Saturday, July 25, 2009

कहानी : मगर के दांत

नदी के किनारे से धारा के भीतर तक निकल आई एक नीची चट्टान के सिरे पर बैठे राजू अपने विचारों में खोया हुआ था। वह एक अलग ही दुनिया में पहुंच गया था जहां उसे चारों ओर की गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं था। वह उन-उन अच्छी चीजों का हिसाब लगा रहा था जो उसे जिंदगी ने दी थीं। हिसाब को आशाजनक रखने के लिए उसने जिंदगी से मिली कष्टदायक चीजों को यत्नपूर्वक भुला दिया। वह जानता था कि यदि वह दुखदायक चीजों की भी गिनती करता तो उनकी सूची हनुमान की पूंछ से भी लंबी हो जाती। यह सही था कि वह एक संपन्न परिवार का सदस्य था, लेकिन इसका उसके सुख-दुख से कोई वास्ता नहीं था। जिंदगी ने उससे एक ऐसा भयानक मजाक किया था कि वह सुख-संतुष्टि का ख्वाब देखने के भी लायक नहीं रहा था। वह एक अपंग था। दुनिया भर के डाक्टरों और उनके पीड़ादायक उपचारों से भी पोलियो से विकृत हुए उसके पैर ठीक न हो सके थे। ये विकृत एवं वीभत्स अंग उसके शरीर से किसी बूढ़े पेड़ की मुड़ी-तुड़ी जड़ों के समान निकले हुए थे। यह नहीं था कि वह अपने नाकाम पैरों से नफरत करता था, लेकिन उसे दूसरे बच्चों के तंदुरुस्त पैरों को देखकर ईर्ष्या जरूर होती थी। वह जानता था कि वह उनके खेल-कूदों में कभी भाग नहीं ले सकता। उसका हृदय एक सामान्य बच्चे की जिंदगी के लिए मचल-मचल उठता था, लेकिन वह जानता था कि यह कभी संभव नहीं हो सकता।

बारह साल की अपनी छोटी सी जिंदगी में उसने कई बार अपनी दयनीय परिस्थिति पर विचार किया था। हर बार उसका मन विषाद और निराशा से ही भर उठा था। अब उसने एक तरह से अपने भाग्य से समझौता कर लिया था। उसने निश्चय कर लिया था कि वह किस्मत की इस मार के सामने चूं तक नहीं बोलेगा और सब कुछ झेल जाएगा। न वह अपने ऊपर तरस खाएगा, न दूसरों के भाग्य से ईर्ष्या करेगा। परंतु उसे एक बात कभी समझ नहीं आती थी। जब कोई उससे हमदर्दी दिखाता या उसकी मदद करने की कोशिश करता तो उसे लगता कि यह सब अनावश्यक ही नहीं, बल्कि उसका अपमान भी है। वह यही सोचता कि कैसे मैं लोगों को समझाऊं कि मुझे उनकी हमदर्दी नहीं, बल्कि प्रोत्साहन चाहिए, और वह भी पर्याप्त मात्रा में, ताकि मैं इस बेबसी से उभर सकूं।

वह दूसरे बच्चों के खेल को कभी नहीं देखता था। वह जानता था कि इससे उसे अपनी विकलांगता का बारबार एहसास होगा। वह अपनी शारीरिक खामी की बात को हमेशा-हमेशा के लिए भुला देना चाहता था। वह जानता था कि दूसरे बच्चों को खुशी-खुशी दौड़ते-कूदते देखकर उसका मन दुख एवं विषाद से भर जाएगा और वह हताश और दुखी हो जाएगा।

उसने मन बहलाने का एक अन्य जरिया खोज लिया था, जो उसकी स्थिति के अधिक अनुकूल था। यह उन खेलों से कहीं अच्छा था जिन्हें वह देख तो सकता था, पर जिनमें वह कभी शरीक नहीं हो सकता था। मन बहलाने का उसका यह तरीका अत्यंत स्वाभाविक और सरल था, यानी नदी के किनारे जाकर प्रकृति के सौंदर्य को देखना और वहां के वातावरण की रम्यता एवं शांति में अपने दुखों को भुलाना। नदी की कल-कल करती धारा, उस में उछलती मछलियां, वहां के अवर्णनीय सौंदर्य से परिपूर्ण प्राकृतिक दृश्य, विभिन्न आकार-प्रकार के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और कीट-पतंग, नदी किनारे लोगों की चहल-पहल और उनके क्रियाकलापों से उठती कर्णमधुर ध्वनियां, ये सभी राजू के मन को मोह लेते थे। नदी की धारा के लगभग मध्य तक निकली हुई एक चट्टान थी। सूरज की गरमी से तप उठी इस चट्टान पर शाम की शीतलता में बैठना काफी आरामदायक रहता था। राजू अक्सर उस पर बैठकर सूरज को डूबते हुए देखा करता था।

राजू को दूर पुल की आकृति दिखाई दे रही थी, जिस पर माचिस के डिब्बे के आकार के वाहन आ-जा रहे थे। बहुत जल्द इतना अंधेरा हो जाएगा कि उसे इन वाहनों की मात्र हिलती रोशनी ही दिखाई देगी। सूरज उसकी चट्टान के साथ 60 डिग्री का कोण बनाए हुए था और तेजी से क्षितिज की ओर गिर रहा था। सूरज के चमकीले चेहरे पर लालिमा छा रही थी, और वह एक विशाल संतरे की तरह लग रहा था। उसकी रक्तिम किरणों की आभा से नदी का जल खून के समान लाल हो उठा था। सूरज राजू को इतना निकट और आत्मीय लगा कि वह सोचने लगा कि क्या वह सचमुच हमसे 15 करोड़ किलोमीटर दूर है जैसा कि किताबों में लिखा है।

पुल पर एक साथ कई रोशनियां चमक उठीं और राजू समझ गया कि बिजली की लाइटें चालू हो गई हैं। शाम का धुंधलका छाने लगा था और लोग अपने-अपने कामों को समेटकर घर की राह लेने लगे थे। नदी किनारे की अनेक झोंपड़ियों से धुआं उठने लगा था और तरह-तरह के व्यंजनों के पकने की महक राजू के नथुनों में पहुंचकर उसकी भूख को बढ़ा रही थीं। राजू जानता था कि कुछ ही समय में नदी पर सन्नाटा छा जाएगा पर वह फिर भी चट्टान पर बैठा रहा। उस प्रिय स्थल को छोड़ने का उसका मन ही नहीं कर रहा था।

राजू अपने खयालों में यों खोया रहा कि जलधारा में उठी एक रहस्यमय हलचल की ओर उसका ध्यान ही नहीं गया। न ही उसने कांच के गोले के समान लगने वाली मगर की आंखों और उसके थूथन के सिरे को देखा, जो पानी के ऊपर दिखाई दे रहे थे और तेजी से उस चट्टान की ओर बढ़ रहे थे जिस पर राजू बैठा था। राजू इस भयानक खतरे को तभी ताड़ सका जब बहुत देर हो चुकी थी। बिना आहट या चेतावनी के उस दैत्याकार प्राणी ने हमला कर दिया। राजू से गज भर की दूरी पर मगर का सिर बिजली की तेजी से पानी के बाहर आया। उसके खुले जबड़ों पर लगे आरी के समान धारवाले पीले दांत चांदनी में हत्यारे के कटार के समान चमक उठे। मगर के जबड़े अभागे राजू के दोनों पैरों पर कचकच की ध्वनि करते हुए बंद हुए। अपनी मांसपेशियों में तीक्ष्ण दांतों के गढ़ने से राजू को असह्य पीड़ा हुई। अनायास ही उसने दोनों हाथों से चट्टान को जकड़ लिया और मगर द्वारा भयंकर बल से उसे पानी में खींचने का विरोध करने लगा। परंतु उस नन्हे बालक में उस विशाल सरीसृप का मुकाबला करने की ताकत कहां से आती? राजू ने देखा कि वह धीरे-धीरे जल की ओर खिंच रहा है। तब कहीं जाकर उसे मदद के लिए पुकारने की सूझी।

"बचाओ, बचाओ, कोई मुझे इस मगर से बचा लो" वह पूरी शक्ति से चीख उठा। मृत्यु का भय उस पर इतना छा गया कि वह लगभग बेहोश ही हो गया।

उधर लोग अपनी झोंपड़ियों के आगे बैठे बतिया रहे थे और भोजन तैयार होने की राह देख रहे थे। राजू की पुकारें रात के सन्नाटे को चीरकर उनकी बस्ती पर गूंज उठी। पल भर के लिए ये पुकारें उन्हें हतप्रभ छोड़ गईं। पर जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि माजरा क्या है। वे तुरंत हाथ में आया हथियार उठाकर मदद के लिए दौड़े। कोई कुल्हाड़ी ले आया, कोई लाठी, कोई चाकू, कोई दरांती। अधिकांश तो निहत्थे ही चल पड़े। जब वे नदी किनारे पहुंचे तो मगर ने राजू को लगभग पूरा-पूरा पानी के नीचे खींच लिया था।

केवल उसका सिर और चट्टान को पकड़े हुए हाथ पानी के बाहर थे। उन लोगों में से कुछ ने राजू को पकड़कर पानी से ऊपर खींचने की चेष्टा की। बाकी नदी में कूदकर मगर से युद्ध करने लगे। इस सामूहिक प्रयास से मगर घबरा उठा। राजू पर अपनी पकड़ छोड़कर वह चुपके से पानी में विलीन हो गया।

राजू के दोनों पैर मगर के दांतों से बुरी तरह घायल हो गए थे। पर वह जीवित था। उसे बचानेवाले लोगों ने उसे उठाकर उसके घर पहुंचाया। तुरंत डाक्टर बुलाया गया पर राजू के पैरों की हालत देखकर उसने चिंता से सिर हिला दिया। राजू के पोलियो-पीड़ित कमजोर पैरों को हड्डी तक गहरी चोट आई थी। कई जगह मगर के दांतों ने हड्डी को कोर तक भेद दिया था।

डाक्टर ने मलहम लगाकर पट्टी बांध दी और दर्द निवारक दवा खाने को दे दी। घाव को सेप्टिक होने से बचाने एक इंजेक्शन भी लगा दिया। महीने भर के लिए पैरों को आराम देने की सलाह देकर डाक्टर चला गया।

घाव को भरने में बहुत समय लगा। यह समय राजू के लिए एक दुःस्वप्न के समान गुजरा। पैरों के दर्द से वह बारबार कराह उठता। उसे तेज बुखार भी हो गया था। पर यह कुछ दिनों में उतर गया। घावों को भरने में डाक्टर के अंदाजे से भी अधिक समय लगा। पूरे तीन महीने बाद ही डाक्टर ने पट्टी खोलना उचित समझा। राजू को लकड़ी के एक बेंच पर लिटाया गया और डाक्टर कैंची से पट्टियों को काटने लगा। पट्टियों के खुलने की बात सोचकर राजू उदास हो गया।

पट्टियों के कारण उसके कुरूप और निस्सहाय पैर उसकी दृष्टि से ओझल रहे थे और वह प्रसन्न था। अब उसे उन्हें फिर देखते रहना पड़ेगा। नदी किनारे की दुर्घटना के बाद वह इन पैरों से घृणा करने लगा था। यदि वे ठीक होते तो क्या वह इस प्रकार मगर की चपेट में आता? वह जरूर अपनी रक्षा कर लेता। ये टांगें न तो उसे चलने-फिरने देती थीं, न सम्मान की जिंदगी जीने। क्या ही अच्छा होता यदि डाक्टर उन्हें काट ही डालता, राजू ने सोचा।

उसकी इन निराशापूर्ण विचारों की शृंखला डाक्टर के उद्गारों को सुनकर टूटी। डाक्टर कह रहा था, "अरे! यह कैसा चमत्कार मैं देख रहा हूं! राजू तुम बिलकुल ठीक हो गए हो। अब तुम अपंग नहीं रहे।" उसकी वाणी आश्चर्य एवं अविश्वास झलका रही थी।

राजू ने डाक्टर को घूरकर देखा। जरूर वह उस पर हमदर्दी दिखा रहा था। परंतु उसने नजरें झुकाकर अपनी टांगों को देख ही लिया। क्या उसकी आंखें उसे धोखा दे रही थीं? वहां उसके मुड़े-तुड़े पोलियो-ग्रस्त पैर नहीं बल्कि एकदम स्वस्थ-दुरुस्त अंग थे। राजू ने पागलों की तरह एक-साथ रोते और हंसते हुए अपनी इन नई पिंडलियों को बार-बार छूकर देखा।

सबसे अधिक अचंभित तो स्वयं डाक्टर ही था। तीस साल के उसके अनुभव में इस तरह का एक भी किस्सा नहीं हुआ था। थोड़ा विचारने पर उसे विदित हुआ कि इसमें कुछ भी अप्राकृतिक नहीं था। मगर के दांतों के घाव ने राजू के पैरों की हड्डियों की मृतप्राय कोशिकाओं को उत्तेजित किया था और वे पुनः बढ़ने लगे थे। यह शरीर की अद्भुत पुनर्वर्धन क्षमता का ही चमत्कार था।

राजू के लिए यह वह तोहफा था जो उसे सपनों में भी नहीं मिला था। उसे लगा कि उसे नई टांगें नहीं, पूरी नई जिंदगी मिली है।

2 Comments:

PC Godiyal said...

काश ! ऐसा चमत्कार सचमुच में हो पाता !

Science Bloggers Association said...

रोचक एवं प्रेरक।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

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