मंगलवार, जून 30, 2009
कार्टून : जान देने के अलग-अलग तरीके
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Labels: कार्टून
जब आपके बच्चे का हो यौन शोषण - 3
बाल यौन शोषण के संकेत
बच्चों का यौन शोषण करनेवाले अपराधियों के कुछ प्रारंभिक व्यवहार इस अपराध की पूर्व सूचना दे सकते हैं। बच्चों को इन संकेतों को पहचानना सिखाएं। इनमें से कुछ का विवरण नीचे दिया गया है। बच्चों को बताएं कि यदि उन्हें किसी बड़े व्यक्ति के हाथों निम्नलिखित में से किसी भी तरह का व्यवहार झेलना पड़े, तो वह उस व्यक्ति द्वारा उनके संभावित भावी यौन शोषण की चेतावनी है और उन्हें उस व्यक्ति से सतर्क रहना चाहिए।
अपने बच्चों से पूछें कि क्या उनके साथ किसी ने इस तरह का व्यवहार किया है -
• उनके प्रति अन्य बच्चों से अलग तरह से पेश आना।
• उनके साथ अकेले में समय बिताने की कोशिश करना।
• बहाने बनाकर उन्हें ऐसी जगह ले जाना जहां वे उसके साथ अकेले रहें।
• ऐसी स्थिति पैदा करना कि उन दोनों के अलावा बाकी लोग वहां से चले जाएं।
• उनसे ऐसे कार्य करवाना जिनसे शारीरिक संपर्क बने, जैसे पीठ खुजलवाना, मालिश कराना, या नहाने में उनकी मदद करना।
• उनके निजी अंगों को जान-बूझकर ऐसे छूना मानो अनजाने में छू दिया हो, जैसे खेलते समय उनके स्तनों को स्पर्श करना।
• उनके शरीर को यह कहकर देखना या छूना कि वह उनके शारीरिक विकास की जांच करना चाहता है।
• ऐसे समय में दवाई या मलहम लगाना जब उन दोनों के अलावा वहां और कोई न हो, या जब दवाई या मलहम की जरूरत ही न हो।
• जब वे कपड़े बदल रहे हों या गुसलखाने में हों, तब वहां अचानक आने का दिखावा करना।
• बिना दस्तक दिए उनके कमरे में आना।
• उन्हें स्नानघर और शयनकक्ष का दरवाजा बंद नहीं करने देना।
• उन्हें यौन शिक्षा देने के बहाने अश्लील तस्वीरें दिखाना।
• उनके शरीर और उनके तैयार होने के ढंग के बारे में कामुक बातें करना।
• उनके साथ यौन क्रियाओं के बारे में विस्तार से बातें करना।
• उनसे यह कहना कि तुम खास और अलग हो और सिर्फ तुम ही मुझे अच्छी तरह समझते हो।
• उन्हें खास सुविधाएं देना ताकि वे उसके प्रति एहसानमंद महसूस करें।
• उनके साथ दूसरों से घटिया बर्ताव करना।
• उन्हें दूसरे मित्र न बनाने देना।
• उन्हें ऐसी गतिविधियां न करने देना जो उनकी उम्र के दूसरे बच्चे करते हैं।
• उनसे कहना कि अपने किसी भी नजदीकी व्यक्ति को उनके और उसके बीच हुई बातों के बारे में मत बताना।
• बिना कारण रात को उनके सोने के कमरे में आना।
(... जारी)
इस लेख माला के अब तक के लेखों की कड़ियां
1. विषय प्रवेश
2. कौन होता है शोषक?
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Labels: बच्चों का यौन शोषण
सोमवार, जून 29, 2009
जब आपके बच्चे का हो यौन शोषण - 2
कौन होता है शोषक?
बच्चों का यौन शोषण समाज के हर स्तर पर देखा जाता है। अमीर से अमीर घरों के बच्चे भी इससे बचे नहीं रहते। और यौन शोषकों की फिहरिस्त में दुनिया के चोटी के लोगों से लेकर साधारण से साधरण व्यक्ति शामिल हैं। अभी कुछ दिन पहले दिवंगत हुए पोप स्टार माइकल जैकसन पर भी बाल यौन शोषण का आरोप लगा था। अन्य मशहूर यौन शोषकों में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, मशहूर अंग्रेज विज्ञान कथा लेखक आर्थर क्लार्क आदि शामिल हैं।
शोषक अक्सर वयस्क होता है, मगर वह एक बड़ा या ज्यादा शक्तिशाली लड़का (या लड़की) भी हो सकता है। शोषित तो हमेशा बच्चे ही होते हैं। लड़के और लड़कियां दोनों बाल यौन शोषण के शिकार बनते हैं।
यौन शोषण के अधिकतर मामलों में शोषक बच्चों का कोई परिचित व्यक्ति ही होता है, जिसमें स्वयं उनके माता-पिता भी शामिल हैं। आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि किसी बच्ची का यौन शोषण उसके ही पिता के हाथों हुआ है।
अपने बच्चों को विशेष रूप से इन व्यक्तियों से सवधान रहना सिखाइए –
1. घर के उनसे अधिक बड़े सदस्य से जिनमें अन्य बच्चे भी शामिल हैं
2. पड़ोसी
3. अक्सर घर आनेवाले रिश्तेदार, मित्र, तथा उनके परिवारजन
4. खेलने, पढ़ने या अन्य कारणों से जिन घरों, दुकानों, इमारतों या अन्य स्थलों में बच्चे जाते हैं, वहां मौजूद लोग
5. घर के नौकर
6. ऐसे अजनबी जो बिना कारण उनसे मित्रता जताते हैं
7. खेलने की जगहों में आनेवाले उनसे बड़े बच्चे
बच्चों को हर ओर से खतरा है। बाल यौन शोषक हम-आप जैसा ही कोई व्यक्ति होता है। इतना ही नहीं, वह बच्चों का अत्यंत परिचत, चहेता रिश्तेदार (पिता, चाचा, भाई), पड़ोसी या मित्र हो सकता है। इसलिए बच्चों को हर वक्त सावधान रहने की जरूरत है। जिस तरह सड़क पार करते समय हम बच्चों को सावधान रहना सिखाते हैं, उसी तरह उनके साथ दूसरे लोग जिस तरह का व्यवहार करते हैं, उसे परखने-समझने की क्षमता भी हमें बच्चों में विकसित करनी चाहिए। अनुचित व्यवहार का विरोध करने की दृढ़ता उनमें पैदा करनी चाहिए।
(... जारी)
इस लेख माला के अब तक के लेखों की कड़ियां
1. विषय प्रवेश
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रविवार, जून 28, 2009
नया इंडी रैंक आ गया है, क्या है आपका इंडी रैंक?
इंडीब्लोगर ने अपने सभी ब्लोगों का ताजा इंडीरैंक जारी किया है। क्या है आपका नया इंडी रैंक? यदि आपने अपने ब्लोग को इंडीब्लोगर में जमा नहीं किया हो, तो जरूर कराएं, यह अलग प्रकार का ब्लोग एग्रिगेटर है। उसके बारे में पूरी जानकारी के लिए जयहिंदी का यह लेख देखें -
इंडीब्लोगर - एक अलग प्रकार का ब्लोग एग्रिगेटर
हां तो जयहिंदी का नया इंडीरैंक 78 है, यह पहले 72 था।
कुछ परिचित हिंदी ब्लोगों के इंडीरैंक यहां दे रहा हूं -
रविरतलामी का हिंदी ब्लोग - 84
उड़न तश्तरी - 84
सारथी - 82
हिंदी ब्लोग टिप्स - 82
महाजाल पर चिपलूनकर - 82
प्राइमरी का मास्टर - 81
कबाड़खाना - 81
अनवरत - 81
भड़ास - 79
जयहिंदी - 78
ताउ डोट इन - 74
काजल कुमार के कार्टून - 74
केरल पुराण - 73
एक आलसी का चिट्ठा - 72
कुदरतनामा - 71
घुघूतीबासूती - 69
अप्रवासी उवाच - 59
प्रिंटेफ-स्कैनेफ - 57
बाल जयहिंदी - 57
इंडीब्लोगर के डेटाबेस में कुछ 400 हिंदी ब्लोग हैं। कई सुपरिचित हिंदी ब्लोग अभी उसमें लिस्ट नहीं हैं, जैसे -
मानसिक हलचल
फुरसतिया
रचनाकर
चोखेर बाली
मसिजीवी
यदि इनके लेखक इस पोस्ट को पढ़ रहे हों, तो अपने ब्लोग को इंडीब्लोगर के डेटाबेस में जमा कराएं। इसमें पांच मिनट का समय ही लगता है। इस कड़ी पर जाएं -
http://www.indiblogger.in/signup.php
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Labels: इंडीब्लोगर, इंडीरैंक
क्यों होती हैं रेल दुर्घटनाएं
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Labels: फोटो फीचर
जब आपके बच्चे का हो यौन शोषण - 1
विषय प्रवेश
बच्चों का यौन शोषण एक भयानक और घिनौना अपराध है जो फिर भी हमारे जीवन का एक कटु सच है। चूंकि हम हर वक्त अपने बच्चों के निकट रहकर उन्हें इस घृणित अपराध से बचा नहीं सकते, अपने बच्चों को उन पर मंडराते इस खतरे से अवगत कराकर और उससे निपटने की उचित सलाह देकर हमें उन्हें सावधान और सुरक्षित करना होगा।
इस लेख माला में हम इस महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे।
तो आइए सबसे पहले यह जान लेते हैं कि बाल यौन शोषण किसे कहते हैं।
बाल यौन शोषण किसी भी छोटे या कमजोर व्यक्ति पर किसी बड़े या ज्यादा शक्तिशाली व्यक्ति का ऐसा कोई भी व्यवहार है जिससे शोषक को यौन संतोष मिले।
बाल यौन शोषण के कुछ उदाहरण ये हैं -
1. शोषक द्वारा बच्चे के सामने अपने निजी अंगों का प्रदर्शन
2. बच्चे को स्नान के दौरान या निर्वस्त्र अवस्था में झांककर देखना
3. खुलेआम अश्लील भाषा का प्रयोग
4. अश्लील चित्र लेना या दिखाना
5. बच्चे के निजी अंगों को छूना
6. बच्चे से अपने निजी अंगों को छूने के लिए कहना
7. हस्त-मैथुन
8. बलात्कार
ऐसे कई और आचरण हैं जो यौन शोषण माने जाएंगे। बच्चे को ऐसे हर व्यवहार या स्पर्श का विरोध करने का अधिकार है जिससे उसे असमंजस, अपमान या बेचैनी का एहसास हो।
(...जारी)
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शनिवार, जून 27, 2009
फोटो फीचर : पढ़ी लिखी गाय देशाटन पर निकली
भले ही देश में 60 फीसदी साक्षरता ही हो, यह गाय तो पूर्ण साक्षर है, वह भी अंग्रेजी में। अब सोच रही है पढ़ाई की थकान मिटाने कहां जाऊं, जोधपुर ठीक रहेगा या जयसलमेर, या आगरा जाकर ताज महल देख आऊं या माऊंट आबू जाकर नक्की झील में जलविहार करूं, या पुष्कर में पुण्य कमाऊं या अजमेर की दरगाह में चादर चढ़ाऊं... जरा कन्फूस्ड लगती है। आप ही बताइए न इसे कि सैर-सपाटे के लिए कौन सा स्थान ठीक रहेगा।
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आयोडीन की कमी से एक-चौथाई मानवजाति पीड़ित

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1.6 अरब व्यक्ति आयोडीन की कमी से उत्पन्न विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं। इनमें से एक-तिहाई एशिया के निवासी हैं।
डाक्टर सलाह देते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए हर दिन 150 माइक्रोग्राम आयडीन खाना चाहिए। बाल्यावस्था में आयोडीन की कमी से मस्तिष्क व अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक अंगों का समुचित विकास नहीं हो पाता है। गर्भावस्था में आयोडीन की कमी से बौने व मंदबुद्धि बच्चे पैदा होते हैं। सर्वेक्षणों में देखा गया है कि जिन बच्चों में आयोडीन की कमी थी, उनकी बौद्धिक क्षमता सामान्य बच्चों से 10-15 प्रतिशत कम है। आयोडीन की कमी से घेंघा नामक बीमारी भी होती है, जिसमें गर्दन के आधार पर स्थित थाइरोइड ग्रंथी सूज जाती है।
यद्यपि स्वस्थ रहने के लिए आयोडीन की बहुत कम मात्रा ही आवश्यक होती है, पर बहुत से समुदायों में प्रचलित आहारों में आयोडीन नहीं रहता है। पहाड़ों व बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में रहनेवालों में आयोडीन की कमी सामान्यतः पाई जाती है, क्योंकि वहां की मिट्टी में आयोडीन नहीं होता। बाढ़ का पानी मिट्टी में मौजूद आयोडीन को घुलाकर या तो जमीन के नीचे ले जाता है अथवा सतही बहाव के साथ उसे अन्यत्र पहुंचा देता है। इसलिए यहां उगाई गई फसलों में और पालतू पशु-पक्षियों के मांस-दूध आदि में आयडीन नहीं होता। इस कारण इन भोजनों पर निर्भर मनुष्य भी आयडीन की कमी की चपेट में आ जाते हैं।
समृद्ध देशों में भी आयोडीन की कमी से जुड़ी समस्याएं पुनः सिर उठा रही हैं, खासकर के यूरोप में, जहां लोग दुग्ध उत्पादों व मांस से आयोडीन प्राप्त करते हैं। वहां के पशुपालक पैसा बचाने की फिराक में अपने जानवरों को बिना आयोडीन वाला नमक खिलाते हैं, जो सस्ता होता है। इससे दूध, मांस आदि में भी आयोडीन की मात्रा कम हो जाती है। अंततः मनुष्यों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है।
युनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन व अनेक सरकारों के प्रयासों से खुराक में आयोडीन शामिल करने के महत्व के बारे में अब अधिक लोग सचेत हो रहे हैं। फिर भी आयोडीन की कमी से जुड़ी समस्याओं से पूर्णतः मुक्ति पाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
चूंकि शरीर को स्वस्थ रहने के लिए बहुत कम मात्रा में ही आयडीन की जरूरत होती है, नमक जैसे व्यापक रूप से उपयोग किए जानेवाले किसी खाद्य-सामग्री में आयडीन मिलाकर बेचने से जन-समुदाय को आयडीन की कमी से बहुत हद तक बचाया जा सकता है। अनेक देश यही रणनीति अपना रहे हैं। भारत में भी आडीन मिला हुआ नमक बेचने के संबंध में अनेक कानून बने हुए हैं। पर इनके साथ-साथ हमारे यहां देशी नमक की भी खूब बिक्री होती है, जिसमें आयडीन नहीं होता है। इसलिए इस प्रयास का फायदा केवल उन लोगों को होता है जो आयडीन वाला नमक खरीदते और उपयोग करते हैं। कहना न होगा कि व्यापक गरीबी के कारण देश के अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, महंगा आयोडीनयुक्त नमक नहीं खरीदते और देशी नमक या पत्थर नमक से ही काम चलाते हैं।
आयोडीन युक्त भोज्य-पदार्थों में शामिल हैं, दूध, दही, पनीर, मांस, अंडे, मछली, समुद्र से प्राप्त भोज्य पादर्थ, विशेषकर सीवीड, ब्रेड तथा अन्य बेकरी उत्पाद, और अनाज।
अगति (सेसबेनिया ग्रांडिफ्लोरा) नामक एक उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो तेजी से बढ़ता है और देश-विदेश में सजावटी वृक्ष के रूप में खूब उगाया जाता है। यह उन थोड़े से पौधों में से एक है जिसमें आयडीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके खाने योग्य अंशों के हर 100 ग्राम में 2 मिलीग्राम आयडीन रहता है।
यह 12 मीटर की ऊंचाई प्राप्त करता है और इसकी दो जातियां हैं - एक में लाल फूल होते हैं और दूसरे में सफेद फूल। सफेद फूल वाली अगति को घर के पिछवाड़े के बगीचे में भी उगाया जा सकता है।
अगति काली कपासी मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। वह सूखे को भी झेल सकती है। पहले उसके बीजों को पौधशाला में उगाया जाता है, फिर शिशु पौधों को खेतों में प्रत्यारोपित किया जाता है। तमिलनाडु में इसकी खूब खेती होती है। खेतों में रोपने के दो महीने बाद पौधों को अमोनियम सल्फेट की खाद दी जाती है। इस वृक्ष में सितंबर-दिसंबर में बहार आता है और गर्मियों में इसमें फल लगते हैं।
इसके पत्तों और फूलों में अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।
सामान्य भोज्य सामग्रियों में विद्यमान आयडीन की सूची नीचे दी गई है (100 ग्राम में) –
नमक (आयडीन मिलाया हुआ) – 3000 माइक्रोग्राम
समुद्री भोज्य सामग्री – 66 माइक्रोग्राम
मांस – 26 माइक्रोग्राम
अंडे – 26 माइक्रोग्राम
दुग्ध उत्पाद – 13 माइक्रोग्राम
ब्रेड तथा अनाज – 10 माइक्रोग्राम
फल – 4 माइक्रोग्राम
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शुक्रवार, जून 26, 2009
फोटो फीचर : बारिश नहीं आई? इसे देखकर शुक्र मना लें
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भारत का सबसे अमीर गांव
भारत का सबसे समृद्ध गांव हिमाचल प्रदेश का कोटगढ़ नामक गांव है। यहां के लोगों की औसत आय राष्ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक है। उनकी समृद्धि का राज 78 साल पहले एक अमरीकी पादरी द्वारा उनके गांव की जमीन पर रोपे गए विदेशी सेब के पेड़ों में छिपा है।
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बृहस्पतिवार, जून 25, 2009
फोटो फीचर : देश-विदेश के प्यारे-प्यारे बच्चे - सो स्वीट
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बहुउपयोगी नमक
- बालों को झड़ने से रोकने के लिए बाल्टी भर गुनगुने पानी में चुटकी भर नमक मिलाएं और इस पानी से बाल धोएं।
- लोहे की जंक लगी वस्तुओं से जंक निकालने के लिए उन्हें नमक रगड़कर साफ करें।
- रेशम के वस्त्रों को धोते समय पानी में थोड़ा नमक मिला लें। इससे उनका रंग नहीं उड़ेगा और उनकी चमक और कोमलता बनी रहेगी।
- ढिबिरी में मिट्टी के तेल के साथ थोड़ा नमक भी डालें। इससे न केवल तेल की खपत घटेगी, वरन ढिबिरी अधिक रोशनी भी देगी।
- क्या आप मक्खियों से परेशान हैं? फर्श को नमक मिले पानी से पोंछें, मक्खियां फर्श पर नहीं बैठेंगी।
- लंबे सफर की थकान मिटाने के लिए गुनगुने पानी में नमक मिलाकर पैरों को उसमें रखें। कुछ ही समय में आपकी थकान दूर हो जाएगी।
- बर्तनों से प्याज की गंध छुड़ाने के लिए उन्हें नमकीन पानी से धोएं।
- संचित अनाज, दाल आदि से कीड़े भगाने के लिए उन पर थोड़ा नमक छिड़कें।
- दांतों को मजबूत बनाने के लिए अंजुलि भर नमक पर सरसों के तेल की दो-तीन बूंदें गिराएं और इससे दांतों को मांजें।
- कपड़ों पर से स्याही के दाग छुड़ाने के लिए उन पर नमक रगड़कर गरम पानी से धोएं।
- बच्चों को नहलाते समय पानी में थोड़ा-सा नमक मिला लें। बच्चे चर्म रोगों से बचे रहेंगे।
- फूलों के गुलदस्तों को नमकीन पानी से भरे फूलदानों में रखें। वे कम-से-कम एक हफ्ते तक ताजे बने रहेंगे।
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बुधवार, जून 24, 2009
क्यों बनानी चाहिए आपको अपनी वसीहत
वसीहत बनाने से बहुत लोग कतराते हैं क्योंकि वह उन्हें अपनी मृत्यु की याद दिलाता है। परंतु वसीहत बनाना बहुत जरूरी है। आपके लिए नहीं, वरन उन लोगों के लिए जिन्हें आप चाहते हैं। आपकी इच्छाओं को जाहिर करने के इस सरल कार्य से आप अपने गुजर जाने के बाद अपनी संपत्ति के बंटवारे को लेकर आपके प्रिय जनों में झगड़ा, उलझन, गलतफहमी एवं कटुता के पैदा होने को रोक सकते हैं।
वसीहत के जरिए आप मृत्यु के बाद भी अपनी इच्छाओं को दूसरों से मनवा सकते हैं और इसकी पक्की व्यवस्था कर सकते हैं कि अपने प्रिय जनों में आपकी संपत्ति का बंटवारा आपकी इच्छानुसार होता है।
हर बालिग और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ व्यक्ति वसीहत बना सकता है। वसीहत बनाना बहुत सरल है। यदि आपकी संपत्ति जटिल प्रकार की नहीं है और यदि आप उसे अपने वारिसों में सीधे-सादे ढंग से बांटना चाहते हैं, तो वकील तक की जरूरत नहीं पड़ेगी। किंतु यदि आपके पास अचल संपत्ति हो या किसी व्यवसाय में आपका हिस्सा हो, तब आपको किसी कानूनी विशेषज्ञ की मदद लेकर ही वसीहत बनानी चाहिए।
वसीहत का लिखित होना आवश्यक है। वह हस्तलिखित हो सकती है (स्याही में) अथवा टंकित। वसीहत को टंकित करवाना अधिक अच्छा है ताकि हस्तलेखन के अस्पष्ट होने से वसीहत को समझने में कठिनाई न पैदा हो। वसीहत स्टैंप पेपर पर ही हो, यह भी आवश्यक नहीं है। किसी भी कागज पर आप अपना वसीहत बना सकते हैं। हां इसका जरूर ध्यान रखें कि कागज टिकाऊ और अच्छी किस्म का हो।
वसीहत को किसी खास कानूनी शब्दावली में लिखना भी जरूरी नहीं है। आप किसी भी भाषा में अपनी स्वाभाविक शैली में वसीहत लिख सकते हैं। यदि वसीहत बनानेवाला अशिक्षित हो, तो वह दूसरे किसी से ऐसी भाषा में वसीहत लिखवा सकता है।
किन्हीं दो व्यक्तियों की मौजूदगी में अपनी वसीहत पर हस्ताक्षर करें। ये दो साक्षी वसीहत पर यह लिखकर हस्ताक्षर करें कि आपने उनकी मौजूदगी में वसीहत पर हस्ताक्षर किए हैं। वसीहत को दो व्यक्तियों से साक्ष्यांकित कराना इसलिए जरूरी है, ताकि यह प्रमाणित हो सके कि वसीहत दबाव की स्थिति में नहीं बल्कि स्वेच्छा से लिखी गई है। यह जरूरी नहीं है कि साक्ष्य देने वाले व्यक्तियों को यह बताई जाए कि वसीहत में क्या लिखा है। कानूनी दृष्टि से यह आवश्यक है कि दोनों साक्षी आपकी मौजूदगी में वसीहत पर सही करें। यदि वे एक-दूसरे की मौजूदगी में सही करें तो और भी अच्छा, क्योंकि ऐसी स्थिति में वे एक-दूसरे की गवाही भी दे सकते हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है। यदि ये दोनों साक्षी वसीहत के हर पन्ने पर सही करें तो उत्तम है। किसी पेशेवर डाक्टर को एक गवाह बनाने का यह लाभ भी रहेगा कि उससे यह प्रमाणित हो जाएगा कि वसीहत पर हस्ताक्षर करते समय आप मानसिक दृष्टि से स्वस्थ थे।
यदि वसीहतकर्ता बीमार हो, तो डाक्टर द्वारा वसीहत को साक्ष्यांकित कराना और भी जरूरी होता है। गवाह ऐसे व्यक्तियों को बनाएं जो आपसे उम्र में छोटे हों और स्वस्थ हों (ताकि उनके आपके बाद जीवित रहने की अधिक संभावना रहे)। वसीहत पर गवाही देने वाला व्यक्ति या उसकी पत्नी अथवा पति वसीहत से लाभान्वित नहीं हो सकता। इसलिए गवाही के लिए ऐसे ही व्यक्ति चुनें जिनका आपने वसीहत में उल्लेख नहीं किया हो।
यदि आप कभी नई वसीहत बनाएं, या पुराने में संशोधन करें, तो पुरानी वसीहत को नष्ट कर दें। कभी भी वसीहत की एक से अधिक प्रति न रखें। इससे बाद में विवाद एवं उलझन पैदा होगा।
किसी एक व्यक्ति का नाम निष्पादक (एक्सिक्यूटर) के रूप में वसीहत में उल्लेख करना जरूरी है। यही वसीहत में लिखी आपकी इच्छाओं को अमल में लाएगा। निष्पादक के रूप में उसी व्यक्ति को चुनें जिसे आप जानते हों और जिस पर आपको भरोसा हो और जो आपकी वसीहत का निष्पादक बनने के लिए तैयार हो। निष्पादक वसीहत द्वारा उपकृत व्यक्तियों में से एक भी हो सकता है।
वसीहत में आमतौर पर संपत्ति के बंटवारे की बात की जाती है, पर उसमें आप अपनी अन्य कोई इच्छा भी जाहिर कर सकते हैं, जैसे कि आप अपना अंत्येष्ठि किस प्रकार कराना चाहते हैं। उदाहरण के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी वसीहत में लिखा था कि उनके शरीर की राख को हवाई जहाज पर से भारतवर्ष के ऊपर छितरा दिया जाए।
परंतु संपत्ति के निपटारे के संबंध में आपको पूरी छूट नहीं है और आपकी इच्छाओं को वर्तमान कानूनों से संगत होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए अपनी संपत्ति को वसीहत के जरिए किसे दे सकते हैं यह हिंदू एडोप्शन एंड मेन्टेनेन्स एक्ट, 1956, द्वारा नियंत्रित है। आपके परिवार के जो सदस्य आप पर आश्रित हैं, उन्हें आपकी संपत्ति पर से मेन्टेनेन्स प्राप्त करने का पूरा कानूनी हक है, भले ही आपने अपनी वसीहत में उनका नाम नहीं लिया हो। यदि अपनी सभी संपत्ति अपनी संतानों में से किसी एक के नाम कर दें, तो बाकी संतान आपकी इस वसीहत को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
यदि आप अपनी संपत्ति किसी नाबालिग व्यक्ति को छोड़ रहे हों, तो किसी अभिभावक/न्यास को उसके बालिग होने तक उसके नाम आई संपत्ति का प्रबंध करना होगा। अभिभावक के रूप में ऐसे ही व्यक्ति को चुनें जो इस जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार हो और जो ईमानदार हो।
यद्यपि वसीहत को पंजीकृत कराना आवश्यक नहीं है, पर पंजीकृत करने के कुछ निश्चित लाभ हैं। पंजीकरण अधिकारी के सुपुर्द कर देने से इसकी आशंका नहीं रहती कि बाद में कोई आपकी वसीहत से खिलवाड़ कर सकेगा। आपकी वसीहत को कोई नष्ट भी नहीं कर पाएगा। आपके जीवित रहते आपकी लिखित अनुमति के बिना कोई भी पंजीकरण अधिकारी से आपकी वसीहत प्राप्त नहीं कर सकता। वसीहत का पंजीकरण सब-रिजिस्ट्रार के कार्यालय में कुछ गवाहों की मौजूदगी में होता है। इसके लिए कोई शुल्क भी नहीं लगता। जो व्यक्ति बीमार हो अथवा चल-फिर नहीं सकता हो, उसे कानून सब-रजिस्ट्रार के पास गए बगैर ही अपनी वसीहत पंजीकृत करने की अनुमति देता है। इस अधिकारी को पत्र लिखने पर वह अस्पताल या आपके घर आकर आपकी वसीहत को पंजीकृत कर लेगा।
अंत में एक बार फिर उन बातों को दुहराएं, जिन्हें वसीहत लिखते समय आपको ध्यान में रखना चाहिए:-
- वसीहत में आपका पूरा नाम व पता रहे।
- उसमें इसका उल्लेख रहे कि आप मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ हैं। यदि आपकी उम्र अधिक हो या आप बीमार हों, तो अपनी मानसिक दुरुस्ती का डाक्टरी प्रमाणपत्र संलग्न करें।
- सभी उपकृत व्यक्तियों का पूरा नाम व पता दें।
- अपनी सभी संपत्तियों, ऋणों, खर्चों, दायित्वों आदि का स्पष्ट उल्लेख करें।
- यह देख लें कि वसीहत की भाषा स्पष्ट एवं असंदिग्ध है।
- इसका भी उल्लेख करें कि यह आपका अंतिम वसीहत है।
- वसीहत के निष्पादक का उल्लेख करें (उसकी सहमति लेकर)।
- दो साक्ष्यों के हस्ताक्षर प्राप्त करें और उनसे लिखवाएं कि आपने उनकी मौजूदगी में वसीहत पर हस्ताक्षर किए हैं।
- यदि चाहें तो उसे पंजीकृत कराएं, अन्यथा उसे ऐसी जगह रखें जहां वह सुरक्षित रहे और दूसरों के हाथ न पड़े।
- यदि वसीहत दूसरे से लिखवाया हो, तो उसे ध्यान से पढ़ें और देख लें कि वह आपकी इच्छानुसार लिखी गई है।
- वसीहत पर किसी भी अवांछित निशान, काट-छांट आदि नहीं होने चाहिए।
- हर साल वसीहत दुबारा लिखें। इसी प्रकार हर महत्वपूर्ण पारिवारिक घटना के बाद, जैसे विवाह, जन्म, मृत्यु, तलाक आदि के बाद वसीहत नए सिरे से लिखें और पुरानी वसीहत को नष्ट कर दें।
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मंगलवार, जून 23, 2009
कौन है माइकेला का असली पति?

पता नहीं यह घटना सचमुच घटी थी या नहीं, पर है मजेदार!
जापान के प्रधान मंत्री योशीरो मोरी अमरीका की यात्रा पर जानेवाले थे। वे अंग्रेजी बहुत कम जानते थे। इसलिए उनके सचिवों ने उन्हें अंग्रेजी के कुछ सरल वाक्य रटा दिए, जिनका प्रयोग उन्हें अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा से मिलने पर करना था। इन दो-एक वाक्यों के बाद दोनों ओर के दुभाषिए काम संभाल लेंगे, यही योजना थी।
तो मोरी जी को सिखाया गया कि जैसे ही आप ओबामा के सामने आएं, कह दें, “हाउ आर यू?” (आप कैसे हैं?)
ओबामा जवाब देंगे, “आई एम फाइन, एंड यू?” (मैं ठीक हूं, आप कैसे हैं?)
इसके जवाब में आप कह दें, “मी टू।“(मैं भी।)
मोरी साहब ने ये दोनों वाक्य रट लिए।
कुछ ही समय में मोरी साहब पहुंच गए अमरीका और आ गए ओबामा के सामने। पर उनसे थोड़ी सी चूक हो गई - “हाउ आर यू?” के बजाए उनके मुंह से निकल गया, “हू आर यू?” (आप कौन हैं?)
यह सुनकर ओबामा को भारी धक्का लगा, पर किसी तरह अपने आपको संभालते हुए, मजाक के लहजे में उन्होंने जवाब दिया, “आई एम माइकेलास हसबैंड, हा, हा, हा!” (मैं माइकेला का पति हूं, हा, हा, हा।)
मोरी जी को इसका अर्थ बिलकुल समझ न आया, और उन्होंने रटा हुआ दूसरा वाक्य ही बोल दिया, "मी टू!” (मैं भी।)
इससे ओबामा की बोलती ही बंद हो गई और काफी देर तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही!
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परि और सोफ्टवेयर इंजीनियर
एक जूनियर सोफ्टवेयर इंजीनियर, एक सीनियर सोफ्टवेयर इंजिनियर और उनका टीम लीडर कार से गुडगांव में स्थित अपने दफ्तर जा रहे थे। नाइट शिफ्ट था, इसलिए काफी रात हो चुकी थी। बीच रास्ते उनकी कार बिगड़ जाती है। दूर-दूर तक कोई नहीं है। वे कार से उतर पड़ते हैं और सोचते हैं कि अब क्या करें।
तभी वहां एक परि आती है, और कहती है, “वैसे मैं केवल एक वर ही देती हूं, पर चूंकि तुम लोग तीन हो, मैं तीन वर दूंगी,” और जूनियर इंजिनयर की ओर देखते हुए बोलती है, “तुम उम्र में सबसे छोटे लगते हो, तुमसे शुरू करते हैं, बताओ, क्या वर मांगते हो।"
जूनियर इंजीनियर बहुत दिनों से अमरीका में जाकर बसने की सोच रहा था, पर वीजा नहीं मिल रहा था। उसने कहा, "मुझे कैलिफोर्निया के किसी आईटी कंपनी में पहुंचा दो।"
उसका यह कहना था कि वह तुरंत वहां से गायब हो गया और कैलिफोर्निया पहुंच गया।
बाकी दोनों यह देखकर काफी विस्मित हुए। परी ने अब सीनियर इंजीनियर की ओर देखते हुए कहा, “अब तुम्हारी बारी।”
उसे जर्मनी में नौकरी करने की इच्छा थी, सो उसने कहा, “मैं जर्मनी की किसी आईटी कंपनी में पहुंचना चाहता हूं।”
वह भी गायब हो गया और जर्मनी पहुंच गया।
अब रह गया टीम लीडर, जब परि ने उससे पूछा, "तुम क्या मांगना चाहोगे?"
उसने कहा, “मेरे इन दोनों साथियों को आधे घंटे में ही मेरे आफिस में हाजिर कर दो। हमें एक जरूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट आज ही सब्मिट करना है। ये इस तरह काम छोड़कर अमरीका, जर्मनी नहीं जा सकते।”
क्या है इस कहानी का मोरल? यही कि सीनियर लोगों को पहले मौका देना चाहिए!
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सोमवार, जून 22, 2009
दक्षिण अफ्रीका : एक देश दो चेहरे
रंगभेदी समाज-व्यवस्था के कुपरिणामों से दक्षिण अफ्रीका आज भी मुक्त नहीं हो पाया है और वहां कालों और गोरों की आर्थिक स्थिति में जमीन आसमान का अंतर पाया जाता है।
सदियों की रंगभेदी नीतियों के फलस्वरूप दक्षिण अफ्रीका की सामाजिक स्थिति अत्यंत विषम हो गई है। उसकी कुल आबादी 4.28 करोड़ है, जिसमें से 14 प्रतिशत श्वेत हैं। ये सबके सब काफी समृद्ध हैं। इनकी औसत आय 9,109 डालर है जो पुर्तगाल या दक्षिण कोरिया के नागरिकों की औसत आय के बराबर है। इसकी तुलना में कालों की औसत आय मात्र 992 डालर है। 90 प्रतिशत कालों की आय निर्धनतम पांच प्रतिशत श्वेतों की औसत आय से कहीं कम है।
दक्षिण अफ्रीका में 80 लाख लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये सब काले लोग हैं। लगभग सभी श्वेत-गृहस्थियों को बिजली की सुविधा उपलब्ध है, पर केवल 31 प्रतिशत काले परिवारों को यह मूलभूत सुविधा मिलती है। विडंबना यह है कि दक्षिण अफ्रीका अपनी जरूरतों से 30 प्रतिशत अधिक बिजली पैदा करता है, बाकी बिजली को वह अन्य अफ्रीकी देशों को निर्यात कर देता है।
1994 में जब काले नेता नेलसन मंडेला राष्ट्रपति बने, उन्होंने 5 साल में 1 करोड़ नए घर बनाने और 25 लाख घरों में बिजली पहुंचाने का वादा किया था। पर अब तक 8 लाख से कम घर बन पाए हैं। बिजली रोजाना 1000 घर के हिसाब से पहुंचाई जा रही है, पर इस दर से 2010 में 70-80 लाख घरों में बिजली की रोशनी नहीं होगी।
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रविवार, जून 21, 2009
अजित-राबर्ट-मोना जोक्स
अज रविवार है, छुट्टी का दिन। चलिए थोड़ा हंस लेते हैं। यहां इंटरनेट पर जितने भी अजित-राबर्ट-मोना जोक्स मिले, सब दे दिया है। यदि आप इनके अलावा भी इस वर्ग के और चुटकुले जानते हों, तो टिप्पणियों में बताएं।
***
राबर्ट – बॉस इस आदमी ने हमसे गद्दारी की है।
अजित – इस कुत्ते के एक हाथ में टाइटन की घड़ी और दूसरे हाथ में एचएमटी की घड़ी पहना दो।
रोबर्ट – लेकिन बॉस यह तो गद्दार है।
अजित – हम जानते हैं राबर्ट, इसे बताना है कि यह दो घड़ी का महमान है।
***
राबर्ट – बॉस सोना कहा है (गोल्ड कहां है के अर्थ में)?
अजित – सारी हवेली हमारी है, कहीं भी सो जाओ राबर्ट।
***
राबर्ट और अजित एक नाव में पुलिस से बचकर भाग रहे हैं। अचानक नाव में छेद हो जाती है।
राबर्ट – अब क्या होगा बॉस?
अजित – एक और छेद कर दो राबर्ट।
राबर्ट – एक और छेद?
अजित – एक छेद से पानी अंदर आएगा, दूसरे से बाहर चला जाएगा।
***
अजित – इस गद्दार को शैंपेन में डुबो दो।
रोबर्ट – वह क्यों बॉस?
अजित – यदि शेम से नहीं मरा तो पेइन से मर जाएगा।
***
मोना – बॉस मैं टोनी से शादी कर रही हूं।
अजित – मोना ऐसा बिलकुल मत करना।
मोना – क्यों बॉस?
अजित – उससे यहां मोनाटोनी हो जाएगी।
***
लेकिन मोना नहीं मानती और वह टोनी से शादी कर लेती है। कुछ समय बाद वह जुड़वे लड़कों को जन्म देती है।
राबर्ट – बॉस मोना ने जुड़वे बच्चों को जन्म दिया है।
अजित – ठीक है, हमने उनके लिए नाम भी सोच लिए हैं, एक का पीटर और दूसरे का रिपीटर।
***
कुछ और समय बीतने पर मोना फिर जुड़वे बच्चों को जन्म देती है, इस बार दोनों लड़कियां।
राबर्ट – बॉस इस बार मोना के जुड़वी लड़कियां हुई हैं।
अजित – ठीक है, पहली वाली का नाम केट रख दो और दूसरी का डूप्लिकेट।
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राबर्ट – बॉस आज मैं काम पर नहीं आ सकूंगा, स्टमक एक है।
अजित – अबे बेवकूफ, सभी के पास एक ही स्टमक होता है।
***
अजित – इस गद्दार को दुनिया से आजाद कर दो और उसकी लाश के साइड में सुई घोंपकर पुलिस स्टेशन के सामने फेंक दो।
राबर्ट – लेकिन बॉस लाश के साइड में सुई क्यों घोंपे?
अजित – ताकि पुलिस समझे कि यह सुईसाइड का मामला है।
***
राबर्ट – बॉस मेरी बीबी ने तीन बच्चे जन्मे हैं। उनके नाम क्या रखूं।
अजित – पहले का पीटर, दूसरे का रिपीटर और तीसरे का चिन चिन मिन।
राबर्ट – बॉस तीसरे का नाम चिन चिन मिन क्यों?
अजित – अरे बेवकूफ, दुनिया में पैदा होनेवाला हर तीसरा बच्चा चीनी होता है।
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मिकी माउस – बॉस मुझे रामायण पढ़नी है।
अजित – राबर्ट, इसे वाल पर चिपका दो।
राबर्ट – वह क्यों बॉस?
अजित – तब यह वालमिकी हो जाएगा और इसे रामायण अपने आप आ जाएगी।
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अजित को विदेश यात्रा में जानी थी, पर प्लेन का टिकट नहीं मिला।
अजित – राबर्ट इस बस में हवा भर दो।
राबर्ट – वह किस लिए बॉस?
अजित - तब यह एयरबस बन जाएगी और हम उसमें विदेश चले जाएंगे।
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राबर्ट – बॉस चीन से हू आए हैं।
अजित – उसे गोली मार दो।
राबर्ट - पर क्यों बॉस?
अजित – हू मरकर ह्यूमर बन जाएगा और सबको हंसाएगा।
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मोना से टाइपिंग में बहुत सारी गलतियां हो जाती हैं और अजित उस पर बहुत नाराज हो उठते हैं।
अजित – राबर्ट मोना के दोनों हाथ काट दो।
राबर्ट – मगर क्यों बॉस?
अजित – टाइपिंग नहीं कर पाती, शोटहैंड तो आ जाएगी उसे।
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राबर्ट गैंग के गद्दारों को पकड़कर अजित के सामने पेश करता है।
अजित – इन कुत्तों में कंप्यूटर फिट करके डीबगर चालू कर दो।
राबर्ट – उससे क्या होगा बॉस?
अजित – साले जाकर चेकपोइंट में अटक जाएंगे।
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अजित के सामने गद्दार लाया गया है।
अजित – इसे इरेसर से मार दो।
राबर्ट – उससे क्या होगा बॉस?
अजित – यह मर भी जाएगा मिट भी जाएगा।
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राबर्ट – बॉस आपको कौन सी तीन चीजें सबसे ज्यादा पसंद हैं?
अजित – एक मोना, दूसरी सोना, और तीसरी मोना के साथ सोना।
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राबर्ट गद्दार को अजित के सामने पेश कर रहा है।
राबर्ट – इसका क्या करें बॉस?
अजित – इसे लिक्विड आक्सीजन में डाल दो।
राबर्ट – उससे क्या होगा बॉस?
अजित – लिक्विड उसे जीने नहीं देगा और आक्सीजन उसे मरने नहीं देगा।
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अजित राबर्ट को गद्दार को मारने का आदेश दे रहे हैं।
राबर्ट – इसे वार्निश में डाल दो, मर भी जाएगा फिनिश भी हो जाएगा।
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राबर्ट – बॉस मैं मिशन पर नहीं जा सकता। हेड एक है।
अजित – अबे बेवकूफ, हेड सबके एक ही होता है।
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राबर्ट गद्दार को अजित के सामने पेश करता है।
अजित – इसके एक हाथ में लाल रंग और दूसरे में हरा रंग लगा दो और पुलिस स्टेशन के सामने फेंक आओ।
राबर्ट – लेकिन क्यों बॉस।
अजित – अरे बेवकूफ, इससे पुलिस उसे रंगे हाथों पकड़ लेगी।
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अजित – डायना को कुछ खट्टा पिला दो।
राबर्ट – उससे क्या होगा बॉस?
अजित – इससे वह डायना से डायनासोर बन जाएगी, फिर एक्स्टिंक्ट हो जाएगी।
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राबर्ट – बॉस यह आदमी कुछ बोलता ही नहीं है।
अजित – उसे रिवोल्विंग चेयर पर बिठा दो, पता तो लगे चक्कर क्या है।
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राबर्ट और अजित शिकार करने जंगल में निकल हैं। राबर्ट को मोर दिखाई देता है।
राबर्ट – बॉस, मोर, मोर।
अजित, मोर को गोली मारकर - नोमोर।
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अजित – मोना तुमा लीसा के साथ मत जाओ राबर्ट के साथ जाओ।
मोना – क्यों बॉस?
अजित – नहीं तो तुम मोनालीसा बन जाओगी।
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अजित – राबर्ट बता सकते हो मर्द और माउस में क्या फर्क होता है?
राबर्ट – नहीं बॉस।
अजित – स्टुपिड। कुछ मर्दों के माउसीजी होती है, पर माउस के मर्दजी नहीं हो सकते।
***
राबर्ट – अमरीका में वार हो गया है बॉस।
अजित- उल्लू, उसमें क्या बड़ी बात है, यहां तो हर रोज वार होता है।
राबर्ट – वह कैसे बॉस?
अजित – सिली बॉय! सोमवार, मंगलवार, बुधवार...
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राबर्ट – बॉस मुझे एक मिनिस्टर बनना है।
अजित – तुम एक फाइल में बैठ जाओ, अपने आप कैबिनेट में चले जाओगे।
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अजित अपने आदमियों को मिशन पर भेज रहे हैं।
अजित – पीटर, तुम मोटर में जाओ।
मैनकशा, तुम रिक्शा में जाओ।
माइकेल, तुम साइकेल से जाओ।
और मोना डार्लिंग, तुम मेरे साथ आओ।
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अजित – अच्छा हुआ जोर्ज बुश ने मैनुएल नोरिएगा को पकड़ लिया।
राबर्ट – वह क्यों बॉस?
अजित – नोरिएगा (न रहेगा) बांस न बजेगी बांसुरी।
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राबर्ट – बॉस मोना को आस्ट्रेलिया देखना है।
अजित – उसे पत्थर के साथ बांधकर समुद्र में फेंक दो।
राबर्ट – मगर क्यों बॉस?
अजित – बेवकूफ! ताकि वह डाउन अंडर चली जाए।
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अजति – पीटर को बेबीसिटर भेज दो, टोनी को पोनी पर बिठा दो, मैक को पैक कर दो और मोना डार्लिंग तुम मुझे नाच दिखाओ।
***
अजित – इसे ग्रेट वाल ओफ चाइना ले जाकर फांसी पर चढ़ा दो।
राबर्ट – उससे क्या होगा बॉस?
अजित – बेवकूपफ, यह ग्रेट वाल हैंगिग बन जाएगा।
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शनिवार, जून 20, 2009
आस्ट्रेलिया जोक
मेलबोर्न हवाई अड्डे से विमान बस उड़ने ही वाला था। लगभग सभी यात्री बैठ चुके थे। आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लवादी हिंसा से घबराकर बहुत से भारतीय मेलबोर्न छोड़कर भाग रहे थे। इसलिए विमान खचा-खचा भरा हुआ था।
तभी एक श्वेत आस्ट्रेलियाई महिला विमान में चढ़ी और अपनी जगह ढूंढ़ने लगी। उसका टिकट एकोनोमी क्लास वाला था। परिचारिका ने उसे उसकी जगह दिखा दी।
श्वेत महिला अपनी सीट की ओर बढ़ी पर एकएक ठिठक गई और जोर-जोर से परिचारिका को बुलाने लगी। परिचारिका दौड़ी-दौड़ी आई और पूछा क्या बात है।
श्वेत महिला – मेरी सीट तुरंत बदल दीजिए, मैं यहां नहीं बैठ सकती।
परिचारिका – लेकिन मैडम आपकी सीट में क्या समस्या है?
श्वेत महिला (उसकी सीट के बगल में बैठे भारतीय व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए) - मैं 20 घंटे इस हब्शी के बगल में नहीं बैठी रह सकती।
परिचारिका – मैडक ऐसे कारणों के लिए हम सीट नहीं बदलकर दे सकते।
पर वह महिला भी अड़ गई, खूब हंगामा करने लगी। तब हारकर परिचारिका ने कहा – ठीक है मैडम, मैं देखकर आती हूं, कहीं दूसरी सीट खाली है कि नहीं।
परिचारिका के जाने पर महिला प्लेन के गलियारे में ही खड़ी-खड़ी उस भारतीय यात्री पर नजरों ही नजरों शोले बरसाने लगी।
थोड़ी देर में परिचारिका लौट आई और बोली – हमें खेद है मैडम, कोई भी दूसरी सीट एकनोमी क्लास में खाली नहीं है, आपको अपनी ही सीट पर बैठना पड़ेगा।
वह नस्लवादी महिला भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। बोली - तुम कुछ भी करो, मेरी सीट बदल दो, वरना मैं सारी यात्रा खड़ी-खड़ी ही चली चलूंगी। जाओ विमान के कप्तान को बुला लाओ।
बेबस परिचारिका को ऐसा ही करना पड़ा। कप्तान महोदय आए। उसे सब कुछ बताया गया।
उसने कहा - मैडम, हम सामान्यतः एकनोमी क्लास वालों को बिजनेस क्लास में नहीं बैठाते, पर चूंकि एकोनोमी क्लाम में कोई सीट खाली नहीं है, इसलिए बिजनेस क्लास में देखता हूं कि कुछ व्यवस्था हो सकती है।
और उसने परिचारिका को पता लगाकर आने को कहा कि क्या बिजनेस क्लास में कोई सीट खाली है।
थोड़ी देर में परिचारिका लौट आई और बोली – जी हां, वहां एक सीट खाली है।
यह सुनना था कि उस श्वेत महिला के मुंह पर विजयी मुस्कान फैल गई। उस भारतीय व्यक्ति पर हिकारत की दृष्टि डालते हुए, वह अपना सामान समेटने लगी।
तभी कप्तान ने भारतीय व्यक्ति से कहा – महोदय, आप अपना सामान ले लें, मैं आपको बिजनेस क्लास में आपकी नई सीट दिखा देता हूं।
विमान के सभी यात्री गदगद हो उठे और उन्होंने कप्तान की न्याय प्रियता का तालियों से स्वागत किया।
नस्लवादी महिला यही सोचने लगी, जमीन फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं।
---
ऐसी घटना वास्तविक जीवन में अभी बहुत सालों तक नहीं होने वाली है। फिर भी कल्पना लोक में ही सही किसी भारतीय के साथ विदेशों में न्याय होता देखकर मन को शकून मिलता है। क्या कहेंगे आप?
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फिर कभी न आएगा 7 अगस्त जैसा दिन
इस वर्ष के 7 अगस्त वाले दिन 12 बजकर 34 मिनट और 56 सेकंड को समय और दिनांक की कड़ी इस तरह की बनती है -
12:34:56 07/08/09
यानी, 1 से लेकर 9 तक के अंक आरोही क्रम में आते हैं, इस तरह -
1 2 3 4 5 6 7 8 9
ऐसा दुबारा हमारे जीवन काल में नहीं होगा। इसलिए, यह दिन है खासमखास।
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खाज का घरेलू इलाज
त्वचा के रोग हो जाएं तो परेशानी बहुत होती है। वे जल्दी ठीक भी नहीं होते। खाज ऐसा ही एक रोग है। वह उंगलियों के बीच, कमर और जनन अंगों पर होती है। खाज होने पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें बहुत खुजली होती है। खुजलाने से बड़े घाव बन जाते हैं।
खाज कीटाणुओं की वजह से होती है। ये कीटाणु छूने से फैलते हैं। बीमार के कपड़े और बिस्तर साफ रखें और उन्हें धूप दिखाएं। जो कपड़े शरीर को छूएं, वे गीले नहीं होने चाहिए।
नीम के पत्तों के उबले पानी से नहाएं। नींबू के रस और कपूर को सरसों के तेल में मिलाकर खाज वाले स्थानों पर लगाएं। नीम के कुछ पत्ते उबालकर पीसें। इसमें हल्दी मिलाकर दानों पर गाढ़ा लेप करें। कुछ देर धूप में खड़े रहें। ऐसा तीन दिन करें। इन दिनों नहाएं नहीं। चौथे दिन नहाकर साफ कपड़े पहनें। नीम के पत्ते पीसकर उसमें घी-शक्कर मिलाकर गाढ़ा घोल बनाएं। इसे दिन में २-३ बार खाएं। ऐसा २-३ दिन करें। इन सब उपचारों के बाद भी अगर खाज ठीक न हो, तो डाक्टर को दिखाएं।
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शुक्रवार, जून 19, 2009
फोटो फीचर : क्या दिखा आपको इस चित्र में?
इस चित्र में आपको क्या दिख रहा है? पानी और चट्टान? एक बार फिर ध्यान से देखिए। चित्र के बाईं ओर खास ध्यान दीजिए। अब क्या दिखा आपको? है न कमाल की चीज?
यदि अब भी नहीं जान पाए कि माजरा क्या है, तो इस चित्र को देखिए। यह वही चित्र है, पर अब उसे 90 डिग्री घुमा दिया गया है, यानी खड़ा कर दिया गया है।
अब आप मानेंगे न, हमारी आंखें विश्वास करने योग्य नहीं हैं?
मजे की बात यह है, हमारी आंखें (या मस्तिष्क) केवल एक बार ही धोखा खाती हैं। दुबारा इस चित्र को देखने पर हमें पहाड़ और पानी की जगह नमस्कार की मुद्रा में मां और बच्चे की मूर्ति ही दिखती है। इसलिए, भले ही हमारी आंखें धोखा दे जाएं, हमारा मस्तिष्क स्थिति को संभाल लेता है, और दुबारा वही गलती नहीं होने देता। गनीमत है यह!
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बृहस्पतिवार, जून 18, 2009
रेशम प्राप्त करने की अहिंसक विधि
रेशम के वस्त्र सुंदर एवं टिकाऊ होते हैं, और वे राजा-महाराजाओं और संभ्रांत वर्ग के लोगों में हजारों सालों से लोकप्रिय रहे हैं। कृष्ण भगवान के पीतांबरी वस्त्र तो प्रसिद्ध ही हैं, जो रेशम के बने थे। रेशम बनाने की विधि पूर्वी एशिया के देशों में विकसित हुई, विशेषकर चीन में। रेशम एक प्रकार के पतिंगे के डिंभक (लार्वा) द्वारा स्रावित धागे से बनाया जाता है। इस डिंभक का विकास जब पूरा हो जाता है, तो वह महीन धागे का एक कोष बना लेता है और उसमें विश्राम करता है। रेशम प्राप्त करने के लिए इस कोष को गरम पानी में डालकर डिंभक को मार दिया जाता है और उसके कोष के धागे को उतार लिया जाता है। इस तरह सुंदर रेशम प्राप्त करने के लिए इन निरीह कीड़ों की कुर्बानी देनी पड़ती है।
हमारे देश के पूर्वी राज्यों में, विशेषकर असम में, रेशम प्राप्त करने की एक दूसरी विधि भी प्रचलित है, जिसे ऐरी-पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें कोषस्थ कीड़े को मारा नहीं जाता है और उसे वयस्क पतिंगे में बदलने दिया जाता है। इसलिए यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है। असम और भारत के अन्य पूर्वी राज्यों में ऐरी रेशम का उत्पादन पारंपरिक घरेलू उद्योग के रूप में चलता है और वहां ग्रामीण लोग इससे अतिरिक्त आमदनी कमाते हैं। ऐरी कीड़े को अरंडी (कैस्टर) के पौधों पर उगाया जाता है।
अब रेशम बनाने की यह विधि देश के अन्य राज्यों में भी अपनाई जा रही है। इसका सबसे अधिक प्रचलन गुजरात में देखा जा रहा है। इसके अनेक कारण हैं। गुजरात अरंडी का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहां कपड़ा मिलों की संख्या देश भर में सर्वाधिक है। गांधीजी की जन्मस्थली होने कारण गुजरात में अहिंसा की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। यहां जैन धर्मावलंबियों की भी बड़ी आबादी है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर अहमदाबाद के एक कपड़ा मिल के प्रशिक्षक श्री शशिकांत शुक्ल ने गुजरात में रेशम बनाने के लिए ऐरी पद्धति को विकसित किया है और उसे एक बड़े उद्योग का रूप देने का बीड़ा उठाया है। अमहदाबाद में कपड़ा मिलों की प्रचुरता के कारण रेशम को बुनने-कातने की सबसे कुशल विधि का पता लगाने के लिए यहां पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तरह बने रेशम से तैयार किए गए वस्त्रों की बिक्री की व्यवस्था भी वहां अच्छी तरह हो सकती है। उन्हें अपने काम में खादी ग्राम प्रयोग समिति और ज्ञान नामक संस्था का भी सहयोग प्राप्त हुआ है।
ऐरी रेशम उद्योग के फलने-फूलने से अनेक सामाजिक और आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं। यह अरंडी उगानेवाले किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन हो सकता है। चूंकि यह पद्धति पूर्णतः अहिंसक है, गुजरात के जैन समुदायों में इस तरह के रेशम के वस्त्रों की बिक्री हो सकती है। महिलाएं इस काम को आसानी से अपना सकती हैं और घर के लिए अतिरिक्त आमदनी कमा सकती हैं। इससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बिना अधिक पूंजी निवेश के पैदा किए जा सकते हैं। इस पद्धति को सीखने के लिए निश्शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है।
ऐरी रेशम के आने से अब हम रेशम के सुंदर वस्त्र पहनते समय निरीह कीड़ों की बड़े पैमाने पर हत्या करने के संकोच से बच सकते हैं।
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बुधवार, जून 17, 2009
अंग्रेजी अखबार ने स्वीकारा, भूल हुई
जयहिंदी के एक पिछले पोस्ट में मैंने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ओफ इंडिया द्वारा की गई छापे की एक महा भूल की जानकारी दी थी। इस अखबार ने सोमवार, जून 15, के संपादकीय पृष्ठ को हुबहू मंगलवार, जून 16, के अखबार में दुबारा छाप दिया था।
इसके ठीक अगले दिन, यानी आज बुधवार, जून 17 को, टाइम्स ओफ इंडिया ने इस भूल को स्वीकारा और आज के संस्करण में बहुत ही छोटे टाइपों में दो पंक्तियों वाली यह भूल-सूचना छापी -
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मंगलवार, जून 16, 2009
हिंदी महाजाति की अवधारणा और डा. रामविलास शर्मा
गांधी जी का अधूरा काम वाले पोस्ट में मैंने डा. रामविलास शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस सुझाव का जिक्र किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि समस्त हिंदी भाषी प्रेदश को एकीकृत करके एक विशाल हिंदी राज्य बना देना चाहिए, उसी तर्ज पर जैसे तमिल, मलयालम, गुजराती आदि अन्य भाषाओं के लिए अलग राज्य बनाए गए हैं।
इस लेख की टिप्पणियों में गिरिजेश राव और समीर लाल (उड़न तश्तरी) ने शंका प्रकट की कि यह आज की परिस्थिति में शायद व्यावहारिक नहीं होगा।
तो आइए देखें, कि डा. शर्मा ने उक्त प्रस्ताव क्यों रखा था और वे इसे व्यावहारिक क्यों समझते थे। डा. शर्मा भारत के चोटी के विचारक हैं और उनके कलम से इस तरह का प्रस्ताव बिना मजबूत कारण के नहीं आएगा।
इस संबंध में डा. शर्मा के विचार अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े हैं, पर इसका सबसे सुलझा हुआ विवेचन उनके महा ग्रंथ “भाषा और समाज”, वाणी प्रकाशन, में देखने को मिलता है। इस पुस्तक में उन्होंने भाषा के उद्भव से लेकर हिंदी भाषा के वर्तमान स्वरूप तक की हजारों सालों की यात्रा का अत्यंत सुस्पष्ट विवेचन किया है।
उनका कहना है कि जिस काल में भाषा का उद्भव हुआ था, उस अति प्राचीन काल में मनुष्यों की समाज व्यवस्था आदि साम्यवाद के जैसे थी। यानी मनुष्य छोटे समूहों में रहता था जिसके सभी सदस्य एक दूसरे के साथ खून के रिश्ते से जुड़े होते थे। इसी तरह की समाज व्यवस्था मनुष्य के निकट के संबंधी गोरिल्ला, चिंपैंजी आदि नरवानरों में भी देखने में आती है।
मनुष्यों की इन टोलियों को डा. शर्मा गण का नाम देते हैं, जिसे ट्राइब, कबीला आदि भी कहा जा सकता है। इनमें एक प्रधान पुरुष होता था, और उसके भाई-बहन, बीवी-बच्चे आदि से गण बना होता था। जीविकोपार्जन का मुख्य जरिया शिकार या फल आदि बटोरना होता था। संपत्ति नाम की कोई चीज किसी के पास नहीं थी। केवल जमीन थी, जिसमें यह गण आहार खोजता था। इस पर गण के सभी सदस्यों का, स्त्री-पुरुष दोनों का, समान अधिकार होता था। अपने क्षेत्र की रक्षा गण के सदस्य अन्य मनुष्यों से करते थे। लड़ाई-झगड़े मुख्यतः गणों के बीच होती थी। इन लड़ाइयों में गण के सभी सदस्य भाग लेते थे।
कहने का मतलब है कि वर्ण-व्यवस्था का उद्भव नहीं हुआ था और ऊंच-नीच, जांति-पांति की अवधारणा अभी नहीं बनी थी।
मनुष्य के इस आदि अवस्था की सबसे महान उपलब्धि ऋग्वेद है। यह उसी अवस्था में रची गई थी। डा. शर्मा कहते हैं कि ऋग्वेद में जांति-पांत, ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि का उल्लेख नहीं है। ऋचाएं सभी रचते हैं, लोहार भी, बढ़ई भी, पशुपालक भी, सभी। युद्ध भी सभी लड़ते हैं। क्षत्रियों का अलग वर्ग तब नहीं था। देवी-देवता भी गण के सदस्यों जैसे ही थे, उनका मनुष्यों से ऊंचा स्थान नहीं था। ऋग्वेद के मंत्र रचनेवाले लोग देवी-देवताओं को उसी तरह संबोधित करते हैं, जिस तरह किसी मित्र को या भाई को।
लेकन जब गणों की संख्या बढ़ने लगी, और कृषि आदि का विकास होने लगा और लोगों में संपत्ति इकट्ठी होने लगी, तो समाज व्यवस्था थोड़ी और जटिल हो गई। रक्त संबंधों पर आधारित गण व्यवस्था अपर्याप्त साबित होने लगी। गणों के बीच व्यापार भी बढ़ने लगा और अनेक गण एक ही स्थान में विनिमय आदि के लिए इकट्ठे होने लगे। इन्हीं स्थलों ने बाद में नगरों का रूप लिया। इससे रक्त संबंध कम महत्वपूर्ण होने लगा। विभिन्न पेशे भी बनने लगे, जिनमें से कुछ अधिक महत्वपूर्ण और कुछ कम महत्वपूर्ण समझे जाने लगे। अधिक महत्वपूर्ण समझे जानेवाले पेश अपनाए हुए लोगों में पैसे और अधिकार भी जमा होने लगे। इस तरह समाज में सत्ता और धन का असमान वितरण होने लगा। इसी से वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ। जिनके हाथ में सत्ता और अधिकार था, वे क्षत्रिय कहलाए, क्षत्रियों द्वारा दूसरों पर राज करने को सही ठहराने वाले तर्क-जाल बुननेवालों को ब्राह्मण कहा जाने लगा, व्यापार में संलग्न लोगों को वैश्य कहा जाने लगा, और बाकी सब कारीगरों को शूद्र कहा जाने लगा। यह व्यवस्था भारत में ही नहीं दखी गई है, बल्कि सभी सभ्यताओं में मनुष्य के इस अवस्था में पहुंचने पर यह प्रकट हुई है।
इसी व्यवस्था को सामंतवाद कहा जाता है। धर्म और सामंतवाद का उद्भव एक साथ होता है। धर्म का मुख्य काम समाज में धन और अधिकारों के असमान वितरण को सही ठहाराना होता है।
यजुर्वेद के समय तक आते-आते समाज की यह व्यवस्था पुख्ता हो चुकी थी। युजुर्वेद में वर्ण-व्यवस्था के अनेक प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य शूद्र का उल्लेख भी है। यजुर्वेद ऋग्वेद के लगभग एक हजार साल बाद अस्तित्व में आया है।
मानव विकास की इस अवस्था में सामंतवाद प्रगतिशील भूमिका निभाता है, वह रक्त संबंधों पर आधारित समाज व्यवस्था को और व्यापक बनाकर अनेक गणों को मिलकार एक जाति का निर्माण करता है।
डा. शर्मा ने जाति शब्द का बहुत विशिष्ट प्रयोग किया है। वे इसे अंग्रेजी के नेशन शब्द के समतुल्य के रूप में प्रयोग करते हैं। उनके लिए जाति शब्द अंग्रेजी के कास्ट शब्द के समतुल्य अर्थ बिलकुल नहीं रखता। डा. शर्मा की पुस्तकों को पढ़ते समय इस शब्द के इस खास अर्थ को समझना बहुत जरूरी है।
जाति का गहरा संबंध भाषा से होता है। दरअसल एक ही भाषा बोलनेवाले लोग मिलकर ही जाति का निर्माण करते हैं। जब गण टूट जाते हैं, तो लोगों को जोड़नेवाला तत्व भाषा ही रह जाता है। एक ही भाषा बोलनेवाले लोगों में परस्पर एक विशिष्ट संबंध सा बनता जाता है, जिसे सामंतवाद भी खूब बढ़ावा देता है। जाति और भाषा के प्रारंभिक विकास में सामंतवाद की भी बड़ी भूमिका है।
जब सामंतवाद खूब बढ़ने लगता है, तो वर्ण-व्यस्था भी अपर्याप्त साबित होने लगती है। विनिमय केंद्रों के रूप में बड़े-बड़े नगर बनने लगते हैं। इन नगरों में सभी जातियों के लोग एकत्र होते हैं। नगरों में एक ही जाति के व्यक्ति का अपनी ही जाति के व्यक्ति से कम संपर्क होता है, और उसका नित्य अन्य जाति के लोगों के साथ अधिक संपर्क होने लगता है। इससे जातीय बंधन टूटने लगता है। इसके साथ ही सभी जातियों द्वारा एक ही भाषा के प्रयोग से सभी जाति के लोगों में अपनी भाषा के प्रति विशिष्ट लगाव पैदा होता है, और लोग अपनी पहचान भाषा के आधार पर करने लगते हैं। इस तरह हिंदी, तमिल, बंगाली, गुजराती आदि होने का लोगों को बोध होने लगता है। यह बोध अन्य सभी पहचानों से अधिक प्रबल होता है। इसमें धर्म और जाति (कास्ट) भी शामिल है।
जब यह बोध काफी प्रबल हो जाता है, तो महाजाति का निर्माण होता है। हिंदी, तमिल, गुजराति आदि डा. शर्मा की शब्दावली में महाजातियां हैं।
और राष्ट्र इन्हीं महाजातियों के मिलन से बनता है। इस तरह भारत-राष्ट्र हिंदी, तमिल, गुजराति आदि महाजातियों के मिलन से बना है। इन महाजातियों में से कोई सर्वोपरि नहीं है। सभी समान हैं।
अब इस सवाल को समझना अधिक आसान है कि डा. शर्मा ने सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर इतना जोर क्यों दिया। सभी हिंदी प्रदेशों को एकीकृत करने पर ही हिंदी महाजाति निखर सकेगी। इससे ही हिंदी भाषियों में यह पहचान बनेगी कि हिंदी भाषा बोलने के नाते हम विशिष्ट हिंदी महाजाति, के अंग हैं। और इस बोध के बलवती होने पर ही हिंदी भाषी अपनी महाजाति को विकसित करने की ओर ध्यान देने लगेंगे।
आज स्थिति यह है कि हिंदी क्षेत्र अनेक टुकड़ों में बंटा हुआ है और इनके बीच की गलत राजनीति के कारण हिंदी भाषियों की शक्ति भी बंटी हुई है। इतना ही नहीं हिंदी महाजाति का बोध होना तो दूर, हिंदी भाषी अपने आपको राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, हरियणवी, भोजपुरी, लखनवी आदि के रूप में ज्यादा पहचानते हुए, अपने अधिक विराट हिंदी महाजाति के सदस्य होने की अस्मिता को भूलते जा रहे हैं। उनमें हिंदी महाजाति का अंग होने का बोध तक नहीं है, न ही वे हिंदी महाजाति को सुदृढ़ करने के लिए प्रयासरत ही हैं।
इससे भारत राष्ट्र कमजोर होता है। पहले बताया था का राष्ट्र इन्हीं महाजातियों का जमघट है। यदि इनमें एक भी महाजाति अपनी पूर्ण संभावना को प्राप्त न करे, तो इससे राष्ट्र कमजोर हो जाएगा।
दूसरे हिंदी महाजाति का क्षेत्र भारत के एक अत्यंत सामरिक भाग में है। यहां रह रहे लोगों ने सह्राब्दियों से भारत राष्ट्र की नियति का नियमन किया है। इसे आर्यावर्त (वैदिक काल में), हिंदुस्तान (मुसलमानों के काल में) आदि विशिष्ट नामों से पुकारा गया है। जब भी इस क्षेत्र में रह रही महाजाति सुदृढ़ थी, भारत भी अजेय था, और अन्य महाजातियां भी सुरक्षित थीं। पर जब भी हिंदी महाजाति कमजोर हुई, भारत भी लड़खड़ाने लगा था।
इसलिए हिंदी महाजाति को मजबूत करना भारत राष्ट्र की सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए आवश्यक है। यह तभी संभव है जब सभी हिंदी भाषी प्रदेशों को एकीकृत किया जाएगा और हिंदी भाषियों में एक महाजाति के सदस्य होने का बोध पैदा होगा। इसकी पहली कसौटी होगी हिंदी प्रदेश का राजनीतिक एकीकरण।
अब रहा व्यावहारिकता का प्रश्न। इसका भी जवाब डा. शर्मा ने दिया है। वे कहते हैं कि लोग हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर घबरा जाते हैं, और सोचते हैं कि इतने बड़े क्षेत्र पर एककीकृत शासन भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था को जन्म देगा। लेकिन डा. शर्मा इससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि यदि हिंदी महाजाति का बोध मजबूत हो, और उसके आधार पर हिंदी प्रदेश को एकीकृत किया जाए, जो निष्ठावान प्रशासक इतने बड़े क्षेत्र का भी अच्छी तरह प्रबंध कर सकते हैं। आखिर यदि चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, शेरशाह सूरी, अकबर आदि इतने बड़े प्रदेश को एकीकृत रख सकते थे, तो हम क्यों नहीं।
डा. शर्मा हिंदी प्रदेश की आज की बिखरी हुई अवस्था का ऐतिहासिक कारण भी हमें समझाते हैं। वे कहते हैं कि यह अंग्रेजों की कूटनीति का परिणाम है। अंग्रेजों को इसी प्रदेश में 1857 में हिंदुओं और मुसलमानों के सम्मिलित प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। यह इसका परिचायक है कि 1857 से पहले हिंदी महाजाति का अवबोध लोगों में आज से कहीं ज्यादा मात्रा में विद्यमान था। 1857 के बाद अंग्रेज समझ गए कि इस महाजाति को तोड़े बगैर वे भारत में टिके नहीं रह सकते।
हिंदी महाजाति को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने अनेक प्रकार की कूटनीति अपनाई। इनमें से एक हिंदी भाषा को तोड़ना भी था। ग्रिएर्सन आदि अंग्रेज भाषाविदों को काम पर लगाकर अंग्रेजों ने हिंदी भाषा के हिंदी और उर्दू ये दो रूप कर दिए और यह झूठा प्रचार भी कर दिया कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की। अंग्रोजों ने इस कूटनीति को कितने घातक रूप से अंजाम दिया इसका पूरा ब्योरा डा. शर्मा ने अपनी किताबों में दिया है।
अंततः अंग्रेज अपनी कूटनीति में सफल हुए और पाकिस्तान का उदय हुआ। और इधर भारत में हिंदी महाजाति भी धराशायी हो गई।
डा. शर्मा कहते हैं कि आजाद भारत को अंग्रेजों की इस विषैली नीति को निरस्त करने का प्रयास करना चाहिए और हिंदी महाजाति को एक बार फिर उठाना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने हिंदी प्रदेश के एकीकरण की बात की है।
इसके बारे में एक प्रश्न और उठ सकता है। हिंदी प्रदेश की विशालता को देखकर अन्य भाषा-भाषी घबरा जाएंगे, और वे उसका विरोध करेंगे। इसका भरपूर उत्तर डा. शर्मा ने अपनी दूसरी किताब “भारत की भाषा समस्या” में दी है, जो भी वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
वे कहते हैं कि आज सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों का असली दुश्मन हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेजी है। अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं और उनके बोलनेवालों को, यानी भारतीय राष्ट्र का निर्माण करनेवाली सभी महाजातियों को घुन की तरह कमजोर कर रही है।
यदि सभी भारतयी भाषाओं को यह बात ठीक प्रकार से समझाई जा सके, तो वे हिंदी को अपनी बहन मानेंगे और उसके साथ सहयोग करते हुए अंग्रेजी को इस देश से हटाने में पूरा सहयोग करेंगे। इससे हमारा राष्ट्र और भी मजबूत हो उठेगा।
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अंग्रेजी अखबार ने की छापे की महा भूल
टाइम्स ओफ इंडिया दुनिया का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार होने का दम भरता है।
उससे आज दुनिया की सबसे बड़ी छापे की भूल भी हो गई है। इतनी बड़ी भूल कि उसे अखबारी इतिहास में ऊंचा स्थान मिलेगा।
यदि आप इस अखबार को मंगाते हों, तो आज (जून 16) की प्रति के संपादकीय पृष्ठ को देखें, और साथ में इसी अखबार के कल (जून 15) के संपादकीय पृष्ठ को भी। क्या आपको दोनों पृष्ठों में कोई अंतर नजर आया?
उन लोगों की सुविधा के लिए जो इस अखबार को नहीं मंगाते, मैं दोनों पृष्ठों का चित्र नीचे दे रहा हूं। ध्यान से देखकर बताइए कि दोनों पृष्ठों में कोई अंतर है?
क्या, तारीख के सिवा आपको कोई अंतर नहीं नजर आया? अरे यही तो है महा भूल जो इस अखबार से हो गई है!
इस अखबार ने जून 15 और जून 16 को अपने अखबार में हूबहू एक ही संपादकीय पृष्ठ छाप डाला है! वे ही संपादकीय लेख, वही मुख्य लेख, वे ही पाठकों के पत्र। हर दृष्टि में दोनों पृष्ठ एक-जैसे हैं। केवल तारीख अलग है।
इतनी बड़ी भूल तो एक पृष्ठ वाला नुक्कड़ का अखबार भी नहीं करता। और यह भूल हुई है दुनिया का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार कहलानेवाले टाइम्स ओफ इंडिया से, जिसके पास अपार साधन हैं, दर्जनों प्रूफ-शोधक, उपसंपादक, संपादक, प्रबंध संपादक, कंप्यूटर, और न जाने क्या-क्या अत्याधुनिक तामझाम।
यह अखबार हिंदी, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकार, हिंदी अखबार आदि पर खूब खिल्ली उड़ाता है। आज हमें मौका मिला है इसे ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए, तो खूब हंसिए इस अखबार की इस महा भूल पर, जिसने इसके लिए मुंह छिपाने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी है।
आखिर अखबार का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ संपादकीय पृष्ठ होता है, जिस पर प्रधान संपादक से लेकर, अखबार मालिक तक सबकी नजर जाती है। उसे सजाने-संवारने में सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। और इसी पृष्ठ पर इतनी बड़ी भूल हो गई है। सारा पृष्ठ ही गलत छप गया है! होगी अखबारी इतिहास में इससे बड़ी गफलत की मिसाल!
अब देखना यह है कि यह अखबार कल के संस्करण में क्या सफाई पेश करता है, इस महा भूल के बारे में।
यदि आप कुछ पैसे कमाना चाहते हों, तो इस अखबार के कल और आज के संस्करण खरीदकर संजोकर रखें। ये प्रतियां बेशकीमती हैं। कौन जाने, कल को कोई सनखी कलेक्टर इस गलत छपे संपादकीय पृष्ठ वाली प्रति को आपसे हजारों रुपए देकर खरीद ले जाए!
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सोमवार, जून 15, 2009
गांधी जी का अधूरा काम
अंग्रेजों के समय देश का प्रशासकीय गठन उनके द्वारा विजित प्रदेशों के अनुसार और भारत में उनके आगमन के क्रम के अनुसार किया गया था। सबसे पहले वे कलकत्ता पहुंचे थे, और वहीं उनकी पहली विजय भी हुई थी। 1757 की प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर की दगाबाजी के फलस्वरूप सिराजुद्दौला को हराकर अंग्रेजों ने बंगाल के विशाल प्रदेश को जीत लिया था। वहां उनका पहला प्रांत बना। इसी तरह बंबई और मद्रास में बड़े-बड़े प्रांत बने। 1857 के बाद संयुक्त प्रांत, सेंट्रल प्रोविन्स, नोर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स आदि प्रशासकीय क्षेत्र बने। इन सबका गठन करते हुए अंग्रेजों ने उनमें रह रही जनता की आकांक्षाओं, सुविधाओं और विकास की संभावनाओं का कोई खयाल नहीं रखा।
इसलिए जब कांग्रेस की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई, तो उन्होंने देश में अधिक वैज्ञानिक तरीके से प्रशासकीय इकाइयां गठित करने पर विचार किया। वे तथा उनके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भाषा के आधार पर प्रांत बनना जनता के हित में है। इस तरह एक ही भाषा बोलनेवाले प्रदेशों को संयुक्त करके उन्हें एक प्रांत का रूप दिया गया और वहां सब कांग्रेस की अलग प्रांतीय कार्यालय भी खोले गए।
गांधी जी द्वारा की गई यह व्यवस्था जनता के लिए बहुत ही कल्याणकारी थी। जनता की अस्मिता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू न धर्म है न जाति बल्कि भाषा है। धर्म, जाति, नस्ल आदि लोगों को बांटते हैं, लेकिन भाषा उसे बोलनेवाले सभी लोगों को जोड़ती है। हिंदी को ही ले लीजिए, हिंदी मुसलमानों की भी भाषा है, हिंदुओं की भी, गरीबों की भी, अमीरों की भी, ब्राह्मणों की भी, शूर्दों की भी, स्त्रियों की भी, पुरुषों की भी, बच्चों की भी और बूढ़ों की भी। इस तरह मुसलमान-हिंदू, गरीब-अमीर, सवर्ण-अवर्ण, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, अमीर-गरीब आदि सबको हिंदी जोड़ती है। भाषा उसे बोलनेवालों की आकांक्षाओं को व्यक्त करनेवाला साधन ही नहीं है, उन आकांक्षाओं को कार्यरूप देने का औजार भी है। इसलिए भाषा के आधर पर बनाए गए प्रांतों ने अंग्रेजों के समय से ही प्रगति करना शुरू कर दिया और आजाद भारत में तो यह प्रगति और भी तेज हो गई।
लेकिन गांधी जी ने भाषाई राज्य कायम करने का काम पूरे देश पर लागू नहीं किया। देश के एक बहुत बड़े भाग में हिंदी बोली जाती है, और ठीक वहीं गांधी जी ने इस जन-कल्याणकारी नीति को लागू नहीं किया। इसके आगे चलकर बहुत ही दुखद परिणाम निकले। आज भी हिंदी प्रदेश की जनता सबसे पिछड़ी, सबसे अधिक अशिक्षित और सबसे अधिक विघटित अवस्था में है। गांधी जी को हिंदी भाषा से अगाध लगाव था, पर वे उसके राष्ट्रभाषा वाले स्वरूप को ही पहचान पाए। वे यह नहीं देख पाए कि हिंदी 40 करोड़ लोगों की मातृ भाषा भी है। शायद इस कारण ही उनसे हिंदी प्रदेश की घोर उपेक्षा हो गई।
इसमें हिंदी प्रदेश के नेताओं की अदूरदर्शिता का भी कम बड़ा हाथ नहीं था। भाषाई राज्य कायम करते समय उन्होंने हिंदी भाषियों की तरफ से हिंदी क्षेत्र की मांग नहीं रखी। दूसरा कारण यह था कि हिंदी प्रदेश के सभी प्रमुख नेता अंग्रेजियत में इतने रंगे हुए थे कि वे अपने प्रदेश के हित के बारे में ठीक से सोच ही नहीं पाए। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू आदि का उदाहरण लिया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू छोटी उम्र से ही परदेश में पढ़े थे और उनकी मुख्य भाषा अंग्रेजी हो गई थी।
हिंदी भाषियों का यह दुर्भाग्य रहा है कि उनके अधिकांश नेताओं का हिंदी साहित्य, साहित्यकार, हिंदी भाषा आदि से कम ही सरोकार रहा है। इसकी तुलना में अन्य भाषा क्षेत्रों के नेता स्वयं साहित्यकार थे या अपनी भाषा के अच्छे पारखी।
इस तरह आजादी से पहले ही हिंदी को छोड़कर अधिकांश भाषाओं के प्रांत बन गए थे, और वे द्रुत प्रगति करने लगे, लेकिन हिंदी भाषियों को हिंदी भाषा के आधार पर संगठित नहीं किया जा सका और वे पिछड़ी हालत में बने रहे और आज भी यही स्थिति है।
हिंदी भाषा क्षेत्र के नेताओं में दूर-दर्शिता की कमी के कारण वे जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के महत्व को समझ नहीं सके। यदि आज हिंदी भाषा क्षेत्र हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-अवर्ण, आदि में इतना बंटा हुआ है, तो वह इसलिए कि वहां लोगों को भाषा के आधार पर संगठित न करके, धर्म, जाति, वर्ण आदि विघटनकारी आधारों पर संगठित करने की कोशिश की गई। इसका अवश्यंभावी परिणाम था देश का विभाजन और लोगों का पिछड़ापन। पाकिस्तान की मांग सबसे बुलंद रूप से उत्तर प्रदेश-बिहार से ही आई थी।
आज भी यहां के नेतागण जनता को संगठित करने में हिंदी भाषा के सर्वोपरि महत्व को समझ नहीं सके हैं। मायावती जैसे संकीर्ण-सोच वाले नेता बचे-खुचे उत्तर प्रदेश को और भी पांच टुकड़ों में बांटने की बात कर रहे हैं।
इसके विपरीत डा. रामविलास शर्मा ने यह मांग की थी कि समस्त हिंदी प्रदेश को राजनीतिक स्तर पर एकीकृत करके एक विशाल हिंदी प्रदेश बना देना चाहिए, उसी तरह जैसे आज तमिलनाडु, बंगाल, कर्णाटक, गुजरात, आदि भाषाई प्रांत बने हुए हैं। उनका तर्क यह था कि इससे हिंदी बोलने वालों में अपनी एक पहचान बनेगी और उनके बीच जो विभाजक शक्तियां हैं, जिन्हें धर्म और जाति की राजनीति ने खूब उभाड़ा है, वे मिट जाएंगी।
इससे शासन में लगनेवाला खर्च भी खूब बचेगा। आज हिंदी प्रदेश में आठ दस विधान सभाएं हैं, उतने ही मंत्रिमंडल, सचिवालय, मंत्री-परिषद आदि-आदि तामझाम हैं। इन पर अरबों रुपए खर्च होते हैं, जो सब अधिकांश में व्यर्थ ही जाता है। यदि पूरे हिंदी प्रदेश में एक ही शासकीय केंद्र होता, तो शासन कहीं अधिक कम खर्चे में और अधिक सुचारु ढंग से हो पाता। बचे पैसे से लोगों के शिक्षण, आवास, रोजगार आदि का इंतजाम हो सकता था। हिंदी प्रदेश के लोगों को भी जाति, धर्म आदि के कटघरों से बाहर निकालकर एक शक्तिशाली जन समूह में बदला जा सकता था, जो देश के विकास में सन्नद्ध होकर भारत को सुदृढ़ और अजेय बना देता।
डा. शर्मा ने बड़े ही ओजपूर्ण तरीके से बताया है कि जब 40 करोड़ हिंदी भाषी एक हो जाएं, तो इस देश को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं तोड़ पाएगी। आज एक ओर अमरीका और दूसरी ओर चीन उस पर हावी होने की चेष्टा कर रहा है। एक अरब की आबादी होने के बाद भी विश्व मंच में भारत की कोई पूछ नहीं है। डा. शर्मा ने यह भी दिखाया है कि भारत के दीर्घ इतिहास में जब भी भारत संगठित, सशक्त और सुंदर रहा है, चाहे वह वैदिक समय रहा हो, मौर्यों का समय रहा हो, गुप्तों के समय रहा हो या मुगलों का समय रहा हो, हिंदी प्रदेश, जिसे विभिन्न नाम दिया गया है, जैसे आर्यावर्त, हिंदुस्तान, आदि, एकीकृत था। डा. शर्मा कहते हैं कि यदि हिंदी प्रदेश को एक बार फिर एकीकृत किया जा सके, तो भारत की कई समस्याएं अपने आप ही दूर हो जाएंगी।
इस विचार को उन्होंने अपनी कई किताबों में व्यक्त किया है, जिनमें प्रमुख हैं, भाषा और समाज, और भारत की भाषा समस्या। दोनों वाणी प्रकशन दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं।
अत्यंत खेद की बात है कि स्वयं हिंदी भाषी इस महान, ऋषि तुल्य भारतीय चिंतक के प्रति उदासीन हैं। डा. रामविलास शर्मा को मैं कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि भारतीय महापुरुषों और मार्क्स, लेनिन, माओ आदि विदेशी महापुरुषों की कोटि में रखता हूं। डा. शर्मा के विचारों में भी इन अन्य महापुरुषों के ही समान भारत का कायकल्प करने की क्षमता है, बशर्ते कि हिंदी भाषी लोग, और भारत की उन्नति में विश्वास रखनेवाले अन्य भाषा-भाषी लोग भी, उनकी पुस्तकों को पढ़ें और उनके विचारों पर मनन करें और उन पर कार्रवाई करें।
हमारे सौभाग्य से डां. शर्मा ने लंबी आयु पाई थी और वे अपने जीवन के एक पल का भी अपव्यय न करते हुए, बड़े ही संगठित, और सुव्यवस्थित तरीके से अध्ययन और लेखन में लगे रहे। उनकी सौ से अधिक किताबें प्रकाशित हुई हैं, और एक-एक रत्न हैं। डा. शर्मा का जीवन दर्शाता है कि कलम में समाज को बदलने की कितनी ताकत हो सकती है। पर कलम तभी सफल हो सकता है, जब उसके लिखे हुए शब्दों को लोग पढ़ें। यदि आज के भारतीय समाज में डा. शर्मा के विचारों का कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी आदि के विचारों जितना प्रभाव नहीं देखने में आ रहा है, तो इसका मुख्य कारण हिंदी भाषियों की उदासीनता है, यद्यपि हिंदी भाषियों के प्रति डा. शर्मा को अगाध प्रेम था, और उनकी उन्नति में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी थी।
डा. शर्मा विरोधाभासों के पुलिंदा थे। लंगोट पहनकर शरीर में तेल मलकर अखाड़े की रेत में उतरकर पहलवानों के साथ दो-दो हाथ करने वाले, पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर, दिल से हिंदी के प्रकांड पंडित और महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता, कवि, आलोचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद ये सब विशेषण उन पर समान रूप से लागू होते हैं। वे सचमुच एक ऐसे अद्भुत व्यक्ति हैं जिनके जीवन के बारे में जानकर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और हिंदी भाषियों की उनके प्रति उदासीनता को देखकर भी कुछ कम आश्चर्य नहीं होता।
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रविवार, जून 14, 2009
भक्ति आंदोलन का असली स्वरूप

भक्ति आंदोलन, जिसके शिरोमणि तुलसी थे, मूलतः सामंतविरोधी आंदोलन था। वह सामंतवाद द्वारा हाशिए पर दबा दिए गए वर्गों की आवाज था। भक्ति आंदोलन में समाज के हर वर्ग के लोगों ने नेतृत्व ग्रहण किया है, ब्राह्मण, जुलाहा, मोची, नाईं, बनिया, नारी आदि-आदि। भक्ति साहित्य में इन सब वर्गों की समस्याओं का यथार्थ चित्रण है। इसलिए भक्ति रचनाओं को, जिनमें तुलसी कृत रामचरितमानस भी है, महज धार्मिक ग्रंथ मानना उचित नहीं है। असल में रामचरितमानस उस समय की सामाजिक व्यवस्था का विश्वकोष है।
यहां वहां से रामचरितमानस के दोहों को संदर्भ से अलग करके उद्धृत करना और उनके आधार पर तुलसी को नारी विरोधी घोषित करना या उन पर कोई अन्य लेबल चेपना फूहड़ता होगी और उनके बारे में और भक्ति आंदोलन के संदर्भ व मूल स्वरूप के बारे में अज्ञान का परिचय देना होगा।
तुलसीदास एक महान, मानवतावादी और करुणामय कवि हैं। जिन्होंने रामचरितमानस को पूरा पढ़ा है, उसके इक्के-दुक्के दोहों-चौपाइयों को नहीं, वे इससे सहमत होंगे। नारी की दशा के प्रति उनकी अपार सहानुभूति थी, जो इस चौपाई से स्पष्ट होती है। संदर्भ है, शिव से विवाह होने के बाद उमा अपनी मां से विदा हो रही है, और मां उमा से कहती हैं:-
“जननी उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरम पति देव न दूजा।
बचन कहत भरि लोचन बारी। बहुर लाइ उर लीन्हि कुमारी।
कत बिधि सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरज कीन्ह कुसमउ बिचारी।“
इन पंक्तियों को सदर्भ से अलग करके यों ही पढ़कर आप आसानी से कह सकते हैं – “देखिए, तुलसी नारी को कैसी ऊंटपटांग सलाह रहे हैं। मानो स्त्री का कोई वजूद ही न हो, वह मात्र पति की दासी हो। पति के चरणों की पूजा करना, और यही नहीं, इसे ही नारी का धर्म बताना, कितनी घिनौनी, नारी-विरोधी बात है। जिस ग्रंथ में ऐसा कहा गया हो, उसे तुरंत जला डालना चाहिए।“
अब संदर्भ सहित इन्हीं पंक्तियों की व्याख्या करें। तब हम देखेंगे कि इसमें नारी के प्रति कितनी करुणा, सदाशय, और व्यावहारिक सूझ-बूझ छिपी है। भूलिए मत तुलसी के जमाने में सामंतवाद मजबूत था। पितृसत्तात्मक समाज व्यस्था थी। नारी पुरुष के आश्रय में ही फल-फूल सकती थी। पुरुषों से अलग होने पर नारी का जीवन दयनीय हो उठता था। ऐसे में नारी का परम स्वार्थ और हित इसी में था कि वह हमेशा पुरुष का कृपापात्र बनी रहे। यही सलाह उमा की अनुभवी मां अपनी बेटी को दे रही है। वह एक प्रकार उसे अशीष दे रही है कि तू अपने पति का हमेशा कृपापात्र बनी रह। तेरा पति हमेशा तुझे रखे। और इस अशीष को फलीभूत करने के लिए जो नीति उमा को अपनानी है, वह भी उसे समझाती है -- अपनी पति से बेकार में भिड़ मत, उसकी सेवा कर, उसे खुश रख, ताकि तू भी खुश रहे। यह एक प्रकार से वही नीति है, जो कमजोर हमेशा बलवान के प्रति अपनाता है। बलवान से खामखां उलझना कहीं की बुद्धिमानी नहीं है। तुलसी यहां सही-गलत की व्याख्या नहीं कर रहे, बल्कि स्त्री को सफलता का एक गुर समझा रहे हैं। यदि वे उमा को उकसाते कि तू पति की कोई बात मत मान, हर बात में अपनी स्वतंत्रता की दुहाई दे, तो यह तुलसी की घोर अमानवीय स्वरूप होता। ऐसा स्वरूप हमें समस्त रामचरितमानस में और तुलसी की अन्य रचनाओं में कहीं नहीं मिलता।
इसलिए तुलसी पर फतवा कसने से पहले हमें यह भी देखना है कि वे किस संदर्भ में क्या कह रहे हैं, और किस सामाजिक परिस्थिति और अवस्था में वे हुए हैं।
और इस विषय को छोड़ने से पहले, रामचरित मानस के उपर्युक्त उद्धरण के अंतिम दो पंक्तियों पर भी गौर करें।
एक तरफ पति सेवा का उपदेश, दूसरी तरफ पराधीन नारी के लिए स्वप्न में भी सुख न मिलने पर क्षोभ। जो लोग “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी ताड़न के अधिकारी“ को वेदवाक्य समझते हैं, वे इन पंक्तियों पर भी गौर करें:-
“कत विध सृजी नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं”
तुलसी के रामचरितमानस के संबंध में कुछ अन्य बातें भी ध्यान में रखने की है। इस प्राचीन ग्रंथ के काफी अंश प्रक्षिप्त हैं। उसका काफी अंश उनके समय के बाद के लोगों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए उसमें जोड़ा है। यह रोग भारत में पहले से चला आ रहा है और वाल्मीकी रामायण से लेकर महाभारत तक कई ग्रंथों में इस तरह के प्रक्षिप्त अंश मिलते हैं। यहां तक कहा गया है कि महाभारत में संपूर्ण गीता प्रक्षिप्त है, और बाद की है।
हिंदी के मूर्धन्य समालोचक डा. रामविलास शर्मा के अनुसार “ढोल गंवार...” वाला अंश भी रामचरितमानस में प्रक्षिप्त है। वे कहते हैं -
“ढोल गंवार वाली पंक्ति राम और समुद्र की बातचीत में आई है जहां समुद्र जल होने के नाते अपने को जड़ कहता है और इस नियम की तरफ इशारा करता है कि जड़-प्रकृति को चेतन ब्रह्म ही संचालित करता है। वहां एकदम अप्रासंगिक ढंग से यह ढोल गंवार शूद्र वाली पंक्ति आ जाती है। निस्संदेह यह उन लोगों की करामात है जो यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि नारी पराधीन है और उसे स्वप्न में भी सुख नहीं है।"
वे आगे कहते हैं -
“सामंती व्यवस्था में स्त्रियों के लिए एक धर्म है तो पुरुषों के लिए दूसरा है। तुलसी के रामराज्य में दोनों के लिए एक ही नियम है:
“एक नारिब्रतरत सब झारी।
ते मन बच क्रम पतिहितकारी।“
अर्थात, पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर तुलसीदास ने दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है। लेकिन विशेषाधिकारवालों ने ढोल गँवार आदि जैसी पंक्तियां तो गढ लीं, और एक नारीव्रतरत होने की बात चुपचाप पी गए। वर्तमान समाज में भी नारी अधिकार-वंचित है। पराधीनता में उसे सुख नहीं है। तरह-तरह की मीठी बातों से उसे भुलावा दिया जाता है लेकिन उसकी दासता ढंकी नहीं जा सकती। तुलसीदास के समय में ऐसी परिस्थितियां नहीं थीं कि पराधीनता के पाश तोड़े जा सकें। वह केवल इस पराधीनता पर क्षोभ प्रकट कर सकते थे और ऐसे समाज का स्वप्न देख सकते थे जिसमें पुरुष भी एक-नारी व्रतधारी हों। राम के चरित्र में उन्होंने यही दिखाया। यह दूसरी बात है कि हिंदी आलोचना में जितनी चर्चा सीता के पतिव्रत की है, उतनी राम के पत्नीव्रत की नहीं है।”
(यह उद्धरण डा. रामविलास शर्मा की "परंपरा का मूल्यांकन" नाम की पुस्तक के “तुलसी-साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य” वाले अध्याय से है। पृष्ठ 81-82। इस पुस्तक के प्रकाशक हैं, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
भक्ति आंदोलन और भक्त कवियों पर छिछले स्तर पर टिप्पणी न करके उसके समाजोपयोगी मूल्यों को पहचानना और उन्हें अपने संदर्भ के लिए ढालना ज्यादा उपयोगी होगा।
डा. शर्मा ने तुलसी, सूर, जायसी, कबीर आदि भक्तों पर ससंदर्भ काफी लिखा है। वह सब नारी आंदोलन के लिए ही नहीं, देश निर्माण की सभी परियोजनाओं के लिए काफी प्रासंगिक है।
एक बात और कहना चाहूंगा, धर्म और नास्तिकता के स्वरूप के बारे में।
इन दोनों में सूक्ष्म अंतर है। नास्तिक वह है जो भगवान को नहीं मानता। यह एक निजी मामला है। पर धर्म निजी मामला नहीं है, वह सामाजिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य शाश्वत नहीं होते और सर्वहितकारी भी नहीं होते, इसे समझना जरूरी है। धर्म का सामंतवाद के साथ चोली-दामन का संबंध है। धर्म सामंतवाद के विकसित होने के बाद आता है, क्योंकि उसकी आवश्यकता तभी पड़ती है। धर्म का मूल हेतु सामंतवाद के अंतर्विरोधों को छिपाना और सामंतों के अधिकारों को सही ठहराना है। सामंत वे होते हैं जो समाज के साधनों और संपत्तियों पर, जिनमें नारी भी शामिल है, अधिकार किए हुए हैं। धर्म अनेक तर्क-कुतर्कों से इसे सही ठहराता है। इस मामले में सभी धर्म समान हैं, चाहे वह हिंदू धर्म हो, इस्लाम हो, बौध-जैन-ईसाई-सिक्ख धर्म हों। धर्म का उद्देश्य यथास्थिति को बनाए रखना, यानी सामंतवाद को बनाए रखना होता है।
भक्ति आंदोलन यथास्थिति को पलटने के लिए निम्न वर्गों द्वारा चलाया गया महान आंदोलन है। उसके कई मूल्य आज के पद-दलितों के लिए, जिनमें नारी भी शामिल है, बहुत ही प्रासंगिक हैं। इसलिए नारी आंदोलन को रामचरितमानक का अवमूल्यन नहीं करना चाहिए, बल्कि उससे अपने फायदे की बातें ढूंढ निकलानी चाहिए।
जब सामंतवाद को कमजोर करके पूंजीवाद समाज पर हावी हो जाता है, यथा स्थिति भी मूलभूत रूप से बदल जाती है, और पुराने धर्म अब अनुपयोगी हो जाते हैं। इसीलिए सभी पूंजीवादी देशों में धर्म समाप्त सा हो गया है, और उनके स्थान पर मानवतावाद, विज्ञानवाद, प्रौद्योगिकीवाद, बाजारवाद, समाजवाद, आदि अनेक अन्य मूल्य-ढांचे अस्तित्व में आए हैं।
भारत में भी जब सामंतवाद खत्म हो जाएगा, तो यही सब होगा। इसलिए देश को आगे ले जाने में जिन्हें रुचि है, उनका असली लक्ष्य सामंतवाद को खत्म करना होना चाहिए। सामंतवाद खत्म होते ही, उसके मूल्य और उसका वैचारिक आधार यानी धर्म, भी समाप्त हो जाएगा। इसीलिए कार्ल मार्क्स ने कहा था, धर्म गरीबों के लिए अफीम के समान है। वह उन्हें नशे में रखता है और असली समस्याओं पर विचार करने से रोकता है। लेकिन जब लोग धर्म के असली स्वरूप को समझ लेते हैं, तो उन पर से धर्म का नशा भी टूट जाता है।
इसलिए आज धर्म के नाम पर देश-विदेश में जो हिंसा का तांडव मचा हुआ है, वह निरर्थक ही नहीं मूर्खतापूर्ण भी है।
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बृहस्पतिवार, जून 11, 2009
हिंदी सचमुच विश्व भाषा बन चुकी है
हिंदी सचमुच विश्व भाषा बन चुकी है, हालांकि हमारे देश में उसकी अब भी अवगणन होती है। मैं अपना एक अनुभव सुनाता हूं जिससे आपको पता चलेगा कि हिंदी वास्तव में कितनी फैल गई है विदेशों में।
जिन लोगों ने मेरा प्रोफाइल देखा है, वे जानते होंगे कि मैं हिंदी अनुवादक हूं। अनुवाद का काम प्राप्त करने के लिए मैंने इंटरनेट पर कई जगह अपना बायोडेटा डाल रखा है, जिसमें मेरी अर्हताएं, अनुवाद का अनुभव, संपर्क जानकारी आदि रहते हैं।
एक दिन मुझे ईरान की एक स्त्री से ईमेल मिला। उसने इंटरनेट में खूब खोजबीन करके मेरा अता-पता ढूंढ़ निकाला होगा। इसमें वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि अनुवाद एजेंसियों के कर्मचारी साधारणतः महिलाएं ही होती हैं, और वे मेरे प्रोफाइल से ईमेल पता प्राप्त करके मुझे आए दिन ईमेल भेजती रहती हैं। पर यह ईमेस किसी अनुवाद एजेंसी से नहीं था। यह ईरान की एक छात्रा का पत्र था। अनोखी बात यह थी, कि पत्र हिंदी में था, और वह भी देवनागरी में लिखा हुआ। अब भारत में ही 90 फीसदी हिंदी भाषी कंप्यूटर पर हिंदी कैसे लिखी जाती है, यह नहीं जानते। पर ईरान की इस छात्रा का पत्र देवनागरी लिपि में हिंदी में था।
मैं यह देखकर सचमुच हैरान रह गया और मैंने पत्र को दो-तीन बार पढ़ डाला। तब मेरा आश्चर्य और भी बढ़ गया। पत्र में उस छात्रा ने हिंदी व्याकरण के एक गूढ़ विषय के बारे में मेरी राय मांगी थी। और ऐसा गूढ़ विषय कि उसे जवाब लिखने के लिए मुझे कामता प्रसाद गुरु के हिंदी व्याकरण से लेकर किशोरीदास वाजेपेयी के हिंदी शब्दानुशासन तक कितने ही व्याकरण ग्रंथों को उलटना-पलटना पड़ा।
इस छात्रा को हिंदी से इतना लगाव हो गया था कि उसने अपना एक हिंदी उपनाम तक रख लिया था, सपना चांदनी, जो उसके ईरानी नाम का हिंदी रूपांतर था। जैसे-जैसे इस छात्रा से मेरा परिचय बढ़ता गया, मैंने उससे पूछ ही डाला कि तुमने इतनी अच्छी हिंदी कैसे सीख ली?
उसने इसके जवाब में बड़ी ही मजेदार बात बताई। उसे हिंदी फिल्मों से बेहद रुचि है। शाहरुखान पर तो वह दीवानी है, और उसके हर फिल्म को देखती है। उसने मुझे बताया कि वह पहले शाहरुख खान के संवाद बिलकुल समझ नहीं पाती थी, क्योंकि शाहरुख संवाद बहुत तेज-तेज बोलता है। उसके संवाद समझने के लिए ही उसने हिंदी सीखना शुरू किया। हिंदी फिल्मों के शीर्षक हिंदी और उर्दू दोनों में आते हैं। फारसी लिपि उर्दू लिपि से बहुत मिलती-जुलती है। इसलिए उर्दू में लिखे शीर्षक वह आसानी से पढ़ लेती है। और इन उर्दू शीर्षकों को उनके समांतर के हिंदी शीर्षकों से तुलना करके उसने एक-एक करके हिंदी वर्णमाला के सभी अक्षरों को पढ़ना-लिखना सीख लिया। देखिए, कितनी लगन और प्यार है इस विदेशी छात्रा में हिंदी के प्रति। कहते हैं न, जहां चाह हो, वहां राह भी निकल ही आती है। इस लड़की ने इस कहावत को सिद्ध करके दिखा दिया।
मैं इस छात्रा के हिंदी प्रेम से इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसे कामता प्रसाद गुरु के हिंदी व्याकरण की एक प्रति अपने खर्चे पर भेज ही दी। मुझे पूरा विश्वास है कि यह लड़की इस किताब का सही उपयोग कर सकेगी।
यहां उसके द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियां दे रहा हूं, जिससे आपको भी अंदाजा हो जाएगा कि हिंदी पर उसकी पकड़ कितनी मजबूत है –
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नमस्ते बाला जी
बहुत ख़ुशी हुई आप का जवाब देख कर अच्छा, तो आप यात्रा पे गए थे। ठीक है, मुझे आशा है एक अच्छा सा यात्रा हुआ होगा।
आप ने देखी मेरी ग़लती ? मैं ने ख़ुद आज देख ली। जब मैं पिछली चिट्ठी लिख रही थी, पुस्तक आने की वजह से इतनी ख़ुश थी कि अपना वाक्य ग़लत लिखा। " जो पुस्तक आप ने भेजी थी मुझको मिली " की जगह पर लिखा " जो पुस्तक आप ने भेजा था मुझको मिली "
मैं और भी इन्तिज़ीर करूँगी आप के विस्तार जवाब का, मगर ये सारे शब्द हैं (पुस्तक की विषयसूची के) जिनका अर्थ मुझे पता नहीं
अनुकरणवाचक ---> ?
अध्याय ---> ?
विकारी शब्द ---> ?
अव्यय ---> ?
विकृत ---> ?
वाक्यविन्यास ---> ?
( मुझे वाक्य का अर्थ पता है , वाक्य = sentence; पर वह दूसरा शब्द का मतलब क्या होता है ? और दोनो शब्द का मतलब एक दूसरे के क्या होता है ? )
क्रियार्थक ---> ?
( मुझे क्रिया का अर्थ पता है क्रिया = verb; पर वह दूसरा शब्द का मतलब क्या होता है ? aur और दोनो शब्द का मतलब एक दूसरे के क्या होता है ? )
भूतकाळिक कृदंत ---> ?
विरामचिह्न ---> ?
काव्यस्वतंत्रता ---> ?
What is the different between वर्ण & लिपि ?
What is the different between भाग , परिच्छेद , खंड , अध्याय ? क्या इन में से कोई arrangement है ? ( जैसे : भाग > परिच्छेद > खंड > अध्याय)
अगर आप के पास Dictionary Program (Hindi to English & Hindi to Hindi BOTH) है तो please ईमेल से attach कर दीजिए।
जवाब देने के लिए शुक्रया,
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यदि ईरान की एक लड़की यह कर सकती है, निश्चय ही अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, दुबई आदि खाड़ी के देशों में ऐसे हजारों लोग होंगे जो हिंदी भली-भांति समझते होंगे। यह सब हिंदी फिल्मों का ही कमाल है। खेद की बात यही है कि आजकल हिंदी फिल्म निर्माता अमरीका, यूके, कनाडा आदि पर नजर टिकाए हुए हैं, और वहीं के भारतीयों को ध्यान में रखते हुए फिल्में बना रहे हैं। उनकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने फिल्मों के शीर्षक आदि हिंदी-उर्दू में न देकर अंग्रेजी में देने लगे हैं। इससे सपना चांदनी जैसे हजारों हिंदी के रसिकों को हिंदी सीखने में कितनी कठिनाई आ रही होगी, इसका शायद हिंदी फिल्म निर्माताओं को अंदाजा नहीं है।
काश हिंदी फिल्म निर्माताओं में भी हिंदी के प्रति थोड़ा लगाव होता। पर इसकी आशा करना तो बालू से तेल निकलने की आशा करने के समान है। सुना है कई अभिनेता-अभिनेत्रियां इतनी कम हिंदी जानती हैं कि उनके डायलोग या तो डब कराए जाते हैं (कैटरीना कैफ के संबंध में ऐसा कहा जाता है) या डायलोग अंग्रेजी लिपि में लिखवाकर उनसे पढ़ाया जाता है। फिल्म निर्माता करण जौहर के संबंध में भी कहा जाता है, कि उसे हिंदी नहीं आती है।
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माओवादी स्वामी अग्निवेश की भूमिका में

माओवादियों ने बिहार के वैशाली जिले के गरीब ग्रामीणों को आदेश दिया है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजें।
पटना से 40 किमी दूर स्थित वैशाली के माओवादियों ने हाशिए पर धकेल दिए गए निर्धन ग्रामीण परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार लाने हेतु यह अनोखा कदम उठाया है। उन्होंने गरीब परिवारों से कहा है कि वे अपने बच्चों से मजदूरी न करवाकर उन्हें पढ़ाएं।
माओवादियों का यह फरमान छह-सात विकास खंडों में जारी किया गया है, जिनमें शामिल हैं, पतेपुर, महनार, जनदहा, महुआ, लालगंज और हाजीपुर। माओवादियों ने कई गांवों में हाथ से लिखे इश्तहार लगाए हैं, जिनमें ग्राम वासियों को चेतावनी दी गई है कि यदि वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भजेंगे तो उन्हें कड़ी सजा दी जाएगी।
माओवादियों के इस तेवर ने जिला अधिकारियों को अचंभे में डाल दिया है। वे इसका स्वागत तो करते हैं, और यह भी मानते हैं कि माओवादियों की तरफ से आने से इसका पालन भी अधिक होगा, लेकिन वे आशंकित भी हैं, कि इससे माओवादियों की छवि सुधरेगी और आम जनता में उनका रुतबा भी बढ़ेगा, जिससे सरकार के लिए उन्हें नियंत्रण में लाना और भी मुश्किल हो जाएगा।
यह खबर काफी दुविधापूर्ण है एक आम भारतीय के लिए। कई अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि बाल मजूरी बंद करवाने के अनेक सामाजिक-आर्थिक फायदे हैं। बच्चों का शोषण तो रुकता ही है, इससे मजदूरी भी बढ़ती है। बच्चों से कराए गए श्रम के लिए अधिक मजदूरी नहीं दी जाती। बाल श्रम के कारण वयस्क मजदूर को काम नहीं मिल पाता है और मिलता भी है, तो बहुत कम मजदूरी पर। जब लगभग मुफ्त ही बच्चों से काम कराया जा सकता हो, तो वयस्क मजदूरों को पूरी मजदूरी पर क्यों रखा जाए? दूसरे, जब बच्चे पढ़-लिख लेते हैं, तो वे अधिक आय दिलानेवाले काम कर सकते हैं, और इस तरह गरीबी के कुचक्र को तोड़ सकते हैं। अपढ़ बच्चे, बड़ा होकर अकुशल काम ही कर सकते हैं, जिसमें अधिक आय की संभावना नहीं रहती है। इसके अलावा छोटी उम्र में ही, जब शरीर का पूर्ण विकास नहीं हुआ होता है, कड़े श्रम में लगाए जाने से बहुत से बच्चों का स्वास्थ्य इस कदर टूट जाता है कि बड़ा होने पर वे अधिक श्रम करने की स्थिति में नहीं रहते। इससे भी उनकी कमाने की क्षमता कुंठित हो जाती है। यदि बच्चे स्कूल जाएं और वहां मिड-डे मील आदि योजनाओं से उन्हें पोषक भोजन नियमित रूप से मिले, तो उनका शारीरिक और बौद्धिक विकास ठीक प्रकार से होगा और बड़ा होकर वे पूर्ण स्वस्थ और कठिन से कठिन काम करने में भी सक्षम हो जाएंगे। इस तरह वे पढ़े-लिखे, स्वस्थ सुंदर युवक-युवतियां बन जाएंगे, जिन पर देश और समुदाय को नाज हो।
दुख इस बात का ही है कि जो काम सरकार को करना चाहिए था, वही काम बागी संगठन कर रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि माओवादी केवल एक आतंकवादी गिरोह नहीं हैं, बल्कि बिहार आदि में राज्य संचालन का काम भी करते हैं, जिसमें कर वसूलना, न्याय करना, जन-हित के काम करना आदि भी शामिल हैं। एक तरह से माओवादियों ने अपने इलाकों में भारतीय राज्य की सत्ता का स्थानापन्न कर दिया है। यह चिंता की बात है। जल्द से जल्द जन कल्याणकारी नीतियां अपनाकर भारतीय राज्य को माओवादियों की इस नैतिक विजय को निरस्त करना होगा।
इसके साथ ही माओवादियों के इस कदम की सराहना किए बिना भी नहीं रहा जाता, भले ही वह राजनीति प्रेरित क्यों न हो।
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चित्र के बारे में - स्वामी अग्निवेश, जिन्होंने बाल मजूरी उन्मूलन को अपने जीवन का मिशन बना लिया था।
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बुधवार, जून 10, 2009
बच्चों का व्यापारी गिरफ्तार, 7 बच्चे छुड़ाए गए

तिरुनेलवेली, तमिलनाडु से खबर है कि सरकारी अस्पताल से एक बालिका को चुराते समय धनमनि नाम की एक महिला पकड़ी गई है। इससे की गई पूछताछ के फलस्वरूप पूरे तमिलनाडु में फैले बच्चों के व्यापारियों का एक बड़ा गिरोह भी प्रकाश में आया है।
पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया है, और 7 बच्चों को उनसे छुड़ाया है। इनमें से 5 बच्चों को उनके मां-बांप को लौट दिया गया है। बाकी दो के परिवारों की खोज की जा रही है। गिरफ्तार लोगों में राजन नामक एक व्यक्ति भी है जो बच्चों के लिए एक अनाथालय चलाता है।
ये लोग निस्संतान लोगों को बच्चे बेचते थे। कुछ बच्चे कारखानेदारों, दुकानदार, होटल मालिकों, आदि को बाल श्रमिक के रूप में भी बेचे जाते थे। लड़कियां वैश्यालयों को बेची जाती थीं। एक बच्चे की कीमत 40-50 हजार रुपए बताई जाती है।
हमारे देश में बाल मजूरी जोरों से चल रही है, इसका यह घटना एक पुख्ता सबूत है। आश्चर्य और क्षोभ की बात यह है कि तमिलनाडु जैसे प्रगतिशील राज्य में भी, जहां बच्चों की शत-प्रतिशत स्कूल भर्ति होती है और मिड-डे मील आदि परियोजनाएं सुशासित रूप से चलाई जाती हैं – वहां भोजन में सांप आदि नहीं मिलते, जैसे अभी हाल में झारखंड से खबर आई है – बाल मजूरी इतने बड़े पैमाने पर हो रही है।
विशेषज्ञ यही कहते आ रहे थे कि बाल मजूरी उन्मूलन का सबसे कारगर तरीका सभी बच्चों को स्कूली शिक्षण देना है। पर तमिलनाडु की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या केवल स्कूल शिक्षण से बाल मजूरी का उन्मूलन हो जाएगा? क्या सरकार और समाज को कुछ और भी करने की आवश्यकता है? यदि हां, तो वह क्या है?
हर भारतीय को इस घटना को गंभीरता से लेते हुए इन प्रश्नों पर विचार करना चाहिए ताकि इस देश को जल्द से जल्द बाल-श्रम मुक्त किया जा सके।
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आस्ट्रेलिया ने आखिर कबूल कर ही लिया कि ये हमले नस्लवादी ही थे
आखिरकार आस्ट्रेलिया की पुलिस को कबूल करना ही पड़ा है कि भारतीय छात्रों पर मेलबर्न में हो रहे हमले नस्लवाद-प्रेरित ही हैं। ये हमले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वहां की पुलिस भी भारतीय छात्रों पर पक्षपात करने पर उतारू हो गई है और उसने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे भारतीय छात्रों को भी लाठियों से पीट डाला है। आखिर भारतीय छात्रों ने भी अपनी रक्षा खुद करना तय कर लिया है। वे टोलियां बनाकर अपने घरों और संपत्ति की हिफाजत करने लगे हैं। और इन हमलों को चुपचाप सहते जाने के बजाए, युद्ध को शत्रु के खेमे में ले जाकर उन्होंने एक 20-वर्षीय श्वेत नस्लवादी को चाकू भोंककर घायल भी कर दिया है। एक अन्य श्वेत नस्लवादी की कार को भी उन्होंने फूंक डाला है। ऐसा लग रहा है कि आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया है, कम-से-कम भारतीयों के लिए! आस्ट्रेलिया तेजी से भारतीयों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान बनता जा रहा है।
मामला हाथ से निकलता देखकर आस्ट्रेलिया को अग्नि-शमन का काम करना पड़ा रहा है। उसने टोकेनिज़म का सहारा लेते हुए पूर्वी आफ्रिका से आस्ट्रेलिया में आकर बसे भारतीय मूल के पीटर वर्गिस को राजदूत बनाकर भारत भेजा है। आस्ट्रेलिया पुलिस ने भी अपना रुख बदलकर इन हमलों के नस्लवादी स्वरूप को स्वीकारा है।
इधर भारत में भी इन हमलों के विरोध में कई तरह के पहल किए जा रहे हैं। सरकार तो अपना काम कर ही रही है, भारतीय नागरिक भी पीछे नहीं हैं। यहां अहमदाबाद में आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिताओं ने अपना एक संघ बना लिया है, जिसका नाम है, अनिवासी भारतीयों के अभिभावकों का संघ। उसका कार्यालय आकाशदीप अपार्टमेंट, अंबावाडी, अहमदाबाद में स्थापित किया गया है।
यह संगठन उन लोगों को सदस्य बनने के लिए आमंत्रित कर रहा है, जिनके बच्चे आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे हैं। संघ का ध्येय है, जब भी किसी भारतीय पर हमला हो, तुरंत उसके शिकार हुए भारतीय मूल के व्यक्ति को मदद पहुंचाना और हर उपलब्ध मंच से इन हमलों का विरोध प्रकट करना।
यह संगठन इन हमलों को संयुक्त राज्य संघ में उठाने पर भी विचार कर रहा है। संगठन के अध्यक्ष दशरथ पटेल ने आस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त को पत्र भी लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है, “चूंकि आपकी सरकार ने हमारे बच्चों को आस्ट्रेलिया में पढ़ने के लिए वीजा दिया है, आपकी सरकार का यह फर्ज भी बनता है कि इन बच्चों की हिफाजत का इंतजाम भी करे और उन्हें इन हमलों से बचाए। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि बिना विलंब इन अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।“
उधर अमिताभ बच्चन द्वारा आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय की डाक्टरेट की पदवी ठुकरा देने के बाद हिंदी फिल्म उद्योग ने भी यह निश्चय कर लिया है कि वह आस्ट्रेलिया में शूटिंग नहीं करेगा। आस्ट्रेलिया में
कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, जैसे दिल चाहता है, सलाम नमस्ते, और बचना ए हसीनो। बोलीवुड फिल्मों की शूटिंग से आस्ट्रेलिया को आमदनी तो होती ही है, उससे भी ज्यादा ढेर सारी पब्लिसिटी भी मिलती है, जिससे उसकी छवि भी सुधरती है और उसके पर्यटन उद्योग को भी लाभ पहुंचता है। अब हिंदी फिल्म निर्माताओं द्वारा आस्ट्रेलिया को ब्लैकलिस्ट कर देने से आस्ट्रेलिया इन सब फायदों से वंचित रह जाएगा।
एक आम आदमी की हैसियत से भी हम आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लवादी हिंसा का विरोध करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं –
- आस्ट्रेलिया में बनी चीजों का बहिष्कार।
- छुट्टियां मनाने आस्ट्रेलिया न जाना।
- अपने बच्चों को आस्ट्रेलिया पढ़ने न भेजना।
- वहां पढ़ रहे बच्चों को वापस बुला लेना।
- आस्ट्रेलिया में बसने का विचार छोड़ना।
- आईपीएल आदि खेल प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलिया की टीम टीवी पर आने या किसी विज्ञापन में आने पर टीवी बंद कर देना या चैनल बदल देना।
- आस्ट्रेलिया के नस्लवाद के विरोध में अपने ब्लोगों में लिखना, अखबारों को इस विषय पर पत्र लिखना और आस्ट्रेलिया के अधिकारियों को ईमेल भेजना।
और भी कोई तरीका हो तो बताएं।
इन हमलों को लेकर मेरी भी एक थ्योरी है जो दूर की कौड़ी हो सकती है, पर मुझे वजनदार लगती है।
मेरा मानना है कि आर्थिक मंदी से तबाह हुए यूरोप में आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को आस्ट्रेलिया में यूरोपीय मूल के गोरे लोगों को अधिकाधिक संख्या में ले आने काअवसर दिख रहा है। याद रहे कि आस्ट्रेलिया अभी हाल तक घोषित रूप से “श्वेत ही आस्ट्रेलिया में बस सकते हैं” वाली नीति पर चल रहा था। उसे यह नीति दूसरे महायुद्ध के बाद इसलिए बदलनी पड़ी क्योंकि इस युद्ध के बाद यूरोप में नवनिर्माण कार्य शुरू हुआ और यूरोप के सभी श्रमिकों को इसी में काम मिल गया। इससे यूरोप के गोरे आस्ट्रेलिया आदि को उत्प्रवास करने को प्रस्तुत नहीं हुए। झकमारकर आस्ट्रेलिया को अपनी नस्लवादी नीति बदलकर दूसरे देशों के लोगों के लिए भी आस्ट्रेलिया के दरवाजे खोलने पड़े। पर आस्ट्रेलिया में अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो श्वेत आस्ट्रेलिया के सपने देखते हैं, उसी प्रकार जैसे भारत में कुछ लोग अब भी हिंदू राष्ट्र का सपना देखते हैं, हालांकि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रभाव में आए 50 से भी अधिक साल हो चुके हैं।
अब यूरोप के सभी देशों की अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई है। वहां बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और मुफलीसी एक बार फिर प्रकट हो गई है। आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को इसमें अवसर नजर आ रहा है। वे सोच रहे हैं कि इन तंग हाल यूरोपियों को आस्ट्रेलिया में आकर बसाया जा सकता है। लेकिन यह तभी हो सकेगा जब आस्ट्रेलिया में इनके लिए नौकरियां हों। आस्ट्रेलिया स्वयं भी इस आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था में और लोगों को नौकरी देने की क्षमता नहीं है। नौकरियां निर्मित करने का एक तरीका है भारतीयों पर हमले करके उन्हें डराना-धमकाना, ताकि वे आस्ट्रेलिया छोड़कर चले जाएं। उनके द्वारा खाली की गई जगहों पर यूरोप से आए श्वेतों को रखा जाए।
पोलैंड, चेकोस्लाविया, हंगरी आदि निर्धन यूरोपीय देशों में आस्ट्रेलिया के एमिग्रेशन एजेंटों की कारगुजारी पर हमें नजर रखना चाहिए। यदि वहां पिछले कुछ महीनों में उनके क्रियाकलापों के बढ़ जाने के प्रमाण मिले, तो यह इसका पक्का सबूत होगा कि भारतीयों पर हमले एक सोची-विचारी व्यापक रणनीति के तहत किए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य भारतीयों को आस्ट्रेलिया से खदेड़ना है।
इस तरह के प्रयास अन्य देशों में भी पहले सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं, मसलन, युगांडा, कीनिया, फीजी, मोरीशियस, त्रिनिडाड, आदि। हमें इन देशों में अपने देशवासियों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए।
यदि हम आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों के सभी पक्षों पर बारीकी से विचार करते हुए अपनी रणनीति तय न करें, तो आने वाले कुछ दशकों में आस्ट्रेलिया से भी भारतीयों के पैर उसी प्रकार उखड़ जाएंगे, जैसे युगांडा, केनिया, आदि से उखड़े थे।
क्या लगता है आपको, आस्ट्रेलिया में हो रहे हमलों के पीछे यह साजिश भी हो सकती है?
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कानों की खबर

उम्र के बढ़ने के साथ-साथ शरीर के अधिकांश अंग कमजोर पड़ जाते हैं और उनका बढ़ना बंद हो जाता है, जैसे, नेत्र, दांत, बाल आदि।
पर कानों की प्रवृत्ति इससे कुछ भिन्न होती है, जैसा कि ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की एक रिपोर्ट से पता चलता है। एक अध्ययन में ब्रिटन के 206 वृद्ध पुरुषों के कानों का अध्ययन किया गया।
इससे पता चला कि पुरुषों के कान 30 साल की उम्र के बाद भी 0.22 मिलीमिटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ते रहते हैं, यानी 80 साल के होते-होते कान 11 मिलीमिटर अधिक लंबे हो जाते हैं।
क्या महिलाओं के कान भी बढ़ते हैं? कहना मुश्किल है, क्योंकि यह अध्ययन केवल पुरुषों के कानों पर किया गया है!
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चित्र के बारे में: मेरे कान का फोटो!!
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मंगलवार, जून 09, 2009
तरबूज, गृहणी और विज्ञान

तरबूज खरीदने निकली हर गृहणी ने इस समस्या का सामना किया होगा, कि यह कैसे तै करें कि तरबूजवाले की दुकान में लगे तरबूजों की अंबार में से कौन-सा तरबूज ठीक प्रकार से पका हुआ है। तरबूजों की खोल से इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि पके और कच्चे दोनों प्रकार के तरबूजों का खोल एक समान हरा होता है। न खोल की सतह की कड़ाई या कोमलता से ही तरबूज के भीतर की स्थिति का ठीक पता लगता है, पके तरबूज का खोल कच्चे तरबूज के खोल से कुछ भी अधिक मुलायम नहीं होता। ऐसे में यदि दुकानदार तरबूज का फांका निकालकर दिखाने को तैयार न हो, तो तरबूज खरीदना एक जुआ ही होता है। किस्मत अच्छी रही तो रसदार, पका तरबूज आपके हाथ लगेगा, वरना आपके पैसे बरबाद।
गृहणियों की इस पेचीदा समस्या पर डेलावेर विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने गौर किया है और उन्होंने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है, जो तरबूज को बिना चीरे ही उसके भीतर के रहस्य का खुलासा कर देता है। इस उपकरण में एक दोलक का इस्तेमाल होता है, जो तरबूज से टकराता है। टकराने से हुई ध्वनि को एक लैपटोप कंप्यूटर विश्लेषित करता है। ध्वनि के तरंगदैर्घ्य तथा प्रतिध्वनिक विशेषताओं के आधार पर कंप्यूटर तरबूज के पके होने या न होने की सूचना देता है। एक प्रयोग में इस उपकरण से मात्र 12 सेकेंड में ही पके तबूज की पहचान हो सकी।
छात्रों की इस खोज से गृहणियां प्रसन्न होंगी ऐसा नहीं लगता क्योंकि दस-बीस रुपए के तरबूज के लिए कौन हजारों रुपयों का कंप्यूटर खरीदेगा? लेकिन यह जरूर है कि गृहणियां अब यह शिकायत नहीं कर पाएंगी कि विज्ञान रोजमर्रा की छोटी-छोटी समस्याओं पर ध्यान नहीं देता।
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ब्राजील के पास गायब हुए विमान के दुर्घटना के वक्त के सनसनीखेज फोटो


ये फोटो मुझे जंक मेल में मिले। पता नहीं ये वास्तविक हैं अथवा फोटोशोप का कमाल। इन फोटोओं के साथ एक विस्तृत संदेश भी अंग्रेजी में था। उसका अनुवाद नीचे दे रहा हूं।। आप खुद पढ़कर निर्णय कर लें।
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कुछ दिन पहले एयर फ्रांस का ए330 विमान रियो और पैरिस के बीच उड़ान भरते समय अतलांतिक महासागर में गयाब हो गया था। एक दिन बाद इस उड़ान के एक यात्री द्वारा उड़ान के दौरान लिए गए कुछ फोटो विमान के मलबे में पड़े एक कैमरे से प्राप्त हुए। ये चित्र विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के कुछ सेकंड पहले लिए गए थे। यह दुर्घटना बीच हवा में 35,000 फुट की ऊंचाई पर एयर फ्रांस के विमान के एक दूसरे विमान, Embraer Legacy, से टकराने से हुई। एयर फ्रांस का विमान तो समुद्र में गिरकर डूब गया और उसमें सवार सभी लोग मारे गए। लेकिन दूसरा विमान बच गया, हालांकि उसका एक पंख इस भिडंत में उखड़ गया। फिर भी वह किसी तरह अमेजन के जंगल में सकुशल उतर सका। इस विमान के चालाक तथा यात्रियों को बिलकुल पता नहीं चला कि उनके विमान के साथ क्या हुआ था।
यहां दिए गए दोनों फोटो एयर फ्रांस विमान के एक यात्री द्वारा दोनों विमानों के टकराने के तुरंत बाद विमान के समुद्र में गिरने से ठीक पहले विमान के अंदर से लिए गए थे। उसके कैमरे के अंदर स्थित मैमरी स्टिक से ये फोटो प्राप्त हुए। पहले फोटो में विमान की छत पर एक बड़ा छेद दिखाई दे रहा है जिससे विमान का पिछला पंख (टेलप्लेन) और ऊर्ध्व फिन दिखाए दे रहे हैं। दूसरे फोटो में एक यात्री इस विशाल छेद से वायु दाब के कारण खिंचते हुए विमान के बाहर जाता हुआ नजर आ रहा है।
ये फोटो एक डिजिटल Casio Z750 कैमरे में मिले। यह कैमरा सेरा डो कचिंबो में मिले एयर फ्रांस विमान के मलबे में कोकपिट के पास से प्राप्त हुआ। यद्यपि कैमरा टूटफूट गया था, उसका मैमरी स्टिक सही हालत में था। कैमरे के सीरियल नंबर से पता चला है कि यह पोलो जी मुलर नामक व्यक्ति का कैमरा है। वह पोर्टो एलग्रे के पास रहनेवाला एक अभिनेता था जो बच्चों के नाटकों में भूमिकाएं अदा करता था।
अद्भूत बात यह है कि दुर्घटना के वक्त उसे फोटो लेने की सूझी। हम कल्पना कर सकते हैं कि दुर्घटना के वक्त वह विमान के आगे के भाग में कैमरा लिए खड़ा था। इसीलिए कैमरा कोकपिट के मलबे में मिला। दूसरे विमान से टकराने से एयर फ्रांस के विमान का इंजन अलग हो गया था, जिससे विमना हल्का हो गया और धीमी गति से नीचे गिरने लगा। इससे कैमरे को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा। लेकिन विमान में विद्यमान कोई भी जीवित नहीं बच सका। पोलो मिलर के दो बेटियां हैं, ब्रूना और बिएट्रिस।
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Labels: विविध, हवाई दुर्घटना के फोटो

















