Saturday, May 09, 2009

गरमी से बचिए

नीचे दिए गए घरेलू नुस्खों से पंखों और कूलरों को अधिक कार्यक्षम बनाएं और गरमी से बचें।

  • पानी के वाष्पन से ठंडक लानेवाले कूलर उन क्षेत्रों में अधिक कारगर होते हैं जहां हवा में नमी की मात्रा कम हो। परंतु उनके ठीक प्रकार से काम करने के लिए कमरे में उनके ठीक सामने हवा की निकासी के लिए मार्ग होना चाहिए, जो खिड़की आदि के रूप में हो सकता है। इस पर एक्जोस्ट पंखा लगा देने से और भी अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

  • कूलर के पंखे के चारों ओर लगी खसखस की जाली में कहीं भी रिक्त स्थान नहीं होना चाहिए। जाली की सतह समान रूप से गीली रहनी चाहिए। यदि कूलरों में ऐसा पंप लगा हो जो निरंतर चलता रहता हो, तो इससे कमरे में उमस की मात्रा बहुत बढ़ जाएगी। इसलिए पंप के साथ टिंबर स्विच फिट करके देखिए। इस उपकरण से पंप दो-चार मिनट चलकर अपने-आप बंद हो जाएगा, और कुछ देर बाद पुनः चालू हो जाएगा। इस प्रकार के स्विच को फ्रिज आदि में काम करते आपने देखा होगा। इससे कमरा उमसभरा होने से तो बचेगा ही, पानी और बिजली की खपत भी घटेगी।

  • छत पर लटकाए जानेवाले बिजली के पंखे तभी कारगर होते हैं जब उनके फलकों और छत के बीच में आधे मीटर का फासला हो। यदि इससे कम फासले पर पंखे लटकाए जाएं, तो पंखे के कारण कमरे में हवा का ठीक संचरण नहीं होगा और पंखे के ठीक नीचे बैठे लोगों को ही हवा लगेगी। यदि आपके घर में छत बहुत नीची हो तो छत पर लटकाए जानेवाले पंखों के स्थान पर टेबल फैन अथवा पेडेस्टल फैन का उपयोग करें।

Thursday, May 07, 2009

ओपरेशन ब्लैकस्टार

सन 2031 के दिसंबर का एक दिन।

डरबन एयरलाइंस की विशाल राकेटयान में एक आरामदायक सीट पर बैठा मैं अपने कंप्यूटर पर इंटरनेट की सहायता से भारत की राजधानी नागपुर से प्रकाशित होनेवाले देश के सबसे बड़े अखबार हिंद समाचार के पृष्ठ खोले हुए था। तभी यान की सुंदर, सांवली परिचारिका ने यात्रियों को अफ्रीका की संपर्क भाषा स्वाहिली में और फिर हिंदी में बारी-बारी से संबोधित करते हुए कहा, "हम कुछ ही देर में भारत की राजधानी नागपुर के हवाई अड्डे पर उतरने वाले हैं। आप सब कृपा करके सुरक्षा पेटियां पहन लें। नागपुर में इस समय सुबह के ठीक नौ बज रहे हैं और दिन का तापमान 5 डिग्री सेलसियस है।"

मैंने कंप्यूटर बंद कर दिया और सुरक्षा पेटी पहन ली। तत्पश्चात अपनी जेब से टेलिविजनफोन निकालकर अपने घर का नंबर मिलाया। कुछ ही समय में फोन के स्क्रीन पर डरबन स्थित मेरे घर की बैठक का दृश्य धीरे-धीरे उभरा और मेरे पिताजी अपनी पसंदीदा आराम कुर्सी पर बैठे नजर आए। अपने फोन के स्क्रीन पर मेरा चेहरा देखकर वे मुस्कुराए और बोले, "सब कुशल तो है न बेटे, कहां से बोल रहे हो?"

उनका स्वस्थ, खुशनुमा, वयोवृद्ध चेहरा देखकर मैं आनंदविभोर हो उठा, "पापा मैं यान से ही बोल रहा हूं। चंद मिनटों में हम भारत पर उतरने वाले हैं। मैं तो बहुत ही उत्साहित हूं। अपनी जिंदगी में प्रथम बार अपने पूर्वजों की मिट्टी पर पदार्पण करने वाला हूं। यह मेरे लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा है। आप मेरी चिंता बिलकुल न करें, मैं समय-समय पर आपसे संपर्क करता रहूंगा।" इतना कहकर मैंने धीरे से फोन को मोड़कर बंद कर दिया। मेरे कानों में पिताजी की "अपना खयाल रखना बेटे" की ध्वनि गूंज रही थी।

रोकेटयान धीरे-धीरे जमीन की ओर उतरने लगा। यह यान भी विज्ञान की एक अद्भुत उपलब्धि है। हाइड्रोजन से चलने वाले इस विशाल यान को दक्षिण अफ्रीका के एक वैज्ञानिक संगठन ने इस सदी के प्रारंभिक वर्षों में विकसित किया था। विश्व भर में तेल के भंडार खाली होते जा रहे थे और हवाई जहाजों को चलाने के लिए वैकल्पिक ईंधन की खोज सभी उन्नत देशों में हो रही थी। इसमें दक्षिण अफ्रीका को सर्वप्रथम सफलता मिली। यह यान रोकट दागने की प्रौद्योगिकी पर आधारित है और इसमें तरल हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। यह ऊपरी वायुमंडल में उड़ान भरता है जहां वायुदाब और घर्षण कम होने से इसकी रफ्तार ध्वनि से कई गुना अधिक होती है। इसका आकार पेंसिल जैसा है और इसके पेट में एक साथ दो हजार आदमी समा सकते हैं। इनके अलावा यह कई हजार टन सामान भी ढो सकता है। इस तरह के विमानों के आ जाने से यातायात अत्यंत सरल और सस्ता हो गया है। इसका आविष्कार और आम उपयोग वैसा ही क्रांतिकारी था जैसा उन्नीसवीं सदी में रेल का आविष्कार था। इसने यातायात की परिकल्पना ही बदल कर रख दी। अब इस तरह के यान लगभग सभी देशों के एयरलाइनों ने अपना लिए हैं। इन विमानों को स्वाहिली भाषा में माबोंगो कहा जाता है, जिसका अर्थ है "गरुड़ राकेट"। यह शब्द अब लगभग सभी भाषाओं में प्रचलित हो गया है क्योंकि रोकेटयान इक्कीसवीं सदी की प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों का ज्वलंत प्रतीक है।

