(बोफोर्स का मामला एक बार फिर सुर्खियों पर आ गया है। इससे इसी विषय पर मेरे एक पुराने व्यंग्य लेख को झाड़-पोंछकर बाहर निकालने और जयहिंदी में देने का मुझे मौका मिल गया है। इसे मैंने लगभग दस साल पहले नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व के समय लिखा था। आशा है आपको पसंद आएगा।)
मैंने देखा है कि जबसे दसवीं कक्षा के भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रम में घोटाला काल नामक एक नया उपविभाग जोड़ा गया है, तब से मेरे छात्रों में इस नीरस एवं उबाऊ विषय में एक नई रुचि जागी है और वे पहली बार पूरा ध्यान लगाकर मेरे व्याख्यानों को सुनते हैं। इतना ही नहीं बहुत ही सूझ-बूझपूर्ण प्रश्न पूछकर इसका भी परिचय देते हैं कि विषय की बारीकियां उन्हें पूरी तरह समझ आ रही हैं।
जब मैंने कक्षा में प्रवेश किया तो छात्रों ने खड़े होकर "गुडमार्निंग सर" कहकर मेरा अभिवादन किया।
उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए मैंने कहा, "गुड मार्निंग बच्चो, सब लोग अपनी-अपनी जगह बैठ जाओ। आज हम भारतीय इतिहास के स्वातंत्र्योत्तर काल के उस महत्वपूर्ण उपकाल का अध्ययन करने जा रहे हैं जिसे इतिहास में घोटाला काल कहा जाता है।" फिर उनके ध्यान को अध्ययन के विषय पर केंद्रित करने के लिए मैंने खड़िए से श्यामपट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा, "घोटाला काल"।
सभी बच्चे बड़े मनोयोग से मेरी बातें सुन रहे थे। थड़िए को मेज पर रखकर मैं उनकी ओर मुड़ा और मेज की टेक लेकर खड़ा होकर कहने लगा, "इतिहास को भिन्न-भिन्न कालों में बांटकर अध्ययन करने की परिपाटी पुरानी है। यदि हजारों सालों की मानव कहानी समझनी हो तो उसे छोटे-छोटे कालखंडों में बांटकर ही समझा जा सकता है। इन कालखंडों में कुछ खास प्रवृत्तियां रहती हैं जो उस काल की घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इस तरह मौर्य काल, गुप्त काल, मुगल काल, ब्रिटिश काल आदि कालखंड हैं। स्वतंत्रता के बाद के काल का अब तक स्वातंत्र्योत्तर काल नाम देकर अध्ययन होता रहा है। पर अब यह माना जाने लगा है कि इस काल में अनेक उप-काल हुए हैं जिनमें कुछ खास-खास प्रवृत्तियां हावी रही हैं। इसे ध्यान में रखकर भारतीय इतिहास के इस कालखंड को कुछ उपकालों में बांटा गया है। इन उपकालों में घोटाला काल एक प्रमुख उपकाल है। सुभीते के लिए घोटाला काल का आरंभ भारत के सातवें प्रधान मंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल के आरंभ के वर्ष यानी 1985 से माना जाता है, परंतु इसका यह मतलब नहीं है कि इस युग की मुख्य प्रवृत्ति, यानी देश के सभी सर्वोच्च नेताओं के घोटालों से आबद्ध होना, इसी वर्ष से शुरू हुई थी और इससे पहले यह प्रवृत्ति नहीं थी या आम नहीं थी। इतिहास की कोई भी प्रवृत्ति अचानक किसी वर्ष प्रकट नहीं होती। तारीखें तो इतिहासकार इन प्रवृत्तियों के अध्ययन को सरल बनाने के लिए किसी न किसी आधार पर दे देते हैं। क्या आपमें से कोई बता सकता है कि इस उपकाल का आरंभ इस वर्ष से क्यों माना जाता है?" मैंने छात्रों से पूछा।
"इसी वर्ष कोई बड़ा घोटाला हुआ होगा।" सुनीता ने अटकल लगाई।
"नहीं, कारण यह नहीं है," मैंने कहा, "परंतु तुम्हारी अटकल गलत भी नहीं है। दरअसल इस उपकाल का पहला घोटाला, जिसे बोफोर्स घोटाला कहते हैं, राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम वर्षों में सामने आया। यद्यपि इससे पहले भी घोटाले हुए हैं, परंतु बोफर्स ऐसा पहला घोटाला था जिसमें देश के सर्वोच्च राजनीतिक अधिकारी, यानी प्रधान मंत्री, स्वयं उलझे हुए थे। चूंकि यह घोटाला राजीव गांधी के कार्यकाल में हुआ था और चूंकि वे, उनके परिवार के कुछ अन्य जन और उनके मंत्रिमंडल के कई मंत्री इससे संलग्न थे, इसलिए इस उपकाल का आरंभ उनके कार्यकाल के प्रारंभिक वर्ष से मानते हैं।"
इस काल के नामकरण को लेकर सुधीर को शंका हुई। उसने पूछा, "सर इससे पहले के कालखंडों का किसी वंश के नाम पर नामकरण हुआ है, जैसे मुगल काल, मौर्य काल, ब्रिटिश काल आदि। इसी आधार पर इस कालखंड का नामकरण राजीव काल क्यों नहीं हुआ?"
मैंने कहा, "तुमने अच्छा सवाल किया है सुधीर। इसका कारण यह है कि इस काल की मुख्य प्रवृत्ति घोटाले रहे हैं, न कि कोई वंश या व्यक्ति द्वारा संचालित क्रियाकलाप। लगभग सभी मुख्य-मुख्य राजनीतिक किसी-न-किसी घोटाले में संलग्न रहे। इनमें से प्रत्येक अन्य सभी से बढ़कर घोटालाकार था। मसलन इस काल के सुख राम, नरसिंह राव, कल्पनाथ राय, हरशद मेहता, जैन बंधु आदि सब अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ घोटालेबाज थे। इनमें से किसी एक को इस काल के नियंता का गौरव प्रदान करना और उसके नाम पर पूरे काल का नामकरण करना अन्य घोटालेबाजों के साथ अन्याय होगा। इतिहास भेदभाव नहीं करता, तथ्यों का निष्पक्ष विश्लेषण मात्र करता है। इसलिए अगणित प्रतिभाशाली और दिलेर घोटालेबाजों में से किसी एक को वरीयता न देकर इस काल की मुख्य प्रवृत्ति, यानी घोटालों, के आधार पर इस काल का नामकरण उचित ही हुआ है।"
"सर इस युग का अंत कब हुआ?" प्रवीणा ने पूछा।
"यह एक टेढ़ा सवाल है," मैंने कहा। "इसको लेकर इतिहासकारों तक में काफी मतभेद है। पर आम राय यही है कि अभी हम घोटाला काल में ही जी रहे हैं और यह भारतीय इतिहास का नवीनतम काल है। इस काल का अंत भविष्य के गर्भ में छिपा है। वैसे यह भी सच है कि जिस प्रकार किसी काल की शुरुआत के वर्ष को पहचानना मुश्किल होता है, उसी प्रकार उस काल के अंत के वर्ष को पहचानना भी आसान नहीं होता। यदि कई सालों तक कोई मुख्य घोटाला सामने न आया और कोई अन्य प्रवृत्ति प्रबल हो उठी, तो हम कह सकते हैं कि घोटाला काल समाप्त हो गया और कोई दूसरे काल की नींव पड़ गई। परंतु पिछले कई वर्षों से घोटाले एक-के-बाद-एक सामने आते जा रहे हैं, इसलिए यह कहना उचित ही होगा कि घोटाला काल इस समय जवान एवं सक्रिय है।"
इस विषयांतर के बाद मैं अपनी मूल बात पर लौट आया, "जैसा कि मैंने शुरू में ही कह दिया था, यह तारीख सुभीते के लिए मान ली गई है। वैसे घोटाला प्रवृत्ति की जड़ें इससे कई वर्ष पहले ही पड़ चुकी थीं। राजीव की मां इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले ने कांग्रेस पार्टी के कोष के लिए सीमेंट उद्योग के मालिकों से भारी चंदा वसूल किया था। परंतु इस घोटाले और घोटाला काल के घोटालों में मुख्य फर्क यह है कि घोटाला काल के घोटालों में स्वयं देश के प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल थे। इस दृष्टि से सिमेंट घोटाला व अन्य इस तरह के घोटाले अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण थे। आज की कक्षा में हम इस उपकाल के कुछ मुख्य-मुख्य घोटालों के बारे में जानेंगे।"
मैंने कहा, "आगे बढ़ने से पहले मैं एक जरूरी बात तुम्हें बता दूं। घोटाला शब्द का समानार्थी एक अन्य शब्द भी है, "कांड"। कुछ पाठ्यपुस्तकों में घोटाला के स्थान पर कांड का प्रयोग तुम्हें मिलेगा। इससे किसी उलझन में नहीं पड़ना। कांड घोटाले को ही कहते हैं। परीक्षा में भी प्रश्न पत्र में इस शब्द को देखकर चौंकना नहीं।" और मैंने श्यामपट पर कांड शब्द भी लिख दिया।
"अब हम घोटाला काल के मुख्य-मुख्य घोटालों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करते हैं। सबसे पहले बोफर्स घोटाले की बात हो जाए। भारतीय सेना के लिए विदेशी बनावट की तोप खरीदने के मामले में इटली की तोप बनानेवाली कंपनी बोफर्स ने भारतीय मंत्रि मंडल के अनेक व्यक्तियों और अनेक बड़े अफसरों को 32 करोड़ रुपए जितना घूंस दिया। घूंस प्राप्त करने वालों में प्रधान मंत्री राजीव गांधी का भी नाम लिया गया। इस सौदे को पटाने में राजीव गांधी की इटली देश में जन्मी पत्नी सोनिया का मित्र और मशहूर आयुध-व्यापारी हेनरी कोशिगर का बड़ा हाथ था। बोफर्स कंपनी ने विन चड्डा को भारत में अपना ऐजेंट नियुक्त किया था और पैसा इसी ने हवाला चैनेल से मंत्रियों तक पहुंचाया था।"
प्रदीप ने कहा, "सर यह हवाला क्या चीज है?"
मैंने कहा, "प्रदीप थोड़ा सब्र करो। इस सवाल का उत्तर मैं हवाला घोटाले को समझाते वक्त दूंगा। वैसे अर्थशास्त्र की कक्षा में तुम लोगों को इसके बारे में विस्तार से पढ़ाया जाइगा। इस वर्ष से अर्थशास्त्र के पाठ्यपुस्तक में हवाला अर्थतंत्र पर भी एक अध्याय शामिल किया गया है। अभी हम बोफर्स की बात पूरी कर लें। इस घोटाले से जुड़ा एक अन्य महापुरुष चंद्रस्वामी था। मंत्रियों, प्रधान मंत्री और बोफर्स कंपनी के बीच संपर्क साधने में इसका बड़ा हाथ था।
"तो बच्चो, यह था बोफर्स घोटाला। इसी से जुड़ा है सेंट किट्स घोटाला। उसकी शुरुआत कुछ इस प्रकार हुई कि जब बोफर्स का भंडा फूटा तो प्रधान मंत्री सहित अनेक अन्य बड़ी हस्तियों की चमड़ी बचाने के प्रयत्न आरंभ हुए। इस प्रयास में वरिष्ठ कांग्रेस नेता नरसिंह राव की मुख्य भूमिका रही। मामले को दबाने के इस प्रयास को ही सेंट किट्स घोटाला कहा जाता है। बोफर्स की बातें तब सामने आईं जब राजीव गांधी के चुनाव हारने पर विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह का मुंह बंद करने के लिए नरसिंह राव ने चंद्रस्वामी की सहायता से जाली दस्तावेज तैयार करके यह सिद्ध करने की कोशिश की कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के बेटे ने स्विस बैंकों में कई करोड़ रुपए जमा करके रखे हैं।"
अमर ने पूछा, "सर ये लोग भारतीय बैंकों में ये पैसे क्यों नहीं रखते थे?"
मैंने उसे समझाया, "बेटे, घोटाला युग में अमीर लोगों के लिए यह आम बात थी कि वे अपनी दौलत को देशी बैंकों में न रखकर विदेशों के बैंकों में, खासकर के स्विटजरलैंड के बैंकों में, रखते थे, ताकि जब उनके क्रियाकलापों का भंडा फूटे तो वे चुपचाप विदेश भाग सकें। हां, तो बात सेंट किट्स घोटाले की हो रही थी। नरसिंह राव की इस जालसाजी की बातें जल्द ही खुल गईं, और वे स्वयं बोफर्स और हवाला कांड में बुरी तरह उलझ गए।"
मैंने देखा कि बच्चों के चेहरे पर कुछ घबाराहट और बेचैनी सी छा गई है। आखिर मनमोहन ने उन सबके मन की बात कह ही डाली, "सर इन घोटालों का विवरण तो मुगल शहजादों की आपसी रंजिश एवं घात-प्रतिघात से भी अधिक उलझा हुआ है। हम कैसे इसे सब याद रख पाएंगे? इस विषय की परीक्षा में तो हम अवश्य ही फेल हो जाएंगे।"
मैंने उसे सांत्वना दी, "निराश होने की कोई बात नहीं है। तुम लोगों के पाठ्यक्रम में घोटाला काल के मुख्य-मुख्य घोटालों के बारे में बहुत ही संक्षिप्त जानकारी ही मांगी गई है। अधिक गहराई से तुम लोग ऊपर की कक्षाओं में पढ़ोगे। घोटाला युग के क्रियाकलाप तो इतने जटिल एवं विस्तृत हैं कि आज सैंकड़ों छात्र हर साल इस विषय पर पीएचडी स्तर का शोध कर रहे हैं और प्रोफेसर लोग घोटाला काल पर पोथियां लिखकर हजारों रुपयों की रायल्टी कमा रहे हैं। मैं तुम लोगों को इन घोटालों के बारे में इसलिए विस्तृत जानकारी दे रहा हूं ताकि आगे की कक्षाओं में फायदा हो।"
बात दरअसल यही नहीं थी। मैं टीचरी से प्राप्त अपनी टुच्ची एवं नाकाफी आय में वृद्धि करने के लिए घोटाला काल पर एक पाठ्यपुस्तक तैयार कर रहा था और उसके लिए काफी मसाला इकट्ठा कर लिया था। इसे मैं अपनी कक्षा के विद्यार्थियों पर आजमाकर अपनी पुस्तक को अधिक सुपाठ्य बनाना चाहता था। परंतु यह देखकर कि घोटालों के अधिक पेचीदा अंशों से बच्चों का जी घबरा रहा है, मैंने अन्य घोटालों को जरा संक्षेप में पेश किया।
मैंने कहा, "कोर्स का अगला घोटाला प्रतिभूति घोटाला है। इसका मुख्य नायक शेयरों का दलाल हर्शद मेहता था। इसने राष्ट्रीय बैंकों में जमा अरबों रुपए की पूंजी को उन बैंकों के मैनेजरों व अन्य उच्च अधिकारियों की मिलीभगत से बेनामी शेयरों में लगाकर खरबों रुपए कमाए। इससे शेयर बाजार में जो अस्वाभाविक उछाल आई उससे बहककर बहुत से टुटपुंजियों ने भी शेयरों में अपनी खून-पसीने की कमाई लगाई। परंतु जब यह अस्वाभाविक उभार ठंडा हुआ और शेयरों के भाव गिर गए तो बैंकों के अरबों रुपए और छोटे निवेशकों के करोड़ों रुपए पर चूना लग गया।"
अगला घोटाला मेरा मनपसंद हवाला घोटाला था। इस पर मैंने काफी सामग्री अपनी पुस्तक के लिए एकत्र कर ली थी। मेरी पुस्तक की खास विशेषता इसी घोटाले का विश्लेषण थी। मैंने देखा था कि मार्किट में जो अन्य पाठ्यपुस्तकें थीं, उन सबमें इस घोटाले का बहुत ही अपूर्ण एवं अस्पष्ट व्याख्या ही दी गई थी। इस कारण से मैंने हवाला घोटाले को कुछ विस्तार से समझाया, "बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने प्रस्तावों को संबंधित अधिकारियों से पास कराने और आवश्यक कागजात प्राप्त करने के लिए करोड़ों रुपए घूंस में खर्च करती हैं। यह सब रकम हवाला चैनेल से ही भेजी जाती है। इसी प्रकार नशीले पदार्थों की तस्करी आदि आपराधिक गतिविधियों से उत्पन्न अकूत दौलत भी हवाला चैनल से ही देश के बाहर जाती है। विदेशी ताकतें देश के विरुद्ध चल रहे आतंकवादी आंदोलनों को वित्तिय सहायता भी इसी हवाला चैनल से पहुंचाती हैं। देश के समृद्ध वर्ग अपनी दौलत देश के बाहर ले जाने के लिए और विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिक अपनी बेशुमार दौलत चोरी-छिपे भारत में लाने के लिए भी इसी चैनल का उपयोग करते हैं। इससे उन्हें आय कर आदि से मुक्ति मिल जाती है। इसी चैनल से विदेशी ताकतें, औद्योगिक घराने, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, विदेशी जासूसी ऐजेंसियां आदि मुख्य-मुख्य राजनीतिक दलों को चुनावी खर्चे के लिए चंदा देते हैं और इस तरह उनकी नीतियों को अपने हितों के अनुकूल बना लेती हैं। इस तरह से हवाला चैनेल बेहिसाब दौलत के दो-तरफा बहाव का एक जरिया है। इसके संचालकों में से एक थे जैन बंधु जो एक छोटे स्तर के उद्योगपति भी थे। इनकी गिरफ्तारी से इनसे जो डायरी प्राप्त हुई उसमें बहुत से उच्च स्तर के राजनेताओं के नाम दर्ज मिले, जिनमें शामिल थे प्रधान मंत्री नरसिंह राव, उसके मंत्रिमंडल के कल्पनाथ राय और अरिफ मुहम्मद खान, विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, दिल्ली के भाजपा सरकार के मुख्य मंत्री मदनलाल खुराना, अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, कमलनाथ, आदि। हवाला घोटाले की एक अन्य मुख्य खासियत यह है कि प्रधान मंत्री नरसिंह राव ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को धराशायी करने के लिए उन्हें हवाला घोटाले में उलझा दिया। परंतु अंत में वे स्वयं ही अपने फैलाए गए जाल में फंस गए।
"अब हम आते हैं चीनी घोटाले पर। एक बार देश में चीनी की बड़ी किल्लत पैदा हुई और चीनी के दाम आसमान छूने लगे। बहुत से विशेषज्ञों ने भारत सरकार से विदेशों से चीनी आयात करने की सलाह दी। परंतु खाद्य मंत्री कल्पनाथ राय ने चीनी मिलों के मालिकों के हित को ध्यान में रखते हुए कई महीनों तक चीनी के आयात की अनुमति नहीं दी। अंत में जब चीनी आयात की गई तब तक भारत द्वारा चीनी आयात करने की संभवना को जानकर चीनी का अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव बहुत बढ़ गया और इससे देश को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। बच्चो, नोट करना कि इस घोटाले से संबंधित कल्पनाथ राय हवाला घोटाले में भी नाम कमा चुके हैं। इन दो घोटालों में उसकी भूमिका को आप कन्फ्यूस न करें।
"अब हम अगले घोटाले पर जाते हैं, जो है चारा घोटाला। यह बिहार राज्य का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है जो दस साल यह अबाध रूप से चलता रहा। जनता को ढोर व उनके लिए चारा खरीदने के लिए ऋण आदि देने के नाम से बिहार सरकार के कर्मचारियों ने हजार-डेढ़ हजार करोड़ रुपए हजम कर लिए। यह सब जनता के दुलारे, बिहार के दो बार मुख्य मंत्री रह चुके और उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की पूर्ण जानकारी में हुआ।"
पाठ को समापन की ओर ले जाते हुए मैंने कहा, "कोर्स में शामिल अंतिम घोटाला टेलिफोन घोटाला है। इसके मुख्य अभियुक्त सुख राम थे जो केंद्र सरकार के दूरसंचार मंत्री थे। उन्होंने अपने राज्य हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी को देश में एक नया टेलिफोन नेटवर्क लगाने के लिए हजारों करोड़ों का टेंडर दिलवाया। इससे देश को सैंकड़ों करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ। इस कंपनी ने इसके बदले मंत्री को कई करोड़ रुपए घूस में दिए जिसे वे ठिकाने लगा पाते इससे पहले ही उनके घर पुलिस का छापा पड़ा। सारे रुपए अलमारियों, सूटकेसों आदि में ठूंसे हुए मिले।"
अंत में मैंने कहा, "बच्चो कोर्स में बस ये ही चंद घोटाले हैं। लेकिन एक अन्य घोटाले के बारे में जानना तुम लोगों को शायद रोचक लगेगा क्योंकि यह उपर्युक्त सभी घोटालों से थोड़ा भिन्न है। यह है राजन पिल्लै से संबंध रखनेवाला बिस्कुट घोटाला। यह घोटाला विलक्षण इस अर्थ में है कि यह इस देश में नहीं बल्कि दूर हांग कांग में हुआ। राजन पिल्लै एक बहुराष्ट्रीय बिस्कुट कंपनी का चेयरमैन था। उसने कंपनी के खाते में से सैंकड़ों करोड़ रुपए उड़ाए और जब इसका भंडा फूटने ही वाला था, हांग कांग के कड़े कानूनों से बचने के लिए वह भारत भाग आया और भारतीय पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसे विश्वास था कि वह भारत के न्यायाधीशों को अपने पैसे के बल पर खरीद कर सस्ते में छूट जाएगा। परंतु दुर्भाग्य से वह जेल में रहते हुए पुलिस अत्याचार के फलस्वरूप मारा गया।
"अब मैं परीक्षाओं में पूछे जा सकने वाले कुछ प्रश्न श्यामपट पर लिखता हूं। गृह कार्य के रूप में तुम लोग उनका उत्तर तैयार करो। मैंने निम्नलिखित प्रश्न लिखेः-
1. नीचे दी गई ऐतिहासिक घटनाओं में से किन्हीं दो पर विस्तार से चर्चा करें।
क) 1857 की गदर; ख) बोफर्स घोटाला; ग) नमक सत्याग्रह; घ) जलियांवाला हत्याकांड
2. भारतीय इतिहास में निम्नलिखित इतिहास पुरुषों में से किन्हीं तीन के महत्व को समझाएं: विवेकानंद, नरसिंह राव, हरशद मेहता, भगत सिंह, लालू प्रसाद यादव, कल्पनाथ राय, महात्मा गांधी, सुख राम।
3. निम्नलिखित पुरुषों में से किसे आप घोटाला काल की प्रवृत्तियों का सच्चा प्रतिनिधि मानते हैं?
सुख राम, राजीव गांधी, कल्पनाथ राय, चंद्रस्वामी, हर्षद मेहता, लालू प्रसाद यादव।
4. चीनी घोटाले अथवा हवाला घोटाले में कल्पनाथ राय की भूमिका को स्पष्ट करें।
5. हवाला चैनेल कैसे काम करता है? राजनीतिक दलों के लिए यह चैनेल क्यों महत्व रखता है?
6. बिस्कुट घोटाला अन्य घोटालों से किस प्रकार भिन्न था?
7. घोटाला काल में घटित इन घोटालों का देश की अर्थव्यवस्था और निर्धन वर्गों पर क्या असर पड़ा?
तब तक कक्षा के समाप्त होने की घंटी बजी और मैं कक्षा से बाहर चला आया।
Wednesday, April 29, 2009
घोटाला काल
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 0 टिप्पणियाँ
लेबल: प्रहसन
Saturday, March 28, 2009
राष्ट्रीय पशु गीदड़
संसद भवन। मई 2009। चुनाव के बाद नए सांसद संसद में एकत्र हैं। प्रधान मंत्री मायावती सांसदों को संबोधित कर रही हैं। विपक्षी दलों के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी अग्रिम पंक्ति की कुर्सियों में से एक में विराजमान हैं। संसद भवन खचाखच भरा हुआ है। सांसदों की आपसी बातचीत के शोर के कारण किसी की भी बात सुनाई नहीं दे रही है।
अध्यक्ष महोदय माइक्रोफोन पर चिल्लाकर सबको चुप हो जाने को कह रहे हैं। धीरे-धीरे शोर कम हो जाता है। तब मायावती कहने लगती हैं, "इस समय हम एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने के लिए यहां एकत्र हैं। इस मुद्दे के निराकरण के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता है। इसलिए मैं बहुजन समाज पार्टी, उसको समर्थन देनेवाली पार्टियों तथा विरोधी दलों के सांसदों से अपील करती हूं कि वे सब इस मुद्दे के निराकरण में सहयोग दें। वैसे यह कोई राजनीतिक मामला नहीं है, इसलिए संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। मैं चाहती हूं कि इस मुद्दे को जल्दी से जल्दी सुलटाकर संसद अन्य अधिक महत्वपूर्ण कार्रवाइयों की ओर आगे बढ़े, और इस सीधे से मुद्दे पर अनावश्यक बहस करके अधिक समय न बिगाड़े।"
इस छोटी सी भूमिका के बाद प्रधान मंत्री ने उप प्रधान मंत्री रामविलास पासवान को संक्षेप में संसद सदस्यों के सामने विचाराधीन मुद्दे को पेश करने को कहा।
रामविलास पासवान ने बोलना आरंभ किया, "धन्यवाद, प्रधान मंत्री जी। प्रिय सांसदो, आप सबने अखबारों व अन्य संचार माध्यमों से जान लिया होगा कि हमारे देश का राष्ट्रीय पशु बाघ इस वर्ष के आरंभ में विलुप्त हो गया। आखिरी शेर कारबट राष्ट्रीय उद्यान में चोर शिकारियों के हाथों मारा गया। यह एक दुखद घटना है और हमारे जंगलों की शान इस शानदार पशु के विलुप्त होने से हजार गुना कम हो गई है। लेकिन उससे भी ज्यादा पेचीदा मामला यह है कि बाघ के विलुप्त होने से एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया है।
"जैसा कि आप जानते हैं, बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। लेकिन उसके विलुप्त हो जाने से स्थिति एकदम बदल गई है। हमें अब हमारे देश के लिए नया राष्ट्रीय पशु चुनना होगा। इसी महत्वपूर्ण काम को अंजाम देने के लिए हम यहां एकत्र हुए हैं।
"मैं जानता हूं कि राष्ट्रीय पशु का चुनाव एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, परंतु जहां तक मैं समझता हूं, और जैसा कि हमारी माननीय प्रधान मंत्री ने अभी कहा, वह राजनीति से हट कर है। इसलिए इसे राजनीति से अलग रखते हुए सब सांसद इस संवैधानिक संकट को सुलटाने में बहुजन समाज पार्टी की सरकार की मदद करें। विपक्षी दलों के नेता श्री आडवाणी जी से मैं निवेदन करता हूं कि इस मुद्दे की बहस को अब वे आगे बढ़ाएं और यह बताएं कि उनकी पार्टी, यानी भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय पशु के रूप में किस प्राणी का समर्थन करती है।"
लालकृष्ण आडवाणी अपनी खास शैली में मुसकराते हुए बोलने लगे, "माननीय उप प्रधान मंत्री श्री रामविलासन पासन के प्रति मैं आभारी हूं। बाघ का विलुप्त होना हम सबके लिए एक दुखद घटना है। उसके विलुप्त होने से जो संवैधानिक समस्या पैदा हो गई है उसे सुलटाने में हमारी पार्टी सरकार को पूरा समर्थन देगी। जैसा कि आप सब जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी इस देश की संस्कृति, इतिहास, भाषा, रीति-रिवाज आदि की उन्नति के लिए कृतसंकल्प है। अतः हम चाहते हैं कि देश का राष्ट्रीय पशु कोई ऐसा प्राणी हो जो देश की संस्कृति का पूरा प्रतिनिधित्व करे।
"हमारी पार्टी ने इस विषय पर काफी विचार किया है और हमारी राय है कि राष्ट्रीय पशु पूजनीय गौ माता को बनाया जाए। आप सब जानते होंगे कि संविधान में गौ माता की रक्षा शासन का एक मुख्य कर्तव्य बताया गया है। हमारे पूजनीय बापूजी भी गाय के प्रति बड़ी ममता रखते थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गाय की खूब महिमा गाई गई है। वृषभ भोलेनाथ का वाहन है और कृष्ण तो गायों के पालक के रूप में ही सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
"गाय हमारे किसानों का अभिन्न साथी है। गाय पर ही हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। हमारे देश के करोड़ों बच्चों को गाय ही अपने दूध से पोसती है। इसलिए गाय एक तरह से इस देश की माता है। उसे ही हमारी पार्टी राष्ट्रीय पशु के रूप में स्वीकार करती है और आप सबसे मेरी विनम्र विनती है कि इसी निरीह एवं उपयोगी प्राणी को देश के प्रतीक के रूप में गौरवान्वित करके उसके द्वारा हम पर किए गए असंख्य एहसानों को चुकाया जाए।"
आडवाणी जी की बात सुनकर भारतीय जनता पार्टी के सभी सदस्य नारा लगाने लगते हैं, "गो माता की जय हो।"
गृह मंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अंसारी अपनी ओजस्वी वाणी में श्री आडवाणी के विरुद्ध बहस में उतर पड़ते हैं, "विपक्षी नेता आडवाणी जी ने जो बातें कही हैं उनसे हम बिलकुल सहमत नहीं हो सकते। राष्ट्रीय पशु का मामला कोई धार्मिक विषय नहीं है, फिर भी हमें खेद है कि श्री आडवाणी जी ने अपनी पार्टी की आदत के मुताबिक इस सीधे और सरल विषय को भी एक धार्मिक मोड़ देना चाहा है।
"गाय हमारे देश के सभी नागरिकों को कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकती। आपको भूलना नहीं चाहिए कि संविधान के अनुसार यह देश धर्मनिरपेक्ष है और यहां हिंदुओं के अलावा मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों, जैनों व अनेक अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं। उन सबकी संख्या इस देश की कुल आबादी की एक-तिहाई से कम नहीं है। गाय हिंदुओं को भले ही रुचे लेकिन हमारे मुसलमान भाइयों को उसके प्रति कोई विशेष लगाव नहीं है। उनके लिए वह ऊंट, बकरी, भैंस, घोड़ा आदि के समान एक साधारण जानवर ही है। इतने साधारण जानवर को राष्ट्र का प्रतीक बनाना उनको रास नहीं आएगा।
"इसके अलावा भी गाय जैसी साधारण पशु को राष्ट्र का प्रतीक बनाना बिलकुल बेतुकी बात है। राष्ट्र के प्रतीक में लोगों में राष्ट्र के प्रति आस्था जगाने की क्षमता होनी चाहिए और वह देखने-सुनने में गौरवशाली होना चाहिए। मेरा प्रस्ताव है कि इन दोनों गुणों का धनी हाथी को राष्ट्र-पशु बनाया जाए। हमारे माननीय विपक्षी नेता श्री आडवाणी जी को इसमें कोई विशेष आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि हाथी भी गाय जितना ही पवित्र जानवर है। हिंदुओं के प्रिय देवता गणेश तो हाथी के ही प्रतीक हैं।"
अपनी जोशीले पार्टी सदस्य का यह चालाकी भरा प्रस्ताव सुनकर प्रधान मंत्री मायावती धीमे से मुस्कुराईं। बहुजन समाज पार्टी के सांसद मेजें ठोंक-ठोंकर अपनी पार्टी के प्रतीक हाथी को राष्ट्रीय पशु बनाने के मुख्तार अंसारी के प्रस्ताव का समर्थन करने लगे।
तभी संसदाध्यक्ष की अनुमति लेकर कांग्रेस के नेता गुजरात वासी श्री शंकर सिंह वाघेला बड़े आक्रोश के साथ बोल उठे, "गृह मंत्री मुख्तार अंसारी की बात सुनकर मुझे बड़ा आघात पहुंचा है। खेद है कि सत्ता में आने और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद को संभालने के बाद भी ये अपनी पार्टी से आगे सोच नहीं पा रहे हैं। हाथी तो सत्तारूढ़ पार्टी का चुनाव चिह्न है और उसे किसी भी हालत में राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय पशु किसी पार्टी विशेष की बपौती नहीं हो सकता, वह सारे राष्ट्र का प्रतीक है। ऐसा ही कोई पशु राष्ट्रीय पशु हो सकता है जो सारे राष्ट्र को मंजूर हो। मैं सुझाता हूं कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए। सिंह बाघ जितना ही शौर्यवान और आकर्षक पशु है और पुराने जमाने से ही राजा-महाराजाओं का प्रतीक रहा है।"
अपनी बात का अनादर होते देखकर गृह मंत्री मुख्तार अंसारी गुस्से से आग बबूला हो उठे और चीखते हुए बोले:- "वाघेला जी, आपका तर्क बिलकुल निराधार है। क्या आपको पता नहीं कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न कमल इस देश का राष्ट्रीय पुष्प है? यदि देश का राष्ट्रीय पुष्प किसी पार्टी का चुनाव चिह्न हो सकता है, तब हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं हो सकता? यदि हाथी राष्ट्रीय पशु नहीं हो सकता, तो कमल को भी राष्ट्रीय पुष्प नहीं रहने देना चाहिए और उसे भी संविधान में संशोधन करके बदल देना चाहिए।"
कम्यूनिस्ट पार्टी के सीताराम यचूरी बोल पड़े, "मैं वाघेला साहब की इस बात से बिलकुल सहमत हूं कि किसी पार्टी विशेष का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन उनकी दूसरी बात कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए, बिलकुल व्यावहारिक नहीं है। शायद उन्होंने सिंह का समर्थन इसलिए किया क्योंकि सिंह उनके अपने राज्य गुजरात का निवासी है। इस तरह की क्षेत्रीय मानसिकता से हमें उबरना चाहिए।
"सिंह के विरुद्ध दूसरी जो बात जाती है, वह यह है कि आज सिंह की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। पिछले माह वन विभाग द्वारा की गई गणना के अनुसार गीर के जंगलों में केवल 350 सिंह बचे हुए हैं। इसलिए इसकी संभावना बहुत अधिक है कि आने वाले चार-पांच सालों में सिंह भी इस देश से विलुप्त हो जाएगा। ऐसे में हमें फिर अपना राष्ट्रीय पशु बदलना पड़ेगा। इससे बेहतर है कि हम इस मुद्दे का कोई स्थायी समाधान निकालें।
"मैं समझता हूं कि कोई ऐसे प्राणी को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया जाना चाहिए जो आज की बदली हुई परिस्थितियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता हो। सिंह, बाघ, हाथी आदि सामंती व्यवस्था की याद दिलाते हैं। प्रथम दो तो हिंसा और शौर्य के प्रतीक हैं। आज के व्यावसायिक युग में इन दोनों भावनाओं को कोई स्थान नहीं है। रही बात हाथी की। हाथी कोई उपयोगी पशु नहीं है। उसकी छवि एक ऐसे पशु की है जो उसके मालिक के धन-दौलत को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। हमारे ही देश के सार्वजनिक उद्यमों को उचित ही सफेद हाथी कहा गया है क्योंकि वे धीरे-धीरे देश की संपत्ति को खाए जा रहे हैं। जिस पशु में ऐसी भावना निहित हो, उसे कदापि राष्ट्रीय पशु नहीं बनाना चाहिए।
"मेरा सुझाव है कि हम कोई ऐसे छोटे एवं सफल प्राणी को चुनें जिसमें वर्तमान परिस्थितियों में तरक्की करने के गुण मौजूद हों। मेरा इशारा एक ऐसे पशु की ओर है जो तेज बदलती परिस्थितियों के मुताबिक अपने आपको ढाल लेता है, और जो चालाक भी है, यानी कि गीदड़। आप को ज्ञात होगा कि पंचतंत्र, हितोपदेश आदि प्राचीन ग्रंथों में गीदड़ का खूब गुण गाया गया है। गीदड़ जैसे स्वभाव वाले नेता ही आजकल ज्यादा दिखाई देते हैं। इसलिए राष्ट्र का पशु उनके जैसे स्वभाव वाला हो, तो अच्छा।"
सीताराम यचूरी की इस सुझाव से सारे सांसदों में खुसुरफुसुर मच गई। अध्यक्ष महोदय ने इस खलबली को शांत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। तब तक संसद के सभी मुख्य पक्ष बोल चुके थे। इसलिए संसदाध्यक्ष ने राष्ट्रीय पशु के मामले पर वोट डलवा दिए। देखा गया कि 90 फीसदी वोट गीदड़ के पक्ष में पड़े।
प्रधान मंत्री मायावती ने प्रसन्न मुद्रा से सांसदों को संबोधित करते हुए कहा, "मैं आप सबकी आभारी हूं कि आपने विचाराधीन मुद्दे पर आपसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर वोट किया। मैं गीदड़ को इस देश का नया राष्ट्रीय पशु घोषित करती हूं। इस संबंध का राजपत्र शीघ्र निकाला जाएगा।"
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
Thursday, March 26, 2009
प्रधान मंत्री राम
यह प्रहसन कुछ वर्ष पहले लिखा था। पर परिस्थितियां आज वैसी ही हैं, इसलिए पाठक उससे आसानी से रिलेट कर सकेंगे। कुछ पदों पर नए लोग आ गए हैं, पर अधिकांश वे ही पुराने चले आ रहे हैं। चुनावी माहौल के लिए उपयुक्त समझकर इसे जयहिंदी में दे रहा हूं।
पात्र
सूत्रधार, राम, हनुमान, वानर सेना, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह, स्पीकर, सीता, अटल बिहारी वाजपेयी, मजदूर नेता, साध्वी रीतंबरा, टी एन शेषन, लक्ष्मण
सूत्रधारः गुजरात के वाघेला कांड के बाद भारतीय जनता पार्टी के साफ-सुथरे, अनुशासित पार्टी होने की छवि मिट्टी में मिल गई। हवाला कांड में उसके राम श्री लाल कृष्ण आडवाणी शहीद हुए। भाजपा को चुनाव जीतने के कम आसार नजर आने लगे। सोच-विचार कर उसने तय किया कि स्वयं भगवान राम ही उसे उभार सकते हैं। बहुत जोर दिए जाने पर राम भाजपा की बागडोर संभालने के लिए राजी हुए। कहना न होगा कि भगवान राम के नेतृत्व में पार्टी विजयी हुई और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और बने देश के नए प्रधान मंत्री राम। इस नए अवतार में भगवान राम ने दरबार बुलाई और अपने चुनावी वादों को लागू करने के उपायों पर विचार करने लगे।
रामः चुनावों के समय हमने अवधवासियों, न न माफ करना भाइयो, पुरानी बात कह गया। हां भारतवासियों से वादा किया था कि हम देश के सभी वृद्ध लोगों को पेंशन देंगे। मैं समझता हूं कि हमारा पहला काम इस स्कीम को लागू करना होना चाहिए। रावण के साथ युद्ध में मेरे साथ लड़े बहुत से प्रिय वानरों को, खासकर हनुमान को, इससे लाभ मिलेगा।
हनुमानः धन्यवाद राम। बोलो श्री राम चंद्र की जय!
(वानर सेना राम जय का नारा बुलंद करती है और गाती हैः
हम तो आपके दीवाने हैं
बड़े मस्ताने हैं, आह ओह....
आपके दीवाने का गाना)
रामः (राव से) भूतपूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी दल के नेता की हैसियत से इसके बारे में तुम्हारी क्या राय है राव?
रावः राम, आप अब समस्त भारत के नेता हैं। आपको सिर्फ अवध या अपने निजी समर्थकों की नहीं सोचनी चाहिए। मैंने और मेरे यह साथी मनमोहन सिंह ने पिछले पांच सालों में जो उदार नीतियों का सूत्रपात किया था, उन्हीं को आप आगे बढ़ाएं तो अच्छा।
(भूतपूर्व वित्तमंत्री मनमोहन सिंह राव का समर्थन करते हुए बहुत उद्विग्नता से कहते हैं।)
मनमोहन सिंहः प्राधान मंत्री राम, इस तरह के पोपुलिस्ट कदमों से पिछले पांच वर्षों में मेरी सरकार ने उदारीकरण के लिए जो भगीरथ प्रयत्न किया था उस पर पानी फिर जाएगा। हनुमान, जांबवान आदि चिरंजीवी हैं। जन्म-जन्मांतर तक पेंशन खाते रहेंगे और देश का दीवाला पिट जाएगा।
हनुमानः अबे मनमोहन सिंह के बच्चे, राम का विरोध करता है। अभी मैं तुझे ठीक करता हूं।
(हनुमान गदा लहराते हुए सिंह साहब के पीछे भागते हैं, जो जान बचाए राव के पीछे छिपते हैं। राव अपने वित्तमंत्री की रक्षा करते हुए यह गाना गाने लगते हैं:
लोगो न मारो उसे, ये तो मेरा दिलदार है...
स्पीकर महोदय बड़ी मुश्किल से हनुमान की गदा छिनवाते हैं और उन्हें शांत करते हैं।)
सीताः स्वामी, एक सुझाव मेरा भी है।
रामः हां, प्राण प्रिय सीते, हम सुन रहे हैं।
सीताः नाथ, सबसे पहले इन अत्याचारी, चुगलखोर धोबियों से निपटिए। पहले अवतार में इनके बहकावे में आकर आपने मुझ पर बहुत जुल्म ढाए थे। अब आप प्रधान मंत्री हैं और यह नारी मुक्ति का जमाना है। नारी विरोधी होने का जो कलंक आपके चरित्र के साथ जुड़ गया है, उसे धोने का यही सुअवसर है। इन धोबियों को देशनिकाला नहीं तो कोई अन्य कड़ी सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इससे आप नारियों में बहुत लोकप्रिय हो जाएंगे।
(सीता की बात सुनकर अटल बिहारी वाजपेयी व्यंग्यपूर्ण ढंग से हंस पड़ते हैं जिसे देखकर राम कुछ-कुछ चिढ़ उठते हैं।)
रामः क्यों अटल, तुम्हें कुछ कहना है?
अटलः सीता जी के बहकावे में न आएं राम! आप गृहस्थों को यह बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ती है। आप तो बस पत्नी जी के गुलाम भर होते हैं। भगवद कृपा से मैं इस दुर्दशा से अब तक बचा हुआ हूं, कुंवारा जो हूं। इस देश की अवनति में पत्नियों का बड़ा हाथ रहा है। आप स्वयं भुक्त-भोगी हैं। दशरथ-पत्नी कैकेयी के कारण ही तो आपको वनवास हुआ था। अब आपकी अर्धांगिनी आपको गलत सलाह दे रही हैं।
रामः वह कैसे अटल?
अटलः बात बहुत सीधी है राम। परंतु आप सामंती लोगों को लोकतंत्र की इतनी मोटी बात भी बड़ी मुश्किल से समझ आती है। धोबी अनुसूचित जातियों में आते हैं जिनकी इस देश में 50 प्रतिशत आबादी है। उनके विरुद्ध कोई कदम उठाने का मतलब है सत्ता से हाथ धोना। अब देखिए न, आपको गाली देने वाले कांशी राम और मायावती से हमें उत्तर प्रदेश में दुमछल्ला होना पड़ा था। राजनीति में अपना उल्लू सीधा करने के लिए गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। इसलिए सीता की बात दर किनार कीजिए। कहीं कांशी राम ने सुन लिया तो आफत आ जाएगी। अपना हाथी दौड़ाकर नए खिले कमल को दुबारा कीचड़ में रौंद देगा। उसको बस एक मुद्दा चाहिए। आपको धोबियों के लिए कोई वेलफेयर कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। इससे भी अच्छा आप किसी धोबी को उप प्रधान मंत्री बना लें। मेरा निजी धोबी बड़ा होनहार है। कहो तो उससे बात चलाऊं।
रामः (घृणा से) क्या! एक धोबी मेरी बराबरी करेगा!
अटलः हां राम। यही लोकतंत्र है।
रामः (निराश स्वर में) यह लोकतंत्र तो रावण से भी विकराल राक्षस मालूम पड़ता है।
(एक मजदूर नेता बहुत गुस्से में सदन में प्रवेश करता है।)
रामः यह कौन है?
एक सचिवः स्वामी, यह साम्यवादी दल का सदस्य और एक खूंखार मजदूर नेता है।
मजदूर नेताः राम आपके प्रधान मंत्री बने पूरे दस दिन हो गए। अब तक फिफ्त पे कमिशन की रिपोर्ट लागू नहीं हुई है। यह तो हद है। अब हम देख लेंगे आपको भी। यदि दो दिन में आपको घुटने पर नहीं लाया तो मेरा नाम नहीं। कल से देश भर में चक्का जाम किया जाएगा। सभी दफ्तर बंद। अस्पताल बंद। हम आपकी सरकार गिराकर ही रहेंगे। ऐसी निकम्मी सरकार हमें नहीं चाहिए।
रामः (घबराकर) अरे भाई जरा शांत हो जाओ। मैं इस रोल में नया हूं। यह फिफ्त पे कमिशन क्या बला है। जरा समझाओ तो।
मजदूर नेताः पिछले पांच वर्षों से कर्मचारियों की पगार नहीं बढ़ी है। इससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है।
रामः पगार? वह क्या होती है?
एक सचिवः भगवन, काम करने के बदले लोगों को पैसे दिए जाते हैं, जिसे पगार कहते हैं।
रामः यह सब लगता है नया शुरू हुआ है। मेरे समय तो किसी को कोई पगार नहीं मिलती थी। वरना मेरे जैसा निर्धन वनवासी दौलतशाली रावण का मटियामेट कैसे कर पाता। लाखों-करोड़ों वानरों को मैंने एक पैसा भी नहीं दिया। वे मेरे प्रति अपनी श्रद्धा से सभी कष्ट झेलते गए। प्राण भी गंवा दिए।
मजदूर नेताः क्या कहा, वानरों से बेगार करवाया? यह तो मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन है। काश यह बात चुनावों से पहले हमें मालूम होती। फिर देखता आप कैसे चुनाव जीतते। जिसका दामन इतने बड़े धब्बे से काला हो, वह चुनाव जीत ही नहीं सकता, भगवान ही क्यों न हो वह।
(मजदूर नेता भौचक्का-सा कुछ बड़बड़ता हुआ सदन से निकल जाता है।)
मनमोहन सिंहः इन यूनियन लीडरों को देखते ही मुझे कुछ होने लगता है, मानो शरीर पर बिच्छू रेंग रहे हों। खैर वह कंबख्त गया सो अच्छा हुआ। चलो अब कुछ काम की बात करें। उदारीकरण के विषय में आपकी सरकार की क्या नीति रहेगी राम, क्या आप विदेशी कंपनियों को भारत में आने देंगे या उन पर पाबंदियां लगाएंगे?
(राम के लिए यह विषय नया था। वे बगले झांकने लगे। पर साधवी रीतंबरा ने राम के कष्ट को भांप कर स्थिति को संभाल लिया। वह यह गाना गाने लगी:
मेड़ इन इंडिया
दिल खोल कर कहो मेड इन इंडिया...)
साध्वीः थोड़े शब्दों में मनमोहन, इस विषय में हमारी पार्टी की नीति यही है। जो चीज भारत में बनी है, वह भारत में बिकेगी। बाकी चीजें नहीं। समझे? हम देश की संपत्ति को विदेशियों के हाथों लुटाने नहीं सत्ता पर आए हैं।
मनमोहनः मगर मैडम, भारत सब चीजें तो नहीं बनाता। उन चीजों का क्या जो यहां नहीं बनतीं।
रामः मनमोहन, तुमने शायद महाभारत नहीं पढ़ा है। उसमें लिखा है, जो चीज इसमें नहीं है, वह इस दुनिया में नहीं है। जो चीज दुनिया में है, वह इस महाग्रंथ में है। इसलिए मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई चीज है जो भारत नहीं बनाता या बना सकता।
मनमोहनः मगर राम वह सब तो दो हजार साल पहले की बात है। अब तो दुनिया बदल चुकी है...
(वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए। तभी मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन सदन में प्रवेश करते हैं।)
रामः आओ शेषन, कैसे आना हुआ। निर्वाचन आयोग में तो शांति है न?
टी एन शेषनः हे जगदीश्वर राम, तीनों लोकों के स्वामी! मेरा प्रणाम ग्रहण करें। मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते मुझे ऐसे अनेक काम करने पड़ते हैं जो मुझे बहुत अप्रिय होते हैं। ऐसा ही एक अप्रिय काम लेकर मैं आपके पास आया हूं। कृपानिधान, मुझे क्षमा करें।
रामः क्षमा किस लिए शेषन। कहो क्या काम है?
शेषनः मैं एक बार फिर क्षमा मांगता हूं राम। पर खेद के साथ कहता हूं कि आपका चुनाव रद्द कर दिया गया है और आप अब प्रधान मंत्री नहीं रहे।
रामः क्या! चुनाव रद्द कर दिया! प्रधान मंत्री नहीं रहा! क्या मतलब है तुम्हारा?
शेषनः चुनावी अभियानों में आपने धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया था। यह संविधान के अनुसार गैरकानूनी है। इसलिए मुझे आपके चुनाव को रद्द करना पड़ा है।
रामः हा शेषन, तुम तो घर के भेदी निकले। वैंकुंड में क्षीर सागर में शेषनाग की गोदी में लेटकर मैं परम आनंद और सुरक्षा का अनुभव करता था। यहां तुम शेष नामधारी ने मुझ पर यों घात किया! निर्दयी! जयचंद! कलियुग! घोर कलियुग!
शेषनः प्रभु यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्था और कानून प्रमुख होते हैं। लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा निर्वाचन आयोग है। उस आयोग का सबसे मजबूत खंभा मैं हूं, हां मैं शेषन! मैं आपसे भी, मेरा मतलब है प्रधान मंत्री से भी, शक्तिशाली हूं। यही लोकतंत्र है, लोकतंत्र यानी शेषन तंत्र। हा हा हा हा...
रामः (उदास स्वर में) यह लोकतंत्र का गणित मेरे पल्ले बिलकुल नहीं पड़ता। चलो लक्षमण, चलो सीते, एक बार फिर वनवास के लिए तैयार हो जाओ। हमें राजगद्दी फिर छोड़नी पड़ेगी।
(राम यह गाना गाते हुए प्रस्थान करते हैं:
हम छोड़ चले हैं महफिल को
याद आए तो मत रोना...)
(समाप्त)
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