बताया जाता है कि मुंबई में मात्र 43% लोगों ने वोट डाले। यह वही मुंबई है जहां नवंबर में आतंकी हमले हुए थे। लोगों को उम्मीद थी कि मुंबईवाले इस बार भारी मतदान करके राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय देंगे। पर नहीं, मुंबई निवासी पहले जैसे ही पैसे बनाने के अपने-अपने धंधों में लगे रहे।
उधर राजकोट जिले में एक गांव है राज समधियाला। यहां पार्टी उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करने से मना कर दिया गया था।
लेकिन जब चुनाव का दिन आया तो पूरा गांव वोट देने उपस्थित हुआ। यहां के मतदान केंद्र में 81% मतदान हुआ।
यह गांव भारत के सबसे साफ-सुथरे गांवों में से एक माना जाता है। यहां के खंड विकास समिति ने फतवा जारी किया था कि जो भी वोट नहीं डालेगा, उसे 51 रुपए का दंड लगेगा।
इस गांव के सरपंच हैं जयवीरसिंह जाडेजा।
गांव में वोटरों की संख्या 1019 है, जिनमें से 850 ने वोट डाले।
समिति ने 50 लोगों को वैध कारणों से वोटिंग से दूर रहने की अनुमति दी थी। अब वह खोजबीन कर रही है कि वे 119 लोग कौन थे, जिन्होंने वोट नहीं दिए।
इस गांव के 150 वोटर अन्यत्र जाकर बस गए थे, पर वोटिंग के दिन इनमें से 80 व्यक्ति सिर्फ वोट डालने के उद्देश्य से गांव लौट आए।
गुजरात से ही एक अन्य रोचक खबर भी सुना दूं -
यहां के एक नाई ने घोषणा की कि जिन्होंने वोट डाले हों, उन्हें वह फ्री में शेव देगा। और उसने लगभग 80 लोगों को फ्री शेव दिया भी।
तो इस तरह के उदाहरण भी हमारे देश में मिलते हैं, जिनके कारण आशाएं बनी रहती हैं।
Friday, May 01, 2009
एक ओर है मुंबई, दूसरी ओर राज समधियाला गांव
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
लेबल: चुनाव
Wednesday, April 08, 2009
क्या आरक्षण हटाना चुनावी मुद्दा बन सकता है?
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की नीति को समाज में विषमता दूर करने के एक अस्थायी औजार के रूप में ही देखा था। पर राजनीतिक कारणों से वह देश की एक स्थायी नीति बन गई है, और कोई भी उसके नुकसानों की चर्चा नहीं कर रहा है।
आरक्षण की नीति सबको समान अधिकार देने के संवैधानिक प्रावधान का खुला उल्लंघन है। इससे देश में गहरी दरारें बनती जा रही हैं, और यह राष्ट्र हित में नहीं है।
आरक्षण की नीति को वापस खींचने की आवश्यकता है। लेकिन साठ सालों से उसे लागू करने से अनेक लोगों का निहित स्वार्थ उससे जुड़ गया है। क्या वे राष्ट्र हित में इन निहित स्वार्थों से ऊपर उठ पाएंगे?
सबसे अच्छा यही होगा कि आरक्षण को दूर करने की मांग स्वयं उन लोगों से आए जिन्हें आरक्षण से अभी लाभ मिल रहा है।
उन्हें इस ओर प्रेरित करने के लिए मैं एक सुझाव देना चाहूंगा जिसके तीन अंग हैं। वे इस प्रकार हैं।
1. शिक्षण से अंग्रेजी हटाई जाए
आरक्षण को समाप्त करना चाहिए, लेकिन उसके साथ शिक्षण के समान अधिकार की भी व्यवस्था होनी चाहिए। आज एक ओर अंग्रेजी आधारित श्रेष्ठ शिक्षण तंत्र है जहां देश के अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं, और दूसरी ओर हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल हैं जहां नाममात्र का ही शिक्षण मुहैया किया जाता है। और इन दोनों के ही बाहर वह विशाल समुदाय है जिसने स्कूल में कभी कदम ही नहीं रखा है।
ऐसी विषम परिस्थिति में आरक्षण को हटाना राजनीतिक दृष्टि से संभव न होगा।
इसे हटाने का एक कारगर उपाय होगा सबको समान कष्ट वाले सिद्धांत पर आधारित पहल, जिसमें अमीर वर्गों को भी कष्ट उठाना पड़े और गरीब वर्गों को भी।
मेरा सुझाव है कि आरक्षण की व्यवस्था को हटाने के साथ-साथ अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण देने की व्यवस्था को भी प्राथमिक शिक्षण से लेकर उच्च शिक्षण तक सभी जगह से हटाया जाए, जिसका अर्थ होगा हमारे नर्सरी-किंटरगार्टन से लेकर आईआईटी, आईआईएम, आदि अभिजातीय शिक्षण संस्थानों का शिक्षण माध्यम हिंदी कर देना। इससे मात्र अंग्रेजी के ज्ञान के कारण समृद्ध वर्गों को जो अतिरिक्त लाभ मिलता है, वह जाता रहेगा और ये संस्थाएं अधिक लोकतांत्रिक हो जाएंगी।
2. उच्च शिक्षण संस्थाओं के लिए भर्ती बोर्ड परीक्षा के नंबरों के आधार पर हो
शिक्षण सुधार के लिए दूसरा सुझाव मैं यह देना चाहूंगा कि आईआईटी, आईआईएम, और अन्य पेशेवरीय शिक्षण संस्थाओं में नए छात्रों की भर्ती के लिए जो अलग से स्पर्धात्मक परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, जैसे एआईईईई (इंजीनियरी कालेजों के लिए), जेईई (आईआईटियों के लिए), कैट (आईआईएमों के लिए), इत्यादि को गैरकानूनी घोषित करके, इन सब संस्थाओं के लिए छात्रों की भर्ती मात्र बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे के आधार पर किया जाए। हां यदि आवश्यक हो तो छात्रों का निजी साक्षात्कार लिया जा सकता है। इससे स्कूल शिक्षण की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण इजाफा होगा और छात्रों का जीवन भी तनावमुक्त हो जाएगा। पर इसका अधिक साधु प्रभाव निर्धन बच्चों पर पड़ेगा, जो अब आईआईटी आदि में पढ़ पाने का ख्वाव देख सकेंगे।
इस एक कदम से हमारे देश में शिक्षण अधिक समतापूर्ण और वैज्ञानिक हो जाएगा। आज गांव का बच्चा चाहे वह रामानुजम या आईनस्टाइन जितना मेधावी क्यों न हो, हमारे आईआईटी, आईआईएम में घुसने का सपना तक नहीं देख सकता है। वह इसलिए क्योंकि आईआईटी आदि की स्पर्धात्मक परीक्षाएं न केवल अंग्रेजी में हैं, बल्कि वे अस्वाभाविक रूप से इतनी कठिन रखी गई हैं कि सालों तक उनके लिए तैयारी करने के बाद ही इन परीक्षाओं में कोई पास हो सकता है। राजस्थान के कोटा आदि शहरों में इन परीक्षाओं के लिए कोचिंग सातवें दर्जे से ही शुरू हो जाते हैं, और लगातार पांच वर्षों तक चलते हैं, यानी आईआईटी के बीटेक कोर्स से भी एक साल ज्यादा, जो चार साल के होते हैं। इन कोचिंग क्लासों की फीस कई लाख रुपए है, जो स्वयं आईआईटी द्वारा ली जाने वाली फीस से भी ज्यादा है। और इन कोचिंग क्लासों में पढ़ा रहे "प्रोफेसरों" की तंख्वाह आईआईटी के प्रोफेसरों से भी ज्यादा है। सोचिए, किस हद तक हमारे देश में आईआईटी आदि मजाक बनकर रह गए हैं।
इसे तुरंत रोकना होगा। आईआईटी, आईआईएम के लोकतांत्रीकरण की आवश्यकता है। सबसे पहला काम इनका शिक्षण माध्यम हिंदी करना होगा, और इनके लिए नए छात्रों की भर्ती बारहवीं की परीक्षा के नंबरों के आधार पर करना होगा।
3. अगले पांच सालों में सर्वशिक्षा लाई जाए
तीसरा आवश्यक कदम यह है कि सरकार जल्द से जल्द एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत सर्वशिक्षा लाने का प्रयास करे। मेरे अनुसार इसके लिए पांच साल का समय काफी होगा, पर सरकार को युद्ध स्तर पर काम करना होगा। यहां तक कि अन्य सभी कार्यक्रमों से पैसा खींचकर इस एक बड़े काम में झोंकना होगा। मैं अगले पांच सालों तक सभी हवाई अड्डों, सड़कों, बांधों, बंदरों, नहरों आदि के निर्माण पर, हथियारों की खरीद पर, और राष्ट्रमंडल खेल जैसी फिजूल खर्चियों पर पूर्ण रोक लगाने के पक्ष में हूं। इससे बचे पैसे से गांव-गांव में अच्छे स्कूल, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, शौचालय आदि स्थापित करके बच्चों में शतप्रतिशत स्कूल भर्ती प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। संभव है इसके लिए राष्ट्रीय आय के 50-75 प्रतिशत को अगले पांच सालों तक हर वर्ष खर्च करना पड़े। पर इसके लिए राष्ट्र के हर तबके को संकल्प करना पड़ेगा।
सर्वशिक्षा के साथ भूख निवारण कार्यक्रम को भी जोड़ा जाए, तो इस देश से व्यापक कुपोषण दूर हो सकता है। स्कूलों में ही बच्चों को पौष्टिक आहार की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इससे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही बच्चों के स्कूल छोड़ने की समस्या भी दूर हो जाएगी। साथ ही बाल मजूरी जैसे राष्ट्रीय कलंक भी धुल जाएंगे।
क्या देश के उद्योगपति, अभिजात वर्ग आदि राष्ट्र हित में यह बलिदान करने को तैयार हैं? यदि हां, तो वे आरक्षण नीति को हटाने में कामयाब हो सकेंगे।
यदि उपर्युक्त तीन सुझावों को लागू करते हुए आरक्षण नीति को हटाने का प्रस्ताव रखा जाए, तो यह राजनीतिक दृष्टि से लोगों को अधिक ग्राह्य हो सकता है।
क्या आप इससे सहमत हैं?
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
Sunday, March 29, 2009
लोकतंत्र का पांचवां खंभा
चुनाव सिर पर है, और हमें सलाह दी जा रही है कि वोट डालना चाहिए, यह हर मतदाता का कर्तव्य है। वोट डालने से अच्छे उम्मीदवार लोक सभा पहुंचेगे, और अच्छे लोग लोक सभा पहुंचें तो हमारी हालत सुधरेगी, और हमारा देश उन्नति करेगा।
पर क्या बात इतनी सरल है?
केवल वोट डालने से कुछ नहीं बदलेगा। सोच-समझकर वोट डालना होगा। मतदाताओं की भी अपनी संस्थाएं होनी चाहिए, जो पार्टी घोषणा-पत्रों, उम्मीदवारों की छवि और निष्पादन, पार्टियों की नीतियां आदि की छानबीन करे और रिपोर्ट जारी करे, जिन्हें पढ़कर मतदाता सही चयन कर सकें। अभी चयन के लिए मदाताओं के पास पार्टी भाषणबाज, अखबार, टीवी, वेबसाइट आदि ही उपलब्ध हैं, जहां सब मामले का एक पक्ष (पार्टी पक्ष) ही उजागर होता है। इस तरह के मतदाता सेल देशभर में हर मुहल्ले और गांव में होने चाहिए।
यदि मुझे इच्छा हो कि चलो पता लगाएं कि कौन उम्मीदवार कितने पानी में है, तो मेरे घर के दो-चार कदम पर मतदाता सेल होना चाहिए जहां जाकर मैं मेरे चुनाव क्षेत्र से खड़े हो रहे उम्मीदवारों, उनकी पार्टियों और उनके घोषणापत्रों की छानबीन कर सकूं। यहां ऐसे जानकार लोग भी होंगे, जो मुझे निष्पक्ष सलाह दे सकेंगे कि उम्मीदवार कैसे हैं, उनकी पृष्ठभूमि क्या है, कितने पढ़े-लिखे हैं, क्या पढ़ा है उन्होंने, राजनीति में कितना अनुभव है, पिछले पांच साल में कितनी पार्टियां बदल चुके हैं, कितनी बार चुनाव हार चुके हैं, क्या उनके साथ कोई आपराधिक मामला जुड़ा है, इत्यादि, इत्यादि।
इन सेलों का स्वरूप बरसाती मेंढ़कों का सा न होकर, जो केवल चुनावों के समय प्रकट होते हों, स्थायी होना चाहिए और इन्हें साल भर काम करते रहना चाहिए, और पार्टियों और उम्मीदवारों के बारे में जानकारी निरंतर इकट्ठा करते जाना चाहिए और उन्हें लोगों तक पहुंचाते जाना चाहिए। मूल संविधान में प्रेस को यह काम दिया गया था, लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में, पर प्रेस को (जिसमें टीवी जैसे अन्य माध्यम भी शामिल हैं) अब व्यवसाय ने मोल ले लिया है। इसलिए लोकतंत्र के पांचवे खंभे के रूप में मतदाता सेल बनाए जाने की सख्त जरूरत है।
आजकल इंटरनेट का जमाना है, इसलिए इन मतदाता सेलों का कोई केंद्रीय मुख्यालय भी होना चाहिए, जिसके वेबसाइट के माध्यम से भी यह सब जानकारी उपलब्ध रहनी चाहिए, हिंदी में।
इन सेलों को उम्मीदवारों और मतदाताओं का इंटरएक्शन की भी व्यवस्था करानी चाहिए, जिसमें उम्मीदवारों से मतदाता (यानि की मैं और आप) उनके विचारों, पार्टी की नीतियों, कार्यक्रमों, वादों आदि के बारे में सवाल पूछ सकें।
ऐसे मतदाता सेल कौन स्थापित करेगा, उसके कर्माचरी कौन होंगे, उसे चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा, ये सब विचारणीय मुद्दे हैं। मेरा सुझाव है कि इसे निर्वाचन आयोग की छत्र-छाया में लाया जा सकता है, और निर्वाचन आयोग इसके लिए पैसे जुटा सकता है। मतदाताओं से चंदे भी लिए जा सकते हैं। उद्योगों से चंदा स्वीकार नहीं करना चाहिए, वरना, इसका भी वही हस्र होगा जो प्रेस और टीवी का हुआ। इसे करदाताओं के पैसे से ही चलाया जाना चाहिए।
संविधान में संशोधन करके इन मतदाता सेलों को कानूनी हैसियत प्रदान करने पर भी विचार किया जा सकता है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
लेबल: चुनाव
लालू, मुलायम पासवन का एक होना हिंदी के लिए हितकारी
हिंदी प्रदेश के दो प्रमुख और विशाल राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश के नेता मुलायम, लालू और पासवान का इस चुनाव के लिए एक जुट होना हिंदी के लिए हितकारी हो सकता है।
दोनों कांग्रेस और भाजपा अंग्रेजी परस्त पार्टियां हैं। आजादी के बाद के 60 सालों में इन्हीं पार्टियों का राज रहा है और इन्होंने अंग्रेजी संस्कृति को फैलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। संपूर्ण उच्च शिक्षा जगत, प्रशासन, व्यवसाय और न्यायतंत्र में अंग्रेजी हावी है। अब तो वहां से उसे डिगाने की बात होनी भी बंद हो गई है। इसका मुख्य कारण यह है, अपने 60 साल के राज में इन पार्टियों ने और उनको पैसा देनेवाली ताकतों ने अपने लोगों का ऐसा जाल इन सभी तंत्रों में ऐसा बिछा दिया है कि वहां कोई परिवर्तन की गुंजाईश ही नहीं है। इन दोनों पार्टियों के सत्ता से हटने पर ही नए शक्ति समीकरण स्थापित किए जा सकेंगे, और इन तंत्रों पर से अंग्रेजी का वर्चस्व हटाया जा सकेगा।
अंग्रेजी को हटाना इन तीनों ही नेताओं की पार्टियों और उनके समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि पिछड़े वर्ग के लोगों का देश के उच्च शिक्षा संस्थानों, व्यवसायों, सरकारी नौकरियों और न्यायतंत्र में प्रवेश नहीं हो पा रहा है तो इसका मुख्य कारण है इन सबमें प्रेवेश अंग्रेजी की छलनी से निश्चित किया जाना। निम्न वर्गीय और निर्धन लोगों में, जो सरकारी विद्यालयों में पढ़े होते हैं, अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होता है और वे इस छलनी को पार नहीं कर पाते हैं।
इसलिए यदि सत्ता पर ये नेता काबिज हो पाते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अंग्रेजी की छलनी को दूर करने का प्रयास करना होगा। इससे शिक्षा संस्थाएं, सरकारी नौकरियां और निजी क्षेत्र की नौकरियां आम आदमी के लिए खुल जाएंगी।
जब लालू-मुलायम-पासवान का नया सत्ता-पुंज सत्ता पर आएगा, तो उसे सत्ता में पहुंचानेवाले लोगों को पुरस्कृत करने की जरूरत पड़ेगी। वह अपने लोगों को सत्ता के महत्वपूर्ण जगहों पर रखवाने की कोशिश करेगा। सभी दल यह प्रयास करते हैं। जब भाजपा सत्ता पर आई थी, तो उसने सब महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को रखवाया था, पाठ्यक्रम, इतिहास लेखन आदि तक को अपनी दृष्टि के अनुसार करने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने भी यही किया, पर उसकी ओर हमारा कम ध्यान जाता है, क्योंकि वह शुरू से ही सत्ता में रही है। लेकिन जब वर्तमान लोक सभा पर कांग्रेस का कब्जा हुआ, तो सबसे पहला काम जो उसने अर्जुन सिंह के जरिए किया, वह यह था कि भाजपा के लोगों को सभी शिक्षा संस्थाओं से हटाकर अपने लोगों को वहां सब बैठाना और भाजपा ने पाठ्य पुस्तक आदि में जो परिवर्तन कराए थे, उन सबको खारिज करना और पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से अपनी सोच के अनुसार लिखवाना। जब लालू-मुलायम-पासवान अपने लोगों को शिक्षा संस्थाओं, न्यायतंत्र, नौकरशाही, व्यावसाय (संरकारी उद्यम) आदि में रखने लगेगा, तो वहां सब एक हद तक हिंदी का बीजारोपण हो सकेगा, क्योंकि ये लोग अंग्रेजी के बजाए, हिंदी को अधिक समझते होंगे और चाहेंगे कि जिन संस्थाओं का नियंत्रण उनके हाथ में आ गया है, वह ऐसी भाषा में काम करे, जिसमें उन्हें सहूलियत हो। भाषा की यह खासियत होती है कि सत्तारूढ़ पक्ष की भाषा ही हमेशा प्रचलन में आती है। अंग्रेजी भी ऐसे ही हमारे ऊपर हावी हुई थी। वह शासक वर्ग की भाषा थी और सत्ताहीन लोग (यानी भारतीय) उसे अपनाने को बाध्य हुए। इसी तरह जब हिंदी सत्ता की भाषा बनेगी, लोग (यानी अंग्रेजीदां लोग) उसे अपनाने को मजबूर हो जाएंगे।
मान लीजिए कि मुलायम चुनाव के बाद विदेश मंत्री बन जाते हैं और अमरीकी यात्रा पर निकलते हैं। अब मुलायम जी वाशिंगटन में जो भी बातें करेंगे, वह हिंदी में ही करेंगे। इसी प्रकार जब मुलायम जी अमरीका के नेताओं से वार्तालाप करेंगे तो उन्हें हिंदी दुभाषिए की जरूरत पड़ेगी। इस तरह हमारे विदेश मंत्रालय में हिंदी की जानकारी रखनेवालों की मांग बढ़ेगी, और वहां से अंग्रेजी का एकाधिकार टूट जाएगा।
यह तो बिना प्रयास होगा। अब यदि ये पार्टियां राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदृष्टि का परिचय भी दें, तो ये सारे देश में राष्ट्र भाषा हिंदी के सवाल पर जनमत तैयार करके अंग्रेजी को हटाने का उपक्रम भी कर सकती हैं।
आज यदि आरक्षण की नीति से निम्न वर्गों को कोई खास फायदा नहीं पहुंच रहा है, तो इसका करण यह है कि नौकरियां तो उनके लिए आरक्षित कर दी गई हैं, लेकिन नौकरी के लिए लोगों को चुनने की कसौटियां वही अंग्रेजी-परस्त हैं। चूंकि अंग्रेजी देश के थोड़े लोग ही जानते हैं, नौकरियां इन थोड़े लोगों में ही आरक्षित होकर रह गई हैं। कहना न होगा कि इन थोड़े लोगों में निम्न वर्ग के लोग नहीं के बराबर हैं।
यदि सभी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं (जैसे आईआईएम, आईआईटी, आदि) में प्रेवश की कसौटियां और वहां का कामकाजी और शिक्षण माध्यम हिंदी हो जाए, तो इससे निम्न वर्गों का बहुत फायदा होगा।
अंग्रेजी सीखना एक खर्चीला और दुस्साध्य मामला है जो निम्न वर्गों के बूते की बात नहीं है। इसलिए आईआईएम, आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थाओं के द्वार निम्न वर्गों के लिए उसी तरह बंद हैं जिस तरह आजादी से पहले दक्षिण भारत के कुछ बड़े-बड़े मंदिरों के द्वार उनके लिए बंद थे।
मंदिरों में प्रवेश न मिलने से निम्न वर्गों का कोई खास आर्थिक नुकसान नहीं होता है, लेकिन उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश न मिलने से उनका काफी आर्थिक नुकसान होता है।
यदि कोई निम्न वर्गीय छात्र बहुत कुशाग्र बुद्धि का निकले और इन उच्च शिक्षाओं में प्रवेश पा ही जाए, तो वहां शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी होने से उसे अपार कठिनाई का सामना करना पड़ता है। आईआईटियों में ऐसे एक दो किस्से हुए भी हैं जहां आरक्षित सीटों पर आए छात्रों ने खुदखुशी तक कर डाली थी क्योंकि वे अंग्रेजी में शिक्षण के कारण वहां की पढ़ाई में पीछे पड़ते जा रहे थे। कहा यही गया कि ये बच्चे आईआईटी के स्तर के नहीं थे, चूंकि ये आरक्षित सीटों पर आए थे, पर असल बात यह है कि अंग्रेजी के कारण ही उन्हें इन संस्थाओं की पढ़ाई के समकक्ष रहने में कठिनाई हुई थी, न कि इसलिए कि उनकी बुद्धी का स्तर कम था।
लालू-मुलायम-पासवान के सत्ता में आने पर निम्न वर्गों की एक अन्य मांग पर भी शायद कार्रवाई हो सकेगी। यह है निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण नीति लागू करना। इससे निम्न वर्गों के लिए बहुत सारी नौकरियां उपलब्ध हो सकेंगी। यदि लालू आदि स्पष्ट बहुमत से चुनाव जीतकर आ सके, तो इसे लागू करना उनके लिए संभव होगा। पर केवल नियम बना देने भर से कुछ न होगा। निजी व्यवसाय अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर ही नौकरियां देते हैं। यदि इसे न बदला गया, तो निम्न वर्गीय उम्मीदवारों को कोई फायदा नहीं पहुंच पाएगा।
आज भी सरकारी महकमों में जहां आरक्षण नीति लागू है, कई आरक्षित सीटें यह कहकर नहीं भरी जातीं कि अनुसूचित जातियों, पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जनजातियों में से योग्य व्यक्ति मिलते नहीं हैं। योग्य की यहां परिभाषा “जिन्हें अंग्रेजी आती हो” होती है। यदि सरकारी तंत्रों में प्रेवश के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता को हटाया जा सके, तो ढेरों योग्य उम्मीदार पैदा हो जाएंगे।
यह भी देखा गया है कि निजी क्षेत्र हमारे देश के लाखों, करोड़ों ग्रेजुएटों और पोस्ट-ग्रेजुएटों को नौकरी देने से इसलिए इन्कार करता है क्योंकि उसकी दृष्टि में ये अनऐंप्लोएबल होते हैं, यानी ये नौकरी देने लायक नहीं होते। यहां भी ऐंप्लोएबल की परिभाषा यही होती है कि ये गिटपिट अंग्रेजी बोल सकें। यदि ऐंप्लोएबिलिटी की कसौटियों में से अंग्रेजी ज्ञान को हटाया जाए, इन करोड़ों ग्रेजुएटों आदि में वे सब काबिलियतें और कुशलताएं विद्यमान हैं जो सरकारी दफ्तरों और निजी क्षेत्रों के किसी भी ओहदे पर सफलतापूर्वक नौकरी बजाने के लिए आवश्यक हैं।
असल बात यह है कि देश अब बिना दिशा के आगे बढ़ रहा है। एक ही वर्ग के लोगों के इतने सालों से सत्ता पर बने रहने से देश को उनके हितों और निहित स्वार्थों के लिए चलाया जा रहा है। इन निहित स्वार्थों में से प्रमुख है, उच्च शिक्षा, निजी व्यवसाय, न्यायतंत्र, प्रशासन आदि में अंग्रेजी को बनाए रखना। इस वस्तुस्थिति को बदलने के लिए नए सत्ता वर्गों को दिल्ली में बागडोर संभालनी होगी।
इस चुनाव में इसकी संभावना नजर आ रही है, और यदि हम सब निश्चय कर लें, कि हमें देश में बदलाव लाना है और देश के फंडमेंटेल्स (बुनियादी तत्वों) को नए सिरे से निश्चित करना है, तो इस संभावना को वास्तविकता में भी बदल सकते हैं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 7 टिप्पणियाँ
Saturday, March 28, 2009
राष्ट्रीय पशु गीदड़
संसद भवन। मई 2009। चुनाव के बाद नए सांसद संसद में एकत्र हैं। प्रधान मंत्री मायावती सांसदों को संबोधित कर रही हैं। विपक्षी दलों के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी अग्रिम पंक्ति की कुर्सियों में से एक में विराजमान हैं। संसद भवन खचाखच भरा हुआ है। सांसदों की आपसी बातचीत के शोर के कारण किसी की भी बात सुनाई नहीं दे रही है।
अध्यक्ष महोदय माइक्रोफोन पर चिल्लाकर सबको चुप हो जाने को कह रहे हैं। धीरे-धीरे शोर कम हो जाता है। तब मायावती कहने लगती हैं, "इस समय हम एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने के लिए यहां एकत्र हैं। इस मुद्दे के निराकरण के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता है। इसलिए मैं बहुजन समाज पार्टी, उसको समर्थन देनेवाली पार्टियों तथा विरोधी दलों के सांसदों से अपील करती हूं कि वे सब इस मुद्दे के निराकरण में सहयोग दें। वैसे यह कोई राजनीतिक मामला नहीं है, इसलिए संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। मैं चाहती हूं कि इस मुद्दे को जल्दी से जल्दी सुलटाकर संसद अन्य अधिक महत्वपूर्ण कार्रवाइयों की ओर आगे बढ़े, और इस सीधे से मुद्दे पर अनावश्यक बहस करके अधिक समय न बिगाड़े।"
इस छोटी सी भूमिका के बाद प्रधान मंत्री ने उप प्रधान मंत्री रामविलास पासवान को संक्षेप में संसद सदस्यों के सामने विचाराधीन मुद्दे को पेश करने को कहा।
रामविलास पासवान ने बोलना आरंभ किया, "धन्यवाद, प्रधान मंत्री जी। प्रिय सांसदो, आप सबने अखबारों व अन्य संचार माध्यमों से जान लिया होगा कि हमारे देश का राष्ट्रीय पशु बाघ इस वर्ष के आरंभ में विलुप्त हो गया। आखिरी शेर कारबट राष्ट्रीय उद्यान में चोर शिकारियों के हाथों मारा गया। यह एक दुखद घटना है और हमारे जंगलों की शान इस शानदार पशु के विलुप्त होने से हजार गुना कम हो गई है। लेकिन उससे भी ज्यादा पेचीदा मामला यह है कि बाघ के विलुप्त होने से एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया है।
"जैसा कि आप जानते हैं, बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। लेकिन उसके विलुप्त हो जाने से स्थिति एकदम बदल गई है। हमें अब हमारे देश के लिए नया राष्ट्रीय पशु चुनना होगा। इसी महत्वपूर्ण काम को अंजाम देने के लिए हम यहां एकत्र हुए हैं।
"मैं जानता हूं कि राष्ट्रीय पशु का चुनाव एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, परंतु जहां तक मैं समझता हूं, और जैसा कि हमारी माननीय प्रधान मंत्री ने अभी कहा, वह राजनीति से हट कर है। इसलिए इसे राजनीति से अलग रखते हुए सब सांसद इस संवैधानिक संकट को सुलटाने में बहुजन समाज पार्टी की सरकार की मदद करें। विपक्षी दलों के नेता श्री आडवाणी जी से मैं निवेदन करता हूं कि इस मुद्दे की बहस को अब वे आगे बढ़ाएं और यह बताएं कि उनकी पार्टी, यानी भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय पशु के रूप में किस प्राणी का समर्थन करती है।"
लालकृष्ण आडवाणी अपनी खास शैली में मुसकराते हुए बोलने लगे, "माननीय उप प्रधान मंत्री श्री रामविलासन पासन के प्रति मैं आभारी हूं। बाघ का विलुप्त होना हम सबके लिए एक दुखद घटना है। उसके विलुप्त होने से जो संवैधानिक समस्या पैदा हो गई है उसे सुलटाने में हमारी पार्टी सरकार को पूरा समर्थन देगी। जैसा कि आप सब जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी इस देश की संस्कृति, इतिहास, भाषा, रीति-रिवाज आदि की उन्नति के लिए कृतसंकल्प है। अतः हम चाहते हैं कि देश का राष्ट्रीय पशु कोई ऐसा प्राणी हो जो देश की संस्कृति का पूरा प्रतिनिधित्व करे।
"हमारी पार्टी ने इस विषय पर काफी विचार किया है और हमारी राय है कि राष्ट्रीय पशु पूजनीय गौ माता को बनाया जाए। आप सब जानते होंगे कि संविधान में गौ माता की रक्षा शासन का एक मुख्य कर्तव्य बताया गया है। हमारे पूजनीय बापूजी भी गाय के प्रति बड़ी ममता रखते थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गाय की खूब महिमा गाई गई है। वृषभ भोलेनाथ का वाहन है और कृष्ण तो गायों के पालक के रूप में ही सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
"गाय हमारे किसानों का अभिन्न साथी है। गाय पर ही हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। हमारे देश के करोड़ों बच्चों को गाय ही अपने दूध से पोसती है। इसलिए गाय एक तरह से इस देश की माता है। उसे ही हमारी पार्टी राष्ट्रीय पशु के रूप में स्वीकार करती है और आप सबसे मेरी विनम्र विनती है कि इसी निरीह एवं उपयोगी प्राणी को देश के प्रतीक के रूप में गौरवान्वित करके उसके द्वारा हम पर किए गए असंख्य एहसानों को चुकाया जाए।"
आडवाणी जी की बात सुनकर भारतीय जनता पार्टी के सभी सदस्य नारा लगाने लगते हैं, "गो माता की जय हो।"
गृह मंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अंसारी अपनी ओजस्वी वाणी में श्री आडवाणी के विरुद्ध बहस में उतर पड़ते हैं, "विपक्षी नेता आडवाणी जी ने जो बातें कही हैं उनसे हम बिलकुल सहमत नहीं हो सकते। राष्ट्रीय पशु का मामला कोई धार्मिक विषय नहीं है, फिर भी हमें खेद है कि श्री आडवाणी जी ने अपनी पार्टी की आदत के मुताबिक इस सीधे और सरल विषय को भी एक धार्मिक मोड़ देना चाहा है।
"गाय हमारे देश के सभी नागरिकों को कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकती। आपको भूलना नहीं चाहिए कि संविधान के अनुसार यह देश धर्मनिरपेक्ष है और यहां हिंदुओं के अलावा मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों, जैनों व अनेक अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं। उन सबकी संख्या इस देश की कुल आबादी की एक-तिहाई से कम नहीं है। गाय हिंदुओं को भले ही रुचे लेकिन हमारे मुसलमान भाइयों को उसके प्रति कोई विशेष लगाव नहीं है। उनके लिए वह ऊंट, बकरी, भैंस, घोड़ा आदि के समान एक साधारण जानवर ही है। इतने साधारण जानवर को राष्ट्र का प्रतीक बनाना उनको रास नहीं आएगा।
"इसके अलावा भी गाय जैसी साधारण पशु को राष्ट्र का प्रतीक बनाना बिलकुल बेतुकी बात है। राष्ट्र के प्रतीक में लोगों में राष्ट्र के प्रति आस्था जगाने की क्षमता होनी चाहिए और वह देखने-सुनने में गौरवशाली होना चाहिए। मेरा प्रस्ताव है कि इन दोनों गुणों का धनी हाथी को राष्ट्र-पशु बनाया जाए। हमारे माननीय विपक्षी नेता श्री आडवाणी जी को इसमें कोई विशेष आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि हाथी भी गाय जितना ही पवित्र जानवर है। हिंदुओं के प्रिय देवता गणेश तो हाथी के ही प्रतीक हैं।"
अपनी जोशीले पार्टी सदस्य का यह चालाकी भरा प्रस्ताव सुनकर प्रधान मंत्री मायावती धीमे से मुस्कुराईं। बहुजन समाज पार्टी के सांसद मेजें ठोंक-ठोंकर अपनी पार्टी के प्रतीक हाथी को राष्ट्रीय पशु बनाने के मुख्तार अंसारी के प्रस्ताव का समर्थन करने लगे।
तभी संसदाध्यक्ष की अनुमति लेकर कांग्रेस के नेता गुजरात वासी श्री शंकर सिंह वाघेला बड़े आक्रोश के साथ बोल उठे, "गृह मंत्री मुख्तार अंसारी की बात सुनकर मुझे बड़ा आघात पहुंचा है। खेद है कि सत्ता में आने और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद को संभालने के बाद भी ये अपनी पार्टी से आगे सोच नहीं पा रहे हैं। हाथी तो सत्तारूढ़ पार्टी का चुनाव चिह्न है और उसे किसी भी हालत में राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय पशु किसी पार्टी विशेष की बपौती नहीं हो सकता, वह सारे राष्ट्र का प्रतीक है। ऐसा ही कोई पशु राष्ट्रीय पशु हो सकता है जो सारे राष्ट्र को मंजूर हो। मैं सुझाता हूं कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए। सिंह बाघ जितना ही शौर्यवान और आकर्षक पशु है और पुराने जमाने से ही राजा-महाराजाओं का प्रतीक रहा है।"
अपनी बात का अनादर होते देखकर गृह मंत्री मुख्तार अंसारी गुस्से से आग बबूला हो उठे और चीखते हुए बोले:- "वाघेला जी, आपका तर्क बिलकुल निराधार है। क्या आपको पता नहीं कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न कमल इस देश का राष्ट्रीय पुष्प है? यदि देश का राष्ट्रीय पुष्प किसी पार्टी का चुनाव चिह्न हो सकता है, तब हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं हो सकता? यदि हाथी राष्ट्रीय पशु नहीं हो सकता, तो कमल को भी राष्ट्रीय पुष्प नहीं रहने देना चाहिए और उसे भी संविधान में संशोधन करके बदल देना चाहिए।"
कम्यूनिस्ट पार्टी के सीताराम यचूरी बोल पड़े, "मैं वाघेला साहब की इस बात से बिलकुल सहमत हूं कि किसी पार्टी विशेष का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन उनकी दूसरी बात कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए, बिलकुल व्यावहारिक नहीं है। शायद उन्होंने सिंह का समर्थन इसलिए किया क्योंकि सिंह उनके अपने राज्य गुजरात का निवासी है। इस तरह की क्षेत्रीय मानसिकता से हमें उबरना चाहिए।
"सिंह के विरुद्ध दूसरी जो बात जाती है, वह यह है कि आज सिंह की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। पिछले माह वन विभाग द्वारा की गई गणना के अनुसार गीर के जंगलों में केवल 350 सिंह बचे हुए हैं। इसलिए इसकी संभावना बहुत अधिक है कि आने वाले चार-पांच सालों में सिंह भी इस देश से विलुप्त हो जाएगा। ऐसे में हमें फिर अपना राष्ट्रीय पशु बदलना पड़ेगा। इससे बेहतर है कि हम इस मुद्दे का कोई स्थायी समाधान निकालें।
"मैं समझता हूं कि कोई ऐसे प्राणी को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया जाना चाहिए जो आज की बदली हुई परिस्थितियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता हो। सिंह, बाघ, हाथी आदि सामंती व्यवस्था की याद दिलाते हैं। प्रथम दो तो हिंसा और शौर्य के प्रतीक हैं। आज के व्यावसायिक युग में इन दोनों भावनाओं को कोई स्थान नहीं है। रही बात हाथी की। हाथी कोई उपयोगी पशु नहीं है। उसकी छवि एक ऐसे पशु की है जो उसके मालिक के धन-दौलत को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। हमारे ही देश के सार्वजनिक उद्यमों को उचित ही सफेद हाथी कहा गया है क्योंकि वे धीरे-धीरे देश की संपत्ति को खाए जा रहे हैं। जिस पशु में ऐसी भावना निहित हो, उसे कदापि राष्ट्रीय पशु नहीं बनाना चाहिए।
"मेरा सुझाव है कि हम कोई ऐसे छोटे एवं सफल प्राणी को चुनें जिसमें वर्तमान परिस्थितियों में तरक्की करने के गुण मौजूद हों। मेरा इशारा एक ऐसे पशु की ओर है जो तेज बदलती परिस्थितियों के मुताबिक अपने आपको ढाल लेता है, और जो चालाक भी है, यानी कि गीदड़। आप को ज्ञात होगा कि पंचतंत्र, हितोपदेश आदि प्राचीन ग्रंथों में गीदड़ का खूब गुण गाया गया है। गीदड़ जैसे स्वभाव वाले नेता ही आजकल ज्यादा दिखाई देते हैं। इसलिए राष्ट्र का पशु उनके जैसे स्वभाव वाला हो, तो अच्छा।"
सीताराम यचूरी की इस सुझाव से सारे सांसदों में खुसुरफुसुर मच गई। अध्यक्ष महोदय ने इस खलबली को शांत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। तब तक संसद के सभी मुख्य पक्ष बोल चुके थे। इसलिए संसदाध्यक्ष ने राष्ट्रीय पशु के मामले पर वोट डलवा दिए। देखा गया कि 90 फीसदी वोट गीदड़ के पक्ष में पड़े।
प्रधान मंत्री मायावती ने प्रसन्न मुद्रा से सांसदों को संबोधित करते हुए कहा, "मैं आप सबकी आभारी हूं कि आपने विचाराधीन मुद्दे पर आपसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर वोट किया। मैं गीदड़ को इस देश का नया राष्ट्रीय पशु घोषित करती हूं। इस संबंध का राजपत्र शीघ्र निकाला जाएगा।"
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
Thursday, March 26, 2009
प्रधान मंत्री राम
यह प्रहसन कुछ वर्ष पहले लिखा था। पर परिस्थितियां आज वैसी ही हैं, इसलिए पाठक उससे आसानी से रिलेट कर सकेंगे। कुछ पदों पर नए लोग आ गए हैं, पर अधिकांश वे ही पुराने चले आ रहे हैं। चुनावी माहौल के लिए उपयुक्त समझकर इसे जयहिंदी में दे रहा हूं।
पात्र
सूत्रधार, राम, हनुमान, वानर सेना, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह, स्पीकर, सीता, अटल बिहारी वाजपेयी, मजदूर नेता, साध्वी रीतंबरा, टी एन शेषन, लक्ष्मण
सूत्रधारः गुजरात के वाघेला कांड के बाद भारतीय जनता पार्टी के साफ-सुथरे, अनुशासित पार्टी होने की छवि मिट्टी में मिल गई। हवाला कांड में उसके राम श्री लाल कृष्ण आडवाणी शहीद हुए। भाजपा को चुनाव जीतने के कम आसार नजर आने लगे। सोच-विचार कर उसने तय किया कि स्वयं भगवान राम ही उसे उभार सकते हैं। बहुत जोर दिए जाने पर राम भाजपा की बागडोर संभालने के लिए राजी हुए। कहना न होगा कि भगवान राम के नेतृत्व में पार्टी विजयी हुई और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और बने देश के नए प्रधान मंत्री राम। इस नए अवतार में भगवान राम ने दरबार बुलाई और अपने चुनावी वादों को लागू करने के उपायों पर विचार करने लगे।
रामः चुनावों के समय हमने अवधवासियों, न न माफ करना भाइयो, पुरानी बात कह गया। हां भारतवासियों से वादा किया था कि हम देश के सभी वृद्ध लोगों को पेंशन देंगे। मैं समझता हूं कि हमारा पहला काम इस स्कीम को लागू करना होना चाहिए। रावण के साथ युद्ध में मेरे साथ लड़े बहुत से प्रिय वानरों को, खासकर हनुमान को, इससे लाभ मिलेगा।
हनुमानः धन्यवाद राम। बोलो श्री राम चंद्र की जय!
(वानर सेना राम जय का नारा बुलंद करती है और गाती हैः
हम तो आपके दीवाने हैं
बड़े मस्ताने हैं, आह ओह....
आपके दीवाने का गाना)
रामः (राव से) भूतपूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी दल के नेता की हैसियत से इसके बारे में तुम्हारी क्या राय है राव?
रावः राम, आप अब समस्त भारत के नेता हैं। आपको सिर्फ अवध या अपने निजी समर्थकों की नहीं सोचनी चाहिए। मैंने और मेरे यह साथी मनमोहन सिंह ने पिछले पांच सालों में जो उदार नीतियों का सूत्रपात किया था, उन्हीं को आप आगे बढ़ाएं तो अच्छा।
(भूतपूर्व वित्तमंत्री मनमोहन सिंह राव का समर्थन करते हुए बहुत उद्विग्नता से कहते हैं।)
मनमोहन सिंहः प्राधान मंत्री राम, इस तरह के पोपुलिस्ट कदमों से पिछले पांच वर्षों में मेरी सरकार ने उदारीकरण के लिए जो भगीरथ प्रयत्न किया था उस पर पानी फिर जाएगा। हनुमान, जांबवान आदि चिरंजीवी हैं। जन्म-जन्मांतर तक पेंशन खाते रहेंगे और देश का दीवाला पिट जाएगा।
हनुमानः अबे मनमोहन सिंह के बच्चे, राम का विरोध करता है। अभी मैं तुझे ठीक करता हूं।
(हनुमान गदा लहराते हुए सिंह साहब के पीछे भागते हैं, जो जान बचाए राव के पीछे छिपते हैं। राव अपने वित्तमंत्री की रक्षा करते हुए यह गाना गाने लगते हैं:
लोगो न मारो उसे, ये तो मेरा दिलदार है...
स्पीकर महोदय बड़ी मुश्किल से हनुमान की गदा छिनवाते हैं और उन्हें शांत करते हैं।)
सीताः स्वामी, एक सुझाव मेरा भी है।
रामः हां, प्राण प्रिय सीते, हम सुन रहे हैं।
सीताः नाथ, सबसे पहले इन अत्याचारी, चुगलखोर धोबियों से निपटिए। पहले अवतार में इनके बहकावे में आकर आपने मुझ पर बहुत जुल्म ढाए थे। अब आप प्रधान मंत्री हैं और यह नारी मुक्ति का जमाना है। नारी विरोधी होने का जो कलंक आपके चरित्र के साथ जुड़ गया है, उसे धोने का यही सुअवसर है। इन धोबियों को देशनिकाला नहीं तो कोई अन्य कड़ी सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इससे आप नारियों में बहुत लोकप्रिय हो जाएंगे।
(सीता की बात सुनकर अटल बिहारी वाजपेयी व्यंग्यपूर्ण ढंग से हंस पड़ते हैं जिसे देखकर राम कुछ-कुछ चिढ़ उठते हैं।)
रामः क्यों अटल, तुम्हें कुछ कहना है?
अटलः सीता जी के बहकावे में न आएं राम! आप गृहस्थों को यह बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ती है। आप तो बस पत्नी जी के गुलाम भर होते हैं। भगवद कृपा से मैं इस दुर्दशा से अब तक बचा हुआ हूं, कुंवारा जो हूं। इस देश की अवनति में पत्नियों का बड़ा हाथ रहा है। आप स्वयं भुक्त-भोगी हैं। दशरथ-पत्नी कैकेयी के कारण ही तो आपको वनवास हुआ था। अब आपकी अर्धांगिनी आपको गलत सलाह दे रही हैं।
रामः वह कैसे अटल?
अटलः बात बहुत सीधी है राम। परंतु आप सामंती लोगों को लोकतंत्र की इतनी मोटी बात भी बड़ी मुश्किल से समझ आती है। धोबी अनुसूचित जातियों में आते हैं जिनकी इस देश में 50 प्रतिशत आबादी है। उनके विरुद्ध कोई कदम उठाने का मतलब है सत्ता से हाथ धोना। अब देखिए न, आपको गाली देने वाले कांशी राम और मायावती से हमें उत्तर प्रदेश में दुमछल्ला होना पड़ा था। राजनीति में अपना उल्लू सीधा करने के लिए गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। इसलिए सीता की बात दर किनार कीजिए। कहीं कांशी राम ने सुन लिया तो आफत आ जाएगी। अपना हाथी दौड़ाकर नए खिले कमल को दुबारा कीचड़ में रौंद देगा। उसको बस एक मुद्दा चाहिए। आपको धोबियों के लिए कोई वेलफेयर कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। इससे भी अच्छा आप किसी धोबी को उप प्रधान मंत्री बना लें। मेरा निजी धोबी बड़ा होनहार है। कहो तो उससे बात चलाऊं।
रामः (घृणा से) क्या! एक धोबी मेरी बराबरी करेगा!
अटलः हां राम। यही लोकतंत्र है।
रामः (निराश स्वर में) यह लोकतंत्र तो रावण से भी विकराल राक्षस मालूम पड़ता है।
(एक मजदूर नेता बहुत गुस्से में सदन में प्रवेश करता है।)
रामः यह कौन है?
एक सचिवः स्वामी, यह साम्यवादी दल का सदस्य और एक खूंखार मजदूर नेता है।
मजदूर नेताः राम आपके प्रधान मंत्री बने पूरे दस दिन हो गए। अब तक फिफ्त पे कमिशन की रिपोर्ट लागू नहीं हुई है। यह तो हद है। अब हम देख लेंगे आपको भी। यदि दो दिन में आपको घुटने पर नहीं लाया तो मेरा नाम नहीं। कल से देश भर में चक्का जाम किया जाएगा। सभी दफ्तर बंद। अस्पताल बंद। हम आपकी सरकार गिराकर ही रहेंगे। ऐसी निकम्मी सरकार हमें नहीं चाहिए।
रामः (घबराकर) अरे भाई जरा शांत हो जाओ। मैं इस रोल में नया हूं। यह फिफ्त पे कमिशन क्या बला है। जरा समझाओ तो।
मजदूर नेताः पिछले पांच वर्षों से कर्मचारियों की पगार नहीं बढ़ी है। इससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है।
रामः पगार? वह क्या होती है?
एक सचिवः भगवन, काम करने के बदले लोगों को पैसे दिए जाते हैं, जिसे पगार कहते हैं।
रामः यह सब लगता है नया शुरू हुआ है। मेरे समय तो किसी को कोई पगार नहीं मिलती थी। वरना मेरे जैसा निर्धन वनवासी दौलतशाली रावण का मटियामेट कैसे कर पाता। लाखों-करोड़ों वानरों को मैंने एक पैसा भी नहीं दिया। वे मेरे प्रति अपनी श्रद्धा से सभी कष्ट झेलते गए। प्राण भी गंवा दिए।
मजदूर नेताः क्या कहा, वानरों से बेगार करवाया? यह तो मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन है। काश यह बात चुनावों से पहले हमें मालूम होती। फिर देखता आप कैसे चुनाव जीतते। जिसका दामन इतने बड़े धब्बे से काला हो, वह चुनाव जीत ही नहीं सकता, भगवान ही क्यों न हो वह।
(मजदूर नेता भौचक्का-सा कुछ बड़बड़ता हुआ सदन से निकल जाता है।)
मनमोहन सिंहः इन यूनियन लीडरों को देखते ही मुझे कुछ होने लगता है, मानो शरीर पर बिच्छू रेंग रहे हों। खैर वह कंबख्त गया सो अच्छा हुआ। चलो अब कुछ काम की बात करें। उदारीकरण के विषय में आपकी सरकार की क्या नीति रहेगी राम, क्या आप विदेशी कंपनियों को भारत में आने देंगे या उन पर पाबंदियां लगाएंगे?
(राम के लिए यह विषय नया था। वे बगले झांकने लगे। पर साधवी रीतंबरा ने राम के कष्ट को भांप कर स्थिति को संभाल लिया। वह यह गाना गाने लगी:
मेड़ इन इंडिया
दिल खोल कर कहो मेड इन इंडिया...)
साध्वीः थोड़े शब्दों में मनमोहन, इस विषय में हमारी पार्टी की नीति यही है। जो चीज भारत में बनी है, वह भारत में बिकेगी। बाकी चीजें नहीं। समझे? हम देश की संपत्ति को विदेशियों के हाथों लुटाने नहीं सत्ता पर आए हैं।
मनमोहनः मगर मैडम, भारत सब चीजें तो नहीं बनाता। उन चीजों का क्या जो यहां नहीं बनतीं।
रामः मनमोहन, तुमने शायद महाभारत नहीं पढ़ा है। उसमें लिखा है, जो चीज इसमें नहीं है, वह इस दुनिया में नहीं है। जो चीज दुनिया में है, वह इस महाग्रंथ में है। इसलिए मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई चीज है जो भारत नहीं बनाता या बना सकता।
मनमोहनः मगर राम वह सब तो दो हजार साल पहले की बात है। अब तो दुनिया बदल चुकी है...
(वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए। तभी मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन सदन में प्रवेश करते हैं।)
रामः आओ शेषन, कैसे आना हुआ। निर्वाचन आयोग में तो शांति है न?
टी एन शेषनः हे जगदीश्वर राम, तीनों लोकों के स्वामी! मेरा प्रणाम ग्रहण करें। मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते मुझे ऐसे अनेक काम करने पड़ते हैं जो मुझे बहुत अप्रिय होते हैं। ऐसा ही एक अप्रिय काम लेकर मैं आपके पास आया हूं। कृपानिधान, मुझे क्षमा करें।
रामः क्षमा किस लिए शेषन। कहो क्या काम है?
शेषनः मैं एक बार फिर क्षमा मांगता हूं राम। पर खेद के साथ कहता हूं कि आपका चुनाव रद्द कर दिया गया है और आप अब प्रधान मंत्री नहीं रहे।
रामः क्या! चुनाव रद्द कर दिया! प्रधान मंत्री नहीं रहा! क्या मतलब है तुम्हारा?
शेषनः चुनावी अभियानों में आपने धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया था। यह संविधान के अनुसार गैरकानूनी है। इसलिए मुझे आपके चुनाव को रद्द करना पड़ा है।
रामः हा शेषन, तुम तो घर के भेदी निकले। वैंकुंड में क्षीर सागर में शेषनाग की गोदी में लेटकर मैं परम आनंद और सुरक्षा का अनुभव करता था। यहां तुम शेष नामधारी ने मुझ पर यों घात किया! निर्दयी! जयचंद! कलियुग! घोर कलियुग!
शेषनः प्रभु यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्था और कानून प्रमुख होते हैं। लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा निर्वाचन आयोग है। उस आयोग का सबसे मजबूत खंभा मैं हूं, हां मैं शेषन! मैं आपसे भी, मेरा मतलब है प्रधान मंत्री से भी, शक्तिशाली हूं। यही लोकतंत्र है, लोकतंत्र यानी शेषन तंत्र। हा हा हा हा...
रामः (उदास स्वर में) यह लोकतंत्र का गणित मेरे पल्ले बिलकुल नहीं पड़ता। चलो लक्षमण, चलो सीते, एक बार फिर वनवास के लिए तैयार हो जाओ। हमें राजगद्दी फिर छोड़नी पड़ेगी।
(राम यह गाना गाते हुए प्रस्थान करते हैं:
हम छोड़ चले हैं महफिल को
याद आए तो मत रोना...)
(समाप्त)
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
Tuesday, March 24, 2009
किस गांधी की बात कर रहे हैं वरुण?

निश्चय ही वह महात्मा गांधी नहीं हो सकते। यह स्पष्ट करना जरूरी लगता है। गांधी नाम सुनकर लोगों के मन में महात्मा गांधी का विचार ही पहले आता है।
इसलिए, वरुण जब गांधी नाम की विरासत पर अपना दावा ठोकते हैं, तो उसमें फिरोस, इंदिरा और संजय की विरासत हो सकती है, पर महात्मा गांधी की नहीं। वरुण के तौर-तरीके देखकर तो यही लगता है कि उनको संजय की विरासत ही ज्यादा प्राप्त हुई है।
वरुण के विचारों का महात्मा गांधी के विचारों से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है। गांधीजी समन्यवादी थे, जो सब कौमों को साथ लेकर चलना चाहते थे, खासकर मुसलमानों को। दूसरे, वे बहुत सोच-विचार कर ही बोलते थे, और कभी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करते थे।
इन दोनों ही बातों में वरुण उनसे भिन्न हैं।
वरुण को जो राजनीतिक संस्कृति पारिवारिक विरासत के रूप में मिली है, वह आखिर रंग दिखा ही रही है। यह बड़े खेद की बात है।
और भी खेद की बात यह है कि वरुण उन्हीं मेनका गांधी के पुत्र हैं जिन्हें कुत्ते-बिल्लियों की पीड़ा से अपार सहानुभूति है। लगता है उनके बेटे के लिए मुसलमान कुत्ते-बिल्लियों से भी गए गुजरे हैं।
चुनाव आयोग को वरुण पर एक्सेंप्लरी सजा ठोकनी चाहिए और उसे चुनाव में भाग लेने से रोकना चाहिए। इससे चुनावी भाषणों में भड़काऊ बयानबाजी थोड़ी थमेगी।
एक बात और काबिले गौर है। राहुल और वरुण, इन दोनों चचेरे भाइयों में, राहुल निश्चय ही अधिक मृदु-भाषी, सज्जन, और विवेकशील मालूम पड़ रहे हैं। राजीव और संजय में भी ठीक यही अंतर था। नेहरू खानदान और कांग्रेस पार्टी को राहुल से इस बार बहुत आशाएं होंगी।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: चुनाव, वरुण गांधी
Saturday, March 21, 2009
वोट के बदले क्या दोगे?
चुनाव आ रहा है और पार्टी कार्यकर्ता वोट मांगने आपके द्वार पर भीड़ लगा रहे हैं। यही मौका है उनसे पूछने के लिए कि हिंदी के लिए आप क्या कर रहे हैं और लोक सभा-विधान सभा-पंचायत-नगरपालिका में पहुंचकर हिंदी के लिए आप क्या करने का इरादा रखते हैं।
क्या आपकी पार्टी अगले पांच वर्षों में हिंदी प्रदेशों में शत-प्रतिशत साक्षरता लाने की गारंटी दे सकती है? प्राथमिक शिक्षण के लिए बजट में राष्ट्रीय आय का 25 प्रतिशत या उससे ज्यादा के आवंटन का आश्वासन दे सकती है? हिंदी के त्वरित विकास के लिए हिंदी प्रदेशों में शत-प्रतिशत साक्षरता लाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे लोग अधिक संख्या में हिंदी पुस्तकें, अखबार आदि पढ़ेंगे। इससे हिंदी जनता अधिक प्रबुद्ध और समझदार बनेगी और अपने अधिकारों और दायित्वों को बेहतर रूप से पहचानेगी। उसे स्वास्थ्य, रोजगार, कला, संस्कृति आदि के बारे में पुस्तकों, अखबारों आदि से बेहतर जानकारी मिलेगी, जिससे उसका जीवन स्तर और आमदनी में सुधार आएगा। समस्त विश्व में देखा गया है कि जहां महिलाएं साक्षर हों, वहां बाल मृत्यु दर, प्रसव के दौरान माता की मृत्यु की दर, जन्म के समय बच्चों का वजन कम होना, आदि नकारात्मक सामाजिक सूचकों में भारी गिरावट आती है। यह भी देखा गया है कि यदि माता पढ़ी-लिखी हो, तो बच्चे पेचिस, दस्त, पोलियो, टीबी आदि घातक बीमारियों से बचे रहते हैं अथवा इनके लगने पर बच्चों की देखरेख ठीक तरह से होती है, क्योंकि माताएं डाक्टरों द्वारा बताए गए निर्देशों का बेहतर रीति से पालन कर पाती हैं और दवा की शीशियों में छपे निर्देशों को और सरकार द्वारा चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों के पोस्टरों, पुस्तिकाओं आदि में दी गई जानकारी को पढ़कर समझ लेती हैं और उनका अनुसरण कर पाती हैं।
साक्षरता जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। वोट मांगने आया उम्मीदार इसकी व्यवस्था के लिए क्या करने का विचार रखता है? क्या वह हर गांव में हिंदी पुस्तकालय स्थापित करने का वादा कर सकता है? केवल वादा करना काफी न होगा। एक पुस्तकालय स्थापित करने में भवन, मेज-कुर्सी, कंप्यूटर, पुस्तकें आदि में कम-से-कम 50 लाख रुपए की लागत आएगी, उसके बाद पुस्तकालय के कर्मियों का वेतन, हर साल नए पुस्तकें खरीदने का खर्च आदि के रूप में कम से कम 5 लाख रुपए का आवर्ती खर्च आएगा। समस्त हिंदी भाषी प्रदेश में लगभग 4,00,000 गांव हैं। इसलिए समस्त हिंदी प्रदेश में पुस्तकालयों की जाल बिछाने के लिए 2 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी। आवर्ती खर्च अलग। इस पैसे की व्यवस्था उम्मीदार कैसे करेगा? निजी क्षेत्रों का योगदान प्राप्त करने से सरकार पर इसका भार कुछ कम हो सकता है। क्या उम्मीदवार की पार्टी ऐसी किसी योजना पर विचार कर रही है, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से सभी गांवों में एक उच्च स्तरीय पुस्तकालय स्थापित की जा सके? उम्मीदवार से इस तरह की योजना के ब्योरे समझाने के लिए कहना चाहिए। मान लेते हैं कि आप चुनाव जीतकर आते हैं, और आपकी पार्टी मई में सत्ता पर काबिज हो जाती है। तो आप कितने दिनों में इस योजना को लागू करना शुरू करेंगे? यदि पांच सालों में 4,00,000 पुस्तकालय स्थापित करने हों, तो हर साल लगभग 30,000 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे, हर महीने 2,500 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे, हर दिन लगभग 100 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे।
उम्मीदवार के सामने इस तरह के आंकड़े गिनाने से उसे एहसास होगा कि चुनाव में खड़ा होना केवल अपनी जेबें भरने का उद्यम नहीं है, बल्कि उसके साथ कुछ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हुई हैं।
हिंदी प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का हाल बेहाल है। कई गांवों में स्कूल तक नहीं हैं। जहां स्कूल हैं, वहां स्कूल के लिए भवन नहीं हैं, पेड़ों के नीचें कक्षाएं चलती हैं। सरकारी अध्यापक तन्खाह तो लेते हैं, पर पढ़ाते नहीं है, इसके बजाए कहीं गांव में दुकान खोलकर बैठे होते हैं, या अन्य किसी काम में लगे रहते हैं। इनको अनुशासित कैसे किया जाएगा? आपकी पार्टी का इसके बारे में क्या सोच है? जरा समझाइए। मां-बांप लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते, कुछ रूढ़िवादिता के कारण, कुछ आर्थिक तंग-हाली के कारण। लड़कियों में शत-प्रतिशत भर्ती लाने के लिए आपकी कोई योजना है?
उच्च शिक्षा की समस्या यह है कि वह अंग्रेजी-परस्त है। इसलिए हिंदी भाषियों के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के द्वार बंद हैं, चाहे वे साधारण से कालेज-विश्वविद्यालय हों, या आईआईटी-आईआईएम सरीखे विश्व-स्तरीय संगठन। इनके द्वार हिंदी भाषियों के लिए खोलने के लिए आप क्या करनेवाले हैं? क्या आप ऐसा कानून बनाएंगे, और उसका क्रियान्वयन करेंगे, कि सभी उच्च शिक्षा संस्थाओं में शिक्षण का माध्यम हिंदी हो? क्या आप अपने पांच साल के कार्यकाल में आईआईटी-आईआईएमों का शिक्षण माध्यम हिंदी करवा पाएंगे?
प्राथमिक शिक्षा अब एक फलता-फूलता व्यवसाय बनता जा रहा है। अब गांवों तक में अंग्रेजी माध्यम के नर्सरी-किंटरगार्टन स्कूल खुलने लगे हैं। यहां सभी शिक्षा-शास्त्रियों और विद्वानों की सलाह का उल्लंघन करते हुए, 4-5 साल के बच्चों को एक विदेशी भाषा सिखाई जाती है। यह उम्र मातृभाषा, यानी हिंदी, पर अच्छी पकड़ प्राप्त करने की होती है क्योंकि बच्चे 5 वर्ष की उम्र में अपनी अधिकांश भाषाई क्षमता अर्जित करते हैं। इन बहुमूल्य वर्षों में उन्हें हिंदी न पढ़ाकर उन्हें उम्र भर के लिए भाषाई दृष्टि से पंगु बनाया जा रहा है। चूंकि अंग्रेजी हमारे देश के लिए विदेशी भाषा है और इन स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ानेवालों तक को ढंग की अंग्रेजी नहीं मालूम होती है, ये बच्चे कभी अंग्रेजी नहीं सीख पाते हैं, और हिंदी से भी वंचित रह जाते हैं, क्योंकि इन स्कूलों में हिंदी को प्रवेश ही नहीं है। शिक्षा के नाम पर इस घोटाले को रोकने के लिए आपकी पार्टी क्या करेगी? क्या वह यह कानून बनाएगी, कि प्राथमिक शिक्षण के लिए हिंदी ही माध्यम रखी जा सकती है, और अंग्रेजी माध्यम से प्राथमिक शिक्षण में संलग्न स्कूलों को बंद करवाएगी?
यदि उपर्युक्त कदम आप उठाते हैं, तो निहित स्वार्थों की तरफ से बहुत ही बड़ा बवाल मचेगा। अंग्रेजीदां लोग, बड़े-बड़े उद्योगपति जो अपना व्यवसाय अंग्रेजी के माध्यम से चलाते हैं, शिक्षा उद्योग में जिन लोगों ने भारी पैसा लगा रखा है, वे सब, आपके खून के प्यासे हो जाएंगे। आप उनसे कैसे निपटेंगे? कहीं उनसे रिश्वत आदि लेकर आप हथियार तो नहीं डाल देंगे?
चुनाव के दौरान हमें पार्टियों और उनके नेताओं से ऐसे सवाल पूछने चाहिए। चुनाव के बाद हमें इस पर निगरानी रखनी चाहिए कि जीतकर आई पार्टियां और उनके नेता उपर्युक्त नीतियों, कानूनों, योजनाओं और कार्यक्रमों को कहां तक लागू करते हैं। इससे उनके इरादों, निष्पादन आदि का सही मूल्यांकन हो सकेगा और अगले चुनाव में इनके रिपोर्ट कार्ड के अनुसार इन्हें वोट देना संभव हो सकेगा।
जनता को ऊपर बताई गई योजनाओं, नीतियों और कानूनों की सूची रखनी चाहिए और चुनावी पार्टियों को उनसे अवगत करना चाहिए। यह काम चुनाव के बहुत पहले ही होना चाहिए, ताकि ये विषय चुनावी मुद्दे बन सकें। इसके लिए जनता को अपने में से जानकार लोगों को चुनकर विस्तृत जन-कल्याणकारी योजनाओं का ब्योरा तैयार कराना चाहिए, ताकि नेताओं से उन पर अमल कराया जा सके।
अन्य गुट, जैसे उद्योगपति, विदेशी सरकारें, विदेशी कंपनियां, आदि ऐसा ही करते हैं। जब पार्टियां उनसे चुनाव के लिए पैसे मांगने जाती हैं, चेक पर हस्ताक्षर करने से पहले, ये सब सरकार से अपनी मांगें पेश करते हैं – कि हमें सरकारी नीतियों-कानूनों में यह-यह परिवर्तन चाहिए, करों में इतनी कटौती चाहिए, हमारे कारखाने तक सड़क या रेल बिछाई जाए, यहां बंदर बनवाया जाए, ताकि हमारे उत्पादों के निर्यात में आसानी हो, इत्यादि। कई तो आधा अभी, आधा काम होने के बाद की शर्त भी रखते हैं, यानी आधा पैसा अभी लो और आधा पैसा चुनाव जीतकर आने के बाद, हमारी मांगें पूरी करने के बाद, ले जाओ।
इसलिए पार्टियां और नेता गण इनकी मांगें पूरी करने में तत्पर रहते हैं, पर चूंकि जनता इस तरह की शर्तें नहीं रखती, इसलिए उसकी कोई भी मांगें पूरी नहीं की जातीं। अन्यथा ऐसा क्यों है कि आजादी के साठ साल बाद भी देश में व्यापक गरीबी, निरक्षरता, कुस्वास्थ्य, कुशासन आदि हैं, जबकि हमारे ही देश के साथ-साथ आजाद हुआ चीन महाशक्ति बन गया है और वहां पूर्ण साक्षरता, आदि के लक्ष्य कब के प्राप्त कर लिए गए हैं? साठ साल बाद भी ऐसा क्यों है कि हमारे न्यायालयों, उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी दफ्तरों में अब भी अंग्रेजी चल रही है, जबकि मूल संविधान में 15 सालों में अंग्रेजी हटाने की बात कही गई थी?
कारण साफ है, नेताओं और पार्टियों ने उद्योगपतियों, विदेशी ताकतों, विदेशी कंपनियों आदि के एजेंडा को आगे बढ़ाने की ओर ज्यादा ध्यान दिया है, जनता के हित के लिए काम करने की ओर कम। अब समय आ गया है कि हम भी अपने हित की योजनाओं की मांग करें। हम अपनी मांग पैसे के बल पर नहीं मनवा सकते, वोट के बल पर शायद मनवा लें। (समाप्त)
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