Wednesday, June 24, 2009

क्यों बनानी चाहिए आपको अपनी वसीहत

वसीहत बनाने से बहुत लोग कतराते हैं क्योंकि वह उन्हें अपनी मृत्यु की याद दिलाता है। परंतु वसीहत बनाना बहुत जरूरी है। आपके लिए नहीं, वरन उन लोगों के लिए जिन्हें आप चाहते हैं। आपकी इच्छाओं को जाहिर करने के इस सरल कार्य से आप अपने गुजर जाने के बाद अपनी संपत्ति के बंटवारे को लेकर आपके प्रिय जनों में झगड़ा, उलझन, गलतफहमी एवं कटुता के पैदा होने को रोक सकते हैं।

वसीहत के जरिए आप मृत्यु के बाद भी अपनी इच्छाओं को दूसरों से मनवा सकते हैं और इसकी पक्की व्यवस्था कर सकते हैं कि अपने प्रिय जनों में आपकी संपत्ति का बंटवारा आपकी इच्छानुसार होता है।

हर बालिग और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ व्यक्ति वसीहत बना सकता है। वसीहत बनाना बहुत सरल है। यदि आपकी संपत्ति जटिल प्रकार की नहीं है और यदि आप उसे अपने वारिसों में सीधे-सादे ढंग से बांटना चाहते हैं, तो वकील तक की जरूरत नहीं पड़ेगी। किंतु यदि आपके पास अचल संपत्ति हो या किसी व्यवसाय में आपका हिस्सा हो, तब आपको किसी कानूनी विशेषज्ञ की मदद लेकर ही वसीहत बनानी चाहिए।

वसीहत का लिखित होना आवश्यक है। वह हस्तलिखित हो सकती है (स्याही में) अथवा टंकित। वसीहत को टंकित करवाना अधिक अच्छा है ताकि हस्तलेखन के अस्पष्ट होने से वसीहत को समझने में कठिनाई न पैदा हो। वसीहत स्टैंप पेपर पर ही हो, यह भी आवश्यक नहीं है। किसी भी कागज पर आप अपना वसीहत बना सकते हैं। हां इसका जरूर ध्यान रखें कि कागज टिकाऊ और अच्छी किस्म का हो।

वसीहत को किसी खास कानूनी शब्दावली में लिखना भी जरूरी नहीं है। आप किसी भी भाषा में अपनी स्वाभाविक शैली में वसीहत लिख सकते हैं। यदि वसीहत बनानेवाला अशिक्षित हो, तो वह दूसरे किसी से ऐसी भाषा में वसीहत लिखवा सकता है।

किन्हीं दो व्यक्तियों की मौजूदगी में अपनी वसीहत पर हस्ताक्षर करें। ये दो साक्षी वसीहत पर यह लिखकर हस्ताक्षर करें कि आपने उनकी मौजूदगी में वसीहत पर हस्ताक्षर किए हैं। वसीहत को दो व्यक्तियों से साक्ष्यांकित कराना इसलिए जरूरी है, ताकि यह प्रमाणित हो सके कि वसीहत दबाव की स्थिति में नहीं बल्कि स्वेच्छा से लिखी गई है। यह जरूरी नहीं है कि साक्ष्य देने वाले व्यक्तियों को यह बताई जाए कि वसीहत में क्या लिखा है। कानूनी दृष्टि से यह आवश्यक है कि दोनों साक्षी आपकी मौजूदगी में वसीहत पर सही करें। यदि वे एक-दूसरे की मौजूदगी में सही करें तो और भी अच्छा, क्योंकि ऐसी स्थिति में वे एक-दूसरे की गवाही भी दे सकते हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है। यदि ये दोनों साक्षी वसीहत के हर पन्ने पर सही करें तो उत्तम है। किसी पेशेवर डाक्टर को एक गवाह बनाने का यह लाभ भी रहेगा कि उससे यह प्रमाणित हो जाएगा कि वसीहत पर हस्ताक्षर करते समय आप मानसिक दृष्टि से स्वस्थ थे।

यदि वसीहतकर्ता बीमार हो, तो डाक्टर द्वारा वसीहत को साक्ष्यांकित कराना और भी जरूरी होता है। गवाह ऐसे व्यक्तियों को बनाएं जो आपसे उम्र में छोटे हों और स्वस्थ हों (ताकि उनके आपके बाद जीवित रहने की अधिक संभावना रहे)। वसीहत पर गवाही देने वाला व्यक्ति या उसकी पत्नी अथवा पति वसीहत से लाभान्वित नहीं हो सकता। इसलिए गवाही के लिए ऐसे ही व्यक्ति चुनें जिनका आपने वसीहत में उल्लेख नहीं किया हो।

यदि आप कभी नई वसीहत बनाएं, या पुराने में संशोधन करें, तो पुरानी वसीहत को नष्ट कर दें। कभी भी वसीहत की एक से अधिक प्रति न रखें। इससे बाद में विवाद एवं उलझन पैदा होगा।

किसी एक व्यक्ति का नाम निष्पादक (एक्सिक्यूटर) के रूप में वसीहत में उल्लेख करना जरूरी है। यही वसीहत में लिखी आपकी इच्छाओं को अमल में लाएगा। निष्पादक के रूप में उसी व्यक्ति को चुनें जिसे आप जानते हों और जिस पर आपको भरोसा हो और जो आपकी वसीहत का निष्पादक बनने के लिए तैयार हो। निष्पादक वसीहत द्वारा उपकृत व्यक्तियों में से एक भी हो सकता है।

वसीहत में आमतौर पर संपत्ति के बंटवारे की बात की जाती है, पर उसमें आप अपनी अन्य कोई इच्छा भी जाहिर कर सकते हैं, जैसे कि आप अपना अंत्येष्ठि किस प्रकार कराना चाहते हैं। उदाहरण के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी वसीहत में लिखा था कि उनके शरीर की राख को हवाई जहाज पर से भारतवर्ष के ऊपर छितरा दिया जाए।

परंतु संपत्ति के निपटारे के संबंध में आपको पूरी छूट नहीं है और आपकी इच्छाओं को वर्तमान कानूनों से संगत होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए अपनी संपत्ति को वसीहत के जरिए किसे दे सकते हैं यह हिंदू एडोप्शन एंड मेन्टेनेन्स एक्ट, 1956, द्वारा नियंत्रित है। आपके परिवार के जो सदस्य आप पर आश्रित हैं, उन्हें आपकी संपत्ति पर से मेन्टेनेन्स प्राप्त करने का पूरा कानूनी हक है, भले ही आपने अपनी वसीहत में उनका नाम नहीं लिया हो। यदि अपनी सभी संपत्ति अपनी संतानों में से किसी एक के नाम कर दें, तो बाकी संतान आपकी इस वसीहत को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।

यदि आप अपनी संपत्ति किसी नाबालिग व्यक्ति को छोड़ रहे हों, तो किसी अभिभावक/न्यास को उसके बालिग होने तक उसके नाम आई संपत्ति का प्रबंध करना होगा। अभिभावक के रूप में ऐसे ही व्यक्ति को चुनें जो इस जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार हो और जो ईमानदार हो।

यद्यपि वसीहत को पंजीकृत कराना आवश्यक नहीं है, पर पंजीकृत करने के कुछ निश्चित लाभ हैं। पंजीकरण अधिकारी के सुपुर्द कर देने से इसकी आशंका नहीं रहती कि बाद में कोई आपकी वसीहत से खिलवाड़ कर सकेगा। आपकी वसीहत को कोई नष्ट भी नहीं कर पाएगा। आपके जीवित रहते आपकी लिखित अनुमति के बिना कोई भी पंजीकरण अधिकारी से आपकी वसीहत प्राप्त नहीं कर सकता। वसीहत का पंजीकरण सब-रिजिस्ट्रार के कार्यालय में कुछ गवाहों की मौजूदगी में होता है। इसके लिए कोई शुल्क भी नहीं लगता। जो व्यक्ति बीमार हो अथवा चल-फिर नहीं सकता हो, उसे कानून सब-रजिस्ट्रार के पास गए बगैर ही अपनी वसीहत पंजीकृत करने की अनुमति देता है। इस अधिकारी को पत्र लिखने पर वह अस्पताल या आपके घर आकर आपकी वसीहत को पंजीकृत कर लेगा।

अंत में एक बार फिर उन बातों को दुहराएं, जिन्हें वसीहत लिखते समय आपको ध्यान में रखना चाहिए:-

  1. वसीहत में आपका पूरा नाम व पता रहे।
  2. उसमें इसका उल्लेख रहे कि आप मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ हैं। यदि आपकी उम्र अधिक हो या आप बीमार हों, तो अपनी मानसिक दुरुस्ती का डाक्टरी प्रमाणपत्र संलग्न करें।
  3. सभी उपकृत व्यक्तियों का पूरा नाम व पता दें।
  4. अपनी सभी संपत्तियों, ऋणों, खर्चों, दायित्वों आदि का स्पष्ट उल्लेख करें।
  5. यह देख लें कि वसीहत की भाषा स्पष्ट एवं असंदिग्ध है।
  6. इसका भी उल्लेख करें कि यह आपका अंतिम वसीहत है।
  7. वसीहत के निष्पादक का उल्लेख करें (उसकी सहमति लेकर)।
  8. दो साक्ष्यों के हस्ताक्षर प्राप्त करें और उनसे लिखवाएं कि आपने उनकी मौजूदगी में वसीहत पर हस्ताक्षर किए हैं।
  9. यदि चाहें तो उसे पंजीकृत कराएं, अन्यथा उसे ऐसी जगह रखें जहां वह सुरक्षित रहे और दूसरों के हाथ न पड़े।
  10. यदि वसीहत दूसरे से लिखवाया हो, तो उसे ध्यान से पढ़ें और देख लें कि वह आपकी इच्छानुसार लिखी गई है।
  11. वसीहत पर किसी भी अवांछित निशान, काट-छांट आदि नहीं होने चाहिए।
  12. हर साल वसीहत दुबारा लिखें। इसी प्रकार हर महत्वपूर्ण पारिवारिक घटना के बाद, जैसे विवाह, जन्म, मृत्यु, तलाक आदि के बाद वसीहत नए सिरे से लिखें और पुरानी वसीहत को नष्ट कर दें।

10 Comments:

Udan Tashtari said...

ज्ञानपरक!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सही जानकारियाँ!
वसीयत की आवश्यकता का प्रचार होना जरूरी है। इस के अभाव मे बहुत झगड़े और विवाद होते हैं।

Arvind Mishra said...

यह इतना अच्छा और समग्र आलेख है की इच्छा हो रही है अभी अपनी वसीयत कर दूं !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हमारे यहाँ हिन्दी-पट्टी में वसीयत का प्रचलन बहुत कम है। पारम्परिक रूप से सम्पत्ति का हस्तान्तरण होता रहता है। लेकिन इससे कभी-कभी विचित्र कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

कोषागार से पेन्शन पाने वालों को एक साधारण सा फॉर्म भरकर जमा करना होता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके जीवन कालीन अवशेषों का भुगतान किसे किया जाय। यह ‘नामांकन पत्र’ भरकर जमा करने के प्रति भी प्रायः उदासीनता देखी जाती है। परिणामस्वरूप पेन्शनर की मृत्यु हो जाने के बाद उसके बकाया सरकारी भुगतान पाने के लिए उनके बच्चों को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र बनवाने के लिए कोर्ट-कचहरी के अनेक चक्कर लगाने पड़ते हैं।

आपका यह आलेख बहुत उपयोगी है। धन्यवाद।

RAJ said...

बहुत ही अछि जानकारी है...

पर यहाँ उत्तर प्रदेश में हर वसीयत विवादित अवश्य हो जाती है....

अतः रजिस्ट्रेशन बहुत ही जरूरी है...

हर वर्ष वसीयत लिखने से क्या फयेदा है ये समझ में नहीं आया....

AlbelaKhatri.com said...

upyogi aalekh
shej kar rakhne layak aalekh
umda aalekh
___________abhinandan !

गिरिजेश राव said...

भरी जवानी में सोच रहा हूं वसीयत लिख ही दूं|
आप के हिस्से ब्लॊग के सारे लेख और टिप्पणियां|

radhe mohan said...

बहुत ही आवश्यक जानकारी

radhe mohan said...

बहुत ही आवश्यक जानकारी

dhananjay singh rana said...

it is very importent sir, for every all.in india,actually every person can,t leave a

bill for his family,but your blog useful for all.


i hope you write always for people in future.thanks a lot.


हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट