मानव निरीक्षण - 5
क्या आप बता सकते हैं, बंदरों की सबसे प्रिय आदत क्या है? वह है एक दूसरे के शरीर से जुए बीनना। जुए बीनने की यह आदत उनकी सामाजिक व्यवस्था में काफी महत्व रखती है। मनुष्यों में भी जुए बीनने की बंदरों की आदत का समतुल्य व्यवहार होता है? वह है, बतियाना, जी हां, बातचीत करना। आगे पढ़िए, सब स्पष्ट हो जाएगा।
टोलियों में रहनेवाले सदस्यों में एक वरीयता क्रम (पेकिंग आर्डर) होता है, जो यह तय करता है कि मैथुन, भोजन, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर पहला अधिकार किसका हो। यह वरीयता क्रम टोली के सदस्यों में इन सब सुविधाओं के लिए नित्य के झगड़ों से बचने के लिए बहुत आवश्यक है। टोलियों के सदस्य शुरुआत में हल्के-फुल्के शक्ति परीक्षण से इस क्रम को निश्चित कर लेते हैं, और उसके बाद टोली में अपेक्षाकृत शांति बनी रहती है। लड़ाई की नौबत तभी आती है जब इस क्रम का कोई उल्लंघन करे। ऐसा होने पर जिस सदस्य की हैसियत को चुनौती मिली हो, वह या तो अपनी हैसियत की लाज रखने के लिए नियम भंग करनेवाले से भिड़ जाता है, या उसके लिए अपना स्थान सदा के लिए छोड़ देता है।
वरीयता क्रम निश्चित हो जाने के बाद भी सदस्यों में परस्पर सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुत से छोटे-मोटे व्यवहार होते रहते हैं। इनमें से एक प्रमुख व्यवहार एक-दूसरों के शरीर से जुए बीनना है। हमें लग सकता है कि यह बिना किसी निहितार्थ के किया जाता होगा, पर जिन वैज्ञानिकों ने इन बातों का अध्ययन किया है, वे बताते हैं कि जुए बीनने जैसे सामान्य व्यवहार के पीछे भी काफी राजनीति होती है।
आमतौर पर जुए बीनना अपने से अधिक सत्तावान सदस्य के प्रति समर्पण भाव दिखाने का एक तरीका होता है। सामान्यतः कम शक्तिमान सदस्य ही अपने से अधिक शक्तिमान सदस्य के शरीर से जुए बीनता है। ऐसा करके वह यही दर्शाता है कि मैं तुम्हारी वरीयता स्वीकार करता हूं और इसके सबूत के रूप में मैं तुम्हें कष्ट पहुंचा रहे इन कीड़ों से छुटकारा दिलाऊंगा। और अधिक सत्तावान सदस्य अपने से कम सत्तावान सदस्य द्वारा अपने शरीर के जुए बिनवाकर उसे यही आश्वासन देता है कि मैं तुम्हारे समर्पण को स्वीकार करता हूं और तुम्हें अपने संरक्षण में लेता हूं और तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा। इससे दोनों को मनोवैज्ञानिक सकून मिलता है। सत्तावान सदस्य उस दूसरे सदस्य के प्रति निश्चिंत हो जाता है कि यह मेरे विरुद्ध उत्पात नहीं करेगा, और कम सत्तावान सदस्य को यह आश्वासन मिलता है कि मुझसे अधिक शक्तिशाली यह सदस्य अब मेरा उत्पीड़न नहीं करेगा।
मित्रों में, अर्थात लगभग समान सामाजिक हैसियत वाले सदस्यों में, जुए बीनने की क्रिया उनके परस्पर संबंधों को और प्रगाढ़ बनाती है।
इसलिए बंदरों में जुए बीनने की क्रिया समूह के अंदर के सबंधों को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब आते हैं मनुष्यों के विषय पर। मनुष्य भी वानर कुल का ही सदस्य है, और वह भी समूहों में रहनेवाला प्राणी है। उसमें भी जुए बीनने की क्रिया से मिलता-जुलता व्यवहार है, जो है बतियाना।
मनुष्यों में समस्या यह है कि उसके शरीर में बाल नहीं हैं, इसलिए उसे जुए, पिस्सू आदि जीव कम परेशान करते हैं। इसलिए जुए बीनने की क्रिया उसके संबंध में अर्थहीन है। पर हम सब जानते हैं कि हमारे समुदाय में भी एक सुस्पष्ट वरीयता क्रम देखी जाती है। चाहे आप परिवार को लें, या किसी दफ्तर के सदस्यों को, हमें वहां सब एक वरीयता क्रम दिखाई देगा। सबसे ज्यादा अधिकार परिवार के वरिष्ठ पुरुष सदस्य का, फिर उसकी पत्नी का, उसके बाद उनके सबसे वरिष्ठ पुत्र का, सबसे नीचे बच्चों और नौकर-चाकरों का। बच्चों में भी वरीयकता क्रम होता है, चाहे वह घर के बच्चे हों या मोहल्ले या स्कूल के बच्चे। नौकरों में भी यही बात है। दफ्तर में सबसे अधिक रसूख वाला व्यक्ति सीईओ होता है, उसके नीचे वरिष्ठ प्रबंधक, फिर कनिष्ठ प्रबंधक, फिर उनके सचिव आदि और सबसे कम रसूख वाला कर्मचारी चपरासी होता है जिस पर सब रौब जमाते हैं। सेना में तो यह बहुत ही औपचारितापूर्ण ढंग से लागू होता है।
अनौपचारिक रूप से भी, जहां भी चार मनुष्य एकत्र हों, उनके बीच यह वरीयता क्रम निश्चित हो जाता है। लोग एक-दूसरे को नाप-तौलकर अपने बीच तय कर लेते हैं कि कौन किससे आगे है और इस क्रम का सभी व्यवहारों में पालन करते हैं। यह अल्प समय के लिए बने मानव समूहों में भी देखा जाता है, जैसे किसी रेल के डिब्बे में चंद घंटों के लिए एकत्र मुसाफिरों में।
डेसमंड मोरिस (मैन वाचिंग, द नेकड एप, ह्यूमन ज़ू आदि पुस्तकों के लेखक) का कहना है कि इस वरीयता क्रम को बिना अनावश्यक लड़ाई-झगड़े के बनाए रखने के लिए मनुष्यों में जो तरीका है, वह है बतियाना। मनुष्य निरंतर बितियाता रहता है। दो मनुष्य मिले नहीं कि कोई न कोई बहाना ढूंढ़कर वे बातचीत शुरू कर देते हैं। डेसमंड मोरिस का कहना है कि यह वास्तव में दोनों में एक दूसरे को तौलने और वरीयता क्रम निश्चित करने की प्रक्रिया है। पुराने परिचित भी खूब बातचीत करते हैं। इनमें बातचीत का महत्व वरीयता क्रम निश्चित करने में नहीं है, क्योंकि वह पहले ही निश्चित हो चुका होता है, बल्कि उसे पुष्ट करने में होता है।
बातचीत में संलग्न दोनों सदस्य एक दूसरे के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं, दोनों के बीच तनाव कम हो जाता है और समाज में सामरस्य बना रहता है।
