Monday, March 25, 2013

टाइम्स ऑफ़ इंडिया का दकियानूसी उर्दू प्रेम

संजय दत्त को पाँच साल की जेल सज़ा होने की ख़बर आते ही अख़बारों में इसी की चर्चा छायी रही। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भी यही बात थी। उसमें छपी एक ख़बर ने विशेषरूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया और मैं सोचने के लिए मजबूर हुआ कि यह अख़बर इस तरह का घिनौना काम क्यों कर रहा है।

यह ख़बर थी, उर्दू अख़बारों में संजय दत्त के मामले में क्या कहा गया है इसकी समीक्षा। अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया आए दिन तो उर्दू अख़बारों में क्या छपा है इसकी समीक्षा प्रकाशित नहीं करता है न ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर उर्दू अख़बारों को याद करता है – उदाहरण के लिए लगभग इसी समय इतालवी कमांडो को इटली से वापस न भेजने का इटली की संसद का निर्णय भी एक मुख्य सुर्खी रही थी, पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मुद्दे पर उर्दू अख़बारों की राय की तलब नहीं की।

थोड़ा सोचने पर विदित होता है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया उर्दू अख़बारों का उन्हीं संदर्भों में उल्लेख करता है जिनका संबंध मुसलमानों से होता है। संजय दत्त मामले का संबंध मुंबई में आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट कराए जाने से है, और यह बम विस्फोट इससे पहले बाबरी मसजिद के ढहाए जाने के बाद हुए दंगों में सैकड़ों मुसलमानों को शिव सेना आदि हिंदुत्व पार्टियों द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने के बदले में कराए गए थे। इस तरह संजय दत्त मामले का सीधा संबंध मुसलमानों से है। इसीलिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस मामले के बारे में उर्दू अख़बारों के विचारों की समीक्षा करता है। इससे पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अफ़सल गुरु को फाँसी दिए जाने के बाद भी इस संबंध में उर्दू अख़बारों में छपे लेखों की समीक्षा छापी थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह करतूत कितनी राष्ट्रविरोधी और घातक है यह उन सभी को मालूम होगा जो यह जानते हैं कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा नहीं है बल्कि वह उत्तर और दक्षिण भारत (जहाँ उर्दू साहित्य का उद्भव और प्ररंभिक विकास हुआ था) के शिष्टजनों की भाषा है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, दलित आदि सभी शामिल हैं। उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति का अंग था, जो भयानक रूप से सफल हुआ और मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दे बैठा और देश को दो (और बाद में तीन) टुकड़ों में बाँट बैठा, और यह नरसंहार अब भी थमा नहीं है – पाकिस्तान में जो नरमेध मचा हुआ है वह इसका सबूत है।

तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा उर्दू अख़बारों की तलब केवल मुसलमानों से संबंधित विषयों में करना अंग्रेज़ों की इसी बाँटो और राज करो वाली घातक नीति को तूल देना है और उर्दू को मात्र मुसलमानों के साथ जोड़कर उसकी असमय मृत्यु के लिए रास्ता साफ करना है। आज यदि इस देश में उर्दू की हालत खस्ता है, तो इसका मुख्य कारण उसे मुसलमानों की भाषा समझना और देश-विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना है। जिस भाषा का संबंध देश विभाजन से हो और पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण देश से संबंधित हो, उसे देशवासियों के दिलों में कैस स्थान मिल सकता था। पर यह निष्कर्ष एक ग़लत प्रचार पर आधारित है। उर्दू न तो मात्र मुसलमानों की भाषा है न ही वह किसी ग़ैर-भारतीय उपज है। वह इस देश में पैदा हुई नवीनतम भाषा है जिसमें गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस देश की सबसे लोक-प्रिय और आम भाषा है, और यह हिंदी का ही एक परिष्कृत रूप है। जिस तरह हनुमान शाप-वश अपनी ही ताकत़ भूल गए थे, उसी तरह हिंदी भी अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति के शाप के प्रभाव से अपने ही परिष्कृत रूप उर्दू को भूल ही नहीं गई है बल्कि उसे अपना शत्रु मानने लगी है, यद्यपि कई जांबवानों ने हिंदी को अपने भूले-बिसरे रूप उर्दू की याद दिलाई है – डा. रामविलास शर्मा ने कई दशक पहले यह काम किया था, और अब न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू यह काम कर रहे हैं। आइए, इसे समझें कि हिंदी और ऊर्दू को, जो एक भाषा हैं, अलग क्यों और कैसे किया गया।

1857 के संग्राम में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़े थे और उनका लगभग इस देश से खात्मा कर दिया था। यदि पंजाब, नेपाल आदि कुछ रियासत अंग्रेजों की फ़ौजी मदद न करते और दक्षिण के रियासत इस संग्राम में शामिल हो गए होते तो अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर तभी बंध चुका होता और आज भारत का इतिहास, और विश्व का इतिहास भी, कुछ और ही हुआ होता। पर इस संग्राम को दबाने में अंग्रेज सफल हुए और वे समझ गए कि इस देश पर अपनी हुकूमत कायम रखनी हो, तो यहाँ के लोगों को विभिन्न परस्पर वैमनस्यपूर्ण गुटों में तोड़ना होगा। इनमें से प्रमुख गुट हिंदुओं और मुसलमानों के थे। इनमें दरार डालने की कूटनीति अंग्रेजों ने बड़े ही संगठित तरीके से शुरू कर दी। इस कूटनीति की आधारशिला भारतीय जनता की उस समय की साझी भाषा हिंदुस्तानी को दो अलग-अलग भाषाओं में विभाजित करना थी। अंग्रेज जानते थे कि कौमी एकता का एक प्रमुख खंभा भाषा होता है और भाषा को बाँटते ही कौम भी बँट जाता है।

इस नीति के तहत फोर्ट विलयम में स्थापित भाषा कोलेज में भाषाविद गिलक्राइस्ट के नेतृत्व में हिंदी और उर्दू को अलग करने की साजिश को अंजाम दिया गया। गिलक्राइस्ट ने पंडित सदासुखलाल जैसे लेखकों की मदद से संस्कृत बहुल भाषा में कुछ पुस्तकें प्रकाशित करवाईं, और इसी प्रकार उर्दू-फारसी बहुल भाषा में और फारसी लिपि में कुछ अन्य किताबें छपवाईं और यह घोषित कर दिया कि हिंदी हिदुओं की भाषा है और उर्दू केवल मुसलमानों की। इसके अलावा अंग्रेजों ने अनगिनत मौलवियों और पंडितों को भी इस घातक धारणा को प्रचारित करने के काम में लगा दिया। कुछ ही दशकों में उनका यह प्रचार रंग लाने लगा और लोग हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएँ समझने लगे। इतना ही नहीं हिंदी को मात्र हिंदुओं की और उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा मानने लगे। इसकी परिणति देश-विभाजन और देश के विभाजन से जुड़े भयानक नर-संहार में हुई।

हिंदी-उर्दू अलग-अलग भाषाएँ हैं, यह बात कितनी बेबुनियाद है यह इस पर विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे प्रेमचंद हिंदी और उर्दू दोनों में ही लिखते थे। इसके अलावा मंटो, फिराक, राजिंदर सिंह बेदी, आदि अनेक उर्दू के लेखक मुसलमान नहीं हैं। आज भी यदि आप उत्तर प्रदेश या बिहार के देहाती इलाकों में चले जाएँ और लोगों की बातें सुनें, तो आप कह नहीं पाएँगे कि वे हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू। उर्दू-हिंदी में केवल उच्च स्तरीय लेखन और लिपि में फ़र्क है, और इस फ़र्क को दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है। लिपि की समस्या कुछ हद तक आज कम होती जा रही है क्योंकि अब बहुत सी उर्दू रचनाएँ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रही हैं और खूब बिक रही हैं क्योंकि देवनागरी लिपि में आने से वे हिंदी भाषियों को भी सुलभ हो जाती हैं।

अब अंग्रेजों के यहाँ से गए साठ से अधिक वर्ष हो गए हैं और हममें से कई लोग इस बात को समझने लगे हैं कि अंग्रेजों ने हमें कैसे उल्लू बना दिया था। पर इन समझनेवाले लोगों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया शामिल नहीं है। वह अब भी यह राग अलाप रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और उर्दू अख़ाबार की राय उन्हीं विषयों में लेने की ज़रूरत है जिनका संबंध मुसलमानों से है। आश्चर्य की बात यह है कि यही अख़बार बड़े ज़ोर-शोर से अमन की आशा नाम का अभियान चला रहा है जिसका कथित उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बुद्धि जीवियों को निकट लाना है। पर इस अख़बार को यह मामूली बात भी अब तक समझ में नहीं आ सकी है कि भारत और पाकिस्तान को निकट लाने का सूत्र दोनों की भाषा में बनाई गई कृत्रिम दरारों को दूर करने में निहित है। भारत और पाकिस्तान को पास लाने का पहला सोपान हिंदी और उर्दू का एकीकरण है। और यह एकीकरण तब तक संभव नहीं है जब तक उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा समझा जाता जाएगा। उर्दू समस्त भारत की उपज है। वह हिंदुओं और मुसलमानों, सिक्खों और अन्य समुदायों की साझी विरासत है। उसमें भाषाई नज़ाकत चरम स्थिति तक पहुँचा दी गई है और इस भाषा में गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इस अभिव्यक्ति शक्ति से अपने आपको वंचित करने के कारण ही हिंदी वह भव्यता नहीं प्राप्त कर पाई है जो वह प्राप्त कर सकती थी। हिंदी में संस्कृत के शब्द भरने और उससे आम बोलचाल के शब्दों को उर्दू के शब्द मानकर निकालने की जो ग़लती की गई, उससे उसकी अभिव्यंजना शक्ति काफी हद तक कुंठित हुई। इतना ही नहीं, उसे फिर से परिमार्जीत करने में दशकों लग गए। अब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वह संपूर्ण रूप से परिमार्जित हो गई है। यह इस बात से स्पष्ट है कि हिंदी की कविताएँ - और भाषा अपने सबसे अधिक निखरे हुए रूप में कविताओं में ही दिखाई देती है - अब भी आम आदमी के लिए दुरूह हैं। क्या आप किसी आम आदमी को निराला, जय शंकर प्रसाद, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि की कविताओं का रसास्वादन करते हुए सोच सकते हैं? इनके लिए इन महान कवियों की कविताएँ दुरूह और कठिन ही बनी हुई हैं। इसकी तुलना में उर्दू की गज़लें, ग़ालिब की रचनाएँ और और अन्य उर्दू शायरों की कविताएँ, आम लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ चुकी हैं, उनके कई अंश मुहावरों का रूप ले चुके हैं। उर्दू के कहानी-किस्से भी लोगों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। समस्त हिंदी फिल्म और फिल्मी गानों की भाषा अधिकांश में उर्दू है और उनकी लोकप्रियता को लेकर कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।

यदि हिंदी और उर्दू में कृत्रिम दरारें नहीं डाली गई होतीं, तो इस मिली-जुली भाषा ने मुग़लों के अंतिम समय में जो आश्चर्यजनक कथन शैली विकसित कर ली थी, वह अनायास ही हिंदी को प्राप्त हो गई होती और उसे कई दशक बिताकर नए सिरे से अपनी अभिव्यंजना शक्ति विकसित नहीं करनी पड़ती और हिंदी आज जहाँ पहुँच सकी है, उससे कई दशक आगे की मंजिल प्राप्त कर गई होती।

यह बात बरसों पहले डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में कही थी, और एक अनोखे संयोग से आज लगभग उन्हीं की बातों को एक समकालीन विचारक दुहरा रहे हैं। ये हैं सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जो प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग सत्यम ब्रूयत में दो महत्वूपूर्ण लेख लिखे हैं जिनका विषय उर्दू और देश-विभाजन हैं। अपने उर्दू वाले लेख में उन्होंने लगभग वे बातें दुहराई हैं जो डा. शर्मा पहले कह चुके हैं, कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा कतई नहीं है बल्कि वह भारत में रहनेवाले लोगों की साझी विरासत है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिक्ख, दलित सभी शामिल हैं। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा इस साझी भाषा को तोड़ने की कूटनीति का भी विस्तार से वर्णन किया है। अपने दूसरे महत्वपूर्ण लेख में उन्होंने पाकिस्तान को एक कृत्रिम देश करार देते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को फिर से एक होने का आह्वान किया है। यह भी डा. शर्मा अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं।

इन देशों का फिर से एक होना आज एक असंभव सी बात लग सकता है, पर यही इन देशों का प्रारब्ध है जिसे उन्हें आनेवाले पचास-सौ सालों में साकार करना होगा। आज हर युवक और विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह इस सपने को सत्य में बदलने के लिए अपना योगदान करे। शुरुआत वह उर्दू सीखकर और उर्दू साहित्य से अपना परिचय बढ़ाकर कर सकता है। इससे उसे यह अच्छी तरह समझ में आ जाएगा कि ये दोनों भाषाएँ एक ही हैं और ये दोनों भाषाएँ बोलनेवाले लोग भी वास्तव में एक ही कौम के अंश हैं, भले ही वे अलग-अलग धर्मों में विश्वास करते हों। दो धर्म, दो देश वाली विचारधारा अंग्रेजों द्वारा इस देश को कमज़ोर करने और तोड़ने के लिए फैलाया गया विषवृक्ष है। यह पाकिस्तान के बनते ही उसके दो टुकड़ों में बटने से और पाकिस्तान के आज की हालात से बखूबी स्पष्ट है। आज पाकिस्तान नाम के लिए मुसलमानों का देश है पर वहाँ मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। सुन्नी शिया को मार रहे हैं, अफगान पाकिस्तानियों को मार रहे हैं और पाकिस्तानी अफगानों, अहमदियों, बोहरा मुस्लिमों और महिलाओं पर अत्याचार ढो रहे हैं।

हम सबको इस विष-वृक्ष की जड़ें काटकर इस देश को (जिसमें उसके दो भटके टुकड़े भी शामिल हैं) मजबूत करना होगा।

Saturday, July 18, 2009

कल हमने देखी हैरी पोटर की नई फिल्म

कल मैं अपनी दोनों बेटियों के साथ हैरी पोटर एंड द हाफ ब्लड प्रिंस देख आया। मेरी पत्नी आने को राजी नहीं हुईं, उन्हें हैरी पोटर में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके लिए हम उन्हें मगल कहकर चिढ़ाते हैं। (मगल क्या है यह वे ही जानेंगे, जो हैरी पोटर और उसकी दुनिया के बारे में कुछ जानते हों)।

मैं और मेरी बड़ी बेटी हैरी पोटर के बड़े फैन हैं, और हमने इस शृंखला की हर किताब खरीदकर पढ़ी है। हमारा नियम रहा है पुस्तक रिलीज़ होने के प्रथम दिन ही उसे खरीदकर पढ़ना। घर में बेटी और मुझमें इस बात को लेकर रौर मचता है कि कौन उसे पहले पढ़ेगा। अंत में हम दोनों में समझौता हो जाता है कि जब बेटी स्कूल में हो, मैं पढ़ूंगा और उसके स्कूल से लौट आने पर मुझे किताब उसके हवाले कर देना होगा। मुझे याद है, कभी-कभी इस किताब को पूरा करने के लिए मैंने आफिस से छुट्टी रखी है और रात भर जागकर अगली सुबह तक उसे पढ़कर पूरा किया है। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है, क्योंकि इस शृंखला की बाद की किताबें 1000 पृष्ठ जितनी बड़ी हैं।

इसी तरह हैरी पोटर फिल्मों के रिलीज़ होने के पहले दिन ही उन्हें देख लेना हमारे लिए अनिवार्य है, नहीं तो ऐसा लगता है कि कुछ बहुत गलत हो गया। इसलिए हमारे लिए यह लाजिमी था कि अहमदाबाद में शुक्रवार को लंबी प्रतीक्षा के बाद जब हैरी पोटर एंड द हाफ ब्लड प्रिंस (जो इस शृंखला की छठी फ्लिम है) रिलीज़ हुई तो उसे तुरंत देख लिया जाए। टिकट आदि मिलने में कोई दिक्कत नहीं आई क्योंकि अहमदाबद मॉलों की राजधानी है और लगभग हर गली-मोहल्ले में एक मॉल है। हम एड लैब्स के थिएटर में गए, जो घर के निकट ही है। फिल्म अंग्रेजी और हिंदी दोनों में ही रिलीज़ हुई है, पर हमने अंग्रेजी में ही उसे देखा।

यह फिल्म भी अन्य हैरी पोटर फिल्मों की ही तरह भव्य थी। शुरू से ही एक्शन का धमाका शुरू हो जाता है। डेथ ईटर जिस तरह थेम्स नदी पर बने पुल को तोड़ते हैं, उसका फिल्मांकन लाजवाब है। फिल्म बड़ी तेजी से आगे बढ़ती है। कई अंशों में वह पुस्तक से भिन्न मार्ग अपनाती है, पर रोचकता अंत तक बनाए रखती है। अन्य हैरी पोटर फिल्मों में ड्रैगन, हिप्पोग्रिफ, दानव आदि कृत्रिम जानवरों का एनिमेशन सीक्वेन्स भी रहता था, पर इसमें वह सब नहीं है। केवल हैग्रिड द्वारा एक मरी हुई मकड़ी को दफनाने का छोटा सा दृश्य है। इसमें मकड़ी कोई पराक्रम नहीं करती, मरी जो है!

पुस्तक विधा का फिल्म विधा में रूपांतरण हमेशा एक कौतूहल का विषय होता है। होलीवुड इस काम में माहिर है। हैरी पोटर की किताबों में इतनी कल्पनाशील बातें हैं, कि पहली नजर में ऐसा ही लगता है कि इन्हें फिल्म माध्यम से व्यक्त करना असंभव होगा, पर अब तक आई सभी हैरी पोटर फिल्मों में इसे बखूबी कर दिखाया गया है।

हैरी पोटर की किताबें उन इने-गिने विश्व साहित्य की किताबों में से हैं जिनका हिंदी अनुवाद मूल अंग्रेजी किताब के प्रकाशित होते ही प्रस्तुत किया जा सका है। हैरी पोटर किताबों के हिंदी संस्करण को भोपाल के मंजुल प्रकाशन ने सुंदर रूप से प्रकाशित किया है। इन किताबों के अनुवादक हैं सुधीर दीक्षित। उन्होंने इन पुस्तकों का बहुत ही सफल अनुवाद किया है। मैंने प्रथम दो किताबों का हिंदी संस्करण खरीदा है और अंग्रेजी संस्करण से उनकी तुलना करके देखा है। अनुवाद मूल के बहुत निकट है और उतना ही रोचक। अनुवादक ने मूल पुस्तक के कई अंशों का देशीकरण सुंदर रीति से किया है। इससे पुस्तक की स्वाभाविकता बढ़ी है। उदाहरण के लिए मूल अंग्रेजी पुस्तक में जादुई सूत्रों के लिए लैटिन के पदों का उपयोग किया गया है। इनके लिए अनुवादक ने संस्कृत के वाक्य रखे हैं।

पुस्तक प्रकाशन के इतिहास में हैरी पोटर शृंखला एक अजीब सा फेनोमेनन है। ये पुस्तकें मुख्य रूप से बच्चों के लिए लिखी गई थीं, पर वे वयस्कों में भी उतनी ही लोकप्रिय हुईं। इन किताबों की मूल कथा भी हमारे रामायण, महाभारत आदि के समान अच्छे और बुरे की लड़ाई को लेकर चलती है। इन किताबों में हालांकि जादू की दृष्टि से सब कुछ देखा गया है, पर ये आधुनिक समाज की समस्याओं और दिशाओं का सुंदर चित्रण करती हैं और प्रगतिशील तत्वों का समर्थन करती हैं। उदाहरण के लिए इन किताबों में नशीली दवाओं के सेवन की निंदा, पारिवारिक मूल्यों का समर्थन, नस्लवाद की निंदा, अभिजातवाद की निंदी, मैत्री भावना की प्रशंसा, ऊंचे आदर्शों के लिए सब कुछ दांव पर लगाकर लड़ना, हमेशा सही बात का पक्ष लेना और विजयी होना, बुरे के साथ कभी समझौता न करना, इत्यादि सकारात्म विचारों को पोषित किया गया है, जिससे ये किताबें बच्चों पर अच्छा प्रभाव डाल सकती हैं।

हालांकि इन किताबों को लिखा है यूके की एक महिला ने (जे के रोलिंग) पर इसमें ईसाई धर्म या यूरोपीय सभ्यता के प्रति कहीं पक्षपात नहीं दिखाई देता। इस दृष्टि से इसे एनिड ब्लाइटन, विलयम, हार्डी बोइस, नेन्सी ड्रू आदि अन्य अंग्रेजी बाल साहित्य की तुलना में हमारे बच्चों के लिए अधिक उपयुक्त माना जा सकता है क्योंकि हमारे बच्चे इस किताब से आसानी से रिलेट कर सकते हैं। इन किताबों में एक दो गौण भारतीय पात्र भी हैं, जैसे होग्वर्ट्स स्कूल में पढ़नेवाली जुड़वा बहनें पद्मा और पार्वती। इन किताबों में लोगों की वेश भूषा, भोजन-पान आदि भी किसी समुदाय, वर्ग, या संस्कृति से निरपेक्ष हैं। इसलिए भी हमारे बच्चे इसे आसानी से पढ़ और समझ सकते हैं। और हमारे बच्चों को इन किताबों को अंग्रेजी में पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं है, ये किताबें हिंदी में भी उपलब्ध हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि हैरी पोटर की हिंदी किताबें भारत में हैरी पोटर के अंग्रेजी संस्करण से कई गुना ज्यादा बिकी हैं।

विदेशों में इन किताबों को लेकर इतना पागलपन है कि वहां हैरी पोटर के फैन जे के रोलिंग द्वारा पुस्तक पूरा करने से पहले ही अपनी ओर से अगला संस्करण लिखकर इंटरनेट पर डाल देते थे। मैंने हैरी पोटर के इस तरह के कई जाली संस्करण पढ़े हैं और कुछ तो इतने अच्छे हैं कि मूल जैसे ही लगते हैं। रूस के एक लेखक ने तो रूसी भाषा में हैरी पोटर पात्र को लेकर एक नई शृंखला ही शुरू कर दी है।

ऐसा हमारे यहां केवल रामायण को लेकर हुआ है। तुलसीदास, कंबन आदि की रामायण मूल वाल्मीकि रामायण जितनी ही लोकप्रिय और अच्छी बन पड़ी हैं। पर आधुनिक समय की किताबों को लेकर ऐसा देखने को नहीं मिलता। प्रेमचंद, अमृतनाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा, निराला आदि के उपन्यासों के पात्रों को लेकर अन्य लेखकों द्वारा उपन्यास लिखा गया हो, ऐसा मैंने नहीं सुना है।

हां, एक उदाहरण मुझे याद आ रहा है। यह है भगवतीशरण वर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास, टेढ़े मेढ़े रास्ते। इस उपन्यास में वर्मा जी ने एक जमींदार और उसके बेटों की कहानी सुनाई है। एक बेटा गांधीवादी बनता है, एक क्रांतिकारी और एक कम्यूनिस्ट। लेखक ने इन तीनों का पतन दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की है ये तीनों ही रास्तें वरण करने लायक नहीं हैं। इस उपन्यास को लेकर काफी बवाल मचा था और डा. रामविलास शर्मा ने उस पर एक बहुत ही तीखी आलोचना लिखी, जो इतनी व्यंग्यपूर्ण और उत्तम है कि मूल उपन्यास से भी ज्यादा रोचक है। उसमें डा. शर्मा ने उपन्यास लेखक पर आरोप लगाया है कि उन्होंने यह उपन्यास अमरीकी हितों को बढ़ावा देने और देश के विघटन को तेज करने के उद्देश्य से लिखा है।

इस उपन्यास के जवाब में रांगेय राघव ने एक उपन्यास लिखा, सीधे सच्चे रास्ते, जिसमें उन्होंने वे ही कथा-पात्र लिए जो टेढ़े मेढ़े रास्ते में हैं और उन तीनों बेटों द्वारा अपनाए गए मार्गों की अधिक सकारात्मक परिणति दिखाई। इस पुस्तक की भूमिका के रूप में उन्होंने डा. शर्मा द्वारा लिखी टेढ़े मेढ़े रास्ते की समालोचना को जोड़ दिया। इन तीनों को, यानी, टेढ़े मेढ़े रास्ते, डा. शर्मा द्वारा लिखी गई इस उपन्यास की समालोचना, और सीधी सच्चे रास्ते को, यदि कोई इसी क्रम में पढ़े, तो उसे सबसे अधिक मजा आएगा।

Wednesday, July 15, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : सहमति

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

पहले सोचा था कि डा. रामविलास शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना करते हुए राहुल जी की निराधार धारणाओं के उदाहरणों का जो ढेर लगाया है, उसका विस्तार से चर्चा करूं, पर अब सोचता हूं कि इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। आपको ही इतिहास दर्शन में इन्हें पढ़ लेना होगा। मेरा उद्देश्य डा. रामविलास शर्मा की इस महत्वपूर्ण पुस्तक की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना भर है।

प्रसंगवश कह दूं कि इस पुस्तक में ऋग्वेद चर्चा (प्रथम अध्याय) और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना (अंतिम अध्याय) के अलावा यूनानी दार्शनिक परंपरा के अंतर्विरोधों का भी सांगोपांग विवेचन हुआ है और डा. शर्मा ने प्लैटो, अरस्तू, सुकरात, देमोस्थेनेस आदि के दर्शनों पर भी इसी तरह आलोचनात्मक दृष्टि डाली है। इसके साथ-साथ सिकंदर का भारत से पलायन, यूनान और यूरोप के दार्शनिक संबंध, भारत-यूनान-यूरोप के संबंध आदि पर भी नई दृष्टि से विचार किया है।

अंत में मैं इतिहास दर्शन के राहुल संबंधी अध्याय के "उपसंहार" से कुछ अंश यहां उद्धृत करता हूं, जिसमें डा. शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की उपयोगी धारणाओं को रेखांकित किया है। उन्हीं के शब्दों में –

उनके (यानी राहुल जी के) लेखन में पूर्वाग्रहों और निराधार कल्पनाओं की ऐसी भरमार है कि उनमें उनकी थोड़ी-सी सही धारणाएं भी खो जाती हैं। पर वे महत्वपूर्ण हैं और उनमें से कुछ को मैं यहां दुहरा रहा हूं।

“वैदिक ऋषि यथार्थवादी थे। वे दुनिया को जैसा देखते थे, वैसा मानते थे और उसमें अधिक से अधिक आनंद उठाना चाहते थे।” – मानव समाज

“उपनिषदकार स्वयं, यज्ञों के व्यर्थ के लंबे-चौड़े विधि-विधान के विरुद्ध एक नई धारा निकालने वाले थे।” – दर्शन दिग्दर्शन

“पुनर्जन्म के दार्शनिक पहलू को और मजबूत करते हुए बुद्ध ने पुनर्जन्म का पुनर्जन्म प्रतिसंधि के रूप में किया... बुद्ध ने कर्म के सिद्धांत को और मजबूत किया” – वहीं

“प्रतीत्य समुत्पाद कार्यकारण को अविच्छिन्न नहीं विच्छिन्न प्रवाह मानता है। प्रतीत्य समुत्पाद के इसी विच्छिन्न प्रवाह को लेकर आगे नागार्जुन ने अपने शून्यवाद को विकसित किया।” - वहीं

“नागार्जुन का दर्शन – शून्यवाद – वास्तविकता का अपलाप करता है। दुनिया को शून्य मानकर उसकी समस्याओं के अस्तित्व से इन्कार करने के लिए इससे बढ़कर दर्शन नहीं मिलेगा।” – वहीं

“वादरायण ने कहीं भी जगत को माया या काल्पनिक नहीं माना है और न उनके दर्शन से इसकी गंध भी मिलती है कि ‘ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है’।” – वहीं

“शंकर के ब्रह्म अद्वैतवाद और सूफियों के अद्वैतवाद में कोई अंतर नहीं है।” – वहीं

“छोटे-छोटे सामंत राज्यों को विशाल राज्यों में परिवर्तित करने में बनियों का हाथ भी रहा है। हम छठी-सातवीं ई.पू., में मगध (दक्षिण बिहार) के सौदागरों को रावलपिंडी, भड़ौच, तक्षशिला, ताम्रलिप्ति अपना सार्थ लेकर क्रय-विक्रय करते देखते हैं।” – मानव समाज

“व्यापारवाद का जोर भारत तथा दूसरे एशियाई देशों में बहुत पहले से चला आता था। जावा, चीन, अरब और अफ्रीका (मिस्र) के साथ सीधा व्यापार-संबंध भारतीय व्यापारियों ने उस वक्त स्थापित किया था, जब कि अभी अरबों और आज की यूरोपीय जातियों का नाम तक सुना नहीं जाता था।” – वहीं

“सारे संघ की राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त हिंदी का अपना विशाल क्षेत्र है। हरियाणा, राजपूताना, मेवाड़, मालवा, मध्य प्रदेश, युक्त प्रांत और बिहार हिंदी की अपनी भूमि है। यही वह भूमि है जिसने हिंदी के आदिम कवियों सरह, स्वयंभू आदि को जन्म दिया। यही भूमि है, जहां अश्वघोष, कालिदास, भवभूति और बाण पैदा हुए। यही वह भूमि है जहां कुरु (मेरठ-अंबाला) और पांचाल (आगरा, रुहेलखंड) की भूमि में वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज ने ऋग्वेद के मंत्र रचे, और प्रवाहण, उद्दालक और याज्ञवल्क्य ने अपनी दार्शनिक उड़ानें कीं।” – हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयास का अध्यक्षीय भाषण

इन स्थापनाओं से भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने में सहायता ली जा सकती है।


डा. शर्मा ने अपने अनेक पुस्तकों में इतनी सारी उपयोगी विचार दिए हैं कि यदि उन्हें ईमानदारी से कार्यान्वित किया गया होता तो आज की बहुत सी समस्याओं का निराकरण हो जाता। इनमें शामिल हैं, सांप्रदायिकता, जातियतावाद, अंग्रेजी का प्रभुत्व, देश का विदेशी पूंजी के अधीन हो जाना, हिंदी-उर्दू का विवाद, भारत का विखंडन और उससे जुड़ी विकट राजनीतिक मसले (जैसे आजकल का आतंकवाद), इत्यादि।

उनकी अपनी पीढ़ी से तो यह न किया जा सका, अब आशाएं युवा पीढ़ी से है कि वह उनकी पुस्तकों का वाचन करके उनके विचारों को आत्मसात करेगी और उन्हें क्रियान्वित करेगी।
इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

Tuesday, July 14, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : ऋग्वेद के दार्शनिक महत्व का अवमूल्यन

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

राहुल जी में जो अनेक अंतर्विरोध हैं, उनमें से एक ऋग्वेद के दार्शनिक महत्व को लेकर है। वे ऋग्वेद को दार्शनिक दृष्टि से महत्वहीन मानते हैं, पर उनके ही विवेचन से ऋग्वेद का असाधारण दार्शनिक महत्व स्पष्ट होता है। पढ़िए डा. शर्मा के ही शब्दों में –

दर्शन-दिग्दर्शन में जो बात सबसे पहले उभरकर सामने आती है, वह यह है कि बौद्ध धर्म के उद्भव से पहले यहां एक शानदार दार्शनिक परंपरा थी और उसे हम धर्मनिरपेक्ष कह सकते हैं। उसमें उपासना का अभाव नहीं है किंतु स्वतंत्र चिंतन उसकी विशेषता है। वह दर्शन रूढ़िबद्ध नहीं है। उसमें अनेक धाराएं हैं। विशेष बात यह कि वह संसार को सत्य मानता है। उसे हम यथार्थवादी दर्शन कह सकते हैं। राहुल जी ने ‘बुद्ध के पहले के दार्शनिक’ शीर्षक देकर सबसे पहले चर्वाक का नाम लिया है। उनकी विचारधारा का सारांश यह बताया है : “ईश्वर नहीं, आत्मा नहीं, पुनर्जन्म और परलोक नहीं जीवन के भोग त्याज्य नहीं ग्राह्य हैं। अनुभव और बुद्धि को हमें सत्य के अन्वेषण के लिए अपना मार्गदर्शन बनाना चाहिए।“ यहां कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विरोध किसी यथार्थवादी दार्शनिक से हो। यह भौतिकवादी दर्शन है और इसकी बुनियाद, राहुल जी के अनुसार, बुद्ध से पहले डाली जा चुकी है। चर्वाक से और पहले भी यहां दार्शनिक परंपराएं थीं। सबसे पहले यहां ऋग्वेद की दार्शनिक परंपरा है। देखना चाहिए राहुल जी ऋग्वेद के दर्शन के बारे में क्या कहते हैं।

कहते हैं, “जिसे हम दर्शन कहते हैं, वह वैदिक काल में दिखलाई नहीं पड़ता।” इस तरह ऋग्वेद में यदि कोई दर्शन था, तो उसका सफाया हो गया। किंतु उसी पृष्ठ पर वह ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त से लंबा उद्धरण देते हैं। और उद्धरण के बाद कहते हैं, “यहां हम उन प्रश्नों को उठते हुए देखते हैं, जिनके उत्तर आगे चलकर दर्शन की बुनियाद कायम करते हैं। विश्व पहले क्या था? इसका उत्तर किसी ने सत अर्थात वह सदा से ऐसा ही मौजूद रहा – दिया। किसी ने कहा कि वह असत, नहीं मौजूद, अर्थात सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। इस सूक्त के ऋषि ने पहले वाद के प्रतिवाद का प्रतिवाद (प्रतिषेध) करके – ‘नहीं सत था नहीं असत -’ द्वारा अपने संवाद को पेश किया।" यदि ऋग्वेद में वे बुनियादी प्रश्न प्रस्तुत किए गए हैं, जिनसे आगे का दर्शन विकसित होता है, तो यह भी ऋग्वेद का दार्शनिक महत्व है। यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें दर्शन का नितांत अभाव है। इसके सिवा तर्क पद्धति में यह बात ध्यान देने की है कि पहले स्थापना है, फिर प्रतिस्थापना है; दोनों के बाद एक नई संस्थापना है। राहुल जी ने इसी को प्रतिवाद का प्रतिवाद कहा है और अंत में जो निष्कर्ष निकलता है, उसे संवाद कहा है। इसका अर्थ यह है कि जिसे डायलेक्टिक्स या द्वंद्ववाद कहते हैं, उसकी शुरुआत ऋग्वेद में हो चुकी है। यह ऋग्वेद का असाधारण महत्व है।

डा. रामविलास शर्मा ने ऋग्वेद का गहन अध्ययन किया है। ऋग्वेद को वे हिंदी जाति का आदि ग्रंथ मानते हैं और उसके अध्ययन में उन्होंने दस वर्ष बिताए। इसके आधार पर उन्होंने कई ग्रंथ रचे, जिनमें से एक इतिहास दर्शन भी है। भाषा और समाज और भारत के भाषा परिवार और हिंदी (तीन खंड) में भी ऋग्वेद की खूब चर्चा है। इतिहास दर्शन के प्रथम अध्याय में उन्होंने ऋग्वेद और उसे रचनेवाले ऋषियों पर अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया है। इस अध्याय में उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ऋग्वेद के संबंध में फैलाई गई भ्रांत धारणाओं का खंडन किया है। वे ऋग्वेद को सिंधु घाटी सभ्यता से पहले की चीज मानते हैं, और उसे 5 से 10 हजार साल पहले का साहित्य मानते हैं। विदेशी विद्वान उसे ईसा पूर्व 1500 के आसपास बताते हैं, यानी 3-3.5 हजार साल पुराना।

ऋग्वेद के संबंध में डा. शर्मा की कुछ महत्वपूर्ण मान्यताएं ये हैं –

  • ऋग्वेद वर्णाश्रम धर्म के प्रकट होने से पहले रचा गया है। उसमें ब्राह्मण, शूद्र के विभाजन का कोई संकेत नहीं है।
  • ऋग्वेद मात्र धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि उसमें हमारे पूर्वजों का इतिहास और स्मृतियां भी हैं।
  • ऋग्वेद रचने वाले ऋषि कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि यहीं के लोग थे।
  • सिंधु घाटी सभ्यता ऋग्वेदिक आर्यों के बाद की चीज है और दोनों में घनिष्ट संबंध है।
  • ऋग्वेदिक आर्यों की संस्कृति के अंश व्यापार, दिग्विजय आदि के कारण ईरान, यूनान, जर्मनी, मध्य एशिया आदि में फैले, जिसके प्रमाण हैं इन जब जगहों में पाई जानेवाली भाषाओं में संस्कृत के शब्दों का मिलना। पाश्चात्य विद्वानों ने गंगा की धारा को उल्टा बहाकर यह प्रमाद फैलाया कि आर्य मध्य एशिया से भारत आए। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अंग्रेजों द्वारा भारत के उपनिवेशीकरण को सही ठहराना चाहते थे और यहां के जन-समुदाय में फूट डालना चाहते थे। राहुल सांकृत्यायन जैसे कुछ देशी विद्वानों ने भी पाश्चात्य विद्वानों के इस द्वेषपूर्ण प्रचार को बिना सोचे-समझे अपना लिया। डा. शर्मा कहते हैं कि यह धारणा देश की एकता के लिए काफी घातक है क्योंकि इससे यह अर्थ भी निकलता है कि आर्य लोगों ने यहां के लोगों को मारकर दक्षिण की ओर खड़ेद दिया और उन्हें शूद्र बनाया। इस गलत धारणा को दक्षिण की द्रविड पार्टियों ने अपना लिया था और वे दक्षिण में इसी के आधार पर अलग देश की मांग भी करने लगी थीं। हिंदी विरोध में भी इस धाराणा का उपयोग किया जाता है। इसलिए आर्यों के बाहर से आने की भ्रांत धारणा को खारिज करना देश की एकता के लिए बहुत जरूरी है। हमारा सौभाग्य है कि डा. शर्मा जैसे विद्वानों के प्रयास से अब बहुत कम लोग ऐसे रह गए हैं जो इस बात को मानते हैं कि आर्य बाहर से आए थे।
  • आर्यों के बाहर से आने की धारणा को सबसे अधिक पाश्चात्य भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में माना गया है। भारत के विश्वविद्यालयों में भाषा विज्ञान के विभागों में भी इस गलत धारणा का बहुत अधिक प्रभाव है। दरअसल यहां जो भी भाषा वैज्ञानिक शोध होता है, वह पाश्चत्य विश्वविद्यालयों द्वारा नियत मानदंडों के अनुसार होता है, जो हमारे देश के हित में नहीं है। डा. शर्मा ने अपनी पुस्तकों के जरिए भाषा विज्ञान के अध्ययन के लिए नई राहें काटकर दी हैं। उन्होंने किशोरीदास वाजपेयी जैसे देशी वैयाकरणों के काम को आगे बढ़ाया है। दुख की बात यही है कि देशी विश्वविद्यालयों ने उनके इस पथ-प्रशस्तक कार्य को अब भी महत्व नहीं दिया है। हिंदी जाति की उन्नति के लिए डा. शर्मा की इन मान्यताओं के महत्व को देखते हुए, जनता को ही अपने-अपने स्तर पर उनका अध्ययन करना चाहिए और उसे आगे बढ़ाना चाहिए।


इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

(... जारी)

Monday, July 13, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : दर्शन और धर्म का घालमेल

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा


डा. शर्मा ने राहुल जी के विचारों के विवेचन के लिए उनके जिन ग्रंथों को चुना है, वे ये हैं –

  1. अकबर
  2. ऋग्वेदिक आर्य
  3. जय यौधेय
  4. दर्शन दिग्दर्शन
  5. दिमागी गुलामी
  6. दिवोदास
  7. मानव समाज
  8. विविध प्रसंग
  9. वैज्ञानिक भौतिकवाद
  10. वोल्गा से गंगा
  11. संस्कृत काव्यधारा
  12. साम्यवाद क्यों?
  13. सिंह सेनापति

इस लेख माला को ठीक से समझने के लिए आपको पहले इन किताबों को पढ़ लेना चाहिए।

राहुल जी की सबसे महत्वपूर्ण दर्शन ग्रंथ दर्शन-दिग्दर्शन है। डां. शर्मा ने उसका बारीकी से अध्ययन करके उनमें विद्यमान अंतर्विरोधों को उजागर किया है। वे कहते हैं कि इस ग्रंथ में राहुल जी ने बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश की है, और इसके लिए उन्होंने भारत की बौद्धेतर दार्शनिक परंपराओं का मूल्य कम आंका है। इतना ही नहीं राहुल जी पर पाश्चात्य विद्वानों का अत्यधिक प्रभाव है और उन्होंने इन विद्वानों की अनेक भ्रांत और द्वेषपूर्ण धारणाओं को बिना विचारे अपना ही नहीं लिया है, अपनी उर्वर कल्पनाशीलता से काम लेते हुए उन्हें और पुष्ट भी किया है, विशेषकर अपने उपन्यासों और कहानियों में।

अपनी पुस्तक दर्शन-दिग्दर्शन में राहुल जी भारतीय दर्शन परंपरा की चर्चा केवल आठवीं-नौवीं सदी तक ही करते हैं पर पाश्चात्य दर्शन परंपरा को प्लेटो के समय से लेकर ठेठ आधुनिक समय तक खींच लाते हैं। इससे भारतीय दर्शन शास्त्र अपनी पूरी भव्यता के साथ इस किताब में नजर नहीं आता। इतना ही नहीं भारत में दर्शन हमेशा से धर्म-निरपेक्ष रहा है, पर राहुल जी धर्म और दर्शन का घाल मेल कर देते हैं, और भारतीय दर्शन परंपरा को हिंदू परंपरा, बौद्ध परंपरा, जैन परंपरा, मुसलमान परंपरा आदि में बांटकर उसके वैभव को नष्ट कर देते हैं। पर यही नीति वे पाश्चात्य दर्शन के संबंध में नहीं करते, जिनके कई प्रवर्तक खुलेआम धर्माचार्य भी थे। इससे पाश्चात्य दर्शन उनकी किताब में धर्म-निरपेक्ष के रूप में दिखाई देता है, जब भारतीय दर्शन धर्म से बंधा हुआ। यह भी राहुल जी पर पाश्चात्य चिंतन के अत्यधिक प्रभाव का एक उदाहरण है।

दर्शन दिग्दर्शन की भूमिका के आरंभ में राहुल जी ने राधाकृष्णन का यह वाक्य उद्धृत किया है –
“प्राचीन भारत में दर्शन किसी भी दूसरी साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न हो, सदा एक संवतंत्र स्थान रखता रहा है।”


इस पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं -
“भारतीय साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न रहा हो किंतु धर्म का लग्गू-भग्गू तो वह सदा से चला आता है और धर्म की गुलामी से बदतर गुलामी और क्या हो सकती है?”


इस पर डा. शर्मा अपनी पुस्तक इतिहास दर्शन में यह टिप्पणी करते हैं –

पाश्चात्य लेखक अक्सर भारत में दर्शन का अस्तित्व अस्वीकार करते हैं। उनका तर्क होता है भारत में धर्म तो है लेकिन विवेकसम्मत दर्शन नहीं है। राहुल जी ने उन्हीं की बात अपने शब्दों में दुहराई है। यदि भारतीय दर्शन धर्म का पिछलग्गू बना रहा तो इसमें बौद्ध दर्शन भी शामिल होगा। यदि धर्म की गुलामी से बतदर और कोई गुलामी नहीं है, तो इस गुलामी के शिकार स्वयं राहुल सांकृत्यायन भी थे। इसलिए कि वे बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन में सदा फर्क नहीं करते। बोद्ध दर्शन ही नहीं, बौद्ध धर्म के प्रति उनका आग्रह कभी-कभी विवेक की सीमा पार कर जाता है। राहुल जी में अनेक अंतर्विरोध हैं। इन अंतर्विरोधों को ध्यान में रखते हुए उनका मूल्यांकन करना चाहिए।


इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.


(...जारी)

Sunday, July 12, 2009

राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

पिछले एक पोस्ट, क्या ब्लोग साहित्य है? में मैंने राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं के बारे में डा. रामविलास शर्मा के मत का जिक्र किया था, जो उन्होंने अपनी पुस्तक इतिहास दर्शन के "इतिहास दर्शन और राहुल सांकृत्यायन" वाले अध्याय में व्यक्त किए हैं।

यह पुस्तक वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

इस लेख पर जो टिप्पणियां प्राप्त हुईं उनमें से दो टिप्पणियों में इस उल्लेख के बारे में क्षोभ व्यक्त किया है। एक टिप्पणी स्मार्ट इंडियन की है और दूसरी अजित वडनेरकर की।

इस मामले में मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी लग रहा है ताकि यह धारणा न बने कि मैं राहुल सांकृत्यायन जैसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण हिंदी साहित्यकार के प्रति अवज्ञा या अनादर रखता हूं। बात ऐसी नहीं है। मेरे लिए सभी हिंदी साहित्यकार आदरणीय और पूज्य हैं, पर मैं उन्हें और उनके साहित्य को अलग-अलग समझता हूं। साहित्यकारों की हिंदी सेवा के सामने नत-मस्तक होते हुए भी मैं उनके साहित्य को स्वतंत्र दृष्टि से देखने-परखने का पक्षधर हूं। साहित्य समय-सापेक्ष होता है और उसमें साहित्यकार के पूर्वाग्रह, उसके समय के ज्ञान की सीमाएं, उसकी परिस्थितियां आदि का अनिवार्य प्रभाव पड़ता है। इन सब प्रभावों से नियंत्रित होकर वह जो साहित्य रचता है, उसके कुछ या अधिक अंश ऐसे भी हो सकते हैं जो बाद की पीढ़ियों के लिए अनिष्टकारी हों। इसलिए किसी साहित्य को ग्रहण करने से पहले उसे भली-प्रकार ठोंक-बजा लेना बुद्धिमानी है। साहित्य का हम पर काफी गहरा असर पड़ता है और वह हमारे सोचने-जीने के नजरिए को बदलने की ताकत रखता है। इसलिए किसी साहित्य को अपनाते समय यह जान लेना जरूरी है कि वह हम पर किस तरह का प्रभाव डाल सकता है।

हमारे यहां एक दुखद प्रवृत्ति देखी जाती है कि हम “बड़े” लोगों को, चाहे वे साहित्यकार हों या नेता, पूजनीय बनाकर किसी चबूतरे पर बिठा देते हैं और उनके साहित्य को पढ़ना या उनके उपदेशों पर आचरण करना जरूरी नहीं समझते। राहुल सांकृत्यायन जैसे साहित्यकारों की रचनाओं पर आलोचनात्मक दृष्टि डालकर इस प्रवृत्ति को कमजोर किया जा सकता है। मैं चाहता हूं कि लोग राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को पढ़ें और पढ़ते वक्त अपनी क्षीर-नीर बुद्धि को भी साथ में रखें।

स्मार्ट इंडियन और अजित वडनेरकर की टिप्पणियों का स्पष्टीकरण मुझे डा. शर्मा की उक्त पुस्तक के अंश देकर करना होगा। यह काम अनेक पोस्टों में करना पड़ेगा अन्यथा बात बहुत नीरस हो जाएगी।

डा. शर्मा बड़े ही गंभीर समालोचक हैं और उनकी लेखनी को चंद पस्टों में समेटना खतरे से खाली नहीं है। उससे अतिसरलीकरण हो सकता है और उनकी मूल भावना विकृत हो सकती है। इसलिए पाठकों से मेरा निवेदन है कि इस लेख माला को एक संकेत मात्र मानकर उनकी किताब इतिहास दर्शन को ही पढ़ने की कोशिश करें, और उसी के आधार पर अपना मत बनाएं, न कि मेरे इन लेखों के आधार पर।

एक दूसरी बात भी कहना आवश्यक है। डा. शर्मा के विचार उनके अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े हैं। जो विचार बीज रूप में एक किताब में आए हैं, उन्हें उनकी किसी अन्य किताब में और उन्मीलित किया गया है। इसलिए उनकी विचारधारा को समझने के लिए आपको उनकी संपूर्ण रचनावली को पढ़ना पड़ेगा। यह काम आपके लिए आसान नहीं होगा क्योंकि डा. शर्मा ने अपने लंबे और अत्यंत अनुशासित एवं कर्मठ जीवनकाल में लगभग 100 किताबें लिखी हैं, हिंदी साहित्य, हिंदी जाति, हिंदी साहित्यकार, राजनीति, इतिहास, कूटनीति आदि पर। अब तक किसी प्रकाशक ने इन सबको संकलित करके एक रचनावली के रूप में प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं दिखाई है, हालांकि उनकी अधिकांश किताबें राजकलम प्रकाशन, दिल्ली और वाणी प्रकाशन, दिल्ली से निकली हैं। ये हिंदी के चोटी के प्रकाशन-गृह हैं और सभी बड़े हिंदी पुस्तक विक्रय केंद्रों में इनकी किताबें मिलनी चाहिए। आप डाक से भी किताबें मंगा सकते हैं। इसलिए आपको उनकी किताबों को प्राप्त करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

पर डा. शर्मा की पुस्तकों को अवश्य पढ़ें, आपका पूरा नजिरया ही बदल जाएगा कई मामलों के बारे में और आजकल की राजनीति, सामाजिक जीवन, साहित्य आदि से जुड़ी अनेक गुत्थियां आपके लिए खुल जाएंगी।

तो शुरू करते हैं, राहुल सांकृत्यायन की पुस्तकों पर डा. शर्मा की समालोचना से परिचय प्राप्त करना।

डा. शर्मा इतिहास दर्शन की भूमिका में लिखते हैं –

राहुल जी हिंदी के माध्यम से जनता में ज्ञान-विज्ञान का प्रसार करना चाहते थे, हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध करना चाहते थे। पर हिंदी भाषियों के जातीय विकास की रूपरेखा उनके सामने अस्पष्ट थी, इस विकास में जनपदों और संप्रदायों की भूमिका अस्पष्ट थी। साहित्यिक हिंदी का विकास अधिकतर पूर्वी जनपदों में हुआ था पर इन्हें एक ही जातीय प्रदेश के अंतर्गत न मानकर वह उन्हें स्वतंत्र जातीय क्षेत्रों के रूप में पुनर्गठित करना चाहते थे। उनका यह प्रयास बौद्धकालीन भारत के मानचित्र से प्रेरित था। जातीय संस्कृति की रूपरेखा स्पष्ट न होने से राहुलजी हिंदू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति की बात करते थे, हिंदी का संबंध हिंदुओं से उर्दू का संबंध मुसलमानों से जोड़ते थे। अंग्रेजी राज कायम होने से पहले दरबारी साहित्य में और दरबारों के बाहर रचे जाने वाले साहित्य में हिंदू और मुसलमान एक साथ हैं। राहुलजी की दृष्टि से यह इतिहास ओझल रहता है। उर्दू और हिंदी दो भाषाएं नहीं हैं, उनमें क्रियापदों, सर्वनामों आदि की बुनियादी एकता है, काफी परिमाण में राष्ट्रीय और जनवादी साहित्य उर्दू में भी लिखा गया है, हिंदी के अनेक लेखक उर्दू के लेखक भी थे - इन तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है। राहुलजी की मान्यताएं समाजसंबंधी हमारी आज की धारणाओं को प्रभावित करती हैं, इसलिए उनका विवेचन प्रासंगिक है।

इसके बाद डा. शर्मा ने राहुल जी की साहित्यिक यात्रा का संक्षिप्त परिचय देकर उसके दो पहलुओं का विशद विवेचन किया है, जो हैं, इतिहास और दर्शन।

आगे के पोस्टों में मैं उनके विवेचन के केवल कुछ चुने हुए अंशों को प्रस्तुत करूंगा। बाकी आपको वहीं पढ़ना पड़ेगा।

(...जारी)

Friday, July 10, 2009

क्या ब्लोग साहित्य है?

आजकल ब्लोगजगत में एक बहस खूब उफान ला रहा है - क्या ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है?

कुछ लोग साहित्य और ब्लोग की तुलना को हंस और कौए को एक पांत में बिठाना कह रहे हैं, तो कोई पलटवार करके साहित्य को ही कागज में छपा बासी ब्लोग बता रहे हैं।

ब्लोगजगत को यह विषय इतना गंभीर लग रहा है कि उस पर एक बकायदा संगोष्ठि ही की जा रही है आज रायपुर में। अध्यक्ष हैं, छींटें और बौछारें के सुपरिचित ब्लोगर श्री रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी)।

तो सच क्या है, ब्लोग साहित्य है या नहीं? जानिए जयहिंदी का दृष्टिकोण।

साहित्य वह चीज है जिसमें किसी जाति (जाति शब्द को अंग्रेजी के नेशनैलिटी के समतुल्य के रूप में यहां प्रयोग किया गया है) के लोग अपनी आकांक्षाओं, सपनों, इच्छाओं, भावों और आहों की झलक पाते हैं। उसका लिखित होना जरूरी नहीं है, वेद सहित अधिकांश साहित्य मौखिक ही रहे हैं, और यही स्थिति अब भी बनी हुई है, लोक साहित्य को देखिए।

साहित्य जनता की आवाज होता है। वह जनता को प्रेरणा देता है, सही दिशा दिखाता है, सांत्वना देता है, उसका उत्साह बढ़ाता है, उसका मनोरंजन करता है और उसकी अभिरुचियों का परिष्कार करता है। थोड़े शब्दों में कहें, तो साहित्य जन-कल्याणकारी होता है। स्वांतः सुखाय जो लिखा जाता है वह अधिकांश में श्रेष्ठ साहित्य की कोटि में नहीं आता। इसी तरह जो किसी छिपे एजेंडा को लेकर लिखा जाता है, वह प्रोपेगैंडा है, साहित्य नहीं, और उसका उद्देश्य किसी खास वर्ग के हितों को बढ़ावा देना होता है, न कि समस्त जन-समूह का। इसके उदाहरण के स्वरूप हम रुड्यार्ड किप्लिंग को ले सकते हैं। उन्होंने खूब लिखा है और वे अंग्रेजी के प्रख्यात साहित्याकार भी माने जाते हैं। उन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला है। पर उनका सारा साहित्य अंग्रेजों के साम्राज्यवाद को सही ठहराने के उद्देश्य से लिखा गया है, और वह उपनिवेशी समुदायों को दोयम दर्जे का सिद्ध करने का प्रयास मात्र है।

रुड्यार्ड किप्लिंग का उदाहरण महत्वपूर्ण है। उनके समय में उन्हें एक बहुत भारी साहित्यकार माना जाता था, पर जब बाद में उनके लिखे का बारीक विश्लेषण किया गया, तो उनमें निहित द्वेषात्मक अंश बाहर आने लगे और अब वे पूर्णतः डिसक्रेडिट हो चुके हैं।

यदि हींदी का ही उदाहरण लेना हो, तो हम राहुल सांकृत्यायन को ले सकते हैं। रुड्यार्ड किप्लिंग के ही समान उन्होंने भी खूब लिखा है, और उन्हें अपने समय में एक बहुत बड़ा साहित्यकार माना जाता था। पर बाद में जब उनके साहित्य का विश्लेषण किया गया, तो पाया गया कि उसके कई अंश घोर नस्लवादी हैं। उनमें गलत और अहितकारी जानकारी की भरमार है - उदाहरण के लिए, वे यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि आर्य यूरोप से भारत आए थे, बौद्ध धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म है, बौद्ध धर्म का क्षणिकवाद मार्क्सवाद ही है, इत्यादि। डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास दर्शन’ में राहुल सांकृत्यायन की संपूर्ण रचनावली का सूक्ष्म विश्लेषण करके दिखाया है कि इस लेखक की मान्यताएं भारतीय राष्ट्र की उन्नति के लिए कितनी घातक साबित हो सकती हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण सीख हमें मिलती है। कोई लेखन श्रेष्ठ साहित्य तभी बनता है, जब उसमें जन-कल्याणकारी प्रवृत्ति हो, और जो समय की कसौटी पर खरा उतरे। रुड्यार्ड किप्लिंग या राहुल सांकृत्यायन की रचनाएं दोनों कसौटियों पर फेल हो जाती हैं।

इससे एक और बात स्पष्ट होती है। सब सुंदर लेखन श्रेष्ठ साहित्य हो, यह जरूरी नहीं है। रुड्यार्ड किप्लिंग या राहुल सांस्कृत्यायन की रचनाएं बहुत सुंदर कला कृतियां हैं, पर मात्र इससे वे श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाएं नहीं बन जातीं, क्योंकि उनमें सौदर्य के साथ-साथ अकल्याणकारी विष की बूंदें भी मौजूद हैं। हां, यह जरूर है कि सब श्रेष्ठ साहित्य सुंदर भी होता ही है, रामचरितमानस को ही ले लीजिए। सुंदर होना साहित्य का आवश्यक गुण है, पर वह पर्याप्त नहीं है। श्रेष्ठ साहित्य होने के लिए किसी रचना को सुंदर होने के साथ-साथ जन-कल्याणकारी भी होना चाहिए। इसे हम आचार्य रामचंद्र शुल्क के शब्दों में यों कह सकते हैं, श्रेष्ठ साहित्य वह है जिससे लोक-मंगल की साधना हो।

इस कठिन कसौटी पर कसा जाए, तो बहुत कुछ जो लिखा जा रहा है, चाहे वह ब्लोगों में हो, या पुस्तकों में या पत्र-पत्रिकाओं में, अंग्रेजी में, या हिंदी में, वह श्रेष्ठ साहित्य कहलाने के लायक नहीं है।

बात शुरू हुई थी, इस सवाल से कि क्या ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है?

यदि ऊपर के विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह सवाल जरा प्रिमेचर लगता है। आखिर हिंदी ब्लोग हैं ही कितने पुराने, यही चार-छह साल। इतने कम समय में उनमें कोई स्थायी महत्व की सामग्री आई भी है यह कहना मुश्किल है। यदि आज ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह बीस-पच्चीस साल बाद भी पढ़ा जाता रहे, तब इस पर विचार किया जा सकता है कि वह साहित्य कहलाने लायक है या नहीं। और तब भी कसौटी वही रहेगी, क्या वह लेखन जन कल्याणकारी है? क्या उसमें लोक-मंगल की साधना है? क्या उसमें प्रोपेगैंडा या किसी विशेष वर्ग के हित-साधन का प्रयास तो नहीं है? क्या वह स्वांतः सुखाय लिखा गया है?

इसलिए ब्लोग में जो लिखा जा रहा है, वह साहित्य है या नहीं, इसकी चिंता अभी न करके, ब्लोगों में श्रेष्ठ सामग्री भरने की ओर हमें ध्यान देना चाहिए। साहित्य बहुत ऊंची चीज है, और हर ठेले हुए लेखन को उसके स्तर पर उठाया नहीं जा सकता। पर हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि हम अच्छा लिखें, सुंदर लिखें, कल्याणकारी चीजें लिखें। ऐसे लेखन के साहित्य के स्तर के बनने की संभावना अधिक है। और यह ब्लोगों पर ही नहीं, अन्य प्रकार के लेखनों पर भी समान रूप से लागू होता है।

Tuesday, June 16, 2009

हिंदी महाजाति की अवधारणा और डा. रामविलास शर्मा

गांधी जी का अधूरा काम वाले पोस्ट में मैंने डा. रामविलास शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस सुझाव का जिक्र किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि समस्त हिंदी भाषी प्रेदश को एकीकृत करके एक विशाल हिंदी राज्य बना देना चाहिए, उसी तर्ज पर जैसे तमिल, मलयालम, गुजराती आदि अन्य भाषाओं के लिए अलग राज्य बनाए गए हैं।

इस लेख की टिप्पणियों में गिरिजेश राव और समीर लाल (उड़न तश्तरी) ने शंका प्रकट की कि यह आज की परिस्थिति में शायद व्यावहारिक नहीं होगा।

तो आइए देखें, कि डा. शर्मा ने उक्त प्रस्ताव क्यों रखा था और वे इसे व्यावहारिक क्यों समझते थे। डा. शर्मा भारत के चोटी के विचारक हैं और उनके कलम से इस तरह का प्रस्ताव बिना मजबूत कारण के नहीं आएगा।

इस संबंध में डा. शर्मा के विचार अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े हैं, पर इसका सबसे सुलझा हुआ विवेचन उनके महा ग्रंथ “भाषा और समाज”, वाणी प्रकाशन, में देखने को मिलता है। इस पुस्तक में उन्होंने भाषा के उद्भव से लेकर हिंदी भाषा के वर्तमान स्वरूप तक की हजारों सालों की यात्रा का अत्यंत सुस्पष्ट विवेचन किया है।

उनका कहना है कि जिस काल में भाषा का उद्भव हुआ था, उस अति प्राचीन काल में मनुष्यों की समाज व्यवस्था आदि साम्यवाद के जैसे थी। यानी मनुष्य छोटे समूहों में रहता था जिसके सभी सदस्य एक दूसरे के साथ खून के रिश्ते से जुड़े होते थे। इसी तरह की समाज व्यवस्था मनुष्य के निकट के संबंधी गोरिल्ला, चिंपैंजी आदि नरवानरों में भी देखने में आती है।

मनुष्यों की इन टोलियों को डा. शर्मा गण का नाम देते हैं, जिसे ट्राइब, कबीला आदि भी कहा जा सकता है। इनमें एक प्रधान पुरुष होता था, और उसके भाई-बहन, बीवी-बच्चे आदि से गण बना होता था। जीविकोपार्जन का मुख्य जरिया शिकार या फल आदि बटोरना होता था। संपत्ति नाम की कोई चीज किसी के पास नहीं थी। केवल जमीन थी, जिसमें यह गण आहार खोजता था। इस पर गण के सभी सदस्यों का, स्त्री-पुरुष दोनों का, समान अधिकार होता था। अपने क्षेत्र की रक्षा गण के सदस्य अन्य मनुष्यों से करते थे। लड़ाई-झगड़े मुख्यतः गणों के बीच होती थी। इन लड़ाइयों में गण के सभी सदस्य भाग लेते थे।

कहने का मतलब है कि वर्ण-व्यवस्था का उद्भव नहीं हुआ था और ऊंच-नीच, जांति-पांति की अवधारणा अभी नहीं बनी थी।

मनुष्य के इस आदि अवस्था की सबसे महान उपलब्धि ऋग्वेद है। यह उसी अवस्था में रची गई थी। डा. शर्मा कहते हैं कि ऋग्वेद में जांति-पांत, ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि का उल्लेख नहीं है। ऋचाएं सभी रचते हैं, लोहार भी, बढ़ई भी, पशुपालक भी, सभी। युद्ध भी सभी लड़ते हैं। क्षत्रियों का अलग वर्ग तब नहीं था। देवी-देवता भी गण के सदस्यों जैसे ही थे, उनका मनुष्यों से ऊंचा स्थान नहीं था। ऋग्वेद के मंत्र रचनेवाले लोग देवी-देवताओं को उसी तरह संबोधित करते हैं, जिस तरह किसी मित्र को या भाई को।

लेकन जब गणों की संख्या बढ़ने लगी, और कृषि आदि का विकास होने लगा और लोगों में संपत्ति इकट्ठी होने लगी, तो समाज व्यवस्था थोड़ी और जटिल हो गई। रक्त संबंधों पर आधारित गण व्यवस्था अपर्याप्त साबित होने लगी। गणों के बीच व्यापार भी बढ़ने लगा और अनेक गण एक ही स्थान में विनिमय आदि के लिए इकट्ठे होने लगे। इन्हीं स्थलों ने बाद में नगरों का रूप लिया। इससे रक्त संबंध कम महत्वपूर्ण होने लगा। विभिन्न पेशे भी बनने लगे, जिनमें से कुछ अधिक महत्वपूर्ण और कुछ कम महत्वपूर्ण समझे जाने लगे। अधिक महत्वपूर्ण समझे जानेवाले पेश अपनाए हुए लोगों में पैसे और अधिकार भी जमा होने लगे। इस तरह समाज में सत्ता और धन का असमान वितरण होने लगा। इसी से वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ। जिनके हाथ में सत्ता और अधिकार था, वे क्षत्रिय कहलाए, क्षत्रियों द्वारा दूसरों पर राज करने को सही ठहराने वाले तर्क-जाल बुननेवालों को ब्राह्मण कहा जाने लगा, व्यापार में संलग्न लोगों को वैश्य कहा जाने लगा, और बाकी सब कारीगरों को शूद्र कहा जाने लगा। यह व्यवस्था भारत में ही नहीं दखी गई है, बल्कि सभी सभ्यताओं में मनुष्य के इस अवस्था में पहुंचने पर यह प्रकट हुई है।

इसी व्यवस्था को सामंतवाद कहा जाता है। धर्म और सामंतवाद का उद्भव एक साथ होता है। धर्म का मुख्य काम समाज में धन और अधिकारों के असमान वितरण को सही ठहाराना होता है।

यजुर्वेद के समय तक आते-आते समाज की यह व्यवस्था पुख्ता हो चुकी थी। युजुर्वेद में वर्ण-व्यवस्था के अनेक प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य शूद्र का उल्लेख भी है। यजुर्वेद ऋग्वेद के लगभग एक हजार साल बाद अस्तित्व में आया है।

मानव विकास की इस अवस्था में सामंतवाद प्रगतिशील भूमिका निभाता है, वह रक्त संबंधों पर आधारित समाज व्यवस्था को और व्यापक बनाकर अनेक गणों को मिलकार एक जाति का निर्माण करता है।

डा. शर्मा ने जाति शब्द का बहुत विशिष्ट प्रयोग किया है। वे इसे अंग्रेजी के नेशन शब्द के समतुल्य के रूप में प्रयोग करते हैं। उनके लिए जाति शब्द अंग्रेजी के कास्ट शब्द के समतुल्य अर्थ बिलकुल नहीं रखता। डा. शर्मा की पुस्तकों को पढ़ते समय इस शब्द के इस खास अर्थ को समझना बहुत जरूरी है।

जाति का गहरा संबंध भाषा से होता है। दरअसल एक ही भाषा बोलनेवाले लोग मिलकर ही जाति का निर्माण करते हैं। जब गण टूट जाते हैं, तो लोगों को जोड़नेवाला तत्व भाषा ही रह जाता है। एक ही भाषा बोलनेवाले लोगों में परस्पर एक विशिष्ट संबंध सा बनता जाता है, जिसे सामंतवाद भी खूब बढ़ावा देता है। जाति और भाषा के प्रारंभिक विकास में सामंतवाद की भी बड़ी भूमिका है।

जब सामंतवाद खूब बढ़ने लगता है, तो वर्ण-व्यस्था भी अपर्याप्त साबित होने लगती है। विनिमय केंद्रों के रूप में बड़े-बड़े नगर बनने लगते हैं। इन नगरों में सभी जातियों के लोग एकत्र होते हैं। नगरों में एक ही जाति के व्यक्ति का अपनी ही जाति के व्यक्ति से कम संपर्क होता है, और उसका नित्य अन्य जाति के लोगों के साथ अधिक संपर्क होने लगता है। इससे जातीय बंधन टूटने लगता है। इसके साथ ही सभी जातियों द्वारा एक ही भाषा के प्रयोग से सभी जाति के लोगों में अपनी भाषा के प्रति विशिष्ट लगाव पैदा होता है, और लोग अपनी पहचान भाषा के आधार पर करने लगते हैं। इस तरह हिंदी, तमिल, बंगाली, गुजराती आदि होने का लोगों को बोध होने लगता है। यह बोध अन्य सभी पहचानों से अधिक प्रबल होता है। इसमें धर्म और जाति (कास्ट) भी शामिल है।

जब यह बोध काफी प्रबल हो जाता है, तो महाजाति का निर्माण होता है। हिंदी, तमिल, गुजराति आदि डा. शर्मा की शब्दावली में महाजातियां हैं।

और राष्ट्र इन्हीं महाजातियों के मिलन से बनता है। इस तरह भारत-राष्ट्र हिंदी, तमिल, गुजराति आदि महाजातियों के मिलन से बना है। इन महाजातियों में से कोई सर्वोपरि नहीं है। सभी समान हैं।

अब इस सवाल को समझना अधिक आसान है कि डा. शर्मा ने सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर इतना जोर क्यों दिया। सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर ही हिंदी महाजाति निखर सकेगी। इससे ही हिंदी भाषियों में यह पहचान बनेगी कि हिंदी भाषा बोलने के नाते हम विशिष्ट हिंदी महाजाति, के अंग हैं। और इस बोध के बलवती होने पर ही हिंदी भाषी अपनी महाजाति को विकसित करने की ओर ध्यान देने लगेंगे।

आज स्थिति यह है कि हिंदी क्षेत्र अनेक टुकड़ों में बंटा हुआ है और इनके बीच की गलत राजनीति के कारण हिंदी भाषियों की शक्ति भी बंटी हुई है। इतना ही नहीं हिंदी महाजाति का बोध होना तो दूर, हिंदी भाषी अपने आपको राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, हरियणवी, भोजपुरी, लखनवी आदि के रूप में ज्यादा पहचानते हुए, अपने अधिक विराट हिंदी महाजाति के सदस्य होने की अस्मिता को भूलते जा रहे हैं। उनमें हिंदी महाजाति का अंग होने का बोध तक नहीं है, न ही वे हिंदी महाजाति को सुदृढ़ करने के लिए प्रयासरत ही हैं।

इससे भारत राष्ट्र कमजोर होता है। पहले बताया था का राष्ट्र इन्हीं महाजातियों का जमघट है। यदि इनमें एक भी महाजाति अपनी पूर्ण संभावना को प्राप्त न करे, तो इससे राष्ट्र कमजोर हो जाएगा।

दूसरे हिंदी महाजाति का क्षेत्र भारत के एक अत्यंत सामरिक भाग में है। यहां रह रहे लोगों ने सह्राब्दियों से भारत राष्ट्र की नियति का नियमन किया है। इसे आर्यावर्त (वैदिक काल में), हिंदुस्तान (मुसलमानों के काल में) आदि विशिष्ट नामों से पुकारा गया है। जब भी इस क्षेत्र में रह रही महाजाति सुदृढ़ थी, भारत भी अजेय था, और अन्य महाजातियां भी सुरक्षित थीं। पर जब भी हिंदी महाजाति कमजोर हुई, भारत भी लड़खड़ाने लगा था।

इसलिए हिंदी महाजाति को मजबूत करना भारत राष्ट्र की सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए आवश्यक है। यह तभी संभव है जब सभी हिंदी भाषी प्रदेशों को एकीकृत किया जाएगा और हिंदी भाषियों में एक महाजाति के सदस्य होने का बोध पैदा होगा। इसकी पहली कसौटी होगी हिंदी प्रदेश का राजनीतिक एकीकरण।

अब रहा व्यावहारिकता का प्रश्न। इसका भी जवाब डा. शर्मा ने दिया है। वे कहते हैं कि लोग हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर घबरा जाते हैं, और सोचते हैं कि इतने बड़े क्षेत्र पर एककीकृत शासन भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था को जन्म देगा। लेकिन डा. शर्मा इससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि यदि हिंदी महाजाति का बोध मजबूत हो, और उसके आधार पर हिंदी प्रदेश को एकीकृत किया जाए, जो निष्ठावान प्रशासक इतने बड़े क्षेत्र का भी अच्छी तरह प्रबंध कर सकते हैं। आखिर यदि चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, शेरशाह सूरी, अकबर आदि इतने बड़े प्रदेश को एकीकृत रख सकते थे, तो हम क्यों नहीं।

डा. शर्मा हिंदी प्रदेश की आज की बिखरी हुई अवस्था का ऐतिहासिक कारण भी हमें समझाते हैं। वे कहते हैं कि यह अंग्रेजों की कूटनीति का परिणाम है। अंग्रेजों को इसी प्रदेश में 1857 में हिंदुओं और मुसलमानों के सम्मिलित प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। यह इसका परिचायक है कि 1857 से पहले हिंदी महाजाति का अवबोध लोगों में आज से कहीं ज्यादा मात्रा में विद्यमान था। 1857 के बाद अंग्रेज समझ गए कि इस महाजाति को तोड़े बगैर वे भारत में टिके नहीं रह सकते।

हिंदी महाजाति को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने अनेक प्रकार की कूटनीति अपनाई। इनमें से एक हिंदी भाषा को तोड़ना भी था। ग्रिएर्सन आदि अंग्रेज भाषाविदों को काम पर लगाकर अंग्रेजों ने हिंदी भाषा के हिंदी और उर्दू ये दो रूप कर दिए और यह झूठा प्रचार भी कर दिया कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की। अंग्रोजों ने इस कूटनीति को कितने घातक रूप से अंजाम दिया इसका पूरा ब्योरा डा. शर्मा ने अपनी किताबों में दिया है।

अंततः अंग्रेज अपनी कूटनीति में सफल हुए और पाकिस्तान का उदय हुआ। और इधर भारत में हिंदी महाजाति भी धराशायी हो गई।

डा. शर्मा कहते हैं कि आजाद भारत को अंग्रेजों की इस विषैली नीति को निरस्त करने का प्रयास करना चाहिए और हिंदी महाजाति को एक बार फिर उठाना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने हिंदी प्रदेश के एकीकरण की बात की है।

इसके बारे में एक प्रश्न और उठ सकता है। हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर अन्य भाषा-भाषी घबरा जाएंगे, और वे उसका विरोध करेंगे। इसका भरपूर उत्तर डा. शर्मा ने अपनी दूसरी किताब “भारत की भाषा समस्या” में दी है, जो भी वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

वे कहते हैं कि आज सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों का असली दुश्मन हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेजी है। अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों को, यानी भारतीय राष्ट्र का निर्माण करनेवाली सभी महाजातियों को घुन की तरह कमजोर कर रही है।

यदि सभी भारतयी भाषाओं को यह बात ठीक प्रकार से समझाई जा सके, तो वे हिंदी को अपनी बहन मानेंगे और उसके साथ सहयोग करते हुए अंग्रेजी को इस देश से हटाने में पूरा सहयोग करेंगे। इससे हमारा राष्ट्र और भी मजबूत हो उठेगा।

Monday, June 15, 2009

गांधी जी का अधूरा काम

अंग्रेजों के समय देश का प्रशासकीय गठन उनके द्वारा विजित प्रदेशों के अनुसार और भारत में उनके आगमन के क्रम के अनुसार किया गया था। सबसे पहले वे कलकत्ता पहुंचे थे, और वहीं उनकी पहली विजय भी हुई थी। 1757 की प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर की दगाबाजी के फलस्वरूप सिराजुद्दौला को हराकर अंग्रेजों ने बंगाल के विशाल प्रदेश को जीत लिया था। वहां उनका पहला प्रांत बना। इसी तरह बंबई और मद्रास में बड़े-बड़े प्रांत बने। 1857 के बाद संयुक्त प्रांत, सेंट्रल प्रोविन्स, नोर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स आदि प्रशासकीय क्षेत्र बने। इन सबका गठन करते हुए अंग्रेजों ने उनमें रह रही जनता की आकांक्षाओं, सुविधाओं और विकास की संभावनाओं का कोई खयाल नहीं रखा।

इसलिए जब कांग्रेस की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई, तो उन्होंने देश में अधिक वैज्ञानिक तरीके से प्रशासकीय इकाइयां गठित करने पर विचार किया। वे तथा उनके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भाषा के आधार पर प्रांत बनना जनता के हित में है। इस तरह एक ही भाषा बोलनेवाले प्रदेशों को संयुक्त करके उन्हें एक प्रांत का रूप दिया गया और वहां सब कांग्रेस की अलग प्रांतीय कार्यालय भी खोले गए।

गांधी जी द्वारा की गई यह व्यवस्था जनता के लिए बहुत ही कल्याणकारी थी। जनता की अस्मिता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू न धर्म है न जाति बल्कि भाषा है। धर्म, जाति, नस्ल आदि लोगों को बांटते हैं, लेकिन भाषा उसे बोलनेवाले सभी लोगों को जोड़ती है। हिंदी को ही ले लीजिए, हिंदी मुसलमानों की भी भाषा है, हिंदुओं की भी, गरीबों की भी, अमीरों की भी, ब्राह्मणों की भी, शूर्दों की भी, स्त्रियों की भी, पुरुषों की भी, बच्चों की भी और बूढ़ों की भी। इस तरह मुसलमान-हिंदू, गरीब-अमीर, सवर्ण-अवर्ण, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, अमीर-गरीब आदि सबको हिंदी जोड़ती है। भाषा उसे बोलनेवालों की आकांक्षाओं को व्यक्त करनेवाला साधन ही नहीं है, उन आकांक्षाओं को कार्यरूप देने का औजार भी है। इसलिए भाषा के आधर पर बनाए गए प्रांतों ने अंग्रेजों के समय से ही प्रगति करना शुरू कर दिया और आजाद भारत में तो यह प्रगति और भी तेज हो गई।

लेकिन गांधी जी ने भाषाई राज्य कायम करने का काम पूरे देश पर लागू नहीं किया। देश के एक बहुत बड़े भाग में हिंदी बोली जाती है, और ठीक वहीं गांधी जी ने इस जन-कल्याणकारी नीति को लागू नहीं किया। इसके आगे चलकर बहुत ही दुखद परिणाम निकले। आज भी हिंदी प्रदेश की जनता सबसे पिछड़ी, सबसे अधिक अशिक्षित और सबसे अधिक विघटित अवस्था में है। गांधी जी को हिंदी भाषा से अगाध लगाव था, पर वे उसके राष्ट्रभाषा वाले स्वरूप को ही पहचान पाए। वे यह नहीं देख पाए कि हिंदी 40 करोड़ लोगों की मातृ भाषा भी है। शायद इस कारण ही उनसे हिंदी प्रदेश की घोर उपेक्षा हो गई।

इसमें हिंदी प्रदेश के नेताओं की अदूरदर्शिता का भी कम बड़ा हाथ नहीं था। भाषाई राज्य कायम करते समय उन्होंने हिंदी भाषियों की तरफ से हिंदी क्षेत्र की मांग नहीं रखी। दूसरा कारण यह था कि हिंदी प्रदेश के सभी प्रमुख नेता अंग्रेजियत में इतने रंगे हुए थे कि वे अपने प्रदेश के हित के बारे में ठीक से सोच ही नहीं पाए। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू आदि का उदाहरण लिया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू छोटी उम्र से ही परदेश में पढ़े थे और उनकी मुख्य भाषा अंग्रेजी हो गई थी।

हिंदी भाषियों का यह दुर्भाग्य रहा है कि उनके अधिकांश नेताओं का हिंदी साहित्य, साहित्यकार, हिंदी भाषा आदि से कम ही सरोकार रहा है। इसकी तुलना में अन्य भाषा क्षेत्रों के नेता स्वयं साहित्यकार थे या अपनी भाषा के अच्छे पारखी।

इस तरह आजादी से पहले ही हिंदी को छोड़कर अधिकांश भाषाओं के प्रांत बन गए थे, और वे द्रुत प्रगति करने लगे, लेकिन हिंदी भाषियों को हिंदी भाषा के आधार पर संगठित नहीं किया जा सका और वे पिछड़ी हालत में बने रहे और आज भी यही स्थिति है।

हिंदी भाषा क्षेत्र के नेताओं में दूर-दर्शिता की कमी के कारण वे जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के महत्व को समझ नहीं सके। यदि आज हिंदी भाषा क्षेत्र हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-अवर्ण, आदि में इतना बंटा हुआ है, तो वह इसलिए कि वहां लोगों को भाषा के आधार पर संगठित न करके, धर्म, जाति, वर्ण आदि विघटनकारी आधारों पर संगठित करने की कोशिश की गई। इसका अवश्यंभावी परिणाम था देश का विभाजन और लोगों का पिछड़ापन। पाकिस्तान की मांग सबसे बुलंद रूप से उत्तर प्रदेश-बिहार से ही आई थी।

आज भी यहां के नेतागण जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के सर्वोपरि महत्व को समझ नहीं सके हैं। मायावती जैसे संकीर्ण-सोच वाले नेता बचे-खुचे उत्तर प्रदेश को और भी पांच टुकड़ों में बांटने की बात कर रहे हैं।

इसके विपरीत डा. रामविलास शर्मा ने यह मांग की थी कि समस्त हिंदी प्रदेश को राजनीतिक स्तर पर एकीकृत करके एक विशाल हिंदी प्रदेश बना देना चाहिए, उसी तरह जैसे आज तमिलनाडु, बंगाल, कर्णाटक, गुजरात, आदि भाषाई प्रांत बने हुए हैं। उनका तर्क यह था कि इससे हिंदी बोलने वालों में अपनी एक पहचान बनेगी और उनके बीच जो विभाजक शक्तियां हैं, जिन्हें धर्म और जाति की राजनीति ने खूब उभाड़ा है, वे मिट जाएंगी।

इससे शासन में लगनेवाला खर्च भी खूब बचेगा। आज हिंदी प्रदेश में आठ दस विधान सभाएं हैं, उतने ही मंत्रिमंडल, सचिवालय, मंत्री-परिषद आदि-आदि तामझाम हैं। इन पर अरबों रुपए खर्च होते हैं, जो सब अधिकांश में व्यर्थ ही जाता है। यदि पूरे हिंदी प्रदेश में एक ही शासकीय केंद्र होता, तो शासन कहीं अधिक कम खर्चे में और अधिक सुचारु ढंग से हो पाता। बचे पैसे से लोगों के शिक्षण, आवास, रोजगार आदि का इंतजाम हो सकता था। हिंदी प्रदेश के लोगों को भी जाति, धर्म आदि के कटघरों से बाहर निकालकर एक शक्तिशाली जन समूह में बदला जा सकता था, जो देश के विकास में सन्नद्ध होकर भारत को सुदृढ़ और अजेय बना देता।

डा. शर्मा ने बड़े ही ओजपूर्ण तरीके से बताया है कि जब 40 करोड़ हिंदी भाषी एक हो जाएं, तो इस देश को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं तोड़ पाएगी। आज एक ओर अमरीका और दूसरी ओर चीन उस पर हावी होने की चेष्टा कर रहा है। एक अरब की आबादी होने के बाद भी विश्व मंच में भारत की कोई पूछ नहीं है। डा. शर्मा ने यह भी दिखाया है कि भारत के दीर्घ इतिहास में जब भी भारत संगठित, सशक्त और सुंदर रहा है, चाहे वह वैदिक समय रहा हो, मौर्यों का समय रहा हो, गुप्तों के समय रहा हो या मुगलों का समय रहा हो, हिंदी प्रदेश, जिसे विभिन्न नाम दिया गया है, जैसे आर्यावर्त, हिंदुस्तान, आदि, एकीकृत था। डा. शर्मा कहते हैं कि यदि हिंदी प्रदेश को एक बार फिर एकीकृत किया जा सके, तो भारत की कई समस्याएं अपने आप ही दूर हो जाएंगी।

इस विचार को उन्होंने अपनी कई किताबों में व्यक्त किया है, जिनमें प्रमुख हैं, भाषा और समाज, और भारत की भाषा समस्या। दोनों वाणी प्रकशन दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं।

अत्यंत खेद की बात है कि स्वयं हिंदी भाषी इस महान, ऋषि तुल्य भारतीय चिंतक के प्रति उदासीन हैं। डा. रामविलास शर्मा को मैं कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि भारतीय महापुरुषों और मार्क्स, लेनिन, माओ आदि विदेशी महापुरुषों की कोटि में रखता हूं। डा. शर्मा के विचारों में भी इन अन्य महापुरुषों के ही समान भारत का कायकल्प करने की क्षमता है, बशर्ते कि हिंदी भाषी लोग, और भारत की उन्नति में विश्वास रखनेवाले अन्य भाषा-भाषी लोग भी, उनकी पुस्तकों को पढ़ें और उनके विचारों पर मनन करें और उन पर कार्रवाई करें।

हमारे सौभाग्य से डां. शर्मा ने लंबी आयु पाई थी और वे अपने जीवन के एक पल का भी अपव्यय न करते हुए, बड़े ही संगठित, और सुव्यवस्थित तरीके से अध्ययन और लेखन में लगे रहे। उनकी सौ से अधिक किताबें प्रकाशित हुई हैं, और एक-एक रत्न हैं। डा. शर्मा का जीवन दर्शाता है कि कलम में समाज को बदलने की कितनी ताकत हो सकती है। पर कलम तभी सफल हो सकता है, जब उसके लिखे हुए शब्दों को लोग पढ़ें। यदि आज के भारतीय समाज में डा. शर्मा के विचारों का कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि के विचारों जितना प्रभाव नहीं देखने में आ रहा है, तो इसका मुख्य कारण हिंदी भाषियों की उदासीनता है, यद्यपि हिंदी भाषियों के प्रति डा. शर्मा को अगाध प्रेम था, और उनकी उन्नति में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी थी।

डा. शर्मा विरोधाभासों के पुलिंदा थे। लंगोट पहनकर शरीर में तेल मलकर अखाड़े की रेत में उतरकर पहलवानों के साथ दो-दो हाथ करने वाले, पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर, दिल से हिंदी के प्रकांड पंडित और महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता, कवि, आलोचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद ये सब विशेषण उन पर समान रूप से लागू होते हैं। वे सचमुच एक ऐसे अद्भुत व्यक्ति हैं जिनके जीवन के बारे में जानकर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और हिंदी भाषियों की उनके प्रति उदासीनता को देखकर भी कुछ कम आश्चर्य नहीं होता।

Friday, March 20, 2009

राज ठाकरे - उत्तर भारतीयों के हितैषी

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे के बयानों के फलस्वरूप मुंबई, नासिक व महाराष्ट्र के अन्य शहरों में उत्तर भारतीयों पर जो हमले हो रहे हैं वे आजकल सभी मीडिया चैनलों की सुर्खियों पर छाए हुए हैं। अमर सिंह, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार आदि उत्तर भारत के नेता भी अखाड़े में कूद पड़े हैं और राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं। कोई राज ठाकरे को बच्चा कह रहा है, कोई शैतान। गनीमत यही है कि स्वयं अमिताभ बच्चन ने, जिन पर राज ठाकरे के आक्षेपों से सारे कांड की शुरुआत हुई थी, बुद्धिमानीपूर्वक कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है और इस तरह मामले को तूल देने में अपनी ओर से कोई योगदान नहीं किया है, यद्यपि जया बच्चन अपने कुछ बयानों से इस कसर को काफी हद तक पूरी कर चुकी हैं। अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों को भी इस मामले में खूब मजा आ रहा है क्योंकि कहीं भी हिंदी या हिंदी भाषियों का अहित होते देखकर उनकी बांछें खिल जाती हैं। पर जरा गहराई से विचार किया जाए तो राज ठाकरे हिंदी क्षेत्र का हितैषी ठहरते हैं।

अमिताभ बच्चन जैसे हिंदी भाषियों के प्रतीक-चिह्नों पर, स्वयं हिंदी भाषियों पर तथा उनके आर्थिक हितों पर किए गए हमलों से हिंदी भाषियों को अपनी जातीय एकता का एहसास होता है। देश के सभी अन्य भाषा-जातियों की तुलना में हिंदी भाषा में इस तरह की जातीय भावना की सर्वाधिक कमी है। यहां जाति शब्द ब्राह्मण, कुम्हार, मोची, चमार, बनिया आदि संकीर्ण अर्थ में व्यवहार नहीं किया गया है, वरन अंग्रेजी शब्द नेशनैलिटी के हिंदी पर्याय के रूप में किया गया है। भारत की राष्ट्रीय चेतना अनेक भाषा-जातियों की चेतना का सम्मिलित रूप है। डा. रामविलास शर्मा ने अपनी कई किताबों में इस बात को काफी मेहनत से और काफी विस्तार से समझाया है। देखिए उनकी भाषा और समाज, हिंदी भाषा की समस्याएं, आदि किताबें (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली)। जातीय भावना के अभाव में हिंदी भाषी उसी तरह संगठित तरीके से अपना हित नहीं साध पाते हैं जिस तरह तमिल, मराठी या बंगाली। हिंदी भाषी अनेक राज्यों, दलों और संप्रदायों में बंटे रहकर अपनी शक्ति गंवा बैठे हैं। हालांकि हिंदी भाषी संख्या में और भौगोलिक विस्तार में भारत का सबसे विशाल जातीय समूह हैं और उनकी भाषा का विश्व में चीनी और अंग्रेजी के बाद तीसरा स्थान है, फिर भी इस देश में उन की एक नहीं चलती – असम जैसे राज्यों में उनका कत्लेआम होता है, तथा मुंबई जैसी महानगरी में वे खुलेआम पिटते हैं। इसका मुख्य कारण हिंदी भाषियों में संगठन की कमी है, जो उनमें जातीय भावना की कमी का ही परिणाम है।

इस जातीय भावना की कमी के कारण हिंदी क्षेत्र के नेता बिना सोचे-समझे अपनी ही भाषा-जाति का अहित कर बैठते हैं। हिंदी क्षेत्र दिन पर दिन अधिकाधिक नए राज्यों में बंटकर अपनी शक्ति खोता जा रहा है। अब उत्तर प्रदेश की दलित मुख्य मंत्रि मायावती पहले से ही टूटे हुए उत्तर प्रदेश को और चार टुकड़ों में बांटने की बात कर रही हैं। इसके विपरीत डा. रामविलास शर्मा ने संपूर्ण उत्तर भारत को, यानी संपूर्ण हिंदी भाषी क्षेत्र को, एक राजनीतिक इकाई बनाने की सिफारिश की थी, उसी तरह जैसे आज संपूर्ण मराठी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र के अंतर्गत या संपूर्ण तमिल क्षेत्र तमिलनाड के अंतर्गत संगठित किया गया है। रामविलास जी ने इस बात पर खूब खेद प्रकट किया है कि जहां भारत के बाकी हिस्सों में तो भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की नीति अपनाई गई, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र में नहीं। इससे हिंदी भाषियों के जातीय विकास में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न हुई है।

दिलचस्प बात यह है कि जहां हिंदी भाषी स्वयं अपनी जातीय पहचान से बेखबर हैं, अन्य भाषा बोलनेवाले हिंदी जाति के अस्तित्व से भली-भांति परिचित हैं और उससे कुछ-कुछ आतंकित भी रहते हैं। राज ठाकरे के बयान इसका नवीनतम प्रमाण हैं। हिंदी क्षेत्र के बाहर के नेता इसलिए परेशान हैं कि अन्य सभी भाषाओं की तुलना में हिंदी बोलनेवाले संख्या में तथा भौगोलिक विस्तार में बहुत ही बड़े लगते हैं। इससे उन्हें लगता है कि कहीं हिंदी उन पर हावी न हो जाए। पर यह मात्र एक हौवा है। असली डर है अंग्रेजी द्वारा सभी अन्य भाषाओं का हक मारा जाना। इस बात को ठीक तरह से न समझने के कारण ही ये नेता हिंदी के विरुद्ध आंदोलन करते रहते हैं और अंग्रेजी के विरुद्ध कभी कुछ नहीं बोलते। इससे अंग्रेजी को चुपके से उनके क्षेत्र में पांव फैलाकर उनकी भाषाओं को कमजोर करने का मौका मिल जाता है। यह कुछ-कुछ उसी तरह हो रहा है जैसे औपनिवेशिक काल में भारतीय राजा असली दुश्मन अंग्रेजों से न लड़कर आपस में लड़ते रहे थे और अंग्रेज चुपके से एक-एक करके उन्हें हराते हुए पूरे देश की छाती पर चढ़ बैठने में सफल हो गए थे। इसी तरह आज अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओं को दोयम स्तर पर उतार दिया है। किसी भी राज्य में, चाहे वह तिमलनाड हो या बंगाल या महाराष्ट्र प्रशासन, उच्च शिक्षा, व्यवसाय, न्यायालय आदि में वहां की भाषा का प्रयोग नहीं होता है। सभी जगह अंग्रेजी ही विराजमान है। रामविलास जी ने इस कटु सत्य की ओर भी अपनी पुस्तकों में इंगित किया है। उनकी सलाह है कि सभी भाषाओं को संगठित होकर अंग्रेजी के विरुद्ध मोर्चा चलाना चाहिए, तभी इस देश में अंग्रेजी का प्रभाव कम होगा।

रामविलास जी हिंदी क्षेत्र के ही नहीं समूचे भारत के इस शताब्दी के सर्वोच्च विचारक हैं। उन्हें प्राचीन काल के महान ऋषियों की परंपरा में रखना चाहिए। अट्ठासी वर्ष के दीर्घ जीवनकाल में उन्होंने निरंतर चिंतन-मनन करते हुए एक के बाद एक उत्कृष्ठ ग्रंथ रचे हैं जिनमें उन्होंने आधुनिक भारत की सभी प्रमुख समस्याओं पर गहराई से विचार करके अत्यंत व्यवहारिक और सर्वहितकारी समाधान सुझाए हैं। उनकी अचूक कसौटी रही है मार्क्सवादी दर्शन, जिसके आधार पर ही वे सभी समस्याओं को परखते हैं। मार्क्सवादी दर्शन में उनकी पैठ इतनी गहरी है कि वे स्वयं मार्क्स और ऐंजेल्स की गलतियों, खामियों और असंगतताओं पर खुलकर चर्चा करने का साहस रखते हैं। पर मार्क्स के प्रति उनकी अनन्य भक्ति है क्योंकि मार्क्स का दर्शन शक्तिहीनों को शक्ति देता है और मानव समाज की असमानताओं को दूर करता है, यही रामविलास जी के संपूर्ण जीवन का भी ध्येय रहा है।

रामविलास जी के लेखन का एक सकारात्मक पहलू यह है कि हालांकि वे समाज की बड़ी-बड़ी और असाध्य सी लगनेवाली समस्याओं पर विचार करते हैं, फिर भी कहीं भी आशाहीनता, आत्मघात, प्रतिशोध, आदि नकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा नहीं देते। सदा आशावादी रहते हुए वे व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने लगभग 80 बड़े-बड़े ग्रंथ रचे हैं जिनमें उन्होंने सांप्रदायवाद, हिंदी की जातीय अस्मिता, हिंदी उर्दू का मसला, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकारों का सही मूल्यांकन, पाश्चात्य विद्वानों द्वारा नस्लवाद से प्रेरित होकर फैलाए गए अनेक भ्रांत धारणाओं का खंडन जैसे विषय लिए हैं।

पाश्चात्य विद्वानों ने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के लिए नैतिक आधार तैयार करने की दृष्टि से तथा नस्लवादी विचारधारा से अंधे होकर भारत, भारत की भाषाएं, भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बारे में अनेक भ्रांत धारणाएं फैलाई थीं। ये धारणाएं आज भी हमारे चिंतन, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों तथा विचारकों को गुमराह कर रही हैं। इन भ्रांत धारणाओं से छुटकारा पाकर नए सिरे से हमारी भाषाओं, सभ्यता, संस्कृति आदि पर विचार करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। रामविलास जी पिछले 60-70 वर्षों से यही करते आ रहे थे।

हमारे देश में आज भी बच्चे स्कूलों में ऐसी भ्रांत धारणाएं सीखते हैं, जैसे, आर्य बाहर से भारत में आए, आर्यों ने द्रविड़ों को जीतकर उन्हें गुलाम बनाया, दक्षिण और उत्तर भारत में नस्लीय वैमनस्य है, हिंदी आदि भाषाएं संस्कृत की पुत्रियां हैं, संस्कृत लैटिन, ग्रीक आदि यूरोपीय भाषाओं से प्रभावित हुई है, ऋग्वेद भारत के बाहर कहीं लिखा गया था, आर्यों का मूल स्थान कहीं मध्य एशिया में था, इत्यादि। रामविलास जी ने इन सब तथा इस तरह की अनेक अन्य धारणाओं को भ्रांत, नस्लवाद-प्रेरित और भारतीय सभ्यता के समुचित विकास के लिए हानिकारक सिद्ध किया है।

उदाहरण के लिए, रामविलास जी ने अनेक अकाट्य तर्कों से प्रमाणित किया है कि आर्य लोग कहीं और से भारत नहीं आए हैं, बल्कि भारत के ही मूल निवासी हैं। रामविलास जी ने अंतिम दस वर्ष भाषा-विज्ञान पर गहन अध्ययन करते हुए बिताया। उन्होंने भाषा-विज्ञान को पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त करके पाणिनी, किशोरीदास वाजपेयी जैसे भारतीय विद्वानों द्वारा प्रशस्त किए गए देशी मार्गों की ओर पुनः मोड़ने का भरसक प्रयास किया है। रामविलास जी मानते हैं कि ग्रीक, लैटिन, जर्मन आदि समेत अनेक यूरोपीय भाषाएं संस्कृत, हिंदी, तमिल आदि भारतीय भाषाओं से खूब प्रभावित हुई हैं। जर्मन की तुलना में रूसी तथा अन्य स्लाव भाषाएं संस्कृत और भारत की अन्य भाषाओं के अधिक निकट हैं। उनके अनुसार यह धारणा गलत है कि भारत की आधुनिक भाषाएं संस्कृत की पुत्रियां हैं। इसके विपरीत रामविलास जी कहते हैं कि संस्कृत तथा सभी भारतीय भाषाएं एक ही स्तर की भाषाएं हैं, यानी अन्य भारतीय भाषाएं भी संस्कृत जितनी ही पुरानी हैं। जिस तरह हिंदी क्षेत्र की अनेक बोलियों (ब्रज, भोजपुरी, मैथिली, अवधी, आदि) में से निकलकर हिंदी समस्त हिंदी क्षेत्र की संपर्क भाषा बन गई है, उसी तरह संस्कृत भी उत्तर भारत की अनेक बोलियों में से एक थी जो समस्त क्षेत्र की प्रमुख भाषा बन गई है। इसी तरह आधुनिक यूरोपीय भाषाएं लैटिन की पुत्रियां न होकर स्वतंत्र भाषाएं हैं जिनका अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना लैटिन का है।

ऋग्वेद के संबंध में भी रामविलास जी की अपनी धारणाएं हैं। वे उसे आध्यात्मिक कम और सामाजिक दस्तावेज अधिक मानते हैं। उसमें उन्हें आदिम समाजवाद के स्पष्ट लक्षण मिलते हैं। ऋग्वेद के ऋषि शारीरिक मेहनत से परहेज न करते थे, और उनमें जातिभेद न था। वे कुम्हार, कृषक, लुहार, बढ़ई आदि सभी पेशे में संल्गन रहते हुए ऋचाएं रचते हैं। स्वयं ऋषि शब्द की रामविलास जी ने बहुत ही रोचक व्युत्पत्ति बताई है। उनके अनुसार यह कृष धातु से बना है जिसका मतलब होता है, खींचना, अर्थात खेत में हल खींचना। जो यह काम करता है वह हुआ ऋषि, अर्थात, ऋषि का मतलब है किसान! ऋग्वेद के सर्वहारापन का इससे बढ़कर क्या प्रमाण हो सकता है!

आजकल के संकीर्णदृष्टिवाले नेता देश को धर्म, संप्रदाय, भाषा, जाति आदि के नाम पर बांटने पर तुले हैं। रामविलास जी ने सही दिशा दिखाई है कि देश के विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संप्रदायों और जातियों को एक करके मजबूत राष्ट्र का निर्माण करने का एकमात्र तरीका भाषा-जातियों के आधार पर समुदायों को संगठित करना है। धर्म, संप्रदाय, जाति आदि संकीर्ण दायरों को लांघकर भाषा लोगों को जोड़ती है। उदाहरण के लिए, हिंदी बोलनेवालों में हिंदू भी हैं, मुसलमान भी, सिक्ख भी, इसाई भी, किसान भी उद्योगपति भी, महिलाएं भी पुरुष भी, अमीर भी गरीब भी। इस तरह हिंदी के मंच पर इन सबको संगठित किया जा सकता है। यही एकमात्र शक्ति है जो आजकल की राजनीतिक दलों द्वारा फैलाए जा रहे सांप्रदायिक विष को निरस्त कर सकती है।

तमिल, बंगला आदि भाषाओं ने भाषा के आधार पर अपनी जाति का संगठन भली-भांति कर लिया है। पीछे रह गया है सिर्फ हिंदी जाति का क्षेत्र, जो अज्ञान, फूट, अशिक्षा, कुस्वास्थ आदि के कुहरे तले तड़प रहा है। उसे ऊपर उठाने के लिए सभी हिंदी भाषियों में जातीय चेतना जगाना बहुत जरूरी है। आज हिंदी भाषियों को बिहारी, हरियाणवी, उत्तर प्रदेशी, झारखंडी आदि अनेक खेमों में बांटकर उनको कमजोर करने की साजिश रची जा रही है। जरूरत है सभी हिंदी भाषियों को एक करने की। यदि पचास करोड़ हिंदी भाषी एक हो जाएं, तो दुनिया की कोई भी ताकत भारत को कमजोर नहीं कर पाएगी।

राज ठाकरे ने हिंदी भाषियों की जातीय चेतना जगाकर उन्हें एक करने में योगदान किया है। इसके लिए हमें उनके प्रति आभार प्रकट करना चाहिए।

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