मानव निरीक्षण - 5
क्या आप बता सकते हैं, बंदरों की सबसे प्रिय आदत क्या है? वह है एक दूसरे के शरीर से जुए बीनना। जुए बीनने की यह आदत उनकी सामाजिक व्यवस्था में काफी महत्व रखती है। मनुष्यों में भी जुए बीनने की बंदरों की आदत का समतुल्य व्यवहार होता है? वह है, बतियाना, जी हां, बातचीत करना। आगे पढ़िए, सब स्पष्ट हो जाएगा।
टोलियों में रहनेवाले सदस्यों में एक वरीयता क्रम (पेकिंग आर्डर) होता है, जो यह तय करता है कि मैथुन, भोजन, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर पहला अधिकार किसका हो। यह वरीयता क्रम टोली के सदस्यों में इन सब सुविधाओं के लिए नित्य के झगड़ों से बचने के लिए बहुत आवश्यक है। टोलियों के सदस्य शुरुआत में हल्के-फुल्के शक्ति परीक्षण से इस क्रम को निश्चित कर लेते हैं, और उसके बाद टोली में अपेक्षाकृत शांति बनी रहती है। लड़ाई की नौबत तभी आती है जब इस क्रम का कोई उल्लंघन करे। ऐसा होने पर जिस सदस्य की हैसियत को चुनौती मिली हो, वह या तो अपनी हैसियत की लाज रखने के लिए नियम भंग करनेवाले से भिड़ जाता है, या उसके लिए अपना स्थान सदा के लिए छोड़ देता है।
वरीयता क्रम निश्चित हो जाने के बाद भी सदस्यों में परस्पर सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुत से छोटे-मोटे व्यवहार होते रहते हैं। इनमें से एक प्रमुख व्यवहार एक-दूसरों के शरीर से जुए बीनना है। हमें लग सकता है कि यह बिना किसी निहितार्थ के किया जाता होगा, पर जिन वैज्ञानिकों ने इन बातों का अध्ययन किया है, वे बताते हैं कि जुए बीनने जैसे सामान्य व्यवहार के पीछे भी काफी राजनीति होती है।
आमतौर पर जुए बीनना अपने से अधिक सत्तावान सदस्य के प्रति समर्पण भाव दिखाने का एक तरीका होता है। सामान्यतः कम शक्तिमान सदस्य ही अपने से अधिक शक्तिमान सदस्य के शरीर से जुए बीनता है। ऐसा करके वह यही दर्शाता है कि मैं तुम्हारी वरीयता स्वीकार करता हूं और इसके सबूत के रूप में मैं तुम्हें कष्ट पहुंचा रहे इन कीड़ों से छुटकारा दिलाऊंगा। और अधिक सत्तावान सदस्य अपने से कम सत्तावान सदस्य द्वारा अपने शरीर के जुए बिनवाकर उसे यही आश्वासन देता है कि मैं तुम्हारे समर्पण को स्वीकार करता हूं और तुम्हें अपने संरक्षण में लेता हूं और तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा। इससे दोनों को मनोवैज्ञानिक सकून मिलता है। सत्तावान सदस्य उस दूसरे सदस्य के प्रति निश्चिंत हो जाता है कि यह मेरे विरुद्ध उत्पात नहीं करेगा, और कम सत्तावान सदस्य को यह आश्वासन मिलता है कि मुझसे अधिक शक्तिशाली यह सदस्य अब मेरा उत्पीड़न नहीं करेगा।
मित्रों में, अर्थात लगभग समान सामाजिक हैसियत वाले सदस्यों में, जुए बीनने की क्रिया उनके परस्पर संबंधों को और प्रगाढ़ बनाती है।
इसलिए बंदरों में जुए बीनने की क्रिया समूह के अंदर के सबंधों को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब आते हैं मनुष्यों के विषय पर। मनुष्य भी वानर कुल का ही सदस्य है, और वह भी समूहों में रहनेवाला प्राणी है। उसमें भी जुए बीनने की क्रिया से मिलता-जुलता व्यवहार है, जो है बतियाना।
मनुष्यों में समस्या यह है कि उसके शरीर में बाल नहीं हैं, इसलिए उसे जुए, पिस्सू आदि जीव कम परेशान करते हैं। इसलिए जुए बीनने की क्रिया उसके संबंध में अर्थहीन है। पर हम सब जानते हैं कि हमारे समुदाय में भी एक सुस्पष्ट वरीयता क्रम देखी जाती है। चाहे आप परिवार को लें, या किसी दफ्तर के सदस्यों को, हमें वहां सब एक वरीयता क्रम दिखाई देगा। सबसे ज्यादा अधिकार परिवार के वरिष्ठ पुरुष सदस्य का, फिर उसकी पत्नी का, उसके बाद उनके सबसे वरिष्ठ पुत्र का, सबसे नीचे बच्चों और नौकर-चाकरों का। बच्चों में भी वरीयकता क्रम होता है, चाहे वह घर के बच्चे हों या मोहल्ले या स्कूल के बच्चे। नौकरों में भी यही बात है। दफ्तर में सबसे अधिक रसूख वाला व्यक्ति सीईओ होता है, उसके नीचे वरिष्ठ प्रबंधक, फिर कनिष्ठ प्रबंधक, फिर उनके सचिव आदि और सबसे कम रसूख वाला कर्मचारी चपरासी होता है जिस पर सब रौब जमाते हैं। सेना में तो यह बहुत ही औपचारितापूर्ण ढंग से लागू होता है।
अनौपचारिक रूप से भी, जहां भी चार मनुष्य एकत्र हों, उनके बीच यह वरीयता क्रम निश्चित हो जाता है। लोग एक-दूसरे को नाप-तौलकर अपने बीच तय कर लेते हैं कि कौन किससे आगे है और इस क्रम का सभी व्यवहारों में पालन करते हैं। यह अल्प समय के लिए बने मानव समूहों में भी देखा जाता है, जैसे किसी रेल के डिब्बे में चंद घंटों के लिए एकत्र मुसाफिरों में।
डेसमंड मोरिस (मैन वाचिंग, द नेकड एप, ह्यूमन ज़ू आदि पुस्तकों के लेखक) का कहना है कि इस वरीयता क्रम को बिना अनावश्यक लड़ाई-झगड़े के बनाए रखने के लिए मनुष्यों में जो तरीका है, वह है बतियाना। मनुष्य निरंतर बितियाता रहता है। दो मनुष्य मिले नहीं कि कोई न कोई बहाना ढूंढ़कर वे बातचीत शुरू कर देते हैं। डेसमंड मोरिस का कहना है कि यह वास्तव में दोनों में एक दूसरे को तौलने और वरीयता क्रम निश्चित करने की प्रक्रिया है। पुराने परिचित भी खूब बातचीत करते हैं। इनमें बातचीत का महत्व वरीयता क्रम निश्चित करने में नहीं है, क्योंकि वह पहले ही निश्चित हो चुका होता है, बल्कि उसे पुष्ट करने में होता है।
बातचीत में संलग्न दोनों सदस्य एक दूसरे के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं, दोनों के बीच तनाव कम हो जाता है और समाज में सामरस्य बना रहता है।
आम प्रवृत्ति अधिक बातचीत को हतोत्साहित करने की है। स्कूलों में, दफ्तरों में, सभी जगह यही कहा जाता है कि बातें कम करो, और काम करो, बातों में समय नष्ट मत करो, इत्यादि। पर यदि हम डेसमंड मोरिस की बात मानें, तो बातें करना तनाव मुक्ति और अनावश्यक रगड़-झगड़ घटाने का एक साधन है और यदि हमें मनुष्य समाज में शांति बनाए रखनी हो, तो हमें परस्पर खूब बातचीत करनी चाहिए।
यदि हम हमारे व्यवहार पर थोड़ा गौर करें तो डेसमंड मोरिस की बात समझ में आती है। जब दो लोगों में मन-मुटाव होता है, तो इसका एक प्रमुख संकेत होता है उनमें बातचीत बंद हो जाना। दोनों मुंह फुलाएं एक दूसरे से कट्टी कर लेते हैं। बच्चों में तो यह खास तौर से देखा जाता है। और दोनों में मैत्री भाव की पुनर्स्थापना का पहला संकेत भी यही होता है कि वे दोनों बातें करने लग गए हैं। दोनों में मेल-मिलाप करानेवाले व्यक्ति भी सबसे पहले दोनों के बीच बातचीत शुरू कराने की ही कोशिश करते हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि बातचीत हमारे समुदाय में तनाव घटाने का और मैत्री भाव जताने का एक महत्वपूर्ण जरिया होता है। यदि दो लोगों में मनमुटाव हो तो उनमें बातचीत करा दीजिए और देखिए वे कैसे तुरंत फिर से मित्र बन जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति तनाव, मायूसी या चिंता से ग्रस्त हो, तो उससे खूब बातचीत कीजिए उसे तुरंत आराम मिल जाएगा। यदि आप स्वयं तनाव, मायूसी या चिंता से परेशान हों, तो अपने परिवार के जनों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य व्यक्तियों से खूब बात कीजिए, और देखिए आप कितनी जल्दी बेहतर महसूस करते हैं।
मजे की बात यह है कि यह दो व्यक्तियों पर ही लागू नहीं होता, दो राष्ट्रों में भी यही बात देखी जाती है। विवाद की स्थिति में दोनों औपचारिक कूटनीतिक संबंधों को तोड़ लेते हैं। एक-दूसरे के देश से अपने राजदूतों को वापस बुला लेते हैं, और यदि इससे भी बात नहीं बनी तो, अपने दूतावासों को ही बंद कर लेते हैं। उसके बाद तो खुले युद्ध का ही रास्ता बचा रहता है।
दूसरे देश जो इस लड़ाई से दुनिया को बचाना चाहते हैं, वे यही कोशिश करते हैं कि दोनों देशों में फिर से बातचीत शुरू हो जाए। भारत और पाकिस्तान, ईरान और अमरीका, रूस और अमरीका, चीन और जापान आदि के संदर्भ में यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। मुंबई हत्याकांड के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी वर्ताएं बंद कर दी थीं और अमरीका निरंतर हम दोनों पर दबाव डाल रहा है कि ये वार्ताएं पुनः शुरू हो जाएं, ताकि युद्ध की नौबत न आए। जब दो व्यक्तियों या राष्ट्रों में बातचीत ही बंद हो जाए तो इसका मतलब यह होता है कि दोनों के बीच जो वरीयता क्रम पहले निश्चित था, वह अब मान्य नहीं रहा और उसे नए सिरे से निश्चित करना पड़ेगा। यह बातचीत से या युद्ध से हो सकता है। चूंकि युद्ध के भीषण परिणाम निकल सकते हैं, दूसरे देश युद्ध टालने के लिए दोनों के बीच बातचीत बहाल करने की ही कोशिश करते हैं।
अब तो राष्ट्रों के बीच औपचारिक बातचीत को सुगम बनाने के लिए स्थायी व्यवस्थाएं भी बना दी गई हैं, यथा, लीग ओफ नेशेन्स (प्रथम महायुद्ध के बाद), संयुक्त राष्ट्र संघ (दूसरे महायुद्ध के बाद)। ये ऐसे मंच हैं जो कट्टी किए बैठे राष्ट्रों के बीच बातचीत पुनः शुरू कराने के अवसर देते हैं।
इसी तरह संसद, विधान सभा, अदालत, आदि सब औपचारिक बातचीत द्वारा मैत्री स्थापित करने के तरीके हैं, जो सब बंदरों के जुए बीनने की गतिविधि के ही विकसित रूप हैं।
दफ्तरों में जोइंट कंसलटेटिव मेकेनिज़म (जेसीएम) जिसमें प्रबंधक और कर्मचारी बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याएं सुलटा लेते हैं, और हड़ताल, तोड़-फोड़, पुलिस कार्रावाई आदि की नौबत नहीं आने देते, भी ऐसी ही एक व्यवस्था।
सामाजिक स्तर पर सत्संग, सामूहिक उपासना, प्रवचन आदि भी बातचीत द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित करने के विभिन्न उपाय हैं।
सभी कलाओं की मूल प्रेरणा भी बातचीत करने की इस मूलभूत आवश्यकता ही है। मनुष्य केवल बोलकर ही नहीं बातचीत करता। वह इशारे से (नृत्य कला), लिखकर (साहित्य), गाकर (संगीत), चित्र बनाकर (चित्रकला), मूर्तियां बनाकर (मूर्तिकला), इमारतें बनाकर (स्थापत्यकला) भी अपने मन की बात व्यक्त करता है। ये सब कलाएं बातचीत करने की क्रिया के ही परिष्कृत रूप हैं, और उन सबका मूल मक्सद तनाव घटाना और मैत्रीभाव बढ़ाना है।
अक्सर हम देखते हैं कि अत्यंत विषाद या दुख की स्थिति में हमारे मुंह से अपने आप ही गीत फूट निकलते हैं। वाल्मीकि ने रामयाण ऐसे ही लिखा था, जब सारस जोड़ी में से एक के बहेलिए द्वारा मार दिए जाने से उनका मन विषाद से भर गया था। वाल्मीकि ही नहीं, हम भी दुख की स्थिति में कोई न कोई गाना गुनगुनाते हैं। अक्सर लेखक, चित्रकार, कवि आदि भी अत्यंत दुख की स्थिति में ही अपनी कला का उच्चतम प्रदर्शन करते हैं। यह इसलिए क्योंकि यह उनके लिए दुख से मुक्ति पाने का एक जरिया होता है। कोई रचना करने के बाद वे दुख या तनाव से मुक्त हो जाते हैं।
तो है न मानव निरीक्षण एक रोचक चीज। क्या आपने इससे पहले सोचा भी था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, साहित्य, चित्रकारी आदि गंभीर क्रियाकलापों का बंदरों द्वारा जुए बीनने की क्रिया से घनिष्ट संबंध है?
Sunday, November 23, 2014
जुए बीनना और बतियाना
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: मानव निरीक्षण
न संस्कृत न जर्मन, बल्कि तीसरी भारतीय भाषा
अभी हाल में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने केंद्रीय विद्यालयों द्वारा जर्मन को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाए जाने को अवैध घोषित किया है। यह भी कहा जा रहा है कि मानव संसाधन मंत्री चाहती हैं कि जर्मन की जगह इन विद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाए। इसे लेकर शिक्षा जगत में माहौल काफी गरम हो उठा है।
जर्मन समर्थकों का कहना है कि आधुनिक विश्व में जर्मन जैसी विदेशी भाषा सीखने से बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होता है और उन्हें नौकरी मिलने की संभावना बढ़ती है। इसके विरुद्ध स्मृति ईरानी का कहना है कि केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन पढ़ाया जाना सरकारी नीति के विरुद्ध है और तीन-भाषा वाले सूत्र के मूल उद्देश्यों के प्रतिकूल है। पर विडंबना यह है कि जर्मन की जगह संस्कृत के अनिवार्य शिक्षण का प्रावधान करना भी इसी तीन-भाषा वाली शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों के विरुद्ध है।
तीन-भाषा सूत्र का प्रस्ताव उस गतिरोध को तोड़ने के लिए किया गया था जिसके तहत हिंदी को सच्चे अर्थों में भारत की राज भाषा के रूप में स्वीकार करने में गैर-हिंदी प्रांतों को झिझक थी, और इसका फायदा लेकर अँग्रेज़ी भारत में अपना पैर दृढ़ता से जमाती जा रही थी। अहिंदी भाषियों को डर था कि यदि हिंदी को भारत की राज भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा, तो प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी भाषियों को गैर-हिंदी भाषियों पर नाज़ायज फायदा होगा। इस शिकायत का समाधान करने के विचार से ही तीन-भाषा सूत्र का प्रस्ताव किया गया था। उसके अनुसार अहिंदी प्रांतों में शिक्षण की भाषा स्थानीय भाषा रहेगी और हिंदी और अँग्रेज़ी को द्वीतीय और तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाया जाएगा। और, हिंदी भाषी क्षेत्रों में शिक्षण की भाषा हिंदी रहेगी और अँग्रेज़ी और कोई अन्य भारतयी भाषा द्वितीय और तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाएँगी।
इस सूत्र के प्रवर्तकों को आशा थी कि इससे हिंदी भाषी क्षेत्रों में अन्य भारतीय भाषाओं का पठन-पाठन होगा और इससे तमिल, बंगाली, मलयालम, उड़िया असमी आदि भारतीय भाषाओं का सामान्य ज्ञान स्कूल छात्र हासिल करेंगे, जिससे आगे चलकर राष्ट्रीय एकता की भावना को बल मिलेगा। दूसरी ओर, अहिंदी क्षेत्रों में छात्र हिंदी सीखेंगे और आगे चलकर वे भी प्रतियोगी परीक्षाओं में उसी तरह आगे आ पाएँगे, जैसे हिंदी क्षेत्र के बच्चे।
यह सूत्र सरसरी तौर पर निरापद लगता है, पर जब इसे कार्यान्वित किया गया, तो कुछ ही समय में उसे इस तरह विरूपित कर दिया गया कि इसे जारी करने का मूल उद्देश्य ही भुला दिया गया। हिंदी भाषी क्षेत्र में तीसरी भारतीय भाषा के रूप में सभी जगह तमिल, बंगला, मलायम, तेलुगु आदि की जगह संस्कृत सिखाई जाने लगी। संस्कृत का भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के साथ जितना भी गहरा संबंध क्यों न हो, आज की परिस्थिति में वह एक मृत भाषा है, और उसके शिक्षण से तीन भाषा सूत्र लाने का मूल उद्देश्य किसी भी तरह से पूरा नहीं होता है। गैर-हिंदी राज्यों में तीन-भाषा सूत्र ले-देकर कुछ हद तक उसके मूल उद्देश्यों के अनुसार कार्यान्वित किया गया, लेकिन वहाँ भी तमिल नाड की सरकार ने इसे अपनाने से इन्कार कर दिया और वहाँ स्कूली बच्चों को केवल तमिल और अँग्रेज़ी सिखाई जाने लगी।
इस बीच इस तीन-भाषा वाली नीति को कमज़ोर करने का छिपा प्रयास केंद्रीय विद्यालय संगठन ने भी किया और उसने तीसरी भाषा के रूप में जर्मन का शिक्षण शुरू कर दिया। उसका तर्क यह था कि इससे देश को फायदा होगा क्योंकि भूगोलीकरण के जमाने में जर्मनी जैसी महत्वपूर्ण आर्थिक महाशक्ति की भाषा सीखने से न केवल बच्चों का भविष्य सुधरेगा, बल्कि देश का कल्याण भी होगा।
इस तर्क में वज़न जितना भी हो, यह निर्विवाद है कि वह उक्त सरकारी नीति का खुला उल्लंघन है, क्योंकि तीन भाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली बच्चों को देश की समृद्ध भाषाई विरासत से अवगत कराना और देश में एकता की भावना में वृद्धि करना था, न कि देश की आर्थिक उन्नति में योगदान करना। स्पष्ट ही तीसरी भाषा के रूप में जर्मन सिखाने से न तो बच्चों में देश की समृद्ध भाषाई विरासत से परिचय बढ़ता है न ही उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित होती है। इसलिए केंद्रीय विद्यालय संगठन का यह कदम निंदनीय है और उसे अवैध घोषित करके मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने ठीक ही किया है।
पर जर्मन की जगह संस्कृत के शिक्षण के संबंध में यही बात नहीं कही जा सकती है। तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाना तीन भाषा नीति की दृष्टि से लगभग उतना ही बेतुका है जितना जर्मन सिखाना। संस्कृत देश में कहीं भी बोली नहीं जाती है। इसलिए उसके शिक्षण से बच्चों द्वारा देश की समृद्ध भाषाई संस्कृति से परिचित होने का सवाल ही नहीं उठता। इतना ही नहीं, उससे राष्ट्रीय एकीकरण को भी बढ़ावा नहीं मिलता। यदि संस्कृत की जगह हिंदी भाषी क्षेत्रों में बच्चे तमिल, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, कश्मीरी, आदि भाषाएँ सीखते, तो वे हमारे देश की समृद्ध भाषाई और साहित्यिक विरासत से कितनी अच्छी तरह से परिचित हो जाते।
इसलिए मानव संसाधन मंत्रालय को केंद्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाने के बाद स्कूली बच्चों पर संस्कृत थोपने की जगह, तीन भाषा सूत्र को सलीके से लागू करने की व्यवस्था करनी चाहिए। यानी, उसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत सहित देश की सभी अन्य भाषाओं के शिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।
आजकल हर देश के लिए यह आवश्यक है कि वह विश्व के सभी प्रमुख भाषाओं के पठन-पाठन की व्यवस्था करे। भारत के लिए भी यह आवश्यक है। भारत में भी चीनी, जापानी, फारसी, अफगान, सिंहला, अरबी, स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रेंच, जर्मन, आदि भाषाओं का शिक्षण होना चाहिए। पर यह सब स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग नहीं हो सकता है। स्कूली शिक्षण के अनेक उद्देश्य होते हैं, जिनमें से प्रमुख हैं राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना, वैज्ञानिक सोच विकसित करना, और व्यावहारिक और आर्थिक महत्व के विषय पढ़ाना। मातृ भाषा, हिंदी, अँग्रेज़ी, कोई अन्य भारतीय भाषा, गणित, विज्ञान, इतिहास, आदि विषय सभी को पढ़ना चाहिए। कुछ छात्र आगे चलकर इनमें से कुछ विषयों को अधिक गहनता से और पेशेवरीय स्तर पर पढ़ सकते हैं। कुछ छात्र देश-विदेश की अन्य भाषाएँ भी अतिरिक्त रूप से पढ़ सकते हैं। पर अनिवार्य शिक्षण का अंग यह नहीं हो सकता है। स्कूलों में तथा स्कूली बच्चों के पास सीमित समय ही होता है। उस समय में कुछ सीमित चीज़ें ही पढ़ाई जा सकती हैं। इन चीज़ों को हमें काफी सोच-समझकर तय करना होगा। यहाँ किसी खास वर्ग की विशिष्ट ज़रूरतों को सब पर थोपने के लिए कोई गुँजाइश नहीं है। इन खास वर्गों के लिए निजी स्कूलों का मार्ग खुला है। सरकारी पैसों से चलनेवाले केंद्रीय विद्यालयों में तथा आम शिक्षण में सर्वहित ही एकमात्र कसौटी होनी चाहिए। सर्वहित न तो संस्कृत के शिक्षण में है न जर्मन के शिक्षण में, बल्कि वह तीन भाषा सूत्र को ईमानदारी से और कुशलता से देश-भर में कार्यान्वित करने में है।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 3 टिप्पणियाँ
लेबल: हिंदी
Sunday, December 22, 2013
देवयानी प्रकरण पर मेरे विचार
भारतीय दूतावास की कर्मचारी देवयानी को अमरीका में अपनी नौकरानी को कम वेतन दिए जाने के लिए गिरफ़्तार करना और उनके साथ अपमानजनक बर्ताव करना सभी भारतीयों के खून को खौलानेवाला प्रकरण है। देवयानी को अपने ही बच्चों के सामने हथकड़ियों में जकड़कर सरे आम ले जाया गया और जेल में उनके साथ बहुत ही कुत्सित बर्ताव किया गया, उसी तरह का बर्ताव जैसे हत्यारों, नशाखोरों, बलात्कारियों आदि के साथ किया जाता है – पुलिसकर्मियों ने देवयानी को नंगा करके, उनके शारीरिक द्वारों में (योनी, मुँह, गुदा, आदि) में उँगली या अन्य चीजें डालकर जाँच की (कैविटी सर्च), यह मालूम करने के लिए कि उन्होंने वहाँ कोई हथियार या नशीली दवा तो नहीं छिपा रखी है। अमरीका में संगीन जुर्मों के कैदियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जाता है। पर देवयानी तो कोई संगीन जुर्म के लिए पकड़ी गई कैदी नहीं थीं, और तो और वे एक स्वाधीन राष्ट्र के दूतावास की कर्मचारी थीं, जिसके साथ अमरीका के दोस्ताना संबंध थे, तथा एक स्वतंत्र देश के दूतावास के कर्मी होने के कारण उन्हें अमरीका के क़ानूनों से एक प्रकार का अभयदान मिला हुआ था। पर इन सब बातों को दरकिनार करके देवयानी के साथ बदसलूकी की गई।
अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ। मुझे लगता है कि इसके पीछे अनेक कारण हैं। पहला कारण देवयानी को गिरफ़्तार करनेवाले भारतीय मूल के व्यक्ति प्रीत भरारा के व्यक्तित्व से जुड़ा है। यह व्यक्ति शायद अमरीकियों को यह दिखाना चाहता है कि वह उनसे भी बढ़कर अमरीकी है, और इसे ज़ाहिर करने का इससे बढ़िया क्या तिकड़म हो सकता है कि वह अपने ही मूल देश के देशवासियों को अमरीकी क़ानूनों के फंदे में फँसाए। ऐसा करके वह शायद यह दिखाना चाहता है कि उसने अपनी भारतीयता की केंचुली पूरी तरह से उतार फेंक दी है, और वह संपूर्ण रूप से अमरीकी हो गया है। शायद उसके मन में राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी हो, और देवयानी के प्रति बदसलूकी करके उसे उम्मीद हो कि अमरीका के लोग उस पर उसकी भूरी चमड़ी के बावजूद अधिक भरोसा करने लगेंगे। या ऐसा भी हो सकता है कि वह अमरीकी में फल-फूल रहे भारत-विरोधी खेमों में से किसी के हाथों का कठपुतली बन गया हो, जो अमरीका में भारत को नीचा दिखाकर न जाने क्या उल्लू सीधा करना चाहते हैं – ये लोग नरेंद्र मोदी को विदेशों में बदनाम करने और उसे अमरीकी वीज़ा से वंचित करने के लिए ऐड़ी-चोटी का पसीना एक किए हुए हैं और पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। अब जब ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी अगले चुनाव के बाद भारत के प्रधान मंत्री के रूप में उभरकर आ सकता है, स्वयं इनके पसीने छूटने लगे हैं। शायद यह बरार ऐसी ही मनोवृत्तिवाला भारत-द्वेषी व्यक्ति हो। यह इस प्रकरण का एक संभव स्पष्टीकरण है। एक अन्य संभाव्यता यह है कि देवयानी की नौकरानी संगीता और उसके परिवार भारत में अमरीकियों के लिए जासूसी करने में लगे हुए थे और उन्हें बचाने के लिए ही देवयानी को बलि का बकरा बनाया गया है। देवयानी को अपनी नौकरानी को कम वेतन देने के ज़ुर्म में फँसाकर, अमरीका ने संगीता, उसके पति तथा परिवार के अन्य सदस्यों को रातों-रात अपने देश में शरण दे दी है। अब हर कोई जानता है कि अमरीका में एक आम भारतीय को शरण तो दूर प्रवेश करने तक का वीज़ा मिलना कितना कठिन काम है। पर संगीता और उसके परिवार को, जो मात्र एक नौकरानी है, अमरीका ने सपरिवार वीज़ा देकर अपने देश में सुखपूर्वक बसाया है। ज्ञातव्य रहे कि संगीता के पिता भारत में अमरीकी दूतावास में बरसों से काम करते आ रहे हैं। निश्चय ही इस दौरान उन्होंने अनेक अमरीकियों से घनिष्ट संबंध बना लिए होंगे, जो संगीता के इस समय काम आए। शायद वे अमरीकियों के लिए कोई अन्य महत्वपूर्ण सेवा भी प्रदान करते रहे होंगे, जिसके प्रति कृतज्ञता जताते हुए उन्होंने संगीता को सपरिवार अपने देश में उठा ले जाने जैसा विलक्षण कार्य किया। स्पष्ट ही यह काम अमरीकियों के लिए अति महत्वपूर्ण रहा होगा, वरना वे ऐसा क्यों करते। जासूसी ही ऐसा काम मुझे प्रतीत हो रहा है जिसकी अमरीकी इतनी अधिक कीमत आँकते। अब सवाल यह उठता है कि संगीता के परिवार ने अमरीकियों को क्या-क्या गुप्त बातें बताई हैं और यह जानकारी भारत के लिए कितना अधिक नुकसानदेह साबित हो सकती है। इसका तो आनेवाले दिनों में ही खुलासा हो सकता है, और इसकी संभावना भी कम ही है, क्योंकि जासूसी से संबंधित अनेक बातें कभी उजागर होती ही नहीं हैं।एक अन्य संभाव्यता यह है कि अमरीका इस प्रकरण के जरिए भारत को किसी अन्य चीज़ के लिए सज़ा दे रहा है। अभी हाल में हमारे रक्षा मंत्री ए के ऐंटनी ने एक बहुत ही महँगे रक्षा निवादा से अमरीकियों का पत्ता काट दिया था। इसी तरह से कुछ अन्य मामलों में भी अमरीकी उद्योगों के प्रस्तावों के स्थान पर अन्य देशों के प्रस्तावों को चुना गया था। इससे अमरीकी उद्योग ताव में आ गया है, और वह भारत को सबक सिखाने के मौके की तलाश कर रहा है। शायद उसने प्रीत बरार के माध्यम से जाल बिछाकर देवयानी को उसमें फँसाकर भारत के विरुद्ध प्रतिघात किया हो।
इसके पीछे आर्थिक कारण भी हैं। पहले भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था जितनी ही चुस्त-दुरुस्त थी और तेज़ी से विकसित हो रही थी। पर पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था की हवा निकल गई है, वह चीन की बराबरी तो दूर विश्व के दोयम दर्जे के देशों से भी पीछे हो गया है। अमरीका मुख्य रूप से पूँजीवादी देश है और उसकी बागडोर वहाँ के बड़े-बड़े धन्नासेठों के हाथों में ही रहती है। इन्हें अब भारत उतना आकर्षक नहीं लग रहा है, और इसलिए भारत के प्रति सम्मान दर्शाना भी वे अब आवश्यक नहीं मान रहे हैं। इसीलिए भारत के दूतावास के कर्मी के प्रति अमरीका ने ऐसा अवहेलनापूर्ण व्यवहार किया है जैसा वह अफ्रीका के ग़रीबों और कम महत्वपूर्ण देशों के दूतों के साथ भी नहीं करता है।
इस सारे काँड में सबसे अखरनेवाली बात यह है कि देवयानी को प्रताड़ित करनेवाला व्यक्ति एक पूर्व-भारतीय है। हम विदेशों में रह रहे अपने देश के लोगों पर उचित ही गर्व करते हैं और उनकी उपलब्धियों को अपनी ही उपलब्धियाँ मानते हैं, भले ही इन लोगों ने दूसरे देशों की नागरिकता स्वीकार कर ली हो। हम यही विश्वास करते हैं कि ऐसा उन्होंने मजबूरी में किया है, और वे दिल से अब भी भारतीय हैं और सदा भारतीय ही रहेंगे। अब इस प्रीत बरार ने सिद्ध कर दिया है कि हमारी यह धारणा कितनी मासूम और अवास्तविक है। इस आदमी के बर्ताव से भारत के प्रति अंशमात्र भी सम्मान या प्रेम नहीं झलक रहा है। वह तो भारत को अनादर करने पर तुला हुआ सा प्रतीत हो रहा है। और यही बात हम भारतीयों को समझ में नहीं आ रही है, कि कैसे भारतीय मूल का कोई व्यक्ति इस कदर राह भटक सकता है, कि वह अपने ही वतन की छाती पर वार कर बैठे।
इससे हमें सबक भी लेनी चाहिए, और वह यह है कि विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को भारत के साथ जोड़े रखने के लिए हमें और मेहनत करनी होगी। आज स्थिति यह है कि एक-दो पीढ़ी में वे भारत से इतने कट जाते हैं कि उनमें से कई प्रीत बरार के ही अन्य संस्करण बन जाते हैं। उनका भारत के साथ नाता उनकी भूरी चमड़ी और नाक-नक्शे तक ही सीमित रह जाता है। दिल और दिमाग से वे भारतीयता से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। क्योंकि भारतीयता की अवधारणा भारत की राजनीतिकि सीमाओं तक सीमति नहीं है, बल्कि वह एक विश्वव्यापी चीज़ है। भारत से निकला व्यक्ति चाहे कहीं भी जाए और चाहे जिस देश का भी नागरिक हो जाए, वह भारत के लिए मूल्यवान है, और भारत को और भारतवासियों को उसे भारत के साथ जोड़े रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह प्रयास राज्य के स्तर पर और सामाजिक संगठनों के स्तर पर और व्यक्तिगत स्तर पर हमें करना होगा। राज्य के स्तर पर उन्हें दुहरी नागरिकता देना और भारत में उन्हें अन्य विदेशियों की तुलना में अधिक सहूलियतें देना जैसे कार्य शामिल हैं। सामाजिक स्तर पर यहाँ के धार्मिक संगठनों तथा कला-आदि से संबंधित संगठनों को उन्हें अपनी भारतीयता बरकार रखने में मदद करनी चाहिए। यह काम सबसे अच्छा हिंदी फिल्में कर रही हैं, पर समाज के अन्य स्तरों पर भी यह होना चाहिए। व्यक्तिगत स्तर पर भी हम इसमें मदद कर सकते हैं।
भारतीयता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, से इन प्रवासी भारतीयों का संबंध है। यह भाषाई सेतु उन्हें धर्म, साहित्य, फ़िल्म, संगीत आदि भारतीयता के अन्य पहलुओं से जोड़े रखता है। और यही भाषाई सेतु प्रवासी भारतीयों के लिए सबसे पहले टूटती है, विशेषकर उन प्रवासी भारतीयों के लिए जो अँग्रेज़ी बोलनेवाले देशों में बसते हैं। वे एक-दो पीढ़ी में ही अपनी मूल भाषा और हिंदी को भूल जाते हैं, और अँग्रेज़ी ही उनकी एकमात्र भाषा रह जाती है। और भाषा का यह संबंध खत्म होते ही, धर्म, साहित्य, कला, संगीत आदि के साथ उनका नाता भी टूट जाता है।
इसलिए मेरी दृष्टि में, विदेशों में बसे भारतीयों में भारत के प्रति सहानुभित बनाए रखने के लिए हमें उनकी भाषाई सेतु, और विशेषकर हिंदी के साथ उनके संबंध, को बनाए रखने की ओर खास ध्यान देना चाहिए।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 5 टिप्पणियाँ
लेबल: अमरीका, अर्थव्यवस्था, प्रवासी भारतीय, हिंदी
Friday, September 27, 2013
लंचबॉक्स जैसी एक मलयालम फ़िल्म भी है
हिंदी में लंचबॉक्स भोजन को लेकर बनी इनी-गिनी फ़िल्मों में से एक है, इससे पहले, अमिताभ बच्चन और तब्बू वाली चीनी कम, और लव शव चिकन खुराना फ़िल्म काफी चली थी, जिसमें भी कहानी स्वादिष्ट भोजन के इर्द-गिर्द घूमती है। चीनी कम और लव शव चिकन खुराना एक संपूर्ण बॉलीवुड फ़िल्म हैं, नाच-गाने से भरूपर सफल व्यावसायिक रोमैटिंक कॉमेडी। लंचबॉक्स की विधा डॉक्यूमेंटरी के अधिक निकट जा पड़ी है, वह आर्ट फ़िल्म के खेमे में मानी जाएगी। लंचबॉक्स बॉलीवुड शैली की फ़िल्म नहीं है। फिर भी लंचबॉक्स एक सुंदर फ़िल्म है, जिसमें सभी अदाकारों ने उम्दा अभिनय किया है, चाहे वह ईरफ़ान खान हो, या नवासुद्दीन सिद्दीक़ी, या निम्रत कौर।
यह फ़िल्म आधी हिंदी में और आधी अँग्रेज़ी में है – इरफ़ान खान के सभी पत्र अँग्रेजी में हैं और उन्हें फ़िल्म में अँग्रेजी में ही पढ़कर सुनाया जाता है। इस कारण से केवल हिंदी जाननेवालों को लगभग आधी फ़िल्म समझ में नहीं आएगी। फ़िल्म का केंद्रीय हिस्सा लंचबॉक्स के ज़रिए निम्रत कौर और इरफ़ान खान के बीच पत्रों के विनिमय से जुड़ा है, यह इस फ़िल्म की एक मुख्य खामी है। पर शायद इस फ़िल्म को भारतीय दर्शकों के लिए नहीं बल्कि विदेशी दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, या यों कह लीजिए, उच्च वर्ग के भारतीयों या विदेशों में बसे भारतीयों के लिए बनाया गया है, जो इतनी अँग्रेज़ी जानते हैं कि फ़िल्म के इन हिस्सों को समझ सकें। इस कारण से यह फ़िल्म देश के शहरी हिस्सों में ही चल सकेगी। गाँवों में जहाँ लोग अँग्रेज़ी से वाकिफ़ नहीं होते हैं, इसे समझ नहीं पाएँगे।
फ़िल्म का माहौल मुंबई पर टिका है – विशेषकर डिब्बेवालों और लोकल ट्रेनों पर। यह भी थोड़ा कृत्रिम लगता है, और ऐसा लगता है कि डिब्बेवालों की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति को भुनाने का प्रयत्न किया गया है। डिब्बेवालों का ट्रेन में बैठे तुकाराम के गीत गानेवाला अंश जो बारबार फ़िल्म में दिखाया गया है, मुझे काफ़ी अस्वाभाविक लगा।
फ़िल्म की कुछ अन्य बातें में भी खटकती हैं, जैसे इरफ़ान का सड़क में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के साथ अँग्रेज़ी में बात करना, जबकि वे हिंदी अच्छी तरह जानते हैं और दफ़्तर में नवासुद्दीन आदि के साथ बड़ी अच्छी हिंदी बोलते हैं। भले ही इरफ़ान का किरदार एक ईसाई व्यक्ति का है, फिर भी कोई भी सड़क पर खेल रहे बच्चों के साथ अँग्रेज़ी में नहीं बात करेगा। यदि इरफ़ान अँग्रेज़ी में बच्चों को डाँटते, और बच्चे हिंदी में उन्हें अपनी सफ़ाई देते, तो यह फिर भी अधिक स्वाभाविक लगता, क्योंकि उस उम्र के और उस आर्थिक वर्ग के बच्चे अँग्रेज़ी नहीं बोलते हैं, हिंदी ही बोलते हैं। फ़िल्म के निर्माताओं/निदेशकों द्वारा यह दर्शाना कि ईसाई लोगों की ज़ुबान अँग्रेज़ी है, वास्तविकता से कोसों दूर है। भारत के ईसाई भारत की ही विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं। यहाँ भी फ़िल्म के निर्माताओं/निदेशकों की नज़र विदेशी दर्शकों पर रही है।
पर फ़िल्म की सबसे बड़ी कमी तो यह है कि यह अचानक समाप्त हो जाती है। इसे यथार्थता कहा जा सकता है, पर इससे फ़िल्म एक डोक्यूमेंटरी जैसे लगती है – डिब्बेवालों पर बनी डोक्यूमेंटरी।
अब रही फ़िल्म की मुख्य कहानी की बात, यह भी कुछ मौलिक नहीं है। इसी तरह की एक फ़िल्म मलयालम में कुछ वर्ष पहले बन चुकी है, और यह फ़िल्म भी इतनी ही सुंदर और लोकप्रिय हुई थी, पर मलयालम जगत में। हिंदी वालों ने शायद ही उसके बारे में सुना होगा। यह फ़िल्म है सॉल्ट एंड पेप्पर।
सॉल्ट एंड पेप्पर (नमक और काली मिर्च) अनेक दृष्टियों से लंचबॉक्स से कहीं श्रेष्ठ फ़िल्म है। इसमें भी कहानी भोजन पर (दक्षिण भारतीय भोजन) पर आधारित है और यहाँ भी किसी को भेजा गया संदेश किसी और को पहुँच जाता है। इस फ़िल्म में टेलिफ़ोन के क्रॉस कनेक्शन से ऐसा होता है। एक विज्ञापन कंपनी में काम कर रही स्त्री एक होटल से ढोसा मँगाती है, और होटल को निर्देश देती है कि ढोसा किस तरह से बनाकर लाना है। पर यह फ़ोन होटल को न जाकर एक पुरातत्ववेत्ता को पहुँचता है जो किसी सुनसान पुरातत्व स्थल में अपने रसोइए द्वारा बनाए गए नीरस भोजन से तंग आ चुका है। जब उसे भोजन के संबंध में यह लार-टपकानेवाला फ़ोन कॉल आता है, तो वह पहले तो झुँझला उठता है, पर फिर चुपचाप सुनता जाता है। आगे के दिनों में यह क्रॉस कनेक्शन बारबार होता है और चूँकि यह पुरातत्ववेत्ता भी महा भोजन-भट्ट है, दोनों में धीरे-धीरे दोस्ती होती जाती है, जो मुख्य रूप से दोनों का भोजन पर रुचि होने पर आधारित होती है।
जिस तरह लंचबॉक्स में नवासुद्दीन सिद्दकी की भूमिका इरफ़ान के शागिर्द की है, वैसे ही सॉल्ट एंड पेप्पर में भी पुरातत्ववेत्ता के एक साइड-किक (शागिर्द) के रूप में उसका एक भाँजा उसके साथ रहने आता है (यह भूमिका मलयालम फ़िल्म जगत के उभरते सुपरस्टार आसिफ़ अली ने बहुत ही अच्छे ढंग से निभाया है)। आसिफ़ अली नौकरी की तलाश में बैठे एमबीए की पढ़ाई पूरी कर चुके छात्र की भूमिका निभाता है, जो नौकरी लगने तक कुछ समय अपने मामा के साथ बिताने आया है।
लंचबॉक्स में निम्रत कौर की एक अधेड़ उम्र की पड़ोसिन है जिसकी केवल आवाज़ सुनाई देती है। इससे मिलती-जुलती एक भूमिका सॉल्ट एंड पेपर में भी है। यह है होटल से ढोसा मँगानेवाली स्त्री की सहकर्मी।
जब ढोसा वाली स्त्री और पुरातत्ववेत्ता में दोस्ती बढ़ती जाती है, दोनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार के अंकुर भी फूटने लगते हैं। दोनों शादी करने की सामान्य उम्र पार चुके हैं, और उन्हें आशा बँधती है कि शायद यह उनके लिए आखिरी मौका है। पर दोनों को ही अपने ऊपर विश्वास नहीं है। पुरातत्ववेत्ता को लगता है कि वह बूढ़ा और कुरूप है, और जब फ़ोन वाली स्त्री उसे आमने-सामने देखेगी तो उसका मोह-भंग हो जाएगा। स्त्री का भी यही ख्याल है। इसलिए जब दोनों एक-दूसरे से मिलने का निश्चय करते हैं, तो पुरात्ववेत्ता आसिफ़ अली को उसकी जगह भेजता है, और फ़ोन वाली स्त्री अपनी सहकर्मी को, जो उम्र में उससे बहुत छोटी है। दोनों अपने-अपने प्रतिनिधि को निर्देश देते हैं कि जाकर देख आओ कि वह कैसा/कैसी है। जब फ़ोनवाली स्त्री की सहेली आसिफ़ अली को देखती है, तो उसे लगता है कि इतनी कम उम्र का लड़का उसकी सहली का जीवन-साथी नहीं बन सकता है, और असिफ़ अली को भी फ़ोनवाली स्त्री की सहेली को देखकर यही बात लगती है। दोनों जाकर बता देते हैं यह रिश्ता महज हवाई कल्पना है और यह दोनों के लिए बिलकुल बेमेल है। इतना ही नहीं, कहानी में ट्विस्ट के रूप में असिफ़ अली को फ़ोनवाली स्त्री की सहेली से प्यार भी हो जाता है। और पुरातत्ववेत्ता को लगता है कि असिफ़ अली ने इसी कारण उससे झूठ बोला है कि फ़ोनवाली स्त्री के साथ उसका संबंध बेमेल साबित होगा। इससे जो ईर्ष्या, जलन, झगड़े आदि होते हैं, उसको लेकर फ़िल्म काफी उलझ जाती है।
पुरतत्ववेत्ता को अब अपने काम में ज़रा भी मज़ा नहीं आता है और उसकी झुँझलाहट और भी अधिक बढ़ जाती है। वह अपने रसोइए से भी लड़ पड़ता है, जिसके साथ वह बचपन से ही रहता आ रहा है। यही हाल फ़ोनवाली लड़की का भी होता है, वह भी जीने की इच्छा खो बैठती है।
फ़िल्म का अंत हैपी ऐंडिंग में होता है, और दोनों एक-दूसरे से मिलते ही नहीं, बल्की एक-दूसरे से विवाह भी कर लेते हैं। यह कहना मुश्किल है कि लंचबॉक्स की कहानी इस मलयालम फ़िल्म से चुराई गई है या नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि दोनों ही फ़िल्मों की मूल-प्रेरणा किसी अन्य जगह से आई हो। जो भी हो, लंचबॉक्स और सॉल्ट एंड पेप्पर में इतनी अधिक समानताएँ है कि वे इन दोनों फ़िल्मों को देखनेवालों को बरबस आकर्षित करती हैं। मुझे स्वयं लंचबॉक्स से अधिक सॉल्ट एंड पेप्पर पसंद आई। वह एक संपूर्ण फ़िल्म की तरह लगती है, यानी उसमें कहानी एक मुकाम तक पहुँचती है, और लंचबॉक्स की तरह अधर में लटकी हुई नहीं रहती है।
सॉल्ट एंड पेप्पर संपूर्ण रूप से एक व्यावसायिक – और सफल – फ़िल्म है, जबकि लंचबॉक्स फ़िल्म फ़ेस्टिवलों, विदेशी दर्शकों और ऑस्कार जैसे पुरस्कारों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। वह भारतीय दर्शकों के साथ सही गोट नहीं बैठा पाती है। तकनीकी दृष्टि से लंचबॉक्स त्रुटि-रहित फ़िल्म हो सकती है, पर यह भारतीय फ़िल्मों के रसिकों को रुचती नहीं है। यही इस फ़िल्म की कमी है।
आपमें से जिन लोगों ने लंचबॉक्स और मलयालम की सॉल्ट एंड पेप्पर फ़िल्म दोनों देखी हों, वे बताएँ कि क्या उन्हें भी इन दोनों फ़िल्मों की समानताएँ देखकर आश्चर्य हुआ था।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 9 टिप्पणियाँ
लेबल: फ़िल्म समीक्षा, मलयालम फ़िल्म, लंचबॉक्स, सॉल्ट एंड पेप्पर
Monday, March 25, 2013
टाइम्स ऑफ़ इंडिया का दकियानूसी उर्दू प्रेम
संजय दत्त को पाँच साल की जेल सज़ा होने की ख़बर आते ही अख़बारों में इसी की चर्चा छायी रही। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भी यही बात थी। उसमें छपी एक ख़बर ने विशेषरूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया और मैं सोचने के लिए मजबूर हुआ कि यह अख़बर इस तरह का घिनौना काम क्यों कर रहा है।
यह ख़बर थी, उर्दू अख़बारों में संजय दत्त के मामले में क्या कहा गया है इसकी समीक्षा। अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया आए दिन तो उर्दू अख़बारों में क्या छपा है इसकी समीक्षा प्रकाशित नहीं करता है न ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर उर्दू अख़बारों को याद करता है – उदाहरण के लिए लगभग इसी समय इतालवी कमांडो को इटली से वापस न भेजने का इटली की संसद का निर्णय भी एक मुख्य सुर्खी रही थी, पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मुद्दे पर उर्दू अख़बारों की राय की तलब नहीं की।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह करतूत कितनी राष्ट्रविरोधी और घातक है यह उन सभी को मालूम होगा जो यह जानते हैं कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा नहीं है बल्कि वह उत्तर और दक्षिण भारत (जहाँ उर्दू साहित्य का उद्भव और प्ररंभिक विकास हुआ था) के शिष्टजनों की भाषा है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, दलित आदि सभी शामिल हैं। उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति का अंग था, जो भयानक रूप से सफल हुआ और मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दे बैठा और देश को दो (और बाद में तीन) टुकड़ों में बाँट बैठा, और यह नरसंहार अब भी थमा नहीं है – पाकिस्तान में जो नरमेध मचा हुआ है वह इसका सबूत है।
तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा उर्दू अख़बारों की तलब केवल मुसलमानों से संबंधित विषयों में करना अंग्रेज़ों की इसी बाँटो और राज करो वाली घातक नीति को तूल देना है और उर्दू को मात्र मुसलमानों के साथ जोड़कर उसकी असमय मृत्यु के लिए रास्ता साफ करना है। आज यदि इस देश में उर्दू की हालत खस्ता है, तो इसका मुख्य कारण उसे मुसलमानों की भाषा समझना और देश-विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना है। जिस भाषा का संबंध देश विभाजन से हो और पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण देश से संबंधित हो, उसे देशवासियों के दिलों में कैस स्थान मिल सकता था। पर यह निष्कर्ष एक ग़लत प्रचार पर आधारित है। उर्दू न तो मात्र मुसलमानों की भाषा है न ही वह किसी ग़ैर-भारतीय उपज है। वह इस देश में पैदा हुई नवीनतम भाषा है जिसमें गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस देश की सबसे लोक-प्रिय और आम भाषा है, और यह हिंदी का ही एक परिष्कृत रूप है। जिस तरह हनुमान शाप-वश अपनी ही ताकत़ भूल गए थे, उसी तरह हिंदी भी अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति के शाप के प्रभाव से अपने ही परिष्कृत रूप उर्दू को भूल ही नहीं गई है बल्कि उसे अपना शत्रु मानने लगी है, यद्यपि कई जांबवानों ने हिंदी को अपने भूले-बिसरे रूप उर्दू की याद दिलाई है – डा. रामविलास शर्मा ने कई दशक पहले यह काम किया था, और अब न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू यह काम कर रहे हैं। आइए, इसे समझें कि हिंदी और ऊर्दू को, जो एक भाषा हैं, अलग क्यों और कैसे किया गया।
1857 के संग्राम में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़े थे और उनका लगभग इस देश से खात्मा कर दिया था। यदि पंजाब, नेपाल आदि कुछ रियासत अंग्रेजों की फ़ौजी मदद न करते और दक्षिण के रियासत इस संग्राम में शामिल हो गए होते तो अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर तभी बंध चुका होता और आज भारत का इतिहास, और विश्व का इतिहास भी, कुछ और ही हुआ होता। पर इस संग्राम को दबाने में अंग्रेज सफल हुए और वे समझ गए कि इस देश पर अपनी हुकूमत कायम रखनी हो, तो यहाँ के लोगों को विभिन्न परस्पर वैमनस्यपूर्ण गुटों में तोड़ना होगा। इनमें से प्रमुख गुट हिंदुओं और मुसलमानों के थे। इनमें दरार डालने की कूटनीति अंग्रेजों ने बड़े ही संगठित तरीके से शुरू कर दी। इस कूटनीति की आधारशिला भारतीय जनता की उस समय की साझी भाषा हिंदुस्तानी को दो अलग-अलग भाषाओं में विभाजित करना थी। अंग्रेज जानते थे कि कौमी एकता का एक प्रमुख खंभा भाषा होता है और भाषा को बाँटते ही कौम भी बँट जाता है।
इस नीति के तहत फोर्ट विलयम में स्थापित भाषा कोलेज में भाषाविद गिलक्राइस्ट के नेतृत्व में हिंदी और उर्दू को अलग करने की साजिश को अंजाम दिया गया। गिलक्राइस्ट ने पंडित सदासुखलाल जैसे लेखकों की मदद से संस्कृत बहुल भाषा में कुछ पुस्तकें प्रकाशित करवाईं, और इसी प्रकार उर्दू-फारसी बहुल भाषा में और फारसी लिपि में कुछ अन्य किताबें छपवाईं और यह घोषित कर दिया कि हिंदी हिदुओं की भाषा है और उर्दू केवल मुसलमानों की। इसके अलावा अंग्रेजों ने अनगिनत मौलवियों और पंडितों को भी इस घातक धारणा को प्रचारित करने के काम में लगा दिया। कुछ ही दशकों में उनका यह प्रचार रंग लाने लगा और लोग हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएँ समझने लगे। इतना ही नहीं हिंदी को मात्र हिंदुओं की और उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा मानने लगे। इसकी परिणति देश-विभाजन और देश के विभाजन से जुड़े भयानक नर-संहार में हुई।
हिंदी-उर्दू अलग-अलग भाषाएँ हैं, यह बात कितनी बेबुनियाद है यह इस पर विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे प्रेमचंद हिंदी और उर्दू दोनों में ही लिखते थे। इसके अलावा मंटो, फिराक, राजिंदर सिंह बेदी, आदि अनेक उर्दू के लेखक मुसलमान नहीं हैं। आज भी यदि आप उत्तर प्रदेश या बिहार के देहाती इलाकों में चले जाएँ और लोगों की बातें सुनें, तो आप कह नहीं पाएँगे कि वे हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू। उर्दू-हिंदी में केवल उच्च स्तरीय लेखन और लिपि में फ़र्क है, और इस फ़र्क को दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है। लिपि की समस्या कुछ हद तक आज कम होती जा रही है क्योंकि अब बहुत सी उर्दू रचनाएँ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रही हैं और खूब बिक रही हैं क्योंकि देवनागरी लिपि में आने से वे हिंदी भाषियों को भी सुलभ हो जाती हैं।
अब अंग्रेजों के यहाँ से गए साठ से अधिक वर्ष हो गए हैं और हममें से कई लोग इस बात को समझने लगे हैं कि अंग्रेजों ने हमें कैसे उल्लू बना दिया था। पर इन समझनेवाले लोगों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया शामिल नहीं है। वह अब भी यह राग अलाप रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और उर्दू अख़ाबार की राय उन्हीं विषयों में लेने की ज़रूरत है जिनका संबंध मुसलमानों से है। आश्चर्य की बात यह है कि यही अख़बार बड़े ज़ोर-शोर से अमन की आशा नाम का अभियान चला रहा है जिसका कथित उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बुद्धि जीवियों को निकट लाना है। पर इस अख़बार को यह मामूली बात भी अब तक समझ में नहीं आ सकी है कि भारत और पाकिस्तान को निकट लाने का सूत्र दोनों की भाषा में बनाई गई कृत्रिम दरारों को दूर करने में निहित है। भारत और पाकिस्तान को पास लाने का पहला सोपान हिंदी और उर्दू का एकीकरण है। और यह एकीकरण तब तक संभव नहीं है जब तक उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा समझा जाता जाएगा। उर्दू समस्त भारत की उपज है। वह हिंदुओं और मुसलमानों, सिक्खों और अन्य समुदायों की साझी विरासत है। उसमें भाषाई नज़ाकत चरम स्थिति तक पहुँचा दी गई है और इस भाषा में गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इस अभिव्यक्ति शक्ति से अपने आपको वंचित करने के कारण ही हिंदी वह भव्यता नहीं प्राप्त कर पाई है जो वह प्राप्त कर सकती थी। हिंदी में संस्कृत के शब्द भरने और उससे आम बोलचाल के शब्दों को उर्दू के शब्द मानकर निकालने की जो ग़लती की गई, उससे उसकी अभिव्यंजना शक्ति काफी हद तक कुंठित हुई। इतना ही नहीं, उसे फिर से परिमार्जीत करने में दशकों लग गए। अब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वह संपूर्ण रूप से परिमार्जित हो गई है। यह इस बात से स्पष्ट है कि हिंदी की कविताएँ - और भाषा अपने सबसे अधिक निखरे हुए रूप में कविताओं में ही दिखाई देती है - अब भी आम आदमी के लिए दुरूह हैं। क्या आप किसी आम आदमी को निराला, जय शंकर प्रसाद, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि की कविताओं का रसास्वादन करते हुए सोच सकते हैं? इनके लिए इन महान कवियों की कविताएँ दुरूह और कठिन ही बनी हुई हैं। इसकी तुलना में उर्दू की गज़लें, ग़ालिब की रचनाएँ और और अन्य उर्दू शायरों की कविताएँ, आम लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ चुकी हैं, उनके कई अंश मुहावरों का रूप ले चुके हैं। उर्दू के कहानी-किस्से भी लोगों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। समस्त हिंदी फिल्म और फिल्मी गानों की भाषा अधिकांश में उर्दू है और उनकी लोकप्रियता को लेकर कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।
यदि हिंदी और उर्दू में कृत्रिम दरारें नहीं डाली गई होतीं, तो इस मिली-जुली भाषा ने मुग़लों के अंतिम समय में जो आश्चर्यजनक कथन शैली विकसित कर ली थी, वह अनायास ही हिंदी को प्राप्त हो गई होती और उसे कई दशक बिताकर नए सिरे से अपनी अभिव्यंजना शक्ति विकसित नहीं करनी पड़ती और हिंदी आज जहाँ पहुँच सकी है, उससे कई दशक आगे की मंजिल प्राप्त कर गई होती।
यह बात बरसों पहले डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में कही थी, और एक अनोखे संयोग से आज लगभग उन्हीं की बातों को एक समकालीन विचारक दुहरा रहे हैं। ये हैं सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जो प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग सत्यम ब्रूयत में दो महत्वूपूर्ण लेख लिखे हैं जिनका विषय उर्दू और देश-विभाजन हैं। अपने उर्दू वाले लेख में उन्होंने लगभग वे बातें दुहराई हैं जो डा. शर्मा पहले कह चुके हैं, कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा कतई नहीं है बल्कि वह भारत में रहनेवाले लोगों की साझी विरासत है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिक्ख, दलित सभी शामिल हैं। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा इस साझी भाषा को तोड़ने की कूटनीति का भी विस्तार से वर्णन किया है। अपने दूसरे महत्वपूर्ण लेख में उन्होंने पाकिस्तान को एक कृत्रिम देश करार देते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को फिर से एक होने का आह्वान किया है। यह भी डा. शर्मा अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं।
इन देशों का फिर से एक होना आज एक असंभव सी बात लग सकता है, पर यही इन देशों का प्रारब्ध है जिसे उन्हें आनेवाले पचास-सौ सालों में साकार करना होगा। आज हर युवक और विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह इस सपने को सत्य में बदलने के लिए अपना योगदान करे। शुरुआत वह उर्दू सीखकर और उर्दू साहित्य से अपना परिचय बढ़ाकर कर सकता है। इससे उसे यह अच्छी तरह समझ में आ जाएगा कि ये दोनों भाषाएँ एक ही हैं और ये दोनों भाषाएँ बोलनेवाले लोग भी वास्तव में एक ही कौम के अंश हैं, भले ही वे अलग-अलग धर्मों में विश्वास करते हों। दो धर्म, दो देश वाली विचारधारा अंग्रेजों द्वारा इस देश को कमज़ोर करने और तोड़ने के लिए फैलाया गया विषवृक्ष है। यह पाकिस्तान के बनते ही उसके दो टुकड़ों में बटने से और पाकिस्तान के आज की हालात से बखूबी स्पष्ट है। आज पाकिस्तान नाम के लिए मुसलमानों का देश है पर वहाँ मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। सुन्नी शिया को मार रहे हैं, अफगान पाकिस्तानियों को मार रहे हैं और पाकिस्तानी अफगानों, अहमदियों, बोहरा मुस्लिमों और महिलाओं पर अत्याचार ढो रहे हैं।
हम सबको इस विष-वृक्ष की जड़ें काटकर इस देश को (जिसमें उसके दो भटके टुकड़े भी शामिल हैं) मजबूत करना होगा।
लेखक: बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण 12 टिप्पणियाँ
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