Tuesday, April 14, 2009

मेरा नया ब्लोग केरल पुराण

आज 14 अप्रैल को विषु है, जो केरलवासियों का एक मुख्य त्योहार है। यह उनके लिए नववर्ष भी है। पंजाब में भी बैसाखी इसी दिन बनाया जाता है। तो मेरे केरल और पंजाब के मित्रों को विषु और बैसाखी की शुभकामनाएं और नव वर्ष के लिए अभिनंदन।

विषु के इस शुभ पर्व को मैंने केरल से संबंधित एक नया ब्लोग शुरू किया है, केरल पुराण

इसमें मैं प्रसिद्ध मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला के प्रथम भाग की कहानियों का हिंदी अनुवाद दे रहा हूं।

इस ग्रंथ का परिचय इस प्रकार से हैं:-

मलयालम साहित्य की कालजयी कृति "ऐतीह्यमाला" बीसवीं सदी के प्रारंभ में (लगभग १९०७ को) रची गई थी। इस ग्रंथ के रचयिता हैं कोट्टारत्तिल शंकुण्णि। इस ग्रंथ का मलयालम साहित्य में वही स्थान है जो पंचतंत्र, हितोपदेश, एक हजार एक रातें, ईसप की कथाएं आदि का विश्व साहित्य में है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी के केरलवासी इस ग्रंथ-रत्न का आस्वादन करते आ रहे हैं और एक शताब्दी से पूर्व लिखे जाने के बावजूद इसकी लोकप्रियता में जरा भी कमी नहीं आई है।

इस ग्रंथ में यूरोपियों के आने के पूर्व के केरल के समाज की अत्यंत सजीव तस्वीर उभरती है। केरल प्रदेश के सभी प्रतीकों का, वहां के देवी-देवताओं, मंदिरों, नदी-तालाबों, पशु-पक्षियों, विभिन्न वर्गों के स्त्री-पुरुषों, जैसे विद्वान और मूर्ख, राजा और भिखारी, पागल और संन्यासी, ब्राह्मण और शूद्र, कुलटा और पतिव्रता, यहां तक कि वहां के प्रेत-पिशाचों और व्यंजनों तक का अत्यंत रोचक वर्णन इस ग्रंथ में हुआ है। यद्यपि आज पढ़ने पर इस ग्रंथ की घटनाओं में निहित जीवन-मूल्य कुछ अप्रासंगिक एवं पुरातन लग सकता है, परंतु यदि इस बात को न भूला जाए कि लेखक जिस समय का चित्रण कर रहा है, उस समय का केरल ऐसे ही जीवन-मूल्यों से संचालित था, तो हम देखेंगे कि लेखक ने प्रचलित शोषणकारी परंपराओं को सीधी चुनौती न देते हुए भी उन पर अत्यंत तीखा व्यंग्य किया है, जिससे उसके सुधारक मनोवृत्ति, विनोदशीलता एवं मानवीयता का प्रमाण मिलता है।

इस ग्रंथ में आई घटनाएं इतनी चमत्कारिक एवं अविश्वसनीय हैं कि पाठक उन्हें एक ही सांस में पढ़ जाने के लिए बेचैन हो उठता है। इस मामले में इसकी तुलना हिंदी के "चंद्रकांता संतति" से की जा सकती है, लेकिन ऐतीह्यमाला का विषय-क्षेत्र मात्र सामंती समाज न होकर अत्यंत विस्तृत है।

यह ग्रंथ प्रारंभ में प्रसिद्ध मलयालम अख्बार "मलयाल मनोरमा" में लगभग सौ साल पहले धारावाहिक रूप से छपा था और बाद में इसकी लोकप्रियता को देखकर अखबार के प्रकाशक ने इसे आठ खंडों में प्रकाशित कराया। तब से इसकी असंख्य आवृत्तियां निकल चुकी हैं। कुछ वर्ष पूर्व कोट्टारत्तिल शंकुण्णि स्मारक न्यास ने आठों खंडों की सामग्री को एक ही जिल्द के अंदर प्रकाशित कराया। इस जिल्द में १२६ कहानियां शामिल की गई हैं जिनमें से प्रत्येक कहानी अन्य से बढ़कर पठनीय है।

केरल पुराण ब्लोग में "ऐतीह्यमाला" के प्रथम खंड में शामिल २१ कहानियों का हिंदी अनुवाद दूंगा। यदि पाठकों को ये कहानियां पसंद आईं, तो अन्य खंडों के अनुवाद का श्रम खुशी-खुशी हाथ में लूंगा।

4 Comments:

अनुनाद सिंह said...

बहुत अच्छा ! निश्चित ही यह नया काम है। अभी तक अपने ही देश की इतनी महान रचना के बारे में जानकारी तो दूर, नाम तक नहीं सुना। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमी है। गैर-प्रासंगिक चीजें अधिक बतायी जातीं हैं, प्रासंगिक कम।

साधुवाद। कहानियाँ पढ़ने की प्रतीक्षा है।

PN Subramanian said...

प्रशंशनीय प्रयास होगा. उत्तर के लोगों को केरल की संस्कृति को समझने का एक अवसर मिलेगा. हमारी शुभकामनायें.

Anil said...

बहुत ही बढ़िया प्रयास है। इससे न सिर्फ ज्ञानवर्धन होगा, अपितु देश का एकीकरण भी होने में योगदान मिलेगा।

lalit said...

सराहनीय प्रयास।
शुभकामनाएँ!

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