Tuesday, March 31, 2009

पहचान की चूक

अपने इकलौते बेटे की सफेद चादर में लिपटी लाश को हाथों में लिए दरोगाजी मरघट की ओर बढ़ रहे थे। उनकी लाल-लाल आंखों से अनवरत बहती अश्रु-धाराओं से उनकी बड़ी-बड़ी मूंछों का एक-एक बाल पोर-पोर तक भीग गया था।

वे पल भर के लिए भूल गए थे कि जिस पर वे अपना हाथ चला रहे हैं, वह जेल का कोई मुजरिम नहीं बल्की स्वयं उनकी अपनी संतान है। उनके पूरे हाथ की मार लगते ही पांच साल के उस लड़के का सिर तरबूज की तरह फट गया था और वह कटे पेड़ के समान उनके सामने गिर कर मर गया था।

Monday, March 30, 2009

क से कत्लेआम

मैं मुन्नी को वर्णमाला सिखा रहा था। स्लेट पर अ लिखकर मैंने कहा, "यह अ है। अ बोल बेटी, अ से अलगाववादी।"

बेटी ने कहा, "अ, अ से अलगाववादी।"

"शबाश। यह है आ। आ से आतंकवादी।"

"आ से आतंकवादी।"

"अच्छा, अब बोल इ। इ से इमरजेंसी।"

"इ। इ से इमरजेंसी।"

"यह उ है। उ से उठाईगीर।"

"उ से उठाईगीर।"

"यह क्या ऊंटपटांग बातें सिखा रहे हो बच्ची को। दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?" श्रीमती जी तूफान के समान कमरे में घुस आईं और मुझ पर बरस पड़ीं।

मैंने कहा, "इसमें ऊंटपटांग की क्या बात है? क्या तुम नहीं चाहतीं कि मुन्नी वर्तमान परिस्थितियों से वाकिफ हो? क्या उसे खतरनाक खुशफहमी में रखना ठीक होगा? नहीं, उसे सच्चाई मालूम होनी ही चाहिए। तभी वह आने वाले कठिन दिनों में अपनी हिफाजत कर पाएगी।"

और मैंने मुन्नी की पढ़ाई जारी रखी, "यह है क। बोल बेटी, क से कत्लेआम।"

Sunday, March 29, 2009

लोकतंत्र का पांचवां खंभा

चुनाव सिर पर है, और हमें सलाह दी जा रही है कि वोट डालना चाहिए, यह हर मतदाता का कर्तव्य है। वोट डालने से अच्छे उम्मीदवार लोक सभा पहुंचेगे, और अच्छे लोग लोक सभा पहुंचें तो हमारी हालत सुधरेगी, और हमारा देश उन्नति करेगा।

पर क्या बात इतनी सरल है?

केवल वोट डालने से कुछ नहीं बदलेगा। सोच-समझकर वोट डालना होगा। मतदाताओं की भी अपनी संस्थाएं होनी चाहिए, जो पार्टी घोषणा-पत्रों, उम्मीदवारों की छवि और निष्पादन, पार्टियों की नीतियां आदि की छानबीन करे और रिपोर्ट जारी करे, जिन्हें पढ़कर मतदाता सही चयन कर सकें। अभी चयन के लिए मदाताओं के पास पार्टी भाषणबाज, अखबार, टीवी, वेबसाइट आदि ही उपलब्ध हैं, जहां सब मामले का एक पक्ष (पार्टी पक्ष) ही उजागर होता है। इस तरह के मतदाता सेल देशभर में हर मुहल्ले और गांव में होने चाहिए।

यदि मुझे इच्छा हो कि चलो पता लगाएं कि कौन उम्मीदवार कितने पानी में है, तो मेरे घर के दो-चार कदम पर मतदाता सेल होना चाहिए जहां जाकर मैं मेरे चुनाव क्षेत्र से खड़े हो रहे उम्मीदवारों, उनकी पार्टियों और उनके घोषणापत्रों की छानबीन कर सकूं। यहां ऐसे जानकार लोग भी होंगे, जो मुझे निष्पक्ष सलाह दे सकेंगे कि उम्मीदवार कैसे हैं, उनकी पृष्ठभूमि क्या है, कितने पढ़े-लिखे हैं, क्या पढ़ा है उन्होंने, राजनीति में कितना अनुभव है, पिछले पांच साल में कितनी पार्टियां बदल चुके हैं, कितनी बार चुनाव हार चुके हैं, क्या उनके साथ कोई आपराधिक मामला जुड़ा है, इत्यादि, इत्यादि।

इन सेलों का स्वरूप बरसाती मेंढ़कों का सा न होकर, जो केवल चुनावों के समय प्रकट होते हों, स्थायी होना चाहिए और इन्हें साल भर काम करते रहना चाहिए, और पार्टियों और उम्मीदवारों के बारे में जानकारी निरंतर इकट्ठा करते जाना चाहिए और उन्हें लोगों तक पहुंचाते जाना चाहिए। मूल संविधान में प्रेस को यह काम दिया गया था, लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में, पर प्रेस को (जिसमें टीवी जैसे अन्य माध्यम भी शामिल हैं) अब व्यवसाय ने मोल ले लिया है। इसलिए लोकतंत्र के पांचवे खंभे के रूप में मतदाता सेल बनाए जाने की सख्त जरूरत है।

आजकल इंटरनेट का जमाना है, इसलिए इन मतदाता सेलों का कोई केंद्रीय मुख्यालय भी होना चाहिए, जिसके वेबसाइट के माध्यम से भी यह सब जानकारी उपलब्ध रहनी चाहिए, हिंदी में।

इन सेलों को उम्मीदवारों और मतदाताओं का इंटरएक्शन की भी व्यवस्था करानी चाहिए, जिसमें उम्मीदवारों से मतदाता (यानि की मैं और आप) उनके विचारों, पार्टी की नीतियों, कार्यक्रमों, वादों आदि के बारे में सवाल पूछ सकें।

ऐसे मतदाता सेल कौन स्थापित करेगा, उसके कर्माचरी कौन होंगे, उसे चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा, ये सब विचारणीय मुद्दे हैं। मेरा सुझाव है कि इसे निर्वाचन आयोग की छत्र-छाया में लाया जा सकता है, और निर्वाचन आयोग इसके लिए पैसे जुटा सकता है। मतदाताओं से चंदे भी लिए जा सकते हैं। उद्योगों से चंदा स्वीकार नहीं करना चाहिए, वरना, इसका भी वही हस्र होगा जो प्रेस और टीवी का हुआ। इसे करदाताओं के पैसे से ही चलाया जाना चाहिए।

संविधान में संशोधन करके इन मतदाता सेलों को कानूनी हैसियत प्रदान करने पर भी विचार किया जा सकता है।

लालू, मुलायम पासवन का एक होना हिंदी के लिए हितकारी

हिंदी प्रदेश के दो प्रमुख और विशाल राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश के नेता मुलायम, लालू और पासवान का इस चुनाव के लिए एक जुट होना हिंदी के लिए हितकारी हो सकता है।

दोनों कांग्रेस और भाजपा अंग्रेजी परस्त पार्टियां हैं। आजादी के बाद के 60 सालों में इन्हीं पार्टियों का राज रहा है और इन्होंने अंग्रेजी संस्कृति को फैलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। संपूर्ण उच्च शिक्षा जगत, प्रशासन, व्यवसाय और न्यायतंत्र में अंग्रेजी हावी है। अब तो वहां से उसे डिगाने की बात होनी भी बंद हो गई है। इसका मुख्य कारण यह है, अपने 60 साल के राज में इन पार्टियों ने और उनको पैसा देनेवाली ताकतों ने अपने लोगों का ऐसा जाल इन सभी तंत्रों में ऐसा बिछा दिया है कि वहां कोई परिवर्तन की गुंजाईश ही नहीं है। इन दोनों पार्टियों के सत्ता से हटने पर ही नए शक्ति समीकरण स्थापित किए जा सकेंगे, और इन तंत्रों पर से अंग्रेजी का वर्चस्व हटाया जा सकेगा।

अंग्रेजी को हटाना इन तीनों ही नेताओं की पार्टियों और उनके समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि पिछड़े वर्ग के लोगों का देश के उच्च शिक्षा संस्थानों, व्यवसायों, सरकारी नौकरियों और न्यायतंत्र में प्रवेश नहीं हो पा रहा है तो इसका मुख्य कारण है इन सबमें प्रेवेश अंग्रेजी की छलनी से निश्चित किया जाना। निम्न वर्गीय और निर्धन लोगों में, जो सरकारी विद्यालयों में पढ़े होते हैं, अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होता है और वे इस छलनी को पार नहीं कर पाते हैं।

इसलिए यदि सत्ता पर ये नेता काबिज हो पाते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अंग्रेजी की छलनी को दूर करने का प्रयास करना होगा। इससे शिक्षा संस्थाएं, सरकारी नौकरियां और निजी क्षेत्र की नौकरियां आम आदमी के लिए खुल जाएंगी।

जब लालू-मुलायम-पासवान का नया सत्ता-पुंज सत्ता पर आएगा, तो उसे सत्ता में पहुंचानेवाले लोगों को पुरस्कृत करने की जरूरत पड़ेगी। वह अपने लोगों को सत्ता के महत्वपूर्ण जगहों पर रखवाने की कोशिश करेगा। सभी दल यह प्रयास करते हैं। जब भाजपा सत्ता पर आई थी, तो उसने सब महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को रखवाया था, पाठ्यक्रम, इतिहास लेखन आदि तक को अपनी दृष्टि के अनुसार करने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने भी यही किया, पर उसकी ओर हमारा कम ध्यान जाता है, क्योंकि वह शुरू से ही सत्ता में रही है। लेकिन जब वर्तमान लोक सभा पर कांग्रेस का कब्जा हुआ, तो सबसे पहला काम जो उसने अर्जुन सिंह के जरिए किया, वह यह था कि भाजपा के लोगों को सभी शिक्षा संस्थाओं से हटाकर अपने लोगों को वहां सब बैठाना और भाजपा ने पाठ्य पुस्तक आदि में जो परिवर्तन कराए थे, उन सबको खारिज करना और पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से अपनी सोच के अनुसार लिखवाना। जब लालू-मुलायम-पासवान अपने लोगों को शिक्षा संस्थाओं, न्यायतंत्र, नौकरशाही, व्यावसाय (संरकारी उद्यम) आदि में रखने लगेगा, तो वहां सब एक हद तक हिंदी का बीजारोपण हो सकेगा, क्योंकि ये लोग अंग्रेजी के बजाए, हिंदी को अधिक समझते होंगे और चाहेंगे कि जिन संस्थाओं का नियंत्रण उनके हाथ में आ गया है, वह ऐसी भाषा में काम करे, जिसमें उन्हें सहूलियत हो। भाषा की यह खासियत होती है कि सत्तारूढ़ पक्ष की भाषा ही हमेशा प्रचलन में आती है। अंग्रेजी भी ऐसे ही हमारे ऊपर हावी हुई थी। वह शासक वर्ग की भाषा थी और सत्ताहीन लोग (यानी भारतीय) उसे अपनाने को बाध्य हुए। इसी तरह जब हिंदी सत्ता की भाषा बनेगी, लोग (यानी अंग्रेजीदां लोग) उसे अपनाने को मजबूर हो जाएंगे।

मान लीजिए कि मुलायम चुनाव के बाद विदेश मंत्री बन जाते हैं और अमरीकी यात्रा पर निकलते हैं। अब मुलायम जी वाशिंगटन में जो भी बातें करेंगे, वह हिंदी में ही करेंगे। इसी प्रकार जब मुलायम जी अमरीका के नेताओं से वार्तालाप करेंगे तो उन्हें हिंदी दुभाषिए की जरूरत पड़ेगी। इस तरह हमारे विदेश मंत्रालय में हिंदी की जानकारी रखनेवालों की मांग बढ़ेगी, और वहां से अंग्रेजी का एकाधिकार टूट जाएगा।

यह तो बिना प्रयास होगा। अब यदि ये पार्टियां राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदृष्टि का परिचय भी दें, तो ये सारे देश में राष्ट्र भाषा हिंदी के सवाल पर जनमत तैयार करके अंग्रेजी को हटाने का उपक्रम भी कर सकती हैं।

आज यदि आरक्षण की नीति से निम्न वर्गों को कोई खास फायदा नहीं पहुंच रहा है, तो इसका करण यह है कि नौकरियां तो उनके लिए आरक्षित कर दी गई हैं, लेकिन नौकरी के लिए लोगों को चुनने की कसौटियां वही अंग्रेजी-परस्त हैं। चूंकि अंग्रेजी देश के थोड़े लोग ही जानते हैं, नौकरियां इन थोड़े लोगों में ही आरक्षित होकर रह गई हैं। कहना न होगा कि इन थोड़े लोगों में निम्न वर्ग के लोग नहीं के बराबर हैं।

यदि सभी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं (जैसे आईआईएम, आईआईटी, आदि) में प्रेवश की कसौटियां और वहां का कामकाजी और शिक्षण माध्यम हिंदी हो जाए, तो इससे निम्न वर्गों का बहुत फायदा होगा।

अंग्रेजी सीखना एक खर्चीला और दुस्साध्य मामला है जो निम्न वर्गों के बूते की बात नहीं है। इसलिए आईआईएम, आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थाओं के द्वार निम्न वर्गों के लिए उसी तरह बंद हैं जिस तरह आजादी से पहले दक्षिण भारत के कुछ बड़े-बड़े मंदिरों के द्वार उनके लिए बंद थे।

मंदिरों में प्रवेश न मिलने से निम्न वर्गों का कोई खास आर्थिक नुकसान नहीं होता है, लेकिन उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश न मिलने से उनका काफी आर्थिक नुकसान होता है।

यदि कोई निम्न वर्गीय छात्र बहुत कुशाग्र बुद्धि का निकले और इन उच्च शिक्षाओं में प्रवेश पा ही जाए, तो वहां शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी होने से उसे अपार कठिनाई का सामना करना पड़ता है। आईआईटियों में ऐसे एक दो किस्से हुए भी हैं जहां आरक्षित सीटों पर आए छात्रों ने खुदखुशी तक कर डाली थी क्योंकि वे अंग्रेजी में शिक्षण के कारण वहां की पढ़ाई में पीछे पड़ते जा रहे थे। कहा यही गया कि ये बच्चे आईआईटी के स्तर के नहीं थे, चूंकि ये आरक्षित सीटों पर आए थे, पर असल बात यह है कि अंग्रेजी के कारण ही उन्हें इन संस्थाओं की पढ़ाई के समकक्ष रहने में कठिनाई हुई थी, न कि इसलिए कि उनकी बुद्धी का स्तर कम था।

लालू-मुलायम-पासवान के सत्ता में आने पर निम्न वर्गों की एक अन्य मांग पर भी शायद कार्रवाई हो सकेगी। यह है निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण नीति लागू करना। इससे निम्न वर्गों के लिए बहुत सारी नौकरियां उपलब्ध हो सकेंगी। यदि लालू आदि स्पष्ट बहुमत से चुनाव जीतकर आ सके, तो इसे लागू करना उनके लिए संभव होगा। पर केवल नियम बना देने भर से कुछ न होगा। निजी व्यवसाय अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर ही नौकरियां देते हैं। यदि इसे न बदला गया, तो निम्न वर्गीय उम्मीदवारों को कोई फायदा नहीं पहुंच पाएगा।

आज भी सरकारी महकमों में जहां आरक्षण नीति लागू है, कई आरक्षित सीटें यह कहकर नहीं भरी जातीं कि अनुसूचित जातियों, पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जनजातियों में से योग्य व्यक्ति मिलते नहीं हैं। योग्य की यहां परिभाषा “जिन्हें अंग्रेजी आती हो” होती है। यदि सरकारी तंत्रों में प्रेवश के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता को हटाया जा सके, तो ढेरों योग्य उम्मीदार पैदा हो जाएंगे।

यह भी देखा गया है कि निजी क्षेत्र हमारे देश के लाखों, करोड़ों ग्रेजुएटों और पोस्ट-ग्रेजुएटों को नौकरी देने से इसलिए इन्कार करता है क्योंकि उसकी दृष्टि में ये अनऐंप्लोएबल होते हैं, यानी ये नौकरी देने लायक नहीं होते। यहां भी ऐंप्लोएबल की परिभाषा यही होती है कि ये गिटपिट अंग्रेजी बोल सकें। यदि ऐंप्लोएबिलिटी की कसौटियों में से अंग्रेजी ज्ञान को हटाया जाए, इन करोड़ों ग्रेजुएटों आदि में वे सब काबिलियतें और कुशलताएं विद्यमान हैं जो सरकारी दफ्तरों और निजी क्षेत्रों के किसी भी ओहदे पर सफलतापूर्वक नौकरी बजाने के लिए आवश्यक हैं।

असल बात यह है कि देश अब बिना दिशा के आगे बढ़ रहा है। एक ही वर्ग के लोगों के इतने सालों से सत्ता पर बने रहने से देश को उनके हितों और निहित स्वार्थों के लिए चलाया जा रहा है। इन निहित स्वार्थों में से प्रमुख है, उच्च शिक्षा, निजी व्यवसाय, न्यायतंत्र, प्रशासन आदि में अंग्रेजी को बनाए रखना। इस वस्तुस्थिति को बदलने के लिए नए सत्ता वर्गों को दिल्ली में बागडोर संभालनी होगी।

इस चुनाव में इसकी संभावना नजर आ रही है, और यदि हम सब निश्चय कर लें, कि हमें देश में बदलाव लाना है और देश के फंडमेंटेल्स (बुनियादी तत्वों) को नए सिरे से निश्चित करना है, तो इस संभावना को वास्तविकता में भी बदल सकते हैं।

Saturday, March 28, 2009

राष्ट्रीय पशु गीदड़

संसद भवन। मई 2009। चुनाव के बाद नए सांसद संसद में एकत्र हैं। प्रधान मंत्री मायावती सांसदों को संबोधित कर रही हैं। विपक्षी दलों के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी अग्रिम पंक्ति की कुर्सियों में से एक में विराजमान हैं। संसद भवन खचाखच भरा हुआ है। सांसदों की आपसी बातचीत के शोर के कारण किसी की भी बात सुनाई नहीं दे रही है।

अध्यक्ष महोदय माइक्रोफोन पर चिल्लाकर सबको चुप हो जाने को कह रहे हैं। धीरे-धीरे शोर कम हो जाता है। तब मायावती कहने लगती हैं, "इस समय हम एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने के लिए यहां एकत्र हैं। इस मुद्दे के निराकरण के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता है। इसलिए मैं बहुजन समाज पार्टी, उसको समर्थन देनेवाली पार्टियों तथा विरोधी दलों के सांसदों से अपील करती हूं कि वे सब इस मुद्दे के निराकरण में सहयोग दें। वैसे यह कोई राजनीतिक मामला नहीं है, इसलिए संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। मैं चाहती हूं कि इस मुद्दे को जल्दी से जल्दी सुलटाकर संसद अन्य अधिक महत्वपूर्ण कार्रवाइयों की ओर आगे बढ़े, और इस सीधे से मुद्दे पर अनावश्यक बहस करके अधिक समय न बिगाड़े।"

इस छोटी सी भूमिका के बाद प्रधान मंत्री ने उप प्रधान मंत्री रामविलास पासवान को संक्षेप में संसद सदस्यों के सामने विचाराधीन मुद्दे को पेश करने को कहा।

रामविलास पासवान ने बोलना आरंभ किया, "धन्यवाद, प्रधान मंत्री जी। प्रिय सांसदो, आप सबने अखबारों व अन्य संचार माध्यमों से जान लिया होगा कि हमारे देश का राष्ट्रीय पशु बाघ इस वर्ष के आरंभ में विलुप्त हो गया। आखिरी शेर कारबट राष्ट्रीय उद्यान में चोर शिकारियों के हाथों मारा गया। यह एक दुखद घटना है और हमारे जंगलों की शान इस शानदार पशु के विलुप्त होने से हजार गुना कम हो गई है। लेकिन उससे भी ज्यादा पेचीदा मामला यह है कि बाघ के विलुप्त होने से एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया है।

"जैसा कि आप जानते हैं, बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। लेकिन उसके विलुप्त हो जाने से स्थिति एकदम बदल गई है। हमें अब हमारे देश के लिए नया राष्ट्रीय पशु चुनना होगा। इसी महत्वपूर्ण काम को अंजाम देने के लिए हम यहां एकत्र हुए हैं।

"मैं जानता हूं कि राष्ट्रीय पशु का चुनाव एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, परंतु जहां तक मैं समझता हूं, और जैसा कि हमारी माननीय प्रधान मंत्री ने अभी कहा, वह राजनीति से हट कर है। इसलिए इसे राजनीति से अलग रखते हुए सब सांसद इस संवैधानिक संकट को सुलटाने में बहुजन समाज पार्टी की सरकार की मदद करें। विपक्षी दलों के नेता श्री आडवाणी जी से मैं निवेदन करता हूं कि इस मुद्दे की बहस को अब वे आगे बढ़ाएं और यह बताएं कि उनकी पार्टी, यानी भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय पशु के रूप में किस प्राणी का समर्थन करती है।"

लालकृष्ण आडवाणी अपनी खास शैली में मुसकराते हुए बोलने लगे, "माननीय उप प्रधान मंत्री श्री रामविलासन पासन के प्रति मैं आभारी हूं। बाघ का विलुप्त होना हम सबके लिए एक दुखद घटना है। उसके विलुप्त होने से जो संवैधानिक समस्या पैदा हो गई है उसे सुलटाने में हमारी पार्टी सरकार को पूरा समर्थन देगी। जैसा कि आप सब जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी इस देश की संस्कृति, इतिहास, भाषा, रीति-रिवाज आदि की उन्नति के लिए कृतसंकल्प है। अतः हम चाहते हैं कि देश का राष्ट्रीय पशु कोई ऐसा प्राणी हो जो देश की संस्कृति का पूरा प्रतिनिधित्व करे।

"हमारी पार्टी ने इस विषय पर काफी विचार किया है और हमारी राय है कि राष्ट्रीय पशु पूजनीय गौ माता को बनाया जाए। आप सब जानते होंगे कि संविधान में गौ माता की रक्षा शासन का एक मुख्य कर्तव्य बताया गया है। हमारे पूजनीय बापूजी भी गाय के प्रति बड़ी ममता रखते थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गाय की खूब महिमा गाई गई है। वृषभ भोलेनाथ का वाहन है और कृष्ण तो गायों के पालक के रूप में ही सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

"गाय हमारे किसानों का अभिन्न साथी है। गाय पर ही हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। हमारे देश के करोड़ों बच्चों को गाय ही अपने दूध से पोसती है। इसलिए गाय एक तरह से इस देश की माता है। उसे ही हमारी पार्टी राष्ट्रीय पशु के रूप में स्वीकार करती है और आप सबसे मेरी विनम्र विनती है कि इसी निरीह एवं उपयोगी प्राणी को देश के प्रतीक के रूप में गौरवान्वित करके उसके द्वारा हम पर किए गए असंख्य एहसानों को चुकाया जाए।"

आडवाणी जी की बात सुनकर भारतीय जनता पार्टी के सभी सदस्य नारा लगाने लगते हैं, "गो माता की जय हो।"

गृह मंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अंसारी अपनी ओजस्वी वाणी में श्री आडवाणी के विरुद्ध बहस में उतर पड़ते हैं, "विपक्षी नेता आडवाणी जी ने जो बातें कही हैं उनसे हम बिलकुल सहमत नहीं हो सकते। राष्ट्रीय पशु का मामला कोई धार्मिक विषय नहीं है, फिर भी हमें खेद है कि श्री आडवाणी जी ने अपनी पार्टी की आदत के मुताबिक इस सीधे और सरल विषय को भी एक धार्मिक मोड़ देना चाहा है।

"गाय हमारे देश के सभी नागरिकों को कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकती। आपको भूलना नहीं चाहिए कि संविधान के अनुसार यह देश धर्मनिरपेक्ष है और यहां हिंदुओं के अलावा मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों, जैनों व अनेक अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं। उन सबकी संख्या इस देश की कुल आबादी की एक-तिहाई से कम नहीं है। गाय हिंदुओं को भले ही रुचे लेकिन हमारे मुसलमान भाइयों को उसके प्रति कोई विशेष लगाव नहीं है। उनके लिए वह ऊंट, बकरी, भैंस, घोड़ा आदि के समान एक साधारण जानवर ही है। इतने साधारण जानवर को राष्ट्र का प्रतीक बनाना उनको रास नहीं आएगा।

"इसके अलावा भी गाय जैसी साधारण पशु को राष्ट्र का प्रतीक बनाना बिलकुल बेतुकी बात है। राष्ट्र के प्रतीक में लोगों में राष्ट्र के प्रति आस्था जगाने की क्षमता होनी चाहिए और वह देखने-सुनने में गौरवशाली होना चाहिए। मेरा प्रस्ताव है कि इन दोनों गुणों का धनी हाथी को राष्ट्र-पशु बनाया जाए। हमारे माननीय विपक्षी नेता श्री आडवाणी जी को इसमें कोई विशेष आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि हाथी भी गाय जितना ही पवित्र जानवर है। हिंदुओं के प्रिय देवता गणेश तो हाथी के ही प्रतीक हैं।"

अपनी जोशीले पार्टी सदस्य का यह चालाकी भरा प्रस्ताव सुनकर प्रधान मंत्री मायावती धीमे से मुस्कुराईं। बहुजन समाज पार्टी के सांसद मेजें ठोंक-ठोंकर अपनी पार्टी के प्रतीक हाथी को राष्ट्रीय पशु बनाने के मुख्तार अंसारी के प्रस्ताव का समर्थन करने लगे।

तभी संसदाध्यक्ष की अनुमति लेकर कांग्रेस के नेता गुजरात वासी श्री शंकर सिंह वाघेला बड़े आक्रोश के साथ बोल उठे, "गृह मंत्री मुख्तार अंसारी की बात सुनकर मुझे बड़ा आघात पहुंचा है। खेद है कि सत्ता में आने और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद को संभालने के बाद भी ये अपनी पार्टी से आगे सोच नहीं पा रहे हैं। हाथी तो सत्तारूढ़ पार्टी का चुनाव चिह्न है और उसे किसी भी हालत में राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय पशु किसी पार्टी विशेष की बपौती नहीं हो सकता, वह सारे राष्ट्र का प्रतीक है। ऐसा ही कोई पशु राष्ट्रीय पशु हो सकता है जो सारे राष्ट्र को मंजूर हो। मैं सुझाता हूं कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए। सिंह बाघ जितना ही शौर्यवान और आकर्षक पशु है और पुराने जमाने से ही राजा-महाराजाओं का प्रतीक रहा है।"

अपनी बात का अनादर होते देखकर गृह मंत्री मुख्तार अंसारी गुस्से से आग बबूला हो उठे और चीखते हुए बोले:- "वाघेला जी, आपका तर्क बिलकुल निराधार है। क्या आपको पता नहीं कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न कमल इस देश का राष्ट्रीय पुष्प है? यदि देश का राष्ट्रीय पुष्प किसी पार्टी का चुनाव चिह्न हो सकता है, तब हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं हो सकता? यदि हाथी राष्ट्रीय पशु नहीं हो सकता, तो कमल को भी राष्ट्रीय पुष्प नहीं रहने देना चाहिए और उसे भी संविधान में संशोधन करके बदल देना चाहिए।"

कम्यूनिस्ट पार्टी के सीताराम यचूरी बोल पड़े, "मैं वाघेला साहब की इस बात से बिलकुल सहमत हूं कि किसी पार्टी विशेष का चुनाव चिह्न राष्ट्रीय पशु नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन उनकी दूसरी बात कि सिंह को राष्ट्रीय पशु बनाया जाए, बिलकुल व्यावहारिक नहीं है। शायद उन्होंने सिंह का समर्थन इसलिए किया क्योंकि सिंह उनके अपने राज्य गुजरात का निवासी है। इस तरह की क्षेत्रीय मानसिकता से हमें उबरना चाहिए।

"सिंह के विरुद्ध दूसरी जो बात जाती है, वह यह है कि आज सिंह की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। पिछले माह वन विभाग द्वारा की गई गणना के अनुसार गीर के जंगलों में केवल 350 सिंह बचे हुए हैं। इसलिए इसकी संभावना बहुत अधिक है कि आने वाले चार-पांच सालों में सिंह भी इस देश से विलुप्त हो जाएगा। ऐसे में हमें फिर अपना राष्ट्रीय पशु बदलना पड़ेगा। इससे बेहतर है कि हम इस मुद्दे का कोई स्थायी समाधान निकालें।

"मैं समझता हूं कि कोई ऐसे प्राणी को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया जाना चाहिए जो आज की बदली हुई परिस्थितियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता हो। सिंह, बाघ, हाथी आदि सामंती व्यवस्था की याद दिलाते हैं। प्रथम दो तो हिंसा और शौर्य के प्रतीक हैं। आज के व्यावसायिक युग में इन दोनों भावनाओं को कोई स्थान नहीं है। रही बात हाथी की। हाथी कोई उपयोगी पशु नहीं है। उसकी छवि एक ऐसे पशु की है जो उसके मालिक के धन-दौलत को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। हमारे ही देश के सार्वजनिक उद्यमों को उचित ही सफेद हाथी कहा गया है क्योंकि वे धीरे-धीरे देश की संपत्ति को खाए जा रहे हैं। जिस पशु में ऐसी भावना निहित हो, उसे कदापि राष्ट्रीय पशु नहीं बनाना चाहिए।

"मेरा सुझाव है कि हम कोई ऐसे छोटे एवं सफल प्राणी को चुनें जिसमें वर्तमान परिस्थितियों में तरक्की करने के गुण मौजूद हों। मेरा इशारा एक ऐसे पशु की ओर है जो तेज बदलती परिस्थितियों के मुताबिक अपने आपको ढाल लेता है, और जो चालाक भी है, यानी कि गीदड़। आप को ज्ञात होगा कि पंचतंत्र, हितोपदेश आदि प्राचीन ग्रंथों में गीदड़ का खूब गुण गाया गया है। गीदड़ जैसे स्वभाव वाले नेता ही आजकल ज्यादा दिखाई देते हैं। इसलिए राष्ट्र का पशु उनके जैसे स्वभाव वाला हो, तो अच्छा।"

सीताराम यचूरी की इस सुझाव से सारे सांसदों में खुसुरफुसुर मच गई। अध्यक्ष महोदय ने इस खलबली को शांत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। तब तक संसद के सभी मुख्य पक्ष बोल चुके थे। इसलिए संसदाध्यक्ष ने राष्ट्रीय पशु के मामले पर वोट डलवा दिए। देखा गया कि 90 फीसदी वोट गीदड़ के पक्ष में पड़े।

प्रधान मंत्री मायावती ने प्रसन्न मुद्रा से सांसदों को संबोधित करते हुए कहा, "मैं आप सबकी आभारी हूं कि आपने विचाराधीन मुद्दे पर आपसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर वोट किया। मैं गीदड़ को इस देश का नया राष्ट्रीय पशु घोषित करती हूं। इस संबंध का राजपत्र शीघ्र निकाला जाएगा।"

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