Tuesday, July 28, 2009

अकबर की मृत्यु

अभी कुछ दिन पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनावली पढ़ रहा था। हिंदी का प्रारंभिक इतिहास आंखों के सामने किसी चलचित्र के समान गुजरता गया। इस रचनावली में महावीर प्रसाद की कई महत्वपूर्ण रचनाएं सम्मिलित हैं, जैसे उनका अर्थशास्त्रीय ग्रंथ "संपत्तिशास्त्र" जो संभवतः हिंदी का प्रथम अर्थशास्त्रीय ग्रंथ है। इस पुस्तक में द्विवेदी जी ने दिखाया है कि किस तरह अंग्रेजी राज भारत को खोखला कर रहा था।

रचनावली में द्विवेदी द्वारा संपादित प्रसिद्ध और ऐतिहासिक पत्रिका "सरस्वती" के लिए उनके द्वारा लिखे गए संपादकीय लेख और अन्य टिप्पणियां भी संकलित की गई हैं। इन टिप्पणियों में ज्ञान-विज्ञान और मनोरंजन की बहुत सारी बातें विद्यमान हैं। बानगी के तौर पर यहां एक छोटी टिप्पणी दे रहा हूं, जिसका संबंध अकबर की मृत्यु से है।

अकबर की मृत्यु के संबंध में एक जनशृति प्रचलित है। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में वह अपने उपद्रवकारी उमरावों को विष की गोलियां दे देकर मारने लगा था। एक ही तरह की गोलियां उसके पास खाने की चीज के बहाने आती थीं। पर कुछ में विष रहता था, कुछ में नहीं। इस भेद को अकबर जानता था, और लोग नहीं। जिसे मारना होता था, उसे वह विष वाली गोली अपने हाथ से देता था और वैसी ही निर्विष गोली वह खुद उसके सामने खाता था। एक बार उसने सिंध में थत्ता नामक रियासत के गवर्नर गाजीखां को इस तरकीब से मारना चाहा। पर गलती से गोलियां बदल गईं और विषाक्त गोली खाकर अकबर ने अपने ही हाथ से अपनी हत्या कर ली। कई अंगरेज ग्रंथकारों ने यह बात लिखी है। टाड साहब ने बूंदी के इतिहास में मानसिंह के संबंध में ऐसी ही घटना का उल्लेख किया है।

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