भारत की राजधानी नागपुर के हवाई अड्डे पर रोकेटयान से जब मैं उतरा तो मेरे रोम-रोम पुलकित हो रहे थे। अपने पूर्वजों की भूमि में मैं पहली बार आया था। दिसंबर 2031 की सर्द सुबह थी। मैंने अपने ओवरकोट को अपने शरीर पर और मजबूती से लपेट लिया और लौंज में जाकर अपना सामान ले आया।

हालांकि मेरे पूर्वज इसी देश के थे, पर मैं दक्षिण अफ्रीका का नागरिक था। इसकी कहानी भी लंबी है।

मेरे माता-पिता उन सहस्रों मध्यम वर्गीय भारतीयों में से एक थे जिन्हें सन 2000-2005 के उन काले दिनों में देश छोड़कर अन्यत्र बसना पड़ा था। विदेश में रहते हुए भी मेरे माता-पिता ने मुझमें अपने मूल देश के प्रति संवेदना कूट-कूट कर भर दी थी। उनके मन में अपने देश को लेकर एक बहुत गहरी लज्जा एवं वितृष्णा की भावना थी जिसे अनायास ही मैंने भी आत्मसात कर ली थी। मेरे माता-पता ने मुझसे अनेक बार ओपरेशन ब्लैकस्टार का जिक्र किया था, जिसने इस देश के इतिहास को ही बदलकर रख दिया था। वह उनकी जिंदगी की सबसे अहम घटना थी।

जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, अपने मूल देश के बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ी। यद्यपि मैं जन्म से दक्षिण अफ्रीका का नागरिक था, पर मेरे माता-पिता के भारतीय संस्कारों का भी मेरे विकास में एक बहुत बड़ा हाथ था। इन संस्कारों को समझे बगैर मैं स्वयं अपने आपको ठीक प्रकार से समझ नहीं सकता था। मैं भारत आया भी इसी उद्देश्य से था कि मैं अपने मूल देश को समझ सकूं। भारत आने के लिए मैंने जो अवसर चुना वह भी इस ओपरेशन ब्लैकस्टार से जुड़ा था। हर साल 23 दिसंबर को भारत अपनी दूसरी आजादी का पर्व मनाता था। इस वर्ष इस दूसरी आजादी की पच्चीसवीं जयंती थी और देश भर में समारोह हो रहे थे।

आज से ठीक पच्चीस साल पहले ओपरेशन ब्लैकस्टार को अंजाम दिया गया था, जिससे भारत को यह दूसरी आजादी हासिल हुई थी। मेरा इरादा था कि इन समारोहों में भाग लेकर मैं न केवल उस संस्कृति को ठीक प्रकार से समझूं जो मुझे घुट्टी में घुलाकर पिलाई गई थी बल्कि इस ओपरेशन ब्लैकस्टार के ऐतिहासिक महत्व के बारे में भी कुछ अधिक जानूं।

अगले ही दिन कुछ अन्य देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ मैं राजधानी नागपुर से दिल्ली रवाना हुआ, वही दिल्ली, जो पहले भारत की राजधानी हुआ करती थी, और जो उसी ओपरेशन ब्लैकस्टार में तबाह हो गई थी। हमारे गाइड ने इस नगर के इतिहास का विहंगम चित्र प्रस्तुत किया। मालूम पड़ा कि यह शहर हजारों साल पुराना था और वह सच्चे अर्थों में खंडहरों का शहर था। यहां महाभारत के कौरव-पांडवों से लेकर मुगल, मराठा, ब्रिटिश, नेहरू आदि अनेक राजवंशों ने शासन किया था और उन सबने भरपूर मात्रा में अपने भवनों और महलों के खंडहर छोड़े थे।

गाइड के साथ हम संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सर्वोच्च न्यायालय आदि के खंडहर देखने गए। सन 1947 को मिली प्रथम आजादी के बाद के लगभग पचपन वर्षों तक इस विशाल देश का शासन यहीं से होता रहा था। एक में प्रधान मंत्री और सांसदों का कार्यालय था, दूसरे में राष्ट्रपति का और तीसरे में देश के सर्वोच्च न्यायाधीश का। ओपरेशन ब्लैकस्टार से जुड़ी घटनाओं में ये तीनों ही संस्थाएं ध्वस्त हो गई थीं।

संसद भवन के खंडहरों से ही स्पष्ट हो रहा था कि अपने समय वह एक अत्यंत भव्य और कलात्मक इमारत रहा होगा। हमारे गाइड ने बताया कि वह सैकड़ों स्तंभों पर टिकी एक गोल इमारत थी, जिसे ब्रिटिश शासकों ने बनाया था। मेरे हाथ में जो सूचना पुस्तक थी, उसमें इस इमारत का एक चित्र था।

उसकी सहायता से मैं अपनी कल्पना की आंखों से इस खंडहर को अपने मूल रूप में देखने की चेष्टा करने लगा। एक समय इसकी दीर्घाओं और सभाकक्षों में देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की रौबीली आवाजें गूंजा करती होंगी। आज वहां कौओं की कांव-कांव और कुत्तों का रुदन ही सुनाई पड़ रहा था।

संसद भवन की टूटी-फूटी दीवारों पर कई जगह ओपरेशन ब्लैकस्टार के मूक गवाह स्वरूप टैंकों के गोलों के आघात से बने कोटर नजर आ रहे थे। सामने एक पट्ट पर पुरातत्व विभाग का एक नीला साइन बोर्ड लगा हुआ था जिसमें इस ऐतिहासिक खंडहर के बारे में कुछ जानकारी दी गई थी। मैं उठा और उस तक गया। उसमें संसद भवन और ओपरेशन ब्लैकस्टार का संक्षिप्त विवरण दिया गया था।

संसद भवन के विशाल खंभे इधर-उधर बिखरे पड़े थे। उनमें से एक पर बैठकर मैं इस भव्य खंडहर को बड़े गौर से देखने लगा। मेरे माता-पिता और उनकी पीढ़ी के करोड़ों लोगों के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रतीक रहा था। उनके इस देश से पलायन करने के पीछे भी इसका पराभव एक मुख्य कारण था। मेरे माता-पिता से जो संस्कार मुझे मिले थे, उसके जरिए यह खंडहर मेरी अपनी जिंदगी से भी जुड़ा था।

यह खंडहर एक प्रकार से मेरे माता-पिता की पीढ़ी की समस्त आशाओं, विश्वासों और सपनों का खंडहर था। उनके मन की कुंठा को मैंने भी अनायास ही अपने जेहन में उतार लिया था। इस कुंठा से मुक्ति पाने के लिए मेरे लिए यह आवश्यक था कि मैं संसद भवन के खंडहर में बदलने के पीछे की परिघटनाओं को, जिनमें से प्रमुख स्वयं ओपरेशन ब्लैकस्टार था, ठीक प्रकार से समझूं। इससे मुझे स्वयं अपने आपको समझने में भी मदद मिलेगी।

अपने भारत प्रवास के दौरान मैं बहुत से भारतीय इतिहासकारों, लेखकों, पत्रकारों, संपादकों आदि से मिला और उन सबसे ओपरेशन ब्लैकस्टार के बारे में पूछा। मैंने देखा कि वे सब उसकी जिक्र मात्र से लज्जा एवं अपराध बोध महसूस करते हैं। यह देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ, क्योंकि यही भाव मैंने अफ्रीका में बसे अपने माता-पिता की पीढ़ी के लोगों में भी देखा था। तो क्या जिस कुंठा से मैं और मेरे माता-पिता ग्रस्त थे, वह समस्त भारतवासियों को साल रही है?

इस सब खोजबीन से मुझे ओपरेशन ब्लैकस्टार और उससे जुड़ी घटनाओं की सही-सही जानकारी मिल गई...

ओपरेशन ब्लैकस्टार की पृष्ठभूमि की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थी सन 1999 में संसद द्वारा पारित किया गया वह विधेयक, जिसने सांसदों को देश के न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र से मुक्त कर दिया। अब किसी भी आपराधिक मामले में किसी विधायक के विरुद्ध देश की किसी भी अदालत में मुकदमा नहीं चल सकता था, न ही कोई अदालत उसे सजा सुना सकती थी। सांसद केवल संसद को जवाबदेह थे। उन्हें यह विधेयक इसलिए लाना पड़ा था क्योंकि पिछले कुछ सालों से बहुत से सांसद अनेक प्रकार के वित्तीय घोटालों में उलझ गए थे और उनमें से कई को न्यायालयों ने कड़ी सजा दी थी। कई सरकारें भी इन घोटालों के कारण गिरीं और कई उभरते नेताओं और सांसदों का भविष्य न्यायालय की इन कार्रवाइयों से धूल में मिल गया। इससे परेशान होकर सांसदों ने यह विधेयक पारित किया ताकि आगे से उनके विरुद्ध किसी भी प्रकार की न्यायिक कार्रवाई न हो सके, भले ही उनका अपराध कितना ही जघन्य क्यों न हो।

परंतु इस विधेयक का एक नकारात्मक नतीजा यह निकला कि आपराधिक जगत की अनेक हस्तियों के लिए संसद अब सबसे सुरक्षित स्थल प्रतीत होने लगा, क्योंकि सांसद बनकर वे देश के कानून से ऊपर हो सकते थे। तब इसमें आश्चर्य ही क्या कि इस विधेयक के आने के कुछ ही दिनों में आपराधिक ताकतों ने सभी राजनीतिक दलों पर धीरे-धीरे अपना कब्जा जमा लिया। नेताओं और माफिया डोनों के बीच चोली-दामन का संबंध तो पहले से ही चला आ रहा था। अब फर्क इतना ही हुआ कि माफिया तत्वों ने नेताओं को धीरे-धीरे राजनीतिक प्रक्रिया के हाशिए पर ढकेल दिया और स्वयं नेता की भूमिका भी निभाने लगे, या फिर नेता स्वयं माफिया डोन बन गए।

जनवरी 2000 में हुआ आम चुनाव भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसमें पहली बार संसद पर आपराधिक तत्वों का पूर्ण कब्जा हो गया। उनकी कोई अलग पार्टी नहीं थी, वरन वे सभी पार्टियों में घुसे हुए थे। चुनाव के बाद संसद में आए सदस्यों में से एक अच्छी खासी तादाद माफिया डोनों या उनके नुमाइंदों की थी। इन सांसदों में आपसी तालमेल था और इस कारण वे संसद की हर गतिविधि को प्रभावित करने की स्थिति में थे।

इस नई माफिया सरकार के प्रथम तीन-चार महीनों में संसद ने ऐसे अनेक विधेयक पारित किए जिससे माफिया की स्थिति और अधिक मजबूत हो उठी। इसी दौरान माफिया सांसदों का विरोध करने वाले अनेक अन्य सांसद मारे गए। कुछ की हत्या तो सरेआम संसद भवन के सभा कक्ष में ही हुई और दूरदर्शन के कैमरों के जरिए सारे देश ने इन हत्याओं को होते हुए देखा, मानो वे कोई हिंदी चलचित्र देख रहे हों।

इन सब हत्याओं से संसद के भीतर माफिया सांसदों का विरोध लगभग समाप्त हो गया।

उन दिनों श्री देवी प्रसाद देश के प्रधान मंत्री थे। वे बेचारे एक सीधे-सादे कालेज प्रोफेसर थे। माफिया सांसदों ने उन्हें यही सोचकर प्रधान मंत्री बनाया था कि वे उनके हाथ की कठपुतली बने रहेंगे। पर चार-पांच महीनों बाद देश की सर्वोच्च संस्था में हो रही इस धांधली से देवी प्रसाद की अंतरात्मा कुलबुलाने लगी और वे माफिया सांसदों के आदेशों का पालन करने से इन्कार करने लगे।

तब वह घटना घटी जिससे संसद भवन का ध्वस्त होना अवश्यंभावी हो गया। माफिया सांसदों ने प्रधानमंत्रि और उनके समर्थकों का अपहरण कर लिया और यह घोषित कर दिया कि देश पर उनका कब्जा है। उन्होंने संसद भवन को ही अपना अड्डा बना लिया और रातों-रात उसे आधुनिक हथियारों से घेर कर उसकी किलेबंदी कर ली। उन्होंने यह भी धमकी दी कि यदि भारतीय सेना उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करेगी तो वे दिल्ली पर परमाणु बम गिरा देंगे। सांसदों की इस धमकी से सारा देश दंग रह गया। दिल्लीवासियों ने तो तुरंत ही दिल्ली खाली कर दी। अपनी धमकी को सिद्ध करने के लिए सांसदों ने राष्ट्रपति भवन और सर्वोच्च न्यायालय पर दो एक प्रक्षेपास्त्र भी दाग दिए, जिससे ये दोनों ही खंडहर में बदल गए और तत्कालीन राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायाधीश मारे गए। फिर माफिया सांसद धीरे-धीरे देश पर अपना वर्चस्व बढ़ाने लगे। प्रधान मंत्री देवी प्रसाद और अन्य विरोधी सांसदों की हत्या कर दी गई और इस तरह संसद में माफिया सांसदों का पूरा बहुमत हो गया। इससे उनके द्वारा पारित अनेक विधेयकों को कानूनी हैसियत भी प्राप्त हो गई क्योंकि वे अब संसद में बहुमत में थे।

इन माफिया गुटों में से सबसे प्रबल गुट वह था जो इस सदी के प्रारंभिक वर्षों में प्रकट हुए नए देश तमिल ईलम की राष्ट्रीय सेना तमिल व्याघ्र से जुड़ा था। तमिल व्याघ्रों ने दशाब्दियों की लड़ाई के बाद भारत के दक्षिण में स्थित टापू श्री लंका के लगभग आधे हिस्से पर एक नया देश कायम कर लिया था।

इसकी राजधानी प्रभाकरपुरम था जो तमिल व्याघ्रों के शक्तिशाली सर्वेसर्वा और तमिल ईलम के प्रथम राष्ट्रपति वेलुप्पल्लि प्रभाकरन के नाम पर बना नया शहर था। प्रभाकरन ने ईलम पर आजीवन राज किया।

श्री लंका के आधे हिस्से पर एक नया तमिल राज्य स्थापित करना वृहद तमिल ईलम स्थापित करने की उसकी योजना का मात्र पहला चरण था। वह चाहता था कि अंततः ईलम में संपूर्ण श्री लंका, दक्षिणपूर्व एशिया के कुछ हिस्से और दक्षिण भारत का तमिलनाड और केरल प्रदेश भी शामिल हों। अपने जीवनकाल में तो वह इस सपने को पूरा होता नहीं देख पाया, पर उसने कभी हार नहीं मानी और इस वृहद ईलम की स्थापना की ओर निरंतर प्रयासरत रहा। उसके देहावसान के बाद वेलुत्तंपी नया राष्ट्रपति बना। वह प्रभाकरन से भी ज्यादा दृढ़ निश्चयी था और उसने धीरे-धीरे एक शक्तिशाली माफिया संगठन स्थापित करके भारतीय राजनीतिज्ञों को खरीदने लगा। जब भारत में माफिया सरकार स्थापित हो गई तो उसने मौका अच्छा देखकर समस्त दक्षिण भारत में तोड़फोड़ आरंभ कर दिया और भारतीय सेना के अनेक अड्डों को नष्ट कर दिया। तत्पश्चात उसने भारतीय संसद से एक विधेयक पास करवाकर एक मामूली रकम के बदले तमिलनाड और केरल के प्रदेशों को खरीद कर ईलम में मिला लिया। माफिया सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई सबसे दुखद एवं हृदयविदारी घटना देश का यह विभाजन थी। देश के अन्य भागों में भी हालात तेजी से बिगड़ रहे थे। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई तो माफिया सरकार के बनने से पहले ही माफिया के पूर्ण नियंत्रण में थी। उसका वास्तविक संचालन दुबई से होता था। दुबई में माफिया गैंगों के रहनुमाओं की संसद लगती थी जिसके अध्यक्ष सबसे शक्तिशाली गैंग का सरगना दाऊद था। इसने भारत सरकार के साथ एक समझौता कर लिया था जिसके अंतर्गत मुंबई में शांति बनाए रखने के बदले भारत सरकार माफिया को सालाना दो अरब रुपए की अदायगी करती थी।

यह रकम भारत सरकार मुंबई के औद्योगिक घरानों पर विशेष कर लगाकर इकट्ठा करती थी। पिछले कुछ सालों से यह व्यवस्था संतोषजनक रही थी और समझौते के पहले के वर्षों की तुलना में मुंबई में शांति थी।

दिल्ली की माफिया सरकार पर दुबई स्थित इस माफिया संसद का भी एक हद तक नियंत्रण था, जो इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि इस सरकार के सत्ता में आते ही मुंबई में शांति बनाए रखने के एवज में दाऊद को दी जानेवाली रकम बढ़ाकर पांच अरब रुपए कर दी गई।

देश के भीतरी भागों में भी स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी। समस्त उत्तर पूर्व को पड़ौसी महाशक्ति चीन अपने में मिलाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा था। पटना, लखनऊ, इंदौर आदि में उद्योगपति, किसान और दलित अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए निजी सेनाएं रखने लगे थे। माफिया पुलिस के अत्याचारों से छुटकारा पाने के लिए इनकी छत्रछाया में रहना आवश्यक था। इनमें से कुछ सेनाएं इतनी प्रबल हो गई थीं कि उनका अपना निश्चित अधिकार-क्षेत्र था जहां केवल उन्हीं का जोर चलता था।

उदाहरण के लिए लखनऊ की यादव सेना का लखनऊ, कानपुर, तथा उसके आसपास के इलाकों में राज था। पटना की लाल सेना की तूती नेपाल तक में बोलती थी। इंदौर की संथाल सेना का मध्य प्रदेश के समस्त आदिवासी इलाकों में वर्चस्व था।

लेकिन यह सब अनर्थ हमेशा के लिए तो चल नहीं सकता था। जब माफिया सरकार के पांच साल पूरे हुए और जनता की आशाओं के विपरीत नए चुनाव कराने की ओर सरकार या निर्वाचन आयोग ने कोई पहल नहीं की तो धीरे-धीरे जनता का संयम टूटने लगा। देश में जगह-जगह विरोधी स्वर उठने लगे।

शुरू-शुरू में तो इन्हें माफिया पुलिस ने बड़ी निर्ममता से दबा दिया, पर धीरे-धीरे विरोधी स्वर ने एक देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। आंदोलन का केंद्र नागपुर था, जहां तमिलनाड और केरल के देश से अलग होने से विक्षुब्ध हुए देशभक्त एकत्र हुए थे। उन्होंने देश को पुनः एकीकृत करने के लिए एक गुप्त संगठन स्थापित कर लिया। इस संगठन का नाम था अखंड भारत दल (अभाद)। जनता का आक्रोश इतना तीव्र था कि कुछ ही समय में अभाद को देश के कोने-कोने से जनसमर्थन प्राप्त होने लगा।

सन 2006 को माफिया सरकार के दो गुटों के बीच किसी बात को लेकर तकरार हो गई और उनकी लड़ाई खुलकर बाहर आ गई। दोनों गुटों ने दूसरे गुट के विरुद्ध सैनिक हमला शुरू कर दिया जिसके बढ़ने से देश में गृहयुद्ध की सी परिस्थिति हो गई। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर अभाद ने अपनी रणनीति बदल दी और खुली लड़ाई का मार्ग अपनाया। उसने भारतीय संसद और वर्तमान संविधान को रद्द घोषित कर दिया और सभी भारतवासियों से आह्वान किया कि देश की छाती पर चढ़ आए इन राक्षसों के दलन में वे उसकी खुलकर सहायता करें।

सौभाग्य से इस जन आंदोलन को सेना का पूरा-पूरा समर्थन मिला। इस समर्थन के बिना अभाद के लिए सांसदों को हराना संभव न हो पाता क्योंकि सांसद सभी प्रकार के आधुनिक हथियारों से लैस थे। सेना को भी सांसदों से कई दिनों तक युद्ध करना पड़ा, जिसमें सभी आधुनिक हथियारों का उपयोग दोनों पक्षों ने किया। सांसदों से हुई इस लड़ाई में सैकड़ों नागरिक और सैनिक मारे गए, जिन्हें सब आज भारत में शहीदों की तरह पूजा जाता है।

आखिर सेना को संसद भवन को ही बारूद से उड़ा देना पड़ा क्योंकि सांसदों ने आत्मसमर्पण करने से इन्कार कर दिया और उन्होंने परमाणु अस्त्रों के उपयोग की अपनी धमकी दुहराई। सेना के इस हमले में, जिसे ही ओपरेशन ब्लैकस्टार नाम दिया गया है, सारे सांसद तो मारे ही गए, उनके साथ संसद भवन भी खंडहर में बदल गया।

संसद के नष्ट होने के बाद बहुत दिनों तक देश में अराजकता रही। फिर धीरे-धीरे अभाद के मार्गदर्शन में स्थिति सामान्य होती गई। सेना की सैद्धांतिकता की दाद देनी चाहिए कि इस कठिन दौर में उसने देश की बागडोर छीनने की कोशिश नहीं की, बल्कि देश को बाहरी ताकतों से बचाने की ओर ध्यान लगाया। उसने एक जबर्दस्त मुहिम छेड़कर तमिल व्याघ्रों को देश के दक्षिणी हिस्सों से खदेड़ दिया और देश के खोए हुए हिस्सों को पुनः प्राप्त कर लिया। सेना की इस तटस्थता का मुख्य कारण यह हो सकता है कि ओपरेशन ब्लैकस्टार में जनता और सैनिकों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ा था।

धीरे-धीरे नई जनतांत्रिक संस्थाओं का गठन हुआ। देश की राजधानी नागपुर बनाई गई। संसद की जगह जनसभा ने ले ली। इसका गठन 23 दिसंबर 2006 को हुआ था। इसी दिन सभी नागरिकों ने वह ऐतिहासिक प्रण भी लिया कि भविष्य में वे राजनीति का अपराधीकरण नहीं होने देंगे। इस प्रण को नागपुर घोषणा के रूप में भी जाना जाता है और वह एक प्रकार से देश का नया संविधान है। पिछले पच्चीस वर्षों से इसी 23 दिसंबर को भारत अपनी दूसरी आजादी का पर्व मनाता आ रहा है...

भारत की दूसरी आजादी के पच्चीसवें साल के समारोहों में भाग लेने के बाद मैं अपने देश लौट चला। डरबन जानेवाली रोकटयान पर बैठे मैं सोचता गया कि क्या आजादी का भारत का यह दूसरा प्रयोग पहले से अधिक सफल हो सकेगा, और भारतीयों की कंगाली, भूख और अशिक्षा दूर हो सकेगी, या जनसभा का भी आज से पच्चीस-पचास वर्ष बाद वही हस्र होगा जो संसद का हुआ था? न जाने क्यों मुझे इस बात से बड़ी राहत मिल रही थी कि मैं इस अभागे देश का नागरिक नहीं हूं। भारत पर पदार्पण करते समय जो उल्लास मेरे मन में था, वह अब वितृष्णा में बदल गया था। मुझे अपने देश दक्षिण अफ्रीका के प्रति बड़ा नाज और अपनापन महसूस होने लगा। यह भाव मुझमें इससे पहले कभी नहीं हुआ था। मैंने देखा कि मैं भारत की केंचुली उतार फेंकने में सफल हो गया हूं और सच्ची दृष्टि में, दिलो-दिमाग से, दक्षिण अफ्रीकी हो गया हूं। भारत को लेकर जो कुंठा मेरे जेहन में बैठी हुई थी, उससे भी मैं मुक्त हो गया था। अब मेरा भारत से कोई सरोकार नहीं रह गया था।

(रचना काल 1999)

Sunday, May 03, 2009

एक्वा डेटा स्टूडियो अब हिंदी में

एक्वा डेटा स्टूडियो डेटाबेस डिजाइनरों और एडमिनिस्ट्रेटरों द्वारा उपयोग किया जानेवाला एक लोकप्रिय सोफ्टवेयर है। इसकी मदद से एक ही इंटरफेस से ओरेकल, माइक्रोसोफ्ट एसक्यूएल, माईएसक्यूएल आदि अनेक डेटाबेसों में काम किया जा सकता है।

अब यह सोफ्टवेयर हिंदी में लोकीकृत हो गया है। यह एक और प्रमाण है कि अब हिंदी सचमुच एक विश्व भाषा बन गई है और देश-विदेश के व्यवसायी उसे अपनाने की ओर तत्परता दिखा रहे हैं।

पूरी प्रेस विज्ञप्ति नीचे दी गई है।

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एक्वाफोल्ड ने अपने एक्वा डेटा स्टूडियो के संस्करण 7.5 का हिंदी रूप बाहर निकाला है, जिसमें है व्यवसाय विश्लेषकों, सोफ्टवेयर डेवलपरों और डेटाबेस प्रशासकों के लिए अतिरिक्त निष्पादन देनेवाली विशेषताएं

सनीवेल, कैलिफोर्निया – 27 अप्रैल 2009 – एक्वाफोल्ड इंक. ने अपना एक्वा डेटा स्टूडियो 7.5 बाहर निकाला है। यह उनके शक्तिशाली डेटाबेस प्रशासन सोफ्टवेयर का महत्वपूर्ण अपग्रेड है। यह सोफ्टवेयर एक ही अंतराफलक से अनेक डेटाबेसों को विशुअलाइस करना और उन्हें नियंत्रित करना आसान बनाता है। विश्व भर में लोकप्रिय इस सोफ्टवेयर के लोकीकरण को विस्तार देते हुए उसे नौ और भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है। ये नई भाषाएं हैं – हिंदी, डच, पोली, चेक, डेनी, नोर्वेजी, स्वीडी, फिनी और यूनानी। अब यह सोफ्टवेयर कुल 21 भाषाओं में उपलब्ध है।

एक्वा डेटा स्टूडियो व्यवसाय विश्लेषकों, सोफ्टवेयर डेवलपरों और डेटाबेस प्रशासकों (डीबीए) को वरदान स्वरूप है क्योंकि यह उनके सभी प्रयासों को एक ही बहुउपयोगी, बहुमंची अनुप्रयोग में समेकित करके उनके लिए ऐंटरप्राइस रिलेशनल डेटाबेसों के डिजाइन, डेवलपमेंट और रखरखाव के कामों में समय और पैसा बचाकर देता है। यह सोफ्टवेयर विंडोस, मैक ओएसएक्स, सोलैरिस और जावा मंच पर ओरेकल, एलयूवी के लिए डीबी2, आईश्रेणी के लिए डीबी2, माइक्रोसोफ्ट एसक्यूएल सर्वर, माईएसक्यूएल, साइबेस, इन्फोर्मिक्स, अपैची डेर्बी और पोस्टग्रेएसक्यूएल का समर्थन करता है।

इस सोफ्टवेयर के प्रमुख सोफ्टवेयर आर्किटेक्ट नील्स ग्रोन कहते हैं, "यह डेटाबेस प्रशासकों, व्यवसाय विश्लेषकों और सोफ्टवेयर डेवलपरों के लिए, जो रोजाना ऐंटरप्राइस रिलेशेनल डेटाबेसों के साथ काम करत हैं, स्विस आर्मी नाइफ जैसा बहुउपयोगी है। उसके संस्करण 7.5 में हमने अपने प्रयोक्ता की फर्माइशों पर ध्यान देना जारी रखते हुए उनके द्वारा मांगे गए अनेक फीचर जोड़े हैं: अधिक तेज निष्पादन, संपूर्ण फाइलों की अंतर्वस्तु को स्कैन करने के लिए एक नया फाइल खोज उपकरण, जावा और जावास्क्रिप्ट के लिए नए संपादक, अतिरिक्त संचित्र और हिंदी समेत 21 भाषाओं में लोकीकरण।”

प्रयोक्ता देखेंगे कि पहले के संस्करणों की तुलना में एक्वा डेटा स्टूडियो सं. 7.5 में अंतराफलक का निष्पादन दुगुनी तेजी से होता है, और प्रारंभन समय भी अब कम हो गया है। बड़े-बड़े पाठ और ग्रिड परिणामों की पुनर्प्राप्ति में खपनेवाली स्मृति अब 40% कम हो गई है, जिससे प्रयोक्ताओं को बड़ी-बड़ी मात्राओं में डेटा को विशुअलाइस करने में अधिक सुविधा होगी।

एक्वा डेटा स्टूडियो सं. 7.5 का नया फाइल खोज उपकरण प्रयोक्ताओं को संस्करण नियंत्रण आधानों (वर्शन कंट्रोल रिपोसिटरी) में फाइल की संपूर्ण अंतर्वस्तु में तेजी से खोज करने की सुविधा प्रदान करता है। स्कीमा विचरक में विद्यमान माउंट किए गए स्क्रिप्टों से, या स्क्रिप्ट वृक्ष से, फाइल खोज उपकरण का आह्वान करने पर उनमें विद्यमान सभी फाइलों या निर्देशिकाओं में खोज होती है। चूंकि खोज का काम पृष्ठभूमि थ्रेड में कार्यक्षम रूप से होता है, प्रयोक्ता खोज के दौरान एक्वा डेटा स्टूडियो के अन्य उपकरणों का उपयोग जारी रख सकते हैं।

संस्करण 7.5 में जावा और जावास्क्रिप्ट के लिए दो नए संपादक जोड़े गए हैं, जिनमें एक्वा डेटा स्टूडियो के अन्य संपादकों में जिन मजबूत संपादन फीचरों की प्रयोक्ता अपेक्षा रखते हैं, वैसी मजूबत फीचर उपलब्ध हैं। सभी संपादकों में अब प्रयोक्ता द्वारा रखे गए पुस्तकचिह्न और होट कुंजी शामिल कर लिए गए हैं, जिनकी मदद से एक ही दस्तावेज में अनेक स्थानों तक तेजी से पहुंचा जा सकता है। अब काटपट (क्लिपबोर्ड) में कोपी करने पर एसक्यूएल कथनों के वाक्य-विन्यासों का आलोकन आरटीएफ फोर्मैट में सहेजा जाता है, जिससे माइक्रोसोफ्ट वर्ड या ईमेल में उसे चिपकाने पर पाठ का रंग-संकेतन सुरक्षित रहता है।

व्यवसाय विश्लेषकों के लिए नौ अतिरिक्त संचित्र प्रकार जोड़े गए हैं, जो रिलेशनल डेटा के विशुअलाइसेशन को सुगम बनाते हैं। इनमें शामिल हैं: समूहित स्तंभ संचित्र, स्टैक किया हुआ स्तंभ संचित्र, समूहित पट्टी संचित्र, स्टैक किया हुआ पट्टी संचित्र, स्टैक किया हुआ रेखा संचित्र, प्रकीर्णित प्लोट संचित्र, बुलबुला संचित्र, ऊंचा-खोलो-नीचा-बंद-करो संचित्र और कैंडलस्टिक संचित्र। इन नए संचित्रों के कारण और सबवर्शन (एसवीएन) 1.5 के लिए उपलब्ध समर्थन के कारण, और दृश्यात्मक संपादन , ईआर माडलक, डीबीए उपकरण, एसक्यूएल दोषमार्जक, स्कीमा तुलना, और एसक्यूएल इतिहास में किए गए 20 से अधिक उन्नतीकरणों के कारण एक्वा डेटा स्टूडियो सं.7.5 अब तक का सबसे शक्तिशाली संस्करण हो गया है।

एक्वा डेटा स्टूडियो 7.5 http://www.aquafold.com/downloads.html पर तुरंत डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध है। नई विशेषताओं और उन्नतीकरणों की पूर्ण सूची http://www.aquafold.com/d7_5/docs/index.html पर देखी जा सकती है। इन भाषाओं के लिए भाषा पैक उपलब्ध हैं: हिंदी, अंग्रेजी, स्पेनी, फ्रांसीसी, पुर्तगाली, पुर्तगाली (ब्राजील), इतालवी, जर्मन, डच, पोली, चेक, डेनी, नोर्वेजी, स्वीडी, फिनी, रूसी, यूनानी, कोरियाई, चीनी (परंपरागत), चीनी (सरलीकृत) और जापानी।

एक्वा डेटा स्टूडियो 7.5 के एक-प्रयोक्ता व्यावसायिक लाइसेन्स की कीमत 399 अमरीकी डालर है। वर्तमान लाइसेन्स-धारक जिनके लाइसेन्स की अवधी समाप्त हो चुकी है, अपने लाइसेन्स को मात्र 139.65 अमरीकी डालर में नवीनीकृत कर सकते हैं, यानी नए लाइसेन्स की कीमत के मात्र 35% में। बहु-प्रयोक्ता लाइसेन्स की खरीद पर छूट भी उपलब्ध है, जिसकी जानकारी http://aquafold.com/licensing.html पर दी गई है।

एक्वाफोल्ट, इंक., के बारे में

एक्वाफोल्ड, इंक., रिलेशनल डेटाबेसों के लिए सोफ्टवेयर उपकरण बनाता है। 90 से अधिक देशों के 300,000 प्रयोक्ता एक्वाफोलड के उत्पादों का उपयोग अपने रिलेशेनल डेटाबेस के अभिकल्पन, विकास और प्रशासन के लिए करते हैं। एक्वाफोल्ड का मुख्यालय सनीवेल, कैलिफोर्निया में है। अधिक जानकारी के लिए http://www.aquafold.com में पधारें।

संपर्क:
ग्विलेर्मो ग्रोन
guillermogron@aquafold.com

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इस सोफ्टवेयर के हिंदी जाल स्थल की कड़ी यह है:-

http://www.aquafold.com/hi/

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Friday, May 01, 2009

एक ओर है मुंबई, दूसरी ओर राज समधियाला गांव

बताया जाता है कि मुंबई में मात्र 43% लोगों ने वोट डाले। यह वही मुंबई है जहां नवंबर में आतंकी हमले हुए थे। लोगों को उम्मीद थी कि मुंबईवाले इस बार भारी मतदान करके राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय देंगे। पर नहीं, मुंबई निवासी पहले जैसे ही पैसे बनाने के अपने-अपने धंधों में लगे रहे।

उधर राजकोट जिले में एक गांव है राज समधियाला। यहां पार्टी उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करने से मना कर दिया गया था।

लेकिन जब चुनाव का दिन आया तो पूरा गांव वोट देने उपस्थित हुआ। यहां के मतदान केंद्र में 81% मतदान हुआ।

यह गांव भारत के सबसे साफ-सुथरे गांवों में से एक माना जाता है। यहां के खंड विकास समिति ने फतवा जारी किया था कि जो भी वोट नहीं डालेगा, उसे 51 रुपए का दंड लगेगा।

इस गांव के सरपंच हैं जयवीरसिंह जाडेजा।

गांव में वोटरों की संख्या 1019 है, जिनमें से 850 ने वोट डाले।

समिति ने 50 लोगों को वैध कारणों से वोटिंग से दूर रहने की अनुमति दी थी। अब वह खोजबीन कर रही है कि वे 119 लोग कौन थे, जिन्होंने वोट नहीं दिए।

इस गांव के 150 वोटर अन्यत्र जाकर बस गए थे, पर वोटिंग के दिन इनमें से 80 व्यक्ति सिर्फ वोट डालने के उद्देश्य से गांव लौट आए।

गुजरात से ही एक अन्य रोचक खबर भी सुना दूं -

यहां के एक नाई ने घोषणा की कि जिन्होंने वोट डाले हों, उन्हें वह फ्री में शेव देगा। और उसने लगभग 80 लोगों को फ्री शेव दिया भी।

तो इस तरह के उदाहरण भी हमारे देश में मिलते हैं, जिनके कारण आशाएं बनी रहती हैं।

इंडी ब्लोगर ओफ द मंथ

इंडीब्लोगर ने इंडी ब्लोगर ओफ द मंथ स्पर्धा घोषित की है। इसमें हर महीने इंडीब्लोगर के सदस्यों द्वारा चुने गए विषय के सर्वोत्तम ब्लोग को पुरस्कृत किया जाता है। पुरस्कृत ब्लोगर को आकर्षक प्राइस भी दिया जाता है, जिन्हें माइक्रोसोफ्ट ने प्रायोजित किया है। प्राइसों की जानकारी यहां उपलब्ध हैं -

http://www.indiblogger.in/contests/

मार्च महीने के लिए विषय है "राजनीति और समसामयिक विषय"। यदि आपके ब्लोग का विषय यह हो, या आपने मार्च महीने में इस विषय पर कम से कम पांच पोस्ट लिखे हों, तो इस प्रतियोगिता में अपने ब्लोग को उतारिए।

हां इसके लिए इंडीब्लोगर का सदस्य होना आवश्यक है। पर सदस्य बनने के लिए चंद मिनट ही लगते हैं। यहां जाइए -

http://www.indiblogger.in/

और हां, सदस्य बनने के बाद आप एक काम और करें। अभी अगले महीने, यानी अप्रैल के लिए ब्लोगर ओफ द मंथ के लिए वोटिंग चालू है। अपनी पसंद भी जाहिर कीजिए कि अप्रैल में किस विषय के ब्लोगर को यह पुरस्कार मिलना चाहिए। यह रही उस चर्चा की कड़ी -

http://www.indiblogger.in/forum/topic.php?id=1156

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हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट