Monday, June 15, 2009

गांधी जी का अधूरा काम

अंग्रेजों के समय देश का प्रशासकीय गठन उनके द्वारा विजित प्रदेशों के अनुसार और भारत में उनके आगमन के क्रम के अनुसार किया गया था। सबसे पहले वे कलकत्ता पहुंचे थे, और वहीं उनकी पहली विजय भी हुई थी। 1757 की प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर की दगाबाजी के फलस्वरूप सिराजुद्दौला को हराकर अंग्रेजों ने बंगाल के विशाल प्रदेश को जीत लिया था। वहां उनका पहला प्रांत बना। इसी तरह बंबई और मद्रास में बड़े-बड़े प्रांत बने। 1857 के बाद संयुक्त प्रांत, सेंट्रल प्रोविन्स, नोर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स आदि प्रशासकीय क्षेत्र बने। इन सबका गठन करते हुए अंग्रेजों ने उनमें रह रही जनता की आकांक्षाओं, सुविधाओं और विकास की संभावनाओं का कोई खयाल नहीं रखा।

इसलिए जब कांग्रेस की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई, तो उन्होंने देश में अधिक वैज्ञानिक तरीके से प्रशासकीय इकाइयां गठित करने पर विचार किया। वे तथा उनके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भाषा के आधार पर प्रांत बनना जनता के हित में है। इस तरह एक ही भाषा बोलनेवाले प्रदेशों को संयुक्त करके उन्हें एक प्रांत का रूप दिया गया और वहां सब कांग्रेस की अलग प्रांतीय कार्यालय भी खोले गए।

गांधी जी द्वारा की गई यह व्यवस्था जनता के लिए बहुत ही कल्याणकारी थी। जनता की अस्मिता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू न धर्म है न जाति बल्कि भाषा है। धर्म, जाति, नस्ल आदि लोगों को बांटते हैं, लेकिन भाषा उसे बोलनेवाले सभी लोगों को जोड़ती है। हिंदी को ही ले लीजिए, हिंदी मुसलमानों की भी भाषा है, हिंदुओं की भी, गरीबों की भी, अमीरों की भी, ब्राह्मणों की भी, शूर्दों की भी, स्त्रियों की भी, पुरुषों की भी, बच्चों की भी और बूढ़ों की भी। इस तरह मुसलमान-हिंदू, गरीब-अमीर, सवर्ण-अवर्ण, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, अमीर-गरीब आदि सबको हिंदी जोड़ती है। भाषा उसे बोलनेवालों की आकांक्षाओं को व्यक्त करनेवाला साधन ही नहीं है, उन आकांक्षाओं को कार्यरूप देने का औजार भी है। इसलिए भाषा के आधर पर बनाए गए प्रांतों ने अंग्रेजों के समय से ही प्रगति करना शुरू कर दिया और आजाद भारत में तो यह प्रगति और भी तेज हो गई।

लेकिन गांधी जी ने भाषाई राज्य कायम करने का काम पूरे देश पर लागू नहीं किया। देश के एक बहुत बड़े भाग में हिंदी बोली जाती है, और ठीक वहीं गांधी जी ने इस जन-कल्याणकारी नीति को लागू नहीं किया। इसके आगे चलकर बहुत ही दुखद परिणाम निकले। आज भी हिंदी प्रदेश की जनता सबसे पिछड़ी, सबसे अधिक अशिक्षित और सबसे अधिक विघटित अवस्था में है। गांधी जी को हिंदी भाषा से अगाध लगाव था, पर वे उसके राष्ट्रभाषा वाले स्वरूप को ही पहचान पाए। वे यह नहीं देख पाए कि हिंदी 40 करोड़ लोगों की मातृ भाषा भी है। शायद इस कारण ही उनसे हिंदी प्रदेश की घोर उपेक्षा हो गई।

इसमें हिंदी प्रदेश के नेताओं की अदूरदर्शिता का भी कम बड़ा हाथ नहीं था। भाषाई राज्य कायम करते समय उन्होंने हिंदी भाषियों की तरफ से हिंदी क्षेत्र की मांग नहीं रखी। दूसरा कारण यह था कि हिंदी प्रदेश के सभी प्रमुख नेता अंग्रेजियत में इतने रंगे हुए थे कि वे अपने प्रदेश के हित के बारे में ठीक से सोच ही नहीं पाए। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू आदि का उदाहरण लिया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू छोटी उम्र से ही परदेश में पढ़े थे और उनकी मुख्य भाषा अंग्रेजी हो गई थी।

हिंदी भाषियों का यह दुर्भाग्य रहा है कि उनके अधिकांश नेताओं का हिंदी साहित्य, साहित्यकार, हिंदी भाषा आदि से कम ही सरोकार रहा है। इसकी तुलना में अन्य भाषा क्षेत्रों के नेता स्वयं साहित्यकार थे या अपनी भाषा के अच्छे पारखी।

इस तरह आजादी से पहले ही हिंदी को छोड़कर अधिकांश भाषाओं के प्रांत बन गए थे, और वे द्रुत प्रगति करने लगे, लेकिन हिंदी भाषियों को हिंदी भाषा के आधार पर संगठित नहीं किया जा सका और वे पिछड़ी हालत में बने रहे और आज भी यही स्थिति है।

हिंदी भाषा क्षेत्र के नेताओं में दूर-दर्शिता की कमी के कारण वे जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के महत्व को समझ नहीं सके। यदि आज हिंदी भाषा क्षेत्र हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-अवर्ण, आदि में इतना बंटा हुआ है, तो वह इसलिए कि वहां लोगों को भाषा के आधार पर संगठित न करके, धर्म, जाति, वर्ण आदि विघटनकारी आधारों पर संगठित करने की कोशिश की गई। इसका अवश्यंभावी परिणाम था देश का विभाजन और लोगों का पिछड़ापन। पाकिस्तान की मांग सबसे बुलंद रूप से उत्तर प्रदेश-बिहार से ही आई थी।

आज भी यहां के नेतागण जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के सर्वोपरि महत्व को समझ नहीं सके हैं। मायावती जैसे संकीर्ण-सोच वाले नेता बचे-खुचे उत्तर प्रदेश को और भी पांच टुकड़ों में बांटने की बात कर रहे हैं।

इसके विपरीत डा. रामविलास शर्मा ने यह मांग की थी कि समस्त हिंदी प्रदेश को राजनीतिक स्तर पर एकीकृत करके एक विशाल हिंदी प्रदेश बना देना चाहिए, उसी तरह जैसे आज तमिलनाडु, बंगाल, कर्णाटक, गुजरात, आदि भाषाई प्रांत बने हुए हैं। उनका तर्क यह था कि इससे हिंदी बोलने वालों में अपनी एक पहचान बनेगी और उनके बीच जो विभाजक शक्तियां हैं, जिन्हें धर्म और जाति की राजनीति ने खूब उभाड़ा है, वे मिट जाएंगी।

इससे शासन में लगनेवाला खर्च भी खूब बचेगा। आज हिंदी प्रदेश में आठ दस विधान सभाएं हैं, उतने ही मंत्रिमंडल, सचिवालय, मंत्री-परिषद आदि-आदि तामझाम हैं। इन पर अरबों रुपए खर्च होते हैं, जो सब अधिकांश में व्यर्थ ही जाता है। यदि पूरे हिंदी प्रदेश में एक ही शासकीय केंद्र होता, तो शासन कहीं अधिक कम खर्चे में और अधिक सुचारु ढंग से हो पाता। बचे पैसे से लोगों के शिक्षण, आवास, रोजगार आदि का इंतजाम हो सकता था। हिंदी प्रदेश के लोगों को भी जाति, धर्म आदि के कटघरों से बाहर निकालकर एक शक्तिशाली जन समूह में बदला जा सकता था, जो देश के विकास में सन्नद्ध होकर भारत को सुदृढ़ और अजेय बना देता।

डा. शर्मा ने बड़े ही ओजपूर्ण तरीके से बताया है कि जब 40 करोड़ हिंदी भाषी एक हो जाएं, तो इस देश को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं तोड़ पाएगी। आज एक ओर अमरीका और दूसरी ओर चीन उस पर हावी होने की चेष्टा कर रहा है। एक अरब की आबादी होने के बाद भी विश्व मंच में भारत की कोई पूछ नहीं है। डा. शर्मा ने यह भी दिखाया है कि भारत के दीर्घ इतिहास में जब भी भारत संगठित, सशक्त और सुंदर रहा है, चाहे वह वैदिक समय रहा हो, मौर्यों का समय रहा हो, गुप्तों के समय रहा हो या मुगलों का समय रहा हो, हिंदी प्रदेश, जिसे विभिन्न नाम दिया गया है, जैसे आर्यावर्त, हिंदुस्तान, आदि, एकीकृत था। डा. शर्मा कहते हैं कि यदि हिंदी प्रदेश को एक बार फिर एकीकृत किया जा सके, तो भारत की कई समस्याएं अपने आप ही दूर हो जाएंगी।

इस विचार को उन्होंने अपनी कई किताबों में व्यक्त किया है, जिनमें प्रमुख हैं, भाषा और समाज, और भारत की भाषा समस्या। दोनों वाणी प्रकशन दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं।

अत्यंत खेद की बात है कि स्वयं हिंदी भाषी इस महान, ऋषि तुल्य भारतीय चिंतक के प्रति उदासीन हैं। डा. रामविलास शर्मा को मैं कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि भारतीय महापुरुषों और मार्क्स, लेनिन, माओ आदि विदेशी महापुरुषों की कोटि में रखता हूं। डा. शर्मा के विचारों में भी इन अन्य महापुरुषों के ही समान भारत का कायकल्प करने की क्षमता है, बशर्ते कि हिंदी भाषी लोग, और भारत की उन्नति में विश्वास रखनेवाले अन्य भाषा-भाषी लोग भी, उनकी पुस्तकों को पढ़ें और उनके विचारों पर मनन करें और उन पर कार्रवाई करें।

हमारे सौभाग्य से डां. शर्मा ने लंबी आयु पाई थी और वे अपने जीवन के एक पल का भी अपव्यय न करते हुए, बड़े ही संगठित, और सुव्यवस्थित तरीके से अध्ययन और लेखन में लगे रहे। उनकी सौ से अधिक किताबें प्रकाशित हुई हैं, और एक-एक रत्न हैं। डा. शर्मा का जीवन दर्शाता है कि कलम में समाज को बदलने की कितनी ताकत हो सकती है। पर कलम तभी सफल हो सकता है, जब उसके लिखे हुए शब्दों को लोग पढ़ें। यदि आज के भारतीय समाज में डा. शर्मा के विचारों का कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि के विचारों जितना प्रभाव नहीं देखने में आ रहा है, तो इसका मुख्य कारण हिंदी भाषियों की उदासीनता है, यद्यपि हिंदी भाषियों के प्रति डा. शर्मा को अगाध प्रेम था, और उनकी उन्नति में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी थी।

डा. शर्मा विरोधाभासों के पुलिंदा थे। लंगोट पहनकर शरीर में तेल मलकर अखाड़े की रेत में उतरकर पहलवानों के साथ दो-दो हाथ करने वाले, पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर, दिल से हिंदी के प्रकांड पंडित और महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता, कवि, आलोचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद ये सब विशेषण उन पर समान रूप से लागू होते हैं। वे सचमुच एक ऐसे अद्भुत व्यक्ति हैं जिनके जीवन के बारे में जानकर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और हिंदी भाषियों की उनके प्रति उदासीनता को देखकर भी कुछ कम आश्चर्य नहीं होता।

5 Comments:

अनुनाद सिंह said...

इस समय एक हिन्दी प्रदेश बनाना कितना कारगर होगा इस पर मैं कुछ भी नहीं कह सकता। किन्तु यह बात सोलह आने सत्य है कि हिन्दीभाषियों में अपनी भाषा के प्रति आग्रह शायद दुनिया में सबसे कम होगा।

डा रामविलास जी शर्मा के बारे में बहुत अच्छी ौर आश्चर्यजनक) बातें पता चलीं।

गिरिजेश राव said...

वह एक ऋषि ही थे । हिन्दी प्रदेशों को मिलाने से तो एक समांतर देश ही बन जाएगा । क्या यह व्यावहारिक होगा?

Udan Tashtari said...

आलेख पढ़ा. गिरिजेशा राव जी का संशय ठीक लगता है.

बालसुब्रमण्यम said...

गिरिजेश और समीर जी: इस संशय का उत्तर डा. शर्मा की पुस्तकें पढ़ने से हो सकेगा। उन्होंने उनमें काफी विस्तृत विश्लेषण दिया है इस बात को लेकर। मैं कोशिश करूंगा कि कुछ लेखों में उनके तर्क का सारांश प्रस्तुत करूं, पर ये तर्क काफी जटिल हैं और उनके पुस्तकों में ही ठीक तरह से समझ में आएंगे। इसलिए आप भी उन पुस्तकों को पढ़ें तो चर्चा अधिक रोचक बन सकेगी।

Abhishek Mishra said...

Dr. Sharma ki soch vakai vicharottejak hai.

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