यद्यपि पुराणों की कथाओं को सही अर्थ में ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता क्योंकि पुराण उनमें वर्णित घटनाओं के घटने के हजारों वर्ष बाद लिखे गए हैं और उनका मूल उद्देश्य इतिहास का वर्णन करना नहीं बल्कि धार्मिक है, फिर भी पुराणों के सूक्ष्म अध्ययन से अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के संकेत मिलते हैं। इतना ही नहीं, आज से हजारों साल पहले की घटनाओं के बारे में जानने के लिए इन प्राचीन ग्रंथों के अलावा और कोई स्रोत हैं भी नहीं। गुजरात के प्राचीन इतिहास के संबंध में तो यह और भी अधिक सच है। इसलिए गुजरात के संबंध में पुराणों व अन्य प्राचीन ग्रंथों में जो उल्लेख आए हैं, उनका ऐतिहासिक महत्व है।
पुराणों के अनुसार वैवस्वत मनु वर्तमान मन्वंतर का प्रथम राजा था। जब उसने अपने पुत्रों में अपने राज्य का बंटवारा किया तो गुजरात प्रदेश शर्याति के हिस्से में आया। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार शर्याति के पुत्रों ने भार्गव च्यवन से दुश्मनी मोल ली और च्यवन ने उनमें आपसी वैर के बीज बो दिए। बूढ़े च्यवन को प्रसन्न करने और इस दुश्मनी को खत्म करने के लिए शर्याति ने अपनी सुंदर पुत्री सुकन्या का च्यवन से ब्याह करा दिया। पुराणों में ही नहीं, ऋग्वेद में भी अश्विन देवों के अनुग्रह से च्यवन ऋषि के पुनर्यौवन प्राप्त करने की कथा आई है। पुराणों के अनुसार शर्याति वलभीपुर में रहता था और च्यवन ऋषि का आश्रम नर्मदा के किनारे था। इन सब कथाओं से इस बात का संकेत मिलता है कि सौराष्ट्र में शर्याति तथा नर्मदा किनारे भार्गवों का वर्चस्व था और इन दोनों में पहले विग्रह और बाद में संधि हुई थी।
शर्याति का अनार्त नाम का एक पुत्र था। इसी के नाम पर इस प्रदेश का नाम अनार्त पड़ा। अनार्त के पुत्र का नाम रेव था जिस पर से नर्मदा नदी का एक अन्य नाम रेवा भी है। अनार्त की संतति अनार्त पर राज करती थी और उनकी राजधानी कुशस्थली थी। रेव के पुत्र रैवत कुकुद्मी के समय में पुण्यजन राक्षसों ने कुशस्थली का नाश किया।
कृष्ण-बलराम पांडवों के समकालीन थे। पुराणों के अनुसार वैवस्वत मनु से पांडवों तक के कालखंड में उत्तर भारत में पौरव वंश में 49 राजा और यादव वंश में 58 राजा हुए। इतने लंबे काल के लिए पुराणों से हमें अनार्त के केवल चार राजाओं का पता चलता है। बाकी सबकी स्मृति काल के ग्रास हो गई है। शर्यात, अनार्त और रैवत जैसे कुलों से अनार्त में तीन अलग-अलग वंश चले। उदाहरण के लिए शर्यात आगे चलकर हैहयों की एक शाखा के रूप में जाने जाने लगे।
नर्मदा जहां समुद्र से मिलती है, वहां के भरुकच्छ प्रदेशों को भृगुओं ने अपने निवास के लिए चुना। तब से यह प्रदेश तथा उनके द्वारा वहां स्थापित नगर का नाम भृगुकच्छ (वर्तमान में भरूच) हो गया। भार्गव च्यवनों का आश्रम नर्मदा के मुख के समीप या असित पर्वत पर था, जो भी नर्मदा के मुख के पास ही था। पद्मपुराण के अनुसार च्यवन के पुत्र दधीची का आश्रम साबरमती और चंद्रभागा नदियों के संगम स्थल पर था। इसी के पास गांधी जी ने अपना साबरमती आश्रम स्थापित किया। दधीची के भाई आत्मवान के वंश में और्व, ऋचीक और जमदग्नी हुए। भरुकच्छ के पूर्व में स्थित अनूप देश में हैहय कुल के यादवों का राज था। इनकी राजधानी माहिष्मती नर्मदा के ऊपरी इलाके (आज के मध्य प्रदेश) में थी। महिष्मती के हैहय राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने भृगुकुल के ऋषि जमदग्नी के आश्रम में उपद्रव मचाया, जिसके बदले जमदग्नी के पुत्र राम ने अर्जुन का वध किया। राम की गैरहाजिरी में अर्जुन के पुत्रों ने जमदग्नी की हत्या की। अपने पिता की हत्या का बदला राम ने अर्जुन के इन पुत्रों को मौत के घाट उतारकर लिया। पुराणों में वर्णित इस कथा से लगता है कि भरुकच्छ प्रदेश के भार्गवों और अनूप देश के हैहयों के बीच लंबे समय तक भीषण संघर्ष चला था।
कौरवों के समान यादवों का वंश भी अति प्राचीन है। ऋग्वेद में यदुओं और तुर्वशुओं का अनेक बार उल्लेख हुआ है। पुराणों में यदु और तुर्वशु को ऐल वंश के राजा ययाति और राक्षसगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी की संतति बताया गया है। यदु के वंश में हैहय, विदर्भ, चेदी, सात्वत, भोज, कुकुर, अंधक, वृष्णी, शिनि आदि अनेक कुल हुए हैं। कुकुर कुल के वृद्ध राजा उग्रसेन से उसके पुत्र कंस ने सत्ता छीन ली और वृष्णी कुल के शूर के पुत्र वासुदेव को जेल में डाल दिया। वसुदेव की पत्नी देवकी उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री थी। देवकी के पुत्र कृष्ण ने जुल्मी राजा कंस को मारकर अपने माता-पिता को जेल से छुड़ाया और उग्रसेन को राज पदवी लौटाई। इससे कंस का ससुर मगध का प्रतापी राजा जरासंध ने मथुरा पर बारबार आक्रमण करना शुरू किया। इन आक्रमणों से तंग आकर यादवों ने मथुरा त्याग दी और सौराष्ट्र में आ गए। यहां उन्होंने रैवत के समय की कुशस्थली के पुण्यजनों को वहां से खदेड़कर जीर्णशीर्ण किले की मरम्मत करके वहां बस गए। उन्होंने जो नई नगरी बसाई वह द्वारवती अथवा द्वारका के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह नगरी अतिविशाल थी और उसका किला इतना अजेय था कि स्त्रियां भी उसकी रक्षा कर सकती थीं। पुराणों के अनुसार समुद्र से लगभग घिरी इस नगरी के पूर्व में रैवतक गिरि थी और वह एक बड़ी नदी के मुख के पास स्थित थी। कृष्ण के जीवनकाल के अंतिम भाग में यह नगरी समुद्र में डूब गई।
आदि शंकराचार्य ने देश के चार दिशाओं में जो चार मठ स्थापित किए, उनमें से एक, यानी पश्चिमी दिशा वाला मठ, सौराष्ट्र के प्रायद्वीप में स्थित द्वारका तीर्थ में है। लेकिन महाभारत, हरिवंश, भागवत आदि ग्रंथों में द्वारका के जो विवरण आए हैं, उनका मेल इस द्वारका से नहीं बैठता। मुख्य त्रुटि यह है कि इस द्वारका के पास कहीं भी रैवतक गिरी का पता नहीं चलता। प्रभास से भी यह काफी दूर है। पुरातात्विक खनन से पता चला है कि यहां कई प्राचीन बस्तियां रही हैं जो बाढ़ में नष्ट हुईं। परंतु इनमें से प्राचीनतम बस्ती का काल ईसापूर्व पहली-दूसरी शताब्दी से पहले का नहीं है, जबकि कृष्ण का समय इससे कई सदी पहले का है। जूनागढ़ के पास एक मजबूत किले के अवशेष मिले हैं जो रैवतक गिरि और प्रभास के समीप है। कई विद्वानों ने इसे ही मूल द्वारका बताया है। परंतु यह समुद्र से काफी दूर है।
यादव कुल के उद्धव, अक्रूर, कृतवर्मा, ययुधान आदि अनेक योद्धा थे पर ये सब कृष्ण के आधिपत्य को स्वीकार करते थे। महाभारत, हरिवंश पुराण, भागवत आदि प्राचीन ग्रंथों में कृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। बलराम और कृष्ण वसुदेव के पुत्र थे। पांडवों की माता कुंती इनकी फुई थी। कुशस्थली के रैवत राजा ने अपनी पुत्री रेवती का ब्याह बलराम से कराया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी की इच्छा के विरुद्ध उसका भाई रुक्मी चेदी राज शिशुपाल से उसका ब्याह कराना चाहता था। रुक्मिणी से गुप्त संदेश मिलने पर कृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण किया और उससे विवाह किया। रीछपति जांबवंत ने वृष्णीकुल के राजा सत्राजित से स्यमंतक मणि छीन लिया था। जांबवंत को हराकर कृष्ण ने सत्राजित को स्यमंतक मणि लौटाया और जांबवंत की पुत्री जांबवंती से विवाह किया। मणि वापस मिलने से प्रसन्न होकर सत्राजित ने अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कराया। गंधार, अवंति, कोसल और मद्र की राजकन्याओं से भी विवाह संबंध जोड़कर कृष्ण ने भारत के अनेक शक्तिशाली कुलों को अपने अनुकूल रखा। कृष्ण ने रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न का विवाह उसके मामा रुक्मी की कन्या से कराया। प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध ने शोणितपुर के राजा बाम की पुत्री उषा से ब्याह किया। बलराम ने जांबवंती के पुत्र सांब का विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से कराया। इस प्रकार कृष्ण के कुटुंब में अनेक कुलों की राजकन्याओं का एकत्रीकरण हुआ। इनमें से उषा (ओखा) ने एक नए प्रकार के लास्य-नृत्य का विकास किया। प्रागज्योतिषपुर के नरकासुर को मारकर कृष्ण ने इसके द्वारा बंदी बनाए गए 16,000 कन्याओं को छुड़ाया। सौभनगर के राजा शाल्व ने कृष्ण की गैरहाजिरी में द्वारका पर चढ़ाई की। कृष्ण ने उसी समय शाल्व की नगरी पर आक्रमण करके उसका वध किया। अपने प्रतिस्पर्धी पौंड्रक वासुदेव को भी कृष्ण ने मारा और अपने पौत्र अनिरुद्ध को कैद करनेवाले बाणासुर को हराया।
कुरु कुल के पांडवों के साथ कृष्ण का संबंध काफी घनिष्ट था। द्रौपदी के साथ पांडवों के विवाह के अवसर पर कृष्ण ने पांडवों को भेंटें भेजीं। खांडववन को जलाकर इंद्रप्रस्थ बसाने में कृष्ण ने अर्जुन की मदद की। वनवास के दौरान अर्जुन कृष्ण से मिलने द्वारका आया। अर्जुन ने कृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया। युद्धिष्ठर को राजसूय यज्ञ करने की प्रेरणा भी कृष्ण ने ही दी और भीम से मगधराज जरासंध का वध कराकर पांडवों के दिग्विजय का मार्ग सरल बनाया। राजसूय यज्ञ में युद्धिष्ठर द्वारा कृष्ण को वरीयता देने का विरोध करनेवाले चेदिराज शिशुपाल का कृष्ण ने वध किया।
द्यूत का खेल हारकर 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के गुप्तवास के बाद जब पांडवों ने दुर्योधन से अपना राज्य वापिस मांगा तो दुर्योधन ने राज्य देने से इन्कार कर दिया। इससे दोनों में युद्ध की नौबत आई। कृष्ण ने मध्यस्थ करके युद्ध रोकने का भरसक प्रयत्न किया, परंतु जब दुर्योधन के हठ के कारण युद्ध अनिवार्य हुआ तो कृष्ण और बलराम की स्थिति कांटे की हो गई क्योंकि दोनों पांडव और कौरव उनके लिए आत्मीय थे। अंत में बलराम तटस्थ रहकर तीर्थाटन पर निकल पड़ा और कृष्ण ने शस्त्रसंन्यास लिया, यद्यपि अर्जुन के सारथी के रूप में युद्ध में भाग लेकर अपने कूट उपदेशों से उन्होंने पांडवों को विजयी बनाया। युद्ध प्रारंभ होने से पहले अर्जुन को गीता का उपदेश देकर कृष्ण ने उसका उत्साह बढ़ाया। महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने जो अश्वमेध यज्ञ किया उसमें कृष्ण ने भाग लिया।
अंत में यादव वीर प्रभास के पास आपस में लड़ मरे और कृष्ण को द्वारका नगरी के डूबने का अंदेशा हुआ। इसलिए सभी यादव स्त्रियों और बच्चों को इंद्रप्रस्थ ले जाने के लिए अर्जुन को बुलाया और बूढ़े नागरिकों को वानप्रस्थ ग्रहण करने की आज्ञा दी। बूढ़े हो चले अर्जुन को रास्ते में आभीरों ने लूटा और अनेक यादव स्त्रियों को उठा ले गए। हस्तिनापुर आकर अर्जुन ने कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का अभिषेक किया। इसके कुछ ही समय बाद कृष्ण ने प्रभास के पास देहोत्सर्ग किया।
पुराणों में अर्जुन और कृष्ण को नर और नारायण के अवतार के रूप में चित्रित किया गया है। आगे चलकर वैष्णवों ने कृष्ण को भगवान विष्णु के पूर्णावतार के रूप में स्वीकारा।
यादवों में गणराज्य पद्धति का राजतंत्र चलता था। इसी कारण से राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने कृष्ण के राजा होने की शंका उठाई।
पुराणों के साक्ष्य पर इन यादवों के समय का निर्धारण करना टेढ़ी खीर है। पुराणों में बताया गया है कि महाभारत का युद्ध कलिकाल के आरंभ में हुआ था, यानी ई।पू। 3000 के आसपास। परंतु पुराणों में ही युधिष्ठर के उत्तराधिकारी परीक्षित का जन्म महापद्म नंद के अभिषेक से 1015 वर्ष पहले बताया है। यह नंद राजा ई।पू। चौथी सदी में हुआ था। इससे यादवों का समय ई।पू। चौदवीं-पंद्रहवीं सदी ठहरता है। पुराणों में बिंबिसार के पहले के राजाओं का जो शासनकाल बताया गया है उसके आधार पर महाभारत का समय ई पू 950 होता है। इस प्रकार द्वारका के यादवों के समय के बारे में कोई निश्चित मत प्रकट करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
Thursday, May 28, 2009
वेद-पुराणों का गुजरात
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: गुजरात का इतिहास
Monday, May 25, 2009
लोथल : सिंधु घाटी सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र

भारत में कई स्थलों पर से ताम्र-कांस्य युग की अनेक नगर-संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। इनमें से सिंधु घाटी में हड़प्पा, मोहेंजोदडो आदि स्थलों पर मिली संस्कृति के अवशेषों को सिंधु घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। जैसे-जैसे पुरातात्विक अन्वेषण आगे बढ़ा है, यह स्पष्ट होता गया है कि यह सभ्यता सिंधु घाटी तक सीमित नहीं थी और ठेठ पश्चिम भारत तक फैली थी। गुजरात में पहले-पहल इस सभ्यता के अवशेष 1935 में सुरेंद्रनगर जिले के रंगपुर नामक स्थान पर मिले। उत्खनन के दौरान रंगपुर में प्राग-हड़प्पीय काल के लघुपाषाण युग के औजार भी मिले हैं। इसी प्रकार सोमनाथ, लोथल और देसलपर से प्राग-ऐतिहासिक काल के विभिन्न प्रकार के मृदभांड मिले हैं। इन सभी स्थलों में रहनेवालों का यहां स्थायी निवास था। वे चक्के के उपयोग से मिट्टी के बर्तन बनाते थे तथा तांबे के औजारों का उपयोग करते थे। सिंधु घाटी के लोग बाद में इन सभी स्थानों में बस गए। इतना ही नहीं यहां से वे कच्छ, सौराष्ट्र व गुजरात के अनेक अन्य भागों में भी फैल गए।
भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के जो केंद्र हैं, उन सबमें से अधिक महत्वपूर्ण है अहमदाबाद जिले के धोलका तालुके के सरगवावा गांव की सीमा में स्थित लोथल का टीला। पुराने खंडहरों के रूप में यह टीला बहुत समय से प्रसिद्ध था पर इसके असली स्वरूप की जानकारी तब मिली जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पश्चिम विभाग के अध्यक्ष श्री एस रंगनाथ राव ने 1954 में यहां खुदाई की।
स्थानीय लोगों का विश्वास था कि इस टीले पर कोई प्राचीन नगरी हुआ करती थी। लोथल शब्द के पूर्वांश "लोथ" का अर्थ शायद शव है। द्रष्टव्य है कि मोहेंजोदड़ो का अर्थ भी मृतकों का टीला है। शायद लोथल शब्द भी इससे मिलता-जुलता अर्थ रखता है। यह टीला आज खंभात की खाड़ी से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके पश्चिम में पांच-छह किलोमीटर की दूरी पर भोगावो नदी और पूर्व में दस-एक किलोमीटर पर साबरमती नदी है। परंतु आद्य-ऐतिहासिक काल में समुद्र इस टीले से 5 किलोमीटर से अधिक दूर नहीं था और उक्त नदियों का मुख भी लोथल के निकट ही था। लोथल के आसपास की जमीन की ऊंचाई समुद्र सतह से 9-12 मीटर है। लोथल का टीला इससे लगभग 4 मीटर और ऊंचा है।
लोथल से सिंधु घाटी सभ्यता के समय की नगरी के भग्नावशेष मिलने से यह स्थल भारत के पुरातात्विक महत्व के स्थलों में से प्रमुख बन गया है। चूंकि हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो जैसे स्थल देश की वर्तमान सीमाओं के बाहर चले गए हैं, लोथल पर पुरातत्वविदों और इतिहासकारों द्वारा भारी खोज चल रही है। आज इस टीले का विस्तार 580-300 मीटर है, पर इस पर बसी नगरी का मूल विस्तार अवश्य ही इससे कहीं अधिक रहा होगा। उत्खनन से मानव बस्ती के तीन स्तरों का पता चला है। सबसे नीचे वाले स्तर की नगरी में मकान सीधे जमीन की सतह पर से ही उठाए गए हैं। इस कारण से लगभग ई पू 2350 में बाढ़ का पानी इनमें भर जाने से इस नगरी का नाश हो गया। बाद में नगरी पुनः बसाई गई। इस बार नगरी को बाढ़ से बचाने के लिए कई उपाय किए गए। नगरी के चारों ओर कच्ची ईंटों की दीवार बनाई गई और मकान कच्ची ईंट अथवा मिट्टी के चबूतरों के ऊपर बनाए गए। इस समय की नगरी में नगर आयोजन के उन्नत तत्व देखने में आते हैं। पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण दिशा में चौड़ी सड़कें बनी हैं और इनके समांतर छोटी गलियां हैं। मकान सड़कों के दोनों किनारे बनाए गए हैं। कुछ मकान कच्ची ईंट के हैं और कुछ पकी हुई ईंट के। प्रत्येक मकान में स्नानगृह है तथा जल के निकलने के लिए घर के सामने मोरी की व्यवस्था है।
रहने के मकान सादे और दो-तीन मंजिलों के हैं। दक्षिणपूर्व में शासक का बड़ा प्रासाद है। पूर्वी क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन पकाने की एक बहुत बड़ी भट्टी के अवशेष मिले हैं। टीले में से बहुत से शव भी मिले हैं। इनमें से अधिकांश को उत्तर की दिशा में सिर रखकर दफनाया गया है। शव के पास खाने-पीने के सामान भी रखे गए हैं। कई बार शवों की जोड़ी मिली है जो शायद स्त्री-पुरुष के शव हैं। संभवतः उस काल में भी सती प्रथा प्रचलित थी। एक बालक की खोपड़ी में छिद्र बना हुआ मिला है, जो शायद शल्य-क्रिया का परिणाम है।
लोथल के पूर्वी छोर पर निचाईवाले भाग में जलपोतों को ठहराने के लिए कृत्रिम बंदर जैसी आयताकार इमारत के अवशेष मिले हैं। इसकी पश्चिमी दीवार 212 मीटर, पूर्वी दीवार 209 मीटर, उत्तरी दीवार 36 मीटर और दक्षिणी दीवार 34 मीटर लंबी है। दीवारों की अधिकतम ऊंचाई 4 मीटर है। उत्तरी दीवार में 12.5 मीटर चौड़ा प्रवेशद्वार है। ज्वार-भाटे के समय इस द्वार से जलपोत भीतर घुसते थे। रेत भर जाने से जब नदी का प्रवाह बदल गया, तब पूर्वी दीवार पर 6.5 मीटर चौड़ा एक दूसरा द्वार बनाया गया।
लोथल से मिली अनेक मुद्राओं और मुहरों का बहुत अधिक ऐतिहासिक महत्व है। ये पत्थर, पकी हुई मिट्टी अथवा तांबे के बने हैं। बहुत सी मुद्राएं चौरस आकार की हैं, लगभग 2.5 से 2.5 सेंटीमीटर की। इनके एक ओर बैल, हाथी, बाघ आदि कोई पशु का चित्र बना है और दूसरी ओर कुछ अक्षर कुरेदे गए हैं। एक मुद्रा में तीन-चार पशुओं का समुच्चय दिखाई देता है। बहुत-सी आयताकार मुद्राएं भी मिली हैं। इनमें केवल लिखावट है। ये सब मुद्राएं हड़प्पा-मोहेंजोदड़ो से मिली मुद्राओं जैसी ही हैं। इन मुद्राओं पर अंकित अक्षरों को अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। यदि इन अक्षरों को पढ़ने के प्रयास सफल हो जाएं, तो सिंधु सभ्यता की सामाजिक व्यवस्था, धर्म, तथा आर्य सभ्यता से इसके संबंधों के बारे में काफी कुछ जानने को मिलेगा।
मिट्टी के बर्तन भी बहुतायत से मिले हैं। इनका भी मुद्राओं जितना ही महत्व है। इन बर्तनों में प्याले, रकाबी, कान वाले प्याले, भरणी, थाली, तगारे आदि शामिल हैं। इन बर्तनों पर लाल अथवा पीले रंग की पट्टियां हैं। कुछ में काले रंग के चित्र बने हैं। ये सब कुम्हार के चक्के पर बने हैं और भट्टी में पकाए गए हैं। इसी प्रकार के बर्तन हड़प्पा-मोहेंजोदड़ो से भी मिले हैं।
बर्तनों के अलावा देवी की मिट्टी से बनी और भट्टी में पकाई गई छोटी मूर्तियां, पशु-पक्षियों की आकृतिवाले खिलौने आदि, पत्थर से बने तराजू के बाट, हथोड़े, मनके आदि, शंख और सीपी से बनी चीजें, कांच की चूड़ियां, हाथीदांत की सुइयां और मापदंड आदि अनेक वस्तुएं मिली हैं। इस सभ्यता के लोग शायद दशमलव पद्धति से परिचित थे क्योंकि लोथल व अन्य स्थलों से मिले मापदंडों में दशमलव पद्धति के अनुसार निशान काटे गए हैं। खनन के दौरान धातुओं से बने औजारों और हथियार भी मिले हैं, जैसे कुल्हाड़ी की फलक, बाणशीर्ष, भाले की नोक, मछली पकड़ने के कांटे, चूड़ियां, मनके, बर्तन, मुद्राएं, खिलौने, बारीक कलाकारी वाले सुंदर आभूषण आदि। इन सबसे स्पष्ट है कि लोथल सिंधु सभ्यता का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र था। इसका सिंधु घाटी के नगरों, मिस्र और पश्चिम एशिया के साथ व्यापारिक संबंध था। यह व्यापार मुख्यरूप से जलमार्ग के जरिए चलता था।
यह नगरी ई पू 1900 के आसपास एक बार फिर बाढ़ के कारण नष्ट हुई। यद्यपि नगरी को लगभग तीन सौ साल बाद ई पू 1600 के लगभग पुनः बसाया गया, पर तीसरी बार बसाई गई नगरी में उतना विस्तार एवं समृद्धि देखने में नहीं आता। यह नगरी भी कुछ समय बाद नष्ट हो गई।
लोथल के अलावा रंगपुर, सोमनाथ, श्रीनाथगढ़, कच्छ, दक्षिण गुजरात आदि अनेक स्थलों से भी सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जिससे स्पष्ट है कि यह सभ्यता गुजरात के लगभग सभी भागों में फैली थी।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 6 टिप्पणियाँ
लेबल: गुजरात का इतिहास