Monday, July 13, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : दर्शन और धर्म का घालमेल

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा


डा. शर्मा ने राहुल जी के विचारों के विवेचन के लिए उनके जिन ग्रंथों को चुना है, वे ये हैं –

  1. अकबर
  2. ऋग्वेदिक आर्य
  3. जय यौधेय
  4. दर्शन दिग्दर्शन
  5. दिमागी गुलामी
  6. दिवोदास
  7. मानव समाज
  8. विविध प्रसंग
  9. वैज्ञानिक भौतिकवाद
  10. वोल्गा से गंगा
  11. संस्कृत काव्यधारा
  12. साम्यवाद क्यों?
  13. सिंह सेनापति

इस लेख माला को ठीक से समझने के लिए आपको पहले इन किताबों को पढ़ लेना चाहिए।

राहुल जी की सबसे महत्वपूर्ण दर्शन ग्रंथ दर्शन-दिग्दर्शन है। डां. शर्मा ने उसका बारीकी से अध्ययन करके उनमें विद्यमान अंतर्विरोधों को उजागर किया है। वे कहते हैं कि इस ग्रंथ में राहुल जी ने बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश की है, और इसके लिए उन्होंने भारत की बौद्धेतर दार्शनिक परंपराओं का मूल्य कम आंका है। इतना ही नहीं राहुल जी पर पाश्चात्य विद्वानों का अत्यधिक प्रभाव है और उन्होंने इन विद्वानों की अनेक भ्रांत और द्वेषपूर्ण धारणाओं को बिना विचारे अपना ही नहीं लिया है, अपनी उर्वर कल्पनाशीलता से काम लेते हुए उन्हें और पुष्ट भी किया है, विशेषकर अपने उपन्यासों और कहानियों में।

अपनी पुस्तक दर्शन-दिग्दर्शन में राहुल जी भारतीय दर्शन परंपरा की चर्चा केवल आठवीं-नौवीं सदी तक ही करते हैं पर पाश्चात्य दर्शन परंपरा को प्लेटो के समय से लेकर ठेठ आधुनिक समय तक खींच लाते हैं। इससे भारतीय दर्शन शास्त्र अपनी पूरी भव्यता के साथ इस किताब में नजर नहीं आता। इतना ही नहीं भारत में दर्शन हमेशा से धर्म-निरपेक्ष रहा है, पर राहुल जी धर्म और दर्शन का घाल मेल कर देते हैं, और भारतीय दर्शन परंपरा को हिंदू परंपरा, बौद्ध परंपरा, जैन परंपरा, मुसलमान परंपरा आदि में बांटकर उसके वैभव को नष्ट कर देते हैं। पर यही नीति वे पाश्चात्य दर्शन के संबंध में नहीं करते, जिनके कई प्रवर्तक खुलेआम धर्माचार्य भी थे। इससे पाश्चात्य दर्शन उनकी किताब में धर्म-निरपेक्ष के रूप में दिखाई देता है, जब भारतीय दर्शन धर्म से बंधा हुआ। यह भी राहुल जी पर पाश्चात्य चिंतन के अत्यधिक प्रभाव का एक उदाहरण है।

दर्शन दिग्दर्शन की भूमिका के आरंभ में राहुल जी ने राधाकृष्णन का यह वाक्य उद्धृत किया है –
“प्राचीन भारत में दर्शन किसी भी दूसरी साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न हो, सदा एक संवतंत्र स्थान रखता रहा है।”


इस पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं -
“भारतीय साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न रहा हो किंतु धर्म का लग्गू-भग्गू तो वह सदा से चला आता है और धर्म की गुलामी से बदतर गुलामी और क्या हो सकती है?”


इस पर डा. शर्मा अपनी पुस्तक इतिहास दर्शन में यह टिप्पणी करते हैं –

पाश्चात्य लेखक अक्सर भारत में दर्शन का अस्तित्व अस्वीकार करते हैं। उनका तर्क होता है भारत में धर्म तो है लेकिन विवेकसम्मत दर्शन नहीं है। राहुल जी ने उन्हीं की बात अपने शब्दों में दुहराई है। यदि भारतीय दर्शन धर्म का पिछलग्गू बना रहा तो इसमें बौद्ध दर्शन भी शामिल होगा। यदि धर्म की गुलामी से बतदर और कोई गुलामी नहीं है, तो इस गुलामी के शिकार स्वयं राहुल सांकृत्यायन भी थे। इसलिए कि वे बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन में सदा फर्क नहीं करते। बोद्ध दर्शन ही नहीं, बौद्ध धर्म के प्रति उनका आग्रह कभी-कभी विवेक की सीमा पार कर जाता है। राहुल जी में अनेक अंतर्विरोध हैं। इन अंतर्विरोधों को ध्यान में रखते हुए उनका मूल्यांकन करना चाहिए।


इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.


(...जारी)

3 Comments:

yuva said...

Badhiya jaankaari hai

Udan Tashtari said...

अच्छी जानकारी!

श्यामल सुमन said...

इनमें से कुछ किताबों को पढ़ने का अवसर मिला है। अच्छी जानकारी दी है आपने।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

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