Sunday, June 07, 2009

आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की लंबी परंपरा है


आस्ट्रेलिया में नस्लवाद के अधिष्ठाता प्रधान मंत्री एल्फ्रेड डीकिन (1856 – 1919)



आस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमलों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 12 महीनों में, इस तरह के 1,447 हमले हुए हैं, यानी औसतन हर रोज 3-4 हमले। इनमें से अधिकांश हमलों की रिपोर्टों को स्वयं हमले के शिकार हुए भारतीय दबा देने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि इसका बहाना बनाकर उन्हें आस्ट्रेलियाई सरकार भारत वापस भेज दे। पर पिछले कुछ दिनों में ये हमले एकदम से बढ़ गए हैं और अत्यंत उग्र रूप धारण कर गए हैं। राह चलते भारतीयों पर चाकू चला देना, उन्हें सुनसान जगहों में पाकर गोरों की टोलियों द्वारा पीटा जाना, उनके हाथ से लैपटोप, मोबाइल फोन आदि कीमती चीजें छीन लेना, उनके घरों में घुसकर लूटपाट करना, उनके वाहनों को जला देना, यह सब चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है।

आस्ट्रेलियाई सरकार इन हमलों पर पर्दा डालने की भरसक कोशिश कर रही है और यह साबित करने पर तुली है कि ये नस्लवादी हमले नहीं हैं। पर सचाई उनके सामने और सारे विश्व के सामने मुंह बाए खड़ी है।

आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की लंबी परंपरा है। आस्ट्रेलिया के श्वेत मूल के समुदाय के आदि पुरुष सब ब्रिटन के बलात्कारी, हत्यारे, चोर-उचक्के, राजद्रोही आदि अपराधी थे। उन्हें सजा के रूप में आस्ट्रेलिया में उतार दिया जाता था। उनके आने से पहले आस्ट्रेलिया में स्थानीय निवासियों के लगभग 260 छोटे-बड़े राज्य थे। इन सबको इन अपराधी मानसिकता के लोगों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इस तरह आस्ट्रेलिया के निर्माता लोग मानव समुदाय के श्रेष्ठ जनों में से नहीं निकले थे, बल्कि मानव जाति की तलछट में से निकले गिरे हुए लोग थे। इसलिए यह देश उच्च आदर्शों का पोषक कभी नहीं रहा है, न ही कभी भी इस देश ने इसका दंभ भरा है। उसकी मंशा यही रही है कि वह ब्रिटन, और अब अमरीका का कृपापात्र बना रहे, और इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है।

आस्ट्रेलिया का कुल क्षेत्रफल 7,618,000 वर्ग किलोमीटर है, पर उसकी आबादी मात्र 2 करोड़ है। यानी वह बहुत ही कम बसा देशा है। इस देश में जितनी प्राकृतिक संपदा है उसके उचित उपयोग के लिए वहां लोगों की कमी है। इसलिए शुरू से ही आस्ट्रेलिया को बाहरी लोगों को अपने यहां आने का प्रोत्साहन देने की नीति अपनानी पड़ी है। पर नस्लवाद के चलते, शुरुआत में उसने केवल गोरों को वहां आने की अनुमति दी।

यह नीति 1901 में आस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री एल्फ्रेड डीकिन 1856 – 1919) ने विकसित की थी। वे मानते थे कि चीनी और जापानी मूल के लोगों से श्वेत आस्ट्रेलिया को खतरा है। इसलिए नहीं कि उनमें कोई बुरी आदत थी, बल्कि इसलिए कि "वे महनती हैं, सादा जीवन बिताते हैं, बुद्धिमान हैं, नई परिस्थितियों में बहुत जल्दी अपने आपको ढाल लेते हैं, अत्यंत ऊर्जाशील हैं, और उनमें काम करने का अदम्य उत्साह है।"

इसे पढ़कर आपको आश्चर्य हो रहा होगा, क्योंकि कोई भी देश इन गुणोंवाले लोगों को अपने यहां स्वागत करना चाहेगा। पर नस्लवाद की सोच और गणित और ही प्रकार का होता है। एल्फ्रेड डीकन नहीं चाहते थे कि गोरों के सिवा और कोई आस्ट्रेलिया में आए। इसकी व्यवस्था भी उन्होंने बड़े ही पक्के ढंग से की। उनकी प्रेरणा से आस्ट्रेलियाई संसद ने एक कानून पारित किया जिसके तहत यूरोपियों के सिवा अन्य लोगों के लिए आस्ट्रेलिया में आना अत्यंत कठिन हो गया। गैर-यूरोपियों को बाहर रखने के लिए आस्ट्रेलिया में आने के इच्छुक लोगों के लिए यह आवश्यक बना दिया गया कि वे किसी यूरोपीय भाषा में एक कठिन परीक्षा पास करें। उन दिनों जब विदेशी भाषाओं के पठन-पाठन के लिए अच्छी व्यवस्थाएं नहीं थीं, इस कानून का सीधा मतलब यह था कि योरोपियों के सिवा और कोई आस्ट्रेलिया में बस नहीं सकता था।

यह आजकल कनाडा, अमरीका, ब्रिटन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया आदि देशों की आप्रवास नीति की याद दिलाता है। ये देश भी अंग्रेजी की अच्छी जानकारी रखनेवाले व्यक्तियों को ही वहां बसने की अनुमति देते हैं। यह भी एक प्रकार का नस्लवाद ही है, जिसका विरोध नहीं किया जा रहा है, हालांकि किया जाना चाहिए।

खैर, 1901 में आस्ट्रिलिया में इमिग्रेशन रेस्ट्रिक्शन एक्ट (आप्रवास परिसीमन अधिनियम) पारित किया गया। इस अधिनियम को आस्ट्रेलिया संसद में भारी बहुमत प्राप्त हुआ। इससे पहले ही नस्लवादी नीतियां प्रचलन में आ गई थीं। उदाहरण के लिए चीनी मजदूरों से आवास कर के रूप में एक अतिरिक्त भारी कर लिया जाने लगा था, जो आजकल पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिक्खों से लिए जानेवाले जजिया के समान माना जा सकता है। फर्क इतना ही है कि तालिबान धर्म के नाम पर भेदभाव बरत रहे थे और आस्ट्रेलियाई सरकार नस्ल के आधार पर।

यह नस्लवादी कानून 50 वर्षों तक कायम रहा, यानी दूसरे महायुद्ध के अंत तक। इस युद्ध में यूरोप लगभग तबाह हो गया। ब्रिटन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, रूस, पोलैंड, बेल्जियम आदि देशों के करोड़ों नागरिक युद्ध में मारे गए। इन देशों की फैक्टरियां, पुल, इमारतें, आदि संपत्तियां भी लगभग पूरी-पूरी नष्ट हो गईं। इन देशों को इन सबको दुबारा नए सिरे से निर्मित करने की आवश्यकता हुई। इसलिए यूरोप की समस्त मानव-शक्ति इस भगीरथ कार्य में जुट गई। इसलिए उधर आस्ट्रेलिया जाकर बसने के लिए यूरोपीय मूल के लोग मिलने बंद हो गए।

इससे आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था, खास करके ग्रामीण अर्थव्यस्था, बुरी तरह प्रभावित होने लगी। खेत में काम करनेवाले लोगों की किल्लत हो गई। तब झक मारकर आस्ट्रेलिया को अपने नस्लवादी कानून निरस्त करना पड़ा। यह काम अत्यंत धीरे-धीरे ही किया गया और इस कानून को पूरा हटने के लिए लगभग तीन दशक लगे। 1973 में कहीं जाकर वह पूरा निरस्त हो सका। तब तक जापान, कोरिया, चीन आदि देश इतने शक्तिशाली हो गए थे, कि आस्ट्रेलिया के लिए उन्हें नजरंदाज करना मुश्किल हो गया। दूसरे, चीन, वियतनाम, इंदोनीशिया आदि देशों में ही अतिरिक्त आबादी मौजूद थी जिन्हें आस्ट्रेलिया में आने के लिए फुसलाया जा सकता था। यह तभी संभव हो सकता था जब आस्ट्रेलिया की नस्लवादी छवि को पोंछ-पांछकर आकर्षक बनाया जाए। फिर भी 1975 तक आस्ट्रेलिया में नस्ल के आधार पर भेदभाव करना कानून की दृष्टि में मान्य रहा।

(डा. मुहम्मद हनीफ)

आधी शती तक आस्ट्रेलिया पर हावी रहे नस्लवादी व्यवस्था ने वहां के गोरों के मानसिकता में गहरी पैठ कर ली है, और आज भी कई आस्ट्रिलाई प्रच्छन रूप से नस्लवादी होते हैं। यह अनेक छोटी-मोटी घटनाओं से जाहिर होती रहती है। मसलन, अभी हाल में भारतीय मूल के डाक्टर मुहम्मद हनीफ को आस्ट्रेलियाई पुलिस ने आंतकी होने के मनगढ़ंत आरोप पर पकड़ लिया था और उन्हें देश से निकाल तक दिया था। पर अंत में वे निर्दोष साबित हुए। यह नस्लवाद आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के रवैए से भी खूब उजागर होता है।


(नस्लवादी आस्ट्रेलियाई नेता पोलिन हैन्सन)

आज भी आस्ट्रेलिया के नेता चुनाव के समय नस्लवाद का बिगुल बजाते हैं क्योंकि आस्ट्रेलया की गोरी जनता का एक बहुत बड़ा अंश इस तरह की अपीलों से खूब उत्साहित होता है। वर्ष 2007 में हुए चुनाव में एक प्रमुख आस्ट्रेलियाई नेता पोलिन हैन्सन ने आस्ट्रेलिया में गैर-यूरोपियों के आने पर रोक लगाने को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। उसने इस मुद्दे को लेकर एक अलग पार्टि ही बना डाली थी, जिसका नाम है पोलिन्स युनाइटेड आस्ट्रिलिया पार्टी। यह पार्टी भारतीय जनता पार्टी, शिव सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की याद दिलाती है, जो भी ‘भारत केवल हिंदुओं के लिए’ वाली नीति को लेकर चलते हैं।


आस्ट्रेलिया की नस्लवादी नीतियों का विषैला प्रभाव दुनिया के अन्य भागों में भी देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण आफ्रीका की रंगभेदी नीति भी आस्ट्रेलिया के नस्लवादी नीतियों के तर्ज पर बनी है। इसी नीति के विरोध में गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में लगभग 20 साल सत्याग्रह किया था। गोखले, तिलक आदि भारतीय नेताओं ने उन्हें खूब समर्थन दिया था। गोखले तो रंगभेद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए और दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीय मूल के हिंदू, मुसलमान और ईसाई समुदायों के अधिकारों के हनन के विरोध में अपनी आवाज मिलाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर भी गए।

इसलिए आज आस्ट्रेलिया में जो नस्लवाद देखने में आ रहा है, वह कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही वहां की नस्लवादी नीतियों का परिणाम है। विश्व समुदाय को इन घटनाओं की और आस्ट्रेलिया में परोक्ष रूप से प्रवर्तमान नस्लवाद की तीक्ष्ण से तीक्ष्ण शब्दों में निंदा करनी चाहिए, और उस पर आर्थिक प्रतिबंध आदि लगाकर जल्द-से-जल्द उसे रास्ते पर लाना चाहिए।

यह आशा जगानेवाली बात है कि इस मामले में चीन और भारत एक सुर में बोल रहे हैं। आज इन्हीं दो देशों से सर्वाधिक लोग आस्ट्रेलिया में बसने और वहां पढ़ने जाते हैं। इसलिए नस्लवाद के शिकार भी वे ही अधिक होते हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि अन्य सभ्य देश भी चीन और भारत की पहल का अनुसरण करके आस्ट्रेलिया को नस्लवाद से मुक्त करने का बीड़ा उठाएंगे।

10 Comments:

P.N. Subramanian said...

नस्लवाद का इतिहास तो पुराना है.आशा करते हैं की ज्यों ज्यों समाज सभ्य होता जाएगा, ऐसे भेदभाव मिटते जायेंगे. सुन्दर ज्ञानवर्धक आलेख.आभार.

गुस्ताख़ said...

अच्छी जानकारी, शुक्रिया।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

अच्छी जानकारी

गिरिजेश राव said...

उत्कृष्ट लेख । आखिरकार इतिहास और वर्तमान दोनों से पर्दा उठा ही दिया आप ने !

प्रतिदिन औसतन 4 हमले, यह नस्लवाद नहीं तो और क्या है ?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सही विष्लेषण किया है। लेकिन नस्लवाद का जीवन कितना है। वह सिमटता जा रहा है। एक दिन उस का अंत होना ही है।

दीपक भारतदीप said...

नस्लवाद पर नयी जानकारी के साथ लिखे इस सार्थक आलेख पर बधाई
दीपक भारतदीप

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर पोस्ट। जानकारियों के लिये शुक्रिया।

yuva said...

Naslvaad ke itihaas par achchhi jaankaari dene ke liye dhnyavaad. Par is Itihaas se vartmaan ki disha tay nahi hoti hai. Haan iska faayda utha kar kuch MANSE jaise dal ya neta jaroor ban jaate hain. Nahi to bhaarat men abhijaatyavad aur bhed-bhaav ke udaaharano ki kami nahi hai.

varsha said...

naslwad ki jadon jitna hi gahra aalekh... abhar .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

नस्लवाद पर जानकारी देने के लिये धन्यवाद। यह भारतीय सामन्तवाद और जातिवाद जैसा ही खतरनाक विचार है।

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