Monday, August 10, 2009

घर की चाहरदीवारी और राष्ट्रों की सरहदें

बिना बोले बातचीत - 7

हममें से प्रत्येक को हमारे चारों ओर कुछ न्यूनतम जगह की आवश्यकता होती है। इस जगह के भीतर कोई अन्य व्यक्ति घुस आए तो हम घबराहट महसूस करने लगते हैं। किसी के निजी क्षेत्र में घुसना उस पर आक्रमण करने के बराबर है। साधारणतः यह निजी क्षेत्र हमारे शरीर के चारों ओर लगभग एक मीटर तक फैला होता है। अधिक आक्रामक स्वभाववाले लोगों में यह अधिक होता है, सरल स्वभाववाले लोगों में कम। रेलवे स्टेशन में टिकट की खिड़की के सामने पंक्ति में खड़े लोगों का निरीक्षण करने पर इस निजी क्षेत्र का हमें एहसास हो जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति उसके आगे या पीछे खड़े व्यक्ति से कुछ सेंटीमीटर की दूरी पर खड़ा रहता है। उसके आगे-पीछे खड़े व्यक्ति को इससे अधिक निकट आने नहीं देता। यदि निकट आता है तो वह या तो उसे पीछे ढकेल देगा या नाराज हो जाएगा या विचिलित होने लगेगा।

भीड़-भरे बाजार में चलते वक्त भी हमें इसी निजी क्षेत्र का एहसास होता है। हम भरसक प्रयत्न करते हैं कि हमारा शरीर किसी अन्य व्यक्ति से टकरा न जाए। यदि टकरा जाता है तो हम माफी मांग लेते हैं। रेल के डिब्बे या बस में बैठते वक्त हम सीट के कुछ हिस्से को अपना मान लेते हैं। इस हिस्से पर कोई अधिक्रमण करने लगे तो हम लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।

यह निजी क्षेत्र व्यक्तियों में ही नहीं पाया जाता, वरन परिवारों, कबीलों और राष्ट्रों में भी दृष्टिगोचर होता है। घरों के चारों ओर दीवार बनवाकर और खेतों के चारों ओर मेड़ या बाड़ा खड़ा करके हम अपने अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार सभी राष्ट्र अपनी सीमाओं को बड़े यत्न से निर्धारित करते हैं और उसकी बड़ी कड़ाई से रक्षा करते हैं। रोचक बात तो यह है कि यह आदत हम मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है। प्राणी जगत में भी इसके चिह्न दिखाई पड़ते हैं। हमारा अत्यंत परिचित प्राणी कुत्ते को ही लीजिए। वह भी अपने अधिकार क्षेत्र को बड़े यत्न से गंध द्वारा निर्धारित करता है और उसकी रक्षा सभी अन्य कुत्तों से करता है।

मनुष्य तथा अनेक अन्य प्राणियों में आंख से आंख मिलाकर देखना आक्रामक भाव व्यक्त करता है। दैनंदिन के जीवन के अनुभवों से हम इस तथ्य को जान सकते हैं। गुस्सा होने पर हम अपने प्रतिद्वंद्वी को घूरते हैं। किसी अन्य मनुष्य को सड़क में मिलने पर हम आंखें झुका लेते हैं। उससे आंखें तभी मिलाते हैं जब वह हमारा परिचित होता है। अपरिचित व्यक्ति से गलती से आंखें मिल भी जाएं तो हम तुरंत आंखें नीची कर लेते हैं या मुसकुरा देते हैं। मुसकुराने का अर्थ होता है कि हमारे इरादे मित्रतापूर्ण हैं।

प्रत्येक समुदाय की अपनी विशिष्ट शारीरिक चेष्टाएं होती हैं जिनका सही अर्थ केवल उस समुदाय के सदस्य ठीक प्रकार से समझ सकते हैं। उस समुदाय में पैदा होनेवाला प्रत्येक शिशु इन शारीरिक चेष्टाओं को भी बड़ों की नकल करके उसी प्रकार सीखता है जैसे वह भाषा सीखता है। इसी कारण जब भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के लोग मिलते हैं तो उन्हें एक-दूसरे को समझने में कठिनाई होती है क्योंकि उनकी अनेक शारीरिक चेष्टाएं भिन्न-भिन्न होती हैं और वे उनका सही अर्थ समझ नहीं पाते।

मनुष्य केवल शब्दों के उच्चारण से ही अपने मन की बात को व्यक्त नहीं करता। शरीर के प्रत्येक अंग की चेष्टाओं से वह अपने मनोभावों को प्रकट करता है। आंख, भौंह, कान, सिर, दांत, जीभ तथा मुख की मांस-पेशियां अत्यंत वाचाल होती हैं। चेहरे की बहुत-सी मुद्राएं अत्यंत आदिम हैं, और उनसे मिलती-जुलती मुद्राएं अन्य जानवरों, विशेषकर नरवानरों (गोरिल्ला, चिंपैंजी, वनमानुष आदि) में, विद्यमान हैं। इन मुद्राओं में हंसना, रोना और मुसकुराना प्रधान हैं।

ऐसे उदाहरणों से यही बात स्पष्ट होती है कि हममें और अन्य प्राणियों में बहुत-सी बातें समान हैं। यह अलग है कि हम इन सामान्य आदतों को पहचानने की कम कोशिश करते हैं। इसीलिए जब डारविन ने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य का विकास बंदरों से हुआ है तो अनेक ईसाई पादरियों को बुरा लगा था क्योंकि उनके धर्म-ग्रंथों के अनुसार सभी जीवों को ईश्वर ने एक सप्ताह में बना डाला था और वे सब अपरिवर्तनीय थे। जो भी हो अब विज्ञान ने यह निर्विवाद रूप से साबित कर दिया है कि मनुष्य तथा सभी जीवधारियों का वर्तमान रूप लाखों वर्षों के विकास क्रम का परिणाम है। यह भी सिद्ध हो गया है कि मनुष्य तथा अन्य जीवों में उतना अंतर नहीं है जितना धर्मावलंबी पंडे बतलाना चाहते हैं।

इस लेख के साथ ही यह लेख-माला एक तरह से समाप्त जाती है। इसमें हमने देखा कि कैसे हम शब्दों के जरिए ही नहीं बोलते, बल्कि संपूर्ण शरीर से अपने विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। इस लेखमाला की सामग्री इस विषय पर डेसमंड मोरिस नामक अंग्रेज वैज्ञानिक ने जो दो-एक अच्छी किताबें लिखी हैं, उससे ली है। जो पाठक अंग्रेजी पढ़ लेते हों वे इन दो पुस्तकों को पढ़ें –

द नेकेड एप

अर्थात, नंगा नरवानर, जिसमें मनुष्य व्यवहार का अच्छा विश्लेषण है। पुस्तक का नाम नंगा नरवानर इसलिए रखा गया है क्योंकि नरवानरों में (गोरिल्ला, चिंपैंजी, उरांगउटान और मनुष्य) केवल मनुष्य ऐसा नरवानर है जिसके शरीर पर बाल नदारद है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि ऐसा क्यों हुआ है।

मैन-वाचिंग

इस पुस्तक का नामकरण बर्ड-वाचिंग (पक्षी निरीक्षण) की तर्ज पर किया गया है, और इसमें मनुष्यों पर वैज्ञानिक सूक्ष्म दृष्टि वैसे ही डाली गई है जैसे पक्षी-निरीक्षण में पक्षियों पर डाली जाती है, यानी, इस पुस्तक में मनुष्य को कुतूहल का विषय मानकर उसकी हर छोटी-बड़ी गतिविधियों और आदतों का बारीक अध्ययन और विश्लेषण का अत्यंत रोचक रिपोर्ट है। पुस्तक पढ़ते हुए, अपने को वैज्ञानिक वीक्षण के केंद्र में पाकर बड़ा अजीब लगता है, पर हमारी अनेक आदतों और व्यवहारों का रहस्य भी खुलता जाता है। इसलिए यह पुस्तक बहुत ही रोचक है।

अगले कुछ लेखों में इन पुस्तकों के कुछ ऐसे अंशों की चर्चा करेंगे, जो मनुष्य-व्यवहार पर प्रकाश डालते हैं।

Sunday, August 09, 2009

ईश्वर को नमन क्यों?

बिना बोले बातचीत - 6

ईश्वर या हमसे बड़े एवं शक्तिशाली व्यक्ति के प्रति आदर प्रकट करने के लिए हम उनके सामने घुटने टेकते हैं (ईसाई), शरीर को झुकाते हैं (मुसलमान), या साष्टांग प्रणाम करते हैं (हिंदू)। इन सब चेष्टाओं में जो सामान्य बात है वह यह है कि हम अधिक शक्तिशाली व्यक्ति से (यानी ईश्वर से) हमारी ऊंचाई कम कर लेते हैं। कभी-कभी किसी व्यक्ति के प्रति आदर दिखाने के लिए हम अपने सिर से टोपी अथवा पगड़ी उतार देते हैं। इससे भी हमारी ऊंचाई उस व्यक्ति से कम हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि सैनिकों की सलूट मारने की क्रिया भी टोपी अथवा पगड़ी उतारने की क्रिया का ही सांकेतिक रूप है।

इसके ठीक विपरीत यदि हमें किसी व्यक्ति के प्रति अनादर दिखाना हो, तो हम अपनी ऊंचाई को उससे अधिक करने की कोशिश करते हैं। यह विशेषकर तब स्पष्ट होता है जब दो व्यक्ति झगड़ रहे होते हैं। दोनों सीना तानकर और पंजों के बल खड़े होकर अपने प्रतिद्वंद्वी से ऊंचा होने की चेष्टा करते हैं।

हम पगड़ी, टोप, हैट, मुकुट, किरीट, मोर-पंख आदि का धारण भी इसीलिए करते हैं। इससे हमारी ऊंचाई अधिक प्रतीत होती है, जिससे दूसरे लोग रौब में आ जाते हैं। पगड़ी उतारना, बेइज्जत करने के बराबर है। किसी के पैरों में अपनी पगड़ी रख देना, उसके आसमने आत्म-समर्पण करने का संकेत देता है।

इस सामान्य नियम का शायद एक ही अपवाद है। वह है दरबार जहां राजा तो बैठा होता है, जब कि उसके दरबारी खड़े होते हैं। परंतु यहां भी राजा का आसान ऊंचाई पर होता है जिससे बैठे होने पर भी वह सामने खड़े दरबारियों से अधिक ऊंचाई पर रहता है।

Saturday, August 08, 2009

हाथ मिलाने का असली अर्थ

बिना बोले बातचीत - 5

शारीरिक चेष्टाएं कुछ विशिष्ट संदर्भों में विशिष्ट अर्थ भी ग्रहण कर लेती हैं। उदाहरण के लिए नृत्य की मुद्राओं को लिया जा सकता है। प्रत्येक मुद्रा का अर्थ हमारी संस्कृति द्वारा निर्धारित होता है। एक अन्य उदाहरण परिवहन पुलिस द्वारा उपयोग में लाते शारीरिक संकेत हैं, जिनके भी अत्यंत विशिष्ट अर्थ होते हैं। इसी प्रकार गूंगे-बहरों के लिए विकसित संकेतों की भाषा लगभग उतनी ही व्यंजक होती है जितनी हमारी सामान्य भाषा, बशर्ते कि हम उन संकेतों का सही अर्थ जान जाएं। क्रिकेट के मैदान में भी अंपायर द्वारा सांकेतिक भाषा का प्रयोग होता है।

इतना ही नहीं, प्रत्येक समुदाय की सांकेतिक भाषा अपने-आप में विशिष्ट होती है। उदाहरण के लिए भारत में किसी व्यक्ति से मिलने पर हाथ जोड़कर नमस्ते किया जाता है। यूरोप आदि प्रदेशों में उससे हाथ मिलाया जाता है। जापान आदि देशों में उसके सामने झुककर उसका स्वागत किया जाता है।

प्रसंगवश हाथ मिलाने की प्रथा कैसे आरंभ हुई यह जानना रोचक रहेगा। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इसकी शुरुआत यूरोप में मध्य युग में हुई थी। तब संपूर्ण यूरोप में बख्तरबंद घुड़सवार योद्धा हथियारों से लैस होकर घूमा करते थे। जब एक योद्धा दूसरे से मिलता था जिससे वह युद्ध नहीं करना चाहता, तो वह अपने दाएं हाथ की हथेली को उसकी ओर बढ़ाता था जिसका अर्थ था, "देखो, मेरे हाथ में हथियार नहीं है। मैं मित्रता चाहता हूं". यही प्रथा विकसित होकर हाथ मिलाने की प्रथा में बदल गई।

Friday, August 07, 2009

सायास शारीरिक चेष्टाओं से बातचीत

बिना बोले बातचीत - 4

पिछले लेख में हमने देखा कि हमारे मनोभावों को अनेक शारीरक चेष्टाएं भी व्यक्त करती है। मन में किसी प्रकार के भाव आने पर उस भाव से जुड़ी शारीरिक चेष्टाएं भी दिखाई देने लगती हैं। इन्हें देखकर कोई समझ सकता है कि हमारे मन में किस तरह के भाव हैं।

इन अनायास चेष्टाओं के अलावा हम अनेक सायास चेष्टाएं भी करते हैं जो अनेक सूचनाएं देती हैं। उदाहरण के लिए हाथ की सभी उंगलियों के सिरों को मिलाकर मुंह की ओर ले जाने का अर्थ है, "मुझे खाना दो". इसी समय दूसरे हाथ से पेट को सहलाना और शरीर को थोड़ा झुका लेने का अर्थ है, "मुझे भूख लगी है, खाना दो". सिर को ऊपर-नीचे हिलाकर हम सहमति व्यक्त करते हैं और दाएं-बाएं हिलाकर असहमति। हाथों को जोड़कर किसी को नमस्ते करना तथा किसी की ओर अंगूठा दिखाना, ये दोनों सायास की गई चेष्टाएं हैं जो बहुत अर्थगर्भित हैं। इसी प्रकार आंख दबाना एक ऐसी चेष्टा है जो अनेक बातों को व्यक्त कर सकती हैं, जैसे गोपनीयता, अश्लीलता, मित्रता आदि।

हाथ हिलाकर या केवल तर्जनी को हिलाकर हम असहमति और नाराजगी व्यक्त करते हैं। खुली हथेली को खड़ाकर दिखाकर हम रुकने का संकेत करते हैं, और हथेली की एक खास प्रकार की चेष्टा करके हम किसी को आगे बढ़ जाने का संकेत दे सकते हैं। हाथ कितने वाचाल हो सकते हैं, इसे समझने के लिए ट्रैफिक पुलिसमैन द्वारा हाथों से की जानेवाली चेष्टाओं को देखना काफी है। क्रिकेट का अंपायर भी हाथ की चेष्टाओं का खूब उपयोग करते हैं।

दोनों भौंहों को ऊपर उठाकर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। एक भौंह को ऊपर उठाकर हम विनोद या कुतूहल दर्शाते हैं। भौंहों को मिलाकर हम गुस्सा जतलाते हैं।

इन सब चेष्टाओं का अत्यंत कलात्मक और परिष्कृत उपयोग नृत्य में होता है। कथकली आदि नृत्यकलाओं में इन चेष्टाओं को अधिक असरकारक बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के मुखौटे और मेकअप भी धारण किए जाते हैं।

भाषा के साथ-साथ ये सायास शारीरिक चेष्टाएं भी हमें अपने अभिप्राय को स्पष्ट करने में सहायक होती हैं। कई बार ये भाषा के पूरक भी होती हैं। उदाहरण के लिए उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब आपको कोई किसी जगह तक पहुचने के मार्ग के बारे में बता रहा है। वह शब्दों से अधिक हाथ अथवा उंगलियों द्वारा दिशा-निर्देश करता है।

(... जारी)

Thursday, August 06, 2009

मुहावरे और शारीरिक चेष्टाएं

बिना बोले बातचीत - 3
बिक्री कर्मचारी अपने ग्राहक को कोई चीज बेच पाता है या नहीं, यह ग्राहक पर उसके अच्छा प्रभाव डालने पर निर्भर करता है। चूंकि उसे ग्राहक से काम निकालना होता है, इसलिए उसमें उसके प्रति दैन्य भाव जागाना फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए वह ग्राहक से झुक-झुककर बोल सकता है, बार-बार हाथ-जोड़ सकता है और ऐसा अभिनय कर सकता है कि वह हर बात में ग्राहक से निम्न दर्जे का है। इससे ग्राहक में दया भाव जग जाएगा और वह बेची जा रही वस्तु आवश्यक न होने पर भी खरीद लेगा।

यदि बिक्री कर्मचारी ग्राहक की शारीरिक चेष्टाओं के अध्ययन से यह समझ सके कि उसके मनोभाव, स्वभाव आदि कैसे हैं, तो उसी के अनुरूप बातचीत करके उसे बहका कर उसे सामान बेच सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे शरीर की अनेक चेष्टाओं से हमारे मन की बात स्पष्ट होती है। उदाहरण के लिए व्याकुल अवस्था में हम पैरों को निरंतर हिलाते हैं, माथे से पसीना बारबार पोंछते हैं, बारबार कमीज का कालर ठीक करते हैं अथवा हाथ मलते रहते हैं। खुशी में हम अपनी मुट्ठियां हवा में उछालते हैं। निराशा जाहिर करते हुए हम एक हाथ की मुट्ठी को दूसरे हाथ की हथेली में मारते हैं। गुस्से में हम बहुधा दांतों को उभाड़कर पीसने लगते हैं। हमारी आंखें लाल हो जाती हैं तथा मुट्ठियां भींच जाती हैं। पैरों को जोर से पटकर हम गरज पड़ते हैं। ये सब चेष्टाएं हम अनायास ही करते हैं। हमारी भाषाओं के अनेक मुहावरों में इन चेष्टाओं को चित्रित किया गया है, जैसे, आंखें लाल होना, आंखे तरेरना, हाथ पर हाथ धरकर बैठना, नाक-भौं सिकोड़ना, आदि।

Wednesday, August 05, 2009

साक्षात्करों में सफलता

बिना बोले बातचीत - 2

मान लीजिए, दो उद्योगों के प्रतिनिधि व्यावसायिक समझौता करने हेतु एकत्र हुए हैं। दोनों अपनी-अपनी कंपनी के उच्च पदाधिकारी हैं और उनका ही निर्णय अंतिम होगा। इसलिए समझौते की शर्तों पर सहमति होती है या नहीं, यह इन दोनों प्रतिनिधियों पर पूरा-पूरा निर्भर करता है। पर दोनों ही प्रतिनिधि एक-दूसरे को नहीं जानते। वे पहली ही बार एक-दूसरे से मिलनेवाले हैं। समझौते का रुख एवं परिणाम बहुत कुछ दोनों प्रतिनिधियों के स्वभावों, चारित्रिक विशेषताओं, उनके आत्मविश्वास, अनुभव आदि पर निर्भर होगा। यदि इनमें से कोई भी प्रतिनिधि दूसरे के बारे में उपर्युक्त विषयों में कुछ जान सके, तो वह इस जानकारी का लाभ उठाते हुए समझौते के दौरान अपनी शर्तों को अपने प्रतिद्वंद्वी से मनवा सकता है, या उसके कठिन शर्तों से सहमत होने से बच सकता है।

इसी संदर्भ में उसकी शारीरिक चेष्टाओं का बारीकी से अवलोकन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि केवल उनकी सहायता से यह जाना जा सकता है कि वह व्यक्ति अनुभवी है या नौसिखिया, मानसिक दृष्टि से उत्तेजित अवस्था में है या सधा हुआ, आसानी से दबाव में आनेवाला है अथवा दूसरों पर दबाव डालनेवाला।

यदि उनमें से एक प्रतिनिधि बार-बार माथे का पसीना पोंछता रहता हो, अपनी शर्ट का कालर ठीक करता रहता हो या हाथ मलता रहता हो, तो स्पष्ट ही इन सबसे यही जाहिर होता है कि वह सहमा हुआ है, कम अनुभवी है और समझौते के परिणामों से आशंकित है। यदि उसकी इन सब चेष्टाओं को देखकर दूसरा प्रतिनिधि समझ जाए कि वह किस मनस्थिति में है, तो वह आसानी से इसका फायदा उठा सकता है। इसलिए उद्योगों, राष्ट्रों आदि के उच्च प्रतिनिधियों को खास प्रशिक्षण दिया जाता है कि वे अपनी ऐसी शारीरिक चेष्टाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखें जिनसे दूसरा व्यक्ति उनके मनोभावों को समझ सकता हो। कुछ अनुभवी लोग इससे आगे बढ़कर जानबूझकर ऐसी शारीरिक चेष्टाएं करते हैं जिससे कि दूसरों पर एक खास प्रकार का असर पड़े। उदाहरण के लिए वास्तव में डरा हुआ एवं आशंकित होने के बावजूद यदि कोई ऊंची आवाज में, सीना तानकर, मुट्ठियों को बार-बार हवा में उछालते हुए बोले, तो सामनेवाला इस गलतफहमी में आ सकता है कि यह तो काफी रौबीला व्यक्ति है, जबकि असलियत इसके ठीक विपरीत होगी। उसकी इस गलतफहमी का वह लाभ उठा सकता है और दूसरों को स्वयं अपनी कमजोरियों का लाभ उठाने से रोक सकता है।

अब आते हैं अधिक रोजमर्रा की एक वस्तुस्थिति में, यानी नौकरियों के साक्षात्कार। साक्षात्कारों के दौरान अधिकांश आवेदक घबराए हुए और आशंकित अवस्था में होते हैं। उन्हें यह चिंता रहती है कि क्या उन्हें नौकरी मिलेगी या नहीं, साक्षात्कार लेने वाले उनसे किस प्रकार के प्रश्न पूछेंगे, क्या वे उनका ठीक प्रकार से जवाब दे पाएंगे या नहीं। उनकी घबरहाट उनकी शारीरिक चेष्टाओं से प्रकट होती है। इसे देखकर साक्षात्कार लेने वाले समझ जाते हैं कि वे तनाव की स्थिति में हैं और उन्हें अधिक तंग करते हैं। परंतु यदि वे अपनी इन चेष्टाओं को नियंत्रण में रख सकें, तो घबराया हुआ होने पर भी अपनी घबराहट के बारे में साक्षात्कार लेने वाले जान नहीं पाएंगे, और वे इस गलतफहमी में हो जाएंगे कि यह आवेदक अधिक संतुलित एवं आत्मविश्वासी लगता है। उनकी यह धारणा उस आवेदक को नौकरी दिलाने में काफी मदद कर सकती है।

इस प्रकार शारीरिक चेष्टाओं तथा उनके द्वारा व्यक्त मनोभावों की जानकारी लाभदायक हो सकती है।

(... जारी)

Tuesday, August 04, 2009

बिना बोले बातचीत -1

राजनीतिकों, अभिनेताओं, कूटनीतिज्ञों, बिक्री कर्मचारियों व अन्य अनेक व्यवसायी लोगों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपने प्रतिद्वंद्वियों के हावभावों, उनके अव्यक्त विचारों व मनस्थिति का कितना सटीक आंकलन कर पाते हैं। इसके लिए इन सभी लोगों को मनुष्य की शारीरिक चेष्टाओं, खास करके उनके चेहरे के हावभावों, पर विशेष ध्यान देना पड़ता है, क्योंकि ये अनायास ही मन के विचारों का खुलासा करते हैं। आजकल प्रबंधकों, कूटनीतिज्ञों, बिक्री कर्मचारियों आदि को तैयार करते समय उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे किस प्रकार मनुष्यों की शारीरिक चेष्टाओं के आधार पर उनके मन के अव्यक्त भावों को समझ सकते हैं। मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा इस विषय को लेकर चलती है और उसका मुख्य उद्देश्य है मनुष्य की हर शारीरिक चेष्टा का वैज्ञानिक अध्ययन करके उसके द्वारा व्यक्त विचार, स्वभाव, हाव-भाव, मनस्थिति आदि के बारे में अधिकाधिक जानना।

यों तो यह कोई नई विद्या नहीं है। साहित्य से परिचित व्यक्ति भाव और अनुभाव के सिद्धांत से अनभिज्ञ नहीं होंगे। भाव यानी मनस्थिति, जैसे, क्रोध, लज्जा, भय, विस्मय, जुगुप्सा, आदि, और अनुभाव यानी ऐसी शारीरिक चेष्टाएं जो मन पर किसी भाव के हावी हो जाने पर प्रकट होती हैं। उदाहरण के लिए क्रोधित होने पर भुजाएं फड़क उठती हैं, आंखें लाल हो जाती हैं, छाती फूल जाती है, मुट्टियां भींच जाती हैं, आदि। इसी प्रकार लज्जा अनुभव होने पर आंखें झुक जाती हैं, चेहरा लाल हो जाता है और हाथों की उंगलियां मली जाती हैं। इन सब चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं। कवि एवं साहित्यकार भाव-अनुभाव का काफी बारीकी से अध्ययन करते हैं क्योंकि इनकी अच्छी जानकारी के बिना नायक-नायिका आदि के मनोभावों को ठीक प्रकार से प्रकट नहीं किया जा सकता।

परंतु आजकल इस विद्या की उपयोगिता केवल कवि और सहृदय तक सीमित नहीं रह गई है। कोई भी व्यक्ति जिसे दूसरे मनुष्यों से काम पड़ता हो, चाहे वह खरीदारी पर निकली गृहणी हो या राष्ट्र का नायक, इस विद्या का लाभ उठाकर अपने कामों को अधिक कारगर ढंग से सिद्ध कर सकता है।

आइए इस लेख माला में इस अनोखे विज्ञान पर कुछ अधिक चर्चा करें।

(... जारी)

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट