Saturday, March 21, 2009

वोट के बदले क्या दोगे?

चुनाव आ रहा है और पार्टी कार्यकर्ता वोट मांगने आपके द्वार पर भीड़ लगा रहे हैं। यही मौका है उनसे पूछने के लिए कि हिंदी के लिए आप क्या कर रहे हैं और लोक सभा-विधान सभा-पंचायत-नगरपालिका में पहुंचकर हिंदी के लिए आप क्या करने का इरादा रखते हैं।

क्या आपकी पार्टी अगले पांच वर्षों में हिंदी प्रदेशों में शत-प्रतिशत साक्षरता लाने की गारंटी दे सकती है? प्राथमिक शिक्षण के लिए बजट में राष्ट्रीय आय का 25 प्रतिशत या उससे ज्यादा के आवंटन का आश्वासन दे सकती है? हिंदी के त्वरित विकास के लिए हिंदी प्रदेशों में शत-प्रतिशत साक्षरता लाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे लोग अधिक संख्या में हिंदी पुस्तकें, अखबार आदि पढ़ेंगे। इससे हिंदी जनता अधिक प्रबुद्ध और समझदार बनेगी और अपने अधिकारों और दायित्वों को बेहतर रूप से पहचानेगी। उसे स्वास्थ्य, रोजगार, कला, संस्कृति आदि के बारे में पुस्तकों, अखबारों आदि से बेहतर जानकारी मिलेगी, जिससे उसका जीवन स्तर और आमदनी में सुधार आएगा। समस्त विश्व में देखा गया है कि जहां महिलाएं साक्षर हों, वहां बाल मृत्यु दर, प्रसव के दौरान माता की मृत्यु की दर, जन्म के समय बच्चों का वजन कम होना, आदि नकारात्मक सामाजिक सूचकों में भारी गिरावट आती है। यह भी देखा गया है कि यदि माता पढ़ी-लिखी हो, तो बच्चे पेचिस, दस्त, पोलियो, टीबी आदि घातक बीमारियों से बचे रहते हैं अथवा इनके लगने पर बच्चों की देखरेख ठीक तरह से होती है, क्योंकि माताएं डाक्टरों द्वारा बताए गए निर्देशों का बेहतर रीति से पालन कर पाती हैं और दवा की शीशियों में छपे निर्देशों को और सरकार द्वारा चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों के पोस्टरों, पुस्तिकाओं आदि में दी गई जानकारी को पढ़कर समझ लेती हैं और उनका अनुसरण कर पाती हैं।

साक्षरता जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। वोट मांगने आया उम्मीदार इसकी व्यवस्था के लिए क्या करने का विचार रखता है? क्या वह हर गांव में हिंदी पुस्तकालय स्थापित करने का वादा कर सकता है? केवल वादा करना काफी न होगा। एक पुस्तकालय स्थापित करने में भवन, मेज-कुर्सी, कंप्यूटर, पुस्तकें आदि में कम-से-कम 50 लाख रुपए की लागत आएगी, उसके बाद पुस्तकालय के कर्मियों का वेतन, हर साल नए पुस्तकें खरीदने का खर्च आदि के रूप में कम से कम 5 लाख रुपए का आवर्ती खर्च आएगा। समस्त हिंदी भाषी प्रदेश में लगभग 4,00,000 गांव हैं। इसलिए समस्त हिंदी प्रदेश में पुस्तकालयों की जाल बिछाने के लिए 2 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी। आवर्ती खर्च अलग। इस पैसे की व्यवस्था उम्मीदार कैसे करेगा? निजी क्षेत्रों का योगदान प्राप्त करने से सरकार पर इसका भार कुछ कम हो सकता है। क्या उम्मीदवार की पार्टी ऐसी किसी योजना पर विचार कर रही है, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से सभी गांवों में एक उच्च स्तरीय पुस्तकालय स्थापित की जा सके? उम्मीदवार से इस तरह की योजना के ब्योरे समझाने के लिए कहना चाहिए। मान लेते हैं कि आप चुनाव जीतकर आते हैं, और आपकी पार्टी मई में सत्ता पर काबिज हो जाती है। तो आप कितने दिनों में इस योजना को लागू करना शुरू करेंगे? यदि पांच सालों में 4,00,000 पुस्तकालय स्थापित करने हों, तो हर साल लगभग 30,000 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे, हर महीने 2,500 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे, हर दिन लगभग 100 पुस्तकालय स्थापित करने होंगे।

उम्मीदवार के सामने इस तरह के आंकड़े गिनाने से उसे एहसास होगा कि चुनाव में खड़ा होना केवल अपनी जेबें भरने का उद्यम नहीं है, बल्कि उसके साथ कुछ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हुई हैं।

हिंदी प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का हाल बेहाल है। कई गांवों में स्कूल तक नहीं हैं। जहां स्कूल हैं, वहां स्कूल के लिए भवन नहीं हैं, पेड़ों के नीचें कक्षाएं चलती हैं। सरकारी अध्यापक तन्खाह तो लेते हैं, पर पढ़ाते नहीं है, इसके बजाए कहीं गांव में दुकान खोलकर बैठे होते हैं, या अन्य किसी काम में लगे रहते हैं। इनको अनुशासित कैसे किया जाएगा? आपकी पार्टी का इसके बारे में क्या सोच है? जरा समझाइए। मां-बांप लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते, कुछ रूढ़िवादिता के कारण, कुछ आर्थिक तंग-हाली के कारण। लड़कियों में शत-प्रतिशत भर्ती लाने के लिए आपकी कोई योजना है?

उच्च शिक्षा की समस्या यह है कि वह अंग्रेजी-परस्त है। इसलिए हिंदी भाषियों के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के द्वार बंद हैं, चाहे वे साधारण से कालेज-विश्वविद्यालय हों, या आईआईटी-आईआईएम सरीखे विश्व-स्तरीय संगठन। इनके द्वार हिंदी भाषियों के लिए खोलने के लिए आप क्या करनेवाले हैं? क्या आप ऐसा कानून बनाएंगे, और उसका क्रियान्वयन करेंगे, कि सभी उच्च शिक्षा संस्थाओं में शिक्षण का माध्यम हिंदी हो? क्या आप अपने पांच साल के कार्यकाल में आईआईटी-आईआईएमों का शिक्षण माध्यम हिंदी करवा पाएंगे?

प्राथमिक शिक्षा अब एक फलता-फूलता व्यवसाय बनता जा रहा है। अब गांवों तक में अंग्रेजी माध्यम के नर्सरी-किंटरगार्टन स्कूल खुलने लगे हैं। यहां सभी शिक्षा-शास्त्रियों और विद्वानों की सलाह का उल्लंघन करते हुए, 4-5 साल के बच्चों को एक विदेशी भाषा सिखाई जाती है। यह उम्र मातृभाषा, यानी हिंदी, पर अच्छी पकड़ प्राप्त करने की होती है क्योंकि बच्चे 5 वर्ष की उम्र में अपनी अधिकांश भाषाई क्षमता अर्जित करते हैं। इन बहुमूल्य वर्षों में उन्हें हिंदी न पढ़ाकर उन्हें उम्र भर के लिए भाषाई दृष्टि से पंगु बनाया जा रहा है। चूंकि अंग्रेजी हमारे देश के लिए विदेशी भाषा है और इन स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ानेवालों तक को ढंग की अंग्रेजी नहीं मालूम होती है, ये बच्चे कभी अंग्रेजी नहीं सीख पाते हैं, और हिंदी से भी वंचित रह जाते हैं, क्योंकि इन स्कूलों में हिंदी को प्रवेश ही नहीं है। शिक्षा के नाम पर इस घोटाले को रोकने के लिए आपकी पार्टी क्या करेगी? क्या वह यह कानून बनाएगी, कि प्राथमिक शिक्षण के लिए हिंदी ही माध्यम रखी जा सकती है, और अंग्रेजी माध्यम से प्राथमिक शिक्षण में संलग्न स्कूलों को बंद करवाएगी?

यदि उपर्युक्त कदम आप उठाते हैं, तो निहित स्वार्थों की तरफ से बहुत ही बड़ा बवाल मचेगा। अंग्रेजीदां लोग, बड़े-बड़े उद्योगपति जो अपना व्यवसाय अंग्रेजी के माध्यम से चलाते हैं, शिक्षा उद्योग में जिन लोगों ने भारी पैसा लगा रखा है, वे सब, आपके खून के प्यासे हो जाएंगे। आप उनसे कैसे निपटेंगे? कहीं उनसे रिश्वत आदि लेकर आप हथियार तो नहीं डाल देंगे?

चुनाव के दौरान हमें पार्टियों और उनके नेताओं से ऐसे सवाल पूछने चाहिए। चुनाव के बाद हमें इस पर निगरानी रखनी चाहिए कि जीतकर आई पार्टियां और उनके नेता उपर्युक्त नीतियों, कानूनों, योजनाओं और कार्यक्रमों को कहां तक लागू करते हैं। इससे उनके इरादों, निष्पादन आदि का सही मूल्यांकन हो सकेगा और अगले चुनाव में इनके रिपोर्ट कार्ड के अनुसार इन्हें वोट देना संभव हो सकेगा।

जनता को ऊपर बताई गई योजनाओं, नीतियों और कानूनों की सूची रखनी चाहिए और चुनावी पार्टियों को उनसे अवगत करना चाहिए। यह काम चुनाव के बहुत पहले ही होना चाहिए, ताकि ये विषय चुनावी मुद्दे बन सकें। इसके लिए जनता को अपने में से जानकार लोगों को चुनकर विस्तृत जन-कल्याणकारी योजनाओं का ब्योरा तैयार कराना चाहिए, ताकि नेताओं से उन पर अमल कराया जा सके।

अन्य गुट, जैसे उद्योगपति, विदेशी सरकारें, विदेशी कंपनियां, आदि ऐसा ही करते हैं। जब पार्टियां उनसे चुनाव के लिए पैसे मांगने जाती हैं, चेक पर हस्ताक्षर करने से पहले, ये सब सरकार से अपनी मांगें पेश करते हैं – कि हमें सरकारी नीतियों-कानूनों में यह-यह परिवर्तन चाहिए, करों में इतनी कटौती चाहिए, हमारे कारखाने तक सड़क या रेल बिछाई जाए, यहां बंदर बनवाया जाए, ताकि हमारे उत्पादों के निर्यात में आसानी हो, इत्यादि। कई तो आधा अभी, आधा काम होने के बाद की शर्त भी रखते हैं, यानी आधा पैसा अभी लो और आधा पैसा चुनाव जीतकर आने के बाद, हमारी मांगें पूरी करने के बाद, ले जाओ।

इसलिए पार्टियां और नेता गण इनकी मांगें पूरी करने में तत्पर रहते हैं, पर चूंकि जनता इस तरह की शर्तें नहीं रखती, इसलिए उसकी कोई भी मांगें पूरी नहीं की जातीं। अन्यथा ऐसा क्यों है कि आजादी के साठ साल बाद भी देश में व्यापक गरीबी, निरक्षरता, कुस्वास्थ्य, कुशासन आदि हैं, जबकि हमारे ही देश के साथ-साथ आजाद हुआ चीन महाशक्ति बन गया है और वहां पूर्ण साक्षरता, आदि के लक्ष्य कब के प्राप्त कर लिए गए हैं? साठ साल बाद भी ऐसा क्यों है कि हमारे न्यायालयों, उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी दफ्तरों में अब भी अंग्रेजी चल रही है, जबकि मूल संविधान में 15 सालों में अंग्रेजी हटाने की बात कही गई थी?

कारण साफ है, नेताओं और पार्टियों ने उद्योगपतियों, विदेशी ताकतों, विदेशी कंपनियों आदि के एजेंडा को आगे बढ़ाने की ओर ज्यादा ध्यान दिया है, जनता के हित के लिए काम करने की ओर कम। अब समय आ गया है कि हम भी अपने हित की योजनाओं की मांग करें। हम अपनी मांग पैसे के बल पर नहीं मनवा सकते, वोट के बल पर शायद मनवा लें। (समाप्त)

1 Comment:

अक्षत विचार said...

बहुत सुन्दर लेख लिखा है सर आपने बिल्कुल सरल और सीधी भाषा में न कोई घुमाव न कोई कठिन मुहावरों का प्रयोग और चुनाव में जिन मुद्दों को उठाया जाना चाहिये वो आपने बताये पर मुझे शक है कि आप कि इस राय का किसी पर कोई असर होगा। आजकल लोग भावनाओं की कमाई खाते है। खैर सबसे बड़ी बात हिन्दी के प्रति आपकी दीवानगी। आमतौर पर हम उत्तर भारतीय दक्षणि भारतीयों को हिंदी विरोधी मानते हैं। हालांकि मुझे पक्का तो नहीं पता क्यों कि आपके प्रोफाइल में आपके बारे में कुछ जानकारी नहीं मिली परंतु आपका नाम देखकर लगा कि आप दक्षणि भारतीय हो सकते हैं। मेरे एक और जानने वाले हैं श्रीनिवास कृष्णन वे भी दक्षणि भारतीय है परंतु कट्टर हिंदी समर्थक हैं।
साधुवाद..

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट