बारिश के मौसम के साथ ही बीमारियों का मौसम भी शुरू हो जाता है। एक आम बीमारी जुकाम है। उसके बारे में जानिए कुछ रोचक तथ्य।
औसतन एक व्यक्ति को हर साल 3-4 बार जुकाम हो जाता है। जुकाम की बीमारी एक विषाणु (वाइरस) के कारण होती है। जुकाम लाने के लिए केवल 10 विषाणुओं की जरूरत होती है। जुकाम पीड़ित व्यक्ति के छींकने पर थूक की छींटे उसके मुंह से 102 मील प्रति घंटे की रफ्तार से 12 फुट तक की दूरी तय कर सकती हैं।
जुकाम होने पर ऐंटीबयोटिक (जीवाणुनाशी) दवाइयां लेने से कोई लाभ नहीं होता क्योंकि जुकाम जीवाणुओं के कारण नहीं होता। ऐंटीबयोटिक जीवाणुओं के विरुद्ध ही असरकारक होते हैं। जुकाम होने पर आमतौर पर बुखार नहीं आता। यह आम धारणा कि जुकाम ठंड लगने से होती है, विज्ञानसिद्ध नहीं है। यदि व्यक्ति थका हुआ और तनावग्रस्त हो, तो वह अधिक आसानी से जुकाम की चपेट में आ सकता है।
Friday, July 17, 2009
जुकाम के जलवे
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
Monday, July 06, 2009
सिगरेट छोड़ने का आसान तरीका - कार पद्धति

एलन कार (1934 – 2006) का जन्म लंदन में हुआ था। उन्होंने 18 साल की उम्र में सिगरेट पीना शुरू किया था। उन्होंने 1958 में सिगरेट पीना छोड़ा। छोड़ने से पहले उन पर यह लत इस कदर सवार हो गई थी कि वे रोज पांच पैकेट सिगरेट फूंक डालते थे।
सिगरेट छोड़ने में अपनी सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने एक विधि विकसित की जिसे अपनाकर लाखों लोग इस घातक लत से अपना पीछा छुड़ा सके हैं। इस पद्धति को कार पद्धति या ईसीवे (आसान तरीका) कहा जाता है।
कार बताते हैं कि आम विश्वास के विपरीत सिगरेट पीने से एक मानसिक उछाल की स्थिति पैदा नहीं होती, बल्कि हर नया सिगरेट उससे पहले के सिगरेट के विथड्रोअल सिमटम को दूर भर करता है। पर नया सिगरेट भी खत्म होने से पहले ही अपना विथड्रोअल सिमटम शुरू कर देता है, और अगली सिगरेट की मांग पैदा कर देता है। इस तरह आदमी बहुत जल्द ही चेन-स्मोकर में बदल जाता है।
कार पद्धति का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि विथड्रोअल सिमटम का मूल कारण सिगरेट के लती के मन में विद्यमान डर और संशय होता है कि वह सिगरेट के बिना नहीं रह सकता। यदि इस डर और संशय को दूर किया जा सके, तो सिगरेट छोड़ना उतना कष्टदायक नहीं होता है।
कार पद्धति का तीसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि सिगरेट छोड़ने के लिए इच्छा शक्ति बिलकुल आवश्यक नहीं है। कारण यह कि जब कोई व्यक्ति कोई काम नहीं करना चाहे, तो उसे वह काम करने से रोकने के लिए इच्छा शक्ति दरकार नहीं होती। जब सिगरेट का लती अपने मन के डर और संशय से उभर जाता है, तो उसमें ऐसी ही मनःस्थिति बनती है, अर्थात वह स्वयं ही सिगरेट नहीं पीना चाहता।
इसके साथ ही जब सिगरेट के लती को यह समझ में आ जाए कि उसके शरीर से निकोटीन के विथोड्रोअल के कारण होनेवाला कष्ट इतना मामूली होता है कि उसे नजरंदाज किया जा सकता है, तो उसके लिए सिगरेट छोड़ना बिलकुल आसान हो जाता है।
इसके विपरीत जो केवल दृढ़ इच्छा शक्ति से काम लेकर सिगरेट छोड़ने की कोशिश करते हैं और अपने मन में विद्यमान डर और संशय को दूर करने की ओर ध्यान नहीं देते, उनमें इस डर और संशय के कारण जल्द ही विथड्रोअल के शारीरिक लक्षण प्रकट होने लगते हैं, जैसे पसीने से हथेलियां भीगना, घबराहट, झुंझलाहट, चेहरा लाल होना, इत्यादि। बहुत से सिगरेट के लती मान बैठते हैं कि ये सब लक्षण शरीर द्वारा निकोटिन की मांग करने के कारण हो रहे हैं, न कि उनकी मानसिक स्थिति के कारण, और तुरंत अगला सिगरेट सुलगा लेते हैं। इस तरह वे कभी भी सिगरेट छोड़ नहीं पाते।
कार का कहना है कि “छोड़ने” के इस डर के कारण ही अधिकांश सिगरेट के लती सिगरेट पीना जारी रखते हैं, यद्यपि सिगरेट पीने के कारण स्वास्थ्य को होनेवाले स्पष्ट नुकसानों के अकाट्य प्रमाण उपलब्ध हैं।
कार अपनी पद्धति में शब्दों के प्रयोग को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। वे कभी भी सिगरेट "छोड़ने" की बात नहीं करते क्योंकि इस शब्द में किसी प्रिय या आवश्यक वस्तु से अलग होने का अर्थ छलकता है, जबकि सिगरेट ऐसी कोई लाभदायक चीज नहीं है। इसके बजाए, वे सिगरट पीना "रोकना", या इस लत से “मुक्ति पाना” या “पिंड छुड़ाना” आदि शब्दों को पसंद करते हैं। उनकी पद्धति में इस तरह की सूक्ष्म मनोविश्लेषण से जुड़ी अनेक बातें शामिल हैं।
सिगरेट छुड़वाने की कार पद्धति इतनी कारगर साबित हुई कि 1983 में कार ने अपनी नौकरी छोड़कर पहला कार दवाखाना स्थापित किया, जिसका नाम उन्होंने ईसीवे (आसान तरीका) रखा। 1985 में उन्होंने द ईसी वे टु क्विट स्मोकिंग (सिगरेट छोड़ने का आसान तरीका) नामक किताब लिखी जो तुरंत ही दुनिया भर में खूब लोकप्रिय हुई। आज भी यह सिगरेट छुड़ाने में मदद करनेवाली किताबों में सबसे ज्यादा बिकती है।
कार का प्रथम ईसीवे दवाखाना इतना लोकप्रिय हुआ कि जल्द ही 41 देशों में ऐसे 150 से भी ज्यादा दवाखाने खुल गए। कार पद्धति से सिगरेट से छुटकारा पानेवाले लोगों में बड़ी-बड़ी हस्तियां शामलि हैं, जैसे पोप गायिका ब्रिटनी स्पियर। यह पद्धति 90 प्रतिशत मामलों में सफल होती है।
कार पद्धति अपनानेवाले ईसीवे दवाखानों का संचालन ऐसे लोग करते हैं जो स्वयं पहले सिगरेट पीते थे और जिन्होंने इस पद्धति की मदद से इस लत से मुक्ति पाई थी।
कार ने वजन घटाने और शराब छोड़ने के बारे में भी उपयोगी पुस्तकें लिखी हैं। जब 71 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ, तो इन सबकी बिक्री से उन्हें जो आमदनी हुई थी वह 12 करोड़ पाउंड जितनी थी।
भारत में भी एलन कार के ईसीवे दवाखाने हैं। उनकी जानकारी एलन कार के जाल स्थल से मिल सकती है। यहां क्लिक करें –
http://easywaytostopsmoking.co.in/
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 9 टिप्पणियाँ
Saturday, June 27, 2009
आयोडीन की कमी से एक-चौथाई मानवजाति पीड़ित

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1.6 अरब व्यक्ति आयोडीन की कमी से उत्पन्न विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं। इनमें से एक-तिहाई एशिया के निवासी हैं।
डाक्टर सलाह देते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए हर दिन 150 माइक्रोग्राम आयडीन खाना चाहिए। बाल्यावस्था में आयोडीन की कमी से मस्तिष्क व अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक अंगों का समुचित विकास नहीं हो पाता है। गर्भावस्था में आयोडीन की कमी से बौने व मंदबुद्धि बच्चे पैदा होते हैं। सर्वेक्षणों में देखा गया है कि जिन बच्चों में आयोडीन की कमी थी, उनकी बौद्धिक क्षमता सामान्य बच्चों से 10-15 प्रतिशत कम है। आयोडीन की कमी से घेंघा नामक बीमारी भी होती है, जिसमें गर्दन के आधार पर स्थित थाइरोइड ग्रंथी सूज जाती है।
यद्यपि स्वस्थ रहने के लिए आयोडीन की बहुत कम मात्रा ही आवश्यक होती है, पर बहुत से समुदायों में प्रचलित आहारों में आयोडीन नहीं रहता है। पहाड़ों व बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में रहनेवालों में आयोडीन की कमी सामान्यतः पाई जाती है, क्योंकि वहां की मिट्टी में आयोडीन नहीं होता। बाढ़ का पानी मिट्टी में मौजूद आयोडीन को घुलाकर या तो जमीन के नीचे ले जाता है अथवा सतही बहाव के साथ उसे अन्यत्र पहुंचा देता है। इसलिए यहां उगाई गई फसलों में और पालतू पशु-पक्षियों के मांस-दूध आदि में आयडीन नहीं होता। इस कारण इन भोजनों पर निर्भर मनुष्य भी आयडीन की कमी की चपेट में आ जाते हैं।
समृद्ध देशों में भी आयोडीन की कमी से जुड़ी समस्याएं पुनः सिर उठा रही हैं, खासकर के यूरोप में, जहां लोग दुग्ध उत्पादों व मांस से आयोडीन प्राप्त करते हैं। वहां के पशुपालक पैसा बचाने की फिराक में अपने जानवरों को बिना आयोडीन वाला नमक खिलाते हैं, जो सस्ता होता है। इससे दूध, मांस आदि में भी आयोडीन की मात्रा कम हो जाती है। अंततः मनुष्यों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है।
युनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन व अनेक सरकारों के प्रयासों से खुराक में आयोडीन शामिल करने के महत्व के बारे में अब अधिक लोग सचेत हो रहे हैं। फिर भी आयोडीन की कमी से जुड़ी समस्याओं से पूर्णतः मुक्ति पाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
चूंकि शरीर को स्वस्थ रहने के लिए बहुत कम मात्रा में ही आयडीन की जरूरत होती है, नमक जैसे व्यापक रूप से उपयोग किए जानेवाले किसी खाद्य-सामग्री में आयडीन मिलाकर बेचने से जन-समुदाय को आयडीन की कमी से बहुत हद तक बचाया जा सकता है। अनेक देश यही रणनीति अपना रहे हैं। भारत में भी आडीन मिला हुआ नमक बेचने के संबंध में अनेक कानून बने हुए हैं। पर इनके साथ-साथ हमारे यहां देशी नमक की भी खूब बिक्री होती है, जिसमें आयडीन नहीं होता है। इसलिए इस प्रयास का फायदा केवल उन लोगों को होता है जो आयडीन वाला नमक खरीदते और उपयोग करते हैं। कहना न होगा कि व्यापक गरीबी के कारण देश के अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, महंगा आयोडीनयुक्त नमक नहीं खरीदते और देशी नमक या पत्थर नमक से ही काम चलाते हैं।
आयोडीन युक्त भोज्य-पदार्थों में शामिल हैं, दूध, दही, पनीर, मांस, अंडे, मछली, समुद्र से प्राप्त भोज्य पादर्थ, विशेषकर सीवीड, ब्रेड तथा अन्य बेकरी उत्पाद, और अनाज।
अगति (सेसबेनिया ग्रांडिफ्लोरा) नामक एक उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो तेजी से बढ़ता है और देश-विदेश में सजावटी वृक्ष के रूप में खूब उगाया जाता है। यह उन थोड़े से पौधों में से एक है जिसमें आयडीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके खाने योग्य अंशों के हर 100 ग्राम में 2 मिलीग्राम आयडीन रहता है।
यह 12 मीटर की ऊंचाई प्राप्त करता है और इसकी दो जातियां हैं - एक में लाल फूल होते हैं और दूसरे में सफेद फूल। सफेद फूल वाली अगति को घर के पिछवाड़े के बगीचे में भी उगाया जा सकता है।
अगति काली कपासी मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। वह सूखे को भी झेल सकती है। पहले उसके बीजों को पौधशाला में उगाया जाता है, फिर शिशु पौधों को खेतों में प्रत्यारोपित किया जाता है। तमिलनाडु में इसकी खूब खेती होती है। खेतों में रोपने के दो महीने बाद पौधों को अमोनियम सल्फेट की खाद दी जाती है। इस वृक्ष में सितंबर-दिसंबर में बहार आता है और गर्मियों में इसमें फल लगते हैं।
इसके पत्तों और फूलों में अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।
सामान्य भोज्य सामग्रियों में विद्यमान आयडीन की सूची नीचे दी गई है (100 ग्राम में) –
