Friday, August 14, 2009

मनुष्य रंगों को क्यों पहचान पाता है?

मानव निरीक्षण - 4

मनुष्य उन प्राणियों में से है जिनमें रंगों की पहचान की क्षमता काफी विकसित होती है। रंगों की पहचान करने के लिए हमारी आंखों में तीन प्रकार के प्रकाश-संवेदी शंकु कोशिकाएं हैं, जो क्रमशः लाल, हरे और नीले रंगों के प्रति संवेदनशील होती हैं। ये तीनों प्राथमिक रंग हैं और इनके मिश्रण से ही अन्य रंग उत्पन्न होते हैं।

इसके विपरीत, कुत्ते, शेर, हिरण, घोड़े आदि में दो शंकु कोशिकाएं ही होती हैं, जो केवल दो रंगों को ही पकड़ पाती हैं। इसलिए ये जानवर उतने रंगों को पहचान नहीं सकते जितने मनुष्य।

समुद्र की कुछ मछलियों और पक्षियों की आंखों में चार तक शंकु कोशिकाएं होती हैं, जो अलग-अलग चार रंगों को पहचानने में सक्षम होती हैं। इसलिए इन मछलियों और पक्षियों में रंगों की पहचान क्षमता मनुष्य से कहीं अधिक परिष्कृत होती है।

इस तरह हम देखते हैं कि रंगों की पहचान की क्षमता सभी जीवों में एक समान नहीं है, कुछ जीव कम रंगों को ही पहचान पाते हैं, जब कि कुछ अधिक। मनुष्य उन जीवों में गिना जाता है जिसमें रंगों की पहचान की अपेक्षाकृत अधिक क्षमता है। सवाल यह है कि मनुष्य में रंगों की पहचान की क्षमता क्यों है।

आम तौर पर ऐसे जानवरों में रंगों की पहचान की क्षमता अधिक पाई जाती है जिनके लिए यह क्षमता उपयोगी है। मनुष्य अपने विकास क्रम के प्रारंभिक दिनों में वृक्षों में काफी समय बिताता था और मुख्यतः वानस्पतिक पदार्थ खाता था, जैसे पत्ते, फूल, फल, टहनी आदि। अनेक पौधों में पत्ते आदि कुछ खास अवस्था में ही खाने योग्य होते हैं। उसके बाद उनमें जहरीले तत्व जमा हो जाते हैं और उन्हें खाना हानिकारक होता है। अथवा एक खास अवसथा में ही उनमें पौष्टिक सामग्री रहती है, बाद में वे कम पौष्टिक रह जाते हैं। उदाहरण के लिए जब पत्ते, डंठल, टहनी आदि कोमल होते हैं उनमें पोषक सामग्री ज्यादा होती है। जब पत्ते आदि पुराने हो जाते हैं, उनमें से पोषक सामग्री भी निकल जाती है। इसी प्रकार कई फल कच्ची अवस्था में खाने योग्य नहीं होते, पकने पर ही खाने योग्य होते हैं। इन सब अवस्थाओं में इनका रंग अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए टमाटर को ही लीजिए। शुरू-शुरू में वह गहरे हरे रंग का होता है, फिर इस हरे में गुलाबी रंग घुलने लगता है, जो गहराता जाता है और जब टमाटर पूरा पक जाता है, तो वह खून की तरह लाल रंग का हो जाता है। इसी तरह पत्ते प्रारंभ में तांबई रंग के होते हैं, फिर गहरे हरे हो जाते हैं। जब वे मुरझाने लगते हैं, तो पीले हो जाते हैं। इस तरह खाने की इन चीजों के रंग में निरंतर सूक्ष्म परिवर्तन होता रहता है, जो उनकी पौष्टिकता की ओर भी संकेत करता है। इन्हें खानेवाले जीवों में इन परिवर्तनों को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए, और वह विकास-क्रम के दौरान अपने आप ही विकसित भी हो जाती है।

आदि मानव के लिए रंगों की पहचान इसीलिए बहुत आवश्यक था। इसके बिना उसके लिए पौधों द्वारा दर्शाए गए इन सूक्ष्म रंग-संकेतों को पढ़कर यह तय कर पाना मुश्किल होता कि कौन सा पत्ता, फल, फूल या टहनी कब खाने योग्य है। इसीलिए मनुष्य में रंगों को पहचानने की क्षमता ऊंचे दर्जे की पाई जाती है।

आम तौर पर वृक्षों में रहनेवाले और फल-फूल आदि वानस्पतिक सामग्री अधिक खानेवाले दिवाचर प्राणियों में रंगों को पहचानने की ऊंचे दर्जे की क्षमता पाई जाती है।

इसलिए मनुष्यों में विद्यमान ऊंचे दर्जे की रंगों की पहचान करने की क्षमता यह भी सूचित करती है कि वह मूलतः फल-फूल-पत्ते खानेवाला दिवाचार प्राणी है। उसके शरीर के अन्य अवयवों से भी इसकी पुष्टि होती है, उदाहरण के लिए उसका पाचन तंत्र, दंत-पक्ति, जबड़े आदि यही दर्शाते हैं कि वह वानस्पतिक भोजन खाने के लिए बना है। मनुष्य में अन्य जानवरों को मारने के अवयवों का अभाव, जैसे तीक्ष्ण दांत या नाखून भी यही सूचित करता है कि मनुष्य मांसाहारी जीव नहीं है। लेकिन विकास-क्रम के दौरान उसे मांस-भक्षण भी अपनाना पड़ा है। यह उसकी सफलता का एक कारण भी बना। मांस-भक्षण से उसकी आहार-सूची में एक नया, सभी जगह विद्यमान भोजन-स्रोत जुड़ गया। जो प्राणी विभिन्न प्रकार के भोजन पचा सकता हो, उसकी उत्तरजीविता भी बढ़ जाती है। इसी कारण मनुष्य, चूहे, तिलचट्टे आदि प्राणी अधिक सफल हो पाए हैं, क्योंकि ये सब लगभग सभी कुछ खाकर जीवित रह सकते हैं और इसलिए पृथ्वी के हर कोने में फैल सके हैं। इसके विपरीत सीमत भोजन-स्रोतों पर निर्भर प्राणी सीमित क्षेत्रों में और सीमित संख्याओं में ही रह पाते हैं जहां उनके अनुकूल भोजन-स्रोत उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए पांडा नामक जीव केवल बांस के कोमल डंठलों को खाता है। वह वहीं रह सकता है जहां बांस के जंगल हों। एक अन्य उदाहरण आस्ट्रेलिया का कोला नामक जीव है, जो केवल यूकालिप्टस वृक्ष के पत्ते ही खाता है। वह भी उन्हीं जंगलों में रह सकता है जहां यूकालिप्टस के वृक्ष बहुतायत में हों।

6 Comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ज्ञानवर्धक आलेख।

Arkjesh said...

रंग पहचानने की क्षमता के विकास के बारे बढ़िया विश्लेषण |

गिरिजेश राव said...

मतलब यह कि हम जो देखते हैं वह बस मनुष्यों के लिए सत्य होता है। बाकी प्राणियों को वह कुछ और दिखता है।

जैनियों का स्यादवाद?

AlbelaKhatri.com said...

umda
abhinav aalekh
badhaai !
jai hind !

बालसुब्रमण्यम said...

गिरिजेश जी, कुछ-कुछ ऐसा ही है। उदाहरण के लिए मधुमक्खियां पराबैंगनी रोशनी को भी देख लेती हैं, उन्हें दुनिया अलग ही तरह की दिखती होगी।

इसी प्रकार, कुत्ते, शेर, घोड़े ऐसी फ्क्रीक्वेन्सी की ध्वनियां भी सुन सकते हैं जो हम नहीं सुन सकते।

इसलिए इंद्रिय-गोचर संसार और वास्तविक संसार में काफी फर्क होता है।

दार्शनिकों ने इस पर काफी कलम चलाया है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

हिन्दी में इन विविध विषयों पर लिखने की बहुत आवश्यकता है! धन्यवाद।

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