Wednesday, July 15, 2009

राहुल सांकृत्यायन चर्चा : सहमति

इस लेख माला का संदर्भ जानने के लिए पहले का यह लेख देखें - राहुल सांकृत्यायन और डा. रामविलास शर्मा

पहले सोचा था कि डा. रामविलास शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना करते हुए राहुल जी की निराधार धारणाओं के उदाहरणों का जो ढेर लगाया है, उसका विस्तार से चर्चा करूं, पर अब सोचता हूं कि इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। आपको ही इतिहास दर्शन में इन्हें पढ़ लेना होगा। मेरा उद्देश्य डा. रामविलास शर्मा की इस महत्वपूर्ण पुस्तक की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना भर है।

प्रसंगवश कह दूं कि इस पुस्तक में ऋग्वेद चर्चा (प्रथम अध्याय) और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं की समालोचना (अंतिम अध्याय) के अलावा यूनानी दार्शनिक परंपरा के अंतर्विरोधों का भी सांगोपांग विवेचन हुआ है और डा. शर्मा ने प्लैटो, अरस्तू, सुकरात, देमोस्थेनेस आदि के दर्शनों पर भी इसी तरह आलोचनात्मक दृष्टि डाली है। इसके साथ-साथ सिकंदर का भारत से पलायन, यूनान और यूरोप के दार्शनिक संबंध, भारत-यूनान-यूरोप के संबंध आदि पर भी नई दृष्टि से विचार किया है।

अंत में मैं इतिहास दर्शन के राहुल संबंधी अध्याय के "उपसंहार" से कुछ अंश यहां उद्धृत करता हूं, जिसमें डा. शर्मा ने राहुल सांकृत्यायन की उपयोगी धारणाओं को रेखांकित किया है। उन्हीं के शब्दों में –

उनके (यानी राहुल जी के) लेखन में पूर्वाग्रहों और निराधार कल्पनाओं की ऐसी भरमार है कि उनमें उनकी थोड़ी-सी सही धारणाएं भी खो जाती हैं। पर वे महत्वपूर्ण हैं और उनमें से कुछ को मैं यहां दुहरा रहा हूं।

“वैदिक ऋषि यथार्थवादी थे। वे दुनिया को जैसा देखते थे, वैसा मानते थे और उसमें अधिक से अधिक आनंद उठाना चाहते थे।” – मानव समाज

“उपनिषदकार स्वयं, यज्ञों के व्यर्थ के लंबे-चौड़े विधि-विधान के विरुद्ध एक नई धारा निकालने वाले थे।” – दर्शन दिग्दर्शन

“पुनर्जन्म के दार्शनिक पहलू को और मजबूत करते हुए बुद्ध ने पुनर्जन्म का पुनर्जन्म प्रतिसंधि के रूप में किया... बुद्ध ने कर्म के सिद्धांत को और मजबूत किया” – वहीं

“प्रतीत्य समुत्पाद कार्यकारण को अविच्छिन्न नहीं विच्छिन्न प्रवाह मानता है। प्रतीत्य समुत्पाद के इसी विच्छिन्न प्रवाह को लेकर आगे नागार्जुन ने अपने शून्यवाद को विकसित किया।” - वहीं

“नागार्जुन का दर्शन – शून्यवाद – वास्तविकता का अपलाप करता है। दुनिया को शून्य मानकर उसकी समस्याओं के अस्तित्व से इन्कार करने के लिए इससे बढ़कर दर्शन नहीं मिलेगा।” – वहीं

“वादरायण ने कहीं भी जगत को माया या काल्पनिक नहीं माना है और न उनके दर्शन से इसकी गंध भी मिलती है कि ‘ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है’।” – वहीं

“शंकर के ब्रह्म अद्वैतवाद और सूफियों के अद्वैतवाद में कोई अंतर नहीं है।” – वहीं

“छोटे-छोटे सामंत राज्यों को विशाल राज्यों में परिवर्तित करने में बनियों का हाथ भी रहा है। हम छठी-सातवीं ई.पू., में मगध (दक्षिण बिहार) के सौदागरों को रावलपिंडी, भड़ौच, तक्षशिला, ताम्रलिप्ति अपना सार्थ लेकर क्रय-विक्रय करते देखते हैं।” – मानव समाज

“व्यापारवाद का जोर भारत तथा दूसरे एशियाई देशों में बहुत पहले से चला आता था। जावा, चीन, अरब और अफ्रीका (मिस्र) के साथ सीधा व्यापार-संबंध भारतीय व्यापारियों ने उस वक्त स्थापित किया था, जब कि अभी अरबों और आज की यूरोपीय जातियों का नाम तक सुना नहीं जाता था।” – वहीं

“सारे संघ की राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त हिंदी का अपना विशाल क्षेत्र है। हरियाणा, राजपूताना, मेवाड़, मालवा, मध्य प्रदेश, युक्त प्रांत और बिहार हिंदी की अपनी भूमि है। यही वह भूमि है जिसने हिंदी के आदिम कवियों सरह, स्वयंभू आदि को जन्म दिया। यही भूमि है, जहां अश्वघोष, कालिदास, भवभूति और बाण पैदा हुए। यही वह भूमि है जहां कुरु (मेरठ-अंबाला) और पांचाल (आगरा, रुहेलखंड) की भूमि में वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज ने ऋग्वेद के मंत्र रचे, और प्रवाहण, उद्दालक और याज्ञवल्क्य ने अपनी दार्शनिक उड़ानें कीं।” – हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयास का अध्यक्षीय भाषण

इन स्थापनाओं से भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने में सहायता ली जा सकती है।


डा. शर्मा ने अपने अनेक पुस्तकों में इतनी सारी उपयोगी विचार दिए हैं कि यदि उन्हें ईमानदारी से कार्यान्वित किया गया होता तो आज की बहुत सी समस्याओं का निराकरण हो जाता। इनमें शामिल हैं, सांप्रदायिकता, जातियतावाद, अंग्रेजी का प्रभुत्व, देश का विदेशी पूंजी के अधीन हो जाना, हिंदी-उर्दू का विवाद, भारत का विखंडन और उससे जुड़ी विकट राजनीतिक मसले (जैसे आजकल का आतंकवाद), इत्यादि।

उनकी अपनी पीढ़ी से तो यह न किया जा सका, अब आशाएं युवा पीढ़ी से है कि वह उनकी पुस्तकों का वाचन करके उनके विचारों को आत्मसात करेगी और उन्हें क्रियान्वित करेगी।
इतिहास दर्शन, डा. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, www.vaniprakashan.com ने प्रकाशित की है। मूल्य है रु. 495 और प्रकाशन वर्ष है 2007.

4 Comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

शीघ्र ही यह पुस्तक पढ़नी पड़ेगी। क्यों कि यह कुछ हद तक मेरी अपनी मान्यताओं से भिन्न है। हो सकता है। उन्हें पढ़ने के उपरांत मैं अपनी कुछ धारणाओं को यदि वे गलत हैं तो सही कर सकूँ।

Arvind Mishra said...

राहुल और राम विलास जी दोनों धुर विद्वान् रहे -मगर क्या राहुल के विचारों का खंडन खुद एक पूर्वाग्रह की परिणति नहीं हो सकती ?

बालसुब्रमण्यम said...

द्विवेदी जी : आपको यह पुस्तक जरूर अच्छी लगेगी। इसे पढ़कर आपमें डा. शर्मा की अन्य पुस्तकें भी पढ़ने की इच्छा जागेगी। एक किताब मैं सुझाना चाहूंगा, वह है, गांधी, अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं, जिसमें डा. शर्मा ने इन तीनों महापुरुषों का मूल्यांकन किया है। यह शायद डा. शर्मा की अंतिम पुस्तक है।

अरविंद जी : इस प्रश्न का जवाब आपको स्वयं ही इतिहास दर्शन पढ़ने के बाद देना होगा।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

डॉ. रामविलास शर्मा अगर थोडे दिन और इस दुनिया में रह गए होते और थोड़ा घूम भी लिए होते तो राहुल जी के बारे में उनके बचे-खुचे पूर्वाग्रह भी ख़त्म हो गए होते. रामविलास जी की दिक्कत यही थी कि बेचारे रोजी-रोटी के लिए मास्टरी करने लगे, जो बहुत समझदार लोगों की भी बुद्धि खा लेती है.

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