Monday, June 08, 2009

पुस्तक पढ़ने में हममें इतनी अरुचि क्यों है?

कबाड़खाना में हिंदी पुस्तक प्रकाशन की स्थिति पर एक लेख छपा है, जिसका स्वर अत्यंत निराशावादी है।

उक्त पोस्ट का मुख्य तर्क यह है कि प्रकाशक लेखकों को लूटते हैं और बहुत महंगी किताबें प्रकाशित करते हैं, जिससे किताबें पाठकों की पहुंच से बाहर हो जाती हैं, पुस्तक वितरण में गंदी राजनीति खेली जाती है। इत्यादि।

आइए देखते हैं, इन आक्षेपों में कितनी सचाई है।

मेरे द्वारा अभी हाल ही में खरीदी गई कुछ पुस्तकों का ब्योरा नीचे दिया गया है -

  1. भारतीय भाषा विज्ञान, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, वाणी प्रकाशन, मूल्य रु. 250, 222 पृष्ठ, सजिल्द।
  2. भारत की भाषा समस्या, रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, मूल्य रु. 365, 358 पृष्ठ, सजिल्द।
  3. गांधी, आंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं, रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, मूल्य रु. 995, पृष्ठ संख्या 786, सजिल्द।
  4. भारतीय ज्योतिष, नेमिचंद्र शास्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ, मूल्य रु. 200, पृष्ठ संख्या 446, सजिल्द।

अब हम तुलना के लिए कुछ अन्य चीजों का मूल्य भी देख लेते हैं -
  1. डोमिनोस का मीडियम साइस पीजा मंगाने पर 350 रु. का बिल हाथ में मिलता है। पीजा खाकर हजम करने में 15-20 मिनट से अधिक समय नहीं लगता।
  2. किसी मल्टी प्लेक्स में जाकर परिवार सहित कोई घटिया हिंदी (या अंग्रेजी) फिल्म देख आने पर 3-4 घंटे बिगड़ते हैं और जेब भी 1000-1500 रुपए से हल्की हो जाती है (150 रु. के हिसाब से 4 लोगों का टिकट 600 रु., पोपकोर्न-पेप्सी 30 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 120 रुपए, कार-पार्किंग फी – 20 रुपए, अन्य खरीदारी 100 रु. से लेकर ???)
  3. टीवी चैनलवाला हर महीने रु. 350 ले जाता है, यानी साल में 4,200 रु.। यदि टाटा स्काय या ऐसा ही कुछ लगवाएं, तो 4,000 रु. डाउन पेमेंट और 150-300 रुपए मासिक अदायगी।
  4. किसी होटल-रेस्तरां में खाने चले गए (परिवार सहित) तो भी 500 से 1000 तक का खर्चा आता है।

अब इन दूसरे प्रकार के खर्चों से किताबों के खर्चे की तुलना की जाए, तो किताबें उतनी महंगी नहीं लगती हैं। और उन किताबों का स्थायी मूल्य है जिसे आप तथा आपके घर का कोई भी व्यक्ति जब चाहे भुना सकता है और उनके भुनाने के बाद भी इन किताबों का मूल्य ज्यों का त्यों बना रहता है, और सालों तक बना रहेगा। मेरे पास मौजूद कुछ किताबें बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस साल पुरानी हैं और उन्हें मैं आज भी पढ़कर आनंद उठाता हूं। इसकी तुलना में पीजा का मजा ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे तक रहता है, फिल्में तो हम थिएटर से बाहर निकलते ही भूल जाते हैं। यही हाल टीवी कार्यक्रमों और होटलों में खाए गए खाने का भी है।

हां, यदि हिंदी किताबों की कीमत को अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की कीमत से तुलना करें, तो वे महंगी लगती हैं, पर यदि हम उन्हें अंग्रेजी किताबों से करें, तो हिंदी किताबें सस्ती लगती हैं। इसका कारण शायद यह है कि हिंदी एक विश्व भाषा है और भारत की ही बात करें, तो हिंदी यहां आठ-दस राज्यों में बोली जाती है। इसलिए हिंदी प्रकाशकों को पुस्तक का मार्केटिंग करने में काफी धन खर्च करना पड़ता है। और चूंकि लोगों में पढ़ने की आदत कम है और क्रय शक्ति भी कम है, इसलिए प्रकाशक जोखिम उठाने से डरता है। जोखिम उठाने की उसकी क्षमता भी कम है क्योंकि उसके पास पूंजी कम है। एक किताब के पीछे लाखों रुपए मार्केटिंग में खर्च कर पाने की स्थिति उसकी नहीं है। यदि आप हैरी पौटर की किताब को जिस तरह मार्केट किया गया था, उस पर विचार करें तो यह बात समझ में आ जाएगी। यहां के प्रकाशक ज्यादा से ज्यादा पुस्तक का विमोचन करा सकते हैं, और उस समारोह में किसी बड़े नेता को बुला सकते हैं, बस, ताकि टीवी-अखबार में कवरेज मिल सके।

आज एक भी हिंदी प्रकाशक ऐसा नहीं है जिसका देश के कोने-कोने में विक्रय केंद्र हो। बड़े-से-बड़े हिंदी प्रकाशक के भी विक्रय केंद्र दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और ज्यादा-ज्यादा लखनऊ-इलाहाबाद में ही होंगे। मुझे अहमदाबाद में रहते हुए हिंदी पुस्तकें खरीदने में काफी जद्दो-जहद करनी पड़ती है। बीस-बीस पच्चीस दिन बाद किताब मिल पाती है। यहां क्रोसवर्ड, बुकबे, रिलाएन्स मार्ट, रिलाएन्स फ्रेश, बिग बाजार, स्टार बाजार आदि अनेकानेक राष्ट्रव्यापी टेलरों के कई आउटलेट हैं, पर उनमें नाममात्र के लिए हिंदी पुस्तकें होती हैं। इसका कारण क्या है, मुझे समझ में नहीं आता। शायद इन पुस्तक रीटेलरों की नीति ही केवल अंग्रेजी पुस्तकें रखने की हो, या हिंदी पुस्तक प्रकाशकों ने इन रिटेलरों के जरिए पुस्तकें देश के कोने-कोने तक पहुंचाने का महत्व ही नहीं समझा हो।

पुस्तक प्रकाशन और पुस्तक विक्रय दो अलग-अलग चीजें हैं। हमारे प्रकाशक दोनों घोड़ों पर एक साथ सवार करने की कोशिश करते हैं और दोनों में विफल हो जाते हैं। होना यह चाहिए कि प्रकाशक और बुकसेलर/रीटेलर अलग-अलग व्यवसायी रहें, प्रकाशक पुस्तक प्रकाशन में पैसा लगाए और रीटेलर पुस्तक वितरण में। फिल्मों का मार्केटिंग ऐसे ही होता है, और देश का ऐसा कोई गांव नहीं जहां हिंदी फिल्में नहीं पहुंचती हों। देश के बाहर भी वे खूब पहुंचती हैं। यदि पुस्तकों के लिए भी यही नीति अपनाई जाए, तो पुस्तकें भी ज्यादा संख्या में छपेंगी और बिकेंगी भी। आज स्थिति यह है कि हिंदी पुस्तकें ऐसे कई लोगों तक पहुंचती ही नहीं हैं जो उन्हें खरीदना चाहते हैं।

अहमदाबाद का ही उदाहरण लिया जाए। यहां लगभग सभी हिंदी बोलते-समझते हैं। यहां हिंदी भाषी लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है, विशेषकर राजस्थान के लोगों की। सौ से ज्यादा हिंदी माध्यम के स्कूल हैं। चार विश्वविद्यालय हैं जिनमें हिंदी एम ए स्तर तक पढ़ाई जाती है। अनगिनत कालेज हैं जिनमें हिंदी पढ़ाई जाती है। फिर भी यहां हिंदी की किताबें आसानी से नहीं मिलतीं। किसी भी बड़े हिंदी प्रकाशक का आउटलेट यहां नहीं है। ऐसा क्यों है? मुझे लगता है कि प्रकाशक स्वयं इस ओर से उदासीन हैं। वे पुस्तकों को सरकारी पुस्तकालयों में बेच डालने का ही प्रयास करते हैं। इसीलिए वे किसी भी पुस्तक का 1000 से अधिक प्रतियां मुद्रित ही नहीं करते। इससे प्रति किताब कीमत भी बढ़ जाती है। यदि वे 1000 के बजाए 10,000 या 20,000 छापें, तो प्रति किताब कीमत कम हो सकती है, जिससे ज्यादा लोग किताब खरीद पाएंगे। प्रकाशकों को अपनी सोच बदलनी होगी।

दूसरी बात यह है कि हिंदी प्रकाशक इंटरनेट आदि आधुनिक तकनीकों के उपयोग से पुस्तकें नहीं बेचते हैं। मैं अहमदाबाद में बैठे-बैठे मलयालम पुस्तक प्रकाशकों और वितरकों के वेब साइटों से हफ्ते-भर में मन चाही किताबें मंगा सकता हूं। पर किसी भी हिंदी प्रकाशक का ढंग का वेब साइट नहीं है। यदि है तो ईशोपिंग की व्यवस्था उसमें नहीं है। यहां तक कि कोई ढंग का ईमेल पता भी नहीं है और यदि है, तो ईमेल भेजने पर जवाब ही नहीं आता है। यह भी प्रकाशकों की उदासीनता को ही दर्शाता है। वे पुस्तकालयों पर ही फोकस जमाए रहते हैं। आम आदमी तक पुस्तक पहुंचाना उनका ध्येय ही नहीं है।

हिंदी भाषियों में पुस्तक पठन को बढ़ाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? पहले तो हमें स्वयं पुस्तकें खरीदकर पढ़ने की आदत डालती होगी। हर महीने एक पीजा कम खाएं, या एक पैकेट सिगरेट कम फूंकें, या अन्य प्रकार से बचत करें और इस पैसे से हम किताब खरीदें। बच्चों में खास तौर पर पढ़ने की आदत डालें। जन्मदिन आदि में फालतू के खिलौने खरीदकर देने के बजाए उतने ही पैसे की किताबें खरीदकर दें। केवल खरीदकर ही न दें, बल्कि उन्हें पढ़कर सुनाएं भी। दो-तीन किताबें बच्चों को पढ़कर सुनाने से उन्हें किताबों में रुचि होने लगेगी और वे स्वयं ही आपसे किताबें लाकर देने को कहेंगे। घर में टीवी थोड़ा कम देखकर पुस्तकें पढ़ें। बच्चे हमें किताबें पढ़ते देखकर खुद भी पढ़ने लगेंगे, उसी तरह जैसे वे हमें सिगरेट पीते देखकर स्वयं सिगरेट पीने लगते हैं। हम बुरी आदतों के साथ-साथ क्यों न उनमें कुछ अच्छी आदतें भी डालें, जैसे पुस्तक पढ़ना?

अपने ब्लोगों में किताबों की खूब चर्चा करें। इससे हमारे ब्लोगों के पाठकों में किताबें पढ़ने की रुचि बढ़ेगी।

पढ़ लेने के बाद पुस्तकों को मुहल्ले के पुस्तकालय को दे आएं ताकि और लोग भी उन्हें पढ़ें। यदि मुहल्ले में पुस्तकालय न हो, तो कुछ पड़ोसी मिलकर ऐसे पुस्तकालय स्थापित करने पर विचार करें।

और भी कुछ किया जा सकता हो, तो इस लेख की टिप्पणियों में बताएं।

8 Comments:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

आपने बहुत खूबसूरती और तार्किकता के साथ इस आक्षेप का जबाब दिया है कि हिन्दी किताबें महंगी हैं. हिन्दी पट्टी में किताबें पढने की रुचि कम है, यह हम सभी जानते-मानते हैं. पता नहीं क्यों, एक बात की तरफ आपका ध्यान नहीं जा पाया और वह यह कि हिन्दी प्रकाशक वैयक्तिक पाठक के लिए न तो किताब छापता है और न उसे बेचने में कोई दिलचस्पी रखता है. अगर ऐसा न होता तो उसने भी अपनी किताबों की मार्केटिग में कोई रुचि ली होती.हिन्दी प्रकाशक की रुचि केवल और केवल सरकारी खरीद में है, जहां वह सम्बद्ध लोगों को कमीशन खिलाकर अपनी किताबें खपा देता है.और वे किताबें प्रायं डम्प हो जाती हैं. अब इस कमीशन की वजह से किताबों का मुद्रित मूल्य दुगुना या उससे भी ज़्यादा होता है. अगर प्रकाशक अपने वैयक्तिक पाठक को 200 रुपये के मुद्रित मूल्य वाली किताब 100 में दे तो किताब को महंगा नहीं कहा जायेगा. लेकिन वह ऐसा करता नहीं है. पिज़्ज़ा या सिगरेट या फिल्म देखने से किताब के मूल्य की तुलना करने का कोई अर्थ नहीं है. किताब की तुलना किताब से ही की जानी चाहिये.आप तो पाठक की क्रय शक्ति पर पहुंच गये

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा विश्लेषण किया है. वाकई, दीगर बातों में इससे कहीं अधिक खर्च है.

सवाल रुचि का तो है ही.

विचारणीय आलेख.

गिरिजेश राव said...

उम्दा विश्लेषण। हमारे लिखने के लिए आप ने कुछ छोड़ा ही नहीं।

पुस्तकों की ब्लॉग चर्चा अच्छा सुझाव है। देखता हूँ। अजित जी की साप्ताहिकी तो कमाल की होती है। उसके आगे कुछ करने से डर लगता है। स्तर बहुत उठा दिया है। :)

वैसे आज के पोस्ट को देखने से लगता है कि आप पूरी तरह से सक्षम हैं। समीक्षा क्यों नहीं लिखते !

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

लोग किताबें नहीं पढ़ते इसका एक प्रमुख कारण मेरे पड़नानाजी डॉ माधोदासजी व्‍यास बताते थे। वे जब हमें कॉमिक्‍स पढ़ते हुए देखते तो कहते कि अभी हल्‍का साहित्‍य पढ़ोगे तो भविष्‍य में अच्‍छा साहित्‍य पढ़ने में कठिनाई महसूस होगी। उनकी बात मानी और छोटी उम्र में मैंने हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़ा। कुछ भी समझ में नहीं आया। कुछ दिन बाद पड़नानाजी के पास ही वापस गया और उनसे कुछ शब्‍दों के अर्थ पूछे तो उन्‍होंने पूछा कहां पढ़ा। मैंने बताया तो बोले अभी सस्‍ता साहित्‍य मण्‍डल की पुस्‍तकें पढ़ो। फिर चौबोली रानी से लेकर सिंहासन बत्‍तीसी तक की सारी पुस्‍तकें पढ़ डाली। हम भाग्‍यशाली थे कि माताजी हर तरह की पुस्‍तकें खरीद देती थीं।

आज भी यह महसूस होता है कि हल्‍के स्‍तर की पुस्‍तकें पढ़ेंगे तो अच्‍छा साहित्‍य पढ़ना मुश्किल लगेगा। मैंने बाद में कई लोगों को ऐसी स्थिति में फंसे देखा है। आप किसी भी घर में चले जाइए। पढ़ने वाले लोग भी होंगे तो मोटीवेशनल मैनेजमेंट, पर्सनेलिटी डवलपमेंट की किताबों के अलावा तमाम तरह की मैग्‍जीन मिल जाएगी लेकिन कहीं निराला, पंत, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, द्विवेदीजी आदि की पुस्‍तकें नहीं दिखाई देंगी। होंगी तो भी रैक में सजी और धूल चढ़ी।

आपका विश्‍लेषण बहुत अच्‍छा है।
और राव साहब की सलाह का अनुमोदन करता हूं कि नियमित रूप से कुछ किताबों की समीक्षा देंगे तो हमारा भी भला होगा।

डॉ .अनुराग said...

वैसे तो पढना एक हॉबी है..जो बचपन में डेवलप हो जाती है .कई बार पारिवारिक माहोल के कारण कई बार व्यक्तिगत रूचि के कारण .......फिर भी हर शहर में एक या दो दुकाने ही पुस्तकों के लिए है....जहाँ हर किताब उपलब्ध नहीं रहती...मंगवाने ओर ढूँढने में कई बार कई वक़्त लग जाता है ..इससे केवल उन्ही पुस्तकों तक पहुँच रहती है जिनके बारे में कही पढ़ा ओर सुना गया हो.....दूसरे हर शहर में पुस्तकालयों की हालत बुरी है..ने किताबे है नहीं.....मेंतेनेनस न के बराबर ...ये तो रही उन लोगो की बात जिनको पुस्तकों में रूचि है .....
दूसरी बात उस इन्सान की प्रवति की ..एक आम व्यक्ति की..जिसकी रूचि शायद दूसरे विषयों में ज्यादा हो.....उसे कैसे मोटिवेट किया जाए ...जैसे किसी बच्चे के जन्मदिन पर किताबे बहुत कम लोग देते है....

आज भी गाँधी पर बहसियाने वाले लोगो में अस्सी फीसदी ऐसे है जिन्होंने गाँधी के बारे में सिर्फ स्कूल .ओर अखबारों में यदा कदा कही पढ़ा है .कभी खरीदकर कोई किता नहीं पढ़ी होगी .....बाकी बात तो जाने दीजिये

बी एस पाबला said...

एक बढ़िया सुलझी पोस्ट

वैसे पुस्तकों की ब्लॉग चर्चा अच्छा सुझाव है।

Mired Mirage said...

आपकी बात से सहमत हूँ। एक ऐसा ब्लौग बना्ना चाहती हूँ,जहाँ सब अपनी पढी पुस्तक की चर्चा करें।
उपलब्ध भी नहीं हैं और चर्चित भी नहीं हैं ,स्वाभाविक हैं तब बिकेंगी कैसे?
यहाँ तक कि दिल्ली में भी हिन्दी पुस्तकें खोजना कठिन है।
घुघूती बासूती

बालसुब्रमण्यम said...

अग्रवाल जी: आपने जिस मुद्दे को उठाया है, उस पर मेरी समझ के अनुसार मैंने अपने लेख में भी जिक्र किया है। मेरे एक मित्र हैं जिन्होंने पौधशाला बनाने के विषय पर एक तकनीकी किताब गुजराती में लिखी थी, जिसका पर्यावरण मंत्रालय ने हिंदी में अनुवाद कराया था। वे बड़े खुश हुए थे इससे। एक साल बाद उनका पर्यावरण मंत्रालय के दफ्तर में जाना हुआ। उन्होंने देखा उनकी किताब के हिंदी संस्करण की प्रतियां उस दफ्तर में बाथरूम के पास के एक कमरे में जमीन से लेकर छत तक दिवार के सहारे ढेर लगाकर रखी पड़ी हैं। प्रिंटर से वे जैसी आई थीं, ठीक वैसी ही रखी पड़ी हैं। बंडलों को खोला तक नहीं गया था। जमीन पर रखी कुछ किताबें बाथरूम से निकले पानी के लगने से खराब भी होने लगी थीं। तो यह है असलियत। अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, निश्चय ही।

समीर जी: कनाडा में बसे भारतीयों में क्या हिंदी पुस्तकों के प्रति रुचि बची है? कई बार देश से दूर रहने पर देशी चीजों के प्रति मोह बढ़ता है। इस पर आपने एक कविता भी लिखी है, हालांकि इस भावना को धिक्कारते हुए। तो क्या कनाडा के हिंदी भाषियों में हिंदी किताबें पढ़ने में रुचि पाई जाती है? यदि हां, तो वे हिंदी किताबें कैसे प्राप्त करते हैं? यदि नहीं तो, क्या किया जा सकता है, जिससे वे हिंदी किताबें मंगाकर पढ़ें। वहां हिंदी पुस्तकाल स्थापित करने की कोई गुंजाइश है?

गिरिजेश और सिद्धार्थ: कोशिश करके देखूंगा, जयहिंदी में पुस्तक-समीक्षा शुरू करने के बारे में। पर एक ब्लोगर के करने से कुछ न होगा। आप भी अपने ब्लोगों पर पुस्तकों की चर्चा करें। सिद्धार्थ जी, आप ज्योतिष विद्या से संबंधित किताबों की चर्चा कर सकते हैं। ऐसी कितनी ही किताबें हैं, पुरानी भी और नई भी।

डा. अनुराग: हां, न जाने क्यों लोग किताबें खरीदने से इतना कतराते हैं। टीशर्ट, जीन्स, आईस्क्रीम, गोगल्स, मोबाइल आदि पर लोग पैसा पानी की तरह बहाते हैं, पर किताबें बेचारी अछूत सी हो गई हैं।

पाबला जी: आपके ब्लोग में पुस्तक-चर्चा की प्रतीक्षा रहेगी। यदि सभी ब्लोग हर महीने कम से कम एक पुस्तक की ही चर्चा कर दें, तो बहुत कुछ पोसिटिव हो सकता है।

Mired Mirages: पुस्तक चर्चा के लिए अलग ब्लोग बनाने का विचार बहुत अच्छा है। यह ब्लोग जल्द शुरू कर दें। दिल्ली में हिंदी किताबें न मिल पाने का मुझे भी खूब अनुभव है। जब भी दिल्ली जाता हूं खरीदने योग्य किताबों की एक लंबी लिस्ट लेकर ही जाता हूं। पर घर के पास (रोहिणी) के किसी भी पुस्तक-विक्रेता से ये किताबें नहीं मिल पातीं। एक पूरा दिन बिगाड़कर नई सड़क और दरियागंज की खाक छाननी ही पड़ती है। फिर भी कई किताबें नहीं मिल पातीं, यहां तक कि उनके प्रकाशकों के पास भी वे नहीं होतीं।

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