Saturday, December 20, 2014

पेशावर हत्याकांड का असली चेहरा

पेशावर हत्याकांड के बाद पाकिस्तान में इस हत्याकांड के असली कर्ता-धर्ताओं को छिपाने और पाकिस्तानी फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के साथ इन हत्यारों की साँठगाँठ पर पर्दा डालने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। इसमें सर्वोच्च स्तर के नेता, फ़ौजी अफ़सर, मीडिया के लोग और आतंकी सब शामिल हो गए हैं।

पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ और विपक्षी नेता इमरान ख़ान दोनों इस हत्याकांड की निंदा करते हुए बड़ी सफ़ाई से तालिबान का नाम लेने से कन्नी काट गए, हालाँकि तालिबान के प्रवक्ता ने हत्याकांड के तुरंत बाद इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी क़बूल करते हुए कह दिया था कि यह पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा उत्तरी वज़ीरिस्तान में सैकड़ों बच्चों सहित अनगिनत मासूम पख्तूनों की हत्या करने का बदलना लेने के लिए किया गया है।

पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में तालिबान ने नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान दोनों को ही अधिक सीटें जीतने में मदद की थी क्योंकि उन्होंने उनके विरोध में खड़े हुए बेनज़ीर भुट्टो और आसिफ़ ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्क पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान चुन-चुनकर मार डाला था। नतीज़ा यह हुआ कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी खुलकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाई और केवल सिंध तक सिमटकर रह गई जहाँ उसका अब भी थोड़ा-बहुत वर्चस्व है। इससे नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तानी संसद में अप्रत्याशित बहुमत मिल सकी और इमरान ख़ान भी खैबर-पख्तून ख्वाह प्रांत में बहुमत हासिल कर सके।

निश्चय ही इसके बदले इन दोनों ही पार्टियों ने तालिबान के साथ परोक्ष समझौता किया होगा। इमरान ख़ान तो पहले से ही तालिबान समर्थक रहे हैं और पाकिस्तान में शरीयत लागू करने की निरंतर वकालत करते हैं। इसलिए अब इनके लिए तालिबान की निंदा करना ज़रा कठिन है। यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ और इमरान ख़ान ने अपने वक्तव्यों में तालिबान पर सीधा आक्षेप नहीं किया।

यह भी ध्यान रहे कि नवाज़ शरीफ़ ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में तालिबान के विरुद्ध फ़ौजी कार्रवाई को टालने के लिए हर संभव प्रयास किया था और इसे तभी होने दिया जब इमरान ख़ान और कनाडाई मौलवी कादरी के मिले-जुले पैंतरे ने उसके हाथ कमज़ोर कर दिए और उसे अपनी गद्दी बचाने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के तहत वज़ीरिस्तान में फ़ौजी कार्रवाई के लिए हरी झंडी देना भी शामिल था। यह हरी झंडी मिलते ही पाकिस्तानी फ़ौज और अमरीका के ड्रोन विमान वज़ीरिस्तान पर टूट पड़े और हज़ारों लोगों को मार डाला। इनमें से मुट्ठी भर लोग ही वास्तव में तालिबान के लड़ाकू थे, बाकी सब मासूम लोग थे। इस सबका मीडिया में उतना खुलासा नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तानी फ़ौज ने मीडिया को वज़ीरिस्तान में घुसने ही नहीं दिया है। इसके विपरीत पेशावर हत्याकांड को पूरा मीडिया कवरेज प्राप्त हुआ जिससे ऐसी धारणा विश्व भर में फैल गई कि तालिबान वहशी हैं, पर यह पूरा सत्य नहीं है। दरअसल पाकिस्तानी फ़ौज ने भी वज़ीरिस्तान में इतना ही या इससे कहीं अधिक वहशीपन दिखाया है, और इसी का बदला तालिबान ने पेशावर में पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चों को मारकर लिया।

कहने का मतलब यह है कि पेशावर हत्याकांड की एक लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि है और उसे मात्र एक आतंकी हमला मानना ठीक नहीं होगा।

यह सब होते हुए भी, पेशावर हत्याकांड ने पाकिस्तानी जनता को झकझोर डाला है, और उनके मन में अनेक कठिन सवाल उठ रहे हैं, और तालिबान और पाकिस्तानी फ़ौज, आईएसआई, और पाकिस्तानी नेताओं के बीच जो साँठगाँठ है वह पाकिस्तानी जनता को समझ में आने लगा है। यदि जनता पूरी तरह इन संबंधों को समझ जाए, तो यह पाकिस्तान के लिए बड़ी समस्या बन सकती है क्योंकि पाकिस्तान का अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा। पाकिस्तान को इस्लामी मुल्क के रूप में अभिकल्पित किया गया है और उसका सीधा सरोकार वहाँ की जनता की खुशहाली या उनके दुखों-कष्टों को दूर करने से नहीं है। यही कारण है कि वहाँ देश की अधिकांश संपदा को फ़ौज को पुष्ट करने और अफ़गानिस्तान और भारत में अनावश्यक हस्तक्षेप करने में खर्च किया जाता है।

इसलिए यह ज़रूरी है कि जल्द ही पेशावर हत्याकांड के असली स्वरूप पर पर्दा डाला जाए। इसका आजमाया हुआ नुस्खा भारत या अमरीका को पाकिस्तान में हो रहे सभी नापाक कामों के लिए ज़िम्मेदार ठहराना है। और यही हथकंडा इस बार भी अपनाया गया है।

पेशावर हत्याकांड अभी चल ही रहा था कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और फ़ौजी तानाशाह मुशर्रफ़ ने एक टीवी चैनल को इंटर्वयू देते हुए कह दिया कि पेशावर हमले के पीछे भारत का हाथ है और पाकिस्तानी फ़ौज को भारत को मुँह तोड़ जवाब देना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान में जब भी कोई आतंकी घटना घटती है, तो इसकी ज़िम्मेदारी भारत के मत्थे मढ़ने के लिए वहाँ किसी भी प्रकार के प्रमाण या सबूत की आवश्यकता नहीं होती है। यह वहाँ की मीडिया, स्तंभ लेखक, अख़बार, नेता, आतंकी सब की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। ऐसा करके वहाँ की जनता में भारत के प्रति नफ़रत की भावना भड़काई जाती है, जिसके बिना पाकिस्तान के अलग अस्तित्व का कोई औचित्य ही नहीं बनता है।

उधर हाफ़िज साईद, जिसने मुंबई में पेशावर के जैसा ही हत्याकांड आयोजित कराया था, और जिसके लिए उसे पाकिस्तान में हीरो की तरह पूजा जाता है, एक बड़ी प्रेस सम्मेलन बुलाकर वक्तव्य दे दिया कि पेशावर हमले के पीछे भारत का हाथ है और यह भारत की सोची-समझी साजिश है क्योंकि यह हमला ठीक उस दिन (दिसंबर 15) को किया गया है जिस दिन भारत ने 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके पूर्वी पाकिस्तान में बंग्लादेश का निर्माण करा दिया था। हाफ़िज़ ने यह भी कहा कि इसका बदला कश्मीर को भारत से छीनकर लिया जाएगा।

पाकिस्तान के अनेक पत्रकारों ने भी इस तरह की अफ़ावाएँ फैलाते हुए पेशावर हमले का ज़िम्मा भारत पर डालना शुरू कर दिया है। वे चाहते हैं कि पाकिस्तानी जनता का रोष तालिबान और उनके आका पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई और तालिबान के समर्थक नेताओं और राजनीतिक पार्टियों पर न उमड़े और उसे सुरक्षित मार्गों की ओर मोड़ दिया जाए, अर्थात भारत की ओर मोड़ दिया जाए।

पर इस बार उनका काम अधिक मुश्किल है, क्योंकि एक तो स्वयं तालिबान ने इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी क़बूल कर ली है और उसे वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा मारे गए सैकड़ों मासूम बच्चों और औरतों का बदला बताया है।

इसके अलावा अब इस हत्याकांड को अंजाम देनेवाले लड़ाकों द्वारा अफ़गानिस्तान में बैठे अपने आकाओं के साथ हुए वार्तालाप की रेकॉर्डिंग भी प्राप्त हो चुका है, जिसमें वे अपने आकाओं से पूछ रहे हैं कि हमने यहाँ सारे बच्चों को मार दिया है अब हमें क्या करना है। उधर से जवाब आता है कि अपने आपको बम से उड़ा लेने से पहले पाकिस्तानी फ़ौज को आने दो ताकि बम धमाके में पाकिस्तानी फ़ौज के सिपाही भी बड़ी संख्या में मरें।

इन सब तथ्यों को मद्दे नज़र रखते हुए ही अनेक भारतीय प्रेक्षकों का मानना है कि आंतिकियों का उपयोग अफ़गानिस्तान और भारत में राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करने की पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की नीति पेशावर हत्याकांड के बाद भी ज़रा भी नहीं बदलेगी।

पाकिस्तान अफ़गानी तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों का उपयोग अफ़गानिस्तान में तबाही मचाने और पाकिस्तानी तालिबान और हाफ़िज़ साईद के लश्कर-ए-तोइबा और जमात-उद-दवा का उपयोग कश्मीर और भारत में आतंक फैलाने के लिए करता है। इनके ज़रिए वह भारत के साथ सामरिक संतुलन स्थापित करने के सपने देखता है और अफ़गानिस्तान में अपने अनुकूल तालिबानी कठपुतली सरकार स्थापित करने के मंसूबे बाँधता है।

पर पेशावर हमले ने दिखा दिया है कि तालिबान कठपुतले कम और दुर्दांत और वहशी लड़ाकू हैं जो समस्त पाकिस्तान को ही लील जाने की क्षमता रखते हैं। अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान के संबंध में सही ही कहा है कि जो लोग अपने घर में इस इरादे से ज़हरीले साँप पालते हैं कि वे उनके पड़ोसियों को डसेंगे, देर-सबेर स्वयं ही इन विषधरों द्वारा डस लिए जाते हैं।

Thursday, December 18, 2014

पेशावर कत्लेआम से नहीं बदलेगी पाकिस्तान की आतंकी नीति

पेशावर स्कूल हमले के बाद भारत के अनेक लोगों ने यह आशा व्यक्त की है कि शायद इस हादसे के बाद पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आएगी और वह आतंकवाद को पालने-पोसने से बाज़ आएगा। लेकिन इसकी ज़रा भी संभावना नहीं है।

पेशावर के फ़ौजी स्कूल में बहे पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चों का ख़ून और उनकी माँओं के आँसू अभी सूखे भी न थे कि लाहौर की एक अदालत ने मुंबई हत्याकांड के प्रमुख संचालक और लश्कर-ए-तोइबा के कमांडर ज़ाकिर रहमान लख़वी की ज़मानत पर रिहाई मंजूर कर ली।

यह शायद हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा पाकिस्तान से मुंबई हत्याकांड के एक अन्य प्रमुख आरोपी हाफ़िज़ साईद को भारत के हवाले करने की माँग का परोक्ष उत्तर था। हाफ़िज़ पाकिस्तान में खुले आम घूम रहा है और अभी हाल में जब पाकिस्तानी फ़ौज कश्मीर में आतंकियों को घुसाने के लिए सरहद पर फ़ायरिंग कर रही थी, सरहद के पास भी इसे देखा गया था। इतना ही नहीं इसने कुछ ही दिन पहले लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान के मैदान में एक बड़ी रैली भी आयोजित की, जिसके लिए लोगों को लाहौर लाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने ख़ास रेलगाडियाँ चलाईं। इससे पता चलता है कि हाफ़िज़ एक तरह से पाकिस्तानी फ़ौज और वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का घर-जमाई है और पाकिस्तान का इन आतंकियों से नाता तोड़ने का कोई इरादा नहीं है।

पेशावर हमले की निंदा वहाँ के नेताओं और फ़ौज को मजबूरन करनी पड़ रही है, पर इससे पाकिस्तान की केंद्रीय नीति में कोई भी परिवर्तन आने के आसार नहीं है क्योंकि इसी नीति पर पाकिस्तानी मुल्क का वजूद टिका है। ध्यान रहे, पेशावर हमले की निंदा करते हुए तहरीख-ए-पाकिस्तान पार्टी के नेता इमरान खान पाकिस्तानी तालिबान का नाम लेने से साफ मुकर गए, हालाँकि इस हमले के लिए पाकिस्तानी तालिबान ने ज़िम्मेदारी क़बूल कर ली है और कहा है कि यह हमला वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा मासूम पख्तून निवासियों को मारने के बदले में किया गया है।

पाकिस्तान जानता है कि सैनिक होड़ में वह भारत का मुक़ाबला नहीं कर सकता है, भले ही उसके पास परमाणु बम क्यों न हो। इसलिए शुरू से ही वह ग़ैर-सैनिक ज़रियों से भारत को कमज़ोर करने की नीति पर चलता आ रहा है। इसे वह हज़ार घावों से ख़ून बहाकर भारत को घुटनों पर लाने की नीति कहता है। इसे अंजाम देने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज ने और खास तौर से उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने दाऊद इब्राहीम, हाफ़िज़ साईद, और तालिबान जैसे अनेक ग़ैर-सरकारी ताकतों को पालकर खड़ा किया है और इन्हें वह भारत में आतंक फैलाने के लिए समय-समय पर छोड़ता रहता है।

तालिबान को उसने अमरीका की सहायता से तब खड़ा किया था जब सोवियत संघ ने अफ़गानिस्तान पर कब्ज़ा करके वहाँ नजीबुल्ला की पाकिस्तान-विरोधी सरकार स्थापित की थी। अफ़गानिस्तान को पाकिस्तान अपने ही मुल्क का पिछवाड़ा मानता है और वहाँ ऐसी किसी भी सरकार को बर्दाश्त नहीं करता है जिसकी बागडोर पाकिस्तान के फ़ौजी जनरलों या आईएसआई के हाथों में न हो। इसलिए नजीबुल्ला सरकार को गिराने के लिए उसने तालिबान को पाला पोसा और इस तालिबान ने ओसामा बिन लादेन जैसे सौउदी धन्ना-सेठ और कट्टर सुन्नी और वहबी इस्लामी विचारधारा के पैरोकारों की मदद से सोवियत संघ को अफ़गानिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया और वहाँ तालिबान की सरकार कायम कर दी।

इसके बाद पाकिस्तान के दुर्भाग्य से ओसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा ने अमरीका में हवाई जहाजों को मिसाइलों के रूप में उपयोग करके न्यू योर्क में ट्विन-टावर को धराशायी कर दिया। इसमें 3,000 से अधिक अमरीकी नागरिक मरे। इससे भी बड़ी बात यह थी कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर समुद्री हमले के बाद यह पहली बार अमरीका की ज़मीन पर किसी ने हमला किया था। अब तक अमरीका यही समझ रहा था कि उसके देश पर कोई भी हमला नहीं कर सकता है। न्यू योर्क हमले ने अमरीकियों की इस ख़ुश-फ़हमी को सदा-सदा के लिए खत्म कर दिया।

इस हमले का बदला लेने के लिए अमरीकी सेना अफ़गानिस्तान में उतरी और उसने तालिबान को काबुल से खदेड़कर हमीद करज़ई को राष्ट्रपति बना दिया। इस लड़ाई में उसने पाकिस्तान को भी शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। अमरीका ने पाकिस्तान को अल्टिमैटम दे डाला कि लड़ाई में शामिल हो जाओ, वरना हम पाकिस्तान पर इतने बम बरसाएँगे कि वह पत्थर युग में पहुँच जाएगा।

पाकिस्तान को इस धमकी को गंभीरता से लेने में ही समझदारी लगी और वहाँ के तानाशाह राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ़ ने अमरीकियों का साथ देना क़बूल किया, पर आधे मन से ही। वह अमरीकियों के साथ लड़ता भी रहा और तालिबान को बचाने के लिए यथा-शक्ति छिपी कोशिश भी करता रहा। यही कारण है कि अमरीका अफ़गानिस्तान में तालिबान को सफ़ाई के साथ हरा नहीं सका न ही वह ओसामा बिन लादेन को ही पकड़ सका क्योंकि वह पाकिस्तानी फ़ौज की एक छावनी अबोट्टाबाद में सुरक्षित रूप से पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा छिपाया गया था जहाँ वह पाकिस्तानी फ़ौज के संरक्षण में अपनी बीवियों और बच्चों के साथ मज़े से रह रहा था। आखिर अमरीका को अपने सीलों को भेजकर रात के अँधेरे में इस तरह उसका वध करवाना पड़ा कि पाकिस्तानी फ़ौज को इसकी भनक तक न लग पाए।

जब तालिबान सरकार सत्ताच्युत हुई तो तालिबानी लड़ाकू पूरे अफ़गानिस्तान में और पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में भागकर फैल गए और वहाँ से वे अमरीका के विरुद्ध छापेमार युद्ध लड़ते रहे। पाकिस्तान में जो तालिबान फैल गए थे, वे ही पाकिस्तानी तालिबान के रूप में जाने जाते हैं और उनका अफ़ागानी तालिबान के साथ घनिष्ट संबंध है। दोनों का अंतिम ध्येय है अफ़गानिस्तान में अमरीका द्वारा स्थापित सरकार को अपदस्थ करके तालिबानी सरकार दुबारा क़ायम करना। यही ध्येय पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का भी है।

अमरीकी दबाव में आकर पाकिस्तानी फ़ौज को अफ़गानी तालिबान पर कुछ कार्रवाई करनी पड़ी है जिससे तालिबान उनसे काफ़ी रुष्ट हो गया है। इसी तरह तालिबान का पाकिस्तानी हिस्सा जब पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को पार करने लगा, तब भी पाकिस्तानी फ़ौज को पाकिस्तानी तालिबान के विरुद्ध कार्रवाई करनी पड़ी है। ऐसा एक बार तब हुआ जब पाकिस्तानी तालिबान ने स्वात घाटी में अपना वर्चस्व फैला लिया और वहाँ शरीयत लागू करके अपराधियों का सिर कलम करना, हाथ काटना, कोड़े लगाना, पत्थर फेंककर मरवाना आदि इस्लामी दंड लागू करने लगा था। इसी तालिबान ने वहाँ लड़कियों को स्कूल जाने से भी मना कर दिया था और इस निषेध का उल्लंघन करने के लिए ही मलाला यूसुफ़ज़ई नामक 15 साल की लड़की के सिर पर एक तालिबानी कमांडर ने गोली दाग दी थी। ईश्वर की कृपा से वह बच गई और उसे लंदन में शरण मिल गई। इसी लड़की को अभी हाल में भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ नोबल पुरस्कार मिला है।

जब यह स्पष्ट होने लगा कि अमरीका अफ़ागन युद्ध में कहीं आगे नहीं बढ़ रहा है और जल्द वहाँ से बोरियाँ-बिस्तर बाँधनेवाला है, तो तालिबान का भी हौसला बुलंद होने लगा। वह अपनी शक्ति बटोरने लगा ताकि अमरीकी सेना के निकलते ही वह अफ़गानिस्तान पर फिर से कब्ज़ा जमा सके। इस नए हौसले ने पाकिस्तानी तालिबान को भी मदहोश कर दिया है और वह पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई द्वारा उस पर कसा गया नकेल तोड़ने के लिए कसमसा रहा है। उसे यह उम्मीद भी बनती जा रही है कि उसके लिए अफ़गानिस्तान पर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान पर भी कब्ज़ा करना और इस तरह पाकिस्तानी फ़ौज के पास मौजूद परमाणु हथियार पर नियंत्रण पाना शायद मुमकिन है। परमाणु हथियार हाथ आते ही, उन्हें इराक में उनके बंधु-बांधव आईसिस के हवाले करके वहाँ से भी अमरीका को खदेड़ना संभव हो सकेगा। इस तरह आईसिस द्वारा घोषित ख़िलाफ़त की नींव और भी पक्की हो सकेगी। तालिबान ने पहले से ही आईसिस को अपना समर्थन घोषित कर दिया है।

इस विचार को अंजाम देने के लिए पाकिस्तानी तालिबान धीरे-धीरे कोशिश कर रहा है। अभी हाल में उसके एक कुमुक ने कराची हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लिया था, और एक अन्य दल ने पाकिस्तानी नौसेना के एक युद्ध-पोत पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी।

तालिबान ने समस्त पाकिस्तान में इस्लामी और सुन्नी वहबी विचारधारा को भी इतना फैला दिया है कि वहाँ उसके इमरान खान जैसे शक्तिशाली समर्थक हो गए हैं। इमरान खान की तहरीख-ए-पाकिस्तान पार्टी खैबर-पक्तून ख्वाह प्रांत में सरकार चला रही है, और अभी हाल में उसने कनाडावासी इस्लामी मौलवी ताहिर उल कादिर के साथ मिलकर इस्लामाबाद में ऐसी जबर्दस्त हड़ताल आयोजित की कि कई दिनों तक पाकिस्तानी सरकार ठप्प पड़ गई और पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन के राष्ट्रपति तक को अपनी पाकिस्तानी दौरा रद्द करना पड़ा। इमरान खान तालिबान और शरियत क़ानून का प्रबल समर्थक है और पाकिस्तानी युवाओं में उसकी काफी धाक है।

दूसरी ओर मुंबई हमले के कर्ता-धर्ता हाफ़िज़ साईड का संगठन लश्कर-ए-तोइबा का भी पाकिस्तान में काफी रुतबा है। यह संगठन पकिस्तान में हज़ारों मदरसे चलाता है जहाँ कट्टर वहबी इस्लामी विचारों का प्रचार होता है। यह संगठन बाढ़, भूकंप आदि विपदाओं में राहत कार्य चलाकर भी लोगों के दिलों में जगह बनाता है। उसे साउदी अरब से अकूत दौलत भी प्राप्त होती है। इतना ही नहीं, पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई भी उसे सभी सहूलियतें मुहैया कराती हैं। इसके बदले वह भारत के विरुद्ध आतंकी हमले आयोजित करता है और काश्मीर में अशांति फैलाकर पाकिस्तानी फ़ौज की मदद करता है।

इस तरह जिस पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर स्कूल में कत्ले-आम किया है, वह पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई का ही बनाया हुआ है और उसे बनाने के पीछे पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई के खास मकसद हैं। ये हैं अफ़गानिस्तान में पाक-समर्थक सरकार खड़ा करना और भारत के विरुद्ध ग़ैर-सैनिक आतंकी कार्रवाई कराने में उसकी मदद करना।

पर पाकिस्तानी फौज़ की बनाई हुई चीज़ होने पर भी तालिबान कई बार किसी उद्दंड संतान की तरह अपने ही पिता के निर्देशों का उल्लंघन कर देता है, और तब पाकिस्तानी फ़ौज उसे दंडित करके सही रास्ते पर ले आती है। ऐसा कई बार हुआ है, जैसे स्वात घाटी में और अभी वज़ीरिस्तान में जर्द-ए-अज़्ब नामक सैनिक कार्रवाई में, जिसके तहत सैकड़ों तालिबानी लड़ाकों को और हज़ारों पख्तून निवासियों को पाकिस्तानी फ़ौज ने मार डाला है।

इसी का बदला लेने के लिए पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर स्कूल हमला कराया है। पाकिस्तानी तालिबान चाहती है कि पाकिस्तानी फ़ौज भी वही दर्द और पीड़ा महसूस करे जो अपनों के मारे जाने पर होता है और जिसे वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौजी कार्रवाई में मारे गए पख्तूनों के कारण तालिबान को महसूस हुआ था। इसीलिए पाकिस्तान ने पेशावर के सैनिक स्कूल को चुना था क्योंकि वहाँ पाकिस्तानी फ़ौजियों के बच्चे पढ़ते हैं और इन बच्चों के मारे जाने पर पाकिस्तानी फ़ौज को वही दुख-दर्द महसूस होगा जो तालिबान को वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों अपनों के मारे जाने पर हुआ था।

इसलिए पेशावर हमले को आतंकी हमला मानना पूरी तरह से ठीक नहीं होगा। यह प्रतिशोध की कार्रवाई है, और दो ऐसे पक्षों के बीच की रस्सा-कशी है जो एक-दूसरे को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश में हैं। पाकिस्तानी फ़ौज चाहती है कि तालिबान वही करे जो उसका हुक्म हो, और तालिबान पाकिस्तान पर कब्ज़ा करके उसके परमाणु हथियारों और अन्य सैनिक साज-सामानों को हथियाना चाहती है ताकि उसकी मदद से उसके वैचारिक भाई आईसिस इराक में इस्लामी खिलाफ़त को सुदृढ़ बना सके।

युद्धरत पक्षों के बीच इस तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई अक्सर होती रहती है। जो महाभरत से वाकिफ़ हैं, वे जानते होंगे कि महाभारत युद्ध में भी ऐसी ही एक कार्रवाई को कौरवों ने अंजाम दिया था। युद्ध के अंतिम दिनों जब पांडवों ने एक अर्ध-सत्य का सहारा लेकर कौरवों की तरफ़ से लड़ रहे उनके गुरु और कौरव सेनापति द्रोणाचार्य की हत्या करा दी थी, तो द्रोणाचार्य के पुत्र और दुर्योधन के मित्र अश्वत्थामा ने कृतवर्मा और कृपाचार्य का साथ लेकर रात के अँधेरे में पांडवों के शिवर में घुसकर वहाँ सो रहे सभी को मारकर इसका बदला लिया था। मारे गए व्यक्तियों में द्रौपदी के पाँच बच्चे भी शामिल थे। पांडव इसलिए बच पाए क्योंकि वे उस समय वहाँ नहीं थे।

भारत के लिए यह सब अत्यंत चिंता का विषय है क्योंकि चाहे तालिबान जीते या पाकिस्तानी फ़ौज, दोनों स्थितियों में उसे नुकसान होनेवाला है। यदि तालिबान पाकिस्तान को हज़म कर जाए, तो परमाणु बम से लैंस एक ऐसी शत्रुतापूर्ण शक्ति भारत की सरहदों पर उभर आएगी, जो भारत के प्रति आज के पाकिस्तान से हज़ार गुना द्वेष रखती है। और यदि पाकिस्तानी फौज़ तालिबान को दंडित और अनुशासित करने में क़ामयाब होती है, तो आनेवाले दिनों में यह तालिबान और हाफ़िज़ साईद जैसे आतंकी पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई के इशारों पर भारत पर आजकल से कहीं अधिक विस्तार से हमले कराएँगे।

इसलिए पाकिस्तान के घटनाचक्र पर भारत को पैनी निगाह रखनी होगी और उसे हर स्थिति का मुक़ाबला करने के लिए मुस्तैद होना पड़ेगा।

Saturday, April 04, 2009

तालिबानी इंसाफ

पाकिस्तान में उस सत्रह साल की किशोरी को अपने पड़ोसी के साथ बाहर निकलने के लिए जैसा इंसाफ मिला उस पर कोई टिप्पणी करना यहां मेरा इरादा नहीं है। इसकी खूब चर्चा टीवी चैनलों, अखबारों और ब्लोगों में हो चुकी है। उसमें कुछ भी नया जोड़ने को बाकी नहीं रह गया है।

यही दिमाग में आता है कि मध्य युग में चंगेज खान आदि जालिमों के जमाने में ऐसा ही सब हुआ होगा।

अफसोस होता है कि पाकिस्तान क्या-क्या सोचकर हमसे अलग हुआ था और आज क्या-क्या होकर रह गया है। पर पाकिस्तान की दुर्गति पर खुश होने का हमें कितना अधिकार है? यहीं मैंगलूर के पबों में लड़कियों के साथ जैसा सलूक किया गया क्या वह तालिबानी इंसाफ से जरा भी कम वहशियाना था?

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जिन्होंने अब तक टीवी या इंटरनेट में इस बर्बरता को नहीं देखा है, वे यूट्यूब के जरिए यहां उसे देख सकते हैं। हालांकि दृश्य काफी विचलित कर देने वाले हैं, पर, जैसा कि घुघूती बासूती ने उचित कहा है (टिप्पणी में देखें), हमें ऐसे कृत्यों के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनानी होगी, जिसके लिए यह आवश्यक है कि हम इस तरह की वीभत्सता को अपनी आंखों से देख लें।

Wednesday, March 18, 2009

अच्छा तालिबान, बुरा तालिबान

ओबामा सरकार अमरीका की अफगान नीति को नए सिरे से गढ़ रही है। जो छिटपुट खबरें आ रही हैं, उनसे ऐसा मालूम पड़ रहा है कि अमरीका अफगानिस्तान में लंबे युद्ध में फंसने से बचने के लिए तालिबान से समझौता करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

अमरीका के ट्विन टावर पर विमान-बम से हमला करके लगभग 5,000 अमरीकियों की जान लेने वाले अलकायदा का तालिबान के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। इस तालिबान से अमरीका भली-भांति परिचित है। अफगानिस्तान से सोवियतों को खदेड़ने के लिए अमरीका ने ही इसे हथियारों से लैस किया था।

तालिबान का दूसरा संरक्षक अमरीका का ही मित्र पाकिस्तान है। उसका खुफिया संगठन आईएसआई और स्वयं पाकिस्तानी सेना तालिबान को अपना धर्म-भाई मानते हैं। भारत के साथ युद्ध होने पर पाकिस्तान अफगानिस्तान को भौगोलिक गहराई प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहता है। इसलिए अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार स्थापित करना उसकी रणनीति का एक अंग है। दुर्भाग्य से नायन-लेवन के बाद उसे इस रणनीति को ताक पर रखकर अमरीकी दबाव में तालिबान पर ही बंदूक तानना पड़ा है। पर परोक्ष रूप से तालिबान को समर्थन देना पाकिस्तान ने कभी नहीं छोड़ा।

नायन-लेवन के बाद अमरीका ने अपने पुराने युद्ध साथी तालिबान पर हमला बोल दिया और उसे काबुल से खदेड़ दिया। संकट के इस पल में तालिबान के लिए यह स्वाभाविक था कि वह पाकिस्तान में शरण ले। पहले तालिबान अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सरहद की बीहड़ पहाड़ियों तक सीमित रहा, परंतु धीरे-धीरे वह पाकिस्तान भर में अपना प्रभाव बढ़ाता गया। नवीनतम खबर यह है कि पाकिस्तान की स्वात घाटी उसके कब्जे में आ गई है। अब लगभग आधे पाकिस्तान पर उसका कब्जा है, और ऐसा माना जा रहा है कि जल्द ही कराची, पेशावर, रावलपिंडी, इस्लामाबाद, और लाहौर, यानी लगभग संपूर्ण पाकिस्तान में उसकी तूती बोलेगी।

तालिबान के साथ लड़ाई में अमरीका ने एक गंभीर गलती की। नयन-लेवन के बाद उसने तालिबान को काबुल में गद्दी से उतार तो दिया, पर मसले का पूर्ण समाधान होने से पहले ही ईराक पर हमला करके अपने ऊपर दो-दो युद्धों का भार थोप लिया। यह दूसरा युद्ध खाड़ी के तेल संसाधनों पर अमरीकी प्रभाव बनाए रखने के लिए था। दो-दो युद्ध एक साथ लड़ने से अमरीका की शक्ति बंट गई। समस्त मुस्लिम जगत में अमरीका के प्रति घृणा की भावना तेज हो गई। इससे तालिबान को मुस्लिम देशों से आर्थिक और नैतिक समर्थन प्राप्त होने लगा।

चीन, जो बड़ी तेजी से महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, भली-भांति समझता है कि अमरीका द्वारा ईराक में युद्ध छेड़ने का उद्देश्य वहां के तेल संसाधनों को अमरीकी कब्जे में रखना है। यह चीन को मंजूर नहीं है क्योंकि वह स्वयं इस संसाधन को अपने प्रभाव में लाना चाहता है। पर चीन अमरीका से सीधा वैर मोल नहीं ले सकता था। इसलिए अमरीका को कमजोर करने के इरादे से उसने तालिबान को समर्थन बढ़ा दिया।

उधर नायन-लेवन के बाद पाकिस्तानी सेना को अमरीकी दबाव में आकर अपने धर्म-भाइयों पर ही सैनिक कार्रवाई करनी पड़ी। इससे पाकिस्तानी सेना की साख न केवल तालिबानों में गिरी, बल्कि पाकिस्तान की जनता भी अपनी सेना को विश्वासघाती के रूप में देखने लगी। वह सवाल करने लगी, पाकिस्तानी सेना अमरीका का युद्ध क्यों लड़े और तालिबान को क्यों मारे, जो आखिर मुसलमान ही तो हैं?

इस सवाल का सीधा सा जवाब यह है कि पाकिस्तानी सेना को इसके बदले अरबों डालर मिल रहे हैं, जिसके बिना पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था कब की लुढ़क चुकी होती। पर यह बेबाक उत्तर पाकिस्तानी जनता को कैसे दिया जा सकता था? अतः आईएसआई और पाकिस्तानी सेना एक दोगली नीती पर चलने लगी जिसे अंग्रेजी कहावत रनिंग विथ द हेर एंड हंटिंग विथ द डोग्स के रूप में अच्छी तरह व्यक्त किया जा सकता है। यह नीति कुछ यों थी -- पाकिस्तानी सेना अमरीका से तो कहती गई कि वह अफगान युद्ध में उसका साथी है, और अमरीका से अरबों डालर इसके एवज में ऐंठती रही, पर जब तालिबान से लड़ने की बारी आई तो वह खोमोश बैठी रही।

नतीजा यह हुआ कि तालिबान को पाकिस्तान में बेरोकटोक अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल गया। अब ऐसा लगता है कि उसकी शक्ति इतनी बढ़ चुकी है कि वह पाकिस्तानी सेना या आईएसआई के नियंत्रण के बाहर हो चुका है। इतना ही नहीं पाकिस्तानी सेना के निचले स्तर के जवान तालिबानी संस्कृति में इतने रंग गए हैं कि वे तालिबान पर कभी हथियार नहीं उठा सकते। वे एक तरह से तालिबान के ही सदस्य जैसे हो गए हैं। यदि पाकिस्तानी फौज के आला अफसर तालिबान के विरुद्ध कार्रवाई का हुक्म भी दें, तो निचले स्तर के पाकिस्तानी जवान इस हुक्म की तामील न करें।

इस तरह अमरीका की मूर्खता, चीन की कूटनीति और पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की मिली भगत से तालिबान इतना मजबूत हो गया है कि अब उसे अमरीका के लिए हरा पाना लगभग असंभव है।

अब भेद नीति ही बची रह गई है। नए अमरीकी राष्ट्रपति ने इसी का सहारा लेना तय किया है। अमरीका द्वारा अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान में अंतर करने के पीछे यही रहस्य है। जो तालिबान अमरीकी डालरों के लिए बिकने को तैयार हैं, वे अच्छे तालिबान, और जो लड़ने पर उतारू हैं, वे बुरे तालिबान। अमरीका तालिबान को भीतर से तोड़कर कमजोर करना चाहता है। तालिबान विभिन्न अफगान कबीलों से बना है, जिनमें आपसी फूट भी है। अमरीका इस फूट का लाभ उठाकर उनमें से कुछ कबीलों को अपने साथ मिलाना चाहता है।

शायद पाकिस्तान ने ही अमरीका को यह पाठ पढ़ाया है। जब जनरल कियानी हाल में वाशिंगटन गया था, उसने अमरीका को साफ-साफ बता दिया होगा कि उसकी सेना के लिए अब तालिबान को अंकुश में रखना संभव नहीं है। हो सकता है कि पाकिस्तान ने यह भी कहा हो कि स्वयं पाकिस्तानी राज्य को तालिबान से खतरा है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति जरदारी तो बारबार कह ही रहे हैं कि पाकिस्तान में तालिबान कभी भी सत्ता-पलट कर सकता है। पीकिस्तान में स्थिति के इस हद तक बिगड़ने से अमरीका घबरा उठा होगा क्योंकि यदि पाकिस्तन पर तालिबान का कब्जा हो जाए, उसके हाथों में पाकिस्तान का परमाणु बम भी आ जाएगा। परमाणु बम हाथ लगते ही तालिबान सचमुच अजेय हो जाएगा और अमरीका को अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा। यह सामरिक दृष्टि से अमरीका की करारी हार होती क्योंकि अफगानिस्तान से वह ईरान, चीन, रूस और भारत जैसे बड़े बड़े देशों को नियंत्रण में रखने की मंशा रखता है।

अफगानिस्तान से अमरीकी प्रभाव समाप्त होने के बाद ईरान और तालिबान के बीच मेल-जोल बढ़ सकता है। इससे खाड़ी क्षेत्र के अमरीका के अन्य मित्र देशों को भारी खतरा पैदा हो जाएगा। इनमें प्रमुख है इजराइल। दूसरी ओर अमरीका के इस क्षेत्र से पलायन करते ही ईरान और तालिबान को चीन अपनी छत्रछाया में ले लेगा, जिससे इस भूभाग के विशाल तेल संपत्ति पर उसका नियंत्रण हो जाएगा।

इस सब घटनाचक्र से भारत सब ओर से घाटे में रहेगा। पाकिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने पर कश्मीर के अलगाववादियों में नया जोश भर जाएगा। उधर पाकिस्तान से शरणार्थी भारी मात्रा में भारत में घुसने लगेंगे। तालिबान के हाथों परमाणु बम आने से काबुल में अमरीका-पोषित वर्तमान सरकार गिर जाएगी और तालिबान वहां सत्ता संभाल लेगा। इससे अफगानिस्तान से भारतीय प्रभाव एक बार फिर समाप्त हो जाएगा। भारत की पश्चिमी सरहद पर पाकिस्तान से भी ज्यादा भारत से शत्रुता रखनेवाला तालिबान नजर आने लगेगा जिसका भारत के एक अन्य शत्रु चीन के साथ बड़े ही मधुर संबंध होंगे। इस संबंध का प्रयोग करके चीन भारत पर दबाव डालने लगेगा। संभव है कि भारत को कमजोर स्थिति में पाकर वह अरुणाचल आदि के संबंध में प्रतिकूल संधियां भी करा ले। खाड़ी प्रदेश में चीन, ईरान और तालिबान का प्रभाव बढ़ने से भारत को वहां से तेल मिलने में कठिनाई का समाना करना पड़ सकता है।

पर बात यहां तक आकर नहीं रुकेगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर अपना राज्य स्थापित करके तालिबान शांत नहीं होगा, बल्कि विजय दर्प में भारत, अमरीका, इजराइल आदि पर हमले करने की भी कोशिश करेगा, क्योंकि उसे चीन और ईरान के समर्थन का भरोसा होगा। इससे तृतीय विश्व युद्ध की नौबत आ सकती है।

इसलिए तालिबान से खिलवाड़ करने से पहले अमरीका को दो बार सोच लेना चाहिए। यदि वह इतिहास से कुछ सीखना चाहे, तो द्वितीय विश्व युद्ध में भी ब्रिटन आदि पश्चिमी देशों ने नाजी जर्मनी के साथ ऐसे ही समझौते किए थे और हर समझौते से हिटलर और मजबूत हो उठा था। अंत में उसने सारे यूरोप में अपनी सेनाएं भेजकर भयंकर नरसंहार मचा दिया था।

अब लगता है कि अमरीका वही पुरानी गलती दुहरा रहा है। स्थिति वही है केवल खिलाड़ियों ने स्थान बदल लिए हैं। नाजी जर्मनी की जगह तालिबान है, नाजियों से समझौते करनेवाले ब्रिटेन की जगह अमरीका है, युद्ध के लगभग अंत तक तटस्थ रहते हुए अपनी शक्ति बरकरार रखनेवाले अमरीका की जगह चीन है। यदि युद्ध छिड़ जाए, तो जिस तरह जर्मनी और ब्रिटन दोनों ही तबाह हुए थे, वैसे ही तालिबान और अमरीका और उसके मित्र देश तबाह हो जाएंगे, और इस विध्वंस से चीन उसी तरह अधिक शक्तिशाली होकर उभरेगा जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका उभरा था।

इस तरह ऐसा लगता है कि आनेवाले वर्षों में भारी उथल-पुथल मचने वाला है जो दुनिया के नक्शे को ही और वर्तमान शक्ति-संतुलन को ही बदलकर रख देगा। द्वितीय विश्व युद्ध के विजेताओं ने अपने पक्ष में जो तंत्र रचा था, लगता है, उसका समय अब बीतने वाला है। उसकी जगह एक नया शक्ति संतुलन आ सकता है जिसमें चीन का स्थान सर्वोपरि होगा। (समाप्त)

Tuesday, March 10, 2009

पाकिस्तानी बम पर गढ़ी है तालिबानी नजर

तालिबान के कब्जे में पाकिस्तानी परमाणु अस्त्र का आना एक गंभीर और वास्तविक खतरा है, जिसके भारत के लिए और समस्त दुनिया के लिए दूरगामी परिणाम होंगे।

रणनीतिक दृष्टि से देखें, तो अमरीका से पिंड़ छुड़ाने के लिए तालिबान के पास पाकिस्तानी बम पर कब्जा करने के सिवा और कोई विकल्प रह भी नहीं गया है, क्योंकि वह अमरीका के साथ सीधी लड़ाई जीत नहीं सकता। इसलिए वह परमाणु बम प्राप्त करने की ओर पुर-जोर कोशिश करेगा।

पाकिस्तानी बम तालिबान के हाथ पड़ते ही अमरीका को अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा। अमरीका कभी भी परमाणु बम के खतरेवाले युद्ध में अपने सैनिकों को नहीं उतारेगा। वह युद्ध भूमि में अपने सैनिकों की इतनी मौतें कभी बर्दाश्त नहीं कर सकेगा।

पाकिस्तानी बम तालिबानों के हाथ लगते ही, पाकिस्तानी सेना में भी विभाजन हो सकता है। उसका एक भाग तालिबान को अजेय मानकर उसके साथ हो जाएगा। इस विभाजन से पाकिस्तानी सेना की लड़ने की क्षमता समाप्त हो जाएगी और तालिबान की उतनी ही मजबूत। तब उसे पाकिस्तान को हजम करने से कोई नहीं रोक सकेगा। यदि ऐसा हुआ तो एक बार फिर विभाजन के समय का और बंग्लादेश के बनने के समय का घटनाचक्र घूम उठेगा और लाखों पाकिस्तानी शरणार्थी तालिबान से भागते हुए गुजरात, राजस्थान, पंजाब आदि सरहदी क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे। इस तरह इतिहास एक पूरा चक्कर घूम जाएगा, धार्मिक कट्टरता के आधार पर बने पाकिस्तान के नागरिक धर्मनिरपेक्ष भारत की शरण में आने को मजबूर हो जाएंगे, और दो राष्ट्रों के अपने सिद्धांत को उन्हें थूक कर चाटना पड़ेगा।

तालिबान के हाथ बम आते ही, वह उसका प्रयोग दिल्ली, अमृतसर या अन्य किसी भारतीय शहर पर कर सकता है। वह इसलिए ऐसा करेगा, क्योंकि पाकिस्तान के पास अभी ऐसे प्रक्षेपास्त्र नहीं हैं, जो इन अस्त्रों को न्यूयोर्क, वाशिंगटन या लंदन तक ले जा सकें। इसलिए तालिबान अपने निकट के अमरीकी मित्रों की कनपटी पर परमाणु बम रखकर अमरीका पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। तालिबान के लिए सबसे नजदीक भारत ही है, जिसे वह अमरीका परस्त मानता है क्योंकि भारत अफगानिस्तान की वरतमान सरकार के साथ मिल-जुलकर काम कर रहा है। हां, इजराइल एक अन्य निशाना हो सकता है।
दिल्ली, इजराइल आदि पर एक आध बम गिराकर तालिबान अमरीका को अल्टीमैटम देगा कि अफगानिस्तान से तुरंत दफा हो जाओ वरना यही क्रम दुहराया जाएगा। जापान को हराने के लिए अमरीका ने भी यही रणनीति अपनाई थी। उसने हिरोशिमा, नागासाकी आदि पर परमाणु बम गिराए, और यह जाहिर कर दिया कि जब तक जापानी सेना हथियार न डाले, वह जापान के अन्य शहरों पर भी परमामु बम गिराता जाएगा और जापान को तबाह कर देगा। इस तरह दिल्ली के बाद चंडीगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद, अहमदाबाद आदि का नंबर आ सकता है।

यदि पाकिस्तान का वजूद नष्ट हो जाए, तो ये सब घटनाएं संभव हैं। पाकिस्तन के पश्चिमी सरहदों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबानी क्षेत्रों में एक नए कबीलाई राष्ट्र का उदय हो रहा है, लगभग उसी तरह जैसे मध्य युग में चंगेस खान मध्य एशिया में शक्तिशाली हुआ था। उसने तब स्पेन से लेकर चीन तक के विशाल भूभाग को हिलाकर रख दिया था।

तालिबान के कब्जे में पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र आने को रोकने के लिए यदि इजराइल अथवा अमरीका पाकिस्तान के परमाणु जखीरों पर एहतियाती हमले करें, तो इससे तीसरे विश्व युद्ध की नौबत आ सकती है, क्योंकि इसके प्रतिकार में चीन जरूर पाकिस्तान के पक्ष में युद्ध भूमि में उतर पड़ेगा। चीन चाहता है कि तालिबान उसके अंकुश के अधीन रहे, क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह अपने मुसलमान इलाकों में तालिबानी विचारधारा को फैलने से रोक नहीं पाएगा। यदि तालिबानी विचारधाराएं चीन के मुसलमानों में फैल जाए, तो चीन के ये इलाके अलग होकर तालिबान से मिल सकते हैं अथवा स्वतंत्र राज्य बन सकते हैं। चीन यह कभी नहीं चाहेगा। इसलिए चीन तालिबान को शह देता जाएगा और उसे अपने वर्चस्व में रखने की कोशिश करेगा। चीन तालिबान का उपयोग अमरीका को कमजोर करने के लिए भी करना चाहता है। चीन अमरीका को अपना दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्वी समझता है। जिस तरह रूस को कमजोर करने के लिए अमरीका ने तालिबान को मजबूत किया था, वैसे ही अब चीन अमरीका को कमजोर करने के लिए तालिबान का उपयोग कर रहा है। तालिबान को हथियार देकर वह अमरीका को अफगानिस्तान-पाकिस्तान में लंबे युद्ध में फंसाए रखने में सफल हो रहा है। यदि अमरीका को कुछ और सालों के लिए अफगानिस्तान-पाकिस्तान में फंसाकर रखा जा सके, तो वह आर्थिक रूप से तबाह हो जाए, और चीन को चुनौती देने की उसकी क्षमता कमजोर हो जाए।

ऐसे में अमरीकी अथवा इजराइली हमला होने पर यदि तालिबान चीन से मदद मांगे, तो चीन इनकार नहीं करेगा। चीन, तालिबान और पाकिस्तान के बीच के गठजोड़ के संकेत अभी से मिलने लगे हैं। चीन पाकिस्तानी सेना और तालिबान दोनों को ही हथियार बेचता है। चीन, पाकिस्तान और तालिबान का यह गठजोड़ द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी, इटली और जापान के गठजोड़ के समान होगा, और उसके सामने होगी अमरीका, ब्रिटन, इजराइल आदि पश्चिमी देशों की सेनाएं। इससे अमरीका और चीन में सीधा युद्ध छिड़ जाएगा, कुछ-कुछ वैसे ही जैसे द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटन और जर्मनी के बीच युद्ध हुआ था। यानी इक्कीसवीं सदी की दो महाशक्तियां आपस में टकराएंगी। भारत या तो अमरीका के पक्ष में युद्ध में कूद पड़ेगा, अथवा ईरान, रूस, इंडोनीशिया, मलेशिया आदि की तरह तटस्थ रहेगा। लेकिन यदि युद्ध विश्व स्तर का छिड़ जाए, तो भारत अधिक दिन तक तटस्थ रह भी नहीं पाएगा। यदि भारत युद्ध में खिंच जाए, तो उसके दशकों के आर्थिक-औद्योगिक विकास पर पानी फिर जाएगा। इसकी भी संभावना रहेगी कि भारतीय सेना को विश्व युद्ध में उलझा पाकर नक्सली और माओवादी ताकतें पूरे देश पर अथवा देश के अधिकांश हिस्सों पर साम्यवादी स्वतंत्र राज्य बना लें। ऐसे राज्य को सफल नेतृत्व देने के लिए भारत में अनुभवी साम्यवादी दल पहले से ही मौजूद है। रूस में भी साम्यवादी क्रांति द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में ही हुई थी। याद रखना चाहिए कि चंद्रगुप्त मौर्य ने ढाई हजार साल पहले लगभग ऐसी ही परिस्थितियों का लाभ उठाकर इन्हीं प्रदेशों में यानी आजकल के बिहार-मध्य प्रदेश वाले इलाके में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी जो समस्त उत्तर और मध्य भारत में लगभग ढाई सौ सालों तक राज्य करता रहा। उस समय सिकंदरी हमले से मगध के उत्तर-पश्चमी भागों में अराजकता फैली हुई थी, जैसे आज पाकिस्तान-अफगानिस्तान में फैली है।

इन सब गतिविधियों का भारत पर क्या असर पड़ सकता है, इसके बारे में सोचकर भी दिल कांप उठता है। तालिबानी हमले से बचने के लिए भारत को अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर नागपुर, पटना अथवा हैदराबाद ले जाना पड़े। यदि ऐसा हुआ, तो जैसे तुगलक के जमाने में हुआ था, दिल्ली एक बार फिर वीरान हो जाएगी।

हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए। भारत पर पश्चिमी सरहदों से ही हमले होते रहे हैं, और हमने कई बार अपनी आजादी इन हमलावरों के हाथों खोई है। ऐसा न हो कि इक्कीसवीं सदी में भारत को तालिबान के रूप में एक और गजनी, गौरी, बाबर, या तैमूर का सामना करना पड़े।

भारतीय राज्य इतना अमरीका परस्त हो गया है कि वह पाकिस्तान-अफगानिस्तान में हो रहे इन बुनियादी परिवर्तनों का बस मूक दर्शक बना हुआ है, हालांकि उसमें उसकी भी तबाही के बीज विद्यमान हैं। वह सोच रहा है कि अमरीका इस समस्या का समाधान कर लेगा। नए अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा पर उसकी आशाएं टिकी हुई हैं। ईराक से अमरीकी सेना वापस बुला लेने को लेकर भी भारत उत्साहित है। वह सोच रहा है कि अब अमरीका अपनी पूरी ताकत अफगानिस्तान-पाकिस्तान में लगाएगा।
पर ये भारतीय आशाएं मिट्टी में मिल सकती हैं, यदि अमरीका का वर्तमान आर्थिक संकट बना रहा अथवा और गहराता गया। ऐसी स्थिति में अमरीका में इतनी कुव्वत बची नहीं रहेगी कि वह अफगानिस्तान-पाकिस्तान में एक लंबा युद्ध छेड़ता जाए। ईराक-अफगानिस्तान में अब लगभग सात-आठ सालों से वह युद्ध में फंसा हुआ है, जो हर साल उसके लिए अरबों डालर का खर्च करा रहा है। क्या आर्थिक महासंकट से कंगाल हुआ अमरीका इस स्तर का खर्च अधिक समय जारी रख सकेगा?

यदि अर्थ-संकट गहराने से अमरीका मजबूर होकर अफगानिस्तान-पाकिस्तान से हाथ खींच ले, तो यह तालिबान और चीन की स्पष्ट विजय होगी। अमरीका के हटते ही, तालिबान पाकिस्तान-अफगानिस्तान पर अपना एकछत्र वर्चस्व स्थापित कर लेगा और पाकिस्तान को हजम कर लेने के बाद वह चीनी शहजोरी में अपनी विनाशकारी नजर भारत की ओर करेगा।

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