गरमियां शुरू हो गई हैं और देश के अनेक भागों में धूल की आंधियां उड़ने लगी हैं। धूल की आंधियां तब प्रकट होती हैं जब ठंडी, अस्थिर वायु की बड़ी परतें सूखी, रेतीली जमीन की सतह पर तेजी से बहने लगती हैं। गरमियों में ऐसी जमीन बहुत अधिक गरम हो जाती है और उसके ऊपर की वायु उठने लगती है। यह गरम वायु 10 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाती है। इस कारण जमीन के ऊपर निम्न दाब का विस्तृत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। यदि आस-पास में कहीं ठंडी वायु मौजूद हो, तो वह इस रिक्त स्थान की ओर बह चलती है। वायु का प्रवाह सतह के ऊपर ही रहता है क्योंकि अधिक ऊंचाई पर गरम वायु मौजूद रहती है। जमीन की सतह पर यदि वनस्पति का आवरण न हो और मिट्टी ढीली हो, तो वह वायु प्रवाह के साथ उड़ चलती है।
भारत में धूल की आंधियां मानसून के पूर्व के महीनों में प्रकट होती हैं। राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में अप्रैल-मई में धूल की प्रचंड आंधियां उठती हैं। इन क्षेत्रों में साल में दस-बारह आंधियां आती हैं। गरमियों में यहां अधिकतम तापमान 45 अंश सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इन विस्तारों के ऊपर के वायुमंडल में एक-दो किलोमीटर की ऊंचाई तक नमी बहुत कम होती है। वायुमंडल के इस शुष्क परत के ऊपर जब नम वायु का दखल होता है, तो तड़ित-झंझा उत्पन्न होती है, जिसके फलस्वरूप वर्षा होने लगती है। परंतु वर्षा बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले ही भाप बनकर उड़ जाती हैं और जमीन तक पहुंचती है केवल बूंदों के चारों ओर की शीतल वायु। जब ये वायु-पुंज रेतीली जमीन से टकराते हैं तो धूल के छोटे-छोटे गुबार ऊपर उठते हैं। इस समय यदि तेज सतही हवा बह रही हो तो वह धूल को भी अपने साथ उड़ा ले जाती है।
ऐसी आंधियां सामान्यतः दोपहर के कुछ ही बाद प्रकट होती हैं। इनकी शुरुआत ठंडी हवा के रह-रहकर बहनेवाले झोंकों से होती है। बाद में ये झोंके सम्मिलित होकर तेज पवन के रूप में बहते हैं। धूल का जो विशाल गुबार उठने लगता है, वह आसमान में 4 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। आंधी 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ती है और पवनों का वेग 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकता है। प्रचंड आंधियों में धूल इतनी उड़ती है कि दिखाई देना बिलकुल बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति 2-3 घंटों तक रहती है। आंधी के बाद तापमान में गिरावट आती है। कभी-कभी तापमान 15 अंश सेल्सियस तक गिर जाता है। इस कारण से लोगों को आंधी के बाद काफी राहत मिलती है।
आंधी के दौरान भारी मात्रा में मिट्टी के कणों का बड़ी दूरियों तक स्थानांतरण हो जाता है। अध्ययनों से पता चला है कि बड़े रेगिस्तानों में उठती आंधियों में 10 करोड़ टन धूल हजारों किलोमीटर दूर पहुंच जाती है। महाद्वीपों से कोसों दूर तैर रहे जलपोतों में धूल वृष्टि होने लगती है।
इस प्रकार भारी मात्रा में धूल के स्थानांतरण से सूखे की स्थिति को प्रोत्साहन मिलता है और रेगिस्तान का विस्तार होता है। रेत कृषि योग्य भूमि, फल बागान, आबादीवाले स्थल आदि को ढक देती है। प्रचंड आंधियों से वायु प्रदूषण भी बढ़ जाता है क्योंकि भारी मात्रा में कणिकीय सामग्री हवा में मिल जाती है। ये निलंबित अवस्था में वायुमंडल में बहुत समय तक बने रहते हैं। इनके कारण वायुमंडल की प्रकाशीय विशेषताओं में भी परिवर्तन आ जाता है, जो जलवायु को प्रभावित कर सकता है। धूल का बादल सौर विकिरण को भूमि तक पहुंचने नहीं देता। धूल कण या तो उसे अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं अथवा स्वयं सोख लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का विकिरण संतुलन बिगड़ जाता है।
धूल की आंधियों की विनाश-लीला को टालने का सर्वोत्तम उपाय खुली जमीन पर वनस्पति उगाना है। वनस्पति की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं और आंधियों में मिट्टी के कण उड़ने नहीं पाते।
Thursday, May 14, 2009
धूल की आंधियां
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
लेबल: मौसम
Wednesday, May 13, 2009
बाल मजूरी -- राष्ट्र पर एक कलंक
बाल मजूर उस बच्चे को कहते हैं जिसकी उम्र 4-14 वर्ष के बीच होती है और जो परिवार के भीतर अथवा बाहर श्रम करता है। इस श्रम के बदले उसे पैसा कभी-कभी मिलता है, पर बुहत बार उससे मुफ्त में ही श्रम करा लिया जाता है। साफ शब्दों में कहें तो बाल मजूर वह बच्चा है जिससे शिक्षा का अधिकार और बचपन छीना जा रहा है।
बाल मजूर कई प्रकार के होते हैं। सबसे पहले हमारे ध्यान में वे बच्चे आते हैं जो कारखानों में, कर्मशालाओं में, खानों-खदानों में, खेतों में और मध्यमवर्गीय घरों में काम करते हैं। फिरोजाबाद के कांच बनानेवाले कारखानों में 10-14 वर्ष की उम्रवाले लगभग 50,000 बच्चे काम कर रहे हैं। इन कारखानों में कांच की चूड़ियां बनाई जाती हैं। भट्टियों का तापमान 700-1400 डिग्री सेलसियस होता है। बच्चे लोहे के बड़े-बड़े सलाखों से भट्टी की टंकी से पिघला कांच निकालते हैं और उसे फुंकनी से चूड़ियां बनानेवाले कारीगरों तक ले जाते हैं। उन्हें भागकर इन कारीगरों तक जाना पड़ता है, ताकि कांच ठोस न हो जाए। भागते समय दुर्घटनाएं आमतौर पर होती हैं। कारखाने का वातावरण इतना प्रदूषित होता है कि उनमें 3-4 साल काम करने पर बच्चों के फेफड़े खराब हो जाते हैं। अगली बार जब आप किसी विशेष अवसर पर कांच की चूड़ियां पहनें, तो इन मासूम बच्चों को भी याद कर लें।
मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले की स्लेट काटनेवाली इकाइयों में बच्चे विद्युत-चालित आरियों से स्लेट को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटते हैं। इससे जो महीन स्लेट कणों की धूल उनके चारों ओर उड़ती है, वह उनके फेफड़ों में पहुंचकर उन्हें धीरे-धीरे सिलिकोसिस नामक जानलेवा बीमारी का शिकार बना देती है। जिस व्यक्ति को यह बीमारी हो जाए, उसे सांस लेने में तकलीफ होती है और थूक के साथ खून आने लगता है। बारह या उससे भी कम उम्र के बच्चे सिलिकोसिस से मरते अपने मां-बाप, भाई-बहन आदि को सहारा देने के लिए स्लेट काटने के काम में लगते हैं और स्वयं इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। तमिलनाडु के शिवकाशी के दियासलाई कारखानों में छोटे-छोटे बच्चे बायलररूम में जहरीले रसायनों को मिलाने का काम करते हैं। उन्हें जहरीले धुंए एवं भीषण गरमी का सामना करना पड़ता है। आग का खतरा तो सदा ही बना रहता है। अलीगढ़ के ताला बनानेवाले काखानों में, मोरादाबाद के पीतल के बर्तन बनानेवाले कारखानों में और महाराष्ट्र के दहानु के गुब्बारे बनानेवाले कारखानों में भी सैंकड़ों बाल मजूर काम करते हैं।
बाल मजूरों का दूसरा वर्ग सड़कों में रहनेवाले बच्चे हैं, जिसके अंतर्गत जूते चमकानेवाले बच्चे, कचरा बीननेवाले बच्चे, अखबार बेचनेवाले बच्चे और भिखमंगे बच्चे शामिल हैं। इनकी समस्या कारखानों आदि में काम करनेवाले बच्चों से कुछ भिन्न है। मुख्य अंतर यह है कि कारखानों आदि में काम करनेवाले बच्चों के पास शाम को लौटने के लिए ऐसा कोई स्थान होता है जिसे वे घर कह सकते हैं, परंतु सड़कों में रहनेवाले बच्चों का कोई घर नहीं होता। वे उन लोगों की दया पर टिके होते हैं जो उन्हें काम देते हैं। वे ढाबों, बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों, पुलों या सड़कों पर ही रह लेते हैं। वे निरंतर जगह बदलते रहते हैं। आमतौर पर उन्हें पुलिस, चोर-उचक्के और नशीली दवाएं बेचनेवाले अपराधी बहुत सताते हैं। उनकी समस्या कारखानों आदि में काम करनेवाले बच्चों से कहीं अधिक विकट होती है।
बंधुवा बाल मजूरों का भी एक बड़ा वर्ग है। इन्हें इनके माता-पिताओं ने चुकाए न जा सकनेवाले कर्जों के बदले कर्जदाता परिवारों के पास गिरवी रख दिया होता है, या इन्हें अपने माता-पिता द्वारा लिए कर्जों को अपना श्रम देकर चुकाने के लिए मजबूर किया गया होता है। ऐसे बंधुआ मजूर मुख्यतः ग्रामीण इलाकों में होते हैं, पर कुछ शहरी मध्यमवर्गीय गृहणियां भी उन्हें रखती हैं। इन बंधुआ बाल मजूरों की मदद करना सबसे मुश्किल होता है क्योंकि सब-कुछ गुप-चुप ढंग से होता है। यदि ढाबा मालिक ने इन बच्चों को खरीद लिया है तो वे भाग नहीं सकते। यदि मध्यवर्गीय गृहणी ने उनके माता-पिता को उनका पारिश्रमिक अग्रिम दे दिया है, तो वे अपने घर नहीं लौट सकते और पूरी अवधि घरेलू कामों में लगाए रखे जाते हैं। यदि जमींदार ने उन्हें कर्ज के बदले गिरवी रख लिया है, तो वे उम्र भर उसकी कैद में रहते हैं या तब तक जब तक कि उनके स्वयं बच्चे नहीं हो जाते जिनको गिरवी रखकर वे अपने-आपको छुड़ा न लें।
बंधुआ बाल मजूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उनसे दिन में 9-10 घंटे काम कराया जाता है और रात को उन्हें कमरे में कैदियों के समान बंद रखा जाता है। जो बच्चे भागने की कोशिश करते हैं उन्हें क्रूरतापूर्वक मारा जाता है। कई बार उन्हें गरम लोहे से दागा जाता है।
गिरवी रखे जाते समय वे 4-5 साल के ही होते हैं। इन नादान बच्चों को दिन भर काम करने की आदत ही नहीं होती है, वे तो अभी-अभी अपनी मां की गोद से उतरे होते हैं। उनसे दिन भर काम लेने के लिए उनके मालिकों को उन्हें बहुत मारना पड़ता है। कई बार छड़ी की मार से उनकी उंगलियों की हड्डियां टूट जाती हैं।
स्वयं अपने परिवारों में मजूरी करनेवाले बच्चों की स्थिति सबसे विवादास्पद है क्योंकि बहुत से लोग उन्हें बाल मजूर स्वीकारते ही नहीं हैं। वे कहते हैं कि यदि ये बच्चे स्वयं अपने ही माता-पिता के धंधे में या खेत में हाथ बंटा रहे हों, तो उन्हें बाल मजदूर नहीं माना जा सकता। परंतु जो बच्चे पढ़ाई छोड़कर दिन में 12-14 घंटे काम में घुटते रहते हों, उनकी हालत बाल मजूरों से कुछ भी भिन्न नहीं है।
भारत की आबादी का 42 प्रतिशत बच्चे हैं और उनमें से आधी लड़कियां हैं। इनमें से 40 प्रतिशत 0-14 वर्ष की आयुवर्ग में आती हैं। घरेलू कामों में मदद देने के अलावा वे दियासलाई, रस्सी, ताला, बीड़ी आदि बनानेवाले कारखानों में काम करती हैं। बहुत सी लड़कियां मध्यमवर्गीय घरों में झाड़ू-पोंछा लगाना, बर्तन मांजना, शहरी कचरे में से बिकाऊ वस्तुएं बीनना, अखबार बेचना आदि काम भी करती हैं।
5-6 साल की बालिकाएं 10 घंटे रोज काम करती हैं। 4 साल की उम्र में ही कुछ लड़कियां बीड़ी बनाने के काम में लगा दी जाती हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि तमिलनाड के तिरुनेलवेली के एक गांव में जितने भी बीड़ी मजूर हैं, उनमें से आधे मजूरों ने 5-10 साल के बीच काम करना शुरू किया था। बाकी मजूरों ने 11-15 वर्ष में। शिवकाशी के दियासलाई कारखानों में काम कर रहे 90 प्रतिशत मजूर 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियां हैं। लड़कियों को अपने मां-बांप द्वारा किए गए भेदभाव का भी शिकार होना पड़ता है। लड़कों को स्कूल भेज दिया जाता है और लड़कियों को काम पर लगा दिया जाता है।
लड़कियों से हर दिन एक निश्चित संख्या में बीड़ी बनाने को कहा जाता है। यदि वे नहीं बनातीं तो उन्हें उनकी माएं बहुत मारती हैं। कई बार मार से बचने के लिए वे पेशेवर बीड़ी बनानेवालों से बीड़ी उधार लने लगती हैं। इसके अनेक दारुण परिणाम निकलते हैं। एक 12 साल की लड़की पर काफी उधार चढ़ गया था। जब उधार देनेवाले को पता चला कि वह उधार लौटा नहीं सकती, तो उसने लड़की के मां-बाप से पैसे मांगे। लड़की को अपने मां-बांप से मार पड़ने की आशंका हुई। उसने जंगल में जाकर एक जहरीला पौधा खाकर आत्महत्या कर ली।
आजकल बच्चों का, विशेषकर लड़कियों का, यौन शोषण भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। जहां भी बच्चे काम करते हैं -- कारखाने, सड़कें, मध्यमवर्गीय शहरी परिवार, बसस्टैंड आदि-आदि --वहां उनका यौन शोषण भी होता है। वे अपना बचाव करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। गांवों में ऐसे बिचौलिए घूमते रहते हैं जो निर्धन परिवारों को कर्ज देते हैं। बाद में यह कर्ज चुकाए न जाने पर वे परिवार की बेटी को गिरवी मांग लेते हैं। इन लड़कियों को बाद में व्यावसायिक वैश्यालयों को बेच दिया जाता है। इन अभागी लड़कियों की स्थिति सभी बाल मजूरों में से सबसे अधिक दयनीय होती है।
बाल मजूरी के संबंध में कई बार कहा जाता है कि वह गरीबी का परिणाम होता है, परंतु इसका ठीक उलटा ही सच है -- बाल मजूरी से गरीबी बढ़ती है। इसके अनेक कारण हैं। पहला, कम अथवा बिना मजूरी के काम करनेवाले बाल मजूरों के कारण मजूरी की दर इतनी गिर जाती है कि वयस्क मजूरों को दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। दूसरा, कम उम्र में ही काम में लग जाने से बच्चे न तो पढ़-लिख पाते हैं या ऐसी कुशलताएं अर्जित कर पाते हैं जो उन्हें बड़ा होने पर अधिक मुनाफेदार रोजगार दिला सके। तीसरा, कठोर श्रम एवं शोषण से उनका स्वास्थ्य टूट जाता है जिससे वे बड़ा होने पर साधारण श्रम करने के भी काबिल नहीं रहते और वे गरीबी के दलदल में और अधिक धंस जाते हैं। ऐसे मजदूर गरीबी के दुश्चक्र से निकलने के लिए स्वयं अपने बच्चों को बाल मजूरी के चूल्हे में झोंक देते हैं क्योंकि उनके पास जिंदा रहने के लिए और कोई उपाय नहीं रहता। इससे बाल मजूरी का अभिशाप पीढ़ी दर पीढ़ी उनका पीछा करता है। बाल मजूरी को गरीबी का परिणाम बतानेवाले लोग यह भी तर्क करते हैं कि गरीब परिवारों के लिए बच्चों द्वारा कमाया गया पैसा महत्वपूर्ण होता है। परंतु अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है कि बच्चों की कमाई उनके परिवार की कुल कमाई का एक अल्पांश ही होती है।
मासूम बच्चों से श्रम कराना मानव-प्रकृति एवं नैतिकता का घोर उल्लंघन है। आज भारत परमाणु बम, लंबी दूरी तक मार करनेवाले प्रक्षेपास्त्र, अंतरिक्ष उपग्रह आदि उन्नत प्रौद्योगिकियों में पारंगत होकर विश्व को यह दिखाने में लगा है कि वह भी विकसित देशों की पांती में बैठने के काबिल हो गया है। लेकिन बाल मजूरों का कलंक उसके विकसित देश होने के दंभ को झुठला देता है। अतः भारत के कर्णधारों को अब ईमानदार प्रयत्न करके बाल मजूरी के अभिशाप को जल्द से जल्द मिटाना चाहिए। इसका सबसे कारगर तरीका तो यह लगता है कि सभी बच्चों को स्कूल भेजने की पूरी व्यवस्था की जाए क्योंकि वे ही बच्चे मजूरी करते पाए जाते हैं जो स्कूल नहीं जाते। माता-पिताओं के लिए कानूनन यह जरूरी बना देना चाहिए कि वे अपनी ल़ड़कियों और लड़कों को उचित समय पर स्कूल भेजें और पूर्ण शिक्षण अवधि तक उन्हें स्कूलों में ही रखें।
माता-पिताओं को बच्चों को स्कूल भेजने की प्रेरणा देने के लिए बच्चों को स्कूलों में मुफ्त में भोजन, दूध, दवाएं आदि देने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे बच्चों का स्वास्थ्य भी सुधरेगा। तमिलनाड, केरल आदि दक्षिणी राज्यों में इन तरकीबों को अपनाकर लगभग शतप्रतिशत साक्षरता प्राप्त की जा सकी है। दूसरी ओर व्यापक गरीबी के कारण देश में पर्याप्त अन्न होने के बावजूद लोग भूखे रहते हैं क्योंकि उनके पास अन्न खरीदने का पैसा नहीं है। विडंबना तो यह है कि करोड़ों की तादाद में भूखे लोगों के रहने के बावजूद सरकारी गोदामों में अन्न सड़ता रहता है या चूहों की भेंट चढ़ जाता है। स्कूली बच्चों को मुफ्त में भोजन देकर सरकारी गोदामों में ठुंसे अन्न का बेहतर उपयोग हो सकता है और बाल मजूरी की समस्या भी दूर की जा सकती है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
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Tuesday, May 12, 2009
पानी -- जीवन का आधार
पानी से कौन नहीं परिचित है। कितने ही कामों के लिए हम उसका उपयोग करते हैं। प्यास लगने पर पानी पीते हैं, भोजन उससे पकाते हैं और कपड़े उसीसे धोते हैं। खेती में और पालतू पशुओं को भी पानी की जरूरत होती है। कारखानों और उद्योगों में भी पानी काम आता है। इन कार्यों के लिए पानी का उपयोग करते वक्त हम उसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता का लाभ उठाते हैं -- उसकी सर्वविलायिकता का। पानी ऐसा तरल है जिसमें हर वस्तु घुलती है। बहते पानी से बिजली पैदा की जाती है।
वस्तुतः पानी एक यौगिक पदार्थ है जिसके प्रत्येक अणु हाइड्रोजन के दो परमाणुओं और आक्सीजन के एक परमाणु के मिलने से बना होता है। पानी एक तरल पदार्थ के रूप में सर्वाधिक परिचित है। परंतु वह उन गिनी-चुनी वस्तुओं में से एक है जो प्राकृतिक रूप में अन्य दो अवस्थाओं में भी पाई जाती हैं, यानी ठोस और गैसीय अवस्थाओं में। ठोस अवस्था में पानी हिम या ओले बनकर गिरता है, पहाड़ियों की चोटियों में जमा होता है, हिमानियों के रूप में बहता है और ठंडे इलाकों में झीलों और तालाबों की सतह को सर्दियों में ढकता है। गैसीय अवस्था में उसे हम हवा की आर्द्रता, मेघ, कुहरा, धुंध आदि में महसूस कर सकते हैं।
आप सोचते होंगे कि पानी की आवश्यकता पीने, नहाने और दैनंदिन की विभिन्न गतिविधियों के लिए ही होती है जिनका हमने ऊपर जिक्र किया। परंतु क्या आपको मालूम है, हमारे शरीर का 65 प्रतिशत पानी से बना हुआ है? पानी शरीर के भीतर कई रासायनिक क्रियाओं को सफल बनाता है। जब आंख में धूल चली जाती है, तो कुछ ग्रंथियां एक तरल पदार्थ छोड़ती हैं, जिसमें पानी का अंश काफी अधिक होता है। यह तरल धूल को आंख से बहा ले जाता है। गरमी लगने पर शरीर से पसीना निकलता है, जिससे ठंडक महसूस होने लगती है। पसीना पानी ही होता है, जिसमें शरीर में बने कुछ मलिन पदार्थ भी घुले हुए होते हैं। इस तरह पसीना बहाकर शरीर शीतल ही नहीं होता, उसे मलिन पदार्थों से छुटकारा भी मिलता है। जो भोजन हम खाते हैं उसमें मौजूद पोषक तत्व और हमारे फेफड़ों द्वारा अवशोषित आक्सीजन शरीर के कोने-कोने तक रक्त द्वारा पहुंचाया जाता है। रक्त पानी से ही बना होता है।
पृथ्वी पर जीवन एक-कोशिकीय जीव के रूप में सर्वप्रथम पानी में प्रकट हुआ। करोड़ों वर्षों में यह सरल जीव अन्य जटिल प्राणियों में परिवर्तित हुआ। कालांतर में इनमें से कुछ तटीय इलाकों में और बाद में ठोस जमीन पर रहने लगे। हमारे चारों ओर जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की जो विवधता नजर आती है, वह इन्हीं आदिम स्थल-जीवों की उपज है। स्थल पर रहते हुए भी इन प्राणियों के जीवनयापन के लिए पानी की उपलब्धता अनिवार्य है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। उसके प्राचीनतम निवास-स्थल पानी के स्रोतों के आसपास ही हुआ करते थे। संसार के पुराने-पुराने शहर नदी तटों पर बनाए गए। ऐसी नदियों में सिंधु, गंगा, नील, ह्वेंग हो आदि के नाम लिए जा सकते हैं।
पानी के बिना तो जीवन असंभव है। वह जीवन का आधार है। चूंकि पानी इतना मूलभूत पदार्थ है, हमारे पूर्वजों ने उसे पंचभूतों में गिना।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 1 टिप्पणियाँ
लेबल: विविध
Sunday, May 10, 2009
संगीत से इलाज
यदि पौधों को संगीत सुनाया जाए, तो उनकी बढ़त अधिक होती है। गाएं संगीत सुनाने पर अधिक दूध देती हैं। यदि घुड़शाला में संगीत प्रसारित करने की व्यवस्था हो, तो घोड़े दौड़ में अधिक चुस्ती दिखाते हैं। रोते बच्चे संगीत सुनकर चुप हो जाते हैं और उन्हें नींद आ जाती है। गर्भस्थ शिशु भी संगीत सुनकर शांत हो जाते हैं।
अनेक वैज्ञानिक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि संगीत हमारे शरीर की अनेक क्रियाओं पर, यहां तक कि मस्तिष्क के काम करने पर भी, प्रभाव डालता है। उदाहरण के लिए संगीत रक्तचाप, दिल के धड़कने की गति, सांस लेने की गति, खून में हार्मोनों के स्तर आदि को प्रभावित करता है।
संगीत हमें उदास भी बना सकता है, और डरा भी सकता है। डरावनी फिल्मों और दुखांत नाटकों में भय और उदासी का भाव संगीत के उपयोग से भी जगाया जाता है। संगीत हमें शांत भी कर सकता है, उदाहरण के लिए मंत्रों का उच्चारण, सुगम संगीत आदि। वह हमें उत्तेजित भी कर सकता है, जैसे पोप संगीत। वह हममें उमंग भर सकता है और हमारी चेतना को ऊपर उठा सकता है, जैसे भक्ति संगीत।
यह अनेक डाक्टरों का निजी अनुभव रहा है, विशेषकर मायूसी, सिरदर्द, चिंता, घबराहट आदि के मरीजों के संबंध में, कि उचित प्रकार के संगीत का उपयोग करने पर रोगियों को कम मात्रा में औषधियां देकर ही ठीक किया जा सकता है। समूह गान में हिस्सा लेकर रोगी मायूसी (डिप्रेशन) से राहत महसूस कर सकते हैं। संगीत की क्षमता हमारे मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में होती है, जबकि बोलने की क्षमता बाएं हिस्से में। अतः मस्तिष्क को आघात लगने पर कई बार रोगी बोलने की क्षमता तो खो देता है, पर गा सकता है।
संगीत कैंसर के मरीजों में या शल्यक्रिया के बाद महसूस होनेवाले तीखे दर्द को कम कर सकता है। प्रसव के कष्टों को भी संगीत आसान बना सकता है। यह देखा गया है कि जिन अस्पतालों में प्रसव-कक्ष में धीमा संगीत बजाने की व्यवस्था हो, वहां प्रसव के दौरान डाक्टरों को कैंची का उपयोग कम करना पड़ता है।
संगीत के साथ-साथ व्यायाम करना और भी अधिक गुणकारी है। कई लोग व्यायाम करने से कतराते हैं, लेकिन संगीत की लय पर शरीर को हिलाने में उन्हें आनंद आता है। वजन घटाने के कार्यक्रमों में और विद्यालयों में संगीत के साथ व्यायाम कराया जाता है।
मनुष्य लय और ताल से प्रभावित होनेवाला प्राणी है। मानव-शरीर स्वयं भी एक लय-ताल से संचालित होता है, जैसे दिल के धड़कने का ताल और सांसों की लय।
संगीत चिकित्सा एक प्राचीन विधा है और भारत जैसे देशों में उसका सैंकड़ों सालों से उपयोग होता आ रहा है। संगीतज्ञ बताते हैं कि आनंद भैरवी राग सुनने से रक्तचाप कम होता है। इसी प्रकार अमृतवर्षा राग वर्षा करा सकता है। नीलांबरी राग नींद ला सकता है। अस्पतालों में रोगियों को मीठी नींद में सुलाने के लिए इस राग का उपयोग किया गया है और इसके अच्छे परिणाम देखे गए हैं।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 2 टिप्पणियाँ
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Saturday, May 09, 2009
जयहिंदी का बच्चा
लीजिए अब होने लगे हैं ब्लोगों के भी बच्चे!
इस नवजात ब्लोग को आपके हाथों थमाए दे रहे हैं। सभालिए इसे, और आपके प्यार और दुलार से यह खूब फले-फूले।
बात यह है कि मैंने बच्चों के लिए उपयोगी हो सकनेवाली काफी रचनाएं समय-समय पर लिखी हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपती रही हैं। इन सबको यदि ब्लोगजगत में ले आया जाए तो बच्चों के लिए काफी रोचक सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। पर इन्हें जयहिंदी में भरना मुझे उचित नहीं जान पड़ा, जयहिंदी को मैं अधिक प्रौढ़ विषयों के लिए अलग रखना चाहता हूं। इसलिए एक नया ब्लोग शुरू करना पड़ा। और कोई नाम नहीं सूझा, तो कर दिया उसका नामकरण, बाल जयहिंदी।
वैसे भी ब्लोग जगत में बालोपयोगी ब्लोग कम संख्या में हैं। इसलिए ब्लोग पाठकों को बच्चों का यह नया ब्लोग नहीं अखरना चाहिए, बल्कि मुझे तो आशा है कि वे इसे संरक्षण देंगे।
यदि आपके घर बच्चे हों, तो उन्हें जरूर इस नए ब्लोग की जानकारी दें। यदि वे पढ़ेंगे, तभी यह प्रयास सफल होगा। आप भी जरूर पढ़ें, कोई मनाही नहीं है, पर आपके लिए तो जयहिंदी, केरल पुराण, प्रिंटेफ-स्कैनेफ भी तो हैं! कुछ ही दिनों में कुछ और ब्लोग भी आपको अर्पित करनेवाला हूं, आप बचकर कहां जाएंगे!
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: विविध