Sunday, April 19, 2009

अंग्रेजी की वर्णमाला ठीक से न बोलने पर 11 साल की लड़की को टीचर ने पीटकर मार डाला

आप सोच रहे होंगे कि क्या इक्कीसवीं सदी में भी ऐसी घटनाएं घट सकती हैं?

जी हां हमारे भारत महान में यह सब होता है।

इस मासूम बच्ची से, सन्नो नाम था उसका, अंग्रेजी की वर्णमाला ठीक से बोली नहीं गई। उसकी टीचर आग-बबूला हो गई और पहले तो उसने सन्नो को खूब मारा-पीटा, और उसके बाद उसे तीन घंटे तक कड़ी धूप में खड़ा रखा, जिससे थकावट के कारण बेचारी लड़की की जान ही चली गई।

स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों पर क्रूरता बरतने का यह अकेला किस्सा नहीं है। आए दिन अखबारों में ऐसी खबरें आती रहती हैं। कहीं छात्रों को नेत्र की ज्योति से हाथ धोना पड़ता है, कहीं वे उम्र भर पंगु बनकर रह जाते हैं।

यह स्थिति अमरीका से ठीक उल्टी लगती है। वहां छात्र बंदूक लेकर शिक्षकों को भून डालने में आगा-पीछा नहीं देखते, यहां मां-बाप बच्चों को स्कूल भेजकर यहीं भगवान से दुआं करते हैं कि ये सकुशल घर लौट आएं और किसी गुस्सैल टीचर की मार-पीट और दंड के शिकार न बन जाएं।

इस समस्या का समाधान क्या हो।

मुझे लगता है कि निजी स्कूलों में, जैसे उपर्युक्त अंग्रेजी स्कूल में टीचरों का भी खूब शोषण होता है। उन्हें पर्याप्त वेतन नहीं दिया जाता है और बहुत काम भी कराया जाता है। एक-एक क्लास में 50-50, 60-60 बच्चे ठूंस दिए जाते हैं। इससे उनमें फ्रस्ट्रेशन खूब बढ़ जाता है। वे इस फ्रस्ट्रेशन को स्कूल संचालकों पर तो उतार नहीं सकते। रह जाते हैं बेचारे बच्चे, जिन्हें मार-पीटकर ये शिक्षक कुछ सकून पाते हैं।

शिक्षकीय क्रूरता रोकने के लिए कड़े कानून बनाने की आवश्यकता है और उन्हें कड़ाई से लागू भी करना चाहिए। उपर्युक्त जैसे किस्सों के लिए मौत की सजा भी वाजिब है।

दूसरी ओर हमारा शिक्षण तंत्र अनेक कुरीतियों से ग्रस्त हो गया है। उदाहरण के लिए निजी स्कूलों द्वारा बारबार फीस बढ़ानेवाला मामला, जिससे अभिभावकों पर असहनीय आर्थिक बोझ आ जाता है।

मुझे लगता है कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार ने पिछले 60 सालों में स्वास्थ्य और शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है, न ही उन पर पर्याप्त खर्च ही किया है। शिक्षा के नाम पर नेहरू के समय आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थाएं तो बना दी गईं, जहां अंग्रेजी का बोलबाला है, पर प्राथमिक शिक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि भारत में लोकतंत्र की भावना अभी गहरी पैठी नहीं है। यहां अब भी अभिजात वर्गों का ही चलता है, और देश का पैसा उन्हीं के फायदे के लिए खर्च किया जाता है। यहां का प्रधान मंत्रि अपने पांच साल के कार्यकाल में से तीन साल अमरीका के साथ परमाणु करार करने में खर्च कर देता है, लेकिन देश से निरक्षरता, कुस्वास्थ्य, गरीबी, बेरोजगारी आदि मिटाने के लिए काम करना हो, तो उसके पास समयाभाव हो जाता है।

शिक्षा पर सरकार को अभी के 10-12 प्रतिशत से कहीं ज्यादा खर्च करना चाहिए। लेकिन केवल खर्च करना ही काफी न होगा, खर्च किया गया पैसा सही जगह पहुंचता भी है इसका भी ध्यान रखना होगा। राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि सरकार द्वारा खर्च किए हर रुपए में से मात्र 10 पैसा ही अंतिम लाभार्थी को मिल पाता है। बाकी के 90 पैसे को बिचौलिए हड़प लेते हैं।

यह सब बहुत ही बड़ी और असाध्य सी समस्याएं प्रतीत होती हैं, पर हमें हिम्मत और आशा नहीं हारनी चाहिए।

पुनश्च

इस कांड से जुड़े अन्य तथ्य भी अब सामने आ गए हैं, जो कुछ अन्य संगीन मुद्दों को भी उजागर करते हैं।

सन्नो के शरीर के पोस्टमोर्टम की रिपोर्ट आ गई है। डाक्टरों ने मृत्यु का कारण सफोकेशन (दम घुटना) बताया है, और यह भी कहा है कि सन्नो पहले से ही किसी बीमारी से बीमार चली आ रही हो सकती है, और टीचर की मार और धूप में खड़ा किए जाने के कारण बीमारी से कमजोर हुआ उसके शरीर ने दम तोड़ दिया हो सकता है।

दूसरी चौंकानेवाली बात यह है कि स्कूल से लौटने पर सन्नो को उसके मां-बाप तुरंत डाक्टर के पास नहीं ले गए, बल्कि नीम-हकीमों के पास ले गए और इस तरह बहुमूल्य समय गंवा दिया। यदि वे उसे तुरंत किसी डाक्टर या अस्पताल ले गए होते तो शायद सन्नो की जान बचाई जा सकती थी।

अब सवाल ये खड़े होते हैं -

1. यदि सन्नो लड़का होती, तो क्या मां-बाप उसकी बीमारी के प्रति इतनी लापरवाही बरतते?

2. यदि सन्नो लड़का होती, तो क्या मां-बाप उसे नीम-हकीम के पास पहले ले गए होते? उसे लेकर तुरंत किसी अस्पताल या डाक्टर के पास न दौड़े होते?

इस तरह यह मामला शिक्षकीय हिंसा का एक वीभत्स उदाहरण तो है ही, साथ-साथ लड़कियों के प्रति हमारे समाज में और परिवार में किए जानेवाले भेद-भावपूर्ण व्यवहार का भी यह एक ज्वलंत उदाहरण है।

4 Comments:

अनुनाद सिंह said...

वैसे तो इतनी क्रूरता-पूर्वक पिटाई अपने आप में घोर निन्दनीय है किन्तु अंग्रेजी वर्णमाला को लेकर की गयी पिटायी और भी निन्दनीय है। इसी तरह आये दिन सुनने में आता है कि अमुक स्कूल में मातृभाषा में आपस में बातचीत करने की मनाही है। ऐसे मनाही आदेश भीकम निन्दनीय नहींहैं। इससे बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने का भयानक खतरा पैदा होता है।

संगीता पुरी said...

सचमुच हमारा भारत महान है ...

Kapil said...

अच्‍छा आलेख।

aahang said...

To me the question is not of english and Hindi.If english or rather hinglish has become popular is because it is convenient.Just to give an example : I am good at Hindi as well as English but when it comes to typing on Keyboard I type faster in english as I have been practcing that for official work.
पर जब बात अपने भाव व्यक्त करने की हो तो मै हिन्दी मे ही लिख पाता हूं.मेरे ब्लाग पर अधिकतर कवितायें उर्दू या हिन्दी में हैं.

So what really is the problem? I feel Mr. Subramanyam has a point when he says that the Government has neglected these sectors but I would add I would say that it's not that they have neglected Hindi and have done an excellent job with English.They have neglected education and why we all know.An educated voter is a dangerous voter.
My heart reaches out to the parents of that poor child who lost her life at a place which was supposed to make something great of her.The parents would be regretting that why at all did we send her to school.

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट