ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्र के संत कवि ज्ञानेश्वर द्वारा रची गई श्रीमदभगवतगीता की अद्वितीय टीका है। यह ग्रंथ ज्ञानेश्वर की सबसे महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। इसमें ज्ञानेश्वर के व्यक्तित्व और उनके दर्शन की झांकी मिलती है। ज्ञानेश्वरी एक अत्यंत लोकप्रिय कृति है। इस कृति में ऐसे तत्व विद्यमान हैं जिनसे प्रेरणा प्राप्त करके मराठी भाषा में एक नवीन काव्य परंपरा का सूत्रपात्र हुआ।
संत ज्ञानेश्वर 13वीं शताब्दी में हुए थे। उस समय हिंदू समाज में जाति के आधार पर कट्टरता व्यापक पैमाने में मौजूद थी और सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों, बलि प्रथा, यज्ञ और तंत्र-मंत्र का बोलबाला था। इस पृष्ठभूमि में संत ज्ञानेस्वर ने लोक भाषा में श्रीमदभगवदगीता की व्याख्या की। ज्ञानेश्वर ने अपनी कृति के माध्यम से भ्रष्ट रीतियों का उन्मूलन करके नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की। उन्होंने नए सिरे से भक्ति मार्ग की व्याख्या की और जाति प्रथा को समाप्त करने का आग्रह करके समाज सुधार पर बल दिया। चिदविलासवाद अथवा स्फूर्तिवाद का प्रवर्तन करके उन्होंने महाराष्ट्र की दार्शनिक परंपरा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। इस सिद्धांत के अनुसार समस्त सृष्टि परमेश्वर के प्रकाश से दीप्त है और स्वयं अपने हाथों से किया गया काम ही पूजा है। इस प्रकार उन्होंने दलितों और नीची जाति के लोगों का उत्थान किया। संत ज्ञानेश्वर का जीवन धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध विजयी संघर्ष की सजीव गाथा है।
सात सौ वर्ष पूर्व रचा गया यह महान आध्यात्मिक काव्य आज भी प्रासंगिक है। ज्ञानेश्वरी ने लोगों की धार्मिक आस्थाओं की व्याख्या उनकी सामाजिक आवश्यकताओं के संदर्भ में की। उसने लौकिक और पारलौकिक संसार में अंतर दूर करके अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया । भक्तगणों ने ज्ञानेश्वरी की पूजा उसे मां मानकर की तथा उसकी स्तुति में जगह-जगह गीत गाए जाने लगे। आध्यात्मिक उत्थान में जाति या लिंग बंधन नहीं रहा। महाराष्ट्र में ज्ञानेस्वरी प्रत्येक वर्ग में पूजा की वस्तु बन गई।
संत ज्ञानेश्वर ने कुछ अन्य कृतियों की भी रचना की, जैसे अमृतानुभव, चांगदेवप्रशस्ति, हरिपथ और अभंग। इन सब कृतियों में भी ज्ञानेश्वरी भक्ति की दार्शनिकता की छाप है।
Friday, September 04, 2009
ज्ञानेश्वरी
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Thursday, September 03, 2009
दुहराना या दोहराना?
अनुवाद, संपादन और प्रूफ-शोधन के व्यवसाय से जुड़े होने के कारण मुझे शब्दों की सही वर्तनी और प्रयोग पर काफी ध्यान देना होता है। हिंदी में अनेक शब्दों के लिए एक से अधिक वर्तनियां चलती हैं। मैं कोशिश करता हूं कि विभिन्न विकल्पों में से मानक हिंदी द्वारा अपनाए गए विकल्प का ही प्रयोग करूं। यह मेरे लिए एक पेशेवरीय आवश्यकता भी है।
अभी हाल में दुहराना तथा उसके सजातीय कुछ शब्दों से सामना हो गया, और उनकी सही वर्तनी निश्चित करने के लिए मुझे अनेक व्याकरण पोथियों की गर्द झाड़नी पड़ी। अंत में किशोरीदास वाजपेयी की पुस्तक हिंदी शब्द मिमांसा में उनका समाधान प्राप्त हुआ।
जरा इन शब्दों को देखिए :- दुहराना, दुपहर, दुअन्नी, दुतल्ला, दुतरफा, दुपट्टा।
इन्हें अनेक पुस्तकों में इस तरह से भी लिखा हुआ मिलता है :- दोहराना, दोपहर, दोअन्नी, दोतल्ला, दोतरफा, दोपट्टा।
इनमें से सही वर्तनी कौन-सी है?
किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी शब्द मिमांसा में विस्तार से समझाया है कि इन सबमें दु वाले रूप सही हैं, यानी, दुहराना, दुपहर, दुअन्नी, दुतल्ला, दुतरफा, दुपट्टा।
हिंदी में संख्यावाचक शब्द बनाते समय मूल शब्द का ह्रस्वीकरण होता है –
एक – इक – इकतारा, इकहरा, इकलौता
दो – दु - दुहराना, दुपहर, दुअन्नी, दुतल्ला, दुतरफा, दुपट्टा
तीन – ति – तिपाई, तिकोना, तिरंगा
चार – च – चवन्नी
पांच – पंच – पंजाब, पंचरत्न, पंचांग, पंचमेल, पंचशील
छह – छि – छिहत्तर
सात – सत – सतरंगा, सत्ताईस, सत्तावन
आठ – अठ – अठन्नी
नौ - नव – नवग्रह, नवरत्न, नवदीप
सौ – सै – सैकड़ा
लाख – लख - लखपति
इस नियम को ध्यान में रखने पर दोपहर, एकतारा, सातरंगा, आठन्नी आदि शब्द गलत सिद्ध होते हैं।
किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी व्याकरण, वर्तनी आदि पर एक दर्जन से अधिक अत्यंत उपयोगी पुस्तकें लिखी हैं। उनके द्वारा लिखा गया हिंदी का सर्वांगीण व्याकरण, हिंदी शब्दानुशासन, कामता प्रसाद गुरु के हिंदी व्याकरण के बाद हिंदी का सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है। राहुल सांकृत्यान ने किशोरीदास वाजपेयी की व्याकरण प्रतिभा को देखते हुए उन्हें हिंदी का पाणिनी कहा था, जो उचित ही है।
वाणी प्रकाशन, दिल्ली ने अभी हाल में किशोरीदास वाजपेयी रचनावली प्रकाशित की है जिसमें वाजपेयी जी की सभी पुस्तकें शामिल की गई हैं। इन पुस्तकों में प्रमुख हैं –
हिंदी शब्द मिमांसा
अच्छी हिंदी
हिंदी वर्तनी
अच्छी हिंदी का नमूना
हिंदी निरुक्त
भारतीय भाषाविज्ञान
हिंदी शब्दानुशासन
संस्कृति का पांचवा स्तंभ
ये सभी पुस्तकें वाणी प्रकाशन, दिल्ली से अलग से भी उपलब्ध हैं।
हिंदी व्यवसाय में जुड़े सभी लोगों को (अनुवादक, संपादक, प्रूफ-शोधक, लेखक, अध्यापक, आदि) और साफ–सुथरी हिंदी लिखने में रुचि रखनेवाले लोगों को ये पुस्तकें अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। छात्रों के लिए भी ये अत्यंत उपयोगी हैं।
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Wednesday, September 02, 2009
जाति-धर्म के बंधनों को तोड़ता त्योहार ओनम
आज ओनम है, केरलवासियों का सबसे लोकप्रिय त्योहार। ओनम तब आता है जब वर्षा ऋतु समाप्ति पर होती है और चारों ओर हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है। नदी-नाले, तालाब और कुंए स्वच्छ जल से लबालब भरे होते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरमोत्कर्ष पर होता है।
किंवदंती है कि बहुत साल पहले राजा महाबली केरलवासियों पर राज करते थे। वे एक न्यायप्रिय, दयालु और प्रजावत्सल राजा थे। हर साल ओनम के अवसर पर राजा अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए उनके द्वारों पर पधारते थे। प्रजा अपने प्रिय राजा के स्वागत में बड़े उल्लास से ओनम त्योहार मनाती थी।
ओनम के पर्व पर केरल भर में नन्हे-मुन्ने बच्चे टोकरी लिए बाग-बगीचों में निकल प़ड़ते हैं और अपने-अपने घर-आंगन को सजाने के लिए सुंदर फूल तोड़ लाते हैं। सभी लोग पौ फटते ही जाग जाते हैं और नदी-तालाबों में जाकर स्नान करते हैं। प्रकृति तो सुंदर वेश-भूषा धारण किए हुए ही होती है, लोग भी, खासकर के बच्चे, नए-नए वस्त्र पहनते हैं। इन वस्त्रों को ओनक्कोडी कहा जाता है। गृहणियां घर-आंगन को बुहारकर साफ करती हैं और दीवारों और फर्श पर गोबर लीपती हैं। युवतियां आंगन में फूलों से रंगोली बनाती हैं और दीप जलाती हैं। इन रंगोलियों को पूक्कोलम (पू = फूल; कोलम = रंगोली) कहा जाता है। पूक्कोलम के चारों ओर युवतियां कैकोट्टिक्कली नाच करती हैं जिसमें वे मधुर-मधुर गीत गाती हुई और तालियां बजाती हुई पूक्कोलम के चारों ओर गीत की लय में थिरकती हैं।
बच्चे बूढ़े और जवान प्रकृति के निकट आने की कोशिश करते हैं। पेड़ों की डालियों से झूले टांगे जाते हैं। रात को खुले में नारियल और ताड़ के झूमते वृक्षों के नीचे कथकली आदि के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सब्जी मंडियों में तरह-तरह की सब्जियों का ढेर लगा रहता है, जिन्हें लोग आ-आकर ओनम की दावत तैयार करने के लिए खरीद ले जाते हैं। दावत केले के चौड़े पत्तों पर परोसी जाती है और उसमें तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन होते हैं। दावत के अंत में पायसम, यानी खीर, परोसी जाती है।
खेल-कूद और प्रतियोगिताएं ओनम त्योहार का अभिन्न अंग होती हैं। सबसे लोकप्रिय वल्लमकलि (जल-क्रीडा) है। यह नदियों और कायलों (समुद्र का वह भाग जो थल भागों के भीतर घुसा होता है) में आयोजित होती है। नौका दौड़ प्रतियोगिताएं सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। देश-विदेश से पर्यटक उन्हें देखने केरल की ओर उमड़ पड़ते हैं। ये नौकाएं खास प्रकार की होती हैं। एक-एक नौका में बीस-बीस, चालीस-चालीस या उससे भी अधिक खेवक होते हैं, जो सब एक खास गीत की लय में चप्पू चलाते हैं। उनके सशक्त एवं संगठित प्रयत्नों से नौकाएं पानी को चीरकर तीर की तेजी से बढ़ती हैं और दर्शकों में उल्लास और रोमांच भर देती हैं।
ओनम उन थोड़े से त्योहारों में से एक है जिनमें धर्म और जाति के बंधन तोड़कर लोग खुले दिल से भाग लेते हैं। केरल में हिंदू, मुसलमान और ईसाई पर्याप्त तादाद में हैं। तीनों ही धर्मों के अनुयायी ओनम त्योहार समान उत्साह से मनाते हैं। इतना ही नहीं केरलवासी जहां कहीं भी हों, ओनम मनाना नहीं भूलते। इस कारण ओनम आज एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय त्योहार हो गया है जो हमें धार्मिक भाईचारे की सीख देता है।
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Monday, August 24, 2009
जिन्ना, जसवंत और भारत का भविष्य

जिन्ना पर जसवंत सिंह द्वारा लिखी गई किताब (जिन्ना – भारत विभाजन के आईने में, राजपाल एंड सन्स, रु. 599) के प्रकाशित होते ही जसवंत को भाजपा से निष्पासित कर दिया गया और गुजरात में पुस्तक पर बैन लगा दिया गया।
दोनों ही बातें हमारे वैचारिक परिपक्वता पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। क्या इस देश में विभाजन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर खुले मन से चर्चा करना अपराध है? क्या हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां इतनी असुरक्षित और कमजोर हैं कि एक किताब के प्रकाशन से ही उनके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाता है?
विभाजन के बाद पैदा हुए भारतीयों के लिए विभाजन के समय की घटनाओं को गहराई से समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि उसके बिना उनके व्यक्तित्व को पूर्णता नहीं मिल सकती तथा देश के उद्भव की परिस्थितियों के बारे में उनके मन में अस्पष्टता बनी रहेगी।
इसलिए उन दिनों की घटनाओं पर प्रकाश डालनेवाली हर पुस्तक महत्वपूर्ण है। इस तरह की पुस्तकों पर बैन लगाकर वर्तमान पीढ़ी के लोगों को विभाजन के समय की बातों को जानने से रोका जा रहा है और इसे मैं बिलकुल ही ठीक नहीं समझता।
मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि 1947 में देश का विभाजन गलत था। इससे शायद ही किसी का फायदा हुआ है, और हुआ भी है तो भारत का अहित चाहनेवालों का, जैसे ब्रिटन, और अब चीन और अमरीका। मेरे विचार से देश का विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि उस समय के नेता राजनीति में अकुशल थे और दीर्घदृष्टिहीन थे, और कुछ तो मौका परस्त और अंग्रेजों के हाथों के कठपुतले भी थे। जिन्ना, नेहरू आदि में भारी अहंकार भी था, जिसके चलते, वे देश हित को अपनी प्रतिष्ठा के आगे नहीं रख सके।
कोई भी ऐतिहासिक निर्णय अनिवार्य नहीं होता। यदि बाद की पीढ़ियों को लगे कि किसी निर्णय से उनका विकास अवरुद्ध हो रहा है अथवा कोई निर्णय गलत कारणों से या गलत पक्षों के फायदे के लिए लिया गया था, तो उसे पलटना जरूरी होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्रथम महायुद्ध के दौरान जर्मनी के गलत विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण। इसका एक अन्य उदाहरण है समस्त यूरोप का एकीकरण, जिसकी प्रक्रिया अभी भी चल रही है। 1960-70 के वर्षों में जब सोवियत संघ शक्तिशाली था और शीत युद्ध पराकांष्ठा पर था, इन घटनाओं की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, पर 30-40 सालों में ही ये होकर रहीं।
इसी तरह भारत का विभाजन भी कोई पत्थर पर खींची गई लकीर नहीं है, जो बदल नहीं सकती। अब इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध हो गए हैं कि विभाजन जिन्ना, नेहरू, पटेल, राजाजी, राजेंद्र प्रसाद आदि उन दिनों के नेताओं की राजनीतिक भूल थी। इससे न पाकिस्तान का कोई भला हुआ है न भारत का। दोनों देशों की जनता को उसके कारण अपार कष्ट ही झेलना पड़ा है और वे अब भी झेल रहे हैं। काश्मीर जैसे अनसुलझे मुद्दे, तीनों देशों में सांप्रदायिकता की बाढ़ और आतंकवाद भी उसी का परिणाम है।
देश के मूल विभाजन के चंद वर्षों बाद ही बंग्लादेश का बनना इसका अकाट्य प्रमाण है कि जिन आधारों पर देश का विभाजन किया गया था, वह खोखला था। आज पाकिस्तान में जो हो रहा है जिसके कारण वह तेजी से एक विफल राज्य बनता जा रहा है, और उसके द्वारा निरंतर आतंकवाद समर्थन देने और भारत के प्रति विद्वेषात्मक रवैया बनाए रखने से उसका भारत सहित समस्त मानव जाति के लिए एक महा खतरा बन जाना, ये सब भी इसके प्रमाण हैं कि विभाजन गलत था। भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश में सांप्रदायिक और संकीर्णतावादी ताकतों का बलवती होना भी विभाजन की विषैली विरासत है।
इसलिए हम सबको यह सोचने लगना आवश्यक है कि किस तरह विभाजन को निरस्त किया जाए। इसी में भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश की जनता की भावी खुशहाली निर्भर करती है। भारत के लिए देश का एकीकरण सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है। आज पाकिस्तान और बंग्लादेश का उपयोग करके चीन, अमरीका, ब्रिटन आदि देश भारत विरोधी कार्रवाई को अंजाम देते हैं, और भारत को कमजोर रखने का भरसक प्रयास करते हैं। इनका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के देशों का एकीकरण आवश्यक है। भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश ऐतिहास काल से एक रहे हैं, चाहे वह चंद्रगुप्त मौर्य का समय हो या अकबर का या अंग्रेजों का। आज भी भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश की जनता में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति है और सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक भाषाई और आर्थिक स्तरों पर अनेक समानताएं हैं, जो हजारों सालों से साथ रहने और भौगोलिक निकटता का परिणाम है। इस सहानुभूति और समानताओं के आधार पर इन तीनों देशों को पूर्ववत एक किया जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, अफगानिस्तान आदि भी ऐतिहासिक काल में एक ही संस्कृति से परस्पर बंधे थे।
भारत के एकीकरण को सिद्ध करने के लिए विभाजन की घटनाओं पर पुनविर्चार और उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। जसवंत और उनके पहले आडवानी ने जिन्ना के पुनर्मूल्यांकन का जो प्रयास किया है, वह इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे हमें विभाजन के बारे में, और उसके बहाने उपमहाद्वीप के देशों के एकीकरण के बारे में, पुनः सोचने का अवसर प्रदान करते हैं।
राजनीति असंभव को संभव करने की कला है। 1942 तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि पांच ही वर्षों में भारत दो टुकड़ों में और फिर तीन टुकड़ों में बंट जाएगा। पर अंग्रेजों और जिन्ना जैसे लोगों ने, नेहरू, पटेल आदि की राजनीतिक अकुशलता से मदद लेते हुए, इसे साकार करके दिखाया।
इसी तरह आज 2009 में भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश का फिर से एक होना ख्याली पुलाव लगता है, पर यदि सही दिशा में कोशिशें की जाएं, यही पुलाव 2014 में ख्याली न रहकर वास्तविक भी बन सकता है।
पर इसके लिए भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश के लोगों को इसके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। जसवंत सिंह की किताब का महत्व इसी में है। वह लोगों को विभाजन के बारे में सोचने पर मजबूर करता है। विभाजन की घटनाओं पर पुनर्विचार करने पर उसकी अनिवार्यता की धारणा कमजोर हो जाती है, और हमें विदित होने लगता है कि वह अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल थी, भारत को कमजोर रखने की। हमें समझ में आने लगता है कि भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश का असली हित एक होने में हैं। हमें समझ में आने लगता है कि आतंकवाद, कश्मीर, सांप्रदायिकता, संकीर्णतावाद, विदेशी हस्तक्षेप आदि का सही समाधान विभाजन को पलटने में है। हमें यह भी समझ में आता है कि तीन टुकड़ों में बंटे रहकर न तो भारत, न ही पाकिस्तान या बंग्लादेश ही जनता की गरीबी, भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी, आदि, से ठीक से लड़ पा रहे हैं, और इनसे लड़ने के बजाए एक-दूसरे के विरुद्ध लड़कर अपनी-अपनी शक्ति को क्षीण कर रहे हैं।
जब हमारी पीढ़ी के लोगों को ये बातें समझ में आ जाएंगी, वे विभाजन को निरस्त करने के बारे में सोचने लगेंगे। और यदि हमें कोई दूर-दृष्टिवाले कुशल नेता का मार्गदर्शन भी मिल जाए, तो यह एकीकरण संभव भी हो सकता है।
जहां तक मैं समझ सका हूं, जिन्ना तथा नेहरू-पटेल में जो वैचारिक मतभेद था, वह भारत की राजनीतिक स्वरूप को लेकर था। जिन्ना भारत को अनेक राज्यों का विशृंखलित संघ के रूप में देखते थे, जबकि नेहरू-पटेल, एक दृढ़ केंद्र वाले यूरोपीय शैली के राष्ट्र के रूप में।
यदि भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश को एक करना है, तो पहले यह इन तीनों के एक विशृंखलित संघ के रूप में ही संभव हो पाएगा। इस विशृंखलित संघ को साकार करने में जिन्ना के विचार उपयोगी हो सकते हैं। इस विशृंखलित राष्ट्र संघ में हमें नेपाल और श्रीलंका को, और संभव हो, तो अफगानिस्तान और बर्मा तक को भी खींच लेना चाहिए, क्योंकि ये भी भारत विरोधी प्रयासों के अड्डे बनते जा रहे हैं, और तेजी से चीन, अमरीका आदि के प्रभाव में जा रहे हैं, जो हमारे हित में नहीं है।
बाद में, तीस-पचाल वर्षों बाद, जब इस विशृंखलित संघ के रूप में रहते हुए सभी देशों के नेताओं और जनता को तसल्ली हो जाए, तो विशृंखलन को उत्तरोत्तर कम किया जा सकता है, और नेहरू-पटेल वाले अधिक दृढ़ केंद्रीकृत राष्ट्र की ओर बढ़ा जा सकता है। यूरोप का एकीकरण भी इसी तरीके से हो रहा है। पहले अनेक मामलों में यूरोपीय संघ के घटक देश स्वतंत्र थे। फिर धीरे-धीरे उनकी बहुत से विशेषाधिकार यूरोपीय संघ को स्थानांतरित किए गए, जैसे, सेना, विदेश नीति, मुद्रा, नागरिकता आदि।
इसी रास्ते हम भी चल सकते हैं। इसलिए 1947 के नेताओं में जो विचार-भेद था वह हमारे लिए अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक है, ये सब नेता अखंड भारत को दृष्टि में रखकर सोचते थे, क्योंकि तब भारत अविभाजित था।
विभाजन को इस तरह निरस्त करना एक प्रतीकात्मक कार्य भी होगा और इस महा अभियान के साथ हम अपनी अनेक अन्य सामयिक समस्याओं को भी जोड़ सकते हैं, जो सब ले-देकर अंग्रेजी राज की ही विरासतें हैं। जैसे राष्ट्रभाषा का विषय और आरक्षण का मुद्दा। आज आरक्षण की राजनीति देश को बांट रही है और इस देश में रह रहे सभी लोगों के भावनात्मक एकीकरण के आड़े आ रही है। इसी तरह राष्ट्रभाषा के विषय का आजादी आंदोलन कोई ठोस समाधान नहीं प्रस्तुत कर सका, जिसके परिणामस्वरूप हमारी सभी भाषाओं की बाढ़ रुक सी गई है और हम पर आज भी अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व बना हुआ है। इससे देश कमजोर हुआ है और सत्ता-संपन्न (अंग्रेजी जाननेवाले) और सत्ता-विहीन (अंग्रेजी न जाननेवाले) में देश बंटता जा रहा है। राष्ट्र को जोड़े रखने और उसके विभिन्न भागों में विचार विनिमय को सुगम बनाने के लिए राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत इस जोड़नेवाली कड़ी के बिना अपना काम चला रहा है, क्योंकि शासन में अंग्रेजी का ही अधिक उपयोग होता है। इस तरह की विसंगतियों को भी विभाजन को निरस्त करने के महा अभियान के साथ जोड़कर आसानी से दूर किया जा सकता है।
इस तरह भारतीय उपमहाद्वीप के देशों का राजनीतिक एकीकरण 1857 की क्रांति या 1947 के आजादी आंदोलन के स्तर का महा प्रयास होगा, जो एक ही साथ कई समस्याओं का समाधन कर सकेगा। पर इतना बड़ा आंदोलना चलाना कोई आसान काम भी न होगा। इसके लिए हमें कांग्रेस की तरह का कोई उपकरण, गांधी जी जैसे कुशल विचारक और समन्वयवादी नेता, तथा भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, आदि के समान विचारशील और साहसी युवकों की आवश्यकता पड़ेगी।
1857 और 1947 में हमारे समक्ष शत्रु सुस्पष्ट था – अंग्रेज और अंग्रेजी राज। आज शत्रु उतना स्पष्ट नहीं है। इसी का लाभ उठाकर कुछ संकीर्णतावादी ताकतें, देशवासियों के ही एक हिस्से को अथवा अपने ही मूल देश के टुकड़ों को शत्रु का जामा पहनाकर जनता को संगठित करने का प्रयास कर रही हैं। यह प्रयास खंडित है, खराब राजनीति है और सामरिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। हमें असली शत्रु को पहचानना होगा। असली शत्रु है विभाजन के कारण पैदा हुई वैमनस्यपूर्ण परिस्थितियां। इन परिस्थितयों को शब्दों और विचारों में ऐसा परिभाषित और रूपायित करना होगा कि आम आदमी भी इन्हें शत्रु के रूप में पहचान सकें और इनके विरुद्ध राष्ट्रीय संघर्ष में मर-मिटने के लिए तैयार हो जाएं, उसी तरह जैसे वे 1857 में या 1947 में तैयार हुए थे। इसमें कवियों, लेखकों, नाटकारों, फिल्मकारों, आदि की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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Sunday, August 23, 2009
आइए आपको सिखाता हूं दक्षिण भारतीय मोदक बनाना

आज गणेश चतुर्थी है। घर में दक्षिण भारतीय शैली में मीठे मोदक बने। मैंने आपको बताने के इरादे से बनाने की सारी विधि का फोटो ले लिया ताकि आप भी इस स्वादिष्ट व्यंजन का कभी मजा ले सकें।
क्या-क्या चाहिए होगा
तो सबसे पहले आवश्यक चीजों की सूची देख लेते हैं। आपको चाहिए होंगे –
1. एक बड़ा नारियल
2. एक कप गुड़
3. एक कप चावल का महीन पिसा आटा
इतनी सामग्री से लगभग 20 मोदक बनेंगे। यदि आपको इससे अधिक चाहिए, तो इसी अनुपात में और सामग्री ले लें।
बनाने की विधि
1. नारियल का महीन कतरन बना लें।
2. एक कड़ाई में आधा गिलास पानी डालें और उसे उबलने के लिए रख दें। जब पानी उबलने लगे, गुड़ को उसमें डाल दें। थोड़ी देर में गुड़ पानी में पूरी तरह घुल जाएगा। तब नारियल की गिरी को कड़ाई में डाल दें और हिलाते रहें ताकि गुड़ और नारियल अच्छी तरह मिल जाएं। जब कड़ाई का सारा पानी उड़ जाए और गुड़ और नारियल अच्छी तरह मिल जाएं, तो कड़ाई को आंच से उतार लें। थोड़ी देर इंतजार करें ताकि नारियल-गड़ का पूरण थोड़ा ठंडा हो जाए। तब उसके आंवले के जितने बड़े गोल पिंड बना लें, जैसा चित्र में दिखाया गया है।
3. चावल के आटे को महीन छलनी से छान लें ताकि उसके कण बहुत छोटे हों। आटा जितना महीन होगा उतने अधिक अच्छे मोदक बनेंगे।
4. अब दूसरी कड़ाई में एक गिलास पानी डालकर उबलने के लिए आंच पर रख दें। उसमें एक चुटकी नमक भी मिलाएं। जब पानी उबलने लगे, तो उसमें चावल का आटा मिला दें और करछुल से अच्छी तरह हिलाते जाएं। चावल का आटा जब सारा पानी सोख ले, और अच्छी तरह पक जाए, तो कड़ाई को आंच से उतार दें। पका हुआ चावल का आटा इस तरह दिखना चाहिए।
5. पूरण के पिंडों से थोड़े बड़े गोल पिंड, चावल के पके आटे के भी बना लें। यदि चावल का आटा हाथ से चिपके, तो उंगलियों पर थोड़ा नारियल का तेल लगा लें। चावल के आटे के उतने पिंड बनाएं जितने पूरण के पिंड हों।
6. अब चावल के प्रत्येक पिंड को दोनों हाथों में पकड़कर दोनों हाथों के अंगूठों से दबाकर चपटा कर लें। 
7. उसके बीच में पूरण का एक पिंड रखकर पूरण के पिंड को चारों ओर से चावल के आटे से ढंक दें। चावल के आटे को ऊपर की तरफ इकट्ठा करके नोंक जैसा आकार दे दें, जैसा चित्र में दिखाया गया है।

8. इसी तरह सभी पिंड़ों को तैयार करें।
9. अब प्रेशर कुकर में इन पिंडों को रखकर 20 मिनट तक बिना वेट रखे भाप में पकाएं।
10. खाने से पहले गणेश जी को एक मोदक भोग लगाना न भूलें!
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