आम प्रवृत्ति अधिक बातचीत को हतोत्साहित करने की है। स्कूलों में, दफ्तरों में, सभी जगह यही कहा जाता है कि बातें कम करो, और काम करो, बातों में समय नष्ट मत करो, इत्यादि। पर यदि हम डेसमंड मोरिस की बात मानें, तो बातें करना तनाव मुक्ति और अनावश्यक रगड़-झगड़ घटाने का एक साधन है और यदि हमें मनुष्य समाज में शांति बनाए रखनी हो, तो हमें परस्पर खूब बातचीत करनी चाहिए।
यदि हम हमारे व्यवहार पर थोड़ा गौर करें तो डेसमंड मोरिस की बात समझ में आती है। जब दो लोगों में मन-मुटाव होता है, तो इसका एक प्रमुख संकेत होता है उनमें बातचीत बंद हो जाना। दोनों मुंह फुलाएं एक दूसरे से कट्टी कर लेते हैं। बच्चों में तो यह खास तौर से देखा जाता है। और दोनों में मैत्री भाव की पुनर्स्थापना का पहला संकेत भी यही होता है कि वे दोनों बातें करने लग गए हैं। दोनों में मेल-मिलाप करानेवाले व्यक्ति भी सबसे पहले दोनों के बीच बातचीत शुरू कराने की ही कोशिश करते हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि बातचीत हमारे समुदाय में तनाव घटाने का और मैत्री भाव जताने का एक महत्वपूर्ण जरिया होता है। यदि दो लोगों में मनमुटाव हो तो उनमें बातचीत करा दीजिए और देखिए वे कैसे तुरंत फिर से मित्र बन जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति तनाव, मायूसी या चिंता से ग्रस्त हो, तो उससे खूब बातचीत कीजिए उसे तुरंत आराम मिल जाएगा। यदि आप स्वयं तनाव, मायूसी या चिंता से परेशान हों, तो अपने परिवार के जनों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य व्यक्तियों से खूब बात कीजिए, और देखिए आप कितनी जल्दी बेहतर महसूस करते हैं।
मजे की बात यह है कि यह दो व्यक्तियों पर ही लागू नहीं होता, दो राष्ट्रों में भी यही बात देखी जाती है। विवाद की स्थिति में दोनों औपचारिक कूटनीतिक संबंधों को तोड़ लेते हैं। एक-दूसरे के देश से अपने राजदूतों को वापस बुला लेते हैं, और यदि इससे भी बात नहीं बनी तो, अपने दूतावासों को ही बंद कर लेते हैं। उसके बाद तो खुले युद्ध का ही रास्ता बचा रहता है।
दूसरे देश जो इस लड़ाई से दुनिया को बचाना चाहते हैं, वे यही कोशिश करते हैं कि दोनों देशों में फिर से बातचीत शुरू हो जाए। भारत और पाकिस्तान, ईरान और अमरीका, रूस और अमरीका, चीन और जापान आदि के संदर्भ में यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। मुंबई हत्याकांड के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी वर्ताएं बंद कर दी थीं और अमरीका निरंतर हम दोनों पर दबाव डाल रहा है कि ये वार्ताएं पुनः शुरू हो जाएं, ताकि युद्ध की नौबत न आए। जब दो व्यक्तियों या राष्ट्रों में बातचीत ही बंद हो जाए तो इसका मतलब यह होता है कि दोनों के बीच जो वरीयता क्रम पहले निश्चित था, वह अब मान्य नहीं रहा और उसे नए सिरे से निश्चित करना पड़ेगा। यह बातचीत से या युद्ध से हो सकता है। चूंकि युद्ध के भीषण परिणाम निकल सकते हैं, दूसरे देश युद्ध टालने के लिए दोनों के बीच बातचीत बहाल करने की ही कोशिश करते हैं।
अब तो राष्ट्रों के बीच औपचारिक बातचीत को सुगम बनाने के लिए स्थायी व्यवस्थाएं भी बना दी गई हैं, यथा, लीग ओफ नेशेन्स (प्रथम महायुद्ध के बाद), संयुक्त राष्ट्र संघ (दूसरे महायुद्ध के बाद)। ये ऐसे मंच हैं जो कट्टी किए बैठे राष्ट्रों के बीच बातचीत पुनः शुरू कराने के अवसर देते हैं।
इसी तरह संसद, विधान सभा, अदालत, आदि सब औपचारिक बातचीत द्वारा मैत्री स्थापित करने के तरीके हैं, जो सब बंदरों के जुए बीनने की गतिविधि के ही विकसित रूप हैं।
दफ्तरों में जोइंट कंसलटेटिव मेकेनिज़म (जेसीएम) जिसमें प्रबंधक और कर्मचारी बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याएं सुलटा लेते हैं, और हड़ताल, तोड़-फोड़, पुलिस कार्रावाई आदि की नौबत नहीं आने देते, भी ऐसी ही एक व्यवस्था।
सामाजिक स्तर पर सत्संग, सामूहिक उपासना, प्रवचन आदि भी बातचीत द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित करने के विभिन्न उपाय हैं।
सभी कलाओं की मूल प्रेरणा भी बातचीत करने की इस मूलभूत आवश्यकता ही है। मनुष्य केवल बोलकर ही नहीं बातचीत करता। वह इशारे से (नृत्य कला), लिखकर (साहित्य), गाकर (संगीत), चित्र बनाकर (चित्रकला), मूर्तियां बनाकर (मूर्तिकला), इमारतें बनाकर (स्थापत्यकला) भी अपने मन की बात व्यक्त करता है। ये सब कलाएं बातचीत करने की क्रिया के ही परिष्कृत रूप हैं, और उन सबका मूल मक्सद तनाव घटाना और मैत्रीभाव बढ़ाना है।
अक्सर हम देखते हैं कि अत्यंत विषाद या दुख की स्थिति में हमारे मुंह से अपने आप ही गीत फूट निकलते हैं। वाल्मीकि ने रामयाण ऐसे ही लिखा था, जब सारस जोड़ी में से एक के बहेलिए द्वारा मार दिए जाने से उनका मन विषाद से भर गया था। वाल्मीकि ही नहीं, हम भी दुख की स्थिति में कोई न कोई गाना गुनगुनाते हैं। अक्सर लेखक, चित्रकार, कवि आदि भी अत्यंत दुख की स्थिति में ही अपनी कला का उच्चतम प्रदर्शन करते हैं। यह इसलिए क्योंकि यह उनके लिए दुख से मुक्ति पाने का एक जरिया होता है। कोई रचना करने के बाद वे दुख या तनाव से मुक्त हो जाते हैं।
तो है न मानव निरीक्षण एक रोचक चीज। क्या आपने इससे पहले सोचा भी था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, साहित्य, चित्रकारी आदि गंभीर क्रियाकलापों का बंदरों द्वारा जुए बीनने की क्रिया से घनिष्ट संबंध है?
Sunday, November 23, 2014
जुए बीनना और बतियाना
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
Monday, August 17, 2009
जुए बीनना और बतियाना
मानव निरीक्षण - 5
क्या आप बता सकते हैं, बंदरों की सबसे प्रिय आदत क्या है? वह है एक दूसरे के शरीर से जुए बीनना। जुए बीनने की यह आदत उनकी सामाजिक व्यवस्था में काफी महत्व रखती है। मनुष्यों में भी जुए बीनने की बंदरों की आदत का समतुल्य व्यवहार होता है? वह है, बतियाना, जी हां, बातचीत करना। आगे पढ़िए, सब स्पष्ट हो जाएगा।
टोलियों में रहनेवाले सदस्यों में एक वरीयता क्रम (पेकिंग आर्डर) होता है, जो यह तय करता है कि मैथुन, भोजन, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर पहला अधिकार किसका हो। यह वरीयता क्रम टोली के सदस्यों में इन सब सुविधाओं के लिए नित्य के झगड़ों से बचने के लिए बहुत आवश्यक है। टोलियों के सदस्य शुरुआत में हल्के-फुल्के शक्ति परीक्षण से इस क्रम को निश्चित कर लेते हैं, और उसके बाद टोली में अपेक्षाकृत शांति बनी रहती है। लड़ाई की नौबत तभी आती है जब इस क्रम का कोई उल्लंघन करे। ऐसा होने पर जिस सदस्य की हैसियत को चुनौती मिली हो, वह या तो अपनी हैसियत की लाज रखने के लिए नियम भंग करनेवाले से भिड़ जाता है, या उसके लिए अपना स्थान सदा के लिए छोड़ देता है।
वरीयता क्रम निश्चित हो जाने के बाद भी सदस्यों में परस्पर सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुत से छोटे-मोटे व्यवहार होते रहते हैं। इनमें से एक प्रमुख व्यवहार एक-दूसरों के शरीर से जुए बीनना है। हमें लग सकता है कि यह बिना किसी निहितार्थ के किया जाता होगा, पर जिन वैज्ञानिकों ने इन बातों का अध्ययन किया है, वे बताते हैं कि जुए बीनने जैसे सामान्य व्यवहार के पीछे भी काफी राजनीति होती है।
आमतौर पर जुए बीनना अपने से अधिक सत्तावान सदस्य के प्रति समर्पण भाव दिखाने का एक तरीका होता है। सामान्यतः कम शक्तिमान सदस्य ही अपने से अधिक शक्तिमान सदस्य के शरीर से जुए बीनता है। ऐसा करके वह यही दर्शाता है कि मैं तुम्हारी वरीयता स्वीकार करता हूं और इसके सबूत के रूप में मैं तुम्हें कष्ट पहुंचा रहे इन कीड़ों से छुटकारा दिलाऊंगा। और अधिक सत्तावान सदस्य अपने से कम सत्तावान सदस्य द्वारा अपने शरीर के जुए बिनवाकर उसे यही आश्वासन देता है कि मैं तुम्हारे समर्पण को स्वीकार करता हूं और तुम्हें अपने संरक्षण में लेता हूं और तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा। इससे दोनों को मनोवैज्ञानिक सकून मिलता है। सत्तावान सदस्य उस दूसरे सदस्य के प्रति निश्चिंत हो जाता है कि यह मेरे विरुद्ध उत्पात नहीं करेगा, और कम सत्तावान सदस्य को यह आश्वासन मिलता है कि मुझसे अधिक शक्तिशाली यह सदस्य अब मेरा उत्पीड़न नहीं करेगा।
मित्रों में, अर्थात लगभग समान सामाजिक हैसियत वाले सदस्यों में, जुए बीनने की क्रिया उनके परस्पर संबंधों को और प्रगाढ़ बनाती है।
इसलिए बंदरों में जुए बीनने की क्रिया समूह के अंदर के सबंधों को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब आते हैं मनुष्यों के विषय पर। मनुष्य भी वानर कुल का ही सदस्य है, और वह भी समूहों में रहनेवाला प्राणी है। उसमें भी जुए बीनने की क्रिया से मिलता-जुलता व्यवहार है, जो है बतियाना।
मनुष्यों में समस्या यह है कि उसके शरीर में बाल नहीं हैं, इसलिए उसे जुए, पिस्सू आदि जीव कम परेशान करते हैं। इसलिए जुए बीनने की क्रिया उसके संबंध में अर्थहीन है। पर हम सब जानते हैं कि हमारे समुदाय में भी एक सुस्पष्ट वरीयता क्रम देखी जाती है। चाहे आप परिवार को लें, या किसी दफ्तर के सदस्यों को, हमें वहां सब एक वरीयता क्रम दिखाई देगा। सबसे ज्यादा अधिकार परिवार के वरिष्ठ पुरुष सदस्य का, फिर उसकी पत्नी का, उसके बाद उनके सबसे वरिष्ठ पुत्र का, सबसे नीचे बच्चों और नौकर-चाकरों का। बच्चों में भी वरीयकता क्रम होता है, चाहे वह घर के बच्चे हों या मोहल्ले या स्कूल के बच्चे। नौकरों में भी यही बात है। दफ्तर में सबसे अधिक रसूख वाला व्यक्ति सीईओ होता है, उसके नीचे वरिष्ठ प्रबंधक, फिर कनिष्ठ प्रबंधक, फिर उनके सचिव आदि और सबसे कम रसूख वाला कर्मचारी चपरासी होता है जिस पर सब रौब जमाते हैं। सेना में तो यह बहुत ही औपचारितापूर्ण ढंग से लागू होता है।
अनौपचारिक रूप से भी, जहां भी चार मनुष्य एकत्र हों, उनके बीच यह वरीयता क्रम निश्चित हो जाता है। लोग एक-दूसरे को नाप-तौलकर अपने बीच तय कर लेते हैं कि कौन किससे आगे है और इस क्रम का सभी व्यवहारों में पालन करते हैं। यह अल्प समय के लिए बने मानव समूहों में भी देखा जाता है, जैसे किसी रेल के डिब्बे में चंद घंटों के लिए एकत्र मुसाफिरों में।
डेसमंड मोरिस (मैन वाचिंग, द नेकड एप, ह्यूमन ज़ू आदि पुस्तकों के लेखक) का कहना है कि इस वरीयता क्रम को बिना अनावश्यक लड़ाई-झगड़े के बनाए रखने के लिए मनुष्यों में जो तरीका है, वह है बतियाना। मनुष्य निरंतर बितियाता रहता है। दो मनुष्य मिले नहीं कि कोई न कोई बहाना ढूंढ़कर वे बातचीत शुरू कर देते हैं। डेसमंड मोरिस का कहना है कि यह वास्तव में दोनों में एक दूसरे को तौलने और वरीयता क्रम निश्चित करने की प्रक्रिया है। पुराने परिचित भी खूब बातचीत करते हैं। इनमें बातचीत का महत्व वरीयता क्रम निश्चित करने में नहीं है, क्योंकि वह पहले ही निश्चित हो चुका होता है, बल्कि उसे पुष्ट करने में होता है।
बातचीत में संलग्न दोनों सदस्य एक दूसरे के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं, दोनों के बीच तनाव कम हो जाता है और समाज में सामरस्य बना रहता है।
आम प्रवृत्ति अधिक बातचीत को हतोत्साहित करने की है। स्कूलों में, दफ्तरों में, सभी जगह यही कहा जाता है कि बातें कम करो, और काम करो, बातों में समय नष्ट मत करो, इत्यादि। पर यदि हम डेसमंड मोरिस की बात मानें, तो बातें करना तनाव मुक्ति और अनावश्यक रगड़-झगड़ घटाने का एक साधन है और यदि हमें मनुष्य समाज में शांति बनाए रखनी हो, तो हमें परस्पर खूब बातचीत करनी चाहिए।
यदि हम हमारे व्यवहार पर थोड़ा गौर करें तो डेसमंड मोरिस की बात समझ में आती है। जब दो लोगों में मन-मुटाव होता है, तो इसका एक प्रमुख संकेत होता है उनमें बातचीत बंद हो जाना। दोनों मुंह फुलाएं एक दूसरे से कट्टी कर लेते हैं। बच्चों में तो यह खास तौर से देखा जाता है। और दोनों में मैत्री भाव की पुनर्स्थापना का पहला संकेत भी यही होता है कि वे दोनों बातें करने लग गए हैं। दोनों में मेल-मिलाप करानेवाले व्यक्ति भी सबसे पहले दोनों के बीच बातचीत शुरू कराने की ही कोशिश करते हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि बातचीत हमारे समुदाय में तनाव घटाने का और मैत्री भाव जताने का एक महत्वपूर्ण जरिया होता है। यदि दो लोगों में मनमुटाव हो तो उनमें बातचीत करा दीजिए और देखिए वे कैसे तुरंत फिर से मित्र बन जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति तनाव, मायूसी या चिंता से ग्रस्त हो, तो उससे खूब बातचीत कीजिए उसे तुरंत आराम मिल जाएगा। यदि आप स्वयं तनाव, मायूसी या चिंता से परेशान हों, तो अपने परिवार के जनों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य व्यक्तियों से खूब बात कीजिए, और देखिए आप कितनी जल्दी बेहतर महसूस करते हैं।
मजे की बात यह है कि यह दो व्यक्तियों पर ही लागू नहीं होता, दो राष्ट्रों में भी यही बात देखी जाती है। विवाद की स्थिति में दोनों औपचारिक कूटनीतिक संबंधों को तोड़ लेते हैं। एक-दूसरे के देश से अपने राजदूतों को वापस बुला लेते हैं, और यदि इससे भी बात नहीं बनी तो, अपने दूतावासों को ही बंद कर लेते हैं। उसके बाद तो खुले युद्ध का ही रास्ता बचा रहता है।
दूसरे देश जो इस लड़ाई से दुनिया को बचाना चाहते हैं, वे यही कोशिश करते हैं कि दोनों देशों में फिर से बातचीत शुरू हो जाए। भारत और पाकिस्तान, ईरान और अमरीका, रूस और अमरीका, चीन और जापान आदि के संदर्भ में यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। मुंबई हत्याकांड के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी वर्ताएं बंद कर दी थीं और अमरीका निरंतर हम दोनों पर दबाव डाल रहा है कि ये वार्ताएं पुनः शुरू हो जाएं, ताकि युद्ध की नौबत न आए। जब दो व्यक्तियों या राष्ट्रों में बातचीत ही बंद हो जाए तो इसका मतलब यह होता है कि दोनों के बीच जो वरीयता क्रम पहले निश्चित था, वह अब मान्य नहीं रहा और उसे नए सिरे से निश्चित करना पड़ेगा। यह बातचीत से या युद्ध से हो सकता है। चूंकि युद्ध के भीषण परिणाम निकल सकते हैं, दूसरे देश युद्ध टालने के लिए दोनों के बीच बातचीत बहाल करने की ही कोशिश करते हैं।
अब तो राष्ट्रों के बीच औपचारिक बातचीत को सुगम बनाने के लिए स्थायी व्यवस्थाएं भी बना दी गई हैं, यथा, लीग ओफ नेशेन्स (प्रथम महायुद्ध के बाद), संयुक्त राष्ट्र संघ (दूसरे महायुद्ध के बाद)। ये ऐसे मंच हैं जो कट्टी किए बैठे राष्ट्रों के बीच बातचीत पुनः शुरू कराने के अवसर देते हैं।
इसी तरह संसद, विधान सभा, अदालत, आदि सब औपचारिक बातचीत द्वारा मैत्री स्थापित करने के तरीके हैं, जो सब बंदरों के जुए बीनने की गतिविधि के ही विकसित रूप हैं।
दफ्तरों में जोइंट कंसलटेटिव मेकेनिज़म (जेसीएम) जिसमें प्रबंधक और कर्मचारी बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याएं सुलटा लेते हैं, और हड़ताल, तोड़-फोड़, पुलिस कार्रावाई आदि की नौबत नहीं आने देते, भी ऐसी ही एक व्यवस्था।
सामाजिक स्तर पर सत्संग, सामूहिक उपासना, प्रवचन आदि भी बातचीत द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित करने के विभिन्न उपाय हैं।
सभी कलाओं की मूल प्रेरणा भी बातचीत करने की इस मूलभूत आवश्यकता ही है। मनुष्य केवल बोलकर ही नहीं बातचीत करता। वह इशारे से (नृत्य कला), लिखकर (साहित्य), गाकर (संगीत), चित्र बनाकर (चित्रकला), मूर्तियां बनाकर (मूर्तिकला), इमारतें बनाकर (स्थापत्यकला) भी अपने मन की बात व्यक्त करता है। ये सब कलाएं बातचीत करने की क्रिया के ही परिष्कृत रूप हैं, और उन सबका मूल मक्सद तनाव घटाना और मैत्रीभाव बढ़ाना है।
अक्सर हम देखते हैं कि अत्यंत विषाद या दुख की स्थिति में हमारे मुंह से अपने आप ही गीत फूट निकलते हैं। वाल्मीकि ने रामयाण ऐसे ही लिखा था, जब सारस जोड़ी में से एक के बहेलिए द्वारा मार दिए जाने से उनका मन विषाद से भर गया था। वाल्मीकि ही नहीं, हम भी दुख की स्थिति में कोई न कोई गाना गुनगुनाते हैं। अक्सर लेखक, चित्रकार, कवि आदि भी अत्यंत दुख की स्थिति में ही अपनी कला का उच्चतम प्रदर्शन करते हैं। यह इसलिए क्योंकि यह उनके लिए दुख से मुक्ति पाने का एक जरिया होता है। कोई रचना करने के बाद वे दुख या तनाव से मुक्त हो जाते हैं।
तो है न मानव निरीक्षण एक रोचक चीज। क्या आपने इससे पहले सोचा भी था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, साहित्य, चित्रकारी आदि गंभीर क्रियाकलापों का बंदरों द्वारा जुए बीनने की क्रिया से घनिष्ट संबंध है?
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
Friday, August 14, 2009
मनुष्य रंगों को क्यों पहचान पाता है?
मानव निरीक्षण - 4
मनुष्य उन प्राणियों में से है जिनमें रंगों की पहचान की क्षमता काफी विकसित होती है। रंगों की पहचान करने के लिए हमारी आंखों में तीन प्रकार के प्रकाश-संवेदी शंकु कोशिकाएं हैं, जो क्रमशः लाल, हरे और नीले रंगों के प्रति संवेदनशील होती हैं। ये तीनों प्राथमिक रंग हैं और इनके मिश्रण से ही अन्य रंग उत्पन्न होते हैं।
इसके विपरीत, कुत्ते, शेर, हिरण, घोड़े आदि में दो शंकु कोशिकाएं ही होती हैं, जो केवल दो रंगों को ही पकड़ पाती हैं। इसलिए ये जानवर उतने रंगों को पहचान नहीं सकते जितने मनुष्य।
समुद्र की कुछ मछलियों और पक्षियों की आंखों में चार तक शंकु कोशिकाएं होती हैं, जो अलग-अलग चार रंगों को पहचानने में सक्षम होती हैं। इसलिए इन मछलियों और पक्षियों में रंगों की पहचान क्षमता मनुष्य से कहीं अधिक परिष्कृत होती है।
इस तरह हम देखते हैं कि रंगों की पहचान की क्षमता सभी जीवों में एक समान नहीं है, कुछ जीव कम रंगों को ही पहचान पाते हैं, जब कि कुछ अधिक। मनुष्य उन जीवों में गिना जाता है जिसमें रंगों की पहचान की अपेक्षाकृत अधिक क्षमता है। सवाल यह है कि मनुष्य में रंगों की पहचान की क्षमता क्यों है।
आम तौर पर ऐसे जानवरों में रंगों की पहचान की क्षमता अधिक पाई जाती है जिनके लिए यह क्षमता उपयोगी है। मनुष्य अपने विकास क्रम के प्रारंभिक दिनों में वृक्षों में काफी समय बिताता था और मुख्यतः वानस्पतिक पदार्थ खाता था, जैसे पत्ते, फूल, फल, टहनी आदि। अनेक पौधों में पत्ते आदि कुछ खास अवस्था में ही खाने योग्य होते हैं। उसके बाद उनमें जहरीले तत्व जमा हो जाते हैं और उन्हें खाना हानिकारक होता है। अथवा एक खास अवसथा में ही उनमें पौष्टिक सामग्री रहती है, बाद में वे कम पौष्टिक रह जाते हैं। उदाहरण के लिए जब पत्ते, डंठल, टहनी आदि कोमल होते हैं उनमें पोषक सामग्री ज्यादा होती है। जब पत्ते आदि पुराने हो जाते हैं, उनमें से पोषक सामग्री भी निकल जाती है। इसी प्रकार कई फल कच्ची अवस्था में खाने योग्य नहीं होते, पकने पर ही खाने योग्य होते हैं। इन सब अवस्थाओं में इनका रंग अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए टमाटर को ही लीजिए। शुरू-शुरू में वह गहरे हरे रंग का होता है, फिर इस हरे में गुलाबी रंग घुलने लगता है, जो गहराता जाता है और जब टमाटर पूरा पक जाता है, तो वह खून की तरह लाल रंग का हो जाता है। इसी तरह पत्ते प्रारंभ में तांबई रंग के होते हैं, फिर गहरे हरे हो जाते हैं। जब वे मुरझाने लगते हैं, तो पीले हो जाते हैं। इस तरह खाने की इन चीजों के रंग में निरंतर सूक्ष्म परिवर्तन होता रहता है, जो उनकी पौष्टिकता की ओर भी संकेत करता है। इन्हें खानेवाले जीवों में इन परिवर्तनों को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए, और वह विकास-क्रम के दौरान अपने आप ही विकसित भी हो जाती है।
आदि मानव के लिए रंगों की पहचान इसीलिए बहुत आवश्यक था। इसके बिना उसके लिए पौधों द्वारा दर्शाए गए इन सूक्ष्म रंग-संकेतों को पढ़कर यह तय कर पाना मुश्किल होता कि कौन सा पत्ता, फल, फूल या टहनी कब खाने योग्य है। इसीलिए मनुष्य में रंगों को पहचानने की क्षमता ऊंचे दर्जे की पाई जाती है।
आम तौर पर वृक्षों में रहनेवाले और फल-फूल आदि वानस्पतिक सामग्री अधिक खानेवाले दिवाचर प्राणियों में रंगों को पहचानने की ऊंचे दर्जे की क्षमता पाई जाती है।
इसलिए मनुष्यों में विद्यमान ऊंचे दर्जे की रंगों की पहचान करने की क्षमता यह भी सूचित करती है कि वह मूलतः फल-फूल-पत्ते खानेवाला दिवाचार प्राणी है। उसके शरीर के अन्य अवयवों से भी इसकी पुष्टि होती है, उदाहरण के लिए उसका पाचन तंत्र, दंत-पक्ति, जबड़े आदि यही दर्शाते हैं कि वह वानस्पतिक भोजन खाने के लिए बना है। मनुष्य में अन्य जानवरों को मारने के अवयवों का अभाव, जैसे तीक्ष्ण दांत या नाखून भी यही सूचित करता है कि मनुष्य मांसाहारी जीव नहीं है। लेकिन विकास-क्रम के दौरान उसे मांस-भक्षण भी अपनाना पड़ा है। यह उसकी सफलता का एक कारण भी बना। मांस-भक्षण से उसकी आहार-सूची में एक नया, सभी जगह विद्यमान भोजन-स्रोत जुड़ गया। जो प्राणी विभिन्न प्रकार के भोजन पचा सकता हो, उसकी उत्तरजीविता भी बढ़ जाती है। इसी कारण मनुष्य, चूहे, तिलचट्टे आदि प्राणी अधिक सफल हो पाए हैं, क्योंकि ये सब लगभग सभी कुछ खाकर जीवित रह सकते हैं और इसलिए पृथ्वी के हर कोने में फैल सके हैं। इसके विपरीत सीमत भोजन-स्रोतों पर निर्भर प्राणी सीमित क्षेत्रों में और सीमित संख्याओं में ही रह पाते हैं जहां उनके अनुकूल भोजन-स्रोत उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए पांडा नामक जीव केवल बांस के कोमल डंठलों को खाता है। वह वहीं रह सकता है जहां बांस के जंगल हों। एक अन्य उदाहरण आस्ट्रेलिया का कोला नामक जीव है, जो केवल यूकालिप्टस वृक्ष के पत्ते ही खाता है। वह भी उन्हीं जंगलों में रह सकता है जहां यूकालिप्टस के वृक्ष बहुतायत में हों।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 6 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
Thursday, August 13, 2009
ईश्वर की उत्पत्ति
मानव निरीक्षण - 3
