Tuesday, May 26, 2009

होम्योपैथी - आपके मर्जों का कोमल इलाज


(डा. सैम्यूल हेहनमान, होम्योपैथी के आविष्कारक)


होम्योपैथी अब विश्वभर में एक ऐसी विश्वसनीय और प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति के रूप में ख्याति अर्जित कर चुकी है जो शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं छोड़ती।

होम्योपैथी की खोज अठारहवीं सदी में डा. सैम्यूल हेहनमैन नामक चिकित्सक ने की। उन्हें विश्वास हो गया था कि ऐलोपैथी फायदा कम करती है और नुकसान अधिक। वे उसके कोई ऐसे विकल्प की खोज में जुट गए जो सुरक्षित, कोमल और असरकारक हो। वे मानते थे कि मानव शरीर में अपने आपको ठीक करने की असीम क्षमता होती है और चिकित्सा के प्रति ऐलोपैथी का रुख गलत है क्योंकि वह रोग के लक्षणों को दबाने की कोशिश करती है। चूंकि ये लक्षण वास्तव में इस बात के सूचक होते हैं कि शरीर रोग से लड़ने की कोशिश कर रहा है, दरअसल इन लक्षणों को उभारने की आवश्यकता है।

हेहनमैन ने अपनी खोज का आधार इस सिद्धांत को बनाया कि लोहा ही लोहे को काट सकता है, यानी जो पदार्थ रोग लाता है, वही रोग का इलाज भी होता है। उन्होंने देखा कि वे अनेक बीमारियों का इलाज रोगी को सूक्ष्म मात्रा में ये बीमारियां लानेवाले पदार्थ खिलाकर कर सकते हैं। अधिक मात्रा में लेने पर ये पदार्थ विष होते हैं, लेकिन बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में रोग का निवारण करते हैं। हेहनमैन पहले ही जान चुके थे कि तंदुरुस्त व्यक्ति को क्विनीन की अत्यल्प मात्रा देने से उसमें मलेरिया के जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। इसके बाद उन्होंने तथा उनके सहयोगियों ने विभिन्न प्रकार के पदार्थों का सूक्ष्म मात्रा में सेवन किया और इन पदार्थों के कारण उनके शरीर में प्रकट होनेवाले लक्षणों का बारीकी से लेखा-जोखा रखा। तत्पश्चात उन्होंने इन पदार्थों का उपयोग वास्तविक मरीजों के इलाज के लिए किया। उन्होंने पाया कि अधिकांश मामलों में मरीजों को राहत मिली।

होम्योपैथी के विकास का अगला पड़ाव था हर औषधि की न्यूनतम असरकारक खुराक की खोज। इस दिशा में काम करते हुए हैहनमैन को अनायास ही होम्योपैथी का मूलभूत सिद्धांत हाथ लग गया कि औषधि की खुराक जितनी अधिक सूक्ष्म रखी जाएगी, वह उतनी ही अधिक असरकारक होगी। इस प्रकार उन्होंने एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति खोज निकाली।

होम्योपैथी मर्ज का नहीं मरीज का इलाज करती है। उसका एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि रोग के लक्षण हर व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इसलिए होम्योपैथी का चिकित्सक मरीज को बिना देखे कभी भी दवा नहीं देगा। चूंकि होम्योपैथी में मरीज का इलाज होता है, न कि मर्ज का, एक ही रोग से पीड़ित व्यक्तियों को अलग-अलग दवा दी जा सकती है। इसी प्रकार अलग-अलग रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को एक ही औषधि से लाभ पहुंच सकता है।

जहां मर्ज उग्र स्वरूप का हो, वहां कभी-कभी होम्योपैथी से तुरंत लाभ मिल जाता है, लेकिन यदि मरीज की जिजीविषा कमजोर हो, तो लाभ मिलने में देर लग सकती है। लंबे समय से चली आ रही बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी धीरज रखना चाहिए क्योंकि होम्योपैथी धीमे-धीमे असर करती है। मरीज को खूब सारा आराम और अच्छा भोजन देना चाहिए और उसे शांत और शुद्ध वातावरण में चिंतामुक्त अवस्था में रखना चाहिए। यदि शरीर का कोई अंग खराब हो गया हो, या भंग हो गया हो, तो शल्य-चिकित्सा जैसी कोई अन्य चिकित्सा पद्धति का सहारा लेना पड़ सकता है। लेकिन इन चिकित्सा पद्धतियों से इलाज कराने के बाद मरीज को होम्योपैथी का कोमल स्पर्श जल्द ही स्वास्थ्य की राह में ले आ सकता है।

होम्योपैथी का सबसे अच्छा प्रभाव बच्चों में देखा जाता है। वह नवजात शिशुओं तक के लिए निरापद है क्योंकि वह बिलकुल ही दुष्प्रभावहीन होती है। चूंकि बच्चों की जीवनीशक्ति बुलंद होती है, उन पर होम्योपैथी का असर भी बहुत जल्द होता है। कुछ लोग कहते हैं कि होम्योपैथी का असर वास्तविक न होकर मात्र मानसिक होता है, पर बच्चों में देखा जाता उसका आश्चर्यजनक प्रभाव इसका खंडन करता है।

होम्योपैथी यह दावा नहीं करती कि उसके पास हर मर्ज का रामबाण इलाज है। दरअसल वह व्यक्ति और उसके स्वास्थ्य के प्रति एक नया दृष्टिकोण भर है। वह मानती है कि व्यक्ति और उसके परिवेश के प्रति सामरस्य लाने से आरोग्य बढ़ता है। होम्योपैथी आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा पद्धतियों को नकारती नहीं है, वह केवल उनके व्यावसायीकरण और दुरुपयोग को चुनौती देती है। बहुत बार होम्योपैथी आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का सहचरी बनकर मरीज को फायदा पहुंचाती है। आज होम्योपैथी समय की परीक्षा में खरी उतर चुकी है। विकसित देशों तक में लोग उसे एक सुरक्षित एवं कारगर चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार चुके हैं।

3 Comments:

ताऊ रामपुरिया said...

होम्योपैथी के बारे मे विस्तार से जानना बहुत अच्छा लगा. आपको बहुत धन्यवाद इस जानकारी के लिये.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

होम्योपैथी धैर्य की परीक्षा भी लेती प्रतीत होती है बहुधा।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मैं ज्ञान जी से सहमत नहीं। होमियोपैथी जैसी त्वरित चिकित्सा नहीं कहीं भी। हाँ रोग पुराना हो तो जाने में समय लेगा। मैं तो 26 बरस से इसी के भरोसे हूँ।

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