एक गड़रिया एक बनिए को मक्खन बेचता था। एक दिन बनिए को शक हुआ कि गड़रिया ठीक मात्रा में मक्खन नहीं दे रहा है। उसने अपने तराजू में तोलकर देखा तो मक्खन का वजन कम निकला। वह आग बबूला हुआ, राजा के पास गया। राजा ने गड़रिए को बुलवाकर उससे पूछा, क्यों, तुम मक्खन कम तोलते हो?
हाथ जोड़कर गड़रिए ने नम्रतापूर्वक कहा, हुजूर, मैं रोज एक किलो मक्खन ही बनिए को दे जाता हूँ।
नहीं हुजूर, मैंने तोलकर देखा है, पूरे दो सौ ग्राम कम निकले, बनिए ने कहा।
राजा ने गड़रिए से पूछा, तुम्हें क्या कहना है?
गड़रिया बोला, हुजूर, मैं ठहरा अनपढ़ गवार, तौलना-वोलना मुझे कहाँ आता है, मेरे पास एक पुराना तराजू है, पर उसके बाट कहीं खो गए हैं। मैं इसी बनिए से रोज एक किलो चावल ले जाता हूँ। उसी को बाट के रूप में इस्तेमाल करके मक्खन तोलता हूँ।
Sunday, November 23, 2014
जैसे को तैसा
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
लेबल: लघु कथा
Thursday, June 04, 2009
लघु कथा : जैसे को तैसा
एक गड़रिया एक बनिए को मक्खन बेचता था। एक दिन बनिए को शक हुआ कि गड़रिया ठीक मात्रा में मक्खन नहीं दे रहा है। उसने अपने तराजू में तोलकर देखा तो मक्खन का वजन कम निकला। वह आग बबूला हुआ, राजा के पास गया। राजा ने गड़रिए को बुलवाकर उससे पूछा, क्यों, तुम मक्खन कम तोलते हो?
हाथ जोड़कर गड़रिए ने नम्रतापूर्वक कहा, हुजूर, मैं रोज एक किलो मक्खन ही बनिए को दे जाता हूं।
नहीं हुजूर, मैंने तोलकर देखा है, पूरे दो सौ ग्राम कम निकले, बनिए ने कहा।
राजा ने गड़रिए से पूछा, तुम्हें क्या कहना है?
गड़रिया बोला, हुजूर, मैं ठहरा अनपढ़ गवार, तौलना-वोलना मुझे कहां आता है, मेरे पास एक पुराना तराजू है, पर उसके बाट कहीं खो गए हैं। मैं इसी बनिए से रोज एक किलो चावल ले जाता हूं। उसी को बाट के रूप में इस्तेमाल करके मक्खन तोलता हूं।
बनिए को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिल रही थी।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
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Tuesday, April 28, 2009
नालायक नेता
चुनावी सभा चल रही थी। लाख, दो लाख लोगों की भीड़ जुटी थी। नेताजी अच्छे वक्ता थे। उनके हर दूसरे-तीसरे वाक्य पर खूब तालियां पिटीं। पार्टी सदस्य बेहद खुश थे, नेता का जादू चल गया था।
पर नेता स्वयं खिन्न थे। हेलिकोप्टर में बैठते हुए सचिवों से बोले, “क्या मैं इस लायक भी नहीं था? एक जूता भी तो नहीं फेंका गया मुझ पर!”
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 0 टिप्पणियाँ
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Sunday, April 05, 2009
योगदान
योगासन मंडली के सदस्य झील के किनारे वाले उद्यान में एकत्र हुए थे। सभी सेवानिवृत्त पेंशनयाफ्ता वृद्ध थे। शाम का वक्त था।
आचार्य के दिखाए अनुसार आधा घंटा हरी घास में आसन लगाने के बाद सब पेड़ों के नीचे अपनी-अपनी पसंद के बेंचों पर और उसके चारों ओर की घास पर बैठे-लेटे बतियाने लगे।
उद्यान के बाहर के चायवाले से इशारे से चाय मंगा ली गई।
मोहन बाबू – भाई विमलदा, क्या तुमने रतन प्रकाश के ब्लोग का वह किश्त पढ़ा जिसमें उन्होंने सांसद दांडेरकर की पोल खोलकर रख दी है?
दातादीन – वही चिट्ठा न जिसमें दांडेरकर बनाम सविता वाले कांड की चर्चा है?
मोहन बाबू – वही, वही... बड़ी मेहनत से तथ्य जुटाए हैं, रतन ने। मजा आ गया पढ़कर। यह सब अखबारों में कही नहीं आया...
रमाशंकर – किस अखबार में हिम्मत है दांडेरकर के विरुद्ध कुछ लिखने की... चुटकी में सरकारी विज्ञापन बंद हो जाते उसका...
भवानी प्रसाद – इन बहादुर लिक्खड़ों के लिए कुछ करना चाहिए, ताकि उनका हौसला बुलंद रहे।
मोहन बाबू – लाख रुपए की बात कही तुमने। मैं भी यही सोच रहा था...
तब तक चाय आ गई, और बातचीत चाय की चुस्कियों में मंद पड़ गई।
अंधेरा छाने लगा। कुर्ता-पायजामा झाड़ते हुए वे उठ खड़े हुए और उद्यान के बाहर आ गए।
पर कोई घर नहीं गया, पास ही के इंटरनेट कफे में उनकी नई महफिल जमी। सब एक-एक कंप्यूटर पर रतन प्रकाश के ब्लोग के पन्ने खोलकर बैठ गए, और लगे चटकाने उसके पृष्ठों के विज्ञापनों पर चूहे का बटन।
दस पंद्रह मिनट बाद वे बाहर आ गए।
दातादीन – लो भवानी, रतन के लिए चाय पानी के खर्चे का तो इंतजाम कर ही दिया, अब तो खुश।
मोहन बाबू - ऐसा ही लिखता रहे बर्खुरदार!
उधर कुछ दिनों के बाद रतन प्रकाश को गूगल से एक ईमेल प्राप्त हुआ। उसमें लिखा था:-
हमें खेद है कि हमें आपका एडसेन्स खाता बंद करना पड़ रहा है। तारीख .... और .... के बीच आपके जाल पृष्ठ के पन्नों के एडसेन्स विज्ञापनों पर असाधारण रूप से अधिक क्लिकें आई हैं। हमें लगता है कि यह एडसेन्स के नियमों का उल्लंघन करते हुए हुआ है।
यदि आपको इस संबंध में कुछ कहना हो, तो निम्नलिखित ईमेल पत पर हमसे संपर्क करें।
एडसेन्स का उपयोग करने के लिए धन्यवाद।
एडसेन्स टीम
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
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Tuesday, March 31, 2009
पहचान की चूक
अपने इकलौते बेटे की सफेद चादर में लिपटी लाश को हाथों में लिए दरोगाजी मरघट की ओर बढ़ रहे थे। उनकी लाल-लाल आंखों से अनवरत बहती अश्रु-धाराओं से उनकी बड़ी-बड़ी मूंछों का एक-एक बाल पोर-पोर तक भीग गया था।
वे पल भर के लिए भूल गए थे कि जिस पर वे अपना हाथ चला रहे हैं, वह जेल का कोई मुजरिम नहीं बल्की स्वयं उनकी अपनी संतान है। उनके पूरे हाथ की मार लगते ही पांच साल के उस लड़के का सिर तरबूज की तरह फट गया था और वह कटे पेड़ के समान उनके सामने गिर कर मर गया था।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
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Monday, March 30, 2009
क से कत्लेआम
मैं मुन्नी को वर्णमाला सिखा रहा था। स्लेट पर अ लिखकर मैंने कहा, "यह अ है। अ बोल बेटी, अ से अलगाववादी।"
बेटी ने कहा, "अ, अ से अलगाववादी।"
"शबाश। यह है आ। आ से आतंकवादी।"
"आ से आतंकवादी।"
"अच्छा, अब बोल इ। इ से इमरजेंसी।"
"इ। इ से इमरजेंसी।"
"यह उ है। उ से उठाईगीर।"
"उ से उठाईगीर।"
"यह क्या ऊंटपटांग बातें सिखा रहे हो बच्ची को। दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?" श्रीमती जी तूफान के समान कमरे में घुस आईं और मुझ पर बरस पड़ीं।
मैंने कहा, "इसमें ऊंटपटांग की क्या बात है? क्या तुम नहीं चाहतीं कि मुन्नी वर्तमान परिस्थितियों से वाकिफ हो? क्या उसे खतरनाक खुशफहमी में रखना ठीक होगा? नहीं, उसे सच्चाई मालूम होनी ही चाहिए। तभी वह आने वाले कठिन दिनों में अपनी हिफाजत कर पाएगी।"
और मैंने मुन्नी की पढ़ाई जारी रखी, "यह है क। बोल बेटी, क से कत्लेआम।"
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
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