सोमवार, मार्च 25, 2013

टाइम्स ऑफ़ इंडिया का दकियानूसी उर्दू प्रेम

संजय दत्त को पाँच साल की जेल सज़ा होने की ख़बर आते ही अख़बारों में इसी की चर्चा छायी रही। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भी यही बात थी। उसमें छपी एक ख़बर ने विशेषरूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया और मैं सोचने के लिए मजबूर हुआ कि यह अख़बर इस तरह का घिनौना काम क्यों कर रहा है।

यह ख़बर थी, उर्दू अख़बारों में संजय दत्त के मामले में क्या कहा गया है इसकी समीक्षा। अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया आए दिन तो उर्दू अख़बारों में क्या छपा है इसकी समीक्षा प्रकाशित नहीं करता है न ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर उर्दू अख़बारों को याद करता है – उदाहरण के लिए लगभग इसी समय इतालवी कमांडो को इटली से वापस न भेजने का इटली की संसद का निर्णय भी एक मुख्य सुर्खी रही थी, पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मुद्दे पर उर्दू अख़बारों की राय की तलब नहीं की।

थोड़ा सोचने पर विदित होता है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया उर्दू अख़बारों का उन्हीं संदर्भों में उल्लेख करता है जिनका संबंध मुसलमानों से होता है। संजय दत्त मामले का संबंध मुंबई में आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट कराए जाने से है, और यह बम विस्फोट इससे पहले बाबरी मसजिद के ढहाए जाने के बाद हुए दंगों में सैकड़ों मुसलमानों को शिव सेना आदि हिंदुत्व पार्टियों द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने के बदले में कराए गए थे। इस तरह संजय दत्त मामले का सीधा संबंध मुसलमानों से है। इसीलिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस मामले के बारे में उर्दू अख़बारों के विचारों की समीक्षा करता है। इससे पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अफ़सल गुरु को फाँसी दिए जाने के बाद भी इस संबंध में उर्दू अख़बारों में छपे लेखों की समीक्षा छापी थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह करतूत कितनी राष्ट्रविरोधी और घातक है यह उन सभी को मालूम होगा जो यह जानते हैं कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा नहीं है बल्कि वह उत्तर और दक्षिण भारत (जहाँ उर्दू साहित्य का उद्भव और प्ररंभिक विकास हुआ था) के शिष्टजनों की भाषा है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, दलित आदि सभी शामिल हैं। उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति का अंग था, जो भयानक रूप से सफल हुआ और मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दे बैठा और देश को दो (और बाद में तीन) टुकड़ों में बाँट बैठा, और यह नरसंहार अब भी थमा नहीं है – पाकिस्तान में जो नरमेध मचा हुआ है वह इसका सबूत है।

तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा उर्दू अख़बारों की तलब केवल मुसलमानों से संबंधित विषयों में करना अंग्रेज़ों की इसी बाँटो और राज करो वाली घातक नीति को तूल देना है और उर्दू को मात्र मुसलमानों के साथ जोड़कर उसकी असमय मृत्यु के लिए रास्ता साफ करना है। आज यदि इस देश में उर्दू की हालत खस्ता है, तो इसका मुख्य कारण उसे मुसलमानों की भाषा समझना और देश-विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना है। जिस भाषा का संबंध देश विभाजन से हो और पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण देश से संबंधित हो, उसे देशवासियों के दिलों में कैस स्थान मिल सकता था। पर यह निष्कर्ष एक ग़लत प्रचार पर आधारित है। उर्दू न तो मात्र मुसलमानों की भाषा है न ही वह किसी ग़ैर-भारतीय उपज है। वह इस देश में पैदा हुई नवीनतम भाषा है जिसमें गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस देश की सबसे लोक-प्रिय और आम भाषा है, और यह हिंदी का ही एक परिष्कृत रूप है। जिस तरह हनुमान शाप-वश अपनी ही ताकत़ भूल गए थे, उसी तरह हिंदी भी अंग्रेजों की बाँटो और राज करो कूटनीति के शाप के प्रभाव से अपने ही परिष्कृत रूप उर्दू को भूल ही नहीं गई है बल्कि उसे अपना शत्रु मानने लगी है, यद्यपि कई जांबवानों ने हिंदी को अपने भूले-बिसरे रूप उर्दू की याद दिलाई है – डा. रामविलास शर्मा ने कई दशक पहले यह काम किया था, और अब न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू यह काम कर रहे हैं। आइए, इसे समझें कि हिंदी और ऊर्दू को, जो एक भाषा हैं, अलग क्यों और कैसे किया गया।

1857 के संग्राम में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़े थे और उनका लगभग इस देश से खात्मा कर दिया था। यदि पंजाब, नेपाल आदि कुछ रियासत अंग्रेजों की फ़ौजी मदद न करते और दक्षिण के रियासत इस संग्राम में शामिल हो गए होते तो अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर तभी बंध चुका होता और आज भारत का इतिहास, और विश्व का इतिहास भी, कुछ और ही हुआ होता। पर इस संग्राम को दबाने में अंग्रेज सफल हुए और वे समझ गए कि इस देश पर अपनी हुकूमत कायम रखनी हो, तो यहाँ के लोगों को विभिन्न परस्पर वैमनस्यपूर्ण गुटों में तोड़ना होगा। इनमें से प्रमुख गुट हिंदुओं और मुसलमानों के थे। इनमें दरार डालने की कूटनीति अंग्रेजों ने बड़े ही संगठित तरीके से शुरू कर दी। इस कूटनीति की आधारशिला भारतीय जनता की उस समय की साझी भाषा हिंदुस्तानी को दो अलग-अलग भाषाओं में विभाजित करना थी। अंग्रेज जानते थे कि कौमी एकता का एक प्रमुख खंभा भाषा होता है और भाषा को बाँटते ही कौम भी बँट जाता है।

इस नीति के तहत फोर्ट विलयम में स्थापित भाषा कोलेज में भाषाविद गिलक्राइस्ट के नेतृत्व में हिंदी और उर्दू को अलग करने की साजिश को अंजाम दिया गया। गिलक्राइस्ट ने पंडित सदासुखलाल जैसे लेखकों की मदद से संस्कृत बहुल भाषा में कुछ पुस्तकें प्रकाशित करवाईं, और इसी प्रकार उर्दू-फारसी बहुल भाषा में और फारसी लिपि में कुछ अन्य किताबें छपवाईं और यह घोषित कर दिया कि हिंदी हिदुओं की भाषा है और उर्दू केवल मुसलमानों की। इसके अलावा अंग्रेजों ने अनगिनत मौलवियों और पंडितों को भी इस घातक धारणा को प्रचारित करने के काम में लगा दिया। कुछ ही दशकों में उनका यह प्रचार रंग लाने लगा और लोग हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएँ समझने लगे। इतना ही नहीं हिंदी को मात्र हिंदुओं की और उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा मानने लगे। इसकी परिणति देश-विभाजन और देश के विभाजन से जुड़े भयानक नर-संहार में हुई।

हिंदी-उर्दू अलग-अलग भाषाएँ हैं, यह बात कितनी बेबुनियाद है यह इस पर विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे प्रेमचंद हिंदी और उर्दू दोनों में ही लिखते थे। इसके अलावा मंटो, फिराक, राजिंदर सिंह बेदी, आदि अनेक उर्दू के लेखक मुसलमान नहीं हैं। आज भी यदि आप उत्तर प्रदेश या बिहार के देहाती इलाकों में चले जाएँ और लोगों की बातें सुनें, तो आप कह नहीं पाएँगे कि वे हिंदी बोल रहे हैं या उर्दू। उर्दू-हिंदी में केवल उच्च स्तरीय लेखन और लिपि में फ़र्क है, और इस फ़र्क को दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है। लिपि की समस्या कुछ हद तक आज कम होती जा रही है क्योंकि अब बहुत सी उर्दू रचनाएँ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रही हैं और खूब बिक रही हैं क्योंकि देवनागरी लिपि में आने से वे हिंदी भाषियों को भी सुलभ हो जाती हैं।

अब अंग्रेजों के यहाँ से गए साठ से अधिक वर्ष हो गए हैं और हममें से कई लोग इस बात को समझने लगे हैं कि अंग्रेजों ने हमें कैसे उल्लू बना दिया था। पर इन समझनेवाले लोगों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया शामिल नहीं है। वह अब भी यह राग अलाप रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और उर्दू अख़ाबार की राय उन्हीं विषयों में लेने की ज़रूरत है जिनका संबंध मुसलमानों से है। आश्चर्य की बात यह है कि यही अख़बार बड़े ज़ोर-शोर से अमन की आशा नाम का अभियान चला रहा है जिसका कथित उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बुद्धि जीवियों को निकट लाना है। पर इस अख़बार को यह मामूली बात भी अब तक समझ में नहीं आ सकी है कि भारत और पाकिस्तान को निकट लाने का सूत्र दोनों की भाषा में बनाई गई कृत्रिम दरारों को दूर करने में निहित है। भारत और पाकिस्तान को पास लाने का पहला सोपान हिंदी और उर्दू का एकीकरण है। और यह एकीकरण तब तक संभव नहीं है जब तक उर्दू को मात्र मुसलमानों की भाषा समझा जाता जाएगा। उर्दू समस्त भारत की उपज है। वह हिंदुओं और मुसलमानों, सिक्खों और अन्य समुदायों की साझी विरासत है। उसमें भाषाई नज़ाकत चरम स्थिति तक पहुँचा दी गई है और इस भाषा में गज़ब की अभिव्यक्ति शक्ति है। इस अभिव्यक्ति शक्ति से अपने आपको वंचित करने के कारण ही हिंदी वह भव्यता नहीं प्राप्त कर पाई है जो वह प्राप्त कर सकती थी। हिंदी में संस्कृत के शब्द भरने और उससे आम बोलचाल के शब्दों को उर्दू के शब्द मानकर निकालने की जो ग़लती की गई, उससे उसकी अभिव्यंजना शक्ति काफी हद तक कुंठित हुई। इतना ही नहीं, उसे फिर से परिमार्जीत करने में दशकों लग गए। अब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वह संपूर्ण रूप से परिमार्जित हो गई है। यह इस बात से स्पष्ट है कि हिंदी की कविताएँ - और भाषा अपने सबसे अधिक निखरे हुए रूप में कविताओं में ही दिखाई देती है - अब भी आम आदमी के लिए दुरूह हैं। क्या आप किसी आम आदमी को निराला, जय शंकर प्रसाद, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि की कविताओं का रसास्वादन करते हुए सोच सकते हैं? इनके लिए इन महान कवियों की कविताएँ दुरूह और कठिन ही बनी हुई हैं। इसकी तुलना में उर्दू की गज़लें, ग़ालिब की रचनाएँ और और अन्य उर्दू शायरों की कविताएँ, आम लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ चुकी हैं, उनके कई अंश मुहावरों का रूप ले चुके हैं। उर्दू के कहानी-किस्से भी लोगों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। समस्त हिंदी फिल्म और फिल्मी गानों की भाषा अधिकांश में उर्दू है और उनकी लोकप्रियता को लेकर कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।

यदि हिंदी और उर्दू में कृत्रिम दरारें नहीं डाली गई होतीं, तो इस मिली-जुली भाषा ने मुग़लों के अंतिम समय में जो आश्चर्यजनक कथन शैली विकसित कर ली थी, वह अनायास ही हिंदी को प्राप्त हो गई होती और उसे कई दशक बिताकर नए सिरे से अपनी अभिव्यंजना शक्ति विकसित नहीं करनी पड़ती और हिंदी आज जहाँ पहुँच सकी है, उससे कई दशक आगे की मंजिल प्राप्त कर गई होती।

यह बात बरसों पहले डा. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में कही थी, और एक अनोखे संयोग से आज लगभग उन्हीं की बातों को एक समकालीन विचारक दुहरा रहे हैं। ये हैं सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जो प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग सत्यम ब्रूयत में दो महत्वूपूर्ण लेख लिखे हैं जिनका विषय उर्दू और देश-विभाजन हैं। अपने उर्दू वाले लेख में उन्होंने लगभग वे बातें दुहराई हैं जो डा. शर्मा पहले कह चुके हैं, कि उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा कतई नहीं है बल्कि वह भारत में रहनेवाले लोगों की साझी विरासत है, जिनमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिक्ख, दलित सभी शामिल हैं। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा इस साझी भाषा को तोड़ने की कूटनीति का भी विस्तार से वर्णन किया है। अपने दूसरे महत्वपूर्ण लेख में उन्होंने पाकिस्तान को एक कृत्रिम देश करार देते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को फिर से एक होने का आह्वान किया है। यह भी डा. शर्मा अपनी पुस्तकों में कह चुके हैं।

इन देशों का फिर से एक होना आज एक असंभव सी बात लग सकता है, पर यही इन देशों का प्रारब्ध है जिसे उन्हें आनेवाले पचास-सौ सालों में साकार करना होगा। आज हर युवक और विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह इस सपने को सत्य में बदलने के लिए अपना योगदान करे। शुरुआत वह उर्दू सीखकर और उर्दू साहित्य से अपना परिचय बढ़ाकर कर सकता है। इससे उसे यह अच्छी तरह समझ में आ जाएगा कि ये दोनों भाषाएँ एक ही हैं और ये दोनों भाषाएँ बोलनेवाले लोग भी वास्तव में एक ही कौम के अंश हैं, भले ही वे अलग-अलग धर्मों में विश्वास करते हों। दो धर्म, दो देश वाली विचारधारा अंग्रेजों द्वारा इस देश को कमज़ोर करने और तोड़ने के लिए फैलाया गया विषवृक्ष है। यह पाकिस्तान के बनते ही उसके दो टुकड़ों में बटने से और पाकिस्तान के आज की हालात से बखूबी स्पष्ट है। आज पाकिस्तान नाम के लिए मुसलमानों का देश है पर वहाँ मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। सुन्नी शिया को मार रहे हैं, अफगान पाकिस्तानियों को मार रहे हैं और पाकिस्तानी अफगानों, अहमदियों, बोहरा मुस्लिमों और महिलाओं पर अत्याचार ढो रहे हैं।

हम सबको इस विष-वृक्ष की जड़ें काटकर इस देश को (जिसमें उसके दो भटके टुकड़े भी शामिल हैं) मजबूत करना होगा।

सोमवार, जनवरी 21, 2013

उपभोक्ता चयन का महत्व

अधिकांश शहरी उपभोक्ताओं के समान मैं भी आजकल बड़े मॉलों में उपलब्ध एक ही तरह की चीज़ के अनेक विकल्पों से कुछ परेशान सा रहता हूँ। चाहे वह साबुन हो, या टूथपेस्ट, पंखा हो या मोबाइल, दर्जनों विकल्प उपलब्ध रहते हैं, और सब एक से बढ़कर एक बढ़िया या घटिया। ऐसे में यह तय कर पाना कठिन होता है कि किस विकल्प को चुनें।

अपने बचपन की एक मिसाल दूँ तो बात अधिक स्पष्ट होगी। जहाँ तक मुझे याद है, ठेठ बचपन से लेकर मेरे कॉलेज के दिनों तक घर में एक ही प्रकार का साबुन उपयोग किया जाता था, मैसूर सैंडल। इसकी तुलना में आज मेरे बच्चे एक साथ कई साबुन उपयोग करते हैं – बालों के लिए एक, हाथ धोने के लिए दूसरा, स्नान करने के लिए तीसरा। इसके अलावा अनेक प्रकार के शैंपू, हैंडवाश, लोशन, क्रीम आदि, आदि, सब अलग। इतना ही नहीं हर महीने उनकी पसंदें बदलती रहती हैं। आज पिएर्स साबुन है तो कल डोव और परसों गोदरेज। लगता है आजकल के युवा-जन विज्ञापनों के आधार पर या दोस्तों, सहपाठियों, रिश्तेदारों की देखादेखी चयन करते हैं।

एक समय वह था जब हम अपने उपभोक्ता चयनों से सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने की कोशिश करते थे। हमारे ही देश के स्वाधीनता संग्राम को ही लीजिए जब अंग्रेजों को यहाँ से खदेड़ने के एक कारगर तरीके के रूप में उनके देश में बने कपड़ों और अन्य वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन गाँधी जी और अन्य नेताओं ने चलाया था, और जिसका विकसित रूप, स्वदेशी आंदोलन, आज भी हमारी राजनीति को थोड़ा-बहुत प्रभावित करता है। पर ऐसा लगता है कि आजकल के युवक अपने उपभोक्ता चयनों में किसी ऊँचे आदर्श को बीच में लाने को या तो नापसंद करते हैं या उनकी राजनीतिक जागरूकता इतनी विकसित नहीं हुई है कि वे इसकी ताकत को पहचान सकें।

मैं समझता हूँ कि उनकी इस आदर्शहीन उपभोक्ता चयन समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के एक शक्तिशाली जरिए से उन्हें वंचित कर रहा है और वे जाने अनजाने उपभोक्ता संस्कृति के हाथों कठपुतले बनते जा रहे हैं। उपभोक्ता संस्कृति चाहती है कि हम ज्यादा से ज्यादा उपभोग करें, चाहे हमें उपभोग की जा रही वस्तुओं की आवश्यकता हो या नहीं। तभी इन उपभोक्ता वस्तुओं को बनानेवाली कंपनियों को निरंतर मुनाफा प्राप्त होता रह सकेगा। पर क्या उनका निरंतर मुनाफा प्राप्त करते जाना अधिक व्यापक मानव समाज के लिए अच्छा है? पृथ्वी के सीमित साधनों का क्या यह दुरुपयोग नहीं है? जो चीज़ वर्षों चल सकती हो, उसे कुछ ही महीने के उपयोग के बाद फेंककर, उसी के जैसी नई वस्तु खरीदकर लाना क्या आत्म-तुष्टि का चरम उदाहरण नहीं है? जब हमारे चारों ओर इतने व्यापक पैमाने पर गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और संरचनात्मक विघटन हो, तो यह कहाँ तक उचित है कि हम अपनी कल्पित इच्छाओं की पूर्ति करते जाएँ? महात्मा बुद्ध ने सही ही कहा था कि हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है, उन्हें परिश्रम से दबाना होगा, और उसे निहायत जरूरी चीजों तक सीमित करना होगा। उन्होंने यह निर्वाण प्राप्त करने के संदर्भ में कहा था, पर यह आज समतापूर्ण समृद्धि प्राप्त करने के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक है।

पूँजीवादी संस्कृति की मुख्य कमी भी यही है। वह उपभोक्तावाद को उकसाता जाता है, मनुष्यों और मानव समाजों की वास्तविक ज़रूरतों से उसका कोई तालमेल नहीं रहता है। इसलिए, एक ओर अमरीका जैसे अमीर देश फिजूल-खर्ची और अंधाधुंध प्रौद्योगिकीय विकास को बढ़ाते जाते हैं, जैसे चाँद पर आदमी उतारना, या मंगल ग्रह में उपग्रह भेजना, परमाणु हथियार बनाना आदि, तो दूसरी ओर भारत, अफ्रीका, अफ़गानिस्तान आदि गरीब देशों में करोड़ों लोग भूख से व्याकुल हैं, उनके पास पहनने के लिए ढंग के वस्त्र नहीं हैं, उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, और उनके शहरों में आधारभूत अधिसंरचनाएँ (सड़कें, रेल, मकान, आदि) बहुत ही खराब हालत में हैं। यदि अमरीका और अन्य विकसित देश चाहें तो उनके पास मौजूद दौलत और प्रौद्योगिकी से इन सबको क्षण-भर में ही दूर कर सकते हैं, पर पूँजीवादी संस्कृति का मुख्य ध्येय मुनाफा कमाना होता है, न कि मनुष्यों की तकलीफों को दूर करना।

इसीलिए पूँजीवादी संस्कृति को नियंत्रित करने और उसे मानव कल्याण की ओर मोड़ने के लिए बाहरी ताकतों की आवश्यकता होती है वह चाहे राज्य की शक्ति हो, या उपभोक्ताओं का संगठित प्रयास (उपभोक्ता चयन), या विप्लव या साम्वाद। इनमें से केवल उपभोक्ता चयन ही एक ऐसा जरिया है जिससे आम आदमी (यानी आप और मैं) पूँजीवादी संस्कृति को नियंत्रित कर सकता है और उसे जन-कल्याणकारी कामों में लगा सकता है।

तो हमें अपने उपभोक्ता चयनों को उच्च आदर्शों के साथ समेकित करना होगा। कोई चीज़ खरीदने से पहले यह सोचना होगा कि क्या हमें उसकी जरूरत है? उसका कोई अन्य विकल्प बेहतर हो सकता है? क्या उसे बड़े मॉल से खरीदना अधिक जन-हितकारी है या नुक्कड़ के किराने की दुकान से खरीदना? क्या उस उत्पाद में निहित नैतिक और सामाजिक मूल्य जन-हितकारी हैं या अहितकारी? उदाहरण के लिए, यदि उस चीज़ के विज्ञापन में कोई ऐसी बात दर्शाई जा रही हो जो समाज के लिए नुकसानदेह है, तो हमें उस वस्तु को खरीदने से इन्कार कर देना चाहिए, भले ही वह कितना ही अधिक किफायती, उपयोगी, तकनीकी दृष्टि से बेहतर या अन्य रीति से हमारे लिए लाभदायक हो। मान लीजिए कि किसी टूथपेस्ट के विज्ञापन में मिहलाओं को अभद्र और आपत्तिजनक रूप से दर्शाया गया हो। इससे उस विज्ञापन को देखनेवाले व्यक्तियों, विशेषकर युवा जनों पर हानिकारक नैतिक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे समाज के नैतिक मूल्यों का ह्रास हो सकता है। तो ऐसे विज्ञापनों को रोकने का हमारे पास एक ही साधन है कि हम उस विज्ञापन में दर्शाई गई चीज़ को न खरीदने का निर्णय लें और उस चीज़ के निर्माता को अपने निर्णय से अवगत कराएँ। और इससे आगे बढ़कर हम उन लोगों को भी जिन पर हमारा नियंत्रण या प्रभाव है इस चीज़ को न खरीदने या उपयोग करने की सलाह दें। इससे होनेवाले आर्थिक नुकसान से घबराकर उस चीज़ का निर्माता उस विज्ञापन को बदलने पर मजबूर होगा और उस विज्ञापन की अभिकल्पना करनेवाले लोग कोई दूसरा और अधिक सकारात्मक विज्ञापन सोचने को प्रेरित होंगे। इससे पूरे समाज को फायदा होगा।

रविवार, जनवरी 09, 2011

मेरी गुरुवायूर तीर्थयात्रा

जब माताजी मेरे साथ रहने आईं, तो हमने गुरुवायूर की तीर्थयात्रा की योजना बनाई। माताजी के दो बेटे हैं, मैं और मेरा बड़ा भाई, जो दिल्ली में हैं। वे हम दोनों बेटों के बीच समय काटती हैं, हालांकि ज्यादातर समय बड़े बेटे, यानी दिल्ली में ही, वे रहना पसंद करती हैं। पर इस बार जब दिल्ली का पारा चिंताजनक रूप से गिरने लगा और उन्हें ठंड असह्य होने लगी, तो उन्होंने मुंबई में मेरे साथ कुछ समय बिताने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसमें गुरुवायूर जाने का मेरा प्रलोभन का योगदान भी काफी रहा होगा। मां 70 साल की हैं, और उनका और मेरे पिताजी का बचपन गुरुवायूर के इर्द-गिर्द ही गुजरा है। आज गुरुवायूर एक बड़ा तीर्थ-स्थल है जहां भक्तों की अपार भीड़ जुटती है, और भगवान के दर्शन के लिए घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है। पर मां के बचपन के समय गुरुवायूर इतना बड़ा तीर्थस्थल नहीं बना था, और उनकी पीढ़ी के लोगों के लिए सुबह मंदिर के पवित्र सरोवर में स्नान करना और देवालय में जाकर अनायास ही गुरुवायूरप्पन के दर्शन कर आना, रोज की दिनचर्या में शामिल था। इस तरह गुरुवायूर और गुरुवायूरप्पन उनके रग-रग में व्याप्त था, और पचास साल से अधिक वर्ष केरल के बाहर रहने के बावजूद गुरुवायूर का आकर्षण उनके लिए कुछ भी कम नहीं हुआ था।

मुझे भी गुरुवायूर जाना प्रिय था। गुरुवायूरप्पन के दर्शन करना और उनका आशीर्वाद पाना एक कारण था, दूसरा इस मंदिर के विभिन्न क्रियाकलाप देखने का लोभ था, विशेषकर उसके हाथियों के आयोजन। गुरुवायूर में 70 से अधिक हाथी हैं, जिनमें से अधिकांश बड़े-बड़े दंतैल हाथी हैं। इन्हें मंदिर के कई क्रियाकलापों में उपयोग किया जाता है। जब इन्हें सोने-चांदी, रेशम, मोरपंख, छत्र, चंवर आदि से सजाकर इन पर भगवान की मूर्ति रखकर चेंडैं (एक प्रकार का केरली नगाड़ा), झांझ, आदि पांच वाद्यों (पंचवाद्य) के मादक सुर-लहरी के साथ घोषयात्रा निकलती है, तो देखनेवालों में एक विचित्र और अलौकिक रोमांच संचरित हो जाता है, जो अवर्णनीय है।

बड़ी मुश्किल से रेल में आरक्षण मिल सका और हम चल पड़े मुंबई से नेत्रावती एक्सप्रेस में, थ्रिशूर तक - जो लगभग 24 घंटे की यात्रा है। गुरुवायूर के लिए थ्रिशूर सबसे सुविधाजनक रेलवे स्टेशन है। दिल्ली से त्रिवेंड्रम जानेवाली राजधानी आदि सभी बड़ी गाड़ियां इस स्टेशन पर रुकती है। यहां से गुरुवायूर मात्र 25 किलोमीटर है। जब हम बहुत से लोग होते हैं, तो यह दूरी किराए के क्वालिस में अथवा बस से तय करते हैं, पर चूंकि इस बार हम दो ही लोग थे, और सामान भी कम था, इसलिए मैंने ऑटोरिक्शे से ही जाना तय किया। किसी ने मुझे बताया था, कि थ्रिशूर से गुरुवायूर ऑटोरिक्शे जाते हैं। स्टेशन के बाहर ही एक ऑटो मिल गया। हल्की बारिश हो रही थी, और हमें अंदर खेद हो रहा था कि हमने सामान कम करने के चक्कर में छतरी साथ में नहीं रखी, हालांकि कई लोगों ने हमें चेताया था कि केरल में इस समय बारिश हो रही है। पर बारिश हल्की थी और उसके जल्द थम जाने के आसार दिख रहे थे।

घंटे भर में ही हम गुरुवायूर पहुंच गए। मैंने गुरुवायूर मंदिर के व्यवस्थापकों द्वारा चलाए जानेवाले पांचजन्य गेस्टहाउस में पहले ही कमरा बुक करके रखा था, इसलिए ऑटो को वहीं ले गया। सामान उतारकर जब ऑटोवाले को पैसा चुकाने लगा, तो उसने जो दाम मांगा, उसे सुनकर मेरे होश उड़ गए। 25-30 किलोमीटर की यात्रा के लिए उसने 360 रुपए मांगे। इस हिसाब से प्रति किलोमीटर 14 रुपए बनते थे, जो टैक्सी की दर से भी ज्यादा था। पर बहस करना व्यर्थ लगा, गलती मेरी ही थी, मैंने शुरू में ही रेट तय नहीं किया, बस इतना पूछा कि मीटर से ही लोगे न, जिसका उत्तर ऑटो चालक ने हां में दिया था। मैंने यह स्पष्ट पूछना जरूरी नहीं समझा कि प्रति किलोमीटर क्या रेट होगी। मैंने मान लिया था कि वह सामान्य शहरी रेट ही होगी, और 25-30 किलोमीटर के लिए 50-60 रुपए से अधिक नहीं होगा। मुझे क्या मालूम था कि वह एसी-टैक्सी से भी ज्यादा की रेट वसूलेगा।

पर हम बिना किसी संकट के थ्रिशूर से गुरुवायूर पहुंच ही गए थे, इसलिए इस लूट का मैंने अधिक विरोध नहीं किया और पांच सौ रुपए का नोट ऑटोवाले को थमा दिया। उसने बड़ी महरबानी से डेढ़ सौ रुपए लौटाए, यानि मुझे दस रुपए की छूट दी। मुझे इसी से संतुष्ट होना पड़ा।

मैं पांचजन्य गेस्टहाउस में अपना कमरा प्राप्त करने के लिए गया। कमरे का किराया (एक दिन के 350 रुपए) मैंने अग्रिम ही ड्राफ्ट के रूप में भेज दिया था, और गेस्टहाउस प्रबंधकों से कमरे की बुकिंग की रसीद भी मुझे डाक से ही मिल चुकी थी। इसलिए वहां कोई दिक्कत नहीं हुई। कमरे में सामान रखकर हमने जल्दी से नहा लिया और गेस्टहाउस के ही रेस्तरां में भोजन करने गए। यह रेस्तरां वाकई अच्छा है और इसमें कई स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं। भोजन (राइस प्लेट) तो मिलता ही है, मसाला दोशा, इडली, वडा, तला हुआ मीठा केला (यह केरल का एक विशिष्ट व्यंजन है जो केरल में हर जगह मिलता है, यहां तक कि ट्रेनों और स्टेशनों में भी, और इसे आपको एक बार तो चखकर देखना ही चाहिए), पूरी-भाजी, आदि। पर दुपहर का समय होने से उस समय केवल भोजन (राइस प्लेट) उपलब्ध था, हमने वही लिया। अब हम पूरी तरह तैयार थे, भगवद-दर्शन के लिए। यह काफी मशक्कत-वाला काम साबित हो सकता था, क्योंकि उस समय अय्यप्पन का सीज़न था और दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में अयप्पन के भक्तों की अपार भीड़ थी।

मंदिर का पश्चिम द्वार ठीक पांचजन्य गेस्टहाउस के गेट के सामने ही था, इसलिए पैदल ही चल पड़े, चप्पल हमने कमरे में ही छोड़ दिए। हमारे सौभाग्य से ज्यादा भीड़ नहीं थी, और एक-आध घंटे में ही भगवान के दर्शन हो जाने की उम्मीद थी। इसलिए हम उत्साह के साथ कटघरों में खड़े हो गए। जो लोग तिरुपति आदि गए हों, वे इन कटघरों के बारे में जानते होंगे। लोहे की पाइपों से बना यह भूल-भुलैया, भीड़-नियंत्रण के विचार से खड़ा किया गया है, दर्शनार्थियों को इसमें खड़ा रहकर धीरे-धीरे आगे बढ़ना होता है।

लाइन में खड़े-खड़े हम चारों ओर की विभिन्न गतिविधियों को निहारने लगे। गरुवायूर हमारे लिए परिचित स्थल था, पर हर बार वहां आने पर नयापन लगता था। मंदिर के बड़े-बड़े भवन हर ओर दिखाई दे रहे थे। गर्भगृह, ऊट्टु-पेरै (भोजन-शाला, जहां भक्तगणों को मुफ्त में भोजन मिलता है), जिसके आगे भगवद-दर्शन कर चुके भक्तों की लंबी कतार खड़ी थी, स्नानगृह, मंदिर के सरोवर की सीढ़ियां, ऊंचा कोडि-मरम (पताका-दंड), दीपस्तंभ, स्वर्ण-मंडित गुंबद, नाट्यशाला (जहां प्रवचन, कथकली, भरत-नाट्यम, संगीत-उत्सव आदि आयोजित किए जाते हैं), विवाह-मडंप (दक्षिण में शादी-ब्याह गुरुवायूर मंदिर में कराने की प्रथा है, जिसके लिए दो विशेष मंडप बने हैं; मुहूरत वाले दिन यहां बीसियों शादियां होती हैं, जिसके लिए आधे-एक घंटे के लिए लोग इन मंडपों को किराए पर लेते हैं) जिनमें एक के बाद एक करके विवाह होते जा रहे थे और नागस्वरम (दक्षिणी शहनाई), कोट्टुमेलम (मृदंग जैसा वाद्य जिसे एक ओर से लकड़ी की छोटी छड़ी और दूसरी ओर से हाथ की ऊंगलियों से बजाया जाता है) आदि बज रहे थे, और मंदिर के द्वार के आगे लंबा सा दालान जिसके दोनों ओर दुकानें हैं - ये पूजा के सामान तो बेचते ही हैं, जैसे घंटी, दीप, अगर, फोटो, कैसेट, धार्मिक पुस्तकें, आदि, अन्य सामानों की दुकानें भी हैं, जैसे मिठाई के, कपड़े के, अल्पाहार-गृह आदि। दूसरे मैदान में हाथी बांधने का शेड है, जिसमें उस समय दो बड़े-बड़े हाथी विश्राम कर रहे थे और बड़े-बड़े नारियल के हरे डंठल युक्त पत्ते खा रहे थे। हमारे देखते ही महावत एक बड़े दंतैल को शेड की ओर ले आए। वह अपनी सूंड और दांतों के बीच नारियल के पत्तों का एक बड़ा गट्ठर थामे हुए था। महावत के इशारे पर उसने यह गट्ठर शेड के आगे गिरा दिया और अपनी पीछे की एक टांग घुटने पर मोड़कर ऊपर की ओर किया ताकि उस पर पैर रखकर उसकी पीठ पर सवार महावत नीचे उतर सके। महावत के उतरने के बाद हाथी कुछ कदम रिवर्स गियर में चलकर अपने निर्धारित स्थान में अन्य हाथियों के बगल में खड़ा हो गया और महावत ने उसके पैरों पर जंजीरें कस दीं। हाथी इत्मीनान से चारा चबाने लगा। उसे तथा उसके अन्य दो साथियों को देखने एक छोटी भीड़ शेड के चारों ओर इकट्ठी हो गई।

लाइन में खड़े-खड़े हम यह सब देखते-सुनते जा रहे थे। मंदिर के पब्लिक एनाउन्समेंट सिस्टम से मंदिर की गतिविधियों की संक्षिप्त कमेंट्री भी प्रसारित हो रही थी। यह मलयालम, तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में बारी-बारी से प्रसारित हो रही थी। मैं हिंदी प्रसारणों की ओर विशेष ध्यान दिया। प्रसारण स्त्री-वाणी में था, और उच्चारण बिलकुल शुद्ध था। शायद कोई हिंदी-भाषी युवती ही संदेशों को पढ़ रही थी, या शायद ये संदेश पहले से ही रेकोर्ड किए गए थे।

इतनी विविध दृश्वाली होने के कारण लाइन में खड़े-खड़े समय कैसे बीत गया, यह पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे कतार आगे बढ़ती गई और हम थोड़ी धक्का-मुक्की के साथ मंदिर में प्रवेश कर गए। मंदिर के अहाते में अपार भीड़ थी जिनमें अधिकांश काले वस्त्रों में अय्यप्पन-भक्त ही थे। ये रह-रहकर "स्वामि शरणम, शरणमय्यप्पा" की गुहार लगा रहे थे, और अय्यप्पन-भगवान के भजन गा रहे थे।

पूरे मंदिर को दीपों से सजाया गया था। गर्भगृह के सामने हमें चंद पलों के लिए ही खड़े होने मिला, इतने में ही पुजारियों ने और हमारे पीछे खड़ी भीड़ के धक्कों ने हमें वहां से खदेड़ दिया। इन पलों में हमें गुरुवायूरप्पन की जो झलक मिल सकी, उसी में हमने उन्हें जीवन के कष्टों की फिहिरिश्त मन ही मन सुना दी और उनकी कृपा की अपील की।

अब जब मुख्य काम हो गया था, तो हम थोड़े इत्मीन से मंदिर के अन्य क्रियाकलापों की ओर ध्यान दे सके। जैसा कि मुझे आशा थी, मंदिर के अंदर के अहाते में भी पत्थर के बड़े-बड़े खंभों के बीच चार हाथी बंधे हुए थे, जिनमें से तीन दंतैल थे और एक मादा थी। इनके सामने नारिल के पत्तों का ढेर रखा हुआ था, जिन्हें ये अपनी सूंड़ों से उठा-उठाकर खा रहे थे। इनके महावत इनके खंभे नुमा पैरों पर कंधा टिकाए बैठे आपस में बतिया रहे थे। हर हाथी के पीछे दो-तीन महावत थे। मंदिर में अपार भीड़ थी। सैकड़ों लोग उस बंद अहाते में मौजूद थे, और वे हाथियों से चंद फुट की दूरी पर आ-जा रहे थे। कभी कोई हाथियों की ओर केला बढ़ा देता, और हाथी उसे अपनी सूंड़ में लेकर मुंह में डाल लेता। इतने कोलाहल के बावजूद हाथी शांति से खड़े थे। बड़ी ही विस्मयकारी बात थी। महावतों को इन दानवों पर कितना अचूक और पूर्ण नियंत्रण था, इसका यह प्रमाण था। यदि ये हाथी जरा भी भड़क जाते या बेकाबू हो जाते तो मिनटों में बीसियों आदमियों की जानें चली जातीं। ऐसा भी नहीं है कि मोटे-मोट जंजीरों में बंधे ये हाथी यदि चाहें, तो भी अधिक नुकसान नहीं कर सकते, क्योंकि जब शीवेली (घोषयात्रा) निकाली जाती है, तो इन्हें बंधनमुक्त कर दिया जाता है, और इन पर भगवान की मूर्ती रखकर, वाद्ययंत्रों के साथ गर्भगृह के चारों ओर के अहाते में इन्हें चलाया जाता है। हाथी अपार भीड़ के बीच रास्ता बनाते हुए बढ़ते हैं, महावतों और पुजारियों को चिल्ला-चिल्लाकर और कभी-कभी बलात हाथियों के लिए भीड़ में से रास्ता बनाना पड़ता है। सब लोग हाथियों को घेरकर खड़े हो जाते हैं और बूढ़ी औरतें हाथियों को छूकर अपने-आपको पवित्र करने के प्रयास में उनके पैरों के बीच तक भी आ जाती हैं, और महावतों को उन्हें खदेड़ना पड़ता है।

मंदिर में पूरा दिना बिताना मुश्किल न था, इतनी सारी गतिविधियां वहां एक-साथ चल रही थीं। कहीं तुलाभारम (मनचाहे वस्तु से अपने आपको तुलवाकर उस वस्तु को भगवान को अर्पित करना) के लिए लोग भीड़ लगा रहे थे, कहीं प्रसाद के लिए लाइन लगी थी। मुख्य मंदिर के चारों ओर अनेक छोटे मंदिर भी थे, जिनमें से प्रत्येक में भक्तों की भीड़ थी। कुछ भक्त विचित्र रीति से गर्भगृह की परिक्रमा कर रहे थे, कोई एक पैर के ठीक आगे दूसरा पैर सटाकर रखकर धीरे-धीरे, भगवान का नाम जपते-जपते परिक्रमा कर रहा था, कोई फर्श पर साष्टांग लेटकर और धीरे-धीरे फर्श पर लुढ़कते-लुढ़कते मंदिर की परिक्रमा कर रहा था।

पर हम दिन भर की रेल-यात्रा से थके थे, इसलिए रात के दस बजे के करीब अपने कमरे में लौट आए, और यह निश्चय करके सो गए कि कल सुबह जल्दी उठकर फिर मंदिर जाएंगे।

बृहस्पतिवार, जनवरी 06, 2011

ईसाइयों की प्रगतिशीलता

जब धर्म वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार अपने-आपको ढालने के संकेत देता है, तो निश्चय ही वह एक सराहनीय बात है।

ईसाई धर्म में इस तरह के सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। ईसाई धर्म में मृतकों को ताबूत में रखकर दफनाने का रिवाज है। यह ताबूत सागौन आदि महंगी लकड़ी से बनते हैं, और कलात्मक नक्काशी वाले ताबूतों की कीमत 50,000 रुपए तक पहुंच जाती है। इन ताबूतों के कारण अनेक गरीब ईसाइयों के लिए अपने प्रिय-जनों के अंतिम संस्कार के फलस्वरूप कर्ज और आर्थिक बर्बादी की नौबत आती है।

पर कैथोलिकों की सभा ने अब शवों को बिना ताबूतों में रखे, केवल कफन के कपड़े में लपेटकर दफनाने को मंजूरी दे दी है। इससे पहले ही मुंबई क्षेत्र में कई चर्चों में बिना ताबूत के शवों को दफनाया जाता रहा है। मुंबई के वसाई क्षेत्र के कुछ ईसाई इसके मध्यवर्ती रिवाज अपनाते हैं। वे शव को ताबूत में रखकर कब्रिस्तान तक लाते हैं, पर दफनाते समय शव को ताबूत से बाहर निकालकर कफन में लपेटकर दफनाते हैं। इस तरह एक ही ताबूत का बारबार उपयोग हो पाता है। कैथोलिक सभा ने राय दी है कि अब शवों को बिना ताबूत के दफनाने की प्रथा को व्यापक रूप से अपनाने में दोष नहीं है। इससे संबंधित वक्तव्य सभा ने अपनी पत्रिका सत्यदीप में प्रकाशित की है।

शव संस्कार की इस नई रीति का एक फायदा महंगे ताबूतों से मुक्ति है, पर इसके अन्य फायदे भी हैं। ताबूतों में रखे शवों के नष्ट होने में अधिक समय लगता है, और इस कारण कब्रिस्तानों में भूमि के पुनरुपयोग की संभावना घट जाती है। पर्यावरण की दृष्टि से भी शवों के दफनाने में ताबूत का उपयोग न करना फायदेमंद है। इससे न जाने कितने पेड़ों को जीवन-दान मिल सकता है।

शवों के दफनाने की यह नई रीति हिंदुओं, मुसलमानों, यहूदियों और पारसियों की अंत्येष्टि प्रथाओं के समीप है। इन सब धर्मों में भी ताबूत का उपयोग नहीं होता है। शवों को या तो जलाकर नष्ट किया जाता है, अथवा कफन में लपेटकर दफनाया जाता है।

इस संबंध में सेंट इग्नेशियस चर्च के पादरी फादर जोसेफ डिसूज़ा याद दिलाते हैं कि स्वयं ईसा मसीह के मृत-देह को बिना ताबूत के दफनाया गया था।

सभी धर्मों को अपने रीति-रिवाजों को इसी तरह समकालीन परिस्थितयों के अनुसार बदलने में संकोच नहीं करना चाहिए। इन रीति-रिवाजों का धर्मों के केंद्रीय तत्वों से कोई संबंध नहीं होता है, वे केवल सुविधा के लिए अपनाए गए होते हैं।

आजकल कई धर्मों ने अपने परंपरागत रिवाजों से चिपके रहने की अड़ियलता दिखाई है, भले ही ये रिवाज आजकल की परिस्थितियों में निरर्थक या हानिकारक साबित हो चुके हों। उन्हें ईसाइयों की इस प्रगतिशीलता से प्रेरणा लेनी चाहिए।

मंगलवार, दिसम्बर 28, 2010

मजदूरों की जागरूकता

मलयालम अखबार मातृभूमि में एक रोचक खबर पढ़ने को मिली, जो आपको भी रुचिकर लगेगी। खबर कुछ यों है -

एक व्यक्ति ने मकान बनाने के लिए लट्ठें खरीदीं। लट्ठों को ट्रक पर चढ़ाने के लिए उसने एक हाथी को किराए पर लिया। हाथी ने सभी लट्ठों को ट्रक पर चढ़ा दिया। ट्रक चलने ही वाला था, कि तभी मजदूर यूनियन के कारिंदे वहां आ धमके और ट्रक को घेरकर खड़े हो गए। उन्होंने लट्ठ खरीदनेवाले व्यक्ति से उनसे काम न लेने का जुर्माना मांगा। जब उस व्यक्ति ने 1,200 रुपए दिए, तभी उन्होंने ट्रक को जाने दिया। ट्रक जाने को हुई तो उससे दो लट्ठें खुलकर सड़क पर गिर गईं। जब मजदूरों से कहा गया कि इन्हें ट्रक पर चढ़ा दो, तो उन्होंने मना कर दिया।

क्या ऐसी कोई खबर किसी हिंदी अखबार में पढ़ने को मिलेगी? है न यह हिंदी भाषियों को कल्चरल शॉक देनेवाली खबर!

पहली विचित्र बात तो लट्ठ उठवाने के लिए हाथी का बुलाया जाना है। गधे, ऊंट, बैल, भैंसा आदि जानवरों से बोझा उठवाने के बारे में आपने सुना होगा। पर हाथी से ऐसा काम करवाना! हिंदी भाषियों के लिए हाथी ऐश्वर्य और आडंबर का चिह्न है न कि भारवाहक पशु। पर केरल में पालतू हाथी इतनी प्रचुर संख्या में हैं कि उनके भरण-पोषण में योगदान देने के लिए उनसे ऐसे छोटे-मोट काम कराए ही जाते हैं। हां, वहां भी हाथी ऐश्वर्य और आडंबर का चिह्न है, और बड़े मंदिरों में एक-दो हाथी बंधते ही हैं, जिनका मंदिर के उत्सवों और अन्य समारोहों में उपयोग किया जाता है। गुरुवायूर जैसे बड़े मंदिरों में तो 70 से अधिक हाथी हैं, यानी हमारे कई हाथी-अभयारण्यों में जितने हाथी हैं, उससे कहीं ज्यादा!

दूसरी गौर-तलब बात है मजदूरों का हाथी से काम लेने का विरोध करना, और इसके लिए जुर्माना वसूलना। भूलना नहीं चाहिए कि केरल वह राज्य है जहां आजाद भारत के प्रथम आम चुनाव में ही साम्यवादी सरकार बन गई थी। यह दूसरी बात है कि नेहरू ने उसे तुरंत ही तिकड़म करके बर्खास्त करा दिया था। पर सच यह है कि केरलवासियों की रग-रग में साम्यवाद के सिद्धांत बसे हुए हैं, और वहां का आम आदमी भी मार्कस्वाद की बातें समझता है। वहां का हर वर्ग अपने अधिकारों को अच्छी तरह पहचानता है और उनके लिए लड़ना जानता है। वहां के मजदूर रोजगार पाना अपना अधिकार मानते हैं, और यदि कोई उन्हें इस अधिकार से वंचित करना चाहे, तो वे हथियार उठा लेने के लिए तैयार रहते हैं, जैसा कि उपर्युक्त खबर से ही स्पष्ट है।

क्या केरल के सिवा किसी अन्य प्रदेश के मजदूरों में इतना साहस हो सकता है कि वे रोजगार पाने के अपने अधिकारों के लिए इस तरह लड़ सकें? अभी हाल में दिल्ली से साइकिल-रिक्शों को निषद्ध करने की आज्ञा दिल्ली सरकार ने जारी की थी। रिक्शा चालकों की तरह से किसी भी प्रकार का विरोध देखने में नहीं आया। किसी भी राजनीतिक दल ने उनकी तरफ से आवाज नहीं उठाई। इसी तरह मुंबई के हिंदी भाषी टैक्सी-चालकों के विरुद्ध शारीरिक हमले हुए, पर कोई भी इन मजदूरों के पक्ष में सामने नहीं आया। यदि दिल्ली के रिक्शा-चालक और मुंबई के टैक्सी-चालक भी केरल के मजदूरों के समान साम्यवादी सिद्धांतों से परिचित होते और संगठित होते, तो किसकी मजाल कि उनकी रोजी-रोटी पर इस तरह लात मारे।

पर क्या ऐसा हो सकता था? केरल में शत-प्रति-शत साक्षरता है, यानी गरीब से गरीब मजदूर भी अखबार पढ़ता है, पुस्तकें पढ़ता है, स्वतंत्र चिंतन करता है। अखबारों, पुस्तकों, टीवी-रेडियो आदि के माध्यम से वह आधुनिक सिद्धांतों के सजीव संपर्क में रहता है। केरल के राजनीतिक दल भी अधिक जनतांत्रिक हैं, वहां वंशवाद नहीं चलता है। गांधी परिवार, मुलायम परिवार, लालू परिवार, पासवान परिवार जैसे खानदान केरल की राजनीति में आपको नहीं मिलेंगे। हां करुणाकरन (जो अभी हाल में दिवंगत हुए) ने अपना राजनीतिक वंश चलाने की कोशिश की थी, पर सफल नहीं हुए। और फिर वे कांग्रेसी थे, और वहीं से उन्हें ऐसे संस्कार मिले होंगे।

दूसरी बात यह है कि केरल ने कई दशकों से छोटा परिवार अपनाया हुआ है। केरल में आम गृहस्थी में एक या ज्यादा-से-ज्यादा दो बच्चे ही होते हैं। यह अमीरों और मध्यम-वर्ग के परिवारों के लिए ही सच नहीं है, बल्कि गरीब तबके के परिवारों के लिए भी। इससे अधिकांश परिवारों को अपनी इकलौती या दुकलौती संतान की शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-सेहत, खान-पान, दवा-दारु पर मुक्त-हस्त से खर्च करने में कोई संकोच नहीं होता है, चाहे वह लड़का हो या लड़की । इससे केरल के बच्चों को जिंदीगी की दौड़ में दो कदम आगे रहने में मदद मिलती है। वे स्वस्थ-तंदुरुस्त, पढ़े-लिखे, प्रसन्न-चित्त होते हैं, जिससे उनमें आत्म-विश्वास छलकता रहता है, और किसी भी अन्याय से लड़ने की उनमें गहरी क्षमता होती है। उन्हें डराना-धमकाना, या बलपूर्वक चुप करा देना संभव नहीं होता।

हिंदी प्रदेश में शिक्षा का अभाव है, रूढ़िवादिता ज्यादा है, लोग कुपोषण, बीमारी, अंधविश्वास आदि से पीड़ित रहते हैं, जिससे उनमें आत्म-विश्वास की कमी हो जाती है, ज्ञान का प्रकाश न रहने से वे दुविधा की स्थिति में रहते हैं, और अपने केरली भाइयों की तुलना में अधिक धब्बू होते हैं। पर धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि अंगड़ाई ले रहे हैं और निद्रा झटककर शिक्षा और ज्ञान को अंगीकार कर रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि आनेवाले दशकों में उनके लोग भी वैसे ही आत्मविश्वासी और दृढ़ बन सकेंगे, जैसे केरल के।

तीसरी बात केरल में स्त्रियों को मिली हुई संपूर्ण आजादी है। शायद केरल भारत का एकमात्र राज्य है, जहां स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। पंजाब, हरियाणा, गुजरात आदि में 1,000 पुरुषों के पीछे 800-900 महिलाएं ही हैं, जबकि केरल में 1,098 महिलाएं हैं। स्त्री स्वतंत्र रहने पर उनकी संतानें भी अधिक स्वस्थ, पढ़ी-लिखी और आत्म-विश्वास से भरपूर होती हैं।

और अंत में पहले बताई गई खबर से मिलती-जिलुती एक और किस्सा। उत्तर भारत से एक मुसाफिर केरल के एक रेलवे स्टेशन पर उतरा। उसके साथ कुछ सामान था, इसलिए उसने कुली बुलाया। कुली ने जो भाव मांगा वह उसे अधिक लगा। सामन बहुत भारी न था, इसलिए उसने उसे खुद ही उठा लेने का निश्चय किया। उसने सूटकेस किसी तरह सिर पर चढ़ा लिया और बैगों को कधे पर टांगकर लड़खड़ाते कदमों से प्लेटफोर्म से चल पढ़ा। गाड़ी तीसरे नंबर के प्लैटफोर्म पर आई थी, इसलिए उसे सीढ़ियां चढ़नी-उतरनी पड़ीं। किसी तरह हांफते-हांफते, पसीने से तरबतर होकर, वह स्टेशन के बाहर आया।

बाहर आते ही कुलियों के गिरोह ने उसे घेर लिया। उसकी अगुआई कर रहा था वही कुली जिससे उसकी प्लैटफोर्म पर बहस हुई थी।

उस कुली ने कहा, "चुपचाप मजदूरी गिनकर रख दो, वरना समान यहां से नहीं हिलेगा।"

मुसाफिर पहले तो कुछ समझा नहीं, बोला, "कैसी मजदूरी, कहां की मजदूरी। सारा सामान तो मैंने खुद उठाया है!"

कुली बोला, "खुद क्या हमसे पूछकर उठाया था? यहां का नियम है कि सामान कुली ही उठाएंगे। यदि स्वयं उठाना चाहो, तो शौक से उठा लो, पर कुली को मेहनताना तो देना ही पड़ेगा।"

उस बेचारे मुसाफिर ने बहुत बहस करके देखी, पर उसकी एक न चली। अंत में उसे कुली को पैसे देने ही पड़े। कैसा कड़ुवा अनुभव रहा होगा उसका, सामान भी खुद उठाना पड़ा और पैसे भी मुट्ठी से गए। यदि उसे पता होता कि ऐसा होनेवाला है, तो शायद वह कुली को ही सामान सौंप देता और अपने कंधों पर इतना अत्याचार नहीं होने देता।

खैर, जब मजदूरों में जागरूरता आती है, तो ऐसा भी हो सकता है। शायद इसीलिए हर देश में सत्ताधारी वर्ग इसकी भरपूर कोशिश करते हैं कि मजदूर वर्ग को अशिक्षा के अंधकार में रखा जाए, और साम्यवाद जैसे सिद्धांतों की उन्हें भनक तक न लगे।

और इसीलिए हर देश में साम्यवादी दल का क्रांतिकारी महत्व होता है। क्योंकि वही सत्ताधारी वर्गों के विरोध का सामना करते हुए मजदूर वर्गों में अपने अधिकारों के बारे में जागरूकता ला सकता है।

सवाल यह है कि क्या भारत के साम्यवादी दल यह भूमिका निभा रहे हैं? वे तो सत्ता की चसक लगकर खूब मोटे और आसली हो गए हैं। उनके नेताओं में और शासक वर्गों में कोई अंतर ही नहीं रह गया है।

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट