यह कविता किसकी लिखी हुई है, पता नहीं, पर अमरीकी नस्लवाद के बारे में एक काले बच्चे द्वारा उठाए गए ये सवाल दिलचस्प हैं। मूल कविता अंग्रेजी में है, उसका हिंदी अनुवाद पढ़िए:
पैदा हुआ तो मैं काला था
बड़ा होने पर भी काला ही रहूंगा
धूप में जाऊं तो भी काला रहूंगा
डर जाने पर भी काला ही रहूंगा
बीमार होने पर भी काला ही रहूंगा
और तुम श्वेत?
पैदा हुए, तो गुलाबी थे
बड़ा होने पर सफेद हो गए
धूप लगने पर लाल हो जाते हो
डर जाने पर पीला
ठंड लगने पर नीला
बीमारी में हरा
और मरने पर धूसर
और तुम मुझे कलर्ड कहते हो?
Friday, July 24, 2009
पैदा हुआ तो काला था...
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 13 टिप्पणियाँ
Saturday, June 20, 2009
आस्ट्रेलिया जोक
मेलबोर्न हवाई अड्डे से विमान बस उड़ने ही वाला था। लगभग सभी यात्री बैठ चुके थे। आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लवादी हिंसा से घबराकर बहुत से भारतीय मेलबोर्न छोड़कर भाग रहे थे। इसलिए विमान खचा-खचा भरा हुआ था।
तभी एक श्वेत आस्ट्रेलियाई महिला विमान में चढ़ी और अपनी जगह ढूंढ़ने लगी। उसका टिकट एकोनोमी क्लास वाला था। परिचारिका ने उसे उसकी जगह दिखा दी।
श्वेत महिला अपनी सीट की ओर बढ़ी पर एकएक ठिठक गई और जोर-जोर से परिचारिका को बुलाने लगी। परिचारिका दौड़ी-दौड़ी आई और पूछा क्या बात है।
श्वेत महिला – मेरी सीट तुरंत बदल दीजिए, मैं यहां नहीं बैठ सकती।
परिचारिका – लेकिन मैडम आपकी सीट में क्या समस्या है?
श्वेत महिला (उसकी सीट के बगल में बैठे भारतीय व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए) - मैं 20 घंटे इस हब्शी के बगल में नहीं बैठी रह सकती।
परिचारिका – मैडक ऐसे कारणों के लिए हम सीट नहीं बदलकर दे सकते।
पर वह महिला भी अड़ गई, खूब हंगामा करने लगी। तब हारकर परिचारिका ने कहा – ठीक है मैडम, मैं देखकर आती हूं, कहीं दूसरी सीट खाली है कि नहीं।
परिचारिका के जाने पर महिला प्लेन के गलियारे में ही खड़ी-खड़ी उस भारतीय यात्री पर नजरों ही नजरों शोले बरसाने लगी।
थोड़ी देर में परिचारिका लौट आई और बोली – हमें खेद है मैडम, कोई भी दूसरी सीट एकनोमी क्लास में खाली नहीं है, आपको अपनी ही सीट पर बैठना पड़ेगा।
वह नस्लवादी महिला भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। बोली - तुम कुछ भी करो, मेरी सीट बदल दो, वरना मैं सारी यात्रा खड़ी-खड़ी ही चली चलूंगी। जाओ विमान के कप्तान को बुला लाओ।
बेबस परिचारिका को ऐसा ही करना पड़ा। कप्तान महोदय आए। उसे सब कुछ बताया गया।
उसने कहा - मैडम, हम सामान्यतः एकनोमी क्लास वालों को बिजनेस क्लास में नहीं बैठाते, पर चूंकि एकोनोमी क्लाम में कोई सीट खाली नहीं है, इसलिए बिजनेस क्लास में देखता हूं कि कुछ व्यवस्था हो सकती है।
और उसने परिचारिका को पता लगाकर आने को कहा कि क्या बिजनेस क्लास में कोई सीट खाली है।
थोड़ी देर में परिचारिका लौट आई और बोली – जी हां, वहां एक सीट खाली है।
यह सुनना था कि उस श्वेत महिला के मुंह पर विजयी मुस्कान फैल गई। उस भारतीय व्यक्ति पर हिकारत की दृष्टि डालते हुए, वह अपना सामान समेटने लगी।
तभी कप्तान ने भारतीय व्यक्ति से कहा – महोदय, आप अपना सामान ले लें, मैं आपको बिजनेस क्लास में आपकी नई सीट दिखा देता हूं।
विमान के सभी यात्री गदगद हो उठे और उन्होंने कप्तान की न्याय प्रियता का तालियों से स्वागत किया।
नस्लवादी महिला यही सोचने लगी, जमीन फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं।
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ऐसी घटना वास्तविक जीवन में अभी बहुत सालों तक नहीं होने वाली है। फिर भी कल्पना लोक में ही सही किसी भारतीय के साथ विदेशों में न्याय होता देखकर मन को शकून मिलता है। क्या कहेंगे आप?
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: आस्ट्रेलिया, चुटकुले, नस्लवाद
Wednesday, June 10, 2009
आस्ट्रेलिया ने आखिर कबूल कर ही लिया कि ये हमले नस्लवादी ही थे
आखिरकार आस्ट्रेलिया की पुलिस को कबूल करना ही पड़ा है कि भारतीय छात्रों पर मेलबर्न में हो रहे हमले नस्लवाद-प्रेरित ही हैं। ये हमले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वहां की पुलिस भी भारतीय छात्रों पर पक्षपात करने पर उतारू हो गई है और उसने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे भारतीय छात्रों को भी लाठियों से पीट डाला है। आखिर भारतीय छात्रों ने भी अपनी रक्षा खुद करना तय कर लिया है। वे टोलियां बनाकर अपने घरों और संपत्ति की हिफाजत करने लगे हैं। और इन हमलों को चुपचाप सहते जाने के बजाए, युद्ध को शत्रु के खेमे में ले जाकर उन्होंने एक 20-वर्षीय श्वेत नस्लवादी को चाकू भोंककर घायल भी कर दिया है। एक अन्य श्वेत नस्लवादी की कार को भी उन्होंने फूंक डाला है। ऐसा लग रहा है कि आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया है, कम-से-कम भारतीयों के लिए! आस्ट्रेलिया तेजी से भारतीयों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान बनता जा रहा है।
मामला हाथ से निकलता देखकर आस्ट्रेलिया को अग्नि-शमन का काम करना पड़ा रहा है। उसने टोकेनिज़म का सहारा लेते हुए पूर्वी आफ्रिका से आस्ट्रेलिया में आकर बसे भारतीय मूल के पीटर वर्गिस को राजदूत बनाकर भारत भेजा है। आस्ट्रेलिया पुलिस ने भी अपना रुख बदलकर इन हमलों के नस्लवादी स्वरूप को स्वीकारा है।
इधर भारत में भी इन हमलों के विरोध में कई तरह के पहल किए जा रहे हैं। सरकार तो अपना काम कर ही रही है, भारतीय नागरिक भी पीछे नहीं हैं। यहां अहमदाबाद में आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिताओं ने अपना एक संघ बना लिया है, जिसका नाम है, अनिवासी भारतीयों के अभिभावकों का संघ। उसका कार्यालय आकाशदीप अपार्टमेंट, अंबावाडी, अहमदाबाद में स्थापित किया गया है।
यह संगठन उन लोगों को सदस्य बनने के लिए आमंत्रित कर रहा है, जिनके बच्चे आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे हैं। संघ का ध्येय है, जब भी किसी भारतीय पर हमला हो, तुरंत उसके शिकार हुए भारतीय मूल के व्यक्ति को मदद पहुंचाना और हर उपलब्ध मंच से इन हमलों का विरोध प्रकट करना।
यह संगठन इन हमलों को संयुक्त राज्य संघ में उठाने पर भी विचार कर रहा है। संगठन के अध्यक्ष दशरथ पटेल ने आस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त को पत्र भी लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है, “चूंकि आपकी सरकार ने हमारे बच्चों को आस्ट्रेलिया में पढ़ने के लिए वीजा दिया है, आपकी सरकार का यह फर्ज भी बनता है कि इन बच्चों की हिफाजत का इंतजाम भी करे और उन्हें इन हमलों से बचाए। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि बिना विलंब इन अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।“
उधर अमिताभ बच्चन द्वारा आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय की डाक्टरेट की पदवी ठुकरा देने के बाद हिंदी फिल्म उद्योग ने भी यह निश्चय कर लिया है कि वह आस्ट्रेलिया में शूटिंग नहीं करेगा। आस्ट्रेलिया में
कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, जैसे दिल चाहता है, सलाम नमस्ते, और बचना ए हसीनो। बोलीवुड फिल्मों की शूटिंग से आस्ट्रेलिया को आमदनी तो होती ही है, उससे भी ज्यादा ढेर सारी पब्लिसिटी भी मिलती है, जिससे उसकी छवि भी सुधरती है और उसके पर्यटन उद्योग को भी लाभ पहुंचता है। अब हिंदी फिल्म निर्माताओं द्वारा आस्ट्रेलिया को ब्लैकलिस्ट कर देने से आस्ट्रेलिया इन सब फायदों से वंचित रह जाएगा।
एक आम आदमी की हैसियत से भी हम आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लवादी हिंसा का विरोध करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं –
- आस्ट्रेलिया में बनी चीजों का बहिष्कार।
- छुट्टियां मनाने आस्ट्रेलिया न जाना।
- अपने बच्चों को आस्ट्रेलिया पढ़ने न भेजना।
- वहां पढ़ रहे बच्चों को वापस बुला लेना।
- आस्ट्रेलिया में बसने का विचार छोड़ना।
- आईपीएल आदि खेल प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलिया की टीम टीवी पर आने या किसी विज्ञापन में आने पर टीवी बंद कर देना या चैनल बदल देना।
- आस्ट्रेलिया के नस्लवाद के विरोध में अपने ब्लोगों में लिखना, अखबारों को इस विषय पर पत्र लिखना और आस्ट्रेलिया के अधिकारियों को ईमेल भेजना।
और भी कोई तरीका हो तो बताएं।
इन हमलों को लेकर मेरी भी एक थ्योरी है जो दूर की कौड़ी हो सकती है, पर मुझे वजनदार लगती है।
मेरा मानना है कि आर्थिक मंदी से तबाह हुए यूरोप में आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को आस्ट्रेलिया में यूरोपीय मूल के गोरे लोगों को अधिकाधिक संख्या में ले आने काअवसर दिख रहा है। याद रहे कि आस्ट्रेलिया अभी हाल तक घोषित रूप से “श्वेत ही आस्ट्रेलिया में बस सकते हैं” वाली नीति पर चल रहा था। उसे यह नीति दूसरे महायुद्ध के बाद इसलिए बदलनी पड़ी क्योंकि इस युद्ध के बाद यूरोप में नवनिर्माण कार्य शुरू हुआ और यूरोप के सभी श्रमिकों को इसी में काम मिल गया। इससे यूरोप के गोरे आस्ट्रेलिया आदि को उत्प्रवास करने को प्रस्तुत नहीं हुए। झकमारकर आस्ट्रेलिया को अपनी नस्लवादी नीति बदलकर दूसरे देशों के लोगों के लिए भी आस्ट्रेलिया के दरवाजे खोलने पड़े। पर आस्ट्रेलिया में अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो श्वेत आस्ट्रेलिया के सपने देखते हैं, उसी प्रकार जैसे भारत में कुछ लोग अब भी हिंदू राष्ट्र का सपना देखते हैं, हालांकि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रभाव में आए 50 से भी अधिक साल हो चुके हैं।
अब यूरोप के सभी देशों की अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई है। वहां बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और मुफलीसी एक बार फिर प्रकट हो गई है। आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को इसमें अवसर नजर आ रहा है। वे सोच रहे हैं कि इन तंग हाल यूरोपियों को आस्ट्रेलिया में आकर बसाया जा सकता है। लेकिन यह तभी हो सकेगा जब आस्ट्रेलिया में इनके लिए नौकरियां हों। आस्ट्रेलिया स्वयं भी इस आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था में और लोगों को नौकरी देने की क्षमता नहीं है। नौकरियां निर्मित करने का एक तरीका है भारतीयों पर हमले करके उन्हें डराना-धमकाना, ताकि वे आस्ट्रेलिया छोड़कर चले जाएं। उनके द्वारा खाली की गई जगहों पर यूरोप से आए श्वेतों को रखा जाए।
पोलैंड, चेकोस्लाविया, हंगरी आदि निर्धन यूरोपीय देशों में आस्ट्रेलिया के एमिग्रेशन एजेंटों की कारगुजारी पर हमें नजर रखना चाहिए। यदि वहां पिछले कुछ महीनों में उनके क्रियाकलापों के बढ़ जाने के प्रमाण मिले, तो यह इसका पक्का सबूत होगा कि भारतीयों पर हमले एक सोची-विचारी व्यापक रणनीति के तहत किए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य भारतीयों को आस्ट्रेलिया से खदेड़ना है।
इस तरह के प्रयास अन्य देशों में भी पहले सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं, मसलन, युगांडा, कीनिया, फीजी, मोरीशियस, त्रिनिडाड, आदि। हमें इन देशों में अपने देशवासियों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए।
यदि हम आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों के सभी पक्षों पर बारीकी से विचार करते हुए अपनी रणनीति तय न करें, तो आने वाले कुछ दशकों में आस्ट्रेलिया से भी भारतीयों के पैर उसी प्रकार उखड़ जाएंगे, जैसे युगांडा, केनिया, आदि से उखड़े थे।
क्या लगता है आपको, आस्ट्रेलिया में हो रहे हमलों के पीछे यह साजिश भी हो सकती है?
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: आस्ट्रेलिया, नस्लवाद, राजनीति
Sunday, June 07, 2009
आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की लंबी परंपरा है

आस्ट्रेलिया में नस्लवाद के अधिष्ठाता प्रधान मंत्री एल्फ्रेड डीकिन (1856 – 1919)
आस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमलों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 12 महीनों में, इस तरह के 1,447 हमले हुए हैं, यानी औसतन हर रोज 3-4 हमले। इनमें से अधिकांश हमलों की रिपोर्टों को स्वयं हमले के शिकार हुए भारतीय दबा देने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि इसका बहाना बनाकर उन्हें आस्ट्रेलियाई सरकार भारत वापस भेज दे। पर पिछले कुछ दिनों में ये हमले एकदम से बढ़ गए हैं और अत्यंत उग्र रूप धारण कर गए हैं। राह चलते भारतीयों पर चाकू चला देना, उन्हें सुनसान जगहों में पाकर गोरों की टोलियों द्वारा पीटा जाना, उनके हाथ से लैपटोप, मोबाइल फोन आदि कीमती चीजें छीन लेना, उनके घरों में घुसकर लूटपाट करना, उनके वाहनों को जला देना, यह सब चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है।
आस्ट्रेलियाई सरकार इन हमलों पर पर्दा डालने की भरसक कोशिश कर रही है और यह साबित करने पर तुली है कि ये नस्लवादी हमले नहीं हैं। पर सचाई उनके सामने और सारे विश्व के सामने मुंह बाए खड़ी है।
आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की लंबी परंपरा है। आस्ट्रेलिया के श्वेत मूल के समुदाय के आदि पुरुष सब ब्रिटन के बलात्कारी, हत्यारे, चोर-उचक्के, राजद्रोही आदि अपराधी थे। उन्हें सजा के रूप में आस्ट्रेलिया में उतार दिया जाता था। उनके आने से पहले आस्ट्रेलिया में स्थानीय निवासियों के लगभग 260 छोटे-बड़े राज्य थे। इन सबको इन अपराधी मानसिकता के लोगों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इस तरह आस्ट्रेलिया के निर्माता लोग मानव समुदाय के श्रेष्ठ जनों में से नहीं निकले थे, बल्कि मानव जाति की तलछट में से निकले गिरे हुए लोग थे। इसलिए यह देश उच्च आदर्शों का पोषक कभी नहीं रहा है, न ही कभी भी इस देश ने इसका दंभ भरा है। उसकी मंशा यही रही है कि वह ब्रिटन, और अब अमरीका का कृपापात्र बना रहे, और इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है।
आस्ट्रेलिया का कुल क्षेत्रफल 7,618,000 वर्ग किलोमीटर है, पर उसकी आबादी मात्र 2 करोड़ है। यानी वह बहुत ही कम बसा देशा है। इस देश में जितनी प्राकृतिक संपदा है उसके उचित उपयोग के लिए वहां लोगों की कमी है। इसलिए शुरू से ही आस्ट्रेलिया को बाहरी लोगों को अपने यहां आने का प्रोत्साहन देने की नीति अपनानी पड़ी है। पर नस्लवाद के चलते, शुरुआत में उसने केवल गोरों को वहां आने की अनुमति दी।
यह नीति 1901 में आस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री एल्फ्रेड डीकिन 1856 – 1919) ने विकसित की थी। वे मानते थे कि चीनी और जापानी मूल के लोगों से श्वेत आस्ट्रेलिया को खतरा है। इसलिए नहीं कि उनमें कोई बुरी आदत थी, बल्कि इसलिए कि "वे महनती हैं, सादा जीवन बिताते हैं, बुद्धिमान हैं, नई परिस्थितियों में बहुत जल्दी अपने आपको ढाल लेते हैं, अत्यंत ऊर्जाशील हैं, और उनमें काम करने का अदम्य उत्साह है।"
इसे पढ़कर आपको आश्चर्य हो रहा होगा, क्योंकि कोई भी देश इन गुणोंवाले लोगों को अपने यहां स्वागत करना चाहेगा। पर नस्लवाद की सोच और गणित और ही प्रकार का होता है। एल्फ्रेड डीकन नहीं चाहते थे कि गोरों के सिवा और कोई आस्ट्रेलिया में आए। इसकी व्यवस्था भी उन्होंने बड़े ही पक्के ढंग से की। उनकी प्रेरणा से आस्ट्रेलियाई संसद ने एक कानून पारित किया जिसके तहत यूरोपियों के सिवा अन्य लोगों के लिए आस्ट्रेलिया में आना अत्यंत कठिन हो गया। गैर-यूरोपियों को बाहर रखने के लिए आस्ट्रेलिया में आने के इच्छुक लोगों के लिए यह आवश्यक बना दिया गया कि वे किसी यूरोपीय भाषा में एक कठिन परीक्षा पास करें। उन दिनों जब विदेशी भाषाओं के पठन-पाठन के लिए अच्छी व्यवस्थाएं नहीं थीं, इस कानून का सीधा मतलब यह था कि योरोपियों के सिवा और कोई आस्ट्रेलिया में बस नहीं सकता था।
यह आजकल कनाडा, अमरीका, ब्रिटन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया आदि देशों की आप्रवास नीति की याद दिलाता है। ये देश भी अंग्रेजी की अच्छी जानकारी रखनेवाले व्यक्तियों को ही वहां बसने की अनुमति देते हैं। यह भी एक प्रकार का नस्लवाद ही है, जिसका विरोध नहीं किया जा रहा है, हालांकि किया जाना चाहिए।
खैर, 1901 में आस्ट्रिलिया में इमिग्रेशन रेस्ट्रिक्शन एक्ट (आप्रवास परिसीमन अधिनियम) पारित किया गया। इस अधिनियम को आस्ट्रेलिया संसद में भारी बहुमत प्राप्त हुआ। इससे पहले ही नस्लवादी नीतियां प्रचलन में आ गई थीं। उदाहरण के लिए चीनी मजदूरों से आवास कर के रूप में एक अतिरिक्त भारी कर लिया जाने लगा था, जो आजकल पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिक्खों से लिए जानेवाले जजिया के समान माना जा सकता है। फर्क इतना ही है कि तालिबान धर्म के नाम पर भेदभाव बरत रहे थे और आस्ट्रेलियाई सरकार नस्ल के आधार पर।
यह नस्लवादी कानून 50 वर्षों तक कायम रहा, यानी दूसरे महायुद्ध के अंत तक। इस युद्ध में यूरोप लगभग तबाह हो गया। ब्रिटन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, रूस, पोलैंड, बेल्जियम आदि देशों के करोड़ों नागरिक युद्ध में मारे गए। इन देशों की फैक्टरियां, पुल, इमारतें, आदि संपत्तियां भी लगभग पूरी-पूरी नष्ट हो गईं। इन देशों को इन सबको दुबारा नए सिरे से निर्मित करने की आवश्यकता हुई। इसलिए यूरोप की समस्त मानव-शक्ति इस भगीरथ कार्य में जुट गई। इसलिए उधर आस्ट्रेलिया जाकर बसने के लिए यूरोपीय मूल के लोग मिलने बंद हो गए।
इससे आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था, खास करके ग्रामीण अर्थव्यस्था, बुरी तरह प्रभावित होने लगी। खेत में काम करनेवाले लोगों की किल्लत हो गई। तब झक मारकर आस्ट्रेलिया को अपने नस्लवादी कानून निरस्त करना पड़ा। यह काम अत्यंत धीरे-धीरे ही किया गया और इस कानून को पूरा हटने के लिए लगभग तीन दशक लगे। 1973 में कहीं जाकर वह पूरा निरस्त हो सका। तब तक जापान, कोरिया, चीन आदि देश इतने शक्तिशाली हो गए थे, कि आस्ट्रेलिया के लिए उन्हें नजरंदाज करना मुश्किल हो गया। दूसरे, चीन, वियतनाम, इंदोनीशिया आदि देशों में ही अतिरिक्त आबादी मौजूद थी जिन्हें आस्ट्रेलिया में आने के लिए फुसलाया जा सकता था। यह तभी संभव हो सकता था जब आस्ट्रेलिया की नस्लवादी छवि को पोंछ-पांछकर आकर्षक बनाया जाए। फिर भी 1975 तक आस्ट्रेलिया में नस्ल के आधार पर भेदभाव करना कानून की दृष्टि में मान्य रहा।
आधी शती तक आस्ट्रेलिया पर हावी रहे नस्लवादी व्यवस्था ने वहां के गोरों के मानसिकता में गहरी पैठ कर ली है, और आज भी कई आस्ट्रिलाई प्रच्छन रूप से नस्लवादी होते हैं। यह अनेक छोटी-मोटी घटनाओं से जाहिर होती रहती है। मसलन, अभी हाल में भारतीय मूल के डाक्टर मुहम्मद हनीफ को आस्ट्रेलियाई पुलिस ने आंतकी होने के मनगढ़ंत आरोप पर पकड़ लिया था और उन्हें देश से निकाल तक दिया था। पर अंत में वे निर्दोष साबित हुए। यह नस्लवाद आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के रवैए से भी खूब उजागर होता है।
आज भी आस्ट्रेलिया के नेता चुनाव के समय नस्लवाद का बिगुल बजाते हैं क्योंकि आस्ट्रेलया की गोरी जनता का एक बहुत बड़ा अंश इस तरह की अपीलों से खूब उत्साहित होता है। वर्ष 2007 में हुए चुनाव में एक प्रमुख आस्ट्रेलियाई नेता पोलिन हैन्सन ने आस्ट्रेलिया में गैर-यूरोपियों के आने पर रोक लगाने को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। उसने इस मुद्दे को लेकर एक अलग पार्टि ही बना डाली थी, जिसका नाम है पोलिन्स युनाइटेड आस्ट्रिलिया पार्टी। यह पार्टी भारतीय जनता पार्टी, शिव सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की याद दिलाती है, जो भी ‘भारत केवल हिंदुओं के लिए’ वाली नीति को लेकर चलते हैं।

आस्ट्रेलिया की नस्लवादी नीतियों का विषैला प्रभाव दुनिया के अन्य भागों में भी देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण आफ्रीका की रंगभेदी नीति भी आस्ट्रेलिया के नस्लवादी नीतियों के तर्ज पर बनी है। इसी नीति के विरोध में गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में लगभग 20 साल सत्याग्रह किया था। गोखले, तिलक आदि भारतीय नेताओं ने उन्हें खूब समर्थन दिया था। गोखले तो रंगभेद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए और दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीय मूल के हिंदू, मुसलमान और ईसाई समुदायों के अधिकारों के हनन के विरोध में अपनी आवाज मिलाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर भी गए।
इसलिए आज आस्ट्रेलिया में जो नस्लवाद देखने में आ रहा है, वह कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही वहां की नस्लवादी नीतियों का परिणाम है। विश्व समुदाय को इन घटनाओं की और आस्ट्रेलिया में परोक्ष रूप से प्रवर्तमान नस्लवाद की तीक्ष्ण से तीक्ष्ण शब्दों में निंदा करनी चाहिए, और उस पर आर्थिक प्रतिबंध आदि लगाकर जल्द-से-जल्द उसे रास्ते पर लाना चाहिए।
यह आशा जगानेवाली बात है कि इस मामले में चीन और भारत एक सुर में बोल रहे हैं। आज इन्हीं दो देशों से सर्वाधिक लोग आस्ट्रेलिया में बसने और वहां पढ़ने जाते हैं। इसलिए नस्लवाद के शिकार भी वे ही अधिक होते हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि अन्य सभ्य देश भी चीन और भारत की पहल का अनुसरण करके आस्ट्रेलिया को नस्लवाद से मुक्त करने का बीड़ा उठाएंगे।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 9 टिप्पणियाँ
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