Monday, March 23, 2009

दो हफ्ते निकल गए!

यह ब्लोग अब कुछ दो हफ्ते पुराना हो चुका है। अब तक इसे लगभग 40 बार देखा गया है ( :-) या :-( ?)। इनमें से 10 बार तो मैंने ही देखा होगा!

बहुत लोगों ने शुभकामनाएं भेजीं। उनका मैं आभारी हूं। कुछ लोगों ने ब्लोग को दीर्घजीवी बनाने के लिए उपयोगी सुझाव भी दिए। उनके प्रति मैं और भी अधिक आभारी हूं। इनमें से एक हैं मंझे हुए हिंदी ब्लोगर कुन्नू सिंह। उनके सुझाव मुझे काफी उपयोगी लगे, इसलिए यहां दुहराता हूं, ताकि अन्य नौसिखिए ब्लोगरों को भी मार्गदर्शन मिल सके:-

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ब्लाग से कमाना बहुत कठीन है क्योंकि हिंदी साइटों पर बहुत ही कम लोग विज्ञापन करवाते हैं।

मैंने एडब्राइट से 1 या दो वर्ष में 10 डालर कमाया। आप सोच सकते हैं कितना मुश्किल है।

और भी कई तरीके हैं, जैसे आप अपना ब्लाग चिट्ठाजगत chitthajagat.in और blogvani.com में डाल दें।

feedburner.com से अपने ब्लोग का फीड बनाएं।

गूगल में यह खोज करें - free web submission या free url submit और 10 - 20 साइटों पर रजिस्टर करें।

सबमिट करने वाला काम हर हफ्ते करें और कम से कम 10 साइटों पर अपना साइट सबमिट करें।

लोगों के साइटों पर जाकर कमेंट दें, इसमें आपको ब्लोगिंग से ज्यादा मजा आएगा।

कभी कभी दूसरों के लेखों पर भी लिख दें जैसे किसी ने कोई बात लिखी हो, उस पर आप कुछ लिख सकते हैं।

बहुत सारे तरीके हैं। टेंप्लेट बदलते रहें।

पहले अपने ब्लाग को पापुलर बनाएं, बाद में एड लगाएं।
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11 Comments:

चन्दन चौहान said...

नमस्कार,
आप मेरे ब्लाग में आकर टिप्पणी की इसके लिये धन्यवाद,
मुगल यहां धर्म का प्रचार करने नहीं आए थे ये बात हास्यपद है अगर मुस्लमान धर्म का प्रचार करने नहीं आए थे तो हिन्दुस्तान में मुस्लमानों कि सख्या कहाँ से आ गया। जब कि मुगल सिर्फ तलवार और घोडा़ लेकर आये थे। मुगलों के द्वारा हिन्दुस्तान में मन्दिरों को तोड़ कर मस्जिद क्यों बनाया गया। कई और बातें मैं आपको बता सकता हू। लेकिन मैं आपसे वहस करना नही चाहता हू।

अकबर के बारे में थोडा़ और विस्तार से आप जानने का कोशीश करे अकबर हिन्दुस्तान के घटिया सम्राट में से एक था। (कौन कहता है अकबर महान था किताब पढे़) मैं इस के लिये कुछ दिन में लेख लिखूगा और आपको सूचित करू का।

भगत सिंह के बारे में आपको जानकारी लेना चाहिये भगत सिंह पक्के आर्य समाजी थे और जनेउ भी पहनते थे। इसके बारे में मेरे पास एक लेख है अगर आप अपना ज्ञान बढा़ना चाहते तो मैं आपको मेल भेज सकता हू

मैं आपके सभी बातों से सहमत होता अगर मैं सिर्फ एह मान्सिकता बाले लेखक का किताब पढ़ता लेकिन मुझे खुशी है मैने यैसा नही किया और मैने खुले दिल से सभी को स्विकार किया

और जहाँ तक धर्म छोड़ने की बात हैं मैं धर्म को छोड़ कर दुबारा धार्मिक बना हू क्यों कि

धर्म हिना पशुभी समाना

बालसुब्रमण्यम said...

चंदन चौहान जी के ऊपर की टिप्पणी का संदर्भ जयहिंदी के पाठकों को तभी समझ में आएगा जब वे चंदन जी का मूल लेख, हिंदू तो गली का कुत्ता है पढ़ेंगे।

इस लेख पर मैंने एक लंबी टिप्पणी छोड़ी थी, जिसके ही जवाब में चंदन जी ने उपर्युक्त टिप्पणी की है।

उपर्युक्त लेख पढ़ने के बाद चंदनजी की टिप्पणी पर नीचे दी गई मेरी टिप्पणी भी पढ़ें।

बालसुब्रमण्यम said...

प्रिय चंदन चौहान जी,

इस टिप्पणी का संबंध मेरे "दो हिफ्ते निकल गए" वाले लेख से नहीं है। इसलिए जयहिंदी के अन्य पाठक सोच रहे होंगे कि हम क्या बात कर रहे हैं। इसलिए उनकी जानकारी के लिए मैंने आपके मूल लेख की कड़ी ऊपर दे दी है।

आपको यह टिप्पणी अपने लेख में ही मेरी टिप्पणी के जवाब के रूप में देनी चाहिए थी। तब वहां इस विषय पर अच्छी बहस चल सकती थी। इससे आपके लेख के अन्य पाठक भी इस चर्चा में भाग ले पाते और वे लोग भी जिन्होंने आपके लेख पर टिप्पणी की है।

खैर, इस विषय पर चर्चा चलाना जरूरी है, इसलिए मैं आपके पत्र का उत्तर जरूर देना चाहूंगा।

लगता है कि आप पर राष्ट्रीय स्वयंकसेवक संघ और हिंदुत्व की विचारधारा जरूरत से ज्यादा हावी है। हो सकता है कि आप स्वयं इस खेमे के नंबरदार हों, पर सचाई अपनी जगह अडिग रहती है आप चाहे जितना प्रचार करते रहें, वह बदलती नहीं। हिटलर को देख लीजिए, उसने कितना प्रचार किया था जर्मनों की अग्रणीयता और यहूदियों की नीचता का। कितने ही हजार यहूदियों को उसने गैंस चैंबर भेजकर हत्या करवा दी थी। पर आखिर जीत किसकी हुई? सचाई की।

आप सोफ्टवेयर इंजीनियर रह चुके हैं, इसलिए आपमें स्वयं सोचने की क्षमता जरूर ही होगी। इन प्रचारों से अलग हटकर इस पर सोचिए कि हमारे देश के लिए हितकारी क्या हो सकता है। क्या लोगों को धर्म के आधार पर बांटने-कांटने से किसी का कोई भला हो सकता है? क्या जो हजारों सालों से इस मिट्टी में रहते आ रहे हैं, वे कहीं हमारे लिए गैर हो सकते हैं? भले ही वे मुसलमान हों, ईसाई हों या सिक्ख हों? जिनका योगदान हमारी भाषा, लिबास, खानपान, स्थापत्य कला, चित्रकला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नृत्यकला, संगीतकला, साहित्य सभी में हो, क्या वै गैर हो सकते हैं? आप किस आधर पर कह रहे हैं भारत हिंदुओं का राष्ट्र है? हिंदु नाम स्वयं मुसलमानों का दिया हुआ है।

भारत की संस्कृति एक मिली-जुली संस्कृति है जिसमें सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं और संप्रदायों का योगदान रहा है। यही हमें अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। वरना कट्टरवादी तो आपको अफगानिस्तान के तालिबान में, ईरान के आयुत्तोल्लाओं में, अमरीका, इटली आदि के ईसाई धर्मांधों में भी मिल जाएंगे।

हम भिन्न हैं तो इसलिए कि हम सभी धर्मों का गुण ग्रहण करते हुए एक सहिष्णु सभ्यता का निर्माण कर सके हैं।

हिंदुत्व की विचारधारा से तो आप सुपरिचित हैं ही। अपने विचारों को संतुलित करने के लिए विपरीत खेमे की विचारधाराओं से भी परिचित होने का प्रयास करें। तब आप भारतीयता की आत्मा को समझ सकेंगे। यही डायलेक्टिकल मैटीरियलिसम नामक दार्शनिक सिद्धांत है जिसका आविष्कार मार्क्स ने किया था और जिसके आधार पर उन्होंने विश्व इतिहास की नयी व्याख्या करके महान मानवतावादी समाज व्यवस्था की नींव रखी थी। आज भी हम उनके इस आदर्श को प्राप्त नहीं कर सके हैं, पर मानव जाति की निरंतर कोशिश उसी की ओर है। इसे हम सबको समझना बहुत आवश्यक है। हमारे ही संविधान में जो समाजवादी राष्ट्र निर्माण की बात कही गई है, वह इसी ओर संकेत है।

हिंदुत्व के विपरीत विचारधाराएं आपको दो जगह मिल सकेंगी -

1. जैसे मैंने ऊपर कहा, मार्क्सवाद में
2. डा. रामविलास शर्मा की रचनाओं में

दरअसल, डा. रामविसाल शर्मा ने मार्क्सवाद को ही अपने सभी विवेचनों के लिए कसौटी के रूप में इस्तेमाल किया है। इसलिए यदि आप केवल उनकी रचनाओं को ही पढ़ें, तो भी आपको काफी बातें समझ में आ जाएंगी।

रामविलासजी की सभी किताबें आपको राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन से प्राप्त हो सकती हैं। दोनों ही दिल्ली स्थित पुस्तक प्रकाशक हैं, जिन्होंने डा. शर्मा की लगभग सभी पुस्तकों का प्रकाशन किया है। मैं उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों की सूची नीचे दे रहा हूं, जिनसे आपको डा. शर्मा का अध्ययन शुरू करना चाहिए। उन्होंने अपने 89 वर्षों की लंबी आयु में 100 से अधिक बड़ी छोटी पुस्तकें लिखी हैं, जिन्हें हर भारतीय को गंभीरता से पढ़नी चाहिए।

1. भारतीय साहित्य की भूमिका
2. भारत की भाषा समस्या
3. आस्था और सौंदर्य
4. परंपरा का मूल्यंकन
5. भाषा और समाज
6. मार्क्स और पिछड़े हुए समाज
7. पाश्चात्य दर्शन और सामाजिक अंतर्विरोध - थेलेस से मार्क्स तक
8. गांधी अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं
9. भारतीय इतिहास की समस्याएं
10. इतिहास दर्शन
11.मानव सभ्यता का विकास
12. भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद
13. लोक जागरण और हिंदी साहित्य

उपर्युक्त सूची के अलावा उन्होंने लगभग सभी प्रमुख हिंदी साहित्यकारों का मूल्यांकन किया है, जिनमें प्रेमचंद, भारतेंदु हरीशचंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुल्क, जयशंकर प्रसाद, निराला, आदि कई साहित्यकार शामिल हैं। इतना ही नहीं इस आश्चर्यजनक प्रतिभा से संपन्न विद्वान ने ऋग्वेद, भाषा विज्ञान, इतिहास, दर्शनशास्त्र, संगीतशास्त्र, अर्थशास्त्र, आदि न जाने कितने विषयों पर कलम चलाया है।

उनके समग्र वाङमय का अध्ययन करने में आपको लगभग एक वर्ष का समय लगेगा। मेरी सलाह है कि आप यह समय निकालें। आप एक नए व्यक्ति के रूप में उभर आएंगे और देश का सच्चा हितैषी बन पाएंगे।

अंधराष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरता की बात पुरनी पड़ चुकी है। वह जनता को बहकाने के लिए सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के पोषकों द्वारा फैलाया गया विषैला जाल है जिसमें आप उलझ गए हैं।

मैं इतनी कन्विक्शन के साथ आपको इसलिए सलाह दे पा रहा हूं क्योंकि मैं स्वयं भी आपके जैसे वैचारिक दौर से गुजर चुका हूं। जैसे हर विचारशील युवा अपनी बौद्धिक यात्रा मार्कस्वादी बनकर करता है, मैंने भी वही मार्ग पकड़ा था। साथ ही आर्यसमाज, गांधी, सावरकर आदि से भी मैं उतना ही प्रभावित था। फिर जब 1987 के लगभग गोर्बोछोफ की मीरजाफरी के कारण रूस का पतन हुआ, मेरा मार्क्सवाद से मोहभंग हुआ था, और मैं विकल्प न रहने के कारण हिंदुत्व की ओर बहता गया था।

तभी इत्तफाक से मेरा डा. शर्मा की रचनाओं से परिचय हुआ और सब कुछ बदल गया। मुझे रूस, मार्क्सवाद, भारत आदि की ऐतिहासिक घटनाओं को सही दृष्टि से समझने में मदद मिली।

यह हम सबका सौभाग्य है कि डा. शर्मा जैसे प्रखर विद्वान और विचारक हमारी अपनी हिंदी में हुए हैं।

तो आप उनकी रचनाओं को पढ़िए, और मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस मानसिक रोग से पूर्णतः मुक्त हो जाएंगे। आप मानसिक रूप से स्वस्थ ही नहीं होंगे, बल्कि दूसरे अस्वस्थ लोगों को भी सही मार्ग दिखाना अपने जीवन का ध्येय बना लेंगे।

डा. शर्मा ने अपनी पुस्तकों में भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति, राजनीति, विदेश नीति आदि पर इतने ढेर सारे विचार रखे हैं, कि यदि हम उन पर अमल करने लगें, तो न केवल हमारे देश की सभी समस्याएं हल हो जाएंगी, बल्कि हमारे देश के नौजवानों को सही दिशा, उत्साह और लक्ष्य भी प्राप्त होगा, जिस पर बढ़ते हुए हम अपने देश को विश्व के देशों की पांती में अग्रणी स्थान दिला सकेंगे।

इसलिए धर्मांधता, सांप्रदायिकता, आदि में समय नष्ट न करें, देश-निर्माण के सच्चे रास्ते पर लौट आएं।

करने को बहुत कुछ है। आप जैसे उत्साही नौजवानों की देश को आवश्यकता है। जरूरत है सही दृष्टिकोण के साथ देश की समस्याओं से भिड़ने की। यह दृष्टिकोण आपको डा. शर्मा में मिल सकता है।

आशा है अन्यथा नहीं लेंगे। यदि आप डा. शर्मा का अध्ययन शुरू कर रहे हों, मुझे आपके साथ मिलकर अध्ययन करने में बड़ी खुशी होगी। मैं भी अभी उनके विचारों के उथले पानी में ही उतरा हूं, और अधिक गहराई में पैठने का विचार रखता हूं। आपका साथ मिल सके, तो अध्ययन की हमारी यह यात्रा सुखद हो सकती है।

सादर,
बालसुब्रमण्यम

बालसुब्रमण्यम said...

पाठकों की सुविधा के लिए, चंदन जी के लेख की टिप्पणी के रूप में मैंने जो लिखा था, उसे यहां दे रहा हूं :-

पता नहीं ये बेसिर पैर की बातें कहां से आपने अपने दिमाग में इकट्ठी कर ली हैं। मुगल यहां धर्म का प्रचार करने नहीं आए थे, बल्कि राज्य स्थापित करने के लिए आए थे। यदि आपने बाबर की आत्मकथा पढ़ी होती, जो हिंदी में बाबरनामा के नाम से उपलब्ध है, आपको मालूम होता कि वे तुर्किस्तान में अपना राज्य खोने से यहां नए राज्य की तलाश में आए थे। दो-एक पीढ़ियों में ही मुगल बादशाह इतने भारतीय हो गए थे, कि अकबर तुर्की भाषा बिलकुल न जानता था, और ब्रज भाषा ही उसकी मुख्य भाषा हो गई थी। अकबर स्वयं ब्रजभाषा में काव्य रचता था। अकबर की मां हिंदू थी। उसका बचपन मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ किले में एक हिंदू राजा के संरक्षण में बीता था। तब शेर शाह द्वारा पीछा किए जाने के कारण हुंमायूं मारा-मारा फिर रहा था और ईरान में शरण लेने को मजबूर था। इसलिए संस्कार से अकबर बिलकुल भारतीय था। उसने भारत में अपना विशाल साम्राज्य राजा मानसिंह जैसे हिंदू सिपाहसलारों की मदद से ही स्थापित की थी। उनके होम मिनिस्टर राजा टोडर मल थे। बीरबल आदि हिंदू राजा उनके नवरत्नों में थे। अकबर धर्म, साहित्य, संस्कृति, स्थापत्य कला आदि का बड़ा पारखी था। वह भारत के महानतम सम्राटों में से एक था, जिस पर हर भारतीय को, चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, सिक्ख हो, या ईसाई, उचित ही गर्व होना चाहिए। उसके बाद के मुगल बादशाह, जहांगीर, शाहजहां आदि ने भी अकबर की ही नीति जारी रखी। यहां तक कि ओरंगजेब ने भी मंदिरों के निर्माण के लिए भारी दान किए हैं। मुगलों का समय हमारी भाषा हिंदी के लिए बहुत महत्व रखता है। मुगलों के ही समय खड़ी बोली, जिसे आज हिंदी कहा जाता है, पूरे देश में फैल गई थी। तुलसी, सूर आदि महान हिंदी रचनाकार मुगलों के समय में ही हुए थे।

हर चीज को धर्म के चश्मे से देखने का रोग हमें अंग्रेजों ने लगाया। वे देश को बांटकर कमजोर रखना चाहते थे। संगठित भारत के शौर्य का परिचय उन्हें 1857 में लग चुका था, और वे जानते थे कि हिंदू और मुसलमान को अलग न करें, तो भारत में उनके दिन इने गिने ही हो सकते हैं। इसलिए उन्होंने एक सोची-समझी साजिश के अंतर्गत हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई खोदना शुरू किया जिसका अंजाम देश के बंटवारे में हुआ। आज भी हम उनकी इस चाल का खामियाजा भर रहे हैं। मुंबई में जो हुआ वह उसी का नवीनतम मिसाल है।

जिस तरह के विचार आपने उगले हैं, वे आपके अज्ञान के सूचक हैं। यदि आप सच्चाई जानना चाहें, तो डा. रामविलास शर्मा की पुस्तकों का अध्ययन कीजिए, उसमें सब कुछ बड़ी स्पष्टता से समझाया गया है।

भगत सिंह जिनका नाम आपने सावरकर और हेगड़े के साथ लिया है, नास्तिक थे और साम्यवादी थे। वे अंग्रेजों की चाल को भली-भांति समझ गए थे, और वे सशस्त्र क्रांति से अंग्रेजों को यहां से भगाने में विश्वास रखते थे।

थोड़ा अध्ययन कीजिए, आपकी आंखों से धर्म का यह विभेदी चश्मा उतर जाएगा, और आप देश का सच्चा हित साध सकेंगे।

निशांत मिश्र said...

प्रिय सुब्रमण्यम जी, मेरे ब्लॉग ज़ेन कथाएँ पर आपका प्रेरक कमेंट पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ. मुझे यह जानकार भी प्रसन्नता हुई कि आप भी अनुवादक हैं. कृपया मुझे the.nishant@gmail.com पर ई-मेल करें. वहीं विस्तार से बात करेंगे.

Mired Mirage said...

भाई, आपकी पोस्ट क्या थी और क्या टिपियाना था तो अब तक भूल गई इन टिप्पणी प्रतिटिप्पणियों को पढ़कर! खैर अगली बार सही।
घुघूती बासूती

चन्दन चौहान said...

धन्यवाद भाई साहब आपके मेल के लियें। मैं ब्लागिंग सिर्फ अपना भाडा़स निकालने के लिये नही करता हू मैं इससे अभी तक कई बातें सिखा भी हू और मैं आशा करता हू कि आप से भी कई अच्छी बातें सिखुगा। मैं आने बाले समय में आपके समर्पक में रहूगां और जब भी मुझे समय मिलेगा मैं आपके द्वारा दिये गये उत्तर के जबाब पुरी इमान्दारी से दूगाँ।

और जहाँ तक मेरा सवाल है जब में 12 साल का था उसी समय तृ्तीय जिला सम्मेलन के स्टेज से मार्क्सवाद के बारे मैं भाषण दिया था। मेरा परिवार भी मार्क्सवाद से जुरा हूआ था लेकिन आप खुद ईमान्दारी से कहीये क्या हिन्दुस्तान में मार्क्सवाद का मौत नही हो चुका है?

आगे भी मैं आपसे बात करना चाहूगा। थोडा़ काम में व्यस्त रहने कारण देर हो सकता है।

धन्यवाद
आपका बन्धु
चन्दन चौहान

Abhishek Mishra said...

Ummid hai bahas kisi mukaam tak pahunche.

बालसुब्रमण्यम said...

चंदन जी,

मार्कवाद की मौत का सवाल आप डा.शर्मा की पुस्तकें पढ़ने के बाद पूछें। यदि आप उन्हें पढ़ेंगे, तो आपको पूछने की जरूरत भी नहीं होगी। आपको उत्तर वहीं मिल जाएगा।

यदि मार्क्सावद मर गया हो, तो यह मानवजाति के लिए बड़ी दुखद बात होगी। मार्क्सवाद समानता पर आधारित, मानवतावादी समाज व्यवस्था लानेवाली विचारधारा है। कौन चाहेगा कि ऐसी व्यवस्था लानेवाली विचारधारा मर जाए?

दूसरी बात, मार्कसवाद मानव समाज के विकास के विभिन्न चरणों का विवेचन है। जैसे-जैसे मानव समाज का विकास होता जाता है, वैसे-वैसे वह एक चरण से दूसरे में बढ़ता जाता है। मुख्य चरण ये हैं-

कबीलाई जीवन
इसमें सामूहिक संपत्ति नहीं होती और सब मनुष्य बराबर होते हैं। शिकार आदि से भरण-पोषण होता है। जमीन, पशुधन आदि नहीं होते।

हमारे यहां वेदों का समय यह समय था। वेदों की ऋचाएं रचनेवाले योद्धा भी थे, लुहार भी थे, महिलाएं भी थीं, और बढ़ई भी थे। कहने का मतलब है, ऊंच-नीच, जांति-पांति का सवाल नहीं था।

सामंतकाल
जब मनुष्य खेती करने लगता है और पशुधन रखने लगता है, तब उसके पास संपत्ति होने लगती है। और संपत्ति के लिए छीना-झपट्टी शुरू होती है। इसमें समाज का अधिक ताकतवर अधिक संपत्ति हथिया लेता है। ये ही राजा-महाराजा, जमींदार, सामंत आदि बनते हैं।

व्यापारवाद
एक समुदाय के माल को दूसरे समुदाय को पहुंचाकर कुछ लोग आजीविका कमाने लगते हैं। सामंतवाद के साथ इनकी भी किसमत चमक उठती है। सामंतों के पास इकट्ठा हुई अपार धनराशि को ये धीरे-धीरे अपने पास जमा करते जाते हैं। ये सामंतों को कर्ज भी देते हैं।

पुरोहितवाद
सामंतकाल में संपत्ति की घोर विषमताएं पैदा होती हैं, अमरी गरीबी का फासला बढ़ता है। लोग यह सवाल न पूछें, "राजा इतना अमीर क्यों रहे, विलासिता में क्यों रहे, और हम भूखे-नंगे क्यों रहे," इसके लिए पुरोहित वर्ग ऐसे नियम कानून बनाता है, जो राजा को ईश्वरीय शक्ति प्रदान करता है और कर्म-फल के सिद्धांत या नरक-स्वर्ग का सिद्धांत रचकर लोगों को गुमराह करता है कि तुम्हारी बुरी हालत तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल है। इस तरह के तर्कों से लोग भाग्यवादी बन जाते हैं और अपनी हालत सुधारने के लिए स्वयं प्रयास नहीं करते, राजा आदि के मुहताज बने रहते हैं। पुरोहितों द्वारा रचा गया यही नीति-कानून धर्म कहलाता है। उसका मुख्य उद्देश्य यथा स्थिति को बनाए रखना होता है, यानी अमीरों को अमीर और गरीबों को गरीब। चाहे वह हिंदू धर्म हो, ईसाई हो इस्लाम हो, बौध हो या जैन, सभी धर्मों का मूल उद्देश्य सामंतवाद की विषमताओं को सही ठहराना और यथा स्थिति को बनाए रखना है।

पूंजीवाद
जब व्यापारियों के पास काफी पैसा इकट्ठा हो जाता है, तो वे छोटे बड़े उद्योग लगाने लगते हैं। उनके वर्ग विरोध सामंतों से होता है, क्योंकि सामंतवाद को समाप्त करके ही वे पूंजीवाद को पूरी तरह विकसित कर सकते हैं। जब अंग्रेज सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में भारत आए थे, तो उनके यहां सामंतवाद-पूंजीवाद का संघर्ष चल रहा था, जबकि मुगलकालीन भारत सामंतवाद से आगे बढ़कर व्यापारवाद के स्तर पर पहुंच चुका था। इस तरह हम सामाजिक विकास के स्तर पर अंग्रेजों से आगे थे। हम प्रोद्योगिकी के स्तर पर भी अंग्रेजों से आगे थे। जब अंग्रेज जहांगीर के दरबार में व्यापार करने के लिए पहुंचे, तो उनके पास ऐसी कोई चीज नहीं थी जो बेचने लायक हो। भारत में बनी चीजें उनकी चीजों से कहीं श्रेष्ठ थीं। उन्होंने यहां उनके देश से भी बड़े-बड़े कारखाने देखे जहां हथियारों से लेकर कई चीजें बनती थीं। कुछ यात्रियों ने कहा है कि मुगलकालनी दिल्ली और आगरा उस समय के लंदन और पेरिस आदि पश्चमी शहरों से भी बड़े और समृद्ध थे।

अंग्रेजों ने यहां के व्यापार को नष्ट किया और हमें सामाजिक विकास की दृष्टि से पीछे धकेला। उन्होंने देशी राजा-महाराजों और जमींदारों से मिलकर नया सामंतवाद रचा और देश का शोषण शुरू कर दिया। आजादी के बाद इन्हीं राजे-महाराजों के हाथों सत्ता गई। इसीलिए आज भी वे सब पुरानी समस्याएं ज्यों-की-त्यों बनी हुई हैं। उस व्यवस्था को बदले बिना वे दूर भी नहीं होंगी। यहीं मार्क्सवाद का महत्व है।

समाजवाद
पूंजीवाद मे पैसा पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित होता जाता है, और वे इस पूंजी से और पूंजी बनाने में लग जाते हैं। इस तरह वे संपूर्ण समाज की धनराशि को पूंजी निर्माण में लगा देते हैं। इससे समाज का विकास कुंठित होता है। उदाहरण के लिए, पूंजीवादियों के लिए सड़कें, रेलवे, बंदर, हवाईअड्डे, जहाज, हथियार आदि चीजें बनाना ज्यादा जरूरी होता है। वे पैसा इन्हीं सब में खर्च करते हैं। इसके विपरीता जनता को स्कूल, अस्पताल, कालेज, घर, पानी, भोजन, कपड़ा आदि की ज्यादा जरूरत होती है। पर पूंजीवादी व्यवस्था में इनकी ओर कम ध्यान दिया जाता है। अपने ही देश को ले लीजिए। आजादी मिले 60 साल के बाद भी यहां गरीबी, कुशिक्षा, भूख, बेरोजगारी क्यों है? क्योंकि हम पूंजीवादी ढंग की समाज व्यवस्था रचने में लगे हुए हैं। जहां साम्यवादी शासन रहा है, जैसे बंगाल या केरल, वहां लोगों की हालत कहीं बेहतर है।

समाजवाद पूंजीवादी व्यवस्था को तहस-नहस करके नई व्यवस्था स्थापित करता है जिसमें समाज की संपत्ति का समान वितरण होता है। यह क्रांति के जरिए होता है, क्योंकि समझाने-बुझाने से या हृदय परिवर्तन से पूंजीवादी नहीं मानते। यही ऐतिहासिक अनुभव रहा है रूस का, चीन का, वियतनाम का, क्यूबा का, और उन सभी देशों का जहां क्रांति हुई है।

हमारे देश में भी आजादी के ठीक पहले क्रांति के लिए बहुत ही अनुकूल परिस्थितियां थीं, तब भगत सिंह, सुखदेव, आदि की मेहनत से साम्यवादी दल बन चुका था, और वे अच्छा प्रचार कर रहे थे। मुंबई के नाविकों ने बगावत कर दी थी, और सुभाष चंद्र बोस बर्मा में हिंद फौज का गठन करके उसे लेकर भारत की ओर बढ़ रहे थे।

ऐसे में अंग्रेजों ने हिंदु और मुसलमान को भिड़ाकर क्रांति की अग्नि पर पानी डाल दिया। इसमें मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा का तो हाथ था ही, जाने अनजाने, गांधी, नेहरू, राजाजी आदि सभी नेता भी अंग्रेजों की चाल में फंसते गए। गांधी सुधारवादी नेता थे। अपने वैश्य पृष्ठभूमि के कारण वे पूंजीवादियों के पक्षपाती थे। इसीलिए साम्यवादी गांधीवाद को पसंद नहीं करते। गांधी क्रांति को आगे बढ़ने नहीं देते थे।

यदि भारत ने गांधी के बजाए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के मार्ग से साम्यवादियों के नेतृत्व से आजादी पाई होती, तो देश भी न बंटा होता, और हम आज कहीं अधिक समृद्ध और शक्तिशाली होते, अफगानिस्तान से लेकर थाईलैंड तक और हिमालय से लेकर श्रीलंका तक एक विशाल राज्य के हम सदस्य होते। हमारी आबादी चीन से भी अधिक होती। और सबसे बड़ी बात आज हमें कश्मीर, पाकिस्तान, आदि में आतंकवाद का नजारा न देखना होता।

अस्तु। लंबा लेख लिख मारा। हमें अपने देश के इतिहास का गहराई से अध्ययन करना चाहिए। किसी के बहकावे में आकर अपनी बुद्धि को गिरवी नहीं रखनी चाहिए। यदि अध्ययन करेंगे, तो देश के लिए सच्चा हित कहां है यह समझ में आएगा।

मैं आपको एक बार फिर डा. रामविलास शर्मा की किताबें पढ़ने की सलाह दूंगा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि डा. शर्मा ने ऋग्वेद के पर गहन चिंतन किया है और उसकी बड़े ही सुंदर ढंग से व्याख्या की है। उनकी इस व्याख्या से कुछ लोगों ने उन यह आरोप तक लगाया था कि ये तो संघी हो गए हैं। आपकी अभिरुचि देखकर आपको उनकी यह ऋग्वेद वाली किताब तो बहुत ही पसंद आएगी। यदि आप चाहें, तो इसी से डा. शर्मा का अध्ययन शुरू कर सकते हैं। इस पुस्तक का नाम है इतिहास दर्शन।

संपर्क में रहिए।

सादर,
बालसुब्रमण्यम

कुन्नू सिंह said...

कहानी बदल गया :)

ईतनी बडी टिप्पनीयां देख कर पोस्ट ही चेन्ज हो गया :)

हस हस के लोट पोट हो रहा हूं :)

prithvi said...

बहुत अच्‍छा और उपयोगी ब्‍लाग है. सराहनीय मेहनत कर रहे हैं. हमें भी आपके मार्ग निर्देशन की जरूरत रहेगी ..

पृथ्‍वी नई दिल्‍ली

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