Wednesday, January 07, 2009

ओलिंपिक में भारत का निराशाजनक प्रदर्शन

सौ करोड़ की आबादी और दिखाने के लिए केवल एक रजत पदक। यह है भारत के खेल प्रदर्शन की सचाई। पर ऐसा क्यों है?

पिछले एक हजार सालों में आजादी के बाद के पचास एक वर्षों को छोड़कर भारत विदेशी शासन के अधीन रहा है। इन विदेशियों के हाथों भारतीयों की दुर्दशा हुई है, आर्थिक ही नहीं, सामाजिक, धार्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी। पिछली शताब्दी के प्रारंभिक दिनों में बंगाल, बिहार आदि में जो भयंकर अकाल पड़ा और जिसमें लाखों भारतीय भुखमरी से मरे, वे इसका प्रमाण है। आज भी यत्र-तत्र उड़ीसा, बिहार, आंध्र प्रदेश आदि देश के गरीब इलाकों से भुखमरी के समाचार मिलते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस देश में अन्न का संकट है और आबादी के एक बहुत बड़े भाग को भरपेट खाना नसीब नहीं हो पाता। जो देश अपने नागरिकों को भोजन जैसी मूलभूत जरूरत तक न मुहैया कर सकता हो, वह ओलिंपिक में पदक क्या जीतेगा।

यह अन्न संकट और गरीबी इस देश में कई पीढ़ियों से विद्यमान है, जिसका अर्थ है कि भारत का आम नागरिक अपनी कई पीढ़ियों से गरीबी और कुपोषण के शिकार रहा है। इसका उसकी शारीरिक क्षमता पर अवश्य ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों से इसके अनेक प्रमाण भी मिलते हैं। जहां समृद्ध देशों में मनुष्य की आयु 75 वर्ष या उससे अधिक है, भारत में मनुष्य की औसत आयु 58 वर्ष ही है। जहां विश्व के सभी समृद्ध देशों में महिलाएं पुरुषों से अधिक समय के लिए जीती हैं, भारत में इससे ठीक उल्टी स्थिति पाई जाती है, यानी यहां महिलाओं की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से कम है। यह तथ्य महिलाओं के स्वास्थ्य के संबंध में कितनी गहरी टिप्पणी करता है। ये महिलाएं जो कुपोषण, खून की कमी, शोषण, अशिक्षा और बीमारी के जुए तले जीने को मजबूर हैं, क्या ओलिंपिक चैंपियनों को पैदा कर सकती हैं? जब तक भारत में महिलाओं की स्थित नहीं सुधरेगी, ओंलिंपिक ही नहीं अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भी भारत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकेगा।

इसी प्रकार के कुछ अन्य चिंताजनक आंकड़े भी गिनाए जा सकते हैं, जो सब आम भारतीय नागरिक के स्वास्थ्य की बुरी हालत को स्पष्ट करते हैं। ऊंची बाल मृत्युदर, जन्म के समय बच्चों का कम वजन, स्त्री और पुरुषों की संख्या में भारी असंतुलन (पंजाब और हरियाणा में तो प्रति हजार पुरुषों के पीछे मात्र 785 महिलाएं ही हैं), समाज में फैली विषमताएं आदि कुछ ऐसी वस्तुस्थितियां हैं जिनके रहते भारत ओलिंपिक जैसी प्रतियोगिताओं में विजय नहीं पा सकता।

भारत का एक औसत नागरिक कम वजनवाला (विश्व के अन्य मनुष्यों की तुलना में), कम शिक्षित, अत्यंत गरीब और हीन मानसिकता वाला होता है। वह कैसे विश्व के उन्नत देशों के नागरिकों का मुकाबला कर सकता है?

यह समस्या का एक पक्ष है। कहा गया है कि जहां चाह है वहां राह है और इन सब बाधाओं के होते हुए भी प्रतिभाशाली खिलाड़ी इस देश में भी पैदा हुए हैं और ईश्वर की कृपा से या अन्य अनुकूल संयोगों से उच्च क्षमता की संभावना प्रदर्शित किया है। क्या हमने ओलिंपिक के प्रारंभिक वर्षों में लगभग 30 सालों तक हाकी का स्वर्ण पदक लगातार नहीं जीता है? क्या हमारे देश में भी पी टी उषा, लिएंडर पिएस और अब राठौर जैसे विजेता खिलाड़ी नहीं हुए हैं। पर इन्हें भी देश की भ्रष्ट एवं सत्तालोलुप खेल प्रणाली मात दे देती है। इन खिलाड़ियों को इस प्रणाली से पहले भिड़ना पड़ता है और उनकी सारी शक्ति इस प्रणाली को हराने में ही खर्च हो जाती है।

जिस देश में खेल मंत्री का पद एक 75 वर्ष के बूढ़े फिल्म अभिनेता के जिम्मे हो जिसने शायद ही कभी अपनी जिंदगी में किसी खेल प्रतियोगिता में भाग लिया हो, वहां विश्व स्तर के खिलाड़ी कैसे पैदा हो सकते हैं? यही हाल खेल विद्यालयों, प्रशिक्षण संस्थाओं और चयन करने वाली समितियों की है। वहां सब राजनीति का बोलबाला है और वे सब सत्ता की उठा-पटक के अखाड़े हैं। वहां सब एक अलग ही प्रकार का खेल चलता है।

इन संस्थाओं से हम कैसे आशा कर सकते हैं कि वे सही खिलाड़ियों का चुनाव करेंगे और चुने गए खिलाड़ियों के समुचित विकास का प्रबंध करेंगे?

एक अन्य समस्या अर्थाभाव की है। भारत अब भी एक निर्धन देश है और उसके सामने खेल के सिवा अनेक अन्य प्राथमिकताएं भी हैं। ऐसे में खिलाड़ियों के पर्वरिश के लिए वह अधिक धन व्यय नहीं कर सकता । आजकल खेल एक फलता-फूलता व्यवसाय हो गया है। हमारे ही देश में क्रिकेट का ही उदाहरण ले लीजिए। आज क्रिकेट के साथ इतना पैसा जुड़ गया है कि एक सफल खिलाड़ी एक-दो साल में ही करोड़पति हो जाता है। ऐसे में खेल में सफल होने के लिए विश्व के उन्नत राष्ट्र पैसा पानी की तरह बहा देते हैं। वहां के खिलाड़ियों को आधुनिकतम से आधुनिकतम सुविधाएं, प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने का भरपूर अवसर आदि आसानी से मिल जाते हैं। चीन, रूस आदि देशों में तो प्रतिभा संपन्न खिलाड़ियों को छोटी उम्र में ही पहचान लिया जाता है और उन्हें अलग प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। भारत के लिए यह सब करना संभव नहीं है।

उपर्युक्त सभी कारणों से ही भारत का ओलिंपिक्स में प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। पर ऐसा क्या किया जाना चाहिए कि कम से कम आगामी ओलिंपिक्सों में भारत का प्रदर्शन बेहतर रहे? ओलिंपिक्स एक प्रकार से विश्व के देशों की भीतरी स्थिति, उनके नागरिकों के स्वास्थ्य, समृद्धि एवं शारिरिक क्षमता की स्पर्धा है। जो देश अधिक उन्नत होगा, जिसके नागरिक अधिक स्वस्थ, शिक्षित एवं ताकतवर होंगे, वे ही विजयी बनेंगे। इसलिए भारत को ओलिंपिक्स में अधिक पदक जीतने के लिए अपने नागरिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं समृद्धि की ओर अधिक ध्यान देना होगा। तभी भारत में विश्वविजयी खिलाड़ी जन्म लेंगे। एक दूसरे स्तर पर खेल महकमे को भी सुधारना होगा। उसे नेताओं और सत्ता के दलालों से मुक्त करके पेशेवरीय खेल प्रबंधकों, प्रशिक्षकों और स्वयं खिलाड़ियों के हवाले करना होगा। खिलाड़ियों की पहचान कम उम्र में ही कर लेनी चाहिए और उन्हें उचित प्रशिक्षण, खान-पान और सभी आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए। खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। आजकल क्रिकेट को छोड़कर बाकी सभी खेलों के खिलाड़ियों को ऐसे अवसर बहुत कम मिल पाते हैं। देश को खिलाड़ियों का समुचित सम्मान करना चाहिए और उनके भरण-पोषण की पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए। आखिर वे देश के एक प्रकार के हीरो हैं, उसी प्रकार के जैसे स्वतंत्रता सेनानी। उन्होंने भी देश का नाम ऊंचा करने के कार्य में सर्वस्व लुटा दिया है।

जब देश का हर नागरिक स्वस्थ, शिक्षित तथा अपनी पूर्ण क्षमता तक विकसित होने लगेगा, तब भारत भी चीन, अमरीका, रूस आदि देशों के समान ओलिंपिक्स में पदकें जीतने लगेगा।

(यह लेख 2004 के ओलिंपिक्स के बाद लिखा गया था। उस समय सुनील दत्त खेल मंत्री थे। आप देखेंगे कि 2008 में भी स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है।)

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