Saturday, August 15, 2009

शहीद खुदीराम बोस


आज यदि हम स्वतंत्र हवा में सांस ले पा रहे हैं, तो यह उन अनेक वीर भारतवासियों की बदौलत है जिन्होंने अपने वतन को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा दी थी। उनमें से एक अमर शहीद खुदीराम बोस थे। आइए आज, 15 अगस्त के दिन उन्हें याद कर लेते हैं। आज से 4 दिन पहले, यानी 11 अगस्त को, 1908 में अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर लटका दिया था, पर वे हमेशा भारतवासियों के हृदयों में बने रहेंगे।

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खुदीराम बोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है। अपनी निर्भीकता और मृत्यु तक को सोत्साह वरण करने के लिए वे घर-घर में श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं।

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। जब वे बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने उनका लालन-पालन किया था। 1905 में बंगाल का विभाजन होने के बाद वे देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे। उन्होंने अपना क्रांतिकारी जीवन सत्येन बोस के नेतृत्व में शुरू किया था।

1906 में वे पहली बार गिरफ्तार हुए लेकिन पुलिस-हिरासत से बच निकले थे। इसके बाद 1907 में उन्होंने अपने साथियों के साथ हाटागाछा में डाक थैलों को लूटा और दिसंबर 1907 में गवर्नर की विशेष रेलगाड़ी पर बम फेंका। मिदनापुर के क्रांतिकारियों के बीच वह एक साहसी और सक्षम संगठनकर्ता के रूप में जाने जाते थे।

उन दिनों किंग्सफोर्ड कलक्ता का चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट था। वह अपनी कठोर दमनकारी कार्रवाइयों से राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए कुख्यात था। क्रांतिकारियों ने उसे वहां से भगाने या खत्म करने का निर्णय किया और यह काम खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपा गया। 13 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस ने प्रफुल्ल चाकी के साथ एक ऐसे वाहन पर बम फेंका जिसमें किंग्सफोर्ड के होने की संभावना थी। दुर्भाग्य से उस बम कांड में किंग्सफोर्ड के स्थान पर दो अंग्रेज महिलाएं मारी गईं जो उस वाहन में सफर कर रही थीं। प्रफुल्ल चाकी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उन्होंने खुद को गोली मार ली। खुदीराम को अगले दिन गिरफ्तार किया गया। उन्होंने निर्भीक होकर पुलिक को बताया कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को दंड देने के लिए बम फेंका था। उन्हें मौत की सजा दी गई और 11 अगस्त, 1908 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। मुजफ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस "एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़ा था"। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।

3 Comments:

गिरिजेश राव, Girijesh Rao said...

ये जवानी जिन्दाबाद !
जय हिन्द

अनुनाद सिंह said...

महान भारतभक्त को शत्-शत् नमन् !

सुना है कि उन्हें फांसी पर चढ़ाये जाने के बाद बंगाल में एक विशेष तरह की धोती पहनने का प्रचलन हुआ जिसके किनारे 'खुदीराम' अंकित होता था।

farhaan khan said...

about of islam

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