धर्म और दर्शन की चिरंतन गुत्थी है यह प्रश्न कि ईश्वर है या नहीं। ईश्वर को मानने का मुख्य कारण यह है कि बिना ईश्वर की कल्पना किए इस असीम ब्रह्मांड की उपस्थिति को समझना कठिन है। यही कारण है कि बड़े से बड़े वैज्ञानिक भी अपनी खोजों से इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसी कोई शक्ति जरूर है जिसने सूरज, चांद, तारे और पृथ्वी को रचा होगा।
खैर, हमारा आज का विषय इससे थोड़ा सा हटकर है। दरअसल मनुष्य के लिए एक अन्य कारण से भी ईश्वर की कल्पना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आवश्यक है। आइए देखते हैं, कैसे।
जैसा कि अब सर्वविदित है, मनुष्य का अन्य वानरों से, और विशेषकर नरवानरों (गोरिल्ला, चिंपैंजी, ओरांग उटान) से निकट का संबंध है। वानरों में जो सामाजिक व्यवस्था पाई जाती है, उसकी कई विशेषताएं मनुष्य समाज में भी देखी जाती है।
वानर समुदाय टोलियों में बंटा होता है। हर टोली में एक ही पिता की संतानें और उसकी पत्नियां रहती हैं। इसे आदिम मानव के गणों या कबीलों के तुल्य माना जा सकता है। प्रत्येक टोली का एक नर शासक होता है। वह टोली का सबसे बलवान नर होता है। वह अन्य सभी नरों को टोली से खदेड़ देता है। ये नर उसी के बच्चे होते हैं या भाई। गोरिल्ला में इस प्रमुख नर को अल्फा मेल या सिल्वरबैक कहा जाता है, क्योंकि इसकी पीठ के बाल चांदी के जैसे चमकीले होते हैं। यह टीली के अन्य सदस्यों की तुलना में असीम बलशाली, अधिक उम्र का और अनुभव वाला होता है। वही टोली को भोजन-पानी की निरंतर तलाश में नेतृत्व करता है, और शत्रुओं से बचाता है। वह एक तनाशाह होता है। टोली के सदस्यों की जरा सी भी अनुशासन-हीनता वह बर्दाश्त नहीं करता। टोली के अन्य सदस्य उससे डरते रहते हैं, पर उसका कृपापात्र बना रहना भी उनके हित में होता है, क्योंकि उसकी छत्रछाया में वे सुरक्षित जीवन बिता सकते हैं।
आदि मानव की उस अवस्था में जब वह मुख्यतः पेड़ों पर रहता था, इससे मिलती-जुलती सामाजिक व्यवस्था होती थी। पेड़ों में रहते हुए मनुष्य की टोलियों के लिए परस्पर सहयोग की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती थी। भोजन फल-फूल-पत्ती के रूप में खूब उपलब्ध था और हाथ बढ़ाते ही मिल जाता था। भोजन के लिए कोई विशेष संगठित प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी। इसी तरह पेड़ों की ऊंचाई के कारण मनुष्य काफी हद तक हिंस्र पशुओं से सुरक्षित था, और बचाव के लिए भी संगठित प्रयास कम ही अपेक्षित था। इस लिए तानाशाह सरदार के लिए अपनी टोली पर नियंत्रण रखना और उसे भोजन और सुरक्षा प्रदान करना आसान और संभव था।
उसके बाद मनुष्य मैदानों में रहने लगा। इससे उसकी आदतें बदल गईं। अब भोजन का मुख्य स्रोत अन्य जानवरों का मांस हो गया। मनुष्य भैंसा, हाथी, हिरण आदि बड़े-बड़े जानवरों का शिकार करने लगा। इन्हें मारना किसी एक मनुष्य के बस की बात नहीं थी। संगठित प्रयत्न अपेक्षित था। जब बहुत सारे मनुष्य ऊंचे दर्जे के परस्पर तालमेल से काम करते थे, तभी इतने बड़े शिकारों को मार पाते थे। इसी प्रकार मैदानों में अनेक हिंस्र पशु भी थे। इनसे बचने के लिए भी एक-दूसरे की मदद अपेक्षित थी। ताल-मेल के साथ काम करने के लिए यह आवश्यक है कि गुट के सदस्यों में ऊंच-नीच की भावना न हो, और सभी को समान महत्व प्राप्त हो, अन्यथा परस्पर-वैमनम्य से गुट बिखर जाता।
इसका मतलब यह हुआ कि एक तानाशाह नेता और अनेक अधिकार-शून्य सदस्योंवाली सामाजिक व्यवस्था अब अपर्याप्त साबित होने लगी। नए मानव समाज में सभी सदस्यों का महत्व और दर्जा लगभग समान ही था। शिकार करते या हिंस्र पशुओं से बचाव करते समय जितने अधिक सदस्य साथ मिलकर काम करें, काम उतना ही आसान होता था। इसलिए सभी को समान महत्व भी मिलने लगा। टोली में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं रह गया जिसका दर्जा तनाशाह सरदार के जैसा सर्वोपरि हो।
पर मनुष्य के लिए यह एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता हो गई थी कि वह ऐसे किसी सर्वशक्तिमान, सभी अधिकारों से संपन्न सरदार के अधीन रहे, जिसके मात्र आज्ञापालन से उसकी सारी समस्याएं सुलझ जाए। नया जीवन अनेक जोखिमों, भयों और अनिश्चितताओं से भरा था। आदि मनुष्य को बारबार अपना वृक्षों वाला अधिक सरल जीवन याद हो आता था और उस सर्वशक्तिमान तानशाह नेता का भी जो उसे सुरक्षा प्रदान करता था, और जो उसकी ओर से हर निर्णय ले लेता था।
इसी कमी को पूरा करने के लिए मनुष्य ने ऐसी किसी सत्ता की कल्पना कर ली जो उसकी टोली से अलग था, और जो उसकी टोली के किसी भी सदस्य से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और अधिकार संपन्न था, और जिसके आज्ञापालन को उसने स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया।
यही ईश्वर है। मनुष्य को ईश्वर की कल्पना करना इसलिए आवश्यक हुआ क्योंकि मैदानों में सामाजिक जीवन शुरू करने पर परस्पर सहयोग आवश्यक हो गया। सभी मनुष्य समान रूप से महत्पवूर्ण और शक्तिशाली हो गए। किसी एक मनुष्य को अन्य मनुष्यों से इतना ऊंचा स्थान देना और उसे जीवन के हर निर्णय लेने का अधिकार देना अब संभव नहीं रह गया। किसी मनुष्य के लिए ऐसा तानाशाह, सर्वशक्ति-संपन्न सरदार बनना अब मुश्किल भी था क्योंकि मानव जीवन तब तक इतना जटिल हो चुका था कि कोई एक मनुष्य समाज की सभी क्रियाकलापों को नियंत्रित नहीं कर सकता था।
पर मनुष्य को वे पुराने दिन उसकी अंतःचेतना (सबकोन्श्यस माइंड) में याद थे जब वह पेड़ों पर रहता था, जब जिंदगी अधिक सरल थी, और जब तानाशाह सरदार उसके लिए हर निर्णय ले लेता था और उसकी रक्षा करता था। उसे केवल उसका आज्ञापालन करना होता था।
इसी पुरानी परिस्थिति को मनोवैज्ञानिक धरातल पर बहाल करने के लिए मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना कर ली और उसे सर्वशक्तिमान, सर्वाधिकार-संपन्न तानाशाह सरदार की भूमिका में उतार दिया।
जैसे-जैसे मानव समाज अधिक जटिल होता गया, ईश्वर की कल्पना भी विकसित होती गई और सारे ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में ईश्वर को देखा जाने लगा। ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं था, उसमें सभी शक्तियां थीं, वह सब जगह था। ईश्वर की शक्ति के बढ़ने का रहस्य भी आप समझ गए होंगे। दरअसल बढ़ी थी स्वयं मनुष्य की शक्ति। मनुष्य प्रकृति पर अधिकाधिक विजय पाता जा रहा था, और प्रकृति की शक्ति को नाथने की कला सीखता जा रहा था। और जैसे-जैसे वह अधिक शक्तिमान बनता गया, और सब जगह फैलता गया, वह ईश्वर को भी अपने से कहीं अधिक शक्ति प्रदान करता गया, ताकि ईश्वर हमेशा उससे अधिक शक्तिशाली और अधिकार-संपन्न बना रहे, सब जगह व्याप्त रहे।
और इस तरह आजकल के सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, असीम शक्तिवाले ईश्वर का आविर्भाव हुआ।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
Wednesday, August 12, 2009
मनुष्य को गरम खाना क्यों पसंद है?
मानव निरीक्षण - 2
जब आप किसी होटल में जाते हैं और खाना मंगाते हैं, तो आप वेटर को कई बार यह हिदायत देना नहीं भूलते कि गरमा गरम खाना ले आओ।
क्या आपने सोचा है कि हमें गरम खाना ज्यादा पसंद क्यों आता है? आखिर गरम और ठंडे खाने में पौष्टिकता की दृष्टि से कोई फर्क नहीं होता। उल्टे, कुछ प्रकार के भोजन के पौष्टिक गुण गरम करने पर नष्ट ही होते हैं, जैसे विटामिन। फिर भी हमें गरम भोजन ही पसंद आता है। क्यों?
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उस समय की लगी आदत है जब मनुष्य ने मांस-भक्षण शुरू किया था। पहले मनुष्य गोरिल्ला, ओरांग गुटान आदि नरवानरों के समान मुख्यतः फल-फूल और अन्य वानस्पतिक पदार्थ ही खाता था। उस समय वह वृक्षों पर ही निवास भी करता था। बाद में पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन हुआ और वन कम होने लगे, और मैदान और खुले प्रदेश अधिक हो गए। मनुष्य को इनमें जीना सीखना पड़ा। इससे उसके शरीर में और आदतों में अनेक परिवर्तन हुए। वह दो पैरों में चलने लगा, उसका शरीर बालहीन हो गया और वह मांस खाने लगा। मैदान में उसे फल-फूल मिलने से रहे, वहां हिरण, मृग, खरगोश आदि तृणभक्षी की ही अधिकता थी। मनुष्य की पाचन व्यवस्था ऐसी नहीं थी कि वह सीधे घास खा सके। उसे वह पचा नहीं पाता। इसलिए उसे इन जानवरों को ही पकड़कर उनका मांस खाना पड़ा। पर यह नया भोजन उसे बिलकुल भी रास नहीं आया। कच्चे मांस में कोई स्वाद नहीं होता है, जब कि फल-फूल आदि में नमक, मिठास, खटास, सुगंध आदि भरपूर मात्रा में होते हैं। इनके कारण ये पदार्थ खाने में अधिक स्वादिष्ट होते हैं। मांस को अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए मनुष्य ने उसे आग में भूनना शुरू किया इससे मांस न केवल नरम हो जाता है, बल्कि जलकर और पककर वह सुगंधित भी हो उठता है। इससे मनुष्य को वह अधिक जायकेदार लगता है।
इसी कारण से आज भी हम गरम खाना खाना पसंद करते हैं। खाने को गरम करने पर होता यह है कि उसके गंध युक्त अंश खूब सक्रिय हो जाते हैं और वे हमारे नथुनों में पहुंचकर हमें खूब उत्तेजित करने लगते हैं। इससे हमारे मस्तिष्क को वह भोजन अधिक स्वादिष्ट प्रतीत होने लगता है।
पर वैज्ञानिक थियोरियों को थोड़ा नमक-मिर्च मिलाकर ही स्वीकारना चाहिए, क्योंकि स्वयं वैज्ञानिक अपनी थियोरियों को बदलते रहते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ धार्मिक कट्टरपन से चिपके रहने से अपनी ही फजीहत होगी। अब इसी थ्योरी को लिजिए। इसे धराशायी करने के लिए रोजमर्रा के जीवन की बस एक छोटी सी चीज पर विचार करना पर्याप्त होगा। आज कोई भी इन्कार नहीं करेगा कि सबसे स्वादिष्ट जंक फुड़ों में आइसक्रीम शामिल है। अब आप ही बताइए आईसक्रीम को गरमागरम परोसा जाए तो उसके स्वाद में इजाफा होगा या स्वाद बिलकुल बिगड़ जाएगा!
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 6 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
Tuesday, August 11, 2009
मनुष्य बाल से वंचित क्यों हुआ
मानव निरीक्षण - 1
पिछले पोस्ट में मैंने डेसमंड मोरिस नामक वैज्ञानिक की मानव-व्यवहार संबंधी दो पुस्तकों का जिक्र किया था, मैन वाचिंग और द नेकड एप। इनमें मनुष्य-व्यवहार के बारे में ढेरों जानकारी है। इस लेख से शूरू करके आगे के कुछ लेखों में इसी पुस्तक के कुछ रोचक अंशों की चर्चा रहेगी।
शुरू करते हैं इस सवाल से कि मनुष्य के शरीर पर इतने कम बाल क्यों हैं, जब कि अधिकांश अन्य स्तनधारियों में, और खास करके हमारे पूर्वजों के निकट समझे जानेवाले नरवानरों में, यानी गोरिल्ला, चिंपैंजी और ओरांगुटान में, बाल का घना आवरण होता है?
वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी पर विचार किया है। मनुष्य में बाल न होने को समझानेवाला एक सिद्धांत मैक्स वेस्टनहोफर ने 1942 में प्रस्तुत किया। एलिस्टर हार्डी नामक समुद्र-वैज्ञानिक ने 1960 में उसे और विस्तार दिया। इस विचित्र सिद्धांत के अनुसार मनुष्य के विकास-क्रम में एक लंबी अवधि वह भी थी जब उसने जल-जीवन को अपनाया था, और इस दौरान उसके शरीर में अनेक परिवर्तन आए ताकि जल-जीवन सुगम हो जाए। इन परिवर्तनों में से एक बाल का चला जाना भी है, जिससे पानी में तैरना आसान हो जाता है। अन्य परिवर्तनों में शामिल हैं, पिछले पैरों का खूब लंबा और बलिष्ठ होना, क्योंकि उनका उपयोग तैरने के अवयव के रूप में किया जाता था, और त्वचा के नीचे चर्बी की परत विकसित होना, ताकि शरीर का ऊष्मारोधन हो। ये सब व्वस्थाएं अन्य समुद्री स्तनियों में भी पाई जाती हैं, जैसे सील, ह्वेल, आदि। इन स्तनधारियों में भी बाल नहीं होते, और पिछले पैर तैरने के अवयव में बदल गए हैं। उनके शरीर में भी त्वचा के नीचे चर्बी की परत होती है।
1970 के दशक मे यह सिद्धांत काफी लोकप्रिय हुआ था, पर इसे न मानने के अनेक कारण हैं। मनुष्य नैसर्गिक रूप से तैरना नहीं जानता है, और उसे तैरने की कला सीखनी पड़ती है। यदि मनुष्य पहले जलीय जीवन बिताता आया हो, तो उसे तैरना कुदरती रूप से आना चाहिए। दूसरी आपत्ति यह है कि मनुष्य में समुद्री परभक्षी जीवों से बचाव के उपाय नदारद हैं। यदि वह जल जीवन में एक समय माहिर रहा हो, तो उसमें ऐसा कोई बचाव साधन विकसित हो गया होना चाहिए था। तीसरी आपत्ति यह है कि अब तक ऐसे कोई मानव जीवश्म समुद्रों से नहीं मिले हैं जो यह सूचित करें कि पहले मनुष्य समुद्रों में रहता था। आजकल के वैज्ञानिक जल जीवन वाले इस सिद्धांत को कम ही तरजीह देते हैं।
मनुष्य में बाल के न होने के लिए कुछ अन्य सिद्धांत भी प्रचलित हैं।
एक सिद्धांत के अनुसार यह तब हुआ जब मनुष्य ने पेड़ों पर रहना छोड़कर खुले मैदानों में रहना शुरू किया। पहले मनुष्य चिंपैजी आदि नरवानरों के समान पेड़ों पर ही अधिक समय बिताता था और फल-फूल-पत्तियां खाकर ही जीवित रहता था। उस समय पृथ्वी में विशाल, घने वन भी बहुतयत में थे। फिर पृथ्वी की जलवायु बदल गई, वर्षा कम होने लगी और वन नष्ट होने लगे और उनकी जगह ले ली बड़े-बड़े घास के मैदानों ने। मनुष्य के पूर्वजों को भी इस परिवर्तन के साथ समझौता करना पड़ा। अब उन्हें पेड़ों से पर्याप्त भोजन नहीं मिल सकता था। उन्हें पेड़ों की सुरक्षा छोड़कर खुले मैदानों में उग रहे घास-पात खानेवालेजीव-जंतुओं से भोजन प्राप्त करने की आवश्यकता पड़ी। जमीन में उतर आने से मनुष्य के शरीर में अनेक परिवर्तन हुए, जैसे वह दो टांगों पर सीधे खड़े होकर चलने लगा। दूसरे, उसे मांस-भक्षी होना पड़ा क्योंकि मैदानों में वही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भोजन-स्रोत था। मांस हेतु अन्य जानवरों का शिकार करने के लिए उसे तेज दौड़ना पड़ता था। इससे उसका शरीर बहुत गरम हो जाता था। वैसे भी उन दिनों पृथ्वी का तापमान पहले से अधिक गरम हो गया था। इन दोनों के कारण बालयुक्त शरीर उसके लिए असुविधाजनक था, क्योंकि बाल के कारण दौड़ने के समय शरीर में बनी ऊष्मा जल्दी शरीर से बाहर नहीं निकल पाती थी। इसलिए उसने धीरे-धीरे अपने शरीर से बाल खो दिए।
वैज्ञानिकों में एक अन्य सिद्धांत भी प्रचलित है, जिसका भी संबंध मनुष्य के वृक्षों में रहना छोड़कर जमीन पर रहने लगने से संबंधित है। जब मनुष्य जमीन पर रहने लगा, तो उसे हिंस्र पशुओं से बचने के लिए गुफा-कंदराओं में शरण लेनी पड़ी। यहां रहते हुए मनुष्य के आसपास अवशिष्ट भोजन, मल-मूत्र और अन्य गंदगी खूब इकट्ठी होने लगी। इन गंदगियों में खूब परजीवी कीड़े भी पनपने लगे, जैसे पिस्सू, खटमल, जुए, आदि। ये मनुष्य को बहुत सताने लगे। इन पीड़क जीवों से छुटकारा पाने के लिए ही मनुष्य रोमहीन हो गया, क्योंकि ये परजीवी रोमयक्त त्वचा में ही पनप सकते थे।
जो भी हो, बालों का न होना मनुष्य को अन्य स्तनधारियों से विलक्षण जरूर बनाता है। बाल स्तनधारियों की खास पहचान है। दरअसल बाल केवल स्तनधारियों में ही पाया जाता है। यदि किसी प्राणी में बाल हो, तो उसे असंदिग्ध रूप से स्तनधारी माना जा सकता है। पर मनुष्य में प्रवृत्ति बाल से मुक्त होते जाने की दिख रही है। आजकल के मनुष्यों में बाल निरंतर कम होता जा रहा है।
वैसे भी विकास-क्रम का एक उसूल यह भी होता है कि जो अवयव आवश्यक नहीं होते हैं, वे बचते नहीं है। नरवानरों की पूछ इसका उदाहरण है। मनुष्यों में बाल का भी बहुत कम प्रयोजन रह गया है। इसलिए यदि विकास-क्रम में वह नष्ट हो जाए, तो वह आश्चर्य की बात नहीं होगी। भौंहें, पलकें, नाक, आदि में ही बाल रह जाएगा, क्योंकि वहां वह उपयोगी भूमिका निभाता है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण