Monday, August 17, 2009

जुए बीनना और बतियाना

मानव निरीक्षण - 5

क्या आप बता सकते हैं, बंदरों की सबसे प्रिय आदत क्या है? वह है एक दूसरे के शरीर से जुए बीनना। जुए बीनने की यह आदत उनकी सामाजिक व्यवस्था में काफी महत्व रखती है। मनुष्यों में भी जुए बीनने की बंदरों की आदत का समतुल्य व्यवहार होता है? वह है, बतियाना, जी हां, बातचीत करना। आगे पढ़िए, सब स्पष्ट हो जाएगा।

टोलियों में रहनेवाले सदस्यों में एक वरीयता क्रम (पेकिंग आर्डर) होता है, जो यह तय करता है कि मैथुन, भोजन, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर पहला अधिकार किसका हो। यह वरीयता क्रम टोली के सदस्यों में इन सब सुविधाओं के लिए नित्य के झगड़ों से बचने के लिए बहुत आवश्यक है। टोलियों के सदस्य शुरुआत में हल्के-फुल्के शक्ति परीक्षण से इस क्रम को निश्चित कर लेते हैं, और उसके बाद टोली में अपेक्षाकृत शांति बनी रहती है। लड़ाई की नौबत तभी आती है जब इस क्रम का कोई उल्लंघन करे। ऐसा होने पर जिस सदस्य की हैसियत को चुनौती मिली हो, वह या तो अपनी हैसियत की लाज रखने के लिए नियम भंग करनेवाले से भिड़ जाता है, या उसके लिए अपना स्थान सदा के लिए छोड़ देता है।

वरीयता क्रम निश्चित हो जाने के बाद भी सदस्यों में परस्पर सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुत से छोटे-मोटे व्यवहार होते रहते हैं। इनमें से एक प्रमुख व्यवहार एक-दूसरों के शरीर से जुए बीनना है। हमें लग सकता है कि यह बिना किसी निहितार्थ के किया जाता होगा, पर जिन वैज्ञानिकों ने इन बातों का अध्ययन किया है, वे बताते हैं कि जुए बीनने जैसे सामान्य व्यवहार के पीछे भी काफी राजनीति होती है।

आमतौर पर जुए बीनना अपने से अधिक सत्तावान सदस्य के प्रति समर्पण भाव दिखाने का एक तरीका होता है। सामान्यतः कम शक्तिमान सदस्य ही अपने से अधिक शक्तिमान सदस्य के शरीर से जुए बीनता है। ऐसा करके वह यही दर्शाता है कि मैं तुम्हारी वरीयता स्वीकार करता हूं और इसके सबूत के रूप में मैं तुम्हें कष्ट पहुंचा रहे इन कीड़ों से छुटकारा दिलाऊंगा। और अधिक सत्तावान सदस्य अपने से कम सत्तावान सदस्य द्वारा अपने शरीर के जुए बिनवाकर उसे यही आश्वासन देता है कि मैं तुम्हारे समर्पण को स्वीकार करता हूं और तुम्हें अपने संरक्षण में लेता हूं और तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा। इससे दोनों को मनोवैज्ञानिक सकून मिलता है। सत्तावान सदस्य उस दूसरे सदस्य के प्रति निश्चिंत हो जाता है कि यह मेरे विरुद्ध उत्पात नहीं करेगा, और कम सत्तावान सदस्य को यह आश्वासन मिलता है कि मुझसे अधिक शक्तिशाली यह सदस्य अब मेरा उत्पीड़न नहीं करेगा।

मित्रों में, अर्थात लगभग समान सामाजिक हैसियत वाले सदस्यों में, जुए बीनने की क्रिया उनके परस्पर संबंधों को और प्रगाढ़ बनाती है।

इसलिए बंदरों में जुए बीनने की क्रिया समूह के अंदर के सबंधों को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अब आते हैं मनुष्यों के विषय पर। मनुष्य भी वानर कुल का ही सदस्य है, और वह भी समूहों में रहनेवाला प्राणी है। उसमें भी जुए बीनने की क्रिया से मिलता-जुलता व्यवहार है, जो है बतियाना।

मनुष्यों में समस्या यह है कि उसके शरीर में बाल नहीं हैं, इसलिए उसे जुए, पिस्सू आदि जीव कम परेशान करते हैं। इसलिए जुए बीनने की क्रिया उसके संबंध में अर्थहीन है। पर हम सब जानते हैं कि हमारे समुदाय में भी एक सुस्पष्ट वरीयता क्रम देखी जाती है। चाहे आप परिवार को लें, या किसी दफ्तर के सदस्यों को, हमें वहां सब एक वरीयता क्रम दिखाई देगा। सबसे ज्यादा अधिकार परिवार के वरिष्ठ पुरुष सदस्य का, फिर उसकी पत्नी का, उसके बाद उनके सबसे वरिष्ठ पुत्र का, सबसे नीचे बच्चों और नौकर-चाकरों का। बच्चों में भी वरीयकता क्रम होता है, चाहे वह घर के बच्चे हों या मोहल्ले या स्कूल के बच्चे। नौकरों में भी यही बात है। दफ्तर में सबसे अधिक रसूख वाला व्यक्ति सीईओ होता है, उसके नीचे वरिष्ठ प्रबंधक, फिर कनिष्ठ प्रबंधक, फिर उनके सचिव आदि और सबसे कम रसूख वाला कर्मचारी चपरासी होता है जिस पर सब रौब जमाते हैं। सेना में तो यह बहुत ही औपचारितापूर्ण ढंग से लागू होता है।

अनौपचारिक रूप से भी, जहां भी चार मनुष्य एकत्र हों, उनके बीच यह वरीयता क्रम निश्चित हो जाता है। लोग एक-दूसरे को नाप-तौलकर अपने बीच तय कर लेते हैं कि कौन किससे आगे है और इस क्रम का सभी व्यवहारों में पालन करते हैं। यह अल्प समय के लिए बने मानव समूहों में भी देखा जाता है, जैसे किसी रेल के डिब्बे में चंद घंटों के लिए एकत्र मुसाफिरों में।

डेसमंड मोरिस (मैन वाचिंग, द नेकड एप, ह्यूमन ज़ू आदि पुस्तकों के लेखक) का कहना है कि इस वरीयता क्रम को बिना अनावश्यक लड़ाई-झगड़े के बनाए रखने के लिए मनुष्यों में जो तरीका है, वह है बतियाना। मनुष्य निरंतर बितियाता रहता है। दो मनुष्य मिले नहीं कि कोई न कोई बहाना ढूंढ़कर वे बातचीत शुरू कर देते हैं। डेसमंड मोरिस का कहना है कि यह वास्तव में दोनों में एक दूसरे को तौलने और वरीयता क्रम निश्चित करने की प्रक्रिया है। पुराने परिचित भी खूब बातचीत करते हैं। इनमें बातचीत का महत्व वरीयता क्रम निश्चित करने में नहीं है, क्योंकि वह पहले ही निश्चित हो चुका होता है, बल्कि उसे पुष्ट करने में होता है।

बातचीत में संलग्न दोनों सदस्य एक दूसरे के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं, दोनों के बीच तनाव कम हो जाता है और समाज में सामरस्य बना रहता है।

आम प्रवृत्ति अधिक बातचीत को हतोत्साहित करने की है। स्कूलों में, दफ्तरों में, सभी जगह यही कहा जाता है कि बातें कम करो, और काम करो, बातों में समय नष्ट मत करो, इत्यादि। पर यदि हम डेसमंड मोरिस की बात मानें, तो बातें करना तनाव मुक्ति और अनावश्यक रगड़-झगड़ घटाने का एक साधन है और यदि हमें मनुष्य समाज में शांति बनाए रखनी हो, तो हमें परस्पर खूब बातचीत करनी चाहिए।

यदि हम हमारे व्यवहार पर थोड़ा गौर करें तो डेसमंड मोरिस की बात समझ में आती है। जब दो लोगों में मन-मुटाव होता है, तो इसका एक प्रमुख संकेत होता है उनमें बातचीत बंद हो जाना। दोनों मुंह फुलाएं एक दूसरे से कट्टी कर लेते हैं। बच्चों में तो यह खास तौर से देखा जाता है। और दोनों में मैत्री भाव की पुनर्स्थापना का पहला संकेत भी यही होता है कि वे दोनों बातें करने लग गए हैं। दोनों में मेल-मिलाप करानेवाले व्यक्ति भी सबसे पहले दोनों के बीच बातचीत शुरू कराने की ही कोशिश करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि बातचीत हमारे समुदाय में तनाव घटाने का और मैत्री भाव जताने का एक महत्वपूर्ण जरिया होता है। यदि दो लोगों में मनमुटाव हो तो उनमें बातचीत करा दीजिए और देखिए वे कैसे तुरंत फिर से मित्र बन जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति तनाव, मायूसी या चिंता से ग्रस्त हो, तो उससे खूब बातचीत कीजिए उसे तुरंत आराम मिल जाएगा। यदि आप स्वयं तनाव, मायूसी या चिंता से परेशान हों, तो अपने परिवार के जनों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य व्यक्तियों से खूब बात कीजिए, और देखिए आप कितनी जल्दी बेहतर महसूस करते हैं।

मजे की बात यह है कि यह दो व्यक्तियों पर ही लागू नहीं होता, दो राष्ट्रों में भी यही बात देखी जाती है। विवाद की स्थिति में दोनों औपचारिक कूटनीतिक संबंधों को तोड़ लेते हैं। एक-दूसरे के देश से अपने राजदूतों को वापस बुला लेते हैं, और यदि इससे भी बात नहीं बनी तो, अपने दूतावासों को ही बंद कर लेते हैं। उसके बाद तो खुले युद्ध का ही रास्ता बचा रहता है।

दूसरे देश जो इस लड़ाई से दुनिया को बचाना चाहते हैं, वे यही कोशिश करते हैं कि दोनों देशों में फिर से बातचीत शुरू हो जाए। भारत और पाकिस्तान, ईरान और अमरीका, रूस और अमरीका, चीन और जापान आदि के संदर्भ में यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। मुंबई हत्याकांड के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी वर्ताएं बंद कर दी थीं और अमरीका निरंतर हम दोनों पर दबाव डाल रहा है कि ये वार्ताएं पुनः शुरू हो जाएं, ताकि युद्ध की नौबत न आए। जब दो व्यक्तियों या राष्ट्रों में बातचीत ही बंद हो जाए तो इसका मतलब यह होता है कि दोनों के बीच जो वरीयता क्रम पहले निश्चित था, वह अब मान्य नहीं रहा और उसे नए सिरे से निश्चित करना पड़ेगा। यह बातचीत से या युद्ध से हो सकता है। चूंकि युद्ध के भीषण परिणाम निकल सकते हैं, दूसरे देश युद्ध टालने के लिए दोनों के बीच बातचीत बहाल करने की ही कोशिश करते हैं।

अब तो राष्ट्रों के बीच औपचारिक बातचीत को सुगम बनाने के लिए स्थायी व्यवस्थाएं भी बना दी गई हैं, यथा, लीग ओफ नेशेन्स (प्रथम महायुद्ध के बाद), संयुक्त राष्ट्र संघ (दूसरे महायुद्ध के बाद)। ये ऐसे मंच हैं जो कट्टी किए बैठे राष्ट्रों के बीच बातचीत पुनः शुरू कराने के अवसर देते हैं।

इसी तरह संसद, विधान सभा, अदालत, आदि सब औपचारिक बातचीत द्वारा मैत्री स्थापित करने के तरीके हैं, जो सब बंदरों के जुए बीनने की गतिविधि के ही विकसित रूप हैं।

दफ्तरों में जोइंट कंसलटेटिव मेकेनिज़म (जेसीएम) जिसमें प्रबंधक और कर्मचारी बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याएं सुलटा लेते हैं, और हड़ताल, तोड़-फोड़, पुलिस कार्रावाई आदि की नौबत नहीं आने देते, भी ऐसी ही एक व्यवस्था।

सामाजिक स्तर पर सत्संग, सामूहिक उपासना, प्रवचन आदि भी बातचीत द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित करने के विभिन्न उपाय हैं।

सभी कलाओं की मूल प्रेरणा भी बातचीत करने की इस मूलभूत आवश्यकता ही है। मनुष्य केवल बोलकर ही नहीं बातचीत करता। वह इशारे से (नृत्य कला), लिखकर (साहित्य), गाकर (संगीत), चित्र बनाकर (चित्रकला), मूर्तियां बनाकर (मूर्तिकला), इमारतें बनाकर (स्थापत्यकला) भी अपने मन की बात व्यक्त करता है। ये सब कलाएं बातचीत करने की क्रिया के ही परिष्कृत रूप हैं, और उन सबका मूल मक्सद तनाव घटाना और मैत्रीभाव बढ़ाना है।

अक्सर हम देखते हैं कि अत्यंत विषाद या दुख की स्थिति में हमारे मुंह से अपने आप ही गीत फूट निकलते हैं। वाल्मीकि ने रामयाण ऐसे ही लिखा था, जब सारस जोड़ी में से एक के बहेलिए द्वारा मार दिए जाने से उनका मन विषाद से भर गया था। वाल्मीकि ही नहीं, हम भी दुख की स्थिति में कोई न कोई गाना गुनगुनाते हैं। अक्सर लेखक, चित्रकार, कवि आदि भी अत्यंत दुख की स्थिति में ही अपनी कला का उच्चतम प्रदर्शन करते हैं। यह इसलिए क्योंकि यह उनके लिए दुख से मुक्ति पाने का एक जरिया होता है। कोई रचना करने के बाद वे दुख या तनाव से मुक्त हो जाते हैं।

तो है न मानव निरीक्षण एक रोचक चीज। क्या आपने इससे पहले सोचा भी था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, साहित्य, चित्रकारी आदि गंभीर क्रियाकलापों का बंदरों द्वारा जुए बीनने की क्रिया से घनिष्ट संबंध है?

3 Comments:

Arvind Mishra said...

बहुत बढियां कोई तो देज्म्नद मोरिस प्रेमी बलागर मिला

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

दोस्ती का पैगाम -आओ तुम्हारी जुएँ बीन दूँ!
रूठना -मैं तुम्हारी जुएँ नहीं बीनता!
बर्खास्तगी -तुमने जुएँ बीनने से इन्कार किया, नौकरी से बर्खास्त किया जाता है।
हाई कमान की जुएँ कई महिनों से नहीं बीनीं-वसुन्धरा से कहा नेता पद से स्तीफा दो!

बहुत रंजक और ज्ञानवर्धक पोस्ट।

गिरिजेश राव said...

समाचार पत्रों के ब्लॉग कॉलम में प्रवेश हो चुका होगा। मुझे पक्का यकीन है। अमर उजाला लेना बन्द कर दिया नहीं तो बताता रहता।

बहुत ही गहन और सरल विवेचन - समझावन की भंगिमा लिए।

लोगों का बतियाना अब अजनबियों से कम हो गया है। क्या यही कारण है कि मौका मिलते ही दूसरे को लतियाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है ?

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