नमक (आयडीन मिलाया हुआ) – 3000 माइक्रोग्राम
समुद्री भोज्य सामग्री – 66 माइक्रोग्राम
मांस – 26 माइक्रोग्राम
अंडे – 26 माइक्रोग्राम
दुग्ध उत्पाद – 13 माइक्रोग्राम
ब्रेड तथा अनाज – 10 माइक्रोग्राम
फल – 4 माइक्रोग्राम
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Saturday, June 20, 2009
खाज का घरेलू इलाज
त्वचा के रोग हो जाएं तो परेशानी बहुत होती है। वे जल्दी ठीक भी नहीं होते। खाज ऐसा ही एक रोग है। वह उंगलियों के बीच, कमर और जनन अंगों पर होती है। खाज होने पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें बहुत खुजली होती है। खुजलाने से बड़े घाव बन जाते हैं।
खाज कीटाणुओं की वजह से होती है। ये कीटाणु छूने से फैलते हैं। बीमार के कपड़े और बिस्तर साफ रखें और उन्हें धूप दिखाएं। जो कपड़े शरीर को छूएं, वे गीले नहीं होने चाहिए।
नीम के पत्तों के उबले पानी से नहाएं। नींबू के रस और कपूर को सरसों के तेल में मिलाकर खाज वाले स्थानों पर लगाएं। नीम के कुछ पत्ते उबालकर पीसें। इसमें हल्दी मिलाकर दानों पर गाढ़ा लेप करें। कुछ देर धूप में खड़े रहें। ऐसा तीन दिन करें। इन दिनों नहाएं नहीं। चौथे दिन नहाकर साफ कपड़े पहनें। नीम के पत्ते पीसकर उसमें घी-शक्कर मिलाकर गाढ़ा घोल बनाएं। इसे दिन में २-३ बार खाएं। ऐसा २-३ दिन करें। इन सब उपचारों के बाद भी अगर खाज ठीक न हो, तो डाक्टर को दिखाएं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 6 टिप्पणियाँ
Saturday, June 06, 2009
बच्चे, टीवी और मां-बाप
आजकल हर मां-बाप को टीवी को लेकर अपने बच्चों के साथ महाभारत लड़ना पड़ता है। मुख्य मुद्दा यह रहता है कि बच्चों को कितने घंटे टीवी देखने देना चाहिए और यह कि टीवी देखने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है।
रूस के कुछ शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सात साल से कम उम्र के बच्चों को दिन में आधे घंटे से अधिक समय के लिए टीवी देखने नहीं देना चाहिए और सप्ताह में दो या तीन बार से अधिक नहीं।
टीवी के सामने बच्चे किस मुद्रा में बैठते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है। बच्चे कई बार लेटकर या उकड़ू बैठकर या टीवी के एकदम पास बैठकर कार्यक्रम देखते हैं। लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से बच्चों की कई शारीरिक क्रियाएं, जैसे पाचन, रक्त-संचार, श्वसन आदि अवरुद्ध हो जाती हैं, जो बच्चों के विकास पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।
बच्चों को टीवी से पांच या छह फुट से अधिक की दूरी पर बैठना चाहिए। अठारह फुट से अधिक दूरी से टीवी देखना भी आंखों के लिए हानिकारक है। टीवी का पर्दा आंखों की ऊंचाई से कुछ नीचे रहना चाहिए।
यदि बच्चा चश्मा पहनता हो, तो टीवी देखते समय उसे चश्मा पहने रहना चाहिए, अन्यथा आंखों पर अत्यधिक जोर पड़ेगा। घुप अंधेरे में बच्चों को टीवी देखने न दें, टीवी वाले कमरे में हल्की रोशनी रहनी चाहिए। अन्यथा टीवी के पर्दे की तेज रोशनी से आंखें झिलमिला जाएंगी और आंखों के दृश्य-पटल (रेटिना) को नुक्सान पहुंचेगा।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Friday, June 05, 2009
बाल की खाल

कवियों और प्रेमियों ने शारीरिक सौंदर्य का अभिवर्धन करने वाले अंगों में बालों को आंखों के बाद दूसरा स्थान दिया है। मनुष्य के बाल विभिन्न रंगों के होते हैं और विभिन्न मानव-समूहों के बालों की विशेषताएं अलग-अलग होती हैं। इतना ही नहीं, बालों का रंग-रूप उम्र के साथ भी बदलता है, हालांकि लोग खिजाब, डाई आदि के इस्तेमाल से इस परिवर्तन पर पर्दा डाले रखने की खूब कोशिश करते हैं। शरीर के विभिन्नों भागों में उगते बाल भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर पर कम से कम एक लाख बाल होते हैं। वे प्रति दिन 0.35 मिलीमीटर की दर से बढ़ते हैं। बढ़ने की यह दर उम्र और लिंग पर आधारित होता है। 15-30 वर्ष के मनुष्यों में बाल का बढ़ाव सबसे अधिक होता है।
बाल ठंडे मौसम की तुलना में गरम मौसम में अधिक तेजी से बढ़ते हैं। यह धारणा गलत है कि काटे जाने पर बाल अधिक तेजी से बढ़ते हैं। बालों के झड़ने से अधिकांश लोग परेशान रहते हैं, पर दिन में 50-100 बालों का झड़ना सामान्य बात है। झड़े हुए बाल नए सिरे से उग आते हैं।
बाल एक अत्यंत शक्तिशाली पदार्थ है। परीक्षणों से पता चला है कि वह 160 ग्राम के वजन के खिंचाव को बिना टूटे सह सकता है। हड्डियों के समान बाल भी आसानी से नष्ट नहीं होते। मिस्र के राजा रामासेस द्वितीय के परिरक्षित शरीर पर बाल आज भी ठीक हालत में विद्यमान हैं, यद्यपि उनके मरे 3,000 से भी अधिक साल हो गए हैं।
एक औसत मनुष्य के जीवनकाल में बाल यदि काटे न जाए तो 55-70 सेंटीमीटर तक बढ़ेंगे। यद्यपि स्त्रियों में पुरुषों से अधिक लंबे बाल होते हैं, दुनिया में सबसे लंबे बाल होने का कीर्तिमान एक पुरुष का है। सन 1949 में तमिल नाड के स्वामी पंडरसन्नधि नामक व्यक्ति के बालों की अधिकतम लंबाई 26 फुट पाई गई।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: बालों की देखभाल, सौंदर्य, स्वास्थ्य
Wednesday, June 03, 2009
क्या है उच्च रक्त चाप और क्यों है वह खतरनाक?

आपने कई लोगों से उच्च रक्त चाप की शिकायत सुनी होगी, विशेषकर अधिक उम्रवाले लोगों से। क्या है उच्च रक्त चाप और वह खतरनाक क्यों है?
शरीर के विभिन्न अंगों तक खून धमनियों में बहते हुए पहुंचता है। ये धमनियां विभिन्न मोटाई की नलियां होती हैं। हृदय जब सिकुड़ता है, तो हृदय के कक्षों में इकट्ठा खून हृदय से जुड़ी धमनियों में बह निकलता है। ये धमनियां लगभग 1,00,000 छोटी धमनियों में बंटकर शरीर के हर कोने में फैली हुई हैं। जब शरीर में बहुत ज्यादा खून होता है या धमनियां संकुचित अवस्था में होती हैं, तब रक्त चाप बढ़ने लगता है।
डाक्टर रक्त चाप मापने के लिए कुहनी के ऊपर गुब्बारेनुमा उपकरण रखकर पट्टी बांध देता है और उपकरण में हवा भरने लगता है। उपकरण से जुड़े एक पैमाने का पारे का स्तंभ उपकरण के भीतर की हवा का दाब दिखाता है। जब उपकरण के भीतर की हवा का दाब खून के दाब के बाराबर हो जाता है, तो पारे का स्तंभ स्थिर हो जाता है, और डाक्टर स्तंभ की ऊंचाई से रक्तचाप का आकलन कर लेता है।
मान लीजिए कि आपका रक्त चाप 110/70 है। अंकों की इस जोड़ी का बड़ा अंक आपके खून के उस वक्त के दाब को दर्शाता है जब आपका हृदय सिकुड़ रहा (यानी धड़क रहा) होता है और आपकी धमनियों में खून बह रहा होता है। छोटा अंक उस समय के रक्त चाप को दर्शाता है जब दो धड़कनों के बीच आपका हृदय सुस्ता रहा होता है। 120/80 का रक्तचाप सामान्य माना जाता है। उच्च रक्त चाप 140/90 से आरंभ होता है।
उच्च रक्त चाप क्यों हानिकारक है? यदि आपका खून आपकी धमनियों की दीवारों पर निरंतर उच्च दबाव बनाए रखे, तो देर-सबेर धमनियां विघटित होने लगेंगी। इस उच्च दबाव के कारण उनमें कोलेस्टेरोल का जमाव भी बढ़ जाएगा। इससे आपके गुर्दे खराब हो सकते हैं और आपको दिल का दौरा पड़ सकता है। यदि धमनियां खून के उच्च दबाव के कारण फट जाएं, तो शरीर के भीतर-भीतर रक्त-स्राव हो सकता है। यदि रक्त-स्राव मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों में होने लगे, तो आपकी मौत तक हो सकती है।
उच्च रक्त चाप से बचने के लिए निम्नलिखित सरल उपाय काफी कारगर पाए गए हैं:-
- यदि आपका वजन अधिक हो, तो वजन घटाने की कोशिश कीजिए। अधिक वजन के कारण शरीर में खून की मात्रा बढ़ जाती है, और आपके हृदय को भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। सबसे अधिक खतरनाक पेट और कमर में चर्बी का जमाव है। यह उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय के अनेक रोगों की संभावना बढ़ा देता है।
- व्यायाम कीजिए। तेज कदमों से चलना, तैरना, साइकिल चलाना आदि व्यायामों के बाद रक्तचाप तेजी से गिरता है। इसका कारण यह है कि व्यायाम करते समय आपकी धमनियां फैलती हैं, ताकि शरीर को अधिक आक्सीजन मिल सके। जब व्यायाम बंद हो जाता है, तो हृदय की धड़कनें तो धीमी हो जाती हैं, पर कुछ और समय के लिए धमनियां फैली ही रहती हैं। इससे रक्तचाप गिर जाता है। नियमित व्यायाम करके आप अपनी धमनियों को अधिकाधिक समय तक फैली अवस्था में बनाए रख सकते हैं और उच्च रक्त चाप पर नियंत्रण पा सकते हैं।
- भोजन पर ध्यान दीजिए। खाने में नमक की मात्रा बिलकुल कम कर दीजिए। वसायुक्त पदार्थ भी कम खाइए। दिन में कम से कम एक बार पेट भर फल और हरी सब्जियां खाइए। अनेक लोगों में इससे उच्च रक्त चाप कम होते पाया गया है। दूध और दूध से बनी चीजें खाने से भी उच्च रक्त चाप पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Tuesday, June 02, 2009
शहद से घाव भरते हैं
थाईलैंड में किए गए कुछ प्रयोगों से सिद्ध होता है कि शहद में सतही घावों को जल्दी ठीक करने की क्षमता पाई जाती है। अनुसंधानकर्ताओं ने देखा कि घावों पर शहद मलने से घावों में विषैले जीवाणुओं की संख्या में भारी कमी आई।
आयुर्वेद में भी शहद के इस गुण को मान्यता मिली हुई है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 4 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Monday, June 01, 2009
हल्दी कैंसर को दूर कर सकती है
परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों में हल्दी को काफी महत्व दिया गया है। सिरदर्द, कील-मुहासे, टूटी हड्डियों को जोड़ने, घावों को सुखाने आदि में उसका उपयोग किया जाता है। अब हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार हल्दी कैंसर को भी दूर कर सकती है।
इस संस्था की एक वैज्ञानिक कमला कृष्णस्वामी के अनुसार हल्दी में कुरकुमिन नामक सक्रिय पदार्थ होता है, जिसे जानवरों में कैंसररोधी क्षमता पैदा करते पाया गया है। यह पदार्थ मनुष्यों में भी कैंसर लानेवाले पदार्थों को दूर करने में सहायक बन सकता है।
परीक्षणों से पता चला है कि नियमित रूप से सिगरट पीने वाले व्यक्ति यदि तीस दिनों तक रोजाना डेढ़ ग्राम हल्दी खाएं, तो उनके पेशाब में कैंसर लाने वाले पदार्थों की मात्रा घटने लगती है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Sunday, May 31, 2009
वातानुकूलक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक
क्या आप गरमी से परेशान हैं? लेकिन वातानुकूलक को चालू करने से पहले जरा एक बार फिर सोच लें। अमेरिकन लंग ऐसोसिएशन के अनुसार वातानुकूलक अनेक प्रकार के जीवाणु, फफूंदी आदि हानिकारक जीवों के भंडार होते हैं। इसके अलावा वातानुकूलित कमरों में खिड़की-दरवाजे आदि सदा बंद रहने से वहां ताजी हवा का बहाव नहीं हो पाता और कोनों और दरारों में बासी हवा सदा मौजूद रहती है। यह भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानकारक होती है क्योंकि इन दरारों और कोनों में, खासकर रसोईघर, प्रयोगशाला आदि स्थानों में, अनेक प्रकार के जहरीले पदार्थ व गैसें रहती हैं।
वातानुकूलक के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए समय-समय पर उसके फिल्टरों को साफ करते रहना चाहिए ताकि वे अवरुद्ध न हो जाएं और उन पर धूल-गंदगी इक्ट्ठी न हो सके, क्योंकि इन्हीं पर रोगाणु पनपते हैं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Wednesday, May 27, 2009
पालक के गुण

पोपआई कार्टून शो के दर्शक पालक के जादुई गुणों से भली-भांति परिचित होंगे। पर अब वैज्ञानिकों ने भी इस पत्तेदार सब्जी का गुणगान शुरू कर दिया है। उनके अनुसार पालक में शरीर के लिए आवश्यक अनेक अमीनो अम्ल, विटामिन ए, फोलिक अम्ल, प्रोटीन और लौह तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
पालक में बीटा केरोटिन नामक विटामिन की भरमार रहती है। यह दृष्टि को सलामत रखने के लिए बहुत आवश्यक है। पालक में लोहे का अंश भी बहुत अधिक रहता है, 100 ग्राम पालक में 10.9 ग्राम जितना। पालक में मौजूद लोहा शरीर द्वारा आसानी से सोख लिया जाता है। इसलिए पालक खाने से खून के लाल कणों की संख्या बढ़ती है। इन लाल कणों में हैमोग्लोबिन नामक तत्व रहता है जो लोहे से बनता है। खून की कमी से पीड़ित व्यक्तियों को पालक खाने से काफी फायदा पहुंचता है। गर्भवती स्त्रियों में फोलिक अम्ल की कमी पाई जाती है। उनके लिए भी पालक का सेवन लाभदायक होता है।
पालक में कैल्शियम भी बहुत अधिक रहता है। इसलिए बढ़ते बच्चों, बूढ़े व्यक्तियों और गर्भवती स्त्रियों के लिए वह बहुत फायदेमंद है। पालक खाने से स्तनपान करानेवाली माताओं के स्तनों में अधिक दूध बनता है। पालक का रस पीने से दांत मजबूत होते हैं और मसूड़ों से खून रिसने की बीमारी दूर होती है। पालक श्वसन तंत्र की बीमारियों को भी दूर करता है।
पालक को कच्चा ही खाना चाहिए। कच्चे पालक में पके पालक से कहीं अधिक पौष्टिकता पाई जाती है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Tuesday, May 26, 2009
होम्योपैथी - आपके मर्जों का कोमल इलाज
होम्योपैथी अब विश्वभर में एक ऐसी विश्वसनीय और प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति के रूप में ख्याति अर्जित कर चुकी है जो शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं छोड़ती।
होम्योपैथी की खोज अठारहवीं सदी में डा. सैम्यूल हेहनमैन नामक चिकित्सक ने की। उन्हें विश्वास हो गया था कि ऐलोपैथी फायदा कम करती है और नुकसान अधिक। वे उसके कोई ऐसे विकल्प की खोज में जुट गए जो सुरक्षित, कोमल और असरकारक हो। वे मानते थे कि मानव शरीर में अपने आपको ठीक करने की असीम क्षमता होती है और चिकित्सा के प्रति ऐलोपैथी का रुख गलत है क्योंकि वह रोग के लक्षणों को दबाने की कोशिश करती है। चूंकि ये लक्षण वास्तव में इस बात के सूचक होते हैं कि शरीर रोग से लड़ने की कोशिश कर रहा है, दरअसल इन लक्षणों को उभारने की आवश्यकता है।
हेहनमैन ने अपनी खोज का आधार इस सिद्धांत को बनाया कि लोहा ही लोहे को काट सकता है, यानी जो पदार्थ रोग लाता है, वही रोग का इलाज भी होता है। उन्होंने देखा कि वे अनेक बीमारियों का इलाज रोगी को सूक्ष्म मात्रा में ये बीमारियां लानेवाले पदार्थ खिलाकर कर सकते हैं। अधिक मात्रा में लेने पर ये पदार्थ विष होते हैं, लेकिन बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में रोग का निवारण करते हैं। हेहनमैन पहले ही जान चुके थे कि तंदुरुस्त व्यक्ति को क्विनीन की अत्यल्प मात्रा देने से उसमें मलेरिया के जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। इसके बाद उन्होंने तथा उनके सहयोगियों ने विभिन्न प्रकार के पदार्थों का सूक्ष्म मात्रा में सेवन किया और इन पदार्थों के कारण उनके शरीर में प्रकट होनेवाले लक्षणों का बारीकी से लेखा-जोखा रखा। तत्पश्चात उन्होंने इन पदार्थों का उपयोग वास्तविक मरीजों के इलाज के लिए किया। उन्होंने पाया कि अधिकांश मामलों में मरीजों को राहत मिली।
होम्योपैथी के विकास का अगला पड़ाव था हर औषधि की न्यूनतम असरकारक खुराक की खोज। इस दिशा में काम करते हुए हैहनमैन को अनायास ही होम्योपैथी का मूलभूत सिद्धांत हाथ लग गया कि औषधि की खुराक जितनी अधिक सूक्ष्म रखी जाएगी, वह उतनी ही अधिक असरकारक होगी। इस प्रकार उन्होंने एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति खोज निकाली।
होम्योपैथी मर्ज का नहीं मरीज का इलाज करती है। उसका एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि रोग के लक्षण हर व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इसलिए होम्योपैथी का चिकित्सक मरीज को बिना देखे कभी भी दवा नहीं देगा। चूंकि होम्योपैथी में मरीज का इलाज होता है, न कि मर्ज का, एक ही रोग से पीड़ित व्यक्तियों को अलग-अलग दवा दी जा सकती है। इसी प्रकार अलग-अलग रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को एक ही औषधि से लाभ पहुंच सकता है।
जहां मर्ज उग्र स्वरूप का हो, वहां कभी-कभी होम्योपैथी से तुरंत लाभ मिल जाता है, लेकिन यदि मरीज की जिजीविषा कमजोर हो, तो लाभ मिलने में देर लग सकती है। लंबे समय से चली आ रही बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी धीरज रखना चाहिए क्योंकि होम्योपैथी धीमे-धीमे असर करती है। मरीज को खूब सारा आराम और अच्छा भोजन देना चाहिए और उसे शांत और शुद्ध वातावरण में चिंतामुक्त अवस्था में रखना चाहिए। यदि शरीर का कोई अंग खराब हो गया हो, या भंग हो गया हो, तो शल्य-चिकित्सा जैसी कोई अन्य चिकित्सा पद्धति का सहारा लेना पड़ सकता है। लेकिन इन चिकित्सा पद्धतियों से इलाज कराने के बाद मरीज को होम्योपैथी का कोमल स्पर्श जल्द ही स्वास्थ्य की राह में ले आ सकता है।
होम्योपैथी का सबसे अच्छा प्रभाव बच्चों में देखा जाता है। वह नवजात शिशुओं तक के लिए निरापद है क्योंकि वह बिलकुल ही दुष्प्रभावहीन होती है। चूंकि बच्चों की जीवनीशक्ति बुलंद होती है, उन पर होम्योपैथी का असर भी बहुत जल्द होता है। कुछ लोग कहते हैं कि होम्योपैथी का असर वास्तविक न होकर मात्र मानसिक होता है, पर बच्चों में देखा जाता उसका आश्चर्यजनक प्रभाव इसका खंडन करता है।
होम्योपैथी यह दावा नहीं करती कि उसके पास हर मर्ज का रामबाण इलाज है। दरअसल वह व्यक्ति और उसके स्वास्थ्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण भर है। वह मानती है कि व्यक्ति और उसके परिवेश के प्रति सामरस्य लाने से आरोग्य बढ़ता है। होम्योपैथी आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा पद्धतियों को नकारती नहीं है, वह केवल उनके व्यावसायीकरण और दुरुपयोग को चुनौती देती है। बहुत बार होम्योपैथी आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का सहचरी बनकर मरीज को फायदा पहुंचाती है। आज होम्योपैथी समय की परीक्षा में खरी उतर चुकी है। विकसित देशों तक में लोग उसे एक सुरक्षित एवं कारगर चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार चुके हैं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
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Sunday, May 24, 2009
तपेदिक के शिकंजे में कसता भारत
तपेदिक भारत में एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है। आई.सी.एम.आर. द्वारा किए गए राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत की कुल आबादी का लगभग 1.5 प्रतिशत तपेदिक का शिकार है। लगभग 40 प्रतिशत आबादी में तपेदिक जीवाणु मौजूद है, यद्यपि यह आबादी बीमारी की चपेट में अभी नहीं आई है। हर साल 25-30 लाख नए तपेदिक के रोगी होते हैं। अनुमानतः 5 लाख व्यक्ति हर साल तपेदिक के कारण मरते हैं। ऐड्स बीमारी के तेजी से फैलने से तपेदिक और विकराल रूप धारण कर रहा है। आज भारत में जितने भी ऐड्स के मरीज हैं, उनमें से 60 प्रतिशत तपेदिक के भी शिकार हैं।
नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संक्रामक रोग संस्थान के निदेशक श्री के।के। दत्ता हेल्थ मानिटर नामक पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में कहते हैं कि देश में 1-1.5 करोड़ तपेदिक के रोगियों का होना संभव है। तपेदिक के मरीज शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में समान रूप से पाए जाते हैं।
राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम 1962 से सक्रिय है, लेकिन इससे तपेदिक को नियंत्रण में लाने में सफलता नहीं मिली है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत देश के हर जिले में कम-से-कम एक तपेदिक केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक 85 प्रतिशत जिलों में, यानी 480 जिलों में से 391 में तपेदिक केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। इनके अलावा 330 तपेदिक दवाखाने भी देश के अनेक शहरों और कसबों में कार्य कर रहे हैं। देश के अस्पतालों में तपेदिक के मरीजों के इलाज के लिए 47,000 बिस्तरों की क्षमता है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
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कैसे करें फलाहार

फलों को हमेशा दूध के साथ ही खाना चाहिए। फलों को हरी सब्जियों (सलाड) के साथ नहीं खाना चाहिए। सूखे मेवे के साथ फल खाए जा सकते हैं। खाली पेट पर फलाहार करने से सबसे अधिक फायदा होता है। यदि आप भोजन के बाद फल खाना पसंद करते हों, तो आपको अधिक मात्रा में फल खाना होगा। यह भी ध्यान रखें कि जब पेट भोजन से भरा हो, तो फल उस पर अतिरिक्त भार डालेगा और इससे पाचन मुश्किल हो सकता है और आपको वायु आदि की तकलीफ हो सकती है। एक बार में केवल एक प्रकार का फल ही खाना चाहिए।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
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Thursday, May 21, 2009
बिस्तर गीला करना -- बच्चों की एक आम बीमारी
सुनील वह दिन कभी नहीं भुला पाएगा। यह तब की बात है जब वह लगभग १० साल का था। उसका सारा परिवार अनेक सगे-संबंधियों के साथ उसके नाना के घर इकट्ठा हुआ था। परिवार में किसी की शादी थी। सभी बच्चों को एक बड़े कमरे में जमीन पर बिस्तर बिछाकर सुला दिया गया था।
अगले दिन उठने पर सुनील ने देखा कि सभी बच्चे उसे नजरें चुरा-चुराकर देख रहे थे और एक-दूसरे को ठेलते हुए खुसर-पुसर कर रहे थे और हंस रहे थे। उसकी मां भी उस दिन उस पर कुछ ज्यादा ही नाराज लग रही थी। बाद में ही उसे पता चला कि माजरा क्या है। उसने पिछली रात बिस्तर गीला कर दिया था।
पंद्रह वर्ष तक के बच्चों में यह बीमारी काफी सामान्य होती है। इस तकलीफ से पीड़ित बच्चे नींद के दौरान अपने मूत्राशय की मांसपेशियों पर नियंत्रण खो देते हैं।
यह बीमारी कुछ-कुछ वंशानुगत होती है, यानी बच्चे की माता अथवा पिता के परिवार में किसी को बचपन में यह शिकायत रही होती है। इस बीमारी के मुख्यतः दो कारण होते हैं। पहला यह कि मूत्राशय आकार में छोटा होता है और रात में बननेवाला मूत्र उसमें समा नहीं पाता। दूसरा यह कि मूत्राशय की मांसपेशियों को नियंत्रित करनेवाली नाड़ियां पूरी विकसित नहीं हुई होती हैं। कभी-कभी मूत्राशय को पहुंची चोट अथवा कोई अन्य शारीरिक कमजोरी भी इस बीमारी के लिए जिम्मेदार हो सकती है। इसलिए इस बीमारी से पीड़ित बच्चे का डाक्टरी जांच करवाना बहुत जरूरी है।
इस बीमारी का इलाज अनेक प्रकार से हो सकता है, जिसमें दवाइयों का सेवन भी शामिल है। खान-पान पर नियंत्रण रखने से भी कुछ बच्चों को फायदा हुआ है। विशेष रूप से संतरा, नींबू आदि फलों का रस, कार्बोनेटेड पेय तथा चाकलेट बच्चे को खाने नहीं देना चाहिए। कुछ प्रकार के योगासन भी मूत्राशय की मांशपेशियों को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।
रात को सोने से पहले बच्चे को दूध आदि तरल पदार्थ पीने मत दें। यदि देना ही हो, तो बच्चे के सोने से कम-से-कम दो घंटे पहले दें और लेटने से पहले उससे पेशाब करने को कहें। रात में एक बार बच्चे को जगाएं और पेशाब कराएं।
यद्यपि यह बीमारी काफी असुविधाजनक साबित हो सकती है, लेकिन इससे पीड़ित बच्चे को डांटने-फटकारने या चिढ़ाने से उसे कुछ भी फायदा नहीं पहुंचेगा, उल्टे नुकसान ही होगा -- उसमें मानसिक ग्रंथि विकसित हो जाएगी। आवश्यकता इस बात की है कि उसकी तकलीफ को ठीक प्रकार से समझा जाए और उसे अपनी बीमारी से उभरने में मदद दी जाए। वैसे भी यह बीमारी बच्चे के बड़े हो जाने पर अपने आप ही दूर हो जाती है, जब उसके मूत्राशय की नीड़ियों का विकास पूरा हो जाता है ।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
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Tuesday, May 19, 2009
खून की कमी और उसका इलाज
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में हर साल एक लाख महिलाएं ऐनीमिया (खून की कमी) के कारण मरती हैं। भारत में महिलाओं का पोषण स्तर अत्यंत शोचनीय है और लगभग 83 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी की बीमारी से पीड़ित हैं। खून की कमी का मुख्य कारण शरीर में लौह तत्वों की कमी है। लोहा खून के हैमोग्लोबिन नामक पदार्थ के बनने के लिए आवश्यक है। यही हैमोग्लोबिन आक्सीजन का वाहक होता है और खून को लाल रंग देता है। हैमोग्लोबिन कम होने से शरीर को आक्सीजन कम मिलती है और आक्सीजन के अभाव में शरीर शर्करा और वसा का दहन करके ऊर्जा नहीं बना पाता। इसीलिए खून की कमी से पीड़ित महिलाएं अत्यधिक थकान महसूस करती हैं। एक अध्ययन से ज्ञात होता है कि कम खून वाली महिलाएं 7-8 मिनट से अधिक समय के लिए निरंतर श्रम नहीं कर पातीं।
एक स्वस्थ व्यक्ति के खून के हर 100 मिलीलिटर में 15 ग्राम हैमोग्लोबिन होता है। चूंकि यही हैमोग्लोबिन शरीर में आक्सीजन का वाहक है, वह श्वसन और पाचन की क्रियाओं को ठीक प्रकार से अंजाम देने के लिए बहुत आवश्यक होता है। हैमोग्लोबिन कम होने से चेहरा मुरझाया-मुरझाया सा रहता है और असमय ही शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। कम हैमोग्लोबिन का एक अन्य लक्षण है, खून का धीमी गति से जमना। घाव भी हैमोग्लोबिन के अभाव में अधिक धीरे भरते हैं। कमजोर दृष्टि और याददाश्त, सांस फूलना, सिर-दर्द और मायूसी का एहसास (डिप्रेशन) ऐनीमिया की कुछ अन्य निशानियां हैं।
शरीर में लोहा कम होने का मुख्य कारण कुपोषण है। समृद्ध वर्गों में यह अत्यधिक संसाधित भोजनों के उपोयग से या डायटिंग के कारण होता है। निर्धन वर्गों में इसका मुख्य कारण है कम भोजन खाना। यद्यपि लोहा स्वयं शरीर को ऊर्जा नहीं देता, पर वह ऊर्जा पैदा करनेवाली प्रक्रियाओं को संचालित करता है और ऊर्जा पैदा करने के लिए आवश्यक पदार्थों के अवशोषण को सुगम बनाता है। शरीर के लिए लोहे को आत्मसात करना अत्यंत कठिन होता है। एक दिन में औसत स्वास्थ्य का व्यक्ति केवल 2 मिलीग्राम लोहा ही आत्मसात कर सकता है। सौभाग्य से शरीर से लोहा उतनी आसानी से छीजता भी नहीं है। शरीर में लोहे की कमी एक लंबे समय तक उचित या पर्याप्त भोजन न मिलने से अथवा चोट, शल्य-क्रिया आदि के कारण शरीर से बहुत अधिक खून बह जाने से होता है।
खून और लोहे की कमी वयस्क महिलाओं और बड़ी लड़कियों में अधिक देखी जाती है क्योंकि उनमें मासिक स्राव के समय शरीर से नियमित रूप से बहुत अधिक खून निकल जाता है। इस खून की भरपाई यदि पौष्टिक भोजन से न हो, तो शरीर में लोहे का अकाल पड़ जाता है। गर्भस्थ शिशु भी अपनी माता के शरीर से बहुत अधिक मात्रा में लोहा खींच लेता है। इसी प्रकार स्तनपान करानेवाली महिलाएं, यदि पौष्टिक भोजन न करें, तो खून की कमी की चपेट में आ जाती हैं। आजकल की फैशन-परस्त महिलाएं टीवी और पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों की दुबली-पतली माडलों की देखा-देखी डायटिंग में कुछ अति कर बैठती हैं, जिससे भी वे कुपोषण के घेरे में आ जाती हैं। भारत में अधिकांश लोग अंडरवेट हैं, खासकरके महिलाएं, यानी वे मोटापे की नहीं, दुबलेपन की शिकार हैं। उन्हें डायटिंग की नहीं बल्कि अच्छे पौष्टिक भोजन की जरूरत है। परंतु विदेशी विज्ञापनों की नकल पर बने देशी विज्ञापन दुबली-पतली माडलों का इस्तेमाल करके जाने-अनजाने भारतीय दर्शकों को गुमराह करते हैं। विदेशों के समृद्ध समाजों में लोग आवश्यकता से अधिक भोजन करके मुटापे की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। वहां दुबलेपन का गुण गानेवाले विज्ञापन शायद प्रासंगिक हो सकते हैं, पर यहां नहीं।
खून की कमी का एक अन्य कारण मानसिक तनाव और चिंता है। तनाव-ग्रस्त व्यक्ति में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल कम बनता है। यह अम्ल पाचन में तथा लोहे और अन्य जरूरी तत्वों के अवशोषण में सहायक होता है। कुछ प्रकार की दवाइयां आंतों में मौजूद उपयोगी जीवाणुओं को मार देती हैं। ये जीवाणु पाचन में तथा विटामिन, लोहे तथा अन्य खनिजों के अवशोषण में मदद करते हैं। सभी विटामिनों में विटामिन ई का अवशोषण कुछ प्रकार के दवाओं के सेवन से सर्वाधिक प्रभावित होता है। विटामिन ई की कमी भी खून की गुणवत्ता को घटा देती है।
सिगरेट-बीड़ी और तंबाकू के सेवन से और शराब पीने से भी ऐनीमिया बढ़ती है।
खून की कमी का एक ही इलाज है, बेहतर भोजन और लोहा-युक्त दवाइयों का सेवन। गेहूं और पूर्ण चावल में लोहे की मात्रा अधिक होती है। सब्जियों में बंध गोभी, गाजर, लाल शलजम, टमाटर और पालक में लोहे का तत्व अधिक होता है। सेब, केला, खजूर और आड़ू जैसे फल भी अच्छी मात्रा में लोहा उपलब्ध कराते हैं। इन सब पदार्थों के सेवन के अलावा लोहे के बर्तनों में खाना पकाने से भी खाने में लोहांश आता है। इसलिए लोहे के तवे, करछुल, कड़ाही, कटोरे, चम्मच, खरल और मूसल का अधिक उपयोग करें। आजकल स्टेनलेस स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों का चलन हो जाने से अधिकांश लोग लोहे के एक महत्वपूर्ण स्रोत से वंचित हो रहे हैं।
हैमोग्लोबिन के निर्माण के लिए थो़ड़ी मात्रा में तांबा भी आवश्यक होता है। यह तांबा अखरोट और बादाम में काफी मात्रा में पाया जाता है। तांबा शरीर द्वारा लोहे के अवशोषण में भी मदद करता है। हैमोग्लोबिन के निर्माण के लिए विटामिन बी-12 और फोलिक अम्ल भी आवश्यक हैं।
अन्य उपयोगी भोज्य पदार्थों में शामिल हैं आम, किशमिश, अंकुरित मूंग, तिल के दाने, चना, राजमा, गन्ने और अनार का रस, गुड़, दही, पनीर, लहसुन आदि। रोज सुबह एक कटोरा अंकुरित मूंग खाया जाए तो शरीर में खून के निर्माण में तेजी आ सकती है। इसी प्रकार काले तिल, गुड़ और दूध को एक साथ पीसकर आधा कप रोज सेवन करने से काफी लाभ मिलता है। रोज सुबह खाली पेट पर दो कप गाजर और पालक का रस पीने से ऐनीमिया के मरीजों को राहत हो सकती है।
आयुर्वेद में खून की कमी के निराकरण के अनेक प्रभावशाली उपचार हैं। लाभकारी आयुर्वेदिक दवाओं में शामिल हैं, च्यवनप्राश, शतवारी और अश्वगंधा। ये दवाएं हजारों सालों से हमारे समाज में प्रचलित रही हैं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
लेबल: स्वास्थ्य
Monday, May 18, 2009
क्या आप सांस की दुर्गंध से परेशान हैं?
सांस से बदबू आना एक ऐसी असुविधाजनक बीमारी है जिसके बड़े ही अटपटे सामाजिक परिणाम होते हैं। उसके कारण व्यक्ति को काफी मानसिक क्लेश भी सहना पड़ता है और उसमें हीन ग्रंथि भी पनप सकती है। कई बार यह बीमारी सामाजिक सफलता में बाधक भी बन सकती है।
हमारा मुंह वास्तव में अनेक प्रकार के जीवाणुओं का जंगल होता है। ये जीवाणु दांतों के पोरों में और जीभ, मसूढ़े आदि में अटके हुए भोजन के कणों पर जीवित रहते हैं। इनमें से बहुत से जीवाणुओं के क्रियाकलापों से ऐसी गैसें प्रकट होती हैं, जो दुर्गंधयुक्त होती हैं। इन्हीं गैसों के कारण हमारी सांस बदबूदार हो जाती है। तब फिर हर व्यक्ति के मुंह से दुर्गंध क्यों नहीं आती, और हम कभी-कभार ही इस बीमारी का शिकार क्यों बनते हैं, हर समय क्यों नहीं? इसका उत्तर सरल है। हमारे मुंह में जो लार निरंतर बनती रहती है, उसमें जीवाणुनाशी शक्ति होती है। लेकिन जब किसी कारण से मुंह में कम लार बनती है या लार सूख जाती है, तब ये जीवाणु बेकाबू हो जाते हैं, और तब सांस दुर्गंधयुक्त हो जाती है। मसलन जब हम सोते हैं, तो लार का प्रवाह धीमा पड़ जाता है और जीवाणु इसका लाभ उठाकर पनपने लगते हैं। सुबह उठने पर मुंह से बदबू आने का यही कारण है। भूख-प्यास, सिगरेट-शराब पीना, अत्यधिक बात करना, बंद नाक के दौरान मुंह से सांस लेना -- इन सबके कारण मुंह सूख जाता है और सांस दूषित हो जाती है। तनाव भी मुंह सूखने का एक कारण है।
उम्र के साथ शरीर के अधिकांश अंगों की कार्यक्षमता घटने लगती है। लार पैदा करने वाली ग्रंथियां भी इसका अपवाद नहीं हैं। यही वजह है कि युवाओं की तुलना में बुजुर्ग कहीं अधिक दुर्गंधयुक्त सांस की समस्या से पीड़ित होते हैं। शिशुओं में लार की प्रचुरता रहती है, इसलिए उनकी सांस एक विशिष्ट भीनी मीठी गंध लिए रहती है।
मुंह सूखने से उठी सांस की दुर्गंध आसानी से दूर की जा सकती है। आपको बस इतना करना है जिससे आपके मुंह की लार-ग्रंथियां पुनः सक्रिय हो उठें। इसके लिए आप मिसरी चूसें या पान खाएं या एक गिलास पानी ही पी लें, तुरंत आपके मुंह की दुर्गंध चली जाएगी। खाना खाने से भी मुंह की दुर्गंध दूर हो जाती है, क्योंकि खाते समय मुंह में बहुत अधिक लार बनती है, जो मुंह के अधिकांश जीवाणुओं को नष्ट कर देती है या उन्हें भोजन के साथ पेट के अंदर बहा ले जाती है।
दांतों को मांजने से भी सांस की दुर्गंध से निजात मिल जाती है क्योंकि यह अनेक दुर्गंधजनक जीवाणुओं को साफ कर डालता है, विशेषकर तब जब जीभ, तालू और गालों के भीतरी भाग और मसूढ़ों को भी साफ किया जाए क्योंकि इन जगहों में भी बहुत से जीवाणु छिपे रहते हैं।
मुंह की दुर्गंध से पीड़ित लोगों को माउथवाश से मुंह धोने की सलाह दी जाती है, पर अनेक परीक्षणों से सिद्ध हो चुका है कि इससे कुछ भी लाभ नहीं होता। माउथवाश बस इतना फायदा करता है कि वह सांस की दुर्गंध पर अपनी सुगंध का मुलम्मा चढ़ा देता है, पर यह प्रभाव भी एक घंटे से ज्यादा नहीं रहता। कुछ माउथवाशों के बारे में यह दावा किया जाता है कि उनमें जीवाणुओं को मारने की क्षमता होती है, पर उनसे उल्टा प्रभाव ही पड़ता है क्योंकि उनमें जो जीवाणुनाशी पदार्थ होता है, वह अलकहोल होता है, जो मुंह को और अधिक सुखा देता है।
मुंह से दुर्गंध आने का एक अन्य कारण आपके द्वारा खाई गई कुछ चीजें होती हैं, जैसे लहसुन। लहसुन खाने के बाद उसके गंध-यौगिक खून के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जहां से निःश्वास की हवा को दूषित करते हैं।
आहार संबंधी दूषित सांस का कोई पक्का उपचार नहीं है। बस आपको गंध के अपने आप खत्म होने की प्रतीक्षा करनी है। खाने के साथ खूब पानी पीने से कुछ मदद मिल सकती है। कुछ लोगों में पाचन की गड़बड़ी के कारण भी सांस की दुर्गंध हो सकती है। हमारे पेट में ऐसे जीवाणु होते हैं जो पाचन के दौरान पैदा हुई दुर्गंधयुक्त वायु को नष्ट करते हैं। कुछ लोगों में ये जीवाणु नहीं होते, जिससे उनकी डकार में यह दुर्गंधयुक्त वायु बाहर निकलती रहती है।
सांस की दुर्गंध कुछ बीमारियों का संकेत भी हो सकती है। उदाहरण के लिए जब साइनस की बीमारी होती है, तो सांस से दुर्गंध आने लगती है। साइनस के कारण व्यक्ति की नाक अवरुद्ध हो जाती है और वह मुंह से सांस लेने लगता है। इससे मुंह सूख जाता है और जीवाणुओं को पनपने का अवसर मिल जाता है।
कुछ प्रकार की दवाइयां खाने से भी सांस की दुर्गंध बढ़ जाती है। इन दवाइयों में शामिल हैं प्रशांतक, मूत्रवर्धक एवं रक्तचापहारी दवाएं। ये लार के प्रवाह को भी कम कर देती हैं, जिससे जीवाणुओं को बढ़ने का मौका मिल जाता है।
यद्यपि सांस की बदबू हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा को काफी नुक्सान पहुंचा सकती है, उसका उपचार आसान है, यानी मुंह की स्वच्छता बरतना और मुंह को सूखने से बचाना। अतः यदि आपकी सांस से बदबू आती हो, तो दिन में दो-तीन बार दांतों, जीभ एवं मसूढ़ों को साफ करें। यदि मुंह सूख रहा हो तो तुरंत पानी पी लें या कोई खाने की चीज मुंह में डाल कर चबाने लग जाएं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 7 टिप्पणियाँ
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