या यह एक अजीब सा माजरा नहीं है कि जिन नेताओं को इन लोगों ने चुना ही नहीं, उन्हें निकाल बाहर करने में ये इतनी उछल-कूद मचा रहे हैं?

खैर छोड़िए इन मोमबत्ति मार्चरों को। इस आतंक का क्या करें, जो कैंसर की तरह देश के देह में फैलता जा रहा है?

इसका कोई आसान समाधान नहीं है। मामले की जड़ तक जाकर ही कोई कारगर समाधान किया जा सकता है। और आतंक की जड़ें आपको दो-राष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर देश के विभाजन में मिलेंगी। अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए भारत में इस सिद्धांत को जाते-जाते सफलतापूर्वक आजमाया था। द्वितीय विश्व युद्ध में साम्राज्यवादी देशों को भारी क्षति पहुंची थी और वे सामरिक, आर्थिक और सामुदायिक रूप से कमजोर हो गए थे। उनके उद्योग नष्ट हो गए थे, खजाने खाली हो गए थे, और भारी संख्या में उनके नागरिक भी मारे गए थे। उन्हें अपने समाज और अर्थव्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करना था। यह अमरीकी मदद के बिना संभव न था, जो एकमात्र पूंजीवादी देश था जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में अपेक्षाकृत कम क्षति झेली थी। उसके प्रतिद्वंद्वी पूंजीवादी देश सब, जैसे ब्रिटन, फ्रांस, जर्मनी, जापान आदि युद्ध के कारण पस्त हो चुके थे। इन पिटे हुए पूंजीवादी देशों को हमेशा के लिए करारी हार देकर उनके अगुआ के रूप में उभरना अमरीका के लिए अब संभव था। लेकिन विश्व का अधिकांश भाग इन पिटे हुए पूंजीवादी देशों के कब्जे में था। इन उपनिवेशों को मुक्त कराए बगैर अमरीकी उद्योगों के लिए और अमरीकी माल के लिए नए बाजार नहीं मिल सकते थे। इसलिए अमरीका ने इन पूंजीवादी देशों की मदद करने के लिए (जिसे मार्शल प्लान के रूप में जाना जाता है) यह शर्त रखी कि उपनिवेश आजाद कर दिए जाएं। उधर उपनिवेशों में भी आजादी का आंदोलन तेज हो रहा था। मुट्ठी भर गोरे सैनिकों के लिए अब करोड़ों लोगों को दबाए रखना मुश्किल होता जा रहा था। अंग्रेजों को अपनी देशी फौज पर भी भरोसा नहीं रह गया था। यह फौज गोरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर द्वतीय विश्वयुद्ध की रणभूमियों में लड़ चुकी थी, और अब आत्मविश्वास से भरी हुई थीं। युद्ध जिन उद्देश्यों के लिए लड़ा गया था, यानी आजादी, लोकतंत्र और मानव जाति की एकता, उनसे भी वह भली-भांति परिचित हो गई थी, और अच्छी तरह समझती थी कि भारत में अंग्रेजों का रहना इन सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है। आजादी के आंदोलन और उससे जुड़े दमन के कारण भारत पर अपना कब्जा बनाए रखना अंग्रेजों के लिए उत्तरोत्तर महंगा होता जा रहा था। एक दूसरी बात यह थी कि अब भारत में एक देशी पूंजीपति वर्ग भी बन चुका था जो अंग्रेजी पूंजीपतियों से होड़ करने लगा था। यह शक्तिशाली वर्ग भी आजादी के पक्ष में था, ताकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी अंग्रेज पूंजीपतियों को देश से निकाल बाहर करके विशाल भारतीय बाजारों पर स्वयं कब्जा कर सके। इन सब कारणों से भारत में अंग्रेजों की अंतिम घड़ी आ गई थी।

पर जाते-जाते उन्होंने अपनी पुरानी कूटनीतिक चाल, बांटो और राज करो, चली। इसी कूटनीति से वे दो सदी पूर्व देश के राजाओं को एक-एक करके हराकर सारे देश की छाती पर चढ़ बैठे थे, हालांकि 1857 में हिंदुस्तान ने इस कूटनीति को विफल बनाने का भरसक प्रयास किया। अंग्रेजों ने देश को दो विरोधी भागों में बांट दिया ताकि ये दोनों आपस में ही लड़ते रहें और ब्रिटन को किसी भी प्रकार की चुनौती न दे सकें। हमारे नेता अंग्रेजों की इस चाल को समझ न सके, और देश का विभाजन होने दिया। इससे भारत की कोई भी समस्या नहीं सुलझी। न भारत हिंदू राष्ट्र बना, न ही पाकिस्तान स्थिर बन सका। पच्चीस साल में ही उसके दो टुकड़े हो गए। आजकल आतंक का जो ज्वार देखने में आ रहा है, वह इसी ऐतिहासिक गलती से जुड़ा हुआ है। विभाजन अंग्रेज साम्राज्यवादियों की एक कूटनीतिक जीत थी, और हमारे समुदायों की करारी हार।

जब तक इस राष्ट्रीय विफलता को निरस्त करके देश के सभी टुकड़ों को फिर से एक न किया जाए, आतंक रहेगा। दो-राष्ट्र की नीति गलत थी, मुंबई के आतंकी हमले ने इसे सबको एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। जब तक इस गलती को सुधारा नहीं जाएगा, आतंक का सिलसिला जारी रहेगा और कश्मीर जैसे मुद्दे जिंदा रहेंगे।

मोमबत्ती जलाकर नेताओं को इस्तीफे देने की गुहार लगाने से और अमरीकियों और ब्रिटनवासियों को इश्तहार दिखने भर से कुछ बदलने वाला नहीं है। न ही पाकिस्तान से युद्ध छेड़ने से कुछ होगा। इससे तो पाकिस्तान के लोग हमसे और भी ज्यादा दूर जा पड़ेंगे। आवश्यकता है इस बात की कि तीनों देशों के समुदायों को और निकट लाया जाए, ताकि उनके हित एक हो जाएं। यह कोई आसान काम नहीं है। इसे अंजाम देने के लिए काफी सृजनात्मक सोच, निर्लिप्त नेतृत्व, हर कौम की ओर से महान बलिदान और अपार धीरज दरकार होगा।

सैंकड़ों सालों से युद्धरत यूरोप यदि एक हो सकता है, तो अंग्रेजों की कूटनीति से साठ-सत्तर सालों से अलग हुए, पर हजारों साल साथ रहे इस प्राचीन देश के टुकड़े भी अवश्य एक हो सकते हैं। यही आतंक का सही जवाब होगा।

Wednesday, December 17, 2008

कसाब का पकड़ा जाना पहले से तय हो सकता है

मुंबई आतंकी हमले को लेकर अनेक प्रश्न अब उठने लगे हैं। यह बारीकी से सोची गई साजिश लगती है जिसके बहुत ही स्पष्ट उद्देश्य थे। सब कुछ अमरीका में बराक ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने से शुरू होता प्रतीत होता है। ओबामा ने चुनाव प्रचार के दौरान ही स्पष्ट कर दिया था कि वे अफगानिस्तान के मसले को सुलटाने को प्राथमिकता देंगे और यदि जरूरी हुआ तो पाकिस्तान की जमीन पर अमरीकी सैनिकों को उतारेंगे। उनका यह भी संकेत था कि ईराक के युद्ध को समेटकर वहां से अमरीकी सेना वापस बुला ली जाएगी ताकि अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर अमरीका पूरा ध्यान दे सके।

उधर पाकिस्तान में जरदारी की सरकार सत्ता में आई और उसने भारत के साथ संबंधों को सुधारने को प्राथमिकता देना शुरू किया। इसके अलावा यह सरकार पाकिस्तानी सेना और आईएसआई को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश भी करने लगी।
उपर्युक्त दोनों ही घटनाओं से पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और पाकिस्तान में जमा तालिबान पर संकट गहराने लगा और उनके लिए यह आवश्यक हो गया कि वे कुछ ऐसा करें, जिससे उनके ऊपर से दबाव हटे।

मुंबई पर हमला इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया। निशाने पर थीं, पाकिस्तान, अमरीका और उसके समर्थक देशों (जैसे इजराइल, ब्रिटन, आदि) की सरकारें। भारत निशाने पर उतना नहीं था जितनी ये सरकारें। हमले का मुख्य उद्देश्य था भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध कराना, जिससे पाकिस्तानी सेना को तालिबान पर कार्रवाई से बचने का बहाना मिले, क्योंकि वह तब यह कह सकेगी कि भारत की फौज का मुकाबला करना पाकिस्तान के लिए ज्यादा जरूरी है। भारत के साथ युद्ध का बहाना करके पाकिस्तानी सेना और आईएसआई जरदारी सरकार को भी हटा सकेगी और उसके स्थान पर किसी जनरल को राष्ट्रपति बना सकेगी, यह कहते हुए कि युद्ध के समय देश का संचालन सेना के हाथ में रहना चाहिए। इस तरह एक ओर तालिबान को राहत मिल जाती, अपनी शक्ति को संगठित करने के लिए, ताकि निकट भविष्य में होनेवाले अमरीकी हमले का वह बेहतर तरीके से सामना कर सके। दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना जरदारी सरकार से मुक्ति पा जाती और पाकिस्तान में पुनः सैनिक शासन स्थापित कर पाती।

इस रणनीति का एक तीसरा पहलू भी है जो पाकिस्तान के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। जैसे ही पाकिस्तानी सेना भारत के साथ युद्ध में उलझ जाती, तालिबान आगे बढ़कर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को हड़प लेता, और इस तरह अमरीका के लिए भी उस पर युद्ध करना असंभव बना देता। परमाणु बम हाथ में आते ही तालिबान एक तरह से अजेय हो जाएगा और पाकिस्तान और अफगानिस्तान के उसके कब्जे वाले इलाके में वह अपने लिए एक नया राज्य कायम करने में सफल हो जाएगा। इसका सीधा अर्थ होगा, पाकिस्तान का एक बार फिर बंटना।

लेकिन इस रणनीति की सफलता इस पर निर्भर थी कि मुंबई हमले को असंदिग्ध रूप से पाकिस्तान के साथ जोड़ा जा सके। इसे सुनिश्चित करने के लिए हमलावरों ने जानबूझकर ऐसे कई संकेत छोड़े जो पाकिस्तान की ओर इशारा करें, और उनके एक साथी, अजमल अमीर कसाब, को भी जिंदा पकड़वा दिया। मेरे विचार से, यह भी उनकी योजना का एक महत्वपूर्ण भाग था।
कई तथ्य इस ओर इशारा करते हैं। आतंकवादियों ने विदेशियों को, खास करके अमरीकी, इजराइली और ब्रिटन के नागरिकों को, मारने की ओर विशेष ध्यान दिया। नरीमन हाउस में तो केवल इजराइली नागरिक ही बंधक थे, और आतंकियों ने एक बच्चे को छोड़कर, बाकी सभी बंधकों का कत्ल कर दिया। वे चाहते थे कि इस आतंकी हमले को भारत में ही नहीं, बल्कि सारे विश्व में और खास करके अमरीका में, पब्लिसिटी मिले। हमले के लिए उन्होंने जो समय चुना, वह भी इसी ओर संकेत करता है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानता है, उसे पता होगा कि शाम 5 से 7 बजे के बीच वहां सर्वाधिक भीड़ होती है, जब दफ्तरें छूटती हैं और लोग घर लौटने के लिए स्टेशन पर उमड़ पड़ते हैं। तब छत्रपति शिवाजी स्टेशन में तिल रखने की जगह नहीं होती, और यदि आतंकी उस समय हमला करते तो हजारों की संख्या में लोगों को आसानी से मार सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और रात 10 बजे का समय चुना, जब तक काफी भीड़ छंट जाती है। यह उनकी मेहरबानी नहीं थी, बल्कि उनका उद्देश्य ही यह था कि हमला ऐसे वक्त हो जब अमरीका में अधिकाधिक लोग टीवी देख रहे हों, ताकि इसकी खबर उन तक तुरंत पहुंचे। भारत में जब शाम के 5 बजे होते हैं, अमरीका में सुबह के 3 बजे होते हैं और वहां सभी लोग गहरी नींद में सो रहे होते हैं, और कोई भी टीवी नहीं देख रहा होता है। इसके विपरीत जब भारत में रात के 10 बजे हों, अमरीका में सुबह के 8 बजे होते हैं, और अधिकांश लोग ब्रेकफास्ट के साथ टीवी के सामने बैठे होते हैं।

आतंकियों ने विदेशियों को इसलिए भारी संख्या में मारा, और वह भी अमरीका, इजराइल और ब्रिटन के, क्योंकि वे इन देशों को अपना प्रमुख शत्रु मानते थे, और साथ ही उन्हें यह भी पता था कि केवल भारतीयों को मारने से उनके हमले को उतनी अंतर्राष्ट्रीय पब्लिसिटी नहीं मिलेगी जितनी अमरीकी या ब्रिटन के नागरिकों को मारने से।

उनकी योजना को सफल बनाने के लिए यह भी अत्यंत जरूरी था कि इस हमले के सूत्र पाकिस्तान से जुड़ें, अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति पैदा न होती। इसलिए उन्होंने सोची-समझी रणनीति के तहत खूब सुराग छोड़े जिनसे तुरंत और असंदिग्ध रूप से पाकिस्तान के साथ इस हमले के तार जुड़ें। आइए देखते हैं ये सुराग क्या थे।

मुख्य सुराग ये थे - मछुआरों का जहाज कुबेर का, जिसमें ये आतंकी भारत आए थे, भारत के समुद्रों में आवारा स्थिति में मिलना; उसमें जीपीएस से लैस सैटालाइट फोन का मिलना जिससे कराची को तीन-चार फोन किए गए थे; आतंकियों के पास मोबाइल फोन होना; और सबसे महत्वपूर्ण, एक आतंकी का जिंदा पकड़ा जाना, ताकि वह असंदिग्ध रूप से यह बता सके कि आतंकी पाकिस्तान से ही आए हैं। ये सभी बातें अनेक सवाल खड़ी करती हैं।

यह योजना इतनी बारीकी से बनाई गई थी कि यदि इसके कर्ता-धर्ता चाहते, तो बड़ी आसानी से ऊपर बताए गए हर सुराग को सफाई से मिटा सकते थे। आतंकियों को मुंबई के तटों पर उतारने के बाद कुबेर जहाज को पाकिस्तानी समुद्री क्षेत्र में ले जाना क्या इनके लिए मुश्किल था? कुबेर के कप्तान की लाश को जहाज में पड़े रहने देने के बजाए उसे तथा उस जहाज में मिले सेटलाइट फोन को समुद्र में फेंक कर सभी सुरागों को मिटाने में उन्हें कितनी देर लग सकती थी? लेकिन ऐसा नहीं किया गया। वे चाहते थे कि कुबेर जहाज भारतीय अधिकारियों को मिले, और उसमें उसके भारतीय कप्तान की लाश भी, और वह सेटलाइट फोन भी, जिससे पाकिस्तान को कई फोन किए गए थे। अन्यथा हमलावरों का पाकिस्तानी स्वरूप कैसे स्पष्ट होता?
मुझे तो यह भी लगता है कि कसाब का जिंदा पकड़ा जाना भी साजिश का ही एक अंग है, क्योंकि पाकिस्तान में बैठे असली षडयंत्रकारियों की जानकारी देने के लिए कम से कम एक आतंकी का जिंदा पकड़ा जाना आवश्यक था। वरना, भारतीय अधिकारियों के लिए इस हमले का संबंध पाकिस्तान से जोड़ना मुश्किल होता, या उन्हें इसमें काफी समय लग जाता, जिससे हमले का मूल उद्देश्य पूरा न हो पाता। हमलावर चाहते थे कि तुरंत ही यह स्पष्ट हो जाए कि हमला पाकिस्तान की ओर से हुआ है, और भारत जल्दबाजी में और तुरंत ही पाकिस्तान पर युद्ध छेड़ दे। और यह युद्ध जनवरी से पहले हो, जब बराक ओबामा अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यभार संभालेंगे और अनुमानतः अगले ही कुछ महीनों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सैनिक कार्रवाई तेज करेंगे। लेकिन यदि इससे पहले भारत और पाक में युद्ध छिड़ जाए, तो ओबामा की सारी योजनाएं ठप हो जाएंगी। पाकिस्तान में छिपे तालिबान की यह भी योजना रही हो सकती है कि भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना को उल्झाकर वह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर कब्जा कर ले, क्योंकि यदि वह ऐसा कर सके, अमरीका तक को वह अंगूठा दिख सकगा, क्योंकि तब अमरीका उस पर हमला करने का जोखिम नहीं उठा सकेगा। यदि ऐसा हुआ, तो पाकिस्तान का दुबारा बंटना भी निश्चित हो जाता और उसके पश्चिमी भागों में तालिबान का स्थायी राज्य कायम हो जाता।

कसाब जिन हालातों में पकड़ा गया, वे भी इस बात को पुष्ट ही करती हैं कि उसका जिंदा पकड़ा जाना पहले से तय था। कसाब एक स्कोड़ा कार में से पकड़ा गया था। उस कार में उसका एक साथी आतंकी भी था, जो गाड़ी चला रहा था। इन दोनों के पास भी उतने ही घातक हथियार थे, जितने ताज और ओबरोय में घुसे आतंकियों के पास थे और जिनकी मदद से वे 60 घंटे तक समस्त भारतीय सेना को रोके रख सके थे। तो क्या ये दोनों भी इन्हें पकड़ने आए सात-आठ लाठी-धारी पुलिस कर्मियों को मिनटों में भूनकर बच न निकल सकते थे? बिलकुल निकल सकते थे, पर लगता है यों निकलना उनकी रणनीति में था नहीं। कसाब कार की पिछली सीट में लेटे हुए लगभग निर्विरोध पकड़ा गया। इन आतंकियों को मिले उच्च स्तरीय सैनिक प्रशिक्षण को देखते हुए, यदि कसाब चाहता तो आसानी से बच निकल सकता था।

मुझे लगता है कि असली योजना में ही यह बात थी कि छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन में हमला करनेवाले दोनों आतंकी जिंदा पकड़े जाएं, ताकि वे भारतीय अधिकारियों को बता सकें कि हमला पाकिस्तान की ओर से हुआ है। अंततः केवल एक जिंदा पकड़ा गया, दूसरा मारा गया, पर इससे असली योजना को कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

एक छोटी सी अन्य घटना भी इस सिद्धांत को पुष्ट करती है कि मुंबई हमले का असली मकसद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध कराना था। जब मुंबई हमलों के कई दिनों के बाद भी भारत ने पाकिस्तान पर युद्ध छेड़ने के कोई संकेत नहीं दिए, तो षडयंत्रकारियों ने अपनी अंतिम चाल चली। यह था पाकिस्तानी राष्ट्रपति जरदारी को भारतीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की ओर से जाली फोन करवाना और कथित रूप से जरदारी को धमकाना। षडयंत्रकारी हताश हो रहे थे कि उनकी सोची-समझी साजिश अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर रही है, यानी भारत और पाक में युद्ध नहीं हो रहा है, तब उन्होंने यह हथकंडा अपनाया। उनकी सोच यही रही होगी कि भारत पाक पर हमला न करे, तो न सही, हम पाक से भारत पर हमला तो करा ही पाएंगे।
लेकिन यहां भी उनका वार खाली गया और भारत ने जाली फोन के संबंध में किसी भी प्रकार की असंदिग्धता नहीं रहने देकर पाक के लिए युद्ध के सारे रास्ते बंद कर दिए। यह अच्छा ही हुआ, वरना दोनों देशों को एक सर्वनाशी युद्ध का सामना करना पड़ता जिससे दोनों ही देशों के दुश्मनों को ही फायदा पहुंचता।

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