Thursday, June 18, 2009

रेशम प्राप्त करने की अहिंसक विधि

रेशम के वस्त्र सुंदर एवं टिकाऊ होते हैं, और वे राजा-महाराजाओं और संभ्रांत वर्ग के लोगों में हजारों सालों से लोकप्रिय रहे हैं। कृष्ण भगवान के पीतांबरी वस्त्र तो प्रसिद्ध ही हैं, जो रेशम के बने थे। रेशम बनाने की विधि पूर्वी एशिया के देशों में विकसित हुई, विशेषकर चीन में। रेशम एक प्रकार के पतिंगे के डिंभक (लार्वा) द्वारा स्रावित धागे से बनाया जाता है। इस डिंभक का विकास जब पूरा हो जाता है, तो वह महीन धागे का एक कोष बना लेता है और उसमें विश्राम करता है। रेशम प्राप्त करने के लिए इस कोष को गरम पानी में डालकर डिंभक को मार दिया जाता है और उसके कोष के धागे को उतार लिया जाता है। इस तरह सुंदर रेशम प्राप्त करने के लिए इन निरीह कीड़ों की कुर्बानी देनी पड़ती है।

हमारे देश के पूर्वी राज्यों में, विशेषकर असम में, रेशम प्राप्त करने की एक दूसरी विधि भी प्रचलित है, जिसे ऐरी-पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें कोषस्थ कीड़े को मारा नहीं जाता है और उसे वयस्क पतिंगे में बदलने दिया जाता है। इसलिए यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है। असम और भारत के अन्य पूर्वी राज्यों में ऐरी रेशम का उत्पादन पारंपरिक घरेलू उद्योग के रूप में चलता है और वहां ग्रामीण लोग इससे अतिरिक्त आमदनी कमाते हैं। ऐरी कीड़े को अरंडी (कैस्टर) के पौधों पर उगाया जाता है।

अब रेशम बनाने की यह विधि देश के अन्य राज्यों में भी अपनाई जा रही है। इसका सबसे अधिक प्रचलन गुजरात में देखा जा रहा है। इसके अनेक कारण हैं। गुजरात अरंडी का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहां कपड़ा मिलों की संख्या देश भर में सर्वाधिक है। गांधीजी की जन्मस्थली होने कारण गुजरात में अहिंसा की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। यहां जैन धर्मावलंबियों की भी बड़ी आबादी है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर अहमदाबाद के एक कपड़ा मिल के प्रशिक्षक श्री शशिकांत शुक्ल ने गुजरात में रेशम बनाने के लिए ऐरी पद्धति को विकसित किया है और उसे एक बड़े उद्योग का रूप देने का बीड़ा उठाया है। अमहदाबाद में कपड़ा मिलों की प्रचुरता के कारण रेशम को बुनने-कातने की सबसे कुशल विधि का पता लगाने के लिए यहां पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तरह बने रेशम से तैयार किए गए वस्त्रों की बिक्री की व्यवस्था भी वहां अच्छी तरह हो सकती है। उन्हें अपने काम में खादी ग्राम प्रयोग समिति और ज्ञान नामक संस्था का भी सहयोग प्राप्त हुआ है।

ऐरी रेशम उद्योग के फलने-फूलने से अनेक सामाजिक और आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं। यह अरंडी उगानेवाले किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन हो सकता है। चूंकि यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है, गुजरात के जैन समुदायों में इस तरह के रेशम के वस्त्रों की बिक्री हो सकती है। महिलाएं इस काम को आसानी से अपना सकती हैं और घर के लिए अतिरिक्त आमदनी कमा सकती हैं। इससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बिना अधिक पूंजी निवेश के पैदा किए जा सकते हैं। इस पद्धति को सीखने के लिए निश्शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है।

ऐरी रेशम के आने से अब हम रेशम के सुंदर वस्त्र पहनते समय निरीह कीड़ों की बड़े पैमाने पर हत्या करने के संकोच से बच सकते हैं।

9 Comments:

गिरिजेश राव said...

ऐरी-पद्धति में रेशम किस प्रकार निकाला जाता है ?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इस पद्यति की कुछ जानकारी मिलती तो अच्छा रहता।

संजय बेंगाणी said...

आपका लेख बहुत सुन्दर जानकारी लिये हुए है. एक असहमती है.
गांधीजी की जन्मस्थली होने कारण गुजरात में अहिंसा की भावना कूटकूट कर भरी हुई है।

ऐसा नहीं है. गाँधीजी गुजरात से थे इसलिए वे अहिंसक हुए. न कि गाँधीजी के कारण गुजरात. :)

P.N. Subramanian said...

हाँ हम भी जानना चाहेंगे कि रेशम निकालने की विधि क्या होती है. कोकून के अन्दर कीडे को बिना मारे छोड़ दिया जाता है तो कुछ समय बाद वह छेद बनाकर बाहर निकल पड़ता है और उड़ने की कोशिश करता है.बहुत शीघ्र वह मर भी जाता है. इसके कारण समस्या यह है की रेशम का धागा लगातार बड़ी लम्बाई का नहीं मिल पाता. धागे टुकडों में मिलते है.

ताऊ रामपुरिया said...

हां इस बारे मे मैने एक विस्तृत लेख कहीं पढा था. इसमे कास्टिंग थोडी ज्यादा बैठती है. पर इस रेशम की काफ़ी डिमांड है, महंगा होने के बावजूद.

शायद किसी मैगजीन मे इसके बारे मे बहुत ही विस्तृत जानकारी दी गई थी.

रामराम.

बालसुब्रमण्यम said...

संजय जी: गुजरात से तो बहुत से अन्य लोग भी हुए हैं, पर वे सब अहिंसक नहीं हुए। आप समझ गए होंगे, मेरा इशारा किस ओर है। इसलिए गांधी जी को अहिंसक बनाने में गुजरात का कितना हाथ रहा है, यह विचारणीय है। उनकी अपनी अभिरुचि और संस्कारों के कारण ही वे अहिंसक हुए। वे वैष्णव परिवार में जन्मे थे और उन पर जैन प्रभाव भी पड़ा था। इसके अलावा इंग्लैड और दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन पर ईसाई प्रभाव भी खूब पड़ा। अनेक पादरियों ने उन्हें ईसाई बनाने की भी खूब कोशिश की थी, पर सफल नहीं हुए। वयस्क होने पर रस्किन और टोल्स्टोय से भी वे प्रभावित हुए थे, जिनमें भी अहिंसक प्रवृत्ति प्रबल थी। खैर, यह सब यहां के लिए अप्रासंगित है।

द्विवेदी जी, गिरिजेश जी: जहां तक मैं जान पाया हूं, एरी पद्धति में कोष के अंदर मौजूद प्यूपा को गरम पानी में डालकर मारा नहीं जाता है। उसके बाहर निकल आने के तुरंत बाद कोष से रेशे उतार लिए जाते हैं। इन रेशों को रील करके इकट्ठा नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें कातकर उनसे रेशम का धागा बनाया जाता है।

यह कला उत्तर-पूर्वी भारत, बिहार और उड़ीसा में विकसित हुआ। चूंकि कीड़े को मारा नहीं जाता है, इसलिए इस रेशम को अहिंसक रेशम नाम दिया गया है।

बालसुब्रमण्यम said...

सुब्रमण्यम जी: ऐरी पद्धति में रेशम के धागे को रील करके इकट्ठा नहीं किया जाता, बल्कि उसे कातकर रेशम का धागा तैयार किया जाता है। इसलिए लंबे-लंबे रेशे न मिले, तो भी काम चल जाता है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जानकारी अच्छी है, किन्तु कीड़े को मारे बिना रेशम निकलने की पद्धति पर विस्तार से प्रक्रिया की जानकारी की आवशयकता शेष रह गयी.

अभिषेक ओझा said...

अच्छा तरीका. पहली बार ही सुना इसके बारे में.

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