Wednesday, July 15, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : सहमति

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

पहले सोचा था कि डा. रामविलास शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना करते हुए राहुल जी की निराधार धारणाओं के उदाहरणों का जो ढेर लगाया है, उसका विस्तार से चर्चा करूं, पर अब सोचता हूं कि इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। आपको ही इतिहास दर्शन में इन्हें पढ़ लेना होगा। मेरा उद्देश्य डा. रामविलास शर्मा की इस महत्वपूर्ण पुस्तक की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना भर है।

प्रसंगवश कह दूं कि इस पुस्तक में ऋग्वेद चर्चा (प्रथम अध्याय) और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना (अंतिम अध्याय) के अलावा यूनानी दार्शनिक परंपरा के अंतर्विरोधों का भी सांगोपांग विवेचन हुआ है और डा. शर्मा ने प्लैटो, अरस्तू, सुकरात, देमोस्थेनेस आदि के दर्शनों पर भी इसी तरह आलोचनात्मक दृष्टि डाली है। इसके साथ-साथ सिकंदर का भारत से पलायन, यूनान और यूरोप के दार्शनिक संबंध, भारत-यूनान-यूरोप के संबंध आदि पर भी नई दृष्टि से विचार किया है।

अंत में मैं इतिहास दर्शन के राहुल संबंधी अध्याय के "उपसंहार" से कुछ अंश यहां उद्धृत करता हूं, जिसमें डा. शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की उपयोगी धारणाओं को रेखांकित किया है। उन्हीं के शब्दों में –

उनके (यानी राहुल जी के) लेखन में पूर्वाग्रहों और निराधार कल्पनाओं की ऐसी भरमार है कि उनमें उनकी थोड़ी-सी सही धारणाएं भी खो जाती हैं। पर वे महत्वपूर्ण हैं और उनमें से कुछ को मैं यहां दुहरा रहा हूं।

“वैदिक ऋषि यथार्थवादी थे। वे दुनिया को जैसा देखते थे, वैसा मानते थे और उसमें अधिक से अधिक आनंद उठाना चाहते थे।” – मानव समाज

“उपनिषदकार स्वयं, यज्ञों के व्यर्थ के लंबे-चौड़े विधि-विधान के विरुद्ध एक नई धारा निकालने वाले थे।” – दर्शन दिग्दर्शन

“पुनर्जन्म के दार्शनिक पहलू को और मजबूत करते हुए बुद्ध ने पुनर्जन्म का पुनर्जन्म प्रतिसंधि के रूप में किया... बुद्ध ने कर्म के सिद्धांत को और मजबूत किया” – वहीं

“प्रतीत्य समुत्पाद कार्यकारण को अविच्छिन्न नहीं विच्छिन्न प्रवाह मानता है। प्रतीत्य समुत्पाद के इसी विच्छिन्न प्रवाह को लेकर आगे नागार्जुन ने अपने शून्यवाद को विकसित किया।” - वहीं

“नागार्जुन का दर्शन – शून्यवाद – वास्तविकता का अपलाप करता है। दुनिया को शून्य मानकर उसकी समस्याओं के अस्तित्व से इन्कार करने के लिए इससे बढ़कर दर्शन नहीं मिलेगा।” – वहीं

“वादरायण ने कहीं भी जगत को माया या काल्पनिक नहीं माना है और न उनके दर्शन से इसकी गंध भी मिलती है कि ‘ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है’।” – वहीं

“शंकर के ब्रह्म अद्वैतवाद और सूफियों के अद्वैतवाद में कोई अंतर नहीं है।” – वहीं

“छोटे-छोटे सामंत राज्यों को विशाल राज्यों में परिवर्तित करने में बनियों का हाथ भी रहा है। हम छठी-सातवीं ई.पू., में मगध (दक्षिण बिहार) के सौदागरों को रावलपिंडी, भड़ौच, तक्षशिला, ताम्रलिप्ति अपना सार्थ लेकर क्रय-विक्रय करते देखते हैं।” – मानव समाज

“व्यापारवाद का जोर भारत तथा दूसरे एशियाई देशों में बहुत पहले से चला आता था। जावा, चीन, अरब और अफ्रीका (मिस्र) के साथ सीधा व्यापार-संबंध भारतीय व्यापारियों ने उस वक्त स्थापित किया था, जब कि अभी अरबों और आज की यूरोपीय जातियों का नाम तक सुना नहीं जाता था।” – वहीं

“सारे संघ की राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त हिंदी का अपना विशाल क्षेत्र है। हरियाणा, राजपूताना, मेवाड़, मालवा, मध्य प्रदेश, युक्त प्रांत और बिहार हिंदी की अपनी भूमि है। यही वह भूमि है जिसने हिंदी के आदिम कवियों सरह, स्वयंभू आदि को जन्म दिया। यही भूमि है, जहां अश्वघोष, कालिदास, भवभूति और बाण पैदा हुए। यही वह भूमि है जहां कुरु (मेरठ-अंबाला) और पांचाल (आगरा, रुहेलखंड) की भूमि में वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज ने ऋग्वेद के मंत्र रचे, और प्रवाहण, उद्दालक और याज्ञवल्क्य ने अपनी दार्शनिक उड़ानें कीं।” – हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयास का अध्यक्षीय भाषण

इन स्थापनाओं से भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने में सहायता ली जा सकती है।


डा. शर्मा ने अपने अनेक पुस्तकों में इतनी सारी उपयोगी विचार दिए हैं कि यदि उन्हें ईमानदारी से कार्यान्वित किया गया होता तो आज की बहुत सी समस्याओं का निराकरण हो जाता। इनमें शामिल हैं, सांप्रदायिकता, जातियतावाद, अंग्रेजी का प्रभुत्व, देश का विदेशी पूंजी के अधीन हो जाना, हिंदी-उर्दू का विवाद, भारत का विखंडन और उससे जुड़ी विकट राजनीतिक मसले (जैसे आजकल का आतंकवाद), इत्यादि।

उनकी अपनी पीढ़ी से तो यह न किया जा सका, अब आशाएं युवा पीढ़ी से है कि वह उनकी पुस्तकों का वाचन करके उनके विचारों को आत्मसात करेगी और उन्हें क्रियान्वित करेगी।
इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

Tuesday, July 14, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : ऋग्वेद के दार्शनिक महत्व का अवमूल्यन

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

राहुल जी में जो अनेक अंतर्विरोध हैं, उनमें से एक ऋग्वेद के दार्शनिक महत्व को लेकर है। वे ऋग्वेद को दार्शनिक दृष्टि से महत्वहीन मानते हैं, पर उनके ही विवेचन से ऋग्वेद का असाधारण दार्शनिक महत्व स्पष्ट होता है। पढ़िए डा. शर्मा के ही शब्दों में –

दर्शन-दिग्दर्शन में जो बात सबसे पहले उभरकर सामने आती है, वह यह है कि बौद्ध धर्म के उद्भव से पहले यहां एक शानदार दार्शनिक परंपरा थी और उसे हम धर्मनिरपेक्ष कह सकते हैं। उसमें उपासना का अभाव नहीं है किंतु स्वतंत्र चिंतन उसकी विशेषता है। वह दर्शन रूढ़िबद्ध नहीं है। उसमें अनेक धाराएं हैं। विशेष बात यह कि वह संसार को सत्य मानता है। उसे हम यथार्थवादी दर्शन कह सकते हैं। राहुल जी ने ‘बुद्ध के पहले के दार्शनिक’ शीर्षक देकर सबसे पहले चर्वाक का नाम लिया है। उनकी विचारधारा का सारांश यह बताया है : “ईश्वर नहीं, आत्मा नहीं, पुनर्जन्म और परलोक नहीं जीवन के भोग त्याज्य नहीं ग्राह्य हैं। अनुभव और बुद्धि को हमें सत्य के अन्वेषण के लिए अपना मार्गदर्शन बनाना चाहिए।“ यहां कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विरोध किसी यथार्थवादी दार्शनिक से हो। यह भौतिकवादी दर्शन है और इसकी बुनियाद, राहुल जी के अनुसार, बुद्ध से पहले डाली जा चुकी है। चर्वाक से और पहले भी यहां दार्शनिक परंपराएं थीं। सबसे पहले यहां ऋग्वेद की दार्शनिक परंपरा है। देखना चाहिए राहुल जी ऋग्वेद के दर्शन के बारे में क्या कहते हैं।

कहते हैं, “जिसे हम दर्शन कहते हैं, वह वैदिक काल में दिखलाई नहीं पड़ता।” इस तरह ऋग्वेद में यदि कोई दर्शन था, तो उसका सफाया हो गया। किंतु उसी पृष्ठ पर वह ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त से लंबा उद्धरण देते हैं। और उद्धरण के बाद कहते हैं, “यहां हम उन प्रश्नों को उठते हुए देखते हैं, जिनके उत्तर आगे चलकर दर्शन की बुनियाद कायम करते हैं। विश्व पहले क्या था? इसका उत्तर किसी ने सत अर्थात वह सदा से ऐसा ही मौजूद रहा – दिया। किसी ने कहा कि वह असत, नहीं मौजूद, अर्थात सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। इस सूक्त के ऋषि ने पहले वाद के प्रतिवाद का प्रतिवाद (प्रतिषेध) करके – ‘नहीं सत था नहीं असत -’ द्वारा अपने संवाद को पेश किया।" यदि ऋग्वेद में वे बुनियादी प्रश्न प्रस्तुत किए गए हैं, जिनसे आगे का दर्शन विकसित होता है, तो यह भी ऋग्वेद का दार्शनिक महत्व है। यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें दर्शन का नितांत अभाव है। इसके सिवा तर्क पद्धति में यह बात ध्यान देने की है कि पहले स्थापना है, फिर प्रतिस्थापना है; दोनों के बाद एक नई संस्थापना है। राहुल जी ने इसी को प्रतिवाद का प्रतिवाद कहा है और अंत में जो निष्कर्ष निकलता है, उसे संवाद कहा है। इसका अर्थ यह है कि जिसे डायलेक्टिक्स या द्वंद्ववाद कहते हैं, उसकी शुरुआत ऋग्वेद में हो चुकी है। यह ऋग्वेद का असाधारण महत्व है।

डा. रामविलास शर्मा ने ऋग्वेद का गहन अध्ययन किया है। ऋग्वेद को वे हिंदी जाति का आदि ग्रंथ मानते हैं और उसके अध्ययन में उन्होंने दस वर्ष बिताए। इसके आधार पर उन्होंने कई ग्रंथ रचे, जिनमें से एक इतिहास दर्शन भी है। भाषा और समाज और भारत के भाषा परिवार और हिंदी (तीन खंड) में भी ऋग्वेद की खूब चर्चा है। इतिहास दर्शन के प्रथम अध्याय में उन्होंने ऋग्वेद और उसे रचनेवाले ऋषियों पर अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया है। इस अध्याय में उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ऋग्वेद के संबंध में फैलाई गई भ्रांत धारणाओं का खंडन किया है। वे ऋग्वेद को सिंधु घाटी सभ्यता से पहले की चीज मानते हैं, और उसे 5 से 10 हजार साल पहले का साहित्य मानते हैं। विदेशी विद्वान उसे ईसा पूर्व 1500 के आसपास बताते हैं, यानी 3-3.5 हजार साल पुराना।

ऋग्वेद के संबंध में डा. शर्मा की कुछ महत्वपूर्ण मान्यताएं ये हैं –

  • ऋग्वेद वर्णाश्रम धर्म के प्रकट होने से पहले रचा गया है। उसमें ब्राह्मण, शूद्र के विभाजन का कोई संकेत नहीं है।
  • ऋग्वेद मात्र धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि उसमें हमारे पूर्वजों का इतिहास और स्मृतियां भी हैं।
  • ऋग्वेद रचने वाले ऋषि कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि यहीं के लोग थे।
  • सिंधु घाटी सभ्यता ऋग्वेदिक आर्यों के बाद की चीज है और दोनों में घनिष्ट संबंध है।
  • ऋग्वेदिक आर्यों की संस्कृति के अंश व्यापार, दिग्विजय आदि के कारण ईरान, यूनान, जर्मनी, मध्य एशिया आदि में फैले, जिसके प्रमाण हैं इन जब जगहों में पाई जानेवाली भाषाओं में संस्कृत के शब्दों का मिलना। पाश्चात्य विद्वानों ने गंगा की धारा को उल्टा बहाकर यह प्रमाद फैलाया कि आर्य मध्य एशिया से भारत आए। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अंग्रेजों द्वारा भारत के उपनिवेशीकरण को सही ठहराना चाहते थे और यहां के जन-समुदाय में फूट डालना चाहते थे। राहुल सांकृत्यायन जैसे कुछ देशी विद्वानों ने भी पाश्चात्य विद्वानों के इस द्वेषपूर्ण प्रचार को बिना सोचे-समझे अपना लिया। डा. शर्मा कहते हैं कि यह धारणा देश की एकता के लिए काफी घातक है क्योंकि इससे यह अर्थ भी निकलता है कि आर्य लोगों ने यहां के लोगों को मारकर दक्षिण की ओर खड़ेद दिया और उन्हें शूद्र बनाया। इस गलत धारणा को दक्षिण की द्रविड पार्टियों ने अपना लिया था और वे दक्षिण में इसी के आधार पर अलग देश की मांग भी करने लगी थीं। हिंदी विरोध में भी इस धाराणा का उपयोग किया जाता है। इसलिए आर्यों के बाहर से आने की भ्रांत धारणा को खारिज करना देश की एकता के लिए बहुत जरूरी है। हमारा सौभाग्य है कि डा. शर्मा जैसे विद्वानों के प्रयास से अब बहुत कम लोग ऐसे रह गए हैं जो इस बात को मानते हैं कि आर्य बाहर से आए थे।
  • आर्यों के बाहर से आने की धारणा को सबसे अधिक पाश्चात्य भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में माना गया है। भारत के विश्वविद्यालयों में भाषा विज्ञान के विभागों में भी इस गलत धारणा का बहुत अधिक प्रभाव है। दरअसल यहां जो भी भाषा वैज्ञानिक शोध होता है, वह पाश्चत्य विश्वविद्यालयों द्वारा नियत मानदंडों के अनुसार होता है, जो हमारे देश के हित में नहीं है। डा. शर्मा ने अपनी पुस्तकों के जरिए भाषा विज्ञान के अध्ययन के लिए नई राहें काटकर दी हैं। उन्होंने किशोरीदास वाजपेयी जैसे देशी वैयाकरणों के काम को आगे बढ़ाया है। दुख की बात यही है कि देशी विश्वविद्यालयों ने उनके इस पथ-प्रशस्तक कार्य को अब भी महत्व नहीं दिया है। हिंदी जाति की उन्नति के लिए डा. शर्मा की इन मान्यताओं के महत्व को देखते हुए, जनता को ही अपने-अपने स्तर पर उनका अध्ययन करना चाहिए और उसे आगे बढ़ाना चाहिए।


इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

(... जारी)

Monday, July 13, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : दर्शन और धर्म का घालमेल

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा


डा. शर्मा ने राहुल जी के विचारों के विवेचन के लिए उनके जिन ग्रंथों को चुना है, वे ये हैं –

  1. अकबर
  2. ऋग्वेदिक आर्य
  3. जय यौधेय
  4. दर्शन दिग्दर्शन
  5. दिमागी गुलामी
  6. दिवोदास
  7. मानव समाज
  8. विविध प्रसंग
  9. वैज्ञानिक भौतिकवाद
  10. वोल्गा से गंगा
  11. संस्कृत काव्यधारा
  12. साम्यवाद क्यों?
  13. सिंह सेनापति

इस लेख माला को ठीक से समझने के लिए आपको पहले इन किताबों को पढ़ लेना चाहिए।

राहुल जी की सबसे महत्वपूर्ण दर्शन ग्रंथ दर्शन-दिग्दर्शन है। डां. शर्मा ने उसका बारीकी से अध्ययन करके उनमें विद्यमान अंतर्विरोधों को उजागर किया है। वे कहते हैं कि इस ग्रंथ में राहुल जी ने बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश की है, और इसके लिए उन्होंने भारत की बौद्धेतर दार्शनिक परंपराओं का मूल्य कम आंका है। इतना ही नहीं राहुल जी पर पाश्चात्य विद्वानों का अत्यधिक प्रभाव है और उन्होंने इन विद्वानों की अनेक भ्रांत और द्वेषपूर्ण धारणाओं को बिना विचारे अपना ही नहीं लिया है, अपनी उर्वर कल्पनाशीलता से काम लेते हुए उन्हें और पुष्ट भी किया है, विशेषकर अपने उपन्यासों और कहानियों में।

अपनी पुस्तक दर्शन-दिग्दर्शन में राहुल जी भारतीय दर्शन परंपरा की चर्चा केवल आठवीं-नौवीं सदी तक ही करते हैं पर पाश्चात्य दर्शन परंपरा को प्लेटो के समय से लेकर ठेठ आधुनिक समय तक खींच लाते हैं। इससे भारतीय दर्शन शास्त्र अपनी पूरी भव्यता के साथ इस किताब में नजर नहीं आता। इतना ही नहीं भारत में दर्शन हमेशा से धर्म-निरपेक्ष रहा है, पर राहुल जी धर्म और दर्शन का घाल मेल कर देते हैं, और भारतीय दर्शन परंपरा को हिंदू परंपरा, बौद्ध परंपरा, जैन परंपरा, मुसलमान परंपरा आदि में बांटकर उसके वैभव को नष्ट कर देते हैं। पर यही नीति वे पाश्चात्य दर्शन के संबंध में नहीं करते, जिनके कई प्रवर्तक खुलेआम धर्माचार्य भी थे। इससे पाश्चात्य दर्शन उनकी किताब में धर्म-निरपेक्ष के रूप में दिखाई देता है, जब भारतीय दर्शन धर्म से बंधा हुआ। यह भी राहुल जी पर पाश्चात्य चिंतन के अत्यधिक प्रभाव का एक उदाहरण है।

दर्शन दिग्दर्शन की भूमिका के आरंभ में राहुल जी ने राधाकृष्णन का यह वाक्य उद्धृत किया है –
“प्राचीन भारत में दर्शन किसी भी दूसरी साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न हो, सदा एक संवतंत्र स्थान रखता रहा है।”


इस पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं -
“भारतीय साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न रहा हो किंतु धर्म का लग्गू-भग्गू तो वह सदा से चला आता है और धर्म की गुलामी से बदतर गुलामी और क्या हो सकती है?”


इस पर डा. शर्मा अपनी पुस्तक इतिहास दर्शन में यह टिप्पणी करते हैं –

पाश्चात्य लेखक अक्सर भारत में दर्शन का अस्तित्व अस्वीकार करते हैं। उनका तर्क होता है भारत में धर्म तो है लेकिन विवेकसम्मत दर्शन नहीं है। राहुल जी ने उन्हीं की बात अपने शब्दों में दुहराई है। यदि भारतीय दर्शन धर्म का पिछलग्गू बना रहा तो इसमें बौद्ध दर्शन भी शामिल होगा। यदि धर्म की गुलामी से बतदर और कोई गुलामी नहीं है, तो इस गुलामी के शिकार स्वयं राहुल सांकृत्यायन भी थे। इसलिए कि वे बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन में सदा फर्क नहीं करते। बोद्ध दर्शन ही नहीं, बौद्ध धर्म के प्रति उनका आग्रह कभी-कभी विवेक की सीमा पार कर जाता है। राहुल जी में अनेक अंतर्विरोध हैं। इन अंतर्विरोधों को ध्यान में रखते हुए उनका मूल्यांकन करना चाहिए।


इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.


(...जारी)

Sunday, July 12, 2009

राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

पिछले एक पोस्ट, क्या ब्लोग साहित्य है? में मैंने राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं के बारे में डा. रामविलास शर्मा के मत का जिक्र किया था, जो उन्होंने अपनी पुस्तक इतिहास दर्शन के "इतिहास दर्शन और राहुल सांकृत्यायन" वाले अध्याय में व्यक्त किए हैं।

यह पुस्तक वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

इस लेख पर जो टिप्पणियां प्राप्त हुईं उनमें से दो टिप्पणियों में इस उल्लेख के बारे में क्षोभ व्यक्त किया है। एक टिप्पणी स्मार्ट इंडियन की है और दूसरी अजित वडनेरकर की।

इस मामले में मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी लग रहा है ताकि यह धारणा न बने कि मैं राहुल सांकृत्यायन जैसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण हिंदी साहित्यकार के प्रति अवज्ञा या अनादर रखता हूं। बात ऐसी नहीं है। मेरे लिए सभी हिंदी साहित्यकार आदरणीय और पूज्य हैं, पर मैं उन्हें और उनके साहित्य को अलग-अलग समझता हूं। साहित्यकारों की हिंदी सेवा के सामने नत-मस्तक होते हुए भी मैं उनके साहित्य को स्वतंत्र दृष्टि से देखने-परखने का पक्षधर हूं। साहित्य समय-सापेक्ष होता है और उसमें साहित्यकार के पूर्वाग्रह, उसके समय के ज्ञान की सीमाएं, उसकी परिस्थितियां आदि का अनिवार्य प्रभाव पड़ता है। इन सब प्रभावों से नियंत्रित होकर वह जो साहित्य रचता है, उसके कुछ या अधिक अंश ऐसे भी हो सकते हैं जो बाद की पीढ़ियों के लिए अनिष्टकारी हों। इसलिए किसी साहित्य को ग्रहण करने से पहले उसे भली-प्रकार ठोंक-बजा लेना बुद्धिमानी है। साहित्य का हम पर काफी गहरा असर पड़ता है और वह हमारे सोचने-जीने के नजरिए को बदलने की ताकत रखता है। इसलिए किसी साहित्य को अपनाते समय यह जान लेना जरूरी है कि वह हम पर किस तरह का प्रभाव डाल सकता है।

हमारे यहां एक दुखद प्रवृत्ति देखी जाती है कि हम “बड़े” लोगों को, चाहे वे साहित्यकार हों या नेता, पूजनीय बनाकर किसी चबूतरे पर बिठा देते हैं और उनके साहित्य को पढ़ना या उनके उपदेशों पर आचरण करना जरूरी नहीं समझते। राहुल सांकृत्यायन जैसे साहित्यकारों की रचनाओं पर आलोचनात्मक दृष्टि डालकर इस प्रवृत्ति को कमजोर किया जा सकता है। मैं चाहता हूं कि लोग राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को पढ़ें और पढ़ते वक्त अपनी क्षीर-नीर बुद्धि को भी साथ में रखें।

स्मार्ट इंडियन और अजित वडनेरकर की टिप्पणियों का स्पष्टीकरण मुझे डा. शर्मा की उक्त पुस्तक के अंश देकर करना होगा। यह काम अनेक पोस्टों में करना पड़ेगा अन्यथा बात बहुत नीरस हो जाएगी।

डा. शर्मा बड़े ही गंभीर समालोचक हैं और उनकी लेखनी को चंद पस्टों में समेटना खतरे से खाली नहीं है। उससे अतिसरलीकरण हो सकता है और उनकी मूल भावना विकृत हो सकती है। इसलिए पाठकों से मेरा निवेदन है कि इस लेख माला को एक संकेत मात्र मानकर उनकी किताब इतिहास दर्शन को ही पढ़ने की कोशिश करें, और उसी के आधार पर अपना मत बनाएं, न कि मेरे इन लेखों के आधार पर।

एक दूसरी बात भी कहना आवश्यक है। डा. शर्मा के विचार उनके अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े हैं। जो विचार बीज रूप में एक किताब में आए हैं, उन्हें उनकी किसी अन्य किताब में और उन्मीलित किया गया है। इसलिए उनकी विचारधारा को समझने के लिए आपको उनकी संपूर्ण रचनावली को पढ़ना पड़ेगा। यह काम आपके लिए आसान नहीं होगा क्योंकि डा. शर्मा ने अपने लंबे और अत्यंत अनुशासित एवं कर्मठ जीवनकाल में लगभग 100 किताबें लिखी हैं, हिंदी साहित्य, हिंदी जाति, हिंदी साहित्यकार, राजनीति, इतिहास, कूटनीति आदि पर। अब तक किसी प्रकाशक ने इन सबको संकलित करके एक रचनावली के रूप में प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं दिखाई है, हालांकि उनकी अधिकांश किताबें राजकलम प्रकाशन, दिल्ली और वाणी प्रकाशन, दिल्ली से निकली हैं। ये हिंदी के चोटी के प्रकाशन-गृह हैं और सभी बड़े हिंदी पुस्तक विक्रय केंद्रों में इनकी किताबें मिलनी चाहिए। आप डाक से भी किताबें मंगा सकते हैं। इसलिए आपको उनकी किताबों को प्राप्त करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

पर डा. शर्मा की पुस्तकों को अवश्य पढ़ें, आपका पूरा नजिरया ही बदल जाएगा कई मामलों के बारे में और आजकल की राजनीति, सामाजिक जीवन, साहित्य आदि से जुड़ी अनेक गुत्थियां आपके लिए खुल जाएंगी।

तो शुरू करते हैं, राहुल सांकृत्यायन की पुस्तकों पर डा. शर्मा की समालोचना से परिचय प्राप्त करना।

डा. शर्मा इतिहास दर्शन की भूमिका में लिखते हैं –

राहुल जी हिंदी के माध्यम से जनता में ज्ञान-विज्ञान का प्रसार करना चाहते थे, हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध करना चाहते थे। पर हिंदी भाषियों के जातीय विकास की रूपरेखा उनके सामने अस्पष्ट थी, इस विकास में जनपदों और संप्रदायों की भूमिका अस्पष्ट थी। साहित्यिक हिंदी का विकास अधिकतर पूर्वी जनपदों में हुआ था पर इन्हें एक ही जातीय प्रदेश के अंतर्गत न मानकर वह उन्हें स्वतंत्र जातीय क्षेत्रों के रूप में पुनर्गठित करना चाहते थे। उनका यह प्रयास बौद्धकालीन भारत के मानचित्र से प्रेरित था। जातीय संस्कृति की रूपरेखा स्पष्ट न होने से राहुलजी हिंदू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति की बात करते थे, हिंदी का संबंध हिंदुओं से उर्दू का संबंध मुसलमानों से जोड़ते थे। अंग्रेजी राज कायम होने से पहले दरबारी साहित्य में और दरबारों के बाहर रचे जाने वाले साहित्य में हिंदू और मुसलमान एक साथ हैं। राहुलजी की दृष्टि से यह इतिहास ओझल रहता है। उर्दू और हिंदी दो भाषाएं नहीं हैं, उनमें क्रियापदों, सर्वनामों आदि की बुनियादी एकता है, काफी परिमाण में राष्ट्रीय और जनवादी साहित्य उर्दू में भी लिखा गया है, हिंदी के अनेक लेखक उर्दू के लेखक भी थे - इन तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है। राहुलजी की मान्यताएं समाजसंबंधी हमारी आज की धारणाओं को प्रभावित करती हैं, इसलिए उनका विवेचन प्रासंगिक है।

इसके बाद डा. शर्मा ने राहुल जी की साहित्यिक यात्रा का संक्षिप्त परिचय देकर उसके दो पहलुओं का विशद विवेचन किया है, जो हैं, इतिहास और दर्शन।

आगे के पोस्टों में मैं उनके विवेचन के केवल कुछ चुने हुए अंशों को प्रस्तुत करूंगा। बाकी आपको वहीं पढ़ना पड़ेगा।

(...जारी)

Friday, July 10, 2009

क्या ब्लोग साहित्य है?

आजकल ब्लोगजगत में एक बहस खूब उफान ला रहा है - क्या ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है?

कुछ लोग साहित्य और ब्लोग की तुलना को हंस और कौए को एक पांत में बिठाना कह रहे हैं, तो कोई पलटवार करके साहित्य को ही कागज में छपा बासी ब्लोग बता रहे हैं।

ब्लोगजगत को यह विषय इतना गंभीर लग रहा है कि उस पर एक बकायदा संगोष्ठि ही की जा रही है आज रायपुर में। अध्यक्ष हैं, छींटें और बौछारें के सुपरिचित ब्लोगर श्री रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी)।

तो सच क्या है, ब्लोग साहित्य है या नहीं? जानिए जयहिंदी का दृष्टिकोण।

साहित्य वह चीज है जिसमें किसी जाति (जाति शब्द को अंग्रेजी के नेशनैलिटी के समतुल्य के रूप में यहां प्रयोग किया गया है) के लोग अपनी आकांक्षाओं, सपनों, इच्छाओं, भावों और आहों की झलक पाते हैं। उसका लिखित होना जरूरी नहीं है, वेद सहित अधिकांश साहित्य मौखिक ही रहे हैं, और यही स्थिति अब भी बनी हुई है, लोक साहित्य को देखिए।

साहित्य जनता की आवाज होता है। वह जनता को प्रेरणा देता है, सही दिशा दिखाता है, सांत्वना देता है, उसका उत्साह बढ़ाता है, उसका मनोरंजन करता है और उसकी अभिरुचियों का परिष्कार करता है। थोड़े शब्दों में कहें, तो साहित्य जन-कल्याणकारी होता है। स्वांतः सुखाय जो लिखा जाता है वह अधिकांश में श्रेष्ठ साहित्य की कोटि में नहीं आता। इसी तरह जो किसी छिपे एजेंडा को लेकर लिखा जाता है, वह प्रोपेगैंडा है, साहित्य नहीं, और उसका उद्देश्य किसी खास वर्ग के हितों को बढ़ावा देना होता है, न कि समस्त जन-समूह का। इसके उदाहरण के स्वरूप हम रुड्यार्ड किप्लिंग को ले सकते हैं। उन्होंने खूब लिखा है और वे अंग्रेजी के प्रख्यात साहित्याकार भी माने जाते हैं। उन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला है। पर उनका सारा साहित्य अंग्रेजों के साम्राज्यवाद को सही ठहराने के उद्देश्य से लिखा गया है, और वह उपनिवेशी समुदायों को दोयम दर्जे का सिद्ध करने का प्रयास मात्र है।

रुड्यार्ड किप्लिंग का उदाहरण महत्वपूर्ण है। उनके समय में उन्हें एक बहुत भारी साहित्यकार माना जाता था, पर जब बाद में उनके लिखे का बारीक विश्लेषण किया गया, तो उनमें निहित द्वेषात्मक अंश बाहर आने लगे और अब वे पूर्णतः डिसक्रेडिट हो चुके हैं।

यदि हींदी का ही उदाहरण लेना हो, तो हम राहुल सांकृत्यायन को ले सकते हैं। रुड्यार्ड किप्लिंग के ही समान उन्होंने भी खूब लिखा है, और उन्हें अपने समय में एक बहुत बड़ा साहित्यकार माना जाता था। पर बाद में जब उनके साहित्य का विश्लेषण किया गया, तो पाया गया कि उसके कई अंश घोर नस्लवादी हैं। उनमें गलत और अहितकारी जानकारी की भरमार है - उदाहरण के लिए, वे यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि आर्य यूरोप से भारत आए थे, बौद्ध धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म है, बौद्ध धर्म का क्षणिकवाद मार्क्सवाद ही है, इत्यादि। डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास दर्शन’ में राहुल सांकृत्यायन की संपूर्ण रचनावली का सूक्ष्म विश्लेषण करके दिखाया है कि इस लेखक की मान्यताएं भारतीय राष्ट्र की उन्नति के लिए कितनी घातक साबित हो सकती हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण सीख हमें मिलती है। कोई लेखन श्रेष्ठ साहित्य तभी बनता है, जब उसमें जन-कल्याणकारी प्रवृत्ति हो, और जो समय की कसौटी पर खरा उतरे। रुड्यार्ड किप्लिंग या राहुल सांकृत्यायन की रचनाएं दोनों कसौटियों पर फेल हो जाती हैं।

इससे एक और बात स्पष्ट होती है। सब सुंदर लेखन श्रेष्ठ साहित्य हो, यह जरूरी नहीं है। रुड्यार्ड किप्लिंग या राहुल सांस्कृत्यायन की रचनाएं बहुत सुंदर कला कृतियां हैं, पर मात्र इससे वे श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाएं नहीं बन जातीं, क्योंकि उनमें सौदर्य के साथ-साथ अकल्याणकारी विष की बूंदें भी मौजूद हैं। हां, यह जरूर है कि सब श्रेष्ठ साहित्य सुंदर भी होता ही है, रामचरितमानस को ही ले लीजिए। सुंदर होना साहित्य का आवश्यक गुण है, पर वह पर्याप्त नहीं है। श्रेष्ठ साहित्य होने के लिए किसी रचना को सुंदर होने के साथ-साथ जन-कल्याणकारी भी होना चाहिए। इसे हम आचार्य रामचंद्र शुल्क के शब्दों में यों कह सकते हैं, श्रेष्ठ साहित्य वह है जिससे लोक-मंगल की साधना हो।

इस कठिन कसौटी पर कसा जाए, तो बहुत कुछ जो लिखा जा रहा है, चाहे वह ब्लोगों में हो, या पुस्तकों में या पत्र-पत्रिकाओं में, अंग्रेजी में, या हिंदी में, वह श्रेष्ठ साहित्य कहलाने के लायक नहीं है।

बात शुरू हुई थी, इस सवाल से कि क्या ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है?

यदि ऊपर के विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह सवाल जरा प्रिमेचर लगता है। आखिर हिंदी ब्लोग हैं ही कितने पुराने, यही चार-छह साल। इतने कम समय में उनमें कोई स्थायी महत्व की सामग्री आई भी है यह कहना मुश्किल है। यदि आज ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह बीस-पच्चीस साल बाद भी पढ़ा जाता रहे, तब इस पर विचार किया जा सकता है कि वह साहित्य कहलाने लायक है या नहीं। और तब भी कसौटी वही रहेगी, क्या वह लेखन जन कल्याणकारी है? क्या उसमें लोक-मंगल की साधना है? क्या उसमें प्रोपेगैंडा या किसी विशेष वर्ग के हित-साधन का प्रयास तो नहीं है? क्या वह स्वांतः सुखाय लिखा गया है?

इसलिए ब्लोग में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है या नहीं, इसकी चिंता अभी न करके, ब्लोगों में श्रेष्ठ सामग्री भरने की ओर हमें ध्यान देना चाहिए। साहित्य बहुत ऊंची चीज है, और हर ठेले हुए लेखन को उसके स्तर पर उठाया नहीं जा सकता। पर हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि हम अच्छा लिखें, सुंदर लिखें, कल्याणकारी चीजें लिखें। ऐसे लेखन के साहित्य के स्तर के बनने की संभावना अधिक है। और यह ब्लोगों पर ही नहीं, अन्य प्रकार के लेखनों पर भी समान रूप से लागू होता है।

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