Sunday, March 15, 2009

हिंदी के बढ़ते कदम

भारत के निवासियों और खास करके हिंदी भाषियों के लिए एक खुश-खबरी है। देश की राजभाषा हिंदी अब धीरे-धीरे, पर दृढ़ता से, एक विश्वभाषा के रूप में उभर रही है। इसके साथ ही एक और अच्छी बात देखने में आ रही है -- भारत में ही नहीं, बल्कि सारे विश्व में, अंग्रेजी का प्रभाव कम हो रहा है।

यदि आप भारत के प्रधान मंत्रियों में अंग्रेजी की कुशलता देखें, तो यह बात काफी स्पष्ट हो जाएगी। नेहरू जी अपने समय के श्रेष्ठतम अंग्रेजी लेखक और वक्ता माने जाते थे (सारी दुनिया में)। उनके बाद आए कितने ही प्रधान मंत्री अंग्रेजी बहुत ही कम जानते थे या बिलकुल नहीं जानते थे - लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, देव गोडा, इत्यादि। संभवतः भावी प्रधान मंत्री मायावती के बारे में यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि वे अंग्रेजी बिलकुल ही नहीं जानतीं। और मायवती अंग्रेजी के सामने हाथ फैलाने का प्रयत्न कभी नहीं करतीं। वे अपने खास दबंग अंदाज में पूरे आत्म विश्वास के साथ हिंदी में ही दुनिया के सामने अपने विचार प्रकट करती हैं।

सचाई यह है कि देश से अंग्रेजी का धीरे-धीरे पराभव हो रहा है। राष्ट्रीय राजकाज में अब उत्तरोत्तर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ रहा है, भले ही नौकरशाही तंत्र द्वारा ये भाषाएं उपेक्षित हैं। व्यवसाय भी भारतीय भाषाओं का महत्व समझ रहा है, विशेषकर विदेशी कंपनियां। वे अपना प्रचार उत्तरोत्तर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में करने लगी हैं क्योंकि वे जानती हैं कि यदि अपना माल गांवों में बेचना है, तो अंग्रेजी से काम न बनेगा।

हिंदी फिल्मों, फिल्मी गानों, टीवी चैनलों, रेडियो आदि के कारण देश में हिंदी बड़ी तेजी से पांव फैला रही है। साठ साल से देश में एक समेकित बाजार होने से और देश के विभिन्न भागों के बीच संपर्क बढ़ने से देशी भाषाओं और खास करके हिंदी का महत्व बढ़ गया है और लोग स्वेच्छा से हिंदी सीख रहे हैं। जब किसी मलयाली को किसी पंजाबी से बातचीत करनी होती है और वह मध्यम या निम्न तबके का हो, तो वह हिंदी का ही प्रयोग करता है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस देश में अमीर वर्ग के लोगों से ज्यादा मध्यम और निम्न वर्ग के लोग हैं।

अखबारों को देखें तो देश ही नहीं विश्व भर में सबसे अधिक पढ़ा जानेवाला अखबार हिंदी अखबार दैनिक जागरण है। दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, आदि अन्य हिंदी अखबार उससे कुछ ही कदम पीछे हैं। अंग्रेजी अखबार कहीं नजर नहीं आते। उनके तो पाठक वर्ग निरंतर घट रहे हैं।

टीवी चैनलों को देखें, तो आज तक, समय आदि चैनलों के सामने टाइम्स नाऊ, एनडीटीवी आदि अंग्रेजी चैनलों के टीआरपी रेटिंग कहीं कम हैं। इनमें से अधिक बुद्धिमान चैनलों ने अपने हिंदी चैनल शुरू कर दिए हैं। जबसे कार्टून नेटवर्क, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, अनिमल प्लेनेट आदि ने अपने कार्यक्रम हिंदी में देना शुरू किया है, उन्हें देखनेवालों की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है। पत्रिकाओं ने भी यही रास्ता अपनाया है। इंडिया टुडे, संडे अबसर्वर, आउटलुक आदि अंग्रेजी पत्रिकाओं ने हिंदी संस्करण भी निकाले हैं, जो उन्हीं के अंग्रेजी संस्करणों से ज्यादा ही बिकते हैं, कम नहीं। उदाहरण के लिए हिंदी इंडिया टुडे की 1,07,000 प्रतियां बिकती हैं, जबकि उसी के अंग्रेजी संस्करण की मात्र 76,000।

हां यह जरूर है कि शिक्षा तंत्र (विशेषकर उच्च शिक्षा), नौकरशाही, न्यायतंत्र और व्यवसाय (बिक्री, विज्ञापन और विपणन को छोड़कर) अंग्रेजी के गढ़ बने हुए हैं, पर ये गढ़ बहुत जल्द ढहनेवाले हैं। जैसे-जैसे हिंदी भाषी क्षेत्र में साक्षरता और समृद्धि बढ़ेगी, वहां अच्छे विद्यालयों, कालेजों, पुस्तकों आदि की मांग बढ़ेगी और इन सबसे हिंदी का प्रचार-प्रसार भी होगा। केंद्र सरकार ही नहीं, हिंदी भाषी क्षेत्रों की सरकारें भी निरक्षरता मिटाने के लिए काफी धन व्यय कर रही हैं। सर्व साक्षरता अभियान राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार आदि में काफी सफल रहा है और वहां साक्षरों की तादाद में भारी इजाफा हुआ है। कुछ ही वर्षों में इन हिंदी प्रदेशों में साक्षरों की दर केरल, तमिल नाड आदि के स्तर तक पहुंच जाएगी, यानी लगभग पूर्ण साक्षरता के स्तर पर आ जाएगी। तब हिंदी पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, स्कूलों आदि की बड़ी मांग होगी। अनेक प्रबुद्ध अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक प्रकाशकों ने इसे अभी से भांप लिया है। पेंग्विन इंडिया अब हिंदी में भी पुस्तकें प्रकाशित करने लगा है। हैरी पोटर की किताबों के हिंदी संस्करण भारत में उनके अंग्रेजी संस्करणों से कहीं अधिक बिके हैं।

यही बात होलीवुड की फिल्मों के बारे में भी कही जा सकती है। जबसे वे हिंदी में डब की जाने लगी हैं, वे भारत में हिंदी फिल्मों से भी ज्यादा कारोबार कर रही हैं। पहले जब वे केवल अंग्रेजी में भारत में रिलीज होती थीं, उन्हें बिरले ही कोई देखता था, और वह भी दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों में ही। अब उन्हीं फिल्मों के हिंदी संस्करण छोटे कस्बों तक में देखे जा रहे हैं।

अंग्रेजी यदि यहां अंग्रेजों के जाने के बाद भी बनी हुई है तो इसका मुख्य कारण यह है कि आजादी के समय भारत ने विदेशी पूंजी के साथ और अंग्रेजों के वर्ग-समर्थकों के साथ पूर्णतः संबंध विच्छेद नहीं किया और अंग्रेजों के द्वारा स्थापित नौकरशाही तंत्र, न्याय प्रणाली, शिक्षा प्रणाली आदि को जारी रहने दिया। पर जैसे-जैसे इन संस्थाओं का देशीकरण होने लगेगा, अंग्रेजी भी जाती रहेगी। आखिर लोकतंत्र का अर्थ ही यह है कि हर क्षेत्र में देशी भाषाओं, देशी रीति-नीतियों का पूर्ण प्रयोग हो। भारत में भी जब लोकतंत्र सच्चे अर्थों में सर्वव्यापी हो जाएगा, यहां भी न्याय-तंत्र, उच्च शिक्षा, नौकरशाही, व्यवसाय आदि में अंग्रेजी के लिए कोई स्थान नहीं रह जाएगा। राजनीतिक सत्ता तंत्र से अंग्रेजी की अर्थी पहले ही उठ चुकी है। धीरे-धीरे नौकरशाही, न्यायतंत्र, उच्च शिक्षा, व्यवसाय आदि से भी उठ जाएगी। इसमें कुछ वक्त जरूर लग सकता है।

उधर विश्व मंच में भी अंग्रेजी का पतन शुरू हो गया है। अंग्रेजों का साम्राज्य मिटते ही अंग्रेजी भी अब एक मात्र विश्व भाषा नहीं रह गई है। जर्मनी, चीन, रूस, जापान आदि के महाशक्तियों के रूप में उभरने से और गलत नीतियों और दंभ के चलते अमरीका के नपुंसक हो जाने से विश्व भाषा की पदवी के लिए ये भाषाएं भी दावेदारी करने लगी हैं। हिंदी भी एक दावेदार है। आज हिंदी 700 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है और 20 से अधिक देशों में उसका चलन है।

इसलिए अंग्रेजी के हौव्वे से डरने की जरूरत नहीं है। एक अंग्रेजी कहावत के शब्दों में कहें, तो वह मिट्टी के पैरोंवाला राक्षस है। अंग्रेजी का रोना रोते रहने के बजाए हमें अपनी भाषाओं के प्रयोग को बढ़ाने की ओर ध्यान देना चाहिए। अपने बच्चों को हिंदी सिखानी चाहिए, क्योंकि जब तक वे बढ़े होंगे, हिंदी इतनी महत्वपूर्ण हो चुकी होगी, कि उन्हें अपने हिंदी ज्ञान का भरपूर फायदा मिलेगा।

1 Comment:

lalit said...

"इसलिए अंग्रेजी के हौव्वे से डरने की जरूरत नहीं है। एक अंग्रेजी कहावत के शब्दों में कहें, तो वह मिट्टी के पैरोंवाला राक्षस है। अंग्रेजी का रोना रोते रहने के बजाए हमें अपनी भाषाओं के प्रयोग को बढ़ाने की ओर ध्यान देना चाहिए।"
आपकी बात से सहमत। ब्लॉगिंग की दुनिया में हिंदी की सेवार्थ आपकी इस यात्रा के लिए शुभकामनाएँ!

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