Friday, May 22, 2009

चीफ सिएटल का उत्तर

सन 1854 में वाशिंगटन के "महान श्वेत प्रमुख" (अमरीका के राष्ट्रपति) ने अमरीकी इंडियनों से उनके एक बड़े क्षेत्र को अमरीकी सरकार के हवाले करने को कहा। इसके बदले में उनके लिए अलग से संरक्षित प्रदेश का प्रलोभन दिया। अमरीकी इंडियनों के प्रमुख चीफ सिएटल ने इस प्रस्ताव का जो उत्तर दिया, उसे पर्यावरण के बारे में कहा गया सबसे सुंदर एवं गहन वक्तव्य माना जाता है। यह रहा उसका हिंदी रूपांतर।
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"असीम आकाश, या धरती की गरमी को कोई खरीद या बेच कैसे सकता है? यह धारणा हमारे लिए नई है। जब हवा की ताजगी या पानी की चमक हमारी नहीं है, तो तुम उन्हें खरीद कैसे सकते हो?

इस धरती का कोना-कोना हमारे लोगों के लिए पवित्र है। चीड़ वृक्ष का प्रत्येक चमकता पत्ता, प्रत्येक गुंजन करता कीट, मेरे लोगों की स्मृति एवं अनुभव में पवित्र है। पेड़ों की जिन शिराओं में रस बहता है, उन्हीं में लाल मानवों की यादें भी बहती हैं। श्वेत मानव के मृतक तारों के सान्निध्य में स्वर्ग में विचरण करते हुए उनको जन्म देनेवाले देश को भूल जाते हैं। हमारे मृतक इस धरती को कभी नहीं भूलते क्योंकि यह लाल मानव की जननी है। हम धरती के एक अंग हैं और धरती हमारा एक अंग। सुगंधित फूल हमारी बहनें हैं; हिरण, घोड़े, गरुड़, ये हमारे भाई। शैल-शिखर, रस-लिप्त मैदान, घोड़े के शरीर की गरमी, और मनुष्य - ये सब एक ही परिवार के सदस्य हैं।



इसलिए वाशिंगटन का श्वेत प्रमुख जब कहला भेजता है कि वह हमारी जमीन खरीदेगा, तो वह हमसे बहुत कुछ मांग लेता है। श्वेत प्रमुख आश्वासन देता है कि वह हमारे लिए कुछ जगह सुरक्षित कर देगा जिससे हम आराम से जिंदगी गुजार सकें। वह हमारा पिता होगा और हम उसके बच्चे। इसलिए हम तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार करेंगे। परंतु यह आसान न होगा, क्योंकि यह जमीन हमारे लिए पवित्र है। नदियों और सरिताओं में बहनेवाला स्वच्छ जल मात्र जल नहीं है, हमारे पूर्वजों का खून है।

यदि हम तुम्हें जमीन बेचते हैं, तो तुम्हें याद रखना होगा कि वह पवित्र है। तुम्हें अपने बाल-बच्चों को भी सिखाना होगा कि वह पवित्र है, और यह भी कि झीलों के साफ जल में पड़नेवाली प्रत्येक परछाईं हमारे लोगों के जीवन में घटित घटनाओं एवं स्मृतियों की तस्वीर है।

जल की कलकल ध्वनि हमारे बाप-दादाओं की आवाज है। नदियां हमारे भाई-बहन हैं; वे हमारी प्यास बुझाती हैं। नदियां हमारे बच्चों को खिलाती हैं। यदि हम हमारी जमीन को तुम्हें बेचते हैं तो तुम्हें याद रखना होगा, और तुम्हारे बच्चों को भी सिखाना होगा, कि नदियां हमारे भाई-बहन हैं, और तुम्हारे भी, और तुम्हें नदियों के प्रति वैसी ही भलाई करनी होगी जैसी तुम एक भाई या बहन के प्रति करोगे।

हम जानते हैं कि श्वेत मानव हमारी आदतों को समझता नहीं है। उसके लिए जमीन का एक टुकड़ा जमीन के किसी दूसरे टुकड़े के तुल्य है, क्योंकि वह एक अजनबी है जो एक रात आता है और जमीन से वह सब कुछ ले लेता है जो उसे चाहिए होता है। पृथ्वी उसकी बहन नहीं है, वरन शत्रु है और जब वह उस पर विजय प्राप्त कर लेता है तो आगे बढ़ चलता है। अपने पिता की कब्र, पीछे छूट जाने से वह व्यथित नहीं होता। खुद अपने बच्चों से पृथ्वी को छीनता है और ऐसा करके वह लज्जित नहीं होता।

अपने पिता की कब्र, अपने बच्चों के जन्म-सिद्ध अधिकार, सब भूल जाता है। अपनी बहन पृथ्वी और भाई आकाश को खरीदने और लूटने की वस्तु, अथवा भेड़ या सुंदर आभूषणों के समान बेचने की वस्तु समझता है।


उसकी दानव-भूख पृथ्वी को ही स्वाहा कर जाएगी, पीछे रह जाएगा शुष्क रेगिस्तान। मैं असमंजस में हूं। हमारे तौर-तरीके तुमसे भिन्न हैं। तुम्हारे नगरों के दृश्य लाल मानव की आंखों को दुख देते हैं। पर यह शायद इसलिए कि लाल मानव बर्बर है, समझता नहीं।

श्वेत मानव के शहर में कभी भी शांति नहीं है। कहीं ऐसा कोना नहीं है जहां से वसंत ऋतु में खुलते पत्तों की ध्वनि या किसी कीट के पंखों की सरसराहट को सुना जा सके। पर यह शायद इसलिए कि मैं बर्बर हूं और समझता नहीं। शहर का कोलाहल मानो कानों को अपमानित करता है। यदि मानव जलकुंड में गिरते झरने की एकांत फुसफुसाहट या रात में तालाब के पास बैठे मेढ़कों की बहस को नहीं सुन सकता तो इस जिंदगी में रखा ही क्या है? मैं लाल मानव हूं और इस बात को समझ नहीं पाता। लाल मानव को अधिक पसंद है, तालाब की झिलमिल सतह से उछलकर चेहरे से टकराती पवन की सोंधी महक, या चीड़ द्वारा सुवासित पवन का मधुर चुंभन।

लाल मानव के लिए हवा बेशकीमती है, क्योंकि वह सभी जीवों की सामान्य धरोहर है - अनेक दिनों से मृत्यु शय्या पर पड़े मानव के समान वह गंध को पहचान नहीं पाता। पर यदि हम इस जमीन को तुम्हें बेचते हैं तो तुम्हें याद रखना होगा कि हवा हमारे लिए अमूल्य है, कि हवा की ही आत्मा सभी जीवधारियों में वितरित है। जिस हवा ने हमारे पितामह को पहली सांस दी उसी में उसकी आखिरी सांस भी निकली।

यदि हम तुम्हें हमारी जमीन बेचते हैं, तो तुम्हें भी उसे अलग और पवित्र रखना होगा, ऐसी जगह के रूप में जहां श्वेत मानव भी जाकर मैदान के फूलों से सुवासित पवन का आस्वादन कर सके।

हम जमीन खरीदने के तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार करेंगे। यदि हम उसे स्वीकार करते हैं तो मैं एक शर्त रखूंगा, कि श्वेत मानव को इस जमीन के सभी पशुओं के साथ अपने भाइयों के समान बर्ताव करना होगा। मैं बर्बर हूं और इससे भिन्न कोई बात समझ नहीं सकता। मैंने अपनी आंखों से हजारों मृत भैसों को सड़ते देखा है जिन्हें मैदान से गुजरती रेलगाड़ी में बैठे श्वेत मानवों ने बंदूकों से मार गिराया था। मैं बर्बर हूं और समझ नहीं पाता कि जिन भैसों को हम केवल जीवित रहने के लिए मारते हैं, उनसे धुंआ उगलता लोह-अश्व अधिक महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है।

पशुओं के अभाव में मनुष्य की क्या हस्ती है? यदि सभी पशु चले जाएं तो मनुष्य की आत्मा एक भयंकर अकेलेपन से पीड़ित होकर मर जाएगी। क्योंकि जो पशुओं के साथ होता है, वही देर-सबेर मनुष्य के साथ भी होता है। सभी चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं। तुम्हें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि उनके पैरों तले की जमीन उनके बाप-दादा की राख है, ताकि वे जमीन का सम्मान करें। उन्हें बताना होगा कि जमीन उसके ही पूर्वजों के जीवन से समृद्ध है। तुम्हारे बच्चों को भी वही बात सिखाओ जो हमने अपने बच्चों को सिखाया है, कि जमीन तुम्हारी मां है।

जो जमीन के साथ घटित होता है, वही उसके पुत्रों के साथ भी होता है। यदि मनुष्य जमीन पर थूकता है तो वह स्वयं अपने ऊपर थूकता है।

यह हम जानते हैं, कि जमीन मानव की संपत्ति नहीं है; मानव जमीन की संपत्ति हैं। सभी चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं, उसी प्रकार जैसे किसी कुटुंब के सदस्य आपस में खून से जुड़े होते हैं। मनुष्य ने जीवन के जाल को नहीं बुना है; वह उसका एक धागा मात्र है। जाल के साथ वह जो कुछ करता है, स्वयं अपने ऊपर करता है।

श्वेत मानव भी, जिसका ईश्वर उसके साथ उसी प्रकार बातें करता है जैसा एक दोस्त दूसरे दोस्त से करता है, इस सामान्य विधान से बच नहीं सकता।

एक चीज हम जानते है - श्वेत मानव भी शायद इस बात को एक दिन जाए - कि उसका और हमारा ईश्वर एक ही है।

आज तुम्हें लग सकता है कि तुम उस ईश्वर को उसी प्रकार प्राप्त कर सकते हो जिस प्रकार इस जमीन को प्राप्त करना चाहते हो; परंतु यह संभव नहीं है। वह मनुष्य मात्र का ईश्वर है, और लाल और श्वेत मानव दोनों का समान रूप से सहचर है। यह पृथ्वी उसको प्रिय है, और इस पृथ्वी को नुकसान पहुंचाना उस सरजनहारा का तिरस्कार करना है। श्वेत मानव भी एक दिन गुजर जाएगा, शायद अन्य कबीलों से कम समय में। अपने ही बिस्तर को गंदा करोगे तो एक रात अपनी ही गंदगी से तुम्हारा दम घुट जाएगा।

परंतु मरते हुए तुम चमक उठोगे, उस ईश्वर-प्राप्त शक्ति से जिसने तुम्हें इस पृथ्वी पर प्रकट किया और किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस जमीन और लाल मानव के ऊपर अधिकार दिया।

यह विधान हमारे लिए पहेली है, क्योंकि हम जान नहीं पाते कि कब सारे भैंस मार दिए जाएंगे, कब सब जंगली घोड़ों पर लगाम लग जाएगा, कब वनों के दुर्गम-से-दुर्गम कोने भी मानव गंध से दूषित हो जाएंगे, और कब पहाड़ों के सुंदर दृश्य बोलते तारों के खंभों से कलंकित हो जाएंगे।

वृक्ष-कुंज कहां है ? कहीं नहीं ।

गरुड़ कहां है? मर-मिट गया।

"यही जीवन का अंत और उत्तरजीविता का आरंभ है।"

(चित्रों के शीर्षक: 1. वर्ष 1865 में लिया गया चीफ सिएटल का फोटो। यह उनका एकमात्र उपलब्ध फोटो है। 2. सिएटल, वाशिंगटन में 1908 में लगाया गया चीफ सिएटल की प्रतिमा। दोनों फोटो विकीपीडिया से।)

3 Comments:

गिरिजेश राव said...

सच मानें, लगा कि एक दूसरे देश के ऋषि की वाणी सुन रहा हूँ.

अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त याद आ गया. मानव की विधेयी चेतना मौलिक रूप में कितनी सार्वकालिक है !
अति सुन्दर

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

जो जमीन के साथ घटित होता है, वही उसके पुत्रों के साथ भी होता है। यदि मनुष्य जमीन पर थूकता है तो वह स्वयं अपने ऊपर थूकता है।
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अप्रतिम। अद्भुत!
कोई धरती से जुड़ा व्यक्ति ही कह सकता है।

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

प्राचीन वैदिक ऋषियों की एक जैसी संवेदनाओं को देखकर रोमाँचित हो गया हूँ। रोमाँज़ के भारतीय समबन्धों का इतिहास जैसे जीवंत हो सम्मुख खड़ा हो गया। संवेदनाओं के निर्झर को यह द्स्यु पणि-वंशज न पहले समझ पाये, न अब। आसुरी संस्कृति के इन ध्वज वाहकों की लोभ वृत्तियों से संस्कार विहीन हो रही भारतीय मनीषा पता नहीं कब स्वरूप दर्शन कर पायेगी? सुंदर इतिवृत्त प्रस्तुति हेतु साधुवाद।

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