Tuesday, June 16, 2009

हिंदी महाजाति की अवधारणा और डा. रामविलास शर्मा

गांधी जी का अधूरा काम वाले पोस्ट में मैंने डा. रामविलास शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस सुझाव का जिक्र किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि समस्त हिंदी भाषी प्रेदश को एकीकृत करके एक विशाल हिंदी राज्य बना देना चाहिए, उसी तर्ज पर जैसे तमिल, मलयालम, गुजराती आदि अन्य भाषाओं के लिए अलग राज्य बनाए गए हैं।

इस लेख की टिप्पणियों में गिरिजेश राव और समीर लाल (उड़न तश्तरी) ने शंका प्रकट की कि यह आज की परिस्थिति में शायद व्यावहारिक नहीं होगा।

तो आइए देखें, कि डा. शर्मा ने उक्त प्रस्ताव क्यों रखा था और वे इसे व्यावहारिक क्यों समझते थे। डा. शर्मा भारत के चोटी के विचारक हैं और उनके कलम से इस तरह का प्रस्ताव बिना मजबूत कारण के नहीं आएगा।

इस संबंध में डा. शर्मा के विचार अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े हैं, पर इसका सबसे सुलझा हुआ विवेचन उनके महा ग्रंथ “भाषा और समाज”, वाणी प्रकाशन, में देखने को मिलता है। इस पुस्तक में उन्होंने भाषा के उद्भव से लेकर हिंदी भाषा के वर्तमान स्वरूप तक की हजारों सालों की यात्रा का अत्यंत सुस्पष्ट विवेचन किया है।

उनका कहना है कि जिस काल में भाषा का उद्भव हुआ था, उस अति प्राचीन काल में मनुष्यों की समाज व्यवस्था आदि साम्यवाद के जैसे थी। यानी मनुष्य छोटे समूहों में रहता था जिसके सभी सदस्य एक दूसरे के साथ खून के रिश्ते से जुड़े होते थे। इसी तरह की समाज व्यवस्था मनुष्य के निकट के संबंधी गोरिल्ला, चिंपैंजी आदि नरवानरों में भी देखने में आती है।

मनुष्यों की इन टोलियों को डा. शर्मा गण का नाम देते हैं, जिसे ट्राइब, कबीला आदि भी कहा जा सकता है। इनमें एक प्रधान पुरुष होता था, और उसके भाई-बहन, बीवी-बच्चे आदि से गण बना होता था। जीविकोपार्जन का मुख्य जरिया शिकार या फल आदि बटोरना होता था। संपत्ति नाम की कोई चीज किसी के पास नहीं थी। केवल जमीन थी, जिसमें यह गण आहार खोजता था। इस पर गण के सभी सदस्यों का, स्त्री-पुरुष दोनों का, समान अधिकार होता था। अपने क्षेत्र की रक्षा गण के सदस्य अन्य मनुष्यों से करते थे। लड़ाई-झगड़े मुख्यतः गणों के बीच होती थी। इन लड़ाइयों में गण के सभी सदस्य भाग लेते थे।

कहने का मतलब है कि वर्ण-व्यवस्था का उद्भव नहीं हुआ था और ऊंच-नीच, जांति-पांति की अवधारणा अभी नहीं बनी थी।

मनुष्य के इस आदि अवस्था की सबसे महान उपलब्धि ऋग्वेद है। यह उसी अवस्था में रची गई थी। डा. शर्मा कहते हैं कि ऋग्वेद में जांति-पांत, ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि का उल्लेख नहीं है। ऋचाएं सभी रचते हैं, लोहार भी, बढ़ई भी, पशुपालक भी, सभी। युद्ध भी सभी लड़ते हैं। क्षत्रियों का अलग वर्ग तब नहीं था। देवी-देवता भी गण के सदस्यों जैसे ही थे, उनका मनुष्यों से ऊंचा स्थान नहीं था। ऋग्वेद के मंत्र रचनेवाले लोग देवी-देवताओं को उसी तरह संबोधित करते हैं, जिस तरह किसी मित्र को या भाई को।

लेकन जब गणों की संख्या बढ़ने लगी, और कृषि आदि का विकास होने लगा और लोगों में संपत्ति इकट्ठी होने लगी, तो समाज व्यवस्था थोड़ी और जटिल हो गई। रक्त संबंधों पर आधारित गण व्यवस्था अपर्याप्त साबित होने लगी। गणों के बीच व्यापार भी बढ़ने लगा और अनेक गण एक ही स्थान में विनिमय आदि के लिए इकट्ठे होने लगे। इन्हीं स्थलों ने बाद में नगरों का रूप लिया। इससे रक्त संबंध कम महत्वपूर्ण होने लगा। विभिन्न पेशे भी बनने लगे, जिनमें से कुछ अधिक महत्वपूर्ण और कुछ कम महत्वपूर्ण समझे जाने लगे। अधिक महत्वपूर्ण समझे जानेवाले पेश अपनाए हुए लोगों में पैसे और अधिकार भी जमा होने लगे। इस तरह समाज में सत्ता और धन का असमान वितरण होने लगा। इसी से वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ। जिनके हाथ में सत्ता और अधिकार था, वे क्षत्रिय कहलाए, क्षत्रियों द्वारा दूसरों पर राज करने को सही ठहराने वाले तर्क-जाल बुननेवालों को ब्राह्मण कहा जाने लगा, व्यापार में संलग्न लोगों को वैश्य कहा जाने लगा, और बाकी सब कारीगरों को शूद्र कहा जाने लगा। यह व्यवस्था भारत में ही नहीं दखी गई है, बल्कि सभी सभ्यताओं में मनुष्य के इस अवस्था में पहुंचने पर यह प्रकट हुई है।

इसी व्यवस्था को सामंतवाद कहा जाता है। धर्म और सामंतवाद का उद्भव एक साथ होता है। धर्म का मुख्य काम समाज में धन और अधिकारों के असमान वितरण को सही ठहाराना होता है।

यजुर्वेद के समय तक आते-आते समाज की यह व्यवस्था पुख्ता हो चुकी थी। युजुर्वेद में वर्ण-व्यवस्था के अनेक प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य शूद्र का उल्लेख भी है। यजुर्वेद ऋग्वेद के लगभग एक हजार साल बाद अस्तित्व में आया है।

मानव विकास की इस अवस्था में सामंतवाद प्रगतिशील भूमिका निभाता है, वह रक्त संबंधों पर आधारित समाज व्यवस्था को और व्यापक बनाकर अनेक गणों को मिलकार एक जाति का निर्माण करता है।

डा. शर्मा ने जाति शब्द का बहुत विशिष्ट प्रयोग किया है। वे इसे अंग्रेजी के नेशन शब्द के समतुल्य के रूप में प्रयोग करते हैं। उनके लिए जाति शब्द अंग्रेजी के कास्ट शब्द के समतुल्य अर्थ बिलकुल नहीं रखता। डा. शर्मा की पुस्तकों को पढ़ते समय इस शब्द के इस खास अर्थ को समझना बहुत जरूरी है।

जाति का गहरा संबंध भाषा से होता है। दरअसल एक ही भाषा बोलनेवाले लोग मिलकर ही जाति का निर्माण करते हैं। जब गण टूट जाते हैं, तो लोगों को जोड़नेवाला तत्व भाषा ही रह जाता है। एक ही भाषा बोलनेवाले लोगों में परस्पर एक विशिष्ट संबंध सा बनता जाता है, जिसे सामंतवाद भी खूब बढ़ावा देता है। जाति और भाषा के प्रारंभिक विकास में सामंतवाद की भी बड़ी भूमिका है।

जब सामंतवाद खूब बढ़ने लगता है, तो वर्ण-व्यस्था भी अपर्याप्त साबित होने लगती है। विनिमय केंद्रों के रूप में बड़े-बड़े नगर बनने लगते हैं। इन नगरों में सभी जातियों के लोग एकत्र होते हैं। नगरों में एक ही जाति के व्यक्ति का अपनी ही जाति के व्यक्ति से कम संपर्क होता है, और उसका नित्य अन्य जाति के लोगों के साथ अधिक संपर्क होने लगता है। इससे जातीय बंधन टूटने लगता है। इसके साथ ही सभी जातियों द्वारा एक ही भाषा के प्रयोग से सभी जाति के लोगों में अपनी भाषा के प्रति विशिष्ट लगाव पैदा होता है, और लोग अपनी पहचान भाषा के आधार पर करने लगते हैं। इस तरह हिंदी, तमिल, बंगाली, गुजराती आदि होने का लोगों को बोध होने लगता है। यह बोध अन्य सभी पहचानों से अधिक प्रबल होता है। इसमें धर्म और जाति (कास्ट) भी शामिल है।

जब यह बोध काफी प्रबल हो जाता है, तो महाजाति का निर्माण होता है। हिंदी, तमिल, गुजराति आदि डा. शर्मा की शब्दावली में महाजातियां हैं।

और राष्ट्र इन्हीं महाजातियों के मिलन से बनता है। इस तरह भारत-राष्ट्र हिंदी, तमिल, गुजराति आदि महाजातियों के मिलन से बना है। इन महाजातियों में से कोई सर्वोपरि नहीं है। सभी समान हैं।

अब इस सवाल को समझना अधिक आसान है कि डा. शर्मा ने सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर इतना जोर क्यों दिया। सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर ही हिंदी महाजाति निखर सकेगी। इससे ही हिंदी भाषियों में यह पहचान बनेगी कि हिंदी भाषा बोलने के नाते हम विशिष्ट हिंदी महाजाति, के अंग हैं। और इस बोध के बलवती होने पर ही हिंदी भाषी अपनी महाजाति को विकसित करने की ओर ध्यान देने लगेंगे।

आज स्थिति यह है कि हिंदी क्षेत्र अनेक टुकड़ों में बंटा हुआ है और इनके बीच की गलत राजनीति के कारण हिंदी भाषियों की शक्ति भी बंटी हुई है। इतना ही नहीं हिंदी महाजाति का बोध होना तो दूर, हिंदी भाषी अपने आपको राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, हरियणवी, भोजपुरी, लखनवी आदि के रूप में ज्यादा पहचानते हुए, अपने अधिक विराट हिंदी महाजाति के सदस्य होने की अस्मिता को भूलते जा रहे हैं। उनमें हिंदी महाजाति का अंग होने का बोध तक नहीं है, न ही वे हिंदी महाजाति को सुदृढ़ करने के लिए प्रयासरत ही हैं।

इससे भारत राष्ट्र कमजोर होता है। पहले बताया था का राष्ट्र इन्हीं महाजातियों का जमघट है। यदि इनमें एक भी महाजाति अपनी पूर्ण संभावना को प्राप्त न करे, तो इससे राष्ट्र कमजोर हो जाएगा।

दूसरे हिंदी महाजाति का क्षेत्र भारत के एक अत्यंत सामरिक भाग में है। यहां रह रहे लोगों ने सह्राब्दियों से भारत राष्ट्र की नियति का नियमन किया है। इसे आर्यावर्त (वैदिक काल में), हिंदुस्तान (मुसलमानों के काल में) आदि विशिष्ट नामों से पुकारा गया है। जब भी इस क्षेत्र में रह रही महाजाति सुदृढ़ थी, भारत भी अजेय था, और अन्य महाजातियां भी सुरक्षित थीं। पर जब भी हिंदी महाजाति कमजोर हुई, भारत भी लड़खड़ाने लगा था।

इसलिए हिंदी महाजाति को मजबूत करना भारत राष्ट्र की सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए आवश्यक है। यह तभी संभव है जब सभी हिंदी भाषी प्रदेशों को एकीकृत किया जाएगा और हिंदी भाषियों में एक महाजाति के सदस्य होने का बोध पैदा होगा। इसकी पहली कसौटी होगी हिंदी प्रदेश का राजनीतिक एकीकरण।

अब रहा व्यावहारिकता का प्रश्न। इसका भी जवाब डा. शर्मा ने दिया है। वे कहते हैं कि लोग हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर घबरा जाते हैं, और सोचते हैं कि इतने बड़े क्षेत्र पर एककीकृत शासन भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था को जन्म देगा। लेकिन डा. शर्मा इससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि यदि हिंदी महाजाति का बोध मजबूत हो, और उसके आधार पर हिंदी प्रदेश को एकीकृत किया जाए, जो निष्ठावान प्रशासक इतने बड़े क्षेत्र का भी अच्छी तरह प्रबंध कर सकते हैं। आखिर यदि चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, शेरशाह सूरी, अकबर आदि इतने बड़े प्रदेश को एकीकृत रख सकते थे, तो हम क्यों नहीं।

डा. शर्मा हिंदी प्रदेश की आज की बिखरी हुई अवस्था का ऐतिहासिक कारण भी हमें समझाते हैं। वे कहते हैं कि यह अंग्रेजों की कूटनीति का परिणाम है। अंग्रेजों को इसी प्रदेश में 1857 में हिंदुओं और मुसलमानों के सम्मिलित प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। यह इसका परिचायक है कि 1857 से पहले हिंदी महाजाति का अवबोध लोगों में आज से कहीं ज्यादा मात्रा में विद्यमान था। 1857 के बाद अंग्रेज समझ गए कि इस महाजाति को तोड़े बगैर वे भारत में टिके नहीं रह सकते।

हिंदी महाजाति को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने अनेक प्रकार की कूटनीति अपनाई। इनमें से एक हिंदी भाषा को तोड़ना भी था। ग्रिएर्सन आदि अंग्रेज भाषाविदों को काम पर लगाकर अंग्रेजों ने हिंदी भाषा के हिंदी और उर्दू ये दो रूप कर दिए और यह झूठा प्रचार भी कर दिया कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की। अंग्रोजों ने इस कूटनीति को कितने घातक रूप से अंजाम दिया इसका पूरा ब्योरा डा. शर्मा ने अपनी किताबों में दिया है।

अंततः अंग्रेज अपनी कूटनीति में सफल हुए और पाकिस्तान का उदय हुआ। और इधर भारत में हिंदी महाजाति भी धराशायी हो गई।

डा. शर्मा कहते हैं कि आजाद भारत को अंग्रेजों की इस विषैली नीति को निरस्त करने का प्रयास करना चाहिए और हिंदी महाजाति को एक बार फिर उठाना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने हिंदी प्रदेश के एकीकरण की बात की है।

इसके बारे में एक प्रश्न और उठ सकता है। हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर अन्य भाषा-भाषी घबरा जाएंगे, और वे उसका विरोध करेंगे। इसका भरपूर उत्तर डा. शर्मा ने अपनी दूसरी किताब “भारत की भाषा समस्या” में दी है, जो भी वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

वे कहते हैं कि आज सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों का असली दुश्मन हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेजी है। अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों को, यानी भारतीय राष्ट्र का निर्माण करनेवाली सभी महाजातियों को घुन की तरह कमजोर कर रही है।

यदि सभी भारतयी भाषाओं को यह बात ठीक प्रकार से समझाई जा सके, तो वे हिंदी को अपनी बहन मानेंगे और उसके साथ सहयोग करते हुए अंग्रेजी को इस देश से हटाने में पूरा सहयोग करेंगे। इससे हमारा राष्ट्र और भी मजबूत हो उठेगा।

2 Comments:

AlbelaKhatri.com said...

atyant mahatvapoorna post
umda aalekh
upyogi jaankaari
waah waah............bdhaai !

गिरिजेश राव said...

अन्ने,
बात में दम है लेकिन सुनेगा कौन? ये मुआमला इतना आसान नहीं है। तब जब कि पब्लिक ने हरयाणा जैसे छोटे राज्य की तरक्की देख ली है। अब ये बात अलग है कि इसके लिए उसका राजधानी से सटे होना भी जिम्मेदार है, किसी को नहीं सूझता।

अब तो उत्तरप्रदेश को चार भागों में बाँटने के तरफदार मेजॉरिटी में हैं। लोकतंत्र है, मेजॉरिटी की चलेगी। डा. शर्मा तो माइनॉरिटी से आते हैं।


वैसे आप ने एक 'समांतर देश' वाली बात की उपेक्षा कर दी है। पहले से ही भन्नाये ग़ैर हिन्दी भाषी इसमें षड़यंत्र सूँघेंगे ही, हिन्दी वाले खुद विरोध में ताल ठोंक खड़े हो जाएँगें।

हिन्दीभाषी विभिन्न क्षेत्रों में एक दूसरे के प्रति इतने पूर्वग्रह हैं कि शायद ही कहीं और वैसे उदाहरण मिलें।

कुछ सपने देखने के लिए अच्छे होते हैं लेकिन होते तो सपने ही हैं !

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