Saturday, August 01, 2009

तिलक का महत्व

शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।

स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

Thursday, July 30, 2009

इसे चोरी मानें या कुछ और?

अभी कुछ देर पहले गिरिजेश जी का एक ईमेल मिला जिसमें उन्होंने एक कड़ी दी और कहा कि उस पर क्लिक करके बताएं कि माजरा क्या है। कड़ी यह है। बताना आपको ही होगा कि माजरा क्या है, क्योंकि मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

गिरिजेश द्वारा भेजी गई कड़ी

यदि आपको पहली बार सब कुछ जंक सा दिखे, तो अपने ब्राउसर के व्यू मेनू में जाकर कैरेक्टर एन्कोडिंग को यूटीएफ-8 पर सेट करें।

क्या आप चौंके? गिरिजेश जी का पूरा का पूरा "एक आलसी का चिट्टा" सभी विजटों और टिप्पणियों सहित आस्ट्रेलियन कैथोलिक यूनिवर्सिटी के इस जाल स्थल पर मौजूद है, हालांकि गिरिजेश ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में अपने ब्लोग पर डू नोट कोपी वाला प्रतीक लगा रखा है।

गिरिजेश जी ने यह भी बताया कि यह केवल उनके ब्लोग के साथ नहीं हुआ है बल्कि कई अन्य हिंदी ब्लोग भी वहां मौजूद है, मसलन -

विवेक सिंह का स्वप्नलोक यहां देखा जा सकता है -

स्वप्नलोक

ज्ञानदत्त जी का मानसिक हलचल यहां उपलब्ध है -

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त जी ने भी बड़े स्पष्ट शब्दों में अपने ब्लोग में डू नोट कोपी वाला संदेश लगा रखा है।

शास्त्री फिलिप जी का सारथी यहां देखा जा सकता है -
सारथी

पाबला साहब का प्रिंट मीडिया पर ब्लोग चर्चा भी वहां उपलब्ध है।
प्रिंट मीडिया पर ब्लोग चर्चा

जब मैंने अपने ब्लोगों के संबंध में खोज की तो मेरा कंप्यूटर प्रोग्रामिंगवाला ब्लोग प्रिंटेफ-स्कैनेफ भी वहां मिल गया -

प्रिंटेफ-स्कैनेफ

मुझे लगता है सभी प्रमुख हिंदी ब्लोग वहां मौजूद हैं। यदि आपको पता करना हो कि आपका ब्लाग इस वेब साइट में है या नहीं, तो अपना प्रोफाइल नाम और ACU अथवा अपने ब्लोग का नाम और ACU के साथ गूगल सर्चे करें, इस तरह

जयहिंदी ACU

या

बालसुब्रमण्यम ACU

सवाल यह उठता है कि क्या यह गैरकानूनी नहीं है?

क्या यह ACU किसी ब्लोग एग्रिगेटर जैसा काम करता है, जैसे चिट्ठा जगत या ब्लोगवाणी? यह कोई यूनिवर्सिटी का वेब साइट मालूम दे रहा है, इसलिए क्या वह इन हिंदी ब्लोगों का उपयोग किसी शैक्षणिक उद्देश्य के लिए कर रहा है?

जिन ब्लोगों का उपयोग इस वेब साइट में हुआ है, क्या उनके ब्लोगरों को इस पर आपत्ति उठानी चाहिए? उनके ब्लोग के इस स्थल में उपयोग किए जाने से क्या उन पर कोई कानूनी दायित्व आता है, जैसे यदि कोई ACU के वेब साइट में जाकर उनके ब्लोग पर कोई उल्टा-सीधा या अश्लील कमेंट लगा दे, तो इससे मूल ब्लोगर पर कोई दायित्व आएगा?

इस तरह के अनेक सवाल मन में उठते हैं। यदि कोई जानकार व्यक्ति पर्याप्त छानबीन करके इन सवालों का उत्तर दे सके, तो हम सबका मार्गदर्शन होगा।

Saturday, July 18, 2009

रोने का लाभ

अमरीका के मिनेसोटा नामक स्थान के वैज्ञानिकों के अनुसंधानों से पता चला है कि मनुष्य शायद तनाव की अवस्था में शरीर में बने हानिकारक रसायनों से पीछा छुड़ाने के लिए रोता है।

इन वैज्ञानिकों ने तनावग्रस्त अवस्था में आंखों से बहे आंसू और आंखों में धूल, हवा आदि घुसने पर बने आंसू का अलग से रासायनिक परीक्षण किया। उन्हें तनाव में बहे आंसुओं में अधिक मात्रा में हानिकारक रसायन मिले।

Tuesday, July 14, 2009

बताइए अस्त-व्यस्त वस्त्र नियंत्रक क्या है

आज ईमेल में यह मिला। शायद आपने इनके बारे में पहले भी पढ़ा होगा, फिर भी यादें ताजा कर लीजिए। यदि नहीं पढ़ा हो तो ये आपको बहुत मजेदार लेगेंगी। वैसे भी इन्हीं के वंशज, डिसिप्लिनाचार्य और साइबरित्य ब्लोग जगत में आजकल धूम मचाए हुए हैं। अतः उनके पूर्वजों को याद कर लेना उचित होगा –

लाइट बल्ब – विद्युत प्रकाशक कांच गोलक
टेबल टेनिस – लकड़ी के फलक क्षेत्र पर ले टकाटक दे टकाटक
क्रिकेट – गोल गुट्टम लकड़ बट्टम दे दनादन प्रतियोगिता
ट्रैफिक सिग्नल – आवत जावत सूचक झंडा
मैच बोक्स – रगड़मपट्टी अग्नि उत्पादन पेटी
टाई – कंठ लंगोठी
सिगरेट – श्वेत पत्र मंडित धूम्र शलाखा प्रवीण
मोस्किटो – गुंजनहारी मानव रक्त पिपासु जीव
बटन – अस्त-व्यस्त वस्त्र नियंत्रक
रेलवे स्टेशन – भकभक अड्डा
रेलवे सिगनल – लौह पथ गामिनी आवागमन सूचक यंत्र
ओल रूट पास – यत्र-तत्र सर्वत्र गमन आज्ञापत्र
ट्रेन – सहस्र चक्र लौह पथ गामिनी
टी – दुग्ध जल मिश्रित शर्करा युक्त पर्वतीय बूटी

Monday, July 13, 2009

क्या ब्लोग साहित्य है? - शिवकुमार मिश्र जी को उत्तर

मेरे क्या ब्लोग साहित्य है? लेख पर शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पांडेय का ब्लोग में मिश्र जी ने एक पोस्ट लिखा है जिस पर काफी प्रतिक्रियाएं आई हैं। मैं इस पोस्ट पर देर से पहुंचा इसलिए इस बहस में वहां भाग न ले पाया, पर सब टिप्पणियों के अंत में मैंने अपनी टिप्पणी लगा दी है। इसके पढ़े जाने की कम संभावना है क्यों यह पोस्ट कुछ दिन पहले का है, इसलिए मेरी इस टिप्पणी को जयहिंदी में भी दुहरा रहा हूं -
--------------------------------
इस चर्चा में मैं देर से पहुंचा, पर यह एक तरह से अच्छा ही हुआ क्योंकि सबकी बातें पढ़कर जवाब दे सकता हूं। वैसे कहने को कुछ ज्यादा है नहीं, बाकी लोग काफी कह गए हैं।

पहली बात, शिव जी, कि आप साहित्य और ज्ञान को एक नहीं मान सकते। ज्ञान पल-पल बदलता है, पर साहित्य अधिक स्थायी चीज है, वरना हम आज भी क्यों रामायण-महाभारत का रस ले पाते हैं उन्हें पढ़ते हैं? या आज प्रकाशित उपन्यासों की तुलना में एक शताब्दी से भी पहले प्रकाशित प्रेमचंद, निराला, अमृतलाल नागर या वृंदावनलाल वर्मा की उपन्यास-कहानियों में ज्यादा रस ले पाते हैं?

इसलिए कि ये सब किताबें समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। इन्हें कई पीढ़ियों ने पढ़ा है और अनुभव किया है कि ये काम की चीजें हैं, और उन्हें दुबारा-तिबारा पढ़ना समय का अपव्यय नहीं है। साहित्य हमें यह आश्वासन देता है।

क्या ब्लोगों में लिखी चीजों के बारे में यह कहा जा सकता है? निश्चय ही कुछ पोस्ट कालजयी हैं, और आगे चलकर साहित्य बनेंगे। यह तो मैंने भी कहां नकारा है? पर अधिकांश पोस्ट?

दूसरी बात जो कहने को रहती है, वह यह कि साहित्य को कौन सहेजकर रखता है? आपने तथा टिप्पणीकारों ने किताब, प्रकाश्क, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय आदि का नाम लिया है, पर यह काम करनेवाले सबसे महत्वपूर्ण तबके को आप सब भूल गए - जनता। अच्छे साहित्य को जनता जीवित रखती है। नहीं तो रामचरितमानस, कबीर, सूर आदि का साहित्य जो शूरू में लिखे ही नहीं गए थे मौखिक रूप में ही उनका अस्तित्व था, आज हमारे आस्वादन के लिए उपलब्ध ही नहीं रहते।

ब्लोगरों को अच्छा न लगना स्वाभाविक है कि उनका लिखा अधिकांश साहित्य नहीं है। इतनी तीखी प्रतिक्रिया जो आई है, वही साबित करता है कि मन ही मन वे यह चाहते हैं कि उनके लिखे को साहित्य माना जाए। यह अच्छी बात भी है। पर साहित्य क्या है यह समझना भी जरूरी है। मैंने इसे परिभाषित करने की अपनी क्षमता के अनुसार कोशिश की है। जो लेखन कल्याणकारी हो, जो किसी वर्ग-विशेष मात्र का पोषक न हो, वह लेखन साहित्य है। इसके साथ ही उसमें सौंदर्य, संप्रेषेणीयता, गरिमा, आदि अन्य गुण भी होने चाहिए। मैं सब ब्लोगों को नहीं पढ़ता हूं, संभव भी नहीं है, कुछ 10,000 ब्लोग हैं हिंदी के, पर निश्चय ही इनमें ऐसा काफी कुछ लिखा जाता होगा, जो साहित्य है, उसे बाहर लाना चाहिए, पहचानना चाहिए, और जनता के सम्मुख रखना चाहिए, यदि वह उनके काम की चीज हो, क्योंकि जनता अभी ब्लोगों तक पहुंचने की स्थिति में नहीं है, और जनता ही साहित्य का असली पोषक होती है।
-----------------

Thursday, July 09, 2009

आखिर आ पहुंची मेघ राजा की सवारी अहमदाबाद

इन पंक्तियों को लिखते समय बाहर जोरों के झपाटे पड़ रहे हैं, मेघ गर्जन हो रहा है और बिजली चमक रही है। ट्यूब लाइट भी टिमटिमा रहा है, बिजली गुल होने की चेतावनी देते हुए। कोई चिंता नहीं, इनवर्टर है, बीस मिनट तक कंप्यूटर को खींच लेगा, तब तक तो यह पोस्ट पूरा हो जाएगा।

लिख रहा हूं तो खिड़की से ठंडी बयार पर सवार महीन फुहार पीठ पर लग रही है और मिट्टी पर प्रथम बारिश की बूंदों की सोंधी महक नथुनों को छेड़ रही है। बहुत अच्छा लग रहा है।

दो महीने से 42 डिग्री पर पक रहे थे। उमस इतनी कि शरीर पर वस्त्र भी कटार सा घाव कर रहे थे। कोई राहत नहीं थी।

हम यही सोच रहे थे कि क्या इस बार मेघ राजा ने अहमदाबाद को भुला ही दिया है? सूरत तक आकर लौट गए।

पर उनके दरबार में देर सही अंधेर नहीं है। आज 9 जुलाई की रात पौने बारह बजे मौसम की पहली तेज बारिश शुरु हुई है अहमदाबाद में, और जोरों से हो रही है।

अब ज्यादा लिखना संभवन नहीं है, यह बारिश देखने का समय है, कंप्यूटर पर झुके रहने का नहीं, यह चेहरे पर ठंडी-ठंडी बूंदों के आघात का मजा लेने का समय है। तो अलविदा, कल बताऊंगा यह बारिश कब तक रही।

मुहम्मद मुबीन शेख


कल अचानक मुबीन साहब से गपशप (चैट) करने का अवसर मिल गया। जब उनका हैलो वाला मेसेज गूगलटोक पर आया तो पहले तो मैं उन्हें पहचान नहीं पाया। कई महीने पहले उनसे ईमेल के जरिए बातचीत हुई थी। उन्होंने ही मुझसे संपर्क किया था। उन्होंने बच्चों के लिए विज्ञान कथाओं की एक किताब लिखी थी, स्टार वार। उस पर वे मेरी राय जानना चाहते थे।

उस समय ये कथाएं पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं हुई थीं। उन्होंने इन कथाओं को एक वेब साइट पर अपलोड कर रखा था। वहीं मैंने उन्हें पढ़ा भी। मुझे ये सरल कहानियां बच्चों के लिए बहुत ही उपयुक्त लगीं। वैसे भी विज्ञान कथा लेखन का क्षेत्र हिंदी में अधिक विकसित नहीं हुआ है, खासकर बच्चों के लिए विज्ञान कथाओं का क्षेत्र। इसलिए मुबीन साहब की कहानियां एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं। आप भी पढ़िए उन्हें, इस कड़ी पर –

http://ghazlein.bizhat.com/Hindi%20Starwar/index.htm

अब ये कथाएं पुस्तक रूप में भी छप चुकी हैं। मुबीन साहब ने इनके अलावा बच्चों के लिए एक अन्य पुस्तक भी लिखी है, जंबो के कारनामे, जिसे आप यहां से पढ़ सकते हैं –

http://jumbohathi.ifastnet.com/

मुबीन साहब ने इन सब कहानियों को मेरे ब्लोग बाल जयहिंदी में प्रकाशित करने की अनुमति दे दी है, इसलिए वहां भी आप इन्हें अगले कुछ दिनों में पढ़ सकेंगे। उनके उपर्युक्त वेब साइटों में ये कहानियां हिंदी के अलावा नौ अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं।

श्री मुबीन ब्लोग जगत में भी काफी सक्रिय हैं और उनके कई ब्लोग हैं। इन सबकी विशेषता यह है कि इनके जरिए वे उर्दू साहित्य को देवनागरी लिपि में हिंदी पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। अब तक मिर्जा गालिब और साहिर लुधियानवी से संबंधित उनके ब्लोगों में अच्छी सामग्री इकट्ठी हो गई है। फैस, मीर, इंशा, मंटो आदि अन्य उर्दू लेखकों की रचनाओं को भी देवनागरी लिपि में ब्लोग के माध्यम से उपलब्ध कराने का उनका विचार है।

मेरी दृष्टि में यह अत्यंत स्तुत्य प्रयास है। डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में कहा है कि यदि कोई हिंदी ठीक से लिखना सीखना चाहता है, तो उसे गालिब आदि उर्दू लेखकों की रचनाओं का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि उनमें हमें मिलते हैं हिंदी के सबसे परिमार्जित और श्रेष्ठ नमूने। दुर्भाग्य से अधिकांश हिंदी भाषी अब उर्दू लिपि से दूर होते जा रहे हैं, और उनके लिए उर्दू लिपि में गालिब आदि रचनाकारों को पढ़ना संभव नहीं रह गया है। इसलिए मुबीन साहब का यह प्रयास बुहत ही उपयोगी है। अन्य लोगों को भी आगे आकर उर्दू के विपुल साहित्य को देवनागरी लिपि में प्रकाशित करने के अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रमसाध्य कार्य को हाथ में लेना चाहिए। इसका काफी कुछ ब्लोगों के जरिए भी हो सकता है, जैसे मुबीन साहब कर रहे हैं।

श्री मुबीन उर्दू के पाठों को देवनागरी लिपि में परिवर्तित करने के लिए एक सोफ्टवेयर से काम लेते हैं। यह बहुत परिष्कृत परिणाम नहीं देता है, और उनके ब्लोग में वर्तनी आदि की बहुत सी त्रुटियां हैं, फिर भी शुरुआती प्रयास के रूप में वे महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी के पास समय हो, तो वह उनके साथ सहयोग करके इन ब्लोगों को अधिक त्रुटिरहित बनाने में उनकी मदद कर सकता है।

इक्बाल और साहिर लुधियानवी के उनके ब्लोगों की कड़ियां ये हैं –

http://kalameghalib.blogspot.com/

http://sahirludhianvi01.blogspot.com/


श्री मुबीन भिवंडी के रहनेवाले हैं। वे उर्दू साहित्य के बारे में जानकारी देने वाले दो पोर्टेल, अदाब नामा और वर्लड ओफ उर्दू लिटरेचर के संपादक हैं।

श्री मुबीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से राष्ट्रीय पुरस्कार स्वीकारते हुए।

वे उर्दू में कहानियां लिखते हैं और उनकी कहानियों के संकलन, यत्न का एक दिन, को 2000-2001 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। उनके दो अन्य कहानी संग्रह इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इनके नाम हैं, टूटी छत का मकान, और, नई सदी का अजब। उनकी कहानियां उर्दू लिपि में यहां पढ़ी जा सकती हैं –

http://mmubin.ifastnet.com/

उन्हें हिंदी निदेशालय की ओर से गैर-हिंदी प्रदेशों के लेखकों का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। उन्हें मिले अन्य पुरस्कारों में शामिल हैं, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी का बाल साहित्य पुरस्कार। लिखने के अलावा उनके शौकों में वेब डिजाइनिंग शामिल है।

मुबीन साहब का ब्लोगर प्रोफाइल उनकी बेटी ईफा के नाम से है। प्रोफाइल की कड़ी यह है -

http://www.blogger.com/profile/00779737290163317300

उनके बारे में अधिक विस्तृत जानकारी यहां पर उपलब्ध है –

http://www.mubinnama.150m.com/

Wednesday, July 08, 2009

अनामी से डरना क्या

अभी ब्लोगजगत में अनामी की धूम मची हुई है। अच्छे-अच्छे धुरंधर महारथी ब्लोगर अनामी का नाम सुनते ही थर-थर कांप उठते हैं और मोडरेशन के बिल में जा दुबकते हैं।

पर इससे आखिर ब्लोगरी का ही नुकसान हो रहा है। जब पोस्ट पर माडरेशन लगा दिया जाता है, तो टिप्पणियां तुरंत नजर नहीं आतीं, जब ब्लोग स्वामी को फुरसत होती है, तब कहीं जाकर प्रकट होती हैं। अभी हिंदी में फुलटाइम ब्लोगिंग की विलासिता बहुत कम लोगों के बस की बात है। अधिकांश ब्लोगर सुबह पोस्ट करते हैं आफिस जाने से पहले, या आफिस पहुंचकर दफ्तरी कामकाज में उलझने से पहले। और दिन में एक दो बार अपना ब्लोग देख लेते हैं, या शाम को घर आकर। इस तरह टिप्पणियां पोस्ट होने और ब्लोग स्वामी द्वारा उनके अनुमोदित किए जाने में काफी समय बीत जाता है।

इसका नुकसान यह हो रहा है कि टिप्पणियों की विविधता ही नष्ट हो रही है। टिप्पणीकर यह नहीं जान पाते कि पहले के टिप्पणीकारों ने क्या लिखा है, इसलिए कई बार एक ही बात बिना पूर्वापर संबंध स्थापित किए कई टिप्पणियों में दुहराई जा रही है। इससे विचार विमर्श में बाधा पड़ रही है।

दूसरा नुकसान यह हो रहा है कि टिप्पणियों में दी गई नई जानकारी, नए दृष्टिकोण, आदि को ध्यान में रखते हुए टिप्पणियां लिखना संभव नहीं हो पा रहा है। इससे टिप्पणियों का गुणस्तर गिरने लगा है।

ब्लोगरों को भूलना नहीं चाहिए कि प्रत्येक पोस्ट के दो अन्योन्याश्रित भाग होते हैं, एक, स्वयं पोस्ट, और दूसरा, उस पर आई टिप्पणियां। पाठक पर इन दोनों का समग्र प्रभाव पड़ता है। यदि टिप्पणियां बेदम हों, तो पोस्ट भी नीरस और फीका हो जाता है। कई बार टिप्पणियां मूल पोस्ट से ज्यादा रोचक और ज्ञानवर्धक होती हैं।

वैसे बेनामी से डरना क्या। यदि वह कोई अटपटी टिप्पणी लगा भी दे, तो उस टिप्पणी को दो सेकंड में हटाया भी तो जा सकता है? माडरेशन लगाना मुझे अति-प्रतिक्रिया मालूम पड़ती है। जिन ब्लोगरों ने उसका सहारा लिया है, उनसे मेरा अनुरोध है कि वे पुनर्विचार करें।

Friday, June 26, 2009

भारत का सबसे अमीर गांव

भारत का सबसे समृद्ध गांव हिमाचल प्रदेश का कोटगढ़ नामक गांव है। यहां के लोगों की औसत आय राष्ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक है। उनकी समृद्धि का राज 78 साल पहले एक अमरीकी पादरी द्वारा उनके गांव की जमीन पर रोपे गए विदेशी सेब के पेड़ों में छिपा है।

Saturday, June 20, 2009

फिर कभी न आएगा 7 अगस्त जैसा दिन

इस वर्ष के 7 अगस्त वाले दिन 12 बजकर 34 मिनट और 56 सेकंड को समय और दिनांक की कड़ी इस तरह की बनती है -

12:34:56 07/08/09

यानी, 1 से लेकर 9 तक के अंक आरोही क्रम में आते हैं, इस तरह -

1 2 3 4 5 6 7 8 9

ऐसा दुबारा हमारे जीवन काल में नहीं होगा। इसलिए, यह दिन है खासमखास।

Thursday, June 18, 2009

रेशम प्राप्त करने की अहिंसक विधि

रेशम के वस्त्र सुंदर एवं टिकाऊ होते हैं, और वे राजा-महाराजाओं और संभ्रांत वर्ग के लोगों में हजारों सालों से लोकप्रिय रहे हैं। कृष्ण भगवान के पीतांबरी वस्त्र तो प्रसिद्ध ही हैं, जो रेशम के बने थे। रेशम बनाने की विधि पूर्वी एशिया के देशों में विकसित हुई, विशेषकर चीन में। रेशम एक प्रकार के पतिंगे के डिंभक (लार्वा) द्वारा स्रावित धागे से बनाया जाता है। इस डिंभक का विकास जब पूरा हो जाता है, तो वह महीन धागे का एक कोष बना लेता है और उसमें विश्राम करता है। रेशम प्राप्त करने के लिए इस कोष को गरम पानी में डालकर डिंभक को मार दिया जाता है और उसके कोष के धागे को उतार लिया जाता है। इस तरह सुंदर रेशम प्राप्त करने के लिए इन निरीह कीड़ों की कुर्बानी देनी पड़ती है।

हमारे देश के पूर्वी राज्यों में, विशेषकर असम में, रेशम प्राप्त करने की एक दूसरी विधि भी प्रचलित है, जिसे ऐरी-पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें कोषस्थ कीड़े को मारा नहीं जाता है और उसे वयस्क पतिंगे में बदलने दिया जाता है। इसलिए यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है। असम और भारत के अन्य पूर्वी राज्यों में ऐरी रेशम का उत्पादन पारंपरिक घरेलू उद्योग के रूप में चलता है और वहां ग्रामीण लोग इससे अतिरिक्त आमदनी कमाते हैं। ऐरी कीड़े को अरंडी (कैस्टर) के पौधों पर उगाया जाता है।

अब रेशम बनाने की यह विधि देश के अन्य राज्यों में भी अपनाई जा रही है। इसका सबसे अधिक प्रचलन गुजरात में देखा जा रहा है। इसके अनेक कारण हैं। गुजरात अरंडी का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहां कपड़ा मिलों की संख्या देश भर में सर्वाधिक है। गांधीजी की जन्मस्थली होने कारण गुजरात में अहिंसा की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। यहां जैन धर्मावलंबियों की भी बड़ी आबादी है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर अहमदाबाद के एक कपड़ा मिल के प्रशिक्षक श्री शशिकांत शुक्ल ने गुजरात में रेशम बनाने के लिए ऐरी पद्धति को विकसित किया है और उसे एक बड़े उद्योग का रूप देने का बीड़ा उठाया है। अमहदाबाद में कपड़ा मिलों की प्रचुरता के कारण रेशम को बुनने-कातने की सबसे कुशल विधि का पता लगाने के लिए यहां पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तरह बने रेशम से तैयार किए गए वस्त्रों की बिक्री की व्यवस्था भी वहां अच्छी तरह हो सकती है। उन्हें अपने काम में खादी ग्राम प्रयोग समिति और ज्ञान नामक संस्था का भी सहयोग प्राप्त हुआ है।

ऐरी रेशम उद्योग के फलने-फूलने से अनेक सामाजिक और आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं। यह अरंडी उगानेवाले किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन हो सकता है। चूंकि यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है, गुजरात के जैन समुदायों में इस तरह के रेशम के वस्त्रों की बिक्री हो सकती है। महिलाएं इस काम को आसानी से अपना सकती हैं और घर के लिए अतिरिक्त आमदनी कमा सकती हैं। इससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बिना अधिक पूंजी निवेश के पैदा किए जा सकते हैं। इस पद्धति को सीखने के लिए निश्शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है।

ऐरी रेशम के आने से अब हम रेशम के सुंदर वस्त्र पहनते समय निरीह कीड़ों की बड़े पैमाने पर हत्या करने के संकोच से बच सकते हैं।

Wednesday, June 10, 2009

कानों की खबर


उम्र के बढ़ने के साथ-साथ शरीर के अधिकांश अंग कमजोर पड़ जाते हैं और उनका बढ़ना बंद हो जाता है, जैसे, नेत्र, दांत, बाल आदि।

पर कानों की प्रवृत्ति इससे कुछ भिन्न होती है, जैसा कि ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की एक रिपोर्ट से पता चलता है। एक अध्ययन में ब्रिटन के 206 वृद्ध पुरुषों के कानों का अध्ययन किया गया।

इससे पता चला कि पुरुषों के कान 30 साल की उम्र के बाद भी 0.22 मिलीमिटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ते रहते हैं, यानी 80 साल के होते-होते कान 11 मिलीमिटर अधिक लंबे हो जाते हैं।

क्या महिलाओं के कान भी बढ़ते हैं? कहना मुश्किल है, क्योंकि यह अध्ययन केवल पुरुषों के कानों पर किया गया है!
----

चित्र के बारे में: मेरे कान का फोटो!!

Tuesday, June 09, 2009

ब्राजील के पास गायब हुए विमान के दुर्घटना के वक्त के सनसनीखेज फोटो






ये फोटो मुझे जंक मेल में मिले। पता नहीं ये वास्तविक हैं अथवा फोटोशोप का कमाल। इन फोटोओं के साथ एक विस्तृत संदेश भी अंग्रेजी में था। उसका अनुवाद नीचे दे रहा हूं।। आप खुद पढ़कर निर्णय कर लें।

---

कुछ दिन पहले एयर फ्रांस का ए330 विमान रियो और पैरिस के बीच उड़ान भरते समय अतलांतिक महासागर में गयाब हो गया था। एक दिन बाद इस उड़ान के एक यात्री द्वारा उड़ान के दौरान लिए गए कुछ फोटो विमान के मलबे में पड़े एक कैमरे से प्राप्त हुए। ये चित्र विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के कुछ सेकंड पहले लिए गए थे। यह दुर्घटना बीच हवा में 35,000 फुट की ऊंचाई पर एयर फ्रांस के विमान के एक दूसरे विमान, Embraer Legacy, से टकराने से हुई। एयर फ्रांस का विमान तो समुद्र में गिरकर डूब गया और उसमें सवार सभी लोग मारे गए। लेकिन दूसरा विमान बच गया, हालांकि उसका एक पंख इस भिडंत में उखड़ गया। फिर भी वह किसी तरह अमेजन के जंगल में सकुशल उतर सका। इस विमान के चालाक तथा यात्रियों को बिलकुल पता नहीं चला कि उनके विमान के साथ क्या हुआ था।

यहां दिए गए दोनों फोटो एयर फ्रांस विमान के एक यात्री द्वारा दोनों विमानों के टकराने के तुरंत बाद विमान के समुद्र में गिरने से ठीक पहले विमान के अंदर से लिए गए थे। उसके कैमरे के अंदर स्थित मैमरी स्टिक से ये फोटो प्राप्त हुए। पहले फोटो में विमान की छत पर एक बड़ा छेद दिखाई दे रहा है जिससे विमान का पिछला पंख (टेलप्लेन) और ऊर्ध्व फिन दिखाए दे रहे हैं। दूसरे फोटो में एक यात्री इस विशाल छेद से वायु दाब के कारण खिंचते हुए विमान के बाहर जाता हुआ नजर आ रहा है।

ये फोटो एक डिजिटल Casio Z750 कैमरे में मिले। यह कैमरा सेरा डो कचिंबो में मिले एयर फ्रांस विमान के मलबे में कोकपिट के पास से प्राप्त हुआ। यद्यपि कैमरा टूटफूट गया था, उसका मैमरी स्टिक सही हालत में था। कैमरे के सीरियल नंबर से पता चला है कि यह पोलो जी मुलर नामक व्यक्ति का कैमरा है। वह पोर्टो एलग्रे के पास रहनेवाला एक अभिनेता था जो बच्चों के नाटकों में भूमिकाएं अदा करता था।

अद्भूत बात यह है कि दुर्घटना के वक्त उसे फोटो लेने की सूझी। हम कल्पना कर सकते हैं कि दुर्घटना के वक्त वह विमान के आगे के भाग में कैमरा लिए खड़ा था। इसीलिए कैमरा कोकपिट के मलबे में मिला। दूसरे विमान से टकराने से एयर फ्रांस के विमान का इंजन अलग हो गया था, जिससे विमना हल्का हो गया और धीमी गति से नीचे गिरने लगा। इससे कैमरे को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा। लेकिन विमान में विद्यमान कोई भी जीवित नहीं बच सका। पोलो मिलर के दो बेटियां हैं, ब्रूना और बिएट्रिस।

दुनिया की सबसे पहली एयर मेल


क्या आपको मालूम है, दुनिया की सबसे प्रथम एयर मेल भारत से पहुंचाई गई थी?

इसकी कहानी काफी रोचक है। शुरुआत होती है दिसंबर 1910 से। इस महीने ब्रिटन का एसएस पर्शिया नामक जहाज मुंबई पहुंचा। उसमें बड़े-बड़े बक्से रखे हुए थे जिनमें हवाई जहाज के पुर्जे थे। इस जहाज के यात्रियों में वाल्टर जोर्ज विंधैम, हेनरी पेक्वेट और कीथ डेविस भी थे। विंधैम एक मशहूर खोजी, यात्री और मोटरकार रेसर थे। बाकी दो पायलट थे। हेनरी फ्रांस का नागरिक था और डेविस अंग्रेज था। इनके अलावा दो मैकेनिक भी उनके साथ थे। वे सब इंग्लैंड की हंबर मोटर कंपनी द्वारा भेजी गई टीम के सदस्य थे। उस समय इलाहाबाद में एक औद्योगिक और कृषि उपकरण प्रदर्शनी लगी हुई थी। हंबर मोटर कंपनी को उम्मीद थी कि उसके द्वारा बनाए गए हवाई जहाज को इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित करके वह भारत में इन विमानों को बेचने में सफल हो सकेगी।

हंबर मोटर कंपनी ने 1910 में हंबर ब्लेरियोट नामक मोनोप्लेन बनाना शुरू किया था। उस साल के अंत में उसने रोजर सोमर नामक बाइप्लेन भी बनाया। कंपनी ने इसे ही विंधैम के साथ भारत भेजा था। यह प्लेन प्रथम महायुद्ध के अंत तक काफी लोकप्रिय बना रहा।

यह टीम ट्रेन द्वारा मुंबई से चल पड़ी और 5 दिसंबर को इलाहाबाद पहुंची। पांच दिनों में ही प्रदर्शनी के मैदान के पास स्थित पोलो ग्राउंड में इस टीम ने दो प्लेन जोड़कर तैयार कर लिए।

10 दिसंबर को परीक्षण करने के लिए कीथ डेविस ने एक प्लेन को पोलो ग्राउंड के चारों ओर उड़ाया। इसकी रिपोर्ट एक स्थानीय अख़बार में भी छपी।

उन्हीं दिनों इलाहाबाद के होली ट्रिनिटी चर्च एक छात्रावास बनवाने के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा था। चर्च के कुछ पादरि विंधैम से मिले और उनसे इस बारे में चर्चा की। विंधैम भी इसी उधेड़बुन में थे कि अपने विमान को कैसे प्रसिद्धि दिलाएं। पादरियों से मिलने पर उन्हें एक विचार आया जिससे वे एक पंथ दो काज सिद्ध कर सकते थे। उन्हें विदित हुआ कि यदि वे अपने हवाई जहाज में कुछ पत्र ले जा सके और इन पत्रों में लगे डाक टिकटों को रद्द करने की मुहर पर विशेष अतिभार (सरचार्ज) लगाया जाए, तो इस अतिभार से छात्रावास के लिए काफी पैसे इकट्ठे हो सकते हैं, और साथ में उनके हवाई जहाज को भी काफी प्रसिद्धि मिल सकती है।

विंधैम संयुक्त प्रांत के पोस्ट मास्टर जनरल से मिले और उनसे इसके बारे में चर्चा की। उन्हें भी यह विचार पसंद आया। उन्होंने एक विशेष कैन्सलेशन मुहर जारी करने का आदेश दे दिया। इस मुहर में लिखा था “फर्स्ट ऐरियल पोस्ट” (अर्थात, पहली हवाई डाक)। इस मुहर के प्रत्येक उपयोग पर 6 आने का सर्चार्ज लगाया गया और इससे प्राप्त पैसे को छात्रावास के लिए दान कर दिया गया।

हवाई जहाज से पत्रों को ले जाने के लिए 18 फरवरी 1911 का दिन चुना गया। यह तय किया गया कि हेनरी हवाई जहाज से पत्रों को इलाहाबाद से गंगा पार स्थित नैनी तक ले जाएंगे। इसके एक दिन पहले इलाहाबाद के ओक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज होस्टल को एक अस्थायी डाक घर में बदल दिया गया। वहां पत्रों की छटाई का काम सुबह 9 बजे शुरू किया गया और अर्धरात्रि तक चलता रहा। कुछ 6,500 पत्रों पर फर्स्ट ऐरियल पोस्ट वाली कैन्सलेशन मुहर लगाई गई।

उधर गंगा पार नैनी में हवाई जहाज से लाए गए पत्रों को स्वीकार करने के लिए एक पादरी को पोस्ट मास्टर के रूप में नियुक्त किया गया। इन प्रथम ऐरियल पोस्टों को ले जानेवाले पाइलट हेनरी पिक्वेट ने स्वयं 400 पोस्टकार्डों में हस्ताक्षर किए। इन विशिष्ट पोस्टकार्डों को उस दिन एक रुपए की कीमत पर बेचा गया। आज इन दुर्लभ पोस्टकार्डों की कीमत लाखों रुपए में आंकी जाती है।

18 दिसंबर 1911 एक सुहावना दिन था। हेनरी पिक्वेट इलाहाबाद से नैनी के लिए पत्रों को लेकर अपने हवाई जहाज में निकल पड़ा। उसने 40 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ते हुए गंगा नदी पार की और इलाहाबाद से नैनी के बीच की 6 मील की दूरी तय की। नैनी पहुंचकर उसने पत्रों को पादरी के हवाले कर दिया और इलाहाबाद लौट आया। उसे इसमें कुल 27 मिनट लगे।

इत्तफाक से उन्हीं दिनों इलाहाबद में कुंभ मेला भी लगा हुआ था, और लाखों तीर्थयात्री गंगा स्नान करने इलाहाबाद आए हुए थे। उन सबने इस ऐतिहासिक उड़ान को अपनी आंखों से देखा।

नैनी से इन पत्रों को सामान्य डाक के समान स्थल और समुद्र मार्गों से दुनिया भर के गंतव्य स्थानों को पहुंचा दिया गया। चूंकि इन पत्रों को कुछ दूरी तक हवाई जहाज द्वारा ले जाया गया था, ऐतिहासिक दृष्टि से उन्हें ही दुनिया की प्रथम ऐयर मेल के रूप में माना जाता है।

इन पत्रों को पानेवालों में इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम भी था। उसके सचिव ने विंधैम को पत्र लिखा जिसमें कहा गया था, “राजा की इच्छा है कि "फर्स्ट ऐरियल पोस्ट" की मुहर लगे भारत से उन्हें आए पत्र के लिए मैं आपको धन्यवाद दूं और यह बताऊं कि उसे उन्होंने अपने डाक टिकट संग्रह में जोड़ लिया है और वह इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण अंग बना रहेगा।"


वर्ष 1961 में इस ऐतिहासिक उड़ान की स्वर्ण जयंती के अवसर पर भारतीय डाक विभाग ने एक विशेष डाक कवर जारी किया। उत्तर प्रदेश फ्लाइंग क्लब ने एक डीएचसी ओटर विमान उपलब्ध कराया जिसने इलाहाबाद-नैनी-इलाहाबाद की वही उड़ान भरते हुए इन कवरों को पहुंचाया। इस समारोह में शरीक होने के लिए गण्यमान्य व्यक्तियों की एक पूरी टोली विशेष हवाई जहाज से इलाहाबाद पहुंची थी।

------
चित्र शीर्षक, जिस क्रम में वे आए हैं -
- वाल्टर जोर्ज विंधैम
- सोमर बाइप्लेन
- प्रथम एयर मेल की स्वर्ण जयंति पर जारी किया गया डाक टिकट
- प्रथम एयर मेल की स्वर्ण जयंति पर जारी किया गया डाक कवर

Monday, June 08, 2009

दालों से बना बुलेट प्रूफ जैकेट

सांगली के मकरंद काले नामक व्यक्ति ने दालों से बुलेट प्रूफ जैकट बनाने की विधि खोज निकाली है। इस विधि से बना जैकेट एके-47 जैसी घातक बंदूकों से निकली गोली को भी रोक सकता है। उन्होंने यह विधि 2003 में विकसित की थी। उनका कहना है कि भारतीय सेना ने इस प्रौद्योगिकी को जांच-परख लिया है। काले का कहना है कि वे अब उसमें और सुधार करने में लगे हुए हैं, ताकि वह डेढ़ किलोमीटर दूर से आई गोली को भी रोक सके।

काले एक खिलाड़ी हैं और सांगली में उनका एक स्पोर्ट्स अकादमी है। उन्होंने इस जैकेट का नाम आयुर्वेदिक जैकेट रखा है। वे कहते हैं, मैं इस जैकेट के जरिए सिद्ध करना चाहता हूं कि आर्युवेद में असीम ताकत निहित है।

काले द्वारा निर्मित जैकट का वजन मात्र 2.1 किलो है और उसकी कीमत मात्र 22,000 रुपए, जबकि भारतीय सेना द्वारा उपयोग किए जानेवाले जैकट का वजन 9 से 11 किलो जितना होता है और उसकी कीमत 40,000 रुपए।

यह आश्चर्यजनक आविष्कार तथा अन्य 50 आविष्कार अहमदाबाद की तीन संस्थाओं -- राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान, ज्ञान, और हनीबी नेटवर्क -- द्वारा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के उपलक्ष्य पर सोमवार 11 मई 2009 को पुणे में आयोजित एक कार्यशाला में सामने आए। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान के अध्यक्ष और भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद के प्रोफेसर डा. अनिल गुप्ता ने कहा, कार्यशाला के लिए पुणे को इसलिए चुना गया क्योंकि इस शहर में मोटरकारों के पुर्जे बनानेवाले अनेक छोटे-बड़े उद्यम हैं, जहां के कारीगरों में गजब की आविष्कारशीलता पाई जाती है। उनके आविष्कारों को पहचानकर बाहर लाने की आवश्यकत है, क्योंकि इनमें से कई आविष्कार ऐसे हैं जिनसे मानव समुदाय को लाभ पहुंच सकता है।

कार्यशाला में आविष्कारकों के अलावा डिजाइनर, इंजीनियर, विक्रेता, वैज्ञानिक आदि शामिल थे। उन सबने मिलकर विचार किया कि कार्यशाल में प्रस्तुत हुए आविष्कारों को बाजार में कैसे उतारा जा सकता है।

Saturday, June 06, 2009

बांस के दांत


जब असम के रहनेवाले दाधी पाठक 55 वर्ष के हुए, तो उनके सारे दांत गिर गए। कृत्रिम दांत लगवाने के लिए वे दंत चिकित्सक के पास गए, लेकिन ये इतने महंगे निकले कि उनकी बस के बाहर थे।

पर पाठक जी निराश नहीं हुए, उन्होंने स्वयं ही अपने लिए एक दंत पंक्ति बना ली, और बांस से, जी हां, बांस से। यह उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि बांस की असीम उपयोगिता के प्रति उनमें गहरी श्रद्धा है। इसके सबूत हैं स्वयं उनका मकान और साइकिल, जो पूरे-पूरे बांस से बने हैं। गांव के लोग तो उन्हें बास बाबा कहकर ही पुकारते हैं।

अब बांस के दांत बनाने की अपनी खोज का लाभ वे अन्य लोगों को भी देने लगे हैं, जिसके लिए उन्होंने अपने ही घर में एक छोटा दवाखाना खोल लिया है। वे एक दांत के लिए बीस रुपए लेते हैं। बांस का एक दांत लगभग दो घंटे में तैयार हो जाता है। पाठक जी कहते हैं कि उनके द्वारा बनाया गया बांस का दांत लगभग 12 साल चलता है, क्योंकि बांस एक टिकाऊ पदार्थ है और जल्दी सड़ता नहीं है।

पाठक जी को बांस से इतना अधिक लगाव है कि उन्होंने कह रखा है कि उनका अंतिम संस्कार बांस की चिता पर ही किया जाए ।
----------
दाधी पाठक का ऊपर दिया गया चित्र, श्री पी एन सु्ब्रमण्यम के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। उसका मूल लिंक यह है -
http://www.goodnewsindia.com/Pages/content/discovery/sristi.html

Thursday, June 04, 2009

ऐसे होंगे भविष्य के टूथ ब्रश

जब आजकल हर छोटी-बड़ी चीज तकनीकी विकास से प्रभावित हो रही है तो दैनंदिन के उपयोग में आनेवाला टूथब्रश ही क्यों इससे अछूता रहे। वैज्ञानिकों का कहना है भविष्य के टूथ ब्रश भी लेसर जैसे अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों से लैस होकर हमारे सामने प्रकट होंगे।

इन ब्रशों के रेशों में से लेसर की तेज रोशनी निकलेगी जो खास तौर से बने प्रकाश-संवेदनशील टूथ पेस्ट की सहायता से मुंह में बदबू लानेवाले और मसूड़ों की बीमारियां पैदा करनेवाले जीवाणुओं को नष्ट करेगी।

लेसर किरणें इन ब्रशों के हत्थों से निकलकर ब्रशों के रेशों के सिरे पर से मुंह के अंदर फैलेंगी। ये रेशे ओप्टिकल फाइबर के जैसे काम करेंगे। दांतों को मांजने की क्रिया के दौरान इस टूथ ब्रश के साथ उपयोग करने के लिए बनाया गया खास टूथ पेस्ट मुंह के जीवाणुओं के संपर्क में आएगा। इस टूथ पेस्ट में प्रकाश से सक्रिय होने वाले रसायन रहेंगे। टूथ ब्रश से निकली रोशनी इन रसायनों को सक्रिय बना देगी जो जीवाणुओं को नष्ट कर देंगे।

यह तरीका कैंसर के इलाज में उपयोग की जानेवाली फोटोडाइनेमिक थिरेपी का विकसित रूप है। इस चिकित्सा पद्धति में प्रकाश के उपयोग से कुछ प्रकार के रसायनों को सक्रिय बनाया जाता है।

लंदन के इंपीरियल कोलेज और ईस्टमैन डेंटल इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिक कैंसर में उपयोग होनेवाली इस तकनीक को मुंह के जीवाणुओं को मारने के लिए परिवर्तित कर रहे हैं। ईस्टमैन डेंटल इंस्टिट्यूट के माइकल विलसन का कहना है कि इस विधि से मुंह या मसूड़ों को नुक्सान नहीं होगा क्योंकि जीवाणु मुंह की कोशिकाओं की तुलना में कहीं अधिक नाजुक होते हैं और प्रकाश व उससे सक्रिय बनाए गए रसायनों से नष्ट हो जाते हैं। इंपीरियल कालेज के डेविड फिलिप के अनुसार इस विधि के घर-घर पहुंचने में केवल एक अड़चन है। अब तक जो प्रकाश-संवेदनशील जीवाणुनाशी ज्ञात हैं, उनके उपयोग से मुंह और दांतों में नीले दाग पड़ सकते हैं। इसलिए इस विधि को सफल बनाने के लिए कोई अन्य प्रकाश-संवेदनशील जीवाणुनाशी खोजना होगा। इसमें समय लगेगा।

डेविड फिलिप व माइकिल विलसन को विश्वास है कि रोशनी फेंकने वाला टूथ ब्रश एक ऐसी अजीबोगरीब खोज है कि लोग उसके साथ उपयोग किए जानेवाले टूथ पेस्ट के अभाव में भी उसे अपनाने के लिए तैयार होंगे, खासकरके बच्चे जिनमें नियमित रूप से दांत साफ करने की आदत डालने में यह नया टूथ ब्रश उपयोगी रहेगा।

डाक टिकट की कहानी


(पेनी ब्लैक, विश्व का पहला डाक डिकट।)

विश्व में पहला डाक टिकट आज से डेढ़ सौ साल पहले ब्रिटेन में जारी हुआ था। यह डाक टिकट काले रंग में एक छोटे से चौकोर कागज पर छपा था। उसमें ब्रिटेन की महारानी का चित्र अंकित था और उसकी कीमत एक पेनी रखी गई थी। यह डाक टिकट पेनी ब्लैक के नाम से मशहूर हुआ। यह डाक टिकट हालांकी पहली मई 1840 को बिक्री के लिए जारी किया गया था, लेकिन डाक शुल्क के लिए इसे 6 मई 1840 से बैध माना गया। यहीं से डाक टिकटों की परंपरा शुरू होती है। इस डाक टिकट की कहानी अत्यंत रोचक है।

1837 में रोलैंड हिल ने डाक व्यवस्था में सुधार और डाक टिकटों द्वारा डाक शुल्क की वसूली के बारे में दो शोधपत्र प्रकाशित किए। इन शोधपत्रों में उन्होंने यह सुझाव दिया कि प्रत्येक आधे औंस के वजन के पत्र पर एक पेनी की समान डाक शुल्क दर लगाई जाए चाहे वह पत्र कितनी ही दूर जाता हो और यह डाक शुल्क पेशगी अदा की जाए। जहां तक डाक शुल्क का भूगतान करने का संबंध है, इस बारे में हिल ने मोहर लगे छोटे-छोटे लेबल जारी करने का सुझाव दिया, लेबल सिर्फ इतने बड़े होने चाहिए कि उन पर मुहर लग सके।

गोंद लगे डाक टिकटों का उचित डिजाइन तैयार करने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने प्रतियोगिता आयोजित की। इस प्रतियोगिता में 2,600 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं लेकिन इनमें से कोई भी डिजाइन उपयुक्त नहीं पाई गई। अंततः हिल ने महारानी के चित्र को डाक टिकट पर छापने का निर्णय किया। इस चित्र के लिए उन्होंने महारानी के उस चित्र को चुना जिसे विलियम वायन ने 1837 में नगर की स्थापना की यादगार के रूप में जारी किए गए मेडल पर अंकित किया था। उन्होंने इसका आकार टैक्स लेबलों पर इस्तेमाल किए जाने वाले चित्रों के आकार जैसा रखा। वायन के मेडल पर अंकित चित्र के आधार पर डाक टिकट तैयार करने के लिए लंदन के हैनरी कारबोल्ड नामक चित्रकार को उसे वाटर कलर पर उतारने के लिए कहा गया। एक पेनी का डाक टिकट काले रंग में और दो पेंस का डाक टिकट नीले रंग में छापा गया। हालांकि, दो पेंस के डाक टिकट 8 मई 1840 तक जारी नहीं हुए।

लैटर शीट्स, रैपर्स और लिफाफे आदि डाक स्टेशनरी भी पेनी ब्लैक के साथ-साथ छप कर जारी हुईं। इनमें से मुलरेडी लिफाफे (जिनका नाम इनका डिजाइन बनानेवाले विलियम मुलरेडी के नाम पर रखा गया था) मशहूर हैं। यह डिजाइन काफी मशहूर हुआ लेकिन लिफाफे लोकप्रिय नहीं हुए। पेनी ब्लैक टिकट एक वर्ष से भी कम समय तक प्रयोग में रहा और 1841 में इसका स्थान पेनी रेड टिकट ने ले लिया।

पेनी ब्लैक डाक टिकट के बाद तो एक के बाद एक करके अनेक अन्य देशों ने भी डाक टिकट जारी करना शुरू कर दिया। भारत में डाक टिकटों की शुरुआत 1852 में हुई। इस वर्ष सिंध प्रांत में और मुंबई कराची रूट पर प्रयोग के लिए सिंध डाक नामक डाक टिकट जारी किया गया।
(आजाद भारत द्वारा जारी किया गया पहला डाक टिकट।)

Sunday, May 31, 2009

दर्शन नहीं बीमारी

डाल्टोनिजम किसी दर्शन या वाद का नाम नहीं है। वह रंगांधता की बीमारी का नाम है। इसमें व्यक्ति की आंखें रंगों की पहचान करने की शक्ति खो देती हैं।

जान डाल्टन नामक वैज्ञानिक को यह बीमारी थी, इसलिए इस रोग का नाम उन्हीं के नाम पर डाल्टोनिजम रखा गया।

Saturday, May 30, 2009

बैलों से बिजली


गुजरात के वडोदरा जिले के छोटाउदयपुर क्षेत्र के 24 जनजातीय गांवों में एक अनोखा प्रयोग चल रहा है, जिसके अंतर्गत बैलों की शक्ति को बिजली में बदला जा रहा है।

बिजली निर्माण की यह नई तकनीक श्री कांतिभाई श्रोफ के दिमाग की उपज है और इसे श्रोफ प्रतिष्ठान का वित्तीय समर्थन प्राप्त है। श्री कांतिभाई एक सफल उद्योगपति एवं वैज्ञानिक हैं।

इस खोज से एक नया नवीकरणीय उर्जा स्रोत प्रकट हुआ है। इस विधि में बैल एक अक्ष के चारों ओर एक दंड को घुमाते हैं। यह दंड एक गियर-बक्स के जरिए जनित्र के साथ जुड़ा होता है। इस विधि से बनी बिजली की प्रति इकाई लागत लगभग चार रुपया है जबकि धूप-पैनलों से बनी बिजली की प्रित इकाई लागत हजार रुपया होता है और पवन चक्कियों से बनी बिजली का चालीस रुपया होता है। अभी गियर बक्से का खर्चा लगभग 40,000 रुपया आता है, पर इसे घटाकर लगभग 1500 रुपया तक लाने की काफी गुंजाइश है, जो इस विधि के व्यापक पैमाने पर अपनाए जाने पर संभव होगा।

बारी-बारी से काम करते हुए यदि चार बैल प्रतिदिन 50 इकाई बिजली पैदा करें, तो साल भर में 15,000 इकाई बिजली उत्पन्न हो सकती है। इस दर से देश के सभी बैल मिलकर 20,000 मेगावाट बिजली पैदा कर सकते हैं, और इससे देश में बिजली की किल्लत बीते दिनों की बात हो जाएगी।

बैलों से बिजली निर्माण की पहली परियोजना गुजरात के कलाली गांव में चल रही है। बैलों से निर्मित बिजली से यहां चारा काटने की एक मशीन, धान कूटने की एक मशीन और भूजल को ऊपर खींचने का एक पंप चल रहा है।

कृषि में साधारणतः बैलों की जरूरत साल भर में केवल 90 दिनों के लिए ही होती है। बाकी दिनों उन्हें यों ही खिलाना पड़ता है। यदि इन दिनों उन्हें बिजली उत्पादन में लगाया जाए तो उनकी खाली शक्ति से बिजली बनाकर अतिरिक्त मुनाफा कमाया जा सकता है।

बैलों से बिजली निर्माण में मुख्य समस्या यह आती है कि इस बिजली को संचित करने का कोई कारगर उपाय नहीं है। यदि अनुसंधान को इस ओर केंद्रित करके इस कमी को दूर किया जा सके, तो स्वायत्त गांवों का गांधी जी का सपना साकार हो सकता है, और आयातित तेल पर देश की निर्भरता कुछ कम हो सकती है। पर्यावरण पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट