Sunday, December 22, 2013

देवयानी प्रकरण पर मेरे विचार

भारतीय दूतावास की कर्मचारी देवयानी को अमरीका में अपनी नौकरानी को कम वेतन दिए जाने के लिए गिरफ़्तार करना और उनके साथ अपमानजनक बर्ताव करना सभी भारतीयों के खून को खौलानेवाला प्रकरण है। देवयानी को अपने ही बच्चों के सामने हथकड़ियों में जकड़कर सरे आम ले जाया गया और जेल में उनके साथ बहुत ही कुत्सित बर्ताव किया गया, उसी तरह का बर्ताव जैसे हत्यारों, नशाखोरों, बलात्कारियों आदि के साथ किया जाता है – पुलिसकर्मियों ने देवयानी को नंगा करके, उनके शारीरिक द्वारों में (योनी, मुँह, गुदा, आदि) में उँगली या अन्य चीजें डालकर जाँच की (कैविटी सर्च), यह मालूम करने के लिए कि उन्होंने वहाँ कोई हथियार या नशीली दवा तो नहीं छिपा रखी है। अमरीका में संगीन जुर्मों के कैदियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जाता है। पर देवयानी तो कोई संगीन जुर्म के लिए पकड़ी गई कैदी नहीं थीं, और तो और वे एक स्वाधीन राष्ट्र के दूतावास की कर्मचारी थीं, जिसके साथ अमरीका के दोस्ताना संबंध थे, तथा एक स्वतंत्र देश के दूतावास के कर्मी होने के कारण उन्हें अमरीका के क़ानूनों से एक प्रकार का अभयदान मिला हुआ था। पर इन सब बातों को दरकिनार करके देवयानी के साथ बदसलूकी की गई।

अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ। मुझे लगता है कि इसके पीछे अनेक कारण हैं। पहला कारण देवयानी को गिरफ़्तार करनेवाले भारतीय मूल के व्यक्ति प्रीत भरारा के व्यक्तित्व से जुड़ा है। यह व्यक्ति शायद अमरीकियों को यह दिखाना चाहता है कि वह उनसे भी बढ़कर अमरीकी है, और इसे ज़ाहिर करने का इससे बढ़िया क्या तिकड़म हो सकता है कि वह अपने ही मूल देश के देशवासियों को अमरीकी क़ानूनों के फंदे में फँसाए। ऐसा करके वह शायद यह दिखाना चाहता है कि उसने अपनी भारतीयता की केंचुली पूरी तरह से उतार फेंक दी है, और वह संपूर्ण रूप से अमरीकी हो गया है। शायद उसके मन में राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी हो, और देवयानी के प्रति बदसलूकी करके उसे उम्मीद हो कि अमरीका के लोग उस पर उसकी भूरी चमड़ी के बावजूद अधिक भरोसा करने लगेंगे। या ऐसा भी हो सकता है कि वह अमरीकी में फल-फूल रहे भारत-विरोधी खेमों में से किसी के हाथों का कठपुतली बन गया हो, जो अमरीका में भारत को नीचा दिखाकर न जाने क्या उल्लू सीधा करना चाहते हैं – ये लोग नरेंद्र मोदी को विदेशों में बदनाम करने और उसे अमरीकी वीज़ा से वंचित करने के लिए ऐड़ी-चोटी का पसीना एक किए हुए हैं और पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। अब जब ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी अगले चुनाव के बाद भारत के प्रधान मंत्री के रूप में उभरकर आ सकता है, स्वयं इनके पसीने छूटने लगे हैं। शायद यह बरार ऐसी ही मनोवृत्तिवाला भारत-द्वेषी व्यक्ति हो।

  यह इस प्रकरण का एक संभव स्पष्टीकरण है। एक अन्य संभाव्यता यह है कि देवयानी की नौकरानी संगीता और उसके परिवार भारत में अमरीकियों के लिए जासूसी करने में लगे हुए थे और उन्हें बचाने के लिए ही देवयानी को बलि का बकरा बनाया गया है। देवयानी को अपनी नौकरानी को कम वेतन देने के ज़ुर्म में फँसाकर, अमरीका ने संगीता, उसके पति तथा परिवार के अन्य सदस्यों को रातों-रात अपने देश में शरण दे दी है। अब हर कोई जानता है कि अमरीका में एक आम भारतीय को शरण तो दूर प्रवेश करने तक का वीज़ा मिलना कितना कठिन काम है। पर संगीता और उसके परिवार को, जो मात्र एक नौकरानी है, अमरीका ने सपरिवार वीज़ा देकर अपने देश में सुखपूर्वक बसाया है। ज्ञातव्य रहे कि संगीता के पिता भारत में अमरीकी दूतावास में बरसों से काम करते आ रहे हैं। निश्चय ही इस दौरान उन्होंने अनेक अमरीकियों से घनिष्ट संबंध बना लिए होंगे, जो संगीता के इस समय काम आए। शायद वे अमरीकियों के लिए कोई अन्य महत्वपूर्ण सेवा भी प्रदान करते रहे होंगे, जिसके प्रति कृतज्ञता जताते हुए उन्होंने संगीता को सपरिवार अपने देश में उठा ले जाने जैसा विलक्षण कार्य किया। स्पष्ट ही यह काम अमरीकियों के लिए अति महत्वपूर्ण रहा होगा, वरना वे ऐसा क्यों करते। जासूसी ही ऐसा काम मुझे प्रतीत हो रहा है जिसकी अमरीकी इतनी अधिक कीमत आँकते। अब सवाल यह उठता है कि संगीता के परिवार ने अमरीकियों को क्या-क्या गुप्त बातें बताई हैं और यह जानकारी भारत के लिए कितना अधिक नुकसानदेह साबित हो सकती है। इसका तो आनेवाले दिनों में ही खुलासा हो सकता है, और इसकी संभावना भी कम ही है, क्योंकि जासूसी से संबंधित अनेक बातें कभी उजागर होती ही नहीं हैं।

एक अन्य संभाव्यता यह है कि अमरीका इस प्रकरण के जरिए भारत को किसी अन्य चीज़ के लिए सज़ा दे रहा है। अभी हाल में हमारे रक्षा मंत्री ए के ऐंटनी ने एक बहुत ही महँगे रक्षा निवादा से अमरीकियों का पत्ता काट दिया था। इसी तरह से कुछ अन्य मामलों में भी अमरीकी उद्योगों के प्रस्तावों के स्थान पर अन्य देशों के प्रस्तावों को चुना गया था। इससे अमरीकी उद्योग ताव में आ गया है, और वह भारत को सबक सिखाने के मौके की तलाश कर रहा है। शायद उसने प्रीत बरार के माध्यम से जाल बिछाकर देवयानी को उसमें फँसाकर भारत के विरुद्ध प्रतिघात किया हो।

इसके पीछे आर्थिक कारण भी हैं। पहले भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था जितनी ही चुस्त-दुरुस्त थी और तेज़ी से विकसित हो रही थी। पर पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था की हवा निकल गई है, वह चीन की बराबरी तो दूर विश्व के दोयम दर्जे के देशों से भी पीछे हो गया है। अमरीका मुख्य रूप से पूँजीवादी देश है और उसकी बागडोर वहाँ के बड़े-बड़े धन्नासेठों के हाथों में ही रहती है। इन्हें अब भारत उतना आकर्षक नहीं लग रहा है, और इसलिए भारत के प्रति सम्मान दर्शाना भी वे अब आवश्यक नहीं मान रहे हैं। इसीलिए भारत के दूतावास के कर्मी के प्रति अमरीका ने ऐसा अवहेलनापूर्ण व्यवहार किया है जैसा वह अफ्रीका के ग़रीबों और कम महत्वपूर्ण देशों के दूतों के साथ भी नहीं करता है।

  इस सारे काँड में सबसे अखरनेवाली बात यह है कि देवयानी को प्रताड़ित करनेवाला व्यक्ति एक पूर्व-भारतीय है। हम विदेशों में रह रहे अपने देश के लोगों पर उचित ही गर्व करते हैं और उनकी उपलब्धियों को अपनी ही उपलब्धियाँ मानते हैं, भले ही इन लोगों ने दूसरे देशों की नागरिकता स्वीकार कर ली हो। हम यही विश्वास करते हैं कि ऐसा उन्होंने मजबूरी में किया है, और वे दिल से अब भी भारतीय हैं और सदा भारतीय ही रहेंगे। अब इस प्रीत बरार ने सिद्ध कर दिया है कि हमारी यह धारणा कितनी मासूम और अवास्तविक है। इस आदमी के बर्ताव से भारत के प्रति अंशमात्र भी सम्मान या प्रेम नहीं झलक रहा है। वह तो भारत को अनादर करने पर तुला हुआ सा प्रतीत हो रहा है। और यही बात हम भारतीयों को समझ में नहीं आ रही है, कि कैसे भारतीय मूल का कोई व्यक्ति इस कदर राह भटक सकता है, कि वह अपने ही वतन की छाती पर वार कर बैठे।

इससे हमें सबक भी लेनी चाहिए, और वह यह है कि विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को भारत के साथ जोड़े रखने के लिए हमें और मेहनत करनी होगी। आज स्थिति यह है कि एक-दो पीढ़ी में वे भारत से इतने कट जाते हैं कि उनमें से कई प्रीत बरार के ही अन्य संस्करण बन जाते हैं। उनका भारत के साथ नाता उनकी भूरी चमड़ी और नाक-नक्शे तक ही सीमित रह जाता है। दिल और दिमाग से वे भारतीयता से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। क्योंकि भारतीयता की अवधारणा भारत की राजनीतिकि सीमाओं तक सीमति नहीं है, बल्कि वह एक विश्वव्यापी चीज़ है। भारत से निकला व्यक्ति चाहे कहीं भी जाए और चाहे जिस देश का भी नागरिक हो जाए, वह भारत के लिए मूल्यवान है, और भारत को और भारतवासियों को उसे भारत के साथ जोड़े रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह प्रयास राज्य के स्तर पर और सामाजिक संगठनों के स्तर पर और व्यक्तिगत स्तर पर हमें करना होगा। राज्य के स्तर पर उन्हें दुहरी नागरिकता देना और भारत में उन्हें अन्य विदेशियों की तुलना में अधिक सहूलियतें देना जैसे कार्य शामिल हैं। सामाजिक स्तर पर यहाँ के धार्मिक संगठनों तथा कला-आदि से संबंधित संगठनों को उन्हें अपनी भारतीयता बरकार रखने में मदद करनी चाहिए। यह काम सबसे अच्छा हिंदी फिल्में कर रही हैं, पर समाज के अन्य स्तरों पर भी यह होना चाहिए। व्यक्तिगत स्तर पर भी हम इसमें मदद कर सकते हैं।

भारतीयता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, से इन प्रवासी भारतीयों का संबंध है। यह भाषाई सेतु उन्हें धर्म, साहित्य, फ़िल्म, संगीत आदि भारतीयता के अन्य पहलुओं से जोड़े रखता है। और यही भाषाई सेतु प्रवासी भारतीयों के लिए सबसे पहले टूटती है, विशेषकर उन प्रवासी भारतीयों के लिए जो अँग्रेज़ी बोलनेवाले देशों में बसते हैं। वे एक-दो पीढ़ी में ही अपनी मूल भाषा और हिंदी को भूल जाते हैं, और अँग्रेज़ी ही उनकी एकमात्र भाषा रह जाती है। और भाषा का यह संबंध खत्म होते ही, धर्म, साहित्य, कला, संगीत आदि के साथ उनका नाता भी टूट जाता है।

इसलिए मेरी दृष्टि में, विदेशों में बसे भारतीयों में भारत के प्रति सहानुभित बनाए रखने के लिए हमें उनकी भाषाई सेतु, और विशेषकर हिंदी के साथ उनके संबंध, को बनाए रखने की ओर खास ध्यान देना चाहिए।

Sunday, July 05, 2009

भारत में गहराया भूख का साया — हम आप क्या कर सकते हैं?

जयहिंदी का भूख वाला लेख लिखना काफी विचलित कर देनेवाला अनुभव रहा। आपको पढ़ते हुए भी ऐसा ही लगा होगा।

सोचता हूं इस वीभत्स स्थिति को दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है? सरकार तो कोशिश कर ही रही है। वह तो पिछले 60 सालों से कर रही है, और शायद अगले 60 सालों तक भी करती ही जाएगी। पर स्पष्ट ही यह पर्याप्त नहीं है। तो क्या और किया जा सकता है?

दिनेशराय द्विवेदी जी ने उक्त लेख की टिप्पणी में कहा है, जब तक भूखे स्वयं खड़े नहीं होते, कुछ नहीं होगा। पर भूखे ऐसा जल्द कर पाएंगे यह नहीं लगता। इसके लिए लंबे समय तक उन्हें संगठित करना होगा, शिक्षित करना होगा। इसके लिए एक क्रांतिकारी दल की आवश्यता होगी, समर्पित, शिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यता होगी, इस सब में समय लगेगा। यह भी जरूर करना चाहिए। पर तुरंत क्या किया जा सकता है?

तुरंत कार्रवाई तो वे ही लोग कर सकते हैं जो भूखे नहीं हैं, यानी हम और आप। जो थोड़ा बहुत इस संबंध में सोच पाया हूं, उसे ही यहां प्रस्तुत करता हूं, आप भी टिप्पणियों में अपने सुझाव दें –

  1. घर के नौकरों, उनके बच्चों आदि को रोज भोजन देना शुरू कर सकते हैं (इसका पैसा उनके वेतन से काटे बिना, यानी एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में)।
  2. जिन मंदिरों, होटलों, कैंटीनों आदि में हमारा कुछ नियंत्रण है, उनमें अन्नदान को व्यापक स्तर पर आयोजित करा सकते हैं। यह आसान होना चाहिए क्योंकि हमारे सभी धर्मों में अन्नदान को ऊंचा स्थान दिया गया है। इन मंदिरों आदि में कोई भी जाकर निश्शुल्क भोजन कर आ सकता है। भोजन बहुत महंगा और विस्तृत हो यह जरूरी नहीं है, पर पौष्टिक और संतुलित होना चाहिए। दक्षिण के कुछ मंदिरों में मैंने ऐसी व्यवस्था देखी है (जैसे. कर्णाटक के धर्मस्थला में)। वहां रोज लाखों लोग मुफ्त में भोजन करते हैं। सारा खर्चा मंदिर की ओर से उठाया जाता है।
  3. स्कूलों में बच्चों को अनिवार्य रूप से भोजन दिलाया जाए। सरकार की ओर से पहले ही ऐसी एक योजना है। हमें बस यह करना होगा कि हम निगरानी रखें कि हमारे आसपास के स्कूलों में इस योजना को ईमानदारी से और सुव्यवस्थित ढंग से चलाया जाता है।
  4. राशन की दुकानों पर सामुदायिक स्तर पर नजर रख सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उन्हें दिया गया अनाज सचमुच गरीबों में बांटा जाता है और दुकानदार चुपके से उन्हें बाजार में ऊंचे दामों पर बेच नहीं देता है।
  5. बच्चों के जन्म दिन, शादी की सालगिरह आदि खुशी के अवसरों पर पार्टियों आदि में पैसे न फूंककर, गरीबों को भोजन खिलाने का रिवाज शुरू कर सकते हैं। मान लीजिए आपकी माताजी 80 वर्ष की हुईं। तो 80 गरीबों को भोजन कराया जाए, या बिटिया के पांच वर्ष के होने पर 5 या 50 लोगों को भोजन कराया जाए।
  6. हमारे घर बहुत से नौकर, कारीगर और अन्य लोग आते रहते हैं, उन्हें सब अनिवार्य रूप से कोई न कोई भोजन की वस्तु दी जाए, जैसे केला, बिसकुट, दूध आदि। जिस तरह हम घर आए व्यक्ति को पानी दिए बिना नहीं जाने देते, उसी तरह अब हमें उन्हें खाने के लिए कुछ न कुछ दिए बगैर न जाने देने का नियम बना लेना चाहिए।
  7. हर महीने अपनी आय का एक अल्पांश बचाकर उसे भूख निवारण के लिए कार्य कर रही किसी संस्था को दान करना चाहिए।
  8. अगले पांच साल तक राष्ट्रमंडल खेल, छब्बीस जनवरी की परेड, चांद मिशन, हथियारों की खरीद आदि फिजूल खर्ची वाले कार्यक्रमों पर रोक लगाकर इससे बचे पैसे से भूख निवारण कार्यक्रमों को सशक्त करना चाहिए।

इस सूची में और विचार जोड़ें।

Saturday, July 04, 2009

भारत में गहराया भूख का साया

अतुल्य भारत वाले प्रचार ने हमें यकीन दिलाया था कि हम विकसित देश हो गए हैं और अब केवल अमरीका एक देश रह गया है जो हमसे थोड़ा-बहुत आगे है, वह भी चंद वर्षों के लिए, जब भारत उसे भी पछाड़कर दुनिया का अग्रणी देश बन जाएगा। चीन भी उससे दो कदम पीछे ही होगा।

एक तरह से यह प्रचार ठीक साबित हो रहा है, भारत दुनिया में अग्रणी हो ही गया है, पर भूख के मामले में। आज भारत में दुनिया भर में जितने भूखे लोग हैं, उनमें से आधे का निवास है। सब सहारा अफ्रीका या बंग्लादेश या पाकिस्तान जैसे गरीब या कुशासित समझे जानेवाले देशों के लोगों को भी भारतीयों से ज्यादा खाने को मिलता है।

खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण भारत में भोजन में अनाजों का अंश निरंतर घट रहा है। शहरी इलाकों में लोगों के भोजन में अनाजों का अंश 1973-74 में 11.3 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह था जो 1993-94 में 10.6 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह और 2004-2005 में 10.6 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह हुआ। ग्रामीण इलाकों में 1972-73 में वह 15.3 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह था जो 1993-94 में 13.4 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह हुआ और 2004-05 में 12.12 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह। योजना आयोग का कहना है कि 20 वर्ष की अवधि में प्रति व्यक्ति कैलोरी और प्रोटीन कंसम्शन भारत में निरंतर घटा है। ग्रामीण इलाकों के लिए कैलरी सीमा 2,400 कैलरी प्रति दिन मानी गई है, पर इन बीस सालों में वह कभी भी इस स्तर तक पुहंच नहीं पाया। बीस साल पहले वह मात्र 2221 कैलरी था जो अब और भी घटकर 2047 कैलरी रह गया है।


2005-06 में भारत की कुल वयस्क आबादी के एक-तिहाई का शारीरिक वजन सूचक (बोडी मास इंडेक्स) 18.5 से नीचे था, जो कुपोषण की सीमा दर्शाता है। दुनिया के सभी विकासशील देशों में जितने कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं, उनमें से आधे भारत में पैदा होते हैं। यहां की महिलाओं और लड़कियों में खून की कमी की दर बहुत अधिक है।

अमरीका के एक राज्य के कैदियों के बारे में प्रकाशित एक रिपोर्ट में क्षोभ व्यक्ति किया गया था कि कैदियों को तीन दिन में एक बार ही भरपेट खाना मिलता है। वहां के एक अखबारी टिप्पणी में इसे अमानवीय और और शर्मनाक करार दिया गया। इसकी तुलना कीजिए राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण की रिपोर्ट की इस टिप्पणी से – भारत की आबादी का लगभग 5 प्रतिशत हर दिन दो भरपेट भोजन के बिना सो जाने को मजबूर है। यानी 6 कोरड़ भारतीयों की स्थिति अमरीका के एक राज्य के कैदियों से भी बदततर है। क्या हमारे लिए इससे बढ़कर शर्मनाक बात कोई हो सकती है?

सरकारी अनुमानों के अनुसार देश में गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों की संख्या 6.52 करोड़ है। उन्हें बाजारी मूल्य से आधे मूल्य पर हर महीने 20 किलो अनाज देने की सरकारी व्यवस्था है। इसके लिए देश भर में 10 लाख राशन की दुकानें खोली गई हैं। पर मजे की बात यह है कि सरकार ने 8 करोड़ राशन कार्ड बांट रखे हैं। मतलब जितने गरीब हैं, उससे करीब 1.5 करोड़ अधिक राशन कार्ड। यह इस प्रणाली में फैले व्यापक भ्रष्टाचार का एक बढ़िया उदाहरण है।

योजना आयोग ने भी माना है कि राशन प्रणाली में रिसाव बहुत अधिक है। यह बिहार जैसे कुशासित प्रदेशों में ही नहीं है बल्कि पंजाब जैसे समृद्ध समझे जानेवाले राज्यों में भी है। इन दोनों राज्यों में राशन की दुकानों को उपलब्ध कराए गए अनाज का 75 प्रतिशत गरीबों तक नहीं पहुंचता है। आयोग का अनुमान है कि 2003-04 में राशन की दुकानों को गरीबों में बांटने के लिए 1.4 करोड टन अनाज दिया गया था। उसमें से केवल 80 लाख टन अनाज ही असल में गरीबों तक पहुंच सका। अन्य शब्दों में कहें तो, गरीबों को मिले प्रत्येक किलो अनाज के लिए सरकार को 2.23 किलो अनाज जारी करना पड़ा।

ये सारे आंकड़े आजकल की आर्थिक मंदी के पूर्व के हैं। निश्चय ही अभी की स्थति इससे कहीं अधिक गंभीर होगी। न केवल पिछले महीनों में अर्थव्यवस्था धीमी हुई है, खाद्य सामग्रियों की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। खाद्य पदार्थों की बढ़ी हुई कीमतों की सबसे कड़ी मार गरीबों पर पड़ती है। अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि गरीब परिवारों में कुल आमदनी का आधा खाने की चीजों पर खर्च होता है। खाद्य सामग्रियों की कीमतें बढ़ने का उनके लिए सीधा मतलब यह है कि अन्य खर्चों के लिए, जैसे कपड़े, दवाएं, बच्चों की पढ़ाई आदि के लिए उनके पास और भी कम पैसे बचते हैं।

अभी हाल में किए गए आर्थिक सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत की 60.5 प्रतिशत आबादी प्रति दिन 20 रुपए की आमदनी पर गुजारा करने को मजबूर है। दरअसल, देश में सचमुच कितने गरीब लोग हैं, इस संबंध में कोई एक मत नहीं है। नेशनल कमिशन ओफ ऐंटरप्राइसेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत के 77 प्रतिशत लोगों की स्थिति ऐसी है कि वे हर रोज 20 रुपए से भी कम खर्च कर सकते हैं। योजना आयोग का अंदाजा है भारत की कुल आबादी के 27.5 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं।

भारत में गरीबी रेखा की परिभाषा भी बहुत कठोर रखी गई है। उसे जिंदा रहने के लिए जो न्यूनतम पोषण आवश्यक है, उसे प्राप्त करने के लिए आवश्यक आय माना गया है। यानी गरीबी रेखा पर रह रहे लोग किसी तरह जिंदा रहने मात्र के लिए आवश्यक भोजन जुटा पाते हैं, परंतु उसके बाद उनके पास कपड़े, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि अन्य आवश्यकताओं के लिए पैसे नहीं बचते।

क्या अब आप समझे कि भारत को ओलिंपिक्स में रो-पीटकर एक-आध मेडल ही क्यों मिलते हैं, जबकि चीन पर मेडलों की वर्षा होती है?

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट