Saturday, July 11, 2009

साहित्य का मूल्य

क्यों इस पचड़े में पड़ें कि साहित्य क्या है? और ब्लोग क्या है.. क्या साहित्य की कोई परिभाषा हो सकती है या क्या इसे परिभाषा में बांधा जा सकता है... कतई नहीं जो आपके लिए साहित्य है वह मेरे लिए कुड़ा हो सकता है और जो आपके लिए कुड़ा हो वह मेरे लिए साहित्य.. किसी को साहित्य कहने न कहने का कोई सर्वमान्य आधार नहीं.. क्यों हम छड़ी लेकर नापते हैं और किसी को तय खानों में फिट करने की कोशिश करते हैं.. जो है वो है.. जो जैसा है उसे वैसा रहने दें..

रंजन

रंजन जी की उपर्युक्त टिप्पणी से जो विचार आए, उन्हें नीचे दे रहा हूं।

साहित्य किसी जाति की स्मृति, आकांक्षा और अभिरुचि का आधान है। यहां मैं जाति शब्द को नेशनैलिटी के अर्थ में प्रयुक्त कर रहा हूं। उस जाति की उन्नति होती है जिसका साहित्य स्पष्ट हो, लोकतांत्रिक हो और समावेशी हो। साहित्य में क्रांतिकारी ताकत होती है। वह लोकतंत्र और न्याय का पोषण कर सकता है। वह मानव जाति को ऊंचाइयों की ओर ले जा सकता है।

साहित्य क्या है यह अधिकांश लोगों को मोटे तौर पर पता होगा, उसमें कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध आदि शामिल हैं। इन सबमें क्या लिखा गया है, किस नजरिए से लिखा गया है और क्यों लिखा गया है, यह साहित्य का अहम हिस्सा है।

साहित्य की इस मौलिक एवं असीम ताकत को समझकर समाज के सुधारवादी, यथास्थितिवादी और शोषक उसे अपने पक्ष में परिवर्तित करने की कोशिश करते रहते हैं। हमारे यहां के अधिकांश पुराने साहित्यिक कृतियों में सुधारवादियों ने कुछ-कुछ अंश जोड़कर इन कृतियों की मूल प्रवृत्ति को अपनी विचारधारा के अनुकूल बनाने की कोशिश की है। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, आदि अनेक रचनाएं इस तरह विरूपित हुई हैं। यहां तक कहा जाता है कि महाभारत में गीता भी बाद में जोड़ी गई है और खास मकसद से। इस पर और कभी चर्चा करेंगे। इस प्रवृत्ति से सतर्क होने की बहुत जरूरत है, अन्यथा साहित्य दूषित हो सकता है, और किसी वर्ग विशेष का होकर रह सकता है, और उसका क्रांतिकारित्व नष्ट हो सकता है। हमारे कई साहित्यिक कृतियों के साथ ऐसा हुआ है।

फिर भी काफी कुछ साहित्य अब भी बचा हुआ है जो दूषण-मुक्त है और हमारे लिए बेशकीमती है।

साहित्य को दूषित करने की प्रवृत्ति हर समाज में पाई जाती है और उसे बड़े ही सूक्ष्म और संगठित तरीके से किया जाता है। कई बार तो स्वयं साहित्यकार को पता नहीं होता है कि जो वह लिख रहा है, वह किसी वर्ग विशेष का हित साधक है, और संपूर्ण समाज का नहीं। मैंने अपने पहले लेख क्या ब्लोग साहित्य है? में इसके उदाहरण स्वरूप रुड्यार्ड किपलिंग और राहुल सांकृत्यायन का नाम लिया था।

कई बार जन-हितकारी साहित्य को जानबूझकर हानिकारक, पुराना या अप्रासंगिक बता दिया जाता है, ताकि लोग उनके क्रांतिकारी स्वरूप को न पहचान सकें, यथा रामचरितमानस। इसका उल्टा भी देखने में आता है, किसी वर्ग विशेष के साहित्य को सर्वहितकारी करार दिया जा सकता है। अंग्रेजों के जमाने में लोड मकोले ने एक बार कहा था अलमारी भर यूरोपीय साहित्य शताब्दियों के समूचे पूर्वी साहित्य से श्रेष्ठ है!

इसलिए हर समाज को अपने साहित्य की रक्षा करनी होती है। उसके उन अंशों को पहचानना होता है जो सर्वहितकारी हो, क्रांतिकारी हो, और उन अंशों को त्यागना होता है, जो अनिष्टकारी हो, प्रोपेगैंडा हो। इसे स्पष्ट करने के लिए हम भारतेंदु युग पर विचार कर सकते हैं। भारतेंदु युग से पहले हिंदी साहित्य पर रीतिकालीन (शृंगारिक) रचनाएं हावी हो गई थीं। पर एक परतंत्र राष्ट्र के लिए जो गुलामी से लड़ रहा हो और जिसके लोग घोर गरीबी में जी रहे हों, ये विलासिता के काव्य अप्रासंगिक ही नहीं, क्रूरता और मजाक के भी परिचायक थे। इसलिए उसे बदलने की आवश्यकता थी। इसे भारतेंदु तथा उनके सहयगियों ने किया। उन्होंने साहित्य के कथ्य को ही नहीं भाषा को भी बदल दिया। रीति काव्य ब्रज भाषा में लिखे जाते थे, उन्होंने नए साहित्य के लिए खड़ी बोली को चुना।

लोकतंत्र को पुष्पित-पल्लवित करने में साहित्य की एक अहम भूमिका होती है। वह संसद, न्याय-तंत्र, नौकरशाही, अखबार आदि के समान समाज का एक शक्ति-केंद्र है। उसकी खासियत यह है कि उसे किसी वर्ग विशेष के समर्थन के लिए भ्रष्ट करना उतना आसान नहीं होता है। सांसदों को खरीदा जा सकता है, न्याय को मखौल बनाया जा सकता है या अमीरों के हाथों का खिलौना, नौकरशाही तंत्र को व्यवसाय की चेरी बनाया जा सकता है, अखबारों को स्वयं व्यवसाय में बदला जा सकता है, पर इसी तरह साहित्य को खोखला करना आसान नहीं होता। कारण यह है कि साहित्य अन्य सभी तंत्रों की तुलना में अधिक दीर्घजीवी है। उसमें मिलावट करना कठिन ही नहीं होता, किया गया मिलावट तुरंत पकड़ में भी आ जाता है। साहित्य जनता का स्पष्ट पक्षधर होता है। वह उस पक्ष में खड़ा होता है जहां अधिकतम या सभी का हित सधता हो।

इसलिए साहित्य बेशकीमती है। उसे प्रोपगेंडा से बचाए रखना बहुत जरूरी है। साहित्यकारों की भी बड़ी जिम्मेदारी है कि वे साहित्य की पावनता में दाग न लगने दें और सभी मनुष्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए साहित्य रचें।

ब्लोग में लोग जो चाहे लिखते हैं, पर वह सब साहित्य नहीं बन सकता। लोग साहित्य बनाने के इरादे से ब्लोग लिखते भी नहीं हैं। पर ब्लोग एक लचीला माध्यम है, उसमें साहित्य भी लिखा जा सकता है। यह ब्लोगर के ऊपर है कि वह साहित्य लिखना चाहता है या साधारण चीज।

और समालोचक का काम यह है कि वह ब्लोगों में लिखे गए हजारों लेखों में से उन मोतियों को चुनकर प्रकाश में लाए जो श्रेष्ठ हो। जहां तक मैं जानता हूं, कोई भी समालोचक या ब्लोगर यह काम नहीं कर रहा है। पर आगे चलकर इसकी भी आवश्यकता होगी। समालोचक के काम को आसान बनाने के लिए ब्लोग विधा के कुछ सामान्य लक्षणों को पहचाना जाना चाहिए और उस पर सहमति लानी चाहिए। कहानी, एकांकी, संस्मरण आदि के समान ब्लोग पोस्ट भी लेखन की एक विधा है। इस पर काफी विचार हुआ है कि कहानी मतलब क्या, या उपन्यास मतलब क्या या संस्मरण मतलब क्या। लेकिन इस पर न के बराबर विचार हुआ है कि एक ब्लोग पोस्ट मने क्या। यदि समालोचक अच्छे ब्लोग पोस्टों का अध्ययन करके यह बता सकें कि वे क्या चीजें हैं जो किसी ब्लोग पोस्ट को अच्छा बनाती हैं, तो ब्लोग लेखकों को ही नहीं, पाठकों को भी सुविधा होगी, हजारों पोस्टों में से उन उपयोगी पोस्टों को छांटने में जो स्थायी महत्व के हैं।

इसी तरह अखबारों और पुस्तक प्रकाशकों का भी ब्लोगों के स्थायी महत्व के अंशों को पहचानने और उन्हें प्रचारित करने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। हमारे देश में साधनों के असमान वितरण के कारण सर्वसाधारण तक ब्लोगों की पहुंच नहीं है। वे केवल उन लोगों तक पहुंचते हैं जिनके पास घर है, घर में बिजली है और इंटरनेट तक पहुंच है, और कंप्यूटर है। इन सब आवश्यकताओं को पूरा करने वाले पूरी आबादी का 1 -2 प्रतिशत ही होंगे। ऐसे में ब्लोगों में रची जा रही श्रेष्ठ सामग्री को जन-जन तक पहुंचाने के लिए ब्लोगों को अन्य माध्यमों के साथ नाथना होगा, विशेषकर अखबारों के साथ और पुस्तकों के साथ।

अखबार पहले ही यह काम कर रहे हैं। अधिकांश हिंदी अखबार अब ब्लोगों की भी चर्चा करते हैं। पर इसे अधिक व्यवस्थित तरीके से और सूझबूझ के साथ करने की आवश्यकता है। अभी तो बस खानापूरी ही हो रहा है। ब्लोगों के जो पोस्ट अखबारी लेखनों के निकट के हैं, उन्हें ही अखबारों में स्थान मिल रहा है। जो लंबे पोस्ट हैं या जो अधिक जटिल पोस्ट हैं उन्हें अखबार नजरंदाज कर रहे हैं। उन्हें अलग रीति से अखबारों में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, पर अखबार अभी इतनी मेहनत नहीं कर रहे हैं।

इसी तरह पुस्तक प्रकाशकों को भी ब्लोगों की ओर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। ब्लोगों में स्थायी महत्व की जो चीजें लिखी गई हैं, उन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशित करने के लिए सामने आना चाहिए।

मैं एक उदाहरण दूंगा। जब मुंबई नरसंहार हुआ था, तो ब्लोग जगत में इस विषय पर लिखे गए पोस्टों की बाढ़ सी आई थी। लगभग सभी ब्लोगरों ने एक दो पोस्ट इस विषय पर लिखा। इनमें से कई बड़े ही मार्मिक, सुंदर और स्थायी महत्व के हैं। ब्लोगों के जरिए वे बहुत कम लोगों तक पहुंचे। यदि कोई प्रकाशक इन पोस्टों को संकलित करता और पुस्तक रूप में प्रकाशित करता, तो वह पुस्तक मुंबई नरसंहार का एक संग्रहणीय ऐतिहासिक अभिलेख बन जाता। पर जहां तक मैं जानता हूं, किसी भी हिंदी प्रकाशक ने इस ओर कोई कदम नहीं उठाया।

इसी तरह ब्लोग जगत में महिला उन्नति पर बहुत ही अच्छे पोस्ट आ रहे हैं, उनका भी एक संकलन बन सकता है। पर प्रकाशक इस ओर उदासीन हैं।

आशा की जानी चाहिए कि आनेवाले दिनों में इन दोनों दिशाओं में सुधार देखने को मिलेगा।

इस तरह के प्रयासों से ब्लोगों में जो स्थायी महत्व की चीजें आ रही हैं, उन्हें पहचाना जा सकेगा और ये ही आगे चलकर साहित्य भी बनेंगे।

5 Comments:

yuva said...

Pratikriya par pratikriya dene ke bahaane sahitya aur blog ke sambandh men achchha vishleshan hai. Main bhee is baat se sahmathun ki abhee bahut kuch karna baaki hai

Nirmla Kapila said...

बहुत ही सार्थक और सही आलेख है आभार्

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

पर ब्लोग एक लचीला माध्यम है, उसमें साहित्य भी लिखा जा सकता है। यह ब्लोगर के ऊपर है कि वह साहित्य लिखना चाहता है या साधारण चीज।
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क्या बतायें क्या लिखना चाहते हैं। लिखना चाहते हैं अण्ट और लिख जाते हैं शण्ट!

सतीश पंचम said...

बहुत उम्दा और चिंतनपरक पोस्ट। अच्छा लिखा।

रंजन said...

बहुत आभार आपने मेरे चंद शब्दों को सोच प्रक्रिया का हिस्सा बनाया.. बस एक बात और रखना चाहुँगा.. साहित्य को केवल छपी हूई पुस्तक ही नहीं मानना चाहिये.. साहित्य इ पुस्तक, कोई बेव साईट या ब्लोग भी हो सकती है.. अभी भले ही वेब युजर्स की संख्या कम हो पर भविष्य में बहुत बढेगी और तब ये रुप ही ज्यादा उपयोगी होगा..

पुःन आभार..